दुर्भाग्य ने झारखण्ड आन्दोलन का साथ कभी नहीं छोड़ा। झारखण्ड आन्दोलन एक तरफ तो बिनोद बिहारी महतो के दिशा-निर्देश तथा विचार धारा के सहारे आगे बढ़ने लगा, तो दूसरी तरफ उनकी इमानदारी ने राजनीति में एक नये आयाम की सृष्टि की। बिना पैसे के चुनाव लड़ो। मतदाताओं को प्रलोभन देकर नहीं, समझदारी देकर चुनाव लड़ो। पर झारखण्ड मुक्ति मोर्चा में घुन उसके गठन के बाद से ही लगने लगा था। 1974 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण का सामाजवादी काँग्रेस-विरोधी आन्दोलन जो जे0 पी0 आन्दोलन के नाम से मशहूर हुआ। वह आन्दोलन तेजी पर था। काँग्रेस की सरकार जो केन्द्र तथा बिहार दोनों जगहों पर काबिज थी, ने इस आन्दोलन के दमन की पूरी व्यवस्था की। नये-नये कानून बनाए गये। मेंटटिनेन्स ऑफ इन्टरनल सेक्यूरिटी एक्ट बना। इधर श्रीमती इंदिरा गाँधी की सरकार ने देश में आपातकाल लगा दिया। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा, मासस, कम्यूनिष्ट पार्टी, जनसंघ आदि सभी काँग्रेस विरोधी पार्टी एक जुट होकर इस आपातकाल में भी काँग्रेस का विरोध कर रही थी। दर्जनों केस-मुकदमें बिनोद बिहारी महतो आदि नेताओं पर लादें गये। आपातकाल के लागू होने के ठीक पहले बिनोद बिहारी महतो को मीसा के तहत मार्च 1974 में गिरफ्तार कर लिया गया। उसी प्रकार शक्ति नाथ, सदानन्द झा, पुनित महतो, चूड़ामण महतो, हीरामण महतो, ए0 के0 राय, के0 एस0 चटर्जी आदि नेताओं को उत्तरी छोटानागपुर में गिरफ्तार किया गया, जिनका संबंध झारखण्ड आन्दोलन से रहा था। उसके अलावा भी छत्रुराम महतो इत्यादि जनसंघ के नेताओं को भी इस क्षेत्र से गिरफ्तार किया गया। इनका विवरण देना आवश्यक नहीं। यह बात सर्व विदित है, कि पूरे झारखण्ड क्षेत्र में सैकड़ों की तादाद में छोटे-बड़े विभिन्न राजनैतिक दलों के नेताओं को आपातकाल के दौरान गिरफ्तार किया गया था।
पर जो सबसे आश्चर्य की बात हुई, वह यह थी कि झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के महामंत्री शिबू सोरेन आपातकाल में जेल नहीं गये। क्या उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया ? और अगर गिरफ्तार किया गया था तो तुरंत छोड़ा कैसे गया। पाया गया कि शिबू सोरेन ने बिहार के तत्कालिन मुख्यमंत्री जगरन्नाथ मिश्रा से मिलकर समझौता कर लिया तथा काँग्रेस की नीतियों का समर्थन कर दिया। इस प्रकार काँग्रेस को समर्थन देने एवं काँग्रेस विरोधियों से अलग हो जाने के कारण शिबू सोरेन जेल जाने से बच गये। आपात काल में इसी कारण 1975 में चार फरवरी का झारखण्ड मुक्ति मोर्चा का स्थापना दिवस शिबू सोरेन ने अलग से टुण्डी मे मनाया जिसमें बतौर मुख्य अतिथि जगरनाथ मिश्रा शरीक हुए। धनबाद के गोल्फ मैदान में स्थापना दिवस मनाने के लिए कोई बड़ा नेता नहीं बचा था, सभी जेल की हवा खा रहे थे। उस साल राज किशोर महतो के नेतृत्व में वहाँ स्थापना दिवस मनाया गया। फिर भी भीड़ उमड़ पड़ी थी।
शिबू सोरेन ने आपात काल 1975 में जो बिनोद बाबू का साथ छोड़ा तो सीधे काँग्रेस में शामिल हो गये और वहीं जम गये। करीब तीन वर्षो तक बिनोद बाबू अकेले रहे एवं आन्दोलन करते रहे। उनके सहयोगी ऐ0 के0 राय रह गये थे। श्री सोरेन 1977 के लोक-सभा चुनाव तक काँग्रेस के साथ रहे।
1977 में जे0 पी0 आन्दोलन के समय लोक-सभा का चुनाव आया तो बिनोद बिहारी महतो एवं ऐ0 के0 राय को गिरिडीह एवं धनबाद लोक-सभा से चुनाव लड़वाने का फैसला लोक नायक जय प्रकाश नारायण ने ले लिया था। उस समय जनसंघ आदि पाटियों ने मिलकर “जनता पार्टी” बनाई थी।
व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा हमेशा से ही एकता में बाधक रही है। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से श्री ऐ0 के0 राय भी ग्रस्त हो गये एवं उनके समर्थकों ने धनबाद लोक-सभा सीट के लिए जनता पार्टी का समर्थन काँग्रेस के विरूद्ध श्री राय के लिए ले लिया। गिरिडीह की सीट में कुछ ऐसी हालात उनके समर्थकों ने पैदा किया कि बिनोद बाबू को बहला फुसला कर पटना से धनबाद वापस ले आया गया और वह समर्थन रामदास सिंह जी को गिरिडीह लोक-सभा के लिए मिला। ऐसा बिनोद बाबू के समर्थक दल मासस के तत्कालीन महासचिव उमाशंकर शुक्ल एवं के0 पी0 भट्ट ने किया श्री राय जेल में थे और बिनोद बाबू को भी वहाँ से हटा दिया गया था। जो लोग सीटों पर बात करने गये थे उन्होनें राय के लिए सीट माँग ली, पर बिनोद बाबू के लिए नहीं। 1977 का चुनाव बिनोद बाबू अकेले लड़े। उस लोक सभा चुनाव में काँग्रेस के टिकट से डा0 इम्तियाज अहमद (डा0 शब्बा अहमद के पिता ) गिरिडीह से लड़ रहें थे। शिबू सोरेन इस चुनाव में काँग्रेस की तरफ से खुलकर प्रचार-प्रसार कर रहें थे। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के उम्मीदवार तीर-धनुष चिन्ह से चुनाव लड़ने वाले पार्टी के अध्यक्ष बिनोद बाबू के खिलाफ शिबू सोरेन काँग्रेस के उम्मीदवार को जिताने में लगे थे। इधर ऐ0 के0 राय अपने को संयुक्त उम्मीद्वार बताकर लड़ रहें थे और बिनोद बाबू के समर्थकों शिबा महतो बगैरह को लेकर बिनोद बाबू का विरोध गिरिडीह में कर रहें थे एवं साझा उम्मीद्वार रामदास सिंह का समर्थन कर थे।
झामुमो के शुरूआती दिनों में ही इसे एक जबरजस्त झटका लगा। पर बिनोद बाबू ने इन बातों को बहुत गहराई से नहीं लिया। पुनः अपने काम में लग गये। हॉलाकि उसी साल नवम्बर के महिने में उन्हें प्रथम बार दिल का दौरा पड़ा।
1977 के लोक-सभा चुनाव में काँग्रेस की बुरी तरह हार हुई। श्रीमती इन्दिरा गाँधी स्वयं चुनाव हार गई। केन्द्र में जनता पार्टी की सरकार बन गई। शिबू सोरेन फिर डर गये एवं इधर-उधर भटकने लगे। फिर धनबाद लोटे एवं श्री ऐ0 के0 राय को पकड़ा। ऐ0 के0 राय के अनुरोध करने पर बिनोद बाबू ने पुनः शिबू सोरेन को दुमका यानि संथाल परगना भेज दिया। टुंडी के पोखरिया आश्रम में अब शिबू सोरेन नहीं जा सकते थे, क्योंकि काँग्रेस में शामिल होने एवं बिनोद बाबू को छोड़ने के कारण वहाँ आदिवासी समर्थक बहुत गुस्से में थे।
फिर 1980 के आम चुनाव के पहले से ही इस बात के संकेत मिलने लग गये थे कि पुराने आदिवासी (जनजाति) नेताओं की तरह ही शिबू सोरेन काँग्रेस की निकटता प्राप्त करना चाहते थे, उससे समझौता करके चलाना चाहते थे, विरोध करके नहीं। यही बात श्री राय एवं बिनोद बाबू को पसंद नहीं थी। 1980 के विधान सभा चुनाव में झारखण्ड मुक्ति मोर्चा एवं मासस को चौदह सीटें मिली थी। शिबू सोरेन चुँकि संथाल परगना देख रहे थे, उन्होनें चुपके से काँग्रेस से भीतर-भीतर तालमेल कर लिया, पर उत्तरी छोटानागपुर में सीटें काँग्रेस के विरोध में लड़ी गई।
1980 के लोक सभा चुनाव में श्री सोरेन से काँग्रेस से गुपचुप समझौता कर लिया और दुमका लोक सभा सीट से मात्र तीन हजार मत से जीत गये। श्री राय 1977 में ही सांसद बन गये थे। फिर 1980 में भी धनबाद से जीते। बिनोद बाबू 1980 में भी गिरिडीह लोक-सभा चुनाव हार गये।
1983, जनवरी में हुए महाधिवेशन के बाद जब बिनोद बाबू ने पार्टी का अध्यक्ष पद छोड़ा तो शिबू-सोरेन, शैलेन्द्र महतो, सूरज मंडल आदि ने गुटबाजी शुरू कर दी। बिनोद बाबू इन बातों की खबर भी रखना नहीं चाहते थे। धीरे-धीरे यह परिस्थिति ऐसी पैदा हो गई कि झामुमो में दो फाँक हो गया। बिनोद बाबू के तरफ शहीद शक्ति नाथ महतो, कॉ0 ऐ0 के0 राय (सांसद धनबाद) के0 एस0 चटर्जी (निरसा विधायक), आनन्द महतो (सिन्दरी विधायक), टेकलाल महतो (मांडू विधायक), शंकर किशोर महतो (लाठाटाँड़), शिबा महतो (डूमरी विधायक) आदि हो गये तथा एक अलग ही गुट बनाने का निश्चय किया गया। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा (बिनोद) गुट से बिनोद बाबू के साथ रहने वालों, साथ देने वालों को जाना जाने लगा। विधिवत् रूप से इस दल का पंजीकरण करने के लिए चुनाव आयोग में लिखा गया। पर इसी बीच शिवा महतो जी के प्रयास से डुमरी में फिर से दोनों गुट एक साथ हो गये एवं फिर झामुमो के बैनर में कार्य करने लगे।
बिनोद बाबू के पुत्र के उम्र के थे सभी, सिवाय, शिवा महतो के। बिनोद बाबू तो सब कुछ भूल गये, पर इन लोगों ने अपनी आदत नहीं छोड़ी।
वर्ष 1988 में जब “झारखण्ड समन्वय समिति” ने रैली निकालने की तैयारी की थी, तो अर्जुन राम महतो, शैलेन्द्र महतो आदि ने शिबू सोरेन, सूरज मंडल के कहने पर रामगढ़ में काला झंड़ा दिखाकर बिनोद बाबू का विरोध किया था तथा शिबू सोरेन, सूरज मंडल, शैलेन्द्र महतो इस समिति से दूर रहे और आन्दोलन में कोई हिस्सा नहीं लिया।
ग्यातव्य हो कि इस समिति में करीब बावन पाटियाँ शामिल थी, एवं 15 नवम्बर 1988 को मोराबादी मैदान राँची में निकाली गई थी। यह एक ऐतिहासिक रैली थी जिसने केन्द्र सरकार का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था।
वर्ष 1989 में जब दुमका के हिजला में पार्टी का तृतीय महाधिवेशन बुलाया गया उसमें बिनोद बाबू की अनुपस्थिति में, उनके विरूद्ध तत्कालीन महामोत्री शैलेन्द्र महतो ने अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया और उसमें जमकर बिनोद बाबू की आलोचना की। उस प्रतिवेदन में उन्हें सामंतवादी चरित्र वाला, पैसे के बल पर राजनीति करने वाला, विघटनकारी, व्यक्तिगत लाभ के लिए राजनीति करने वाला कहा। शैलेन्द्र महतो ने उस रिपोर्ट में यह भी कहा है कि वर्ष 1983 के सरायढेला, धनबाद में हुए महाधिवेशन में पार्टी का शुद्धिकरण करने के लिए बिनोद बिहारी महतो को निष्काषित किया गया था। यह निष्काषण की बात भी झूठी थी। उन्होनें स्वयं पद छोड़ा था।
शैलेन्द्र महतो वर्ष 1978 में पार्टी में शामिल हुए थे। जब धनबाद आए थे, तो एक हाफ कमीज एवं पैजामा पहने थे तथा कंधे पर एक झोला टंगा हुआ था।
Sunday, November 7, 2010
झामुमो में दो धाराओं का जन्म
दुर्भाग्य ने झारखण्ड आन्दोलन का साथ कभी नहीं छोड़ा। झारखण्ड आन्दोलन एक तरफ तो बिनोद बिहारी महतो के दिशा-निर्देश तथा विचार धारा के सहारे आगे बढ़ने लगा, तो दूसरी तरफ उनकी इमानदारी ने राजनीति में एक नये आयाम की सृष्टि की। बिना पैसे के चुनाव लड़ो। मतदाताओं को प्रलोभन देकर नहीं, समझदारी देकर चुनाव लड़ो। पर झारखण्ड मुक्ति मोर्चा में घुन उसके गठन के बाद से ही लगने लगा था। 1974 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण का सामाजवादी काँग्रेस-विरोधी आन्दोलन जो जे0 पी0 आन्दोलन के नाम से मशहूर हुआ। वह आन्दोलन तेजी पर था। काँग्रेस की सरकार जो केन्द्र तथा बिहार दोनों जगहों पर काबिज थी, ने इस आन्दोलन के दमन की पूरी व्यवस्था की। नये-नये कानून बनाए गये। मेंटटिनेन्स ऑफ इन्टरनल सेक्यूरिटी एक्ट बना। इधर श्रीमती इंदिरा गाँधी की सरकार ने देश में आपातकाल लगा दिया। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा, मासस, कम्यूनिष्ट पार्टी, जनसंघ आदि सभी काँग्रेस विरोधी पार्टी एक जुट होकर इस आपातकाल में भी काँग्रेस का विरोध कर रही थी। दर्जनों केस-मुकदमें बिनोद बिहारी महतो आदि नेताओं पर लादें गये। आपातकाल के लागू होने के ठीक पहले बिनोद बिहारी महतो को मीसा के तहत मार्च 1974 में गिरफ्तार कर लिया गया। उसी प्रकार शक्ति नाथ, सदानन्द झा, पुनित महतो, चूड़ामण महतो, हीरामण महतो, ए0 के0 राय, के0 एस0 चटर्जी आदि नेताओं को उत्तरी छोटानागपुर में गिरफ्तार किया गया, जिनका संबंध झारखण्ड आन्दोलन से रहा था। उसके अलावा भी छत्रुराम महतो इत्यादि जनसंघ के नेताओं को भी इस क्षेत्र से गिरफ्तार किया गया। इनका विवरण देना आवश्यक नहीं। यह बात सर्व विदित है, कि पूरे झारखण्ड क्षेत्र में सैकड़ों की तादाद में छोटे-बड़े विभिन्न राजनैतिक दलों के नेताओं को आपातकाल के दौरान गिरफ्तार किया गया था।
पर जो सबसे आश्चर्य की बात हुई, वह यह थी कि झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के महामंत्री शिबू सोरेन आपातकाल में जेल नहीं गये। क्या उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया ? और अगर गिरफ्तार किया गया था तो तुरंत छोड़ा कैसे गया। पाया गया कि शिबू सोरेन ने बिहार के तत्कालिन मुख्यमंत्री जगरन्नाथ मिश्रा से मिलकर समझौता कर लिया तथा काँग्रेस की नीतियों का समर्थन कर दिया। इस प्रकार काँग्रेस को समर्थन देने एवं काँग्रेस विरोधियों से अलग हो जाने के कारण शिबू सोरेन जेल जाने से बच गये। आपात काल में इसी कारण 1975 में चार फरवरी का झारखण्ड मुक्ति मोर्चा का स्थापना दिवस शिबू सोरेन ने अलग से टुण्डी मे मनाया जिसमें बतौर मुख्य अतिथि जगरनाथ मिश्रा शरीक हुए। धनबाद के गोल्फ मैदान में स्थापना दिवस मनाने के लिए कोई बड़ा नेता नहीं बचा था, सभी जेल की हवा खा रहे थे। उस साल राज किशोर महतो के नेतृत्व में वहाँ स्थापना दिवस मनाया गया। फिर भी भीड़ उमड़ पड़ी थी।
शिबू सोरेन ने आपात काल 1975 में जो बिनोद बाबू का साथ छोड़ा तो सीधे काँग्रेस में शामिल हो गये और वहीं जम गये। करीब तीन वर्षो तक बिनोद बाबू अकेले रहे एवं आन्दोलन करते रहे। उनके सहयोगी ऐ0 के0 राय रह गये थे। श्री सोरेन 1977 के लोक-सभा चुनाव तक काँग्रेस के साथ रहे।
1977 में जे0 पी0 आन्दोलन के समय लोक-सभा का चुनाव आया तो बिनोद बिहारी महतो एवं ऐ0 के0 राय को गिरिडीह एवं धनबाद लोक-सभा से चुनाव लड़वाने का फैसला लोक नायक जय प्रकाश नारायण ने ले लिया था। उस समय जनसंघ आदि पाटियों ने मिलकर “जनता पार्टी” बनाई थी।
व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा हमेशा से ही एकता में बाधक रही है। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से श्री ऐ0 के0 राय भी ग्रस्त हो गये एवं उनके समर्थकों ने धनबाद लोक-सभा सीट के लिए जनता पार्टी का समर्थन काँग्रेस के विरूद्ध श्री राय के लिए ले लिया। गिरिडीह की सीट में कुछ ऐसी हालात उनके समर्थकों ने पैदा किया कि बिनोद बाबू को बहला फुसला कर पटना से धनबाद वापस ले आया गया और वह समर्थन रामदास सिंह जी को गिरिडीह लोक-सभा के लिए मिला। ऐसा बिनोद बाबू के समर्थक दल मासस के तत्कालीन महासचिव उमाशंकर शुक्ल एवं के0 पी0 भट्ट ने किया श्री राय जेल में थे और बिनोद बाबू को भी वहाँ से हटा दिया गया था। जो लोग सीटों पर बात करने गये थे उन्होनें राय के लिए सीट माँग ली, पर बिनोद बाबू के लिए नहीं। 1977 का चुनाव बिनोद बाबू अकेले लड़े। उस लोक सभा चुनाव में काँग्रेस के टिकट से डा0 इम्तियाज अहमद (डा0 शब्बा अहमद के पिता ) गिरिडीह से लड़ रहें थे। शिबू सोरेन इस चुनाव में काँग्रेस की तरफ से खुलकर प्रचार-प्रसार कर रहें थे। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के उम्मीदवार तीर-धनुष चिन्ह से चुनाव लड़ने वाले पार्टी के अध्यक्ष बिनोद बाबू के खिलाफ शिबू सोरेन काँग्रेस के उम्मीदवार को जिताने में लगे थे। इधर ऐ0 के0 राय अपने को संयुक्त उम्मीद्वार बताकर लड़ रहें थे और बिनोद बाबू के समर्थकों शिबा महतो बगैरह को लेकर बिनोद बाबू का विरोध गिरिडीह में कर रहें थे एवं साझा उम्मीद्वार रामदास सिंह का समर्थन कर थे।
झामुमो के शुरूआती दिनों में ही इसे एक जबरजस्त झटका लगा। पर बिनोद बाबू ने इन बातों को बहुत गहराई से नहीं लिया। पुनः अपने काम में लग गये। हॉलाकि उसी साल नवम्बर के महिने में उन्हें प्रथम बार दिल का दौरा पड़ा।
1977 के लोक-सभा चुनाव में काँग्रेस की बुरी तरह हार हुई। श्रीमती इन्दिरा गाँधी स्वयं चुनाव हार गई। केन्द्र में जनता पार्टी की सरकार बन गई। शिबू सोरेन फिर डर गये एवं इधर-उधर भटकने लगे। फिर धनबाद लोटे एवं श्री ऐ0 के0 राय को पकड़ा। ऐ0 के0 राय के अनुरोध करने पर बिनोद बाबू ने पुनः शिबू सोरेन को दुमका यानि संथाल परगना भेज दिया। टुंडी के पोखरिया आश्रम में अब शिबू सोरेन नहीं जा सकते थे, क्योंकि काँग्रेस में शामिल होने एवं बिनोद बाबू को छोड़ने के कारण वहाँ आदिवासी समर्थक बहुत गुस्से में थे।
फिर 1980 के आम चुनाव के पहले से ही इस बात के संकेत मिलने लग गये थे कि पुराने आदिवासी (जनजाति) नेताओं की तरह ही शिबू सोरेन काँग्रेस की निकटता प्राप्त करना चाहते थे, उससे समझौता करके चलाना चाहते थे, विरोध करके नहीं। यही बात श्री राय एवं बिनोद बाबू को पसंद नहीं थी। 1980 के विधान सभा चुनाव में झारखण्ड मुक्ति मोर्चा एवं मासस को चौदह सीटें मिली थी। शिबू सोरेन चुँकि संथाल परगना देख रहे थे, उन्होनें चुपके से काँग्रेस से भीतर-भीतर तालमेल कर लिया, पर उत्तरी छोटानागपुर में सीटें काँग्रेस के विरोध में लड़ी गई।
1980 के लोक सभा चुनाव में श्री सोरेन से काँग्रेस से गुपचुप समझौता कर लिया और दुमका लोक सभा सीट से मात्र तीन हजार मत से जीत गये। श्री राय 1977 में ही सांसद बन गये थे। फिर 1980 में भी धनबाद से जीते। बिनोद बाबू 1980 में भी गिरिडीह लोक-सभा चुनाव हार गये।
1983, जनवरी में हुए महाधिवेशन के बाद जब बिनोद बाबू ने पार्टी का अध्यक्ष पद छोड़ा तो शिबू-सोरेन, शैलेन्द्र महतो, सूरज मंडल आदि ने गुटबाजी शुरू कर दी। बिनोद बाबू इन बातों की खबर भी रखना नहीं चाहते थे। धीरे-धीरे यह परिस्थिति ऐसी पैदा हो गई कि झामुमो में दो फाँक हो गया। बिनोद बाबू के तरफ शहीद शक्ति नाथ महतो, कॉ0 ऐ0 के0 राय (सांसद धनबाद) के0 एस0 चटर्जी (निरसा विधायक), आनन्द महतो (सिन्दरी विधायक), टेकलाल महतो (मांडू विधायक), शंकर किशोर महतो (लाठाटाँड़), शिबा महतो (डूमरी विधायक) आदि हो गये तथा एक अलग ही गुट बनाने का निश्चय किया गया। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा (बिनोद) गुट से बिनोद बाबू के साथ रहने वालों, साथ देने वालों को जाना जाने लगा। विधिवत् रूप से इस दल का पंजीकरण करने के लिए चुनाव आयोग में लिखा गया। पर इसी बीच शिवा महतो जी के प्रयास से डुमरी में फिर से दोनों गुट एक साथ हो गये एवं फिर झामुमो के बैनर में कार्य करने लगे।
बिनोद बाबू के पुत्र के उम्र के थे सभी, सिवाय, शिवा महतो के। बिनोद बाबू तो सब कुछ भूल गये, पर इन लोगों ने अपनी आदत नहीं छोड़ी।
वर्ष 1988 में जब “झारखण्ड समन्वय समिति” ने रैली निकालने की तैयारी की थी, तो अर्जुन राम महतो, शैलेन्द्र महतो आदि ने शिबू सोरेन, सूरज मंडल के कहने पर रामगढ़ में काला झंड़ा दिखाकर बिनोद बाबू का विरोध किया था तथा शिबू सोरेन, सूरज मंडल, शैलेन्द्र महतो इस समिति से दूर रहे और आन्दोलन में कोई हिस्सा नहीं लिया।
ग्यातव्य हो कि इस समिति में करीब बावन पाटियाँ शामिल थी, एवं 15 नवम्बर 1988 को मोराबादी मैदान राँची में निकाली गई थी। यह एक ऐतिहासिक रैली थी जिसने केन्द्र सरकार का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था।
वर्ष 1989 में जब दुमका के हिजला में पार्टी का तृतीय महाधिवेशन बुलाया गया उसमें बिनोद बाबू की अनुपस्थिति में, उनके विरूद्ध तत्कालीन महामोत्री शैलेन्द्र महतो ने अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया और उसमें जमकर बिनोद बाबू की आलोचना की। उस प्रतिवेदन में उन्हें सामंतवादी चरित्र वाला, पैसे के बल पर राजनीति करने वाला, विघटनकारी, व्यक्तिगत लाभ के लिए राजनीति करने वाला कहा। शैलेन्द्र महतो ने उस रिपोर्ट में यह भी कहा है कि वर्ष 1983 के सरायढेला, धनबाद में हुए महाधिवेशन में पार्टी का शुद्धिकरण करने के लिए बिनोद बिहारी महतो को निष्काषित किया गया था। यह निष्काषण की बात भी झूठी थी। उन्होनें स्वयं पद छोड़ा था।
शैलेन्द्र महतो वर्ष 1978 में पार्टी में शामिल हुए थे। जब धनबाद आए थे, तो एक हाफ कमीज एवं पैजामा पहने थे तथा कंधे पर एक झोला टंगा हुआ था।
पर जो सबसे आश्चर्य की बात हुई, वह यह थी कि झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के महामंत्री शिबू सोरेन आपातकाल में जेल नहीं गये। क्या उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया ? और अगर गिरफ्तार किया गया था तो तुरंत छोड़ा कैसे गया। पाया गया कि शिबू सोरेन ने बिहार के तत्कालिन मुख्यमंत्री जगरन्नाथ मिश्रा से मिलकर समझौता कर लिया तथा काँग्रेस की नीतियों का समर्थन कर दिया। इस प्रकार काँग्रेस को समर्थन देने एवं काँग्रेस विरोधियों से अलग हो जाने के कारण शिबू सोरेन जेल जाने से बच गये। आपात काल में इसी कारण 1975 में चार फरवरी का झारखण्ड मुक्ति मोर्चा का स्थापना दिवस शिबू सोरेन ने अलग से टुण्डी मे मनाया जिसमें बतौर मुख्य अतिथि जगरनाथ मिश्रा शरीक हुए। धनबाद के गोल्फ मैदान में स्थापना दिवस मनाने के लिए कोई बड़ा नेता नहीं बचा था, सभी जेल की हवा खा रहे थे। उस साल राज किशोर महतो के नेतृत्व में वहाँ स्थापना दिवस मनाया गया। फिर भी भीड़ उमड़ पड़ी थी।
शिबू सोरेन ने आपात काल 1975 में जो बिनोद बाबू का साथ छोड़ा तो सीधे काँग्रेस में शामिल हो गये और वहीं जम गये। करीब तीन वर्षो तक बिनोद बाबू अकेले रहे एवं आन्दोलन करते रहे। उनके सहयोगी ऐ0 के0 राय रह गये थे। श्री सोरेन 1977 के लोक-सभा चुनाव तक काँग्रेस के साथ रहे।
1977 में जे0 पी0 आन्दोलन के समय लोक-सभा का चुनाव आया तो बिनोद बिहारी महतो एवं ऐ0 के0 राय को गिरिडीह एवं धनबाद लोक-सभा से चुनाव लड़वाने का फैसला लोक नायक जय प्रकाश नारायण ने ले लिया था। उस समय जनसंघ आदि पाटियों ने मिलकर “जनता पार्टी” बनाई थी।
व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा हमेशा से ही एकता में बाधक रही है। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से श्री ऐ0 के0 राय भी ग्रस्त हो गये एवं उनके समर्थकों ने धनबाद लोक-सभा सीट के लिए जनता पार्टी का समर्थन काँग्रेस के विरूद्ध श्री राय के लिए ले लिया। गिरिडीह की सीट में कुछ ऐसी हालात उनके समर्थकों ने पैदा किया कि बिनोद बाबू को बहला फुसला कर पटना से धनबाद वापस ले आया गया और वह समर्थन रामदास सिंह जी को गिरिडीह लोक-सभा के लिए मिला। ऐसा बिनोद बाबू के समर्थक दल मासस के तत्कालीन महासचिव उमाशंकर शुक्ल एवं के0 पी0 भट्ट ने किया श्री राय जेल में थे और बिनोद बाबू को भी वहाँ से हटा दिया गया था। जो लोग सीटों पर बात करने गये थे उन्होनें राय के लिए सीट माँग ली, पर बिनोद बाबू के लिए नहीं। 1977 का चुनाव बिनोद बाबू अकेले लड़े। उस लोक सभा चुनाव में काँग्रेस के टिकट से डा0 इम्तियाज अहमद (डा0 शब्बा अहमद के पिता ) गिरिडीह से लड़ रहें थे। शिबू सोरेन इस चुनाव में काँग्रेस की तरफ से खुलकर प्रचार-प्रसार कर रहें थे। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के उम्मीदवार तीर-धनुष चिन्ह से चुनाव लड़ने वाले पार्टी के अध्यक्ष बिनोद बाबू के खिलाफ शिबू सोरेन काँग्रेस के उम्मीदवार को जिताने में लगे थे। इधर ऐ0 के0 राय अपने को संयुक्त उम्मीद्वार बताकर लड़ रहें थे और बिनोद बाबू के समर्थकों शिबा महतो बगैरह को लेकर बिनोद बाबू का विरोध गिरिडीह में कर रहें थे एवं साझा उम्मीद्वार रामदास सिंह का समर्थन कर थे।
झामुमो के शुरूआती दिनों में ही इसे एक जबरजस्त झटका लगा। पर बिनोद बाबू ने इन बातों को बहुत गहराई से नहीं लिया। पुनः अपने काम में लग गये। हॉलाकि उसी साल नवम्बर के महिने में उन्हें प्रथम बार दिल का दौरा पड़ा।
1977 के लोक-सभा चुनाव में काँग्रेस की बुरी तरह हार हुई। श्रीमती इन्दिरा गाँधी स्वयं चुनाव हार गई। केन्द्र में जनता पार्टी की सरकार बन गई। शिबू सोरेन फिर डर गये एवं इधर-उधर भटकने लगे। फिर धनबाद लोटे एवं श्री ऐ0 के0 राय को पकड़ा। ऐ0 के0 राय के अनुरोध करने पर बिनोद बाबू ने पुनः शिबू सोरेन को दुमका यानि संथाल परगना भेज दिया। टुंडी के पोखरिया आश्रम में अब शिबू सोरेन नहीं जा सकते थे, क्योंकि काँग्रेस में शामिल होने एवं बिनोद बाबू को छोड़ने के कारण वहाँ आदिवासी समर्थक बहुत गुस्से में थे।
फिर 1980 के आम चुनाव के पहले से ही इस बात के संकेत मिलने लग गये थे कि पुराने आदिवासी (जनजाति) नेताओं की तरह ही शिबू सोरेन काँग्रेस की निकटता प्राप्त करना चाहते थे, उससे समझौता करके चलाना चाहते थे, विरोध करके नहीं। यही बात श्री राय एवं बिनोद बाबू को पसंद नहीं थी। 1980 के विधान सभा चुनाव में झारखण्ड मुक्ति मोर्चा एवं मासस को चौदह सीटें मिली थी। शिबू सोरेन चुँकि संथाल परगना देख रहे थे, उन्होनें चुपके से काँग्रेस से भीतर-भीतर तालमेल कर लिया, पर उत्तरी छोटानागपुर में सीटें काँग्रेस के विरोध में लड़ी गई।
1980 के लोक सभा चुनाव में श्री सोरेन से काँग्रेस से गुपचुप समझौता कर लिया और दुमका लोक सभा सीट से मात्र तीन हजार मत से जीत गये। श्री राय 1977 में ही सांसद बन गये थे। फिर 1980 में भी धनबाद से जीते। बिनोद बाबू 1980 में भी गिरिडीह लोक-सभा चुनाव हार गये।
1983, जनवरी में हुए महाधिवेशन के बाद जब बिनोद बाबू ने पार्टी का अध्यक्ष पद छोड़ा तो शिबू-सोरेन, शैलेन्द्र महतो, सूरज मंडल आदि ने गुटबाजी शुरू कर दी। बिनोद बाबू इन बातों की खबर भी रखना नहीं चाहते थे। धीरे-धीरे यह परिस्थिति ऐसी पैदा हो गई कि झामुमो में दो फाँक हो गया। बिनोद बाबू के तरफ शहीद शक्ति नाथ महतो, कॉ0 ऐ0 के0 राय (सांसद धनबाद) के0 एस0 चटर्जी (निरसा विधायक), आनन्द महतो (सिन्दरी विधायक), टेकलाल महतो (मांडू विधायक), शंकर किशोर महतो (लाठाटाँड़), शिबा महतो (डूमरी विधायक) आदि हो गये तथा एक अलग ही गुट बनाने का निश्चय किया गया। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा (बिनोद) गुट से बिनोद बाबू के साथ रहने वालों, साथ देने वालों को जाना जाने लगा। विधिवत् रूप से इस दल का पंजीकरण करने के लिए चुनाव आयोग में लिखा गया। पर इसी बीच शिवा महतो जी के प्रयास से डुमरी में फिर से दोनों गुट एक साथ हो गये एवं फिर झामुमो के बैनर में कार्य करने लगे।
बिनोद बाबू के पुत्र के उम्र के थे सभी, सिवाय, शिवा महतो के। बिनोद बाबू तो सब कुछ भूल गये, पर इन लोगों ने अपनी आदत नहीं छोड़ी।
वर्ष 1988 में जब “झारखण्ड समन्वय समिति” ने रैली निकालने की तैयारी की थी, तो अर्जुन राम महतो, शैलेन्द्र महतो आदि ने शिबू सोरेन, सूरज मंडल के कहने पर रामगढ़ में काला झंड़ा दिखाकर बिनोद बाबू का विरोध किया था तथा शिबू सोरेन, सूरज मंडल, शैलेन्द्र महतो इस समिति से दूर रहे और आन्दोलन में कोई हिस्सा नहीं लिया।
ग्यातव्य हो कि इस समिति में करीब बावन पाटियाँ शामिल थी, एवं 15 नवम्बर 1988 को मोराबादी मैदान राँची में निकाली गई थी। यह एक ऐतिहासिक रैली थी जिसने केन्द्र सरकार का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था।
वर्ष 1989 में जब दुमका के हिजला में पार्टी का तृतीय महाधिवेशन बुलाया गया उसमें बिनोद बाबू की अनुपस्थिति में, उनके विरूद्ध तत्कालीन महामोत्री शैलेन्द्र महतो ने अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया और उसमें जमकर बिनोद बाबू की आलोचना की। उस प्रतिवेदन में उन्हें सामंतवादी चरित्र वाला, पैसे के बल पर राजनीति करने वाला, विघटनकारी, व्यक्तिगत लाभ के लिए राजनीति करने वाला कहा। शैलेन्द्र महतो ने उस रिपोर्ट में यह भी कहा है कि वर्ष 1983 के सरायढेला, धनबाद में हुए महाधिवेशन में पार्टी का शुद्धिकरण करने के लिए बिनोद बिहारी महतो को निष्काषित किया गया था। यह निष्काषण की बात भी झूठी थी। उन्होनें स्वयं पद छोड़ा था।
शैलेन्द्र महतो वर्ष 1978 में पार्टी में शामिल हुए थे। जब धनबाद आए थे, तो एक हाफ कमीज एवं पैजामा पहने थे तथा कंधे पर एक झोला टंगा हुआ था।
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