Tuesday, June 21, 2011
झामुमो की आर्थिक नाकेबन्दी –
15 मार्च को राँची के मोराबादी मैदान में ऐतिहासिक भीड़ जुटी। शहीद ज्योती जलाई गई। वहीं पर मुझे एहसास हो गया कि मुझे पार्टी में जगह देना झामुमो के केन्द्रीय नेतागण नहीं चाहते थे।
21 मार्च को बन्द शुरू हुआ। मैंने स्वंय इसमें भाग लिया। मैंने पूरे झारखंड क्षैत्र का कार से आर्थिक नाकेबन्दी के दौरान दौरा किया और कार्यकर्त्तॉओं के मनोबल को बनाए रखा। आर्थिक नाकेबन्दी का यह कार्यक्रम एक अभूतपूर्व कार्यक्रम था। झारखण्ड के आन्दोलन के इतिहास में ऐसा आन्दोलन अब तक नहीं हुआ था। सारे खनिज पदार्थो की नाकेबन्दी कर दी गई थी। जगह-जगह तमाम झारखंड क्षेत्र में कार्यकर्त्ताओं ने चेक नाका बना डाला था। ट्रकों का आवागमन बंद हो गया था। रेल गाड़ियों, खासकर मालगाड़ियों का चलना बन्द करा दिया गया था। पूरे झारखंड के खदानों से खनिज ढुलाई बंद हो गई थी। बालू, लकड़ी, सीमेंट तक की ढुलाई बन्द रही। कोयला की ढुलाई तो सम्पूर्ण रूप से बाधित रही। एक सन्नाटा छा गया झारखण्ड में। एक विचित्र आतंक का माहौल बन गया।
झारखंड मुक्ति मोर्चा के इस आन्दोलन के दौरान झारखंड की जनता ने भी साथ दिया। दूसरी झारखंड नामधारी पार्टियों तथा कई अन्य दलों नें इसका समर्थन किया। इस दौरान हजारों कार्यकर्त्ताओं ने गिरफ्तारी दी। कई जगहों पर तोड़-फोड़, बमबाजी की घटनाएँ भी हुई। लाठीचार्ज हुए। पर यह आन्दोलन रूका नही और इसने एक जन आन्दोलन का रूप ले लिया।
इस आन्दोलन में एक मुहत्वपूर्ण घटना घटी, 21 मार्च को। इसी बंद के दौरान जिला बोकारो के गोदाम कोलियरी के पास झारखंड के पुराने नेता शिबा महतो के घर के पास गोली चली। गोली भारत कोकिंग कोल के एक बस को रोकने के दौरान चली। सेन्ट्रल सेक्यूरिटी फोर्स तथा बिहार पुलिस के जवानों ने गोली चलाई थी। हॉलाकि झामुमो कार्यकर्त्ता काफी तादाद में थे और मोर्चा उन्होंने भी संभाल रखा था। उस समय दुग्धा पुलिस आउट पोस्ट पर धनबाद के उपायुक्त मौजुद थे। यद्दपि घटना दिन बारह बजे की थी, जिसमें सूदन महतो को गोली लगने से शहीद हो गये थे, पर प्रथम इत्तिला रिपोर्ट तीन दिन बाद सोच समझकर दर्ज किया गया था। सूदन महतो की लाश को पुलिस घटना स्थल से ही उठाकर ले गई थी और पोस्ट मार्टम के बाद ही इसे लौटाया था। प्रथम इत्तिला रिपोर्ट झूठा था। बिहार पुलिस ने कोई गोली नहीं चलाई थी, पर जिम्मेवारी उसके सर ठोंकी गई। गोली सी0 आइ0 एस0 एफ0 ने चलाई थी लोगों को बन्दूक के कून्दों से पीटा था। एवं अभियुक्त बनाया गया था।
उल्लेखनीय है कि पार्टी अध्यक्ष सासंद शिबू सोरेन 22 मार्च को सिजुआ पहुँचे थे जहाँ सूदन महतो मारा गया था। वे बोकारो के पुलिस अधीक्षक की गाड़ी में उनके साथ वहाँ पहुँचे थे। उन्होनें वहाँ घोषणा किया था कि मृत सूदन महतो के परिवार को एक लाख रूपया देगें। मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ था कि आन्दोलन के शुरू में ही शिबू सोरेन पुलिस अधीक्षक की गाड़ी में उनके साथ घटना के दूसरे दिन क्यों पहुँचे ? उन्हें आन्दोलन करना था पुलिस की चाकरी नहीं। उसके दूसरे दिन मैंने एवं शिबा महतो ने भारत कोकिंग कोल को दबाद डाला और सूदन महतो चुँकि वहाँ कर्मचारी था, उसकी पत्नी को नौकरी दिलवाई। शिबू सोरेन ने घोषित एक लाख रूपया आज तक नहीं दिया।
दूसरी जो महत्वपूर्ण बात हुई वह यह कि फूलचन्द सोरेन जो झामुमो के चन्द्रपुरा के नेता थे, घटना स्थल पर मौजुद थे, उनका नाम इस केस में नहीं आया। प्रथम इत्तिला रिपोर्ट करने वाला बी0 सी0 सी0 एल0 का ड्राइवर था और झारखण्ड से बाहर का व्यक्ति था, उसके लिए अभियुक्तों का नाम जानना असंभव था।
इस आर्थिक नाकेबन्दी को सभी ने साथ दिया। पर दुखः की बात यह हुई कि श्री ए0 के0 राय जिन्हें बिनोद बाबू ने हर प्रकार का संरक्षण दिया था। और जो झारखण्ड आन्दोलन के साथी के रुप में स्वंय को घोषित करते थे, उन्होनें इस आर्थिक नाकेबन्दी को “टाकाबन्दी” यानि रूपया कमाने का आन्दोलन कहा।
इस आन्दोलन का सबसे दुःखदायी पहलू नाकेबन्दी के दश दिन के बाद सामने आया। नाकेबन्दी का आन्दोलन सफलता पूर्वक चल रहा था। और दिल्ली तक में इसका प्रभाव पड़ने लगा था। अचानक 31 मार्च को इसे स्थगित करने की घोषणा कर दी गई। यह घोषणा दिल्ली से पार्टी उपाध्यक्ष सूरज मंडल ने किया। इस आन्दोलन को तीन अप्रेल तक चलाना था, पर बीच में ही स्थगित कर दिया गया। हम सभी को जो या तो आन्दोलनरत थे, या जेल में बंद हो गये थे या सक्रिय रूप से सहयोग कर रहे थे घोर आश्चर्य हुआ। जितने भी विधायक झामुमो के थे, सभी चकित थे। जनता स्तम्भित थी कि आखिर कौन सी ऐसी मजबूरी आ गई थी कि इस सफलतम आन्दोलन को स्थगित कर देना पड़ा था।
एक अप्रेल को मैंने धनबाद जिला कमिटि की मीटिंग में इस सवाल को खड़ा कर दिया। चार अप्रेल को हजारीबाग में प्रत्येक वर्ष की भाँति झामुमो का स्थापना दिवस मनाया गया। यहाँ पर सांसदो से खुले रूप में पार्टी के वरिष्ठ नेता श्री शिबा महतो ने मेरे कहने पर आन्दोलन को स्थगित करने का कारण पूछा। शिबू सोरेन के जबाव ने सबको चकित कर दिया। उन्होंने कहा कि सरकार को बहुत क्षति हो रही थी, इसीलिए आन्दोलन को बंद कर दिया।
मुझे यह जबाव खटक गया। जब आन्दोलन किया ही गया था, सरकार को क्षति पहुँचाने के लिए, दबाव बनाकर अपनी माँग मनवाने के लिए तो फिर हमें सरकार को हानि से बचाने की बात सोचनी क्यों पड़ी ? इसमें सभी के मन में संदेह पैदा हुआ कि हो न हो भीतर ही भीतर कोई गुप्त समझौता नेताओं ने दिल्ली में कर लिया है, जिसका खुलासा वे करना नहीं चाहते। पता चला कि इस स्थगन का विरोध अकेले सांसद कृष्णा मरांडी ने किया था, बाकि चार सांसद स्थगन के लिए जिम्मेवार थे।
इस घटना से कार्यकर्त्ताओं का मनोबल गिर गया। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि ऐसा क्यों किया गया। मोराबादी मैदान की घोषणा कि कोई फैसला केन्द्रीय समिति की राय के बिना नहीं ली जायेगी, झूठी साबित हुई। झारखण्ड की धरती पर फैसला होगा – वार्त्ता यहीं होगा – ये सारी घोषणाएँ झूठी साबित हुई।
31 मार्च को ही शिबू सोरेन तथा सूरज मंडल दिल्ली रवाना हो गये थे। संयोग से पेटरवार के पास हमारी तथा शिबा महतो की मुलाकात उनसे हो गई। हम राँची से सी0 सी0 एल0 के मुख्यालय से आ रहे थे, सूदन महतो की पत्नी को नौकरी दिलाने की वार्त्ता त्तकालीन डायरेक्टर परसनल श्री आई0 बी0 पाण्डे से बात कर के और इधर ये राँची जा रहे थे। रास्ते में शिबा महतो तथा मुझे, शिबू सोरेन ने गृह मंत्री एस0 बी0 चौहान के बुलाने की बात कही। मुझे उस समय भी आश्चर्य हुआ था कि समय से पहले ही आर्थिक नाकेबंदी को वापस क्यों ले लिया गया था। पर बाद में भी इस बात का खुलासा नेताओं के द्वारा नहीं किया गया कि आखिर किन शर्त्तों पर आर्थिक नाकेबंदी वापस ली गई थी।
Friday, May 20, 2011
बिनोद बिहारी महतो का निधन एवं प्रभाव
बिनोद बिहारी महतो जब पहली बार सांसद पहुँचे, तो कई काँग्रेस के नेता एवं मंत्री उनसे बात करने के लिए उनके पास गये । श्री नरसिंहा राव उस समय काँग्रेस सरकार के प्रधानमंत्री थे। श्री राजीव गाँधी को लोक सभा चुनाव के दौरान ही प्रचार के समय चिकमंगलूर में हत्या कर दी गई थी। वरना श्री राजीव गाँधी ही पुनः भारत के प्रधानमंत्री बनते । पर ऐसा नहीं हुआ। पर नरसिंहा राव ने झारखण्ड आन्लोलन के विषय में सोचना छोड़ा नहीं था। स्व0 राजीव राजीव गाँधी ने अपने कार्यकाल में “झारखण्ड मामलों से संबंधित समिति” का गठन किया था, जिसका जिक्र हमने पहले ही किया है। इसकी रिपोर्ट जो मई 1990 में तैयार की गई, रखी हुई थी। 1991 में लोक-सभा चुनाव मई तक सम्पन्न हो सका था। राजीव गाँधी के समान ही झारखंड आन्दोलन एवं इसके प्रभावों की जानकारी श्री नरसिंह राव को थी और वे इसे एक मुकाम देना चाहते थे।
उनके मंत्रियों ने बिनोद बाबू से इस सम्बंध में वार्त्ता की थी। बिनोद बिहारी महतो से सरकार बनाने के लिए समर्थन भी माँगा था। पर बिनोद बाबू का स्पष्ट कहना था कि झारखंड राज्य के विषय में सकारात्मक निर्णय लेने पर ही वे समर्थन दे सकते थे। तब तक श्री नरसिंह राव स्पष्ट नहीं थे कि झारखंड आन्दोलन के विषय में कौन सा निर्णय लिया जाय। कई कठिनाईयाँ थी। कुछ भी स्पष्ट नहीं था।
पर अचानक दिसम्बर 18, 1991 को बिनोद बिहारी महतो का निधन हो गया था, पर स्थिति डाँमाडोल थी और विपक्ष अविस्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा था। बिनोद बाबू के निधन के बाद न सिर्फ बिहार की राजनीति में व्यापक प्रभाव पड़ा, वरन पूरे देश में राजनैतिक हलचल बढ़ गई। झामुमो के छः सांसद थे और वे विपक्ष में बैठे थे। शिबू सोरेन काँग्रेस के नजदीकी माने जाते थे और बिनोद बाबू वामपंथी पृष्ठ भूमि के थे। विपक्ष में उस समय भारतीय जनता पार्टी, जनता दल, वामपंथी पार्टियाँ एवं अन्य कई दल काँग्रेस के विरोध में थे।
बिनोद बाबू की मृत्यु के पश्चात बिहार में राजनैतिक समीकरण गड़बड़ाने लगा था। लालू प्रसाद के लिए परेशानी थी। उसी प्रकार केन्द्र में काग्रेस इस चक्कर में थी कि झामुमो के सांसदों को अपने पक्ष में कर लिया जाय। राजनैतिक शह-मात का खेल शुरू हो गया था।
झारखंड क्षेत्र में न सिर्फ झामुमो समर्थकों, वरन् झारखण्ड नामधारी दलों के साथ-साथ वामपंथियों, शिक्षा-विदों एवं अन्य कई सामजि संगठनों में शोक की लहर दौड़ गई। झारखंड की आम-गरीब जनता उनके निधन से आहत थी ओर किंकर्त्तव्यविमूड़ थी। दूसरी तरफ झारखंड के शोषणकर्त्ता खुश थे। खुले आम जश्न मनाकर अपनि खुशी का इजहकर कर चुके थे। झारखंड आन्दोलन को एक जोरदार झटका बिनोद बाबू के निधन से लगा।
राष्ट्रीय दलों जैसे काँग्रेस पार्टी तथा भारतीय जनता पार्टी के साथ-साथ वामपंथी दलों ने अपनी सक्रियता झारखंड क्षेत्र में बढ़ानी शुरू कर दी थी। वह समय एक ऐसा समय था जब राजनैतिक महकमें में कई अटकले लगाई जा रही थी।
इससे एक समस्या और उत्पन्न हो गई थी। कई जगहों के विस्थापितों के हजारों मामले बिनोद बाबू विभिन्न कोर्ट-कचहरियों में लड़ रहें थे, उन मामलों में भी ग्रहण लगना शुरू हो गया था। खासकर बोकारो, धनबाद आदि जिलों में भू-अर्जन अधिनियम के तहत हजारों केस बिनोद बाबू ने एक वकील की हैसियत से दायर किए थे, जो उनकी मृत्यु के बाद दूसरे वकीलों द्वारा चलाए जाने के प्रयास भी शुरू हो गये थे। दर्जनों शिक्षण संस्थाओं का भविष्य भी खतरे में पड़ गया था जो उनके द्वारा स्थापित या संचालित थे।
मैं झारखंड आन्दोलन के साथ शुरू से ही जुड़ा हुआ था। तथा अपने पिता बिनोद बिहारी महतो का प्रशंसक रहा था। अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई इंडियन स्कूल ऑफ माइन्स धनबाद से पूरी करके मैं सुदामडीह कोलियरी में कार्यरत था तथा 1972 में कोलियरी छोड़ दिया था। 1969 के आस पास शिवाजी समाज के आन्दोलनों में तथा अन्य प्रकार के कई कार्यक्रमों में ज्यादे सक्रिय हो जाने के कारण बिनोद बाबू पर कई मुकदमें लादे गये थे। उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा था। आपात काल के लागू होने के पहले वे इतने ज्यादे उलझ गये कि उन्हे “मिसा” के तहत 1974 में गिरफ्तार करके कारागार में बंद कर दिया गया। पहले उन्हें भागलपूर सेंट्रल जेल तथा बाद में उन्हें बाँकीपुर पटना सेंट्रल जेल में बंद रखा गया था। मैं घर का बड़ा था। मुझे छोड़कर सभी भाई बहन पढ़ाई कर रहें थे। बड़ी मुश्किल हो गई थी। कोलियरी में मेरा आना-जाना का हो गया। इन्हीं झंझटो से आजिज आकर मैंने कोलियरी से सदा के लिए अलविदा कह दिया। यहीं पर छोटा-मोटा कारोबार करके घर में ही रहने लगा। पिताजी के मुकदमों को पटना हाईकोर्ट सेलेकर सुप्रीम कोर्ट तक मुझे लड़ना पड़ा। पिताजी के “मिसा” कानून के तहत दायर किया गया केस अपने आप में एक अनूठा केस था जो 1974 के ए0 आइ0 आर0 के सुप्रीम कोर्ट के फेसलों में दर्ज है। इस दौरान मुझे कोर्ट कचहरी तथा जेलों के चक्कर काटने पड़े थे। इस केस में हार जाने के बाद मैंने तय कर लिया कि वकील बनूँगा। 1971 में मैंने लॉ कॉलेज छोटानागपुर, राँची में दाखीला ले लिया था। पर परीक्षा में 1975 में बैठा। इस प्रकार 1977 तक मैं धनबाद, गिरिडीह, हजारीबाग जिलों में झमुमो के आन्दोलन के साथ-साथ जुड़ा रहा।
मैंने 1973 में धनबाद म्यूनिसिपैलटी का चुनाव लड़ा, वार्डो में अपना उम्मीद्वार दिया। बिनोद बाबू, कॉमरेड राय मेरे साथ तो थे, पर उन्होनें इस चुनाव में मुझे अपने ढंग से कार्य करने दिया। नतीजा यह निकला कि मैनें अपने साथियों का बहुमत प्राप्त कर लिया। काँग्रेस के दबंग नेताओं, वी0 पी0 सिन्हा, शंकर दयाल सिंह जैसे दिग्गज नेतओं के प्रतिरोध के बावजूद यह बहुमत हासिल किया था, तथा बिनोद बाबू के कथनानुसार उनके पुराने साथियों सचिन चन्द्र मल्लिक को चैयरमैन तथा हरिहरप्रसाद जी को वाइस चैयरमैन बनाया। 1977 के बाद मैं 1978 में राँची चला आया था, पर राजनीति से अलग नहीं हो सका। राँची जिले में तब झारखंड मुक्ति मोर्चा का कोई संगठन नहीं था। इस समय तक झामुमो का संगठन उत्तरी छोटानागपुर तथा संथाल परगना तक ही सीमित था। दक्षिणी छोटानागपुर में झारखंड नामधारी अन्य दल सक्रिय थे।
मैं श्री इन्द्रनाथ महतो अधिवक्ता, त्रिदीप घोष, बिरसा उराँव, मानवघोष दस्तीदार भाई हॉलेन कुजूर, शिव नन्दन महतो, बिरसा उराँव आदि कुछ गिने चुने लोगों के साथ झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन राँची में किया। 1980 में हिनू मे हमारे एक साथी एतवा उराँव आदिवासी जमीन बचाने के विवाद में जमीन-माफियाओं के द्वारा मार दिया गया। तब झामुमो के आन्दोलन ने जोर पकड़ा। कई सहकारी समितियों के जमीनों पर हमने हरा झंड़ा गाड़कर उनके कार्यो को रोका। तथा कई जगहों पर विस्थापित आन्दोलन की शुरूआत की।
इसके बाद सिंहभूम जिलों से कई साथी आए एवं मुझसे मिले। इस बीच मैने कई कार्यक्रमों में बिनोद बाबू एवं ए0 के0 राय एवं शिबू सोरेन को शिरकत करवाया। सघनू भगत (बाद में मंत्री) भी पार्टी में शामिल हुए। मेरी सिफारिश पर 1980 में भाई हॉलेन कूजूर को झामुमो तथा मासस ने विधान परिषद् का सदस्य बनवाया। अर्जुन महतो (बाद में विधायक) मेरे कहने पर झामुमो में आए। मैने उन्हें बिनोद बाबू के पास भेज दिया था।
पर धीरे-धीरे मैं वकालत में मशगुल हो गया। पर इससे राजनीति से मेरा सम्बन्ध टूटा नहीं। सक्रिय राजनीति में मेरा दखल का जरूर हो गया। पर फिर भी बिनोद बाबू के चुनाओं मे मैं ही चुनाव प्रभारी हुआ करता और तब क्षेत्र का दौरा करता। आनन्द महतो, कॉमरेड राय को भी चुनावों में क्षेत्र मे जाकर मदद करता। एक फायदा तो वकालत से हो ही गया था। विभिन्न राजनैतिक दलों के लोग जो मेरे पिताजी से संबंध रखते थे, मेरे पास अपने मुकदमें की पैरवी करने आते। इसके अलावा मेरा आयाम राँची मे रहने के कारण बढ़ गया था। पूरे झारखंड के लोग मेरे पास मुकदमें लेकर आते।
मेरे पिता बिनोद बिहारी महतो की अचानक मृत्यु ने मुझे बड़ी असमंजस की स्थिति मे डाल दिया था। परिस्थिति ऐसी पैदा हो गई कि मुझे अपने सरकारी वकील का पद छोड़कर राजनीति मे वापस आना पड़ा। तेरह वर्षो की कड़ी मेहनत के बाद मै सरकारी वकील बना था, केरियर को बनाया था। भविष्य मे हाईकोर्ट जज के पद पर जा सकता था, पर जहाँ से चला वहीं आकर फिर खड़ा हो गया। एक कैरियर माइनिंग इंजीनियर का छोड़ चुका था तो दूसरा भी छूट गया था। राजनीति में वर्चस्व की लड़ाई में अक्सर मुद्दे पीछे छूट जाते है। मैं झारखंड आन्दोलन को आगे बढ़ाने तथा पृथक झारंखड राज्य बनाने के मुद्दे के साथ राजनीति में आया था, पर मुझे घोर आश्चर्य हुआ कि बिनोद बिहारी महतो की मृत्यु के बाद राजनैतिक महत्वाकांक्षा ने व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का रूप ले लिया था। कॉमरेड ए0 के0 राय तथा शिबू सोरेन व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को पूरा करने में लग गये थे। अलग राज्य का मुद्दा भूला दिया गया। न सिर्फ भूला दिया गया था, वरन् इसके विरूद्ध कॉमरेड राय तथा शिबू सोरेन दोनों ने मुहिम छेड़ दिया।
इस महत्वाकांक्षा की लड़ाई में काँग्रेस ने शिबू सोरेन को पटाकर बिहार से लालू प्रसाद की सरकार को गिराने का प्रयास शुरू कर दिया। पुनः काँग्रेस को बिहार की गद्दी में बैठने के लिए शिबू सोरेन सक्रिय हो गये।
केन्द्र में काँग्रेस शिबू सोरेन के सांसदों को अपने पक्ष में करने का प्रयास करने लगी।
Thursday, March 17, 2011
अध्याय – दश
वास्तव में झारखंड आन्दोलोन को झारखंड नामधारी पर्टियों ने ही जन्म दिया तथा उसे आगे बढ़ाया। अन्य राजनैतिक दलों जिसमें वामपंथी भी थे, उनकी भूमिका झारखंड आन्दोलन को आगे बढ़ाने में नगण्य रही। जब-जब झारखंड आन्दोलन आगे बढ़ाता कोई-कोई इक्का-दुक्का नेता इसपर कभी कोई ब्यान दे देता। ज्यादेतर पार्टियाँ एवं वामपंथी नेता अपनी अंतर्राष्ट्रीय अवधारणा के कारण इस इलाके को पृथक राज्य के रूप में अलग होने देना नहीं चाहते थे। भीतर ही भीतर इस आन्दोलन को कमजोर करने की साजिश रचते।
पर एक समय ऐसा भी आया जब वामपंथी पार्टियों ने सीधा विरोध खुले आम किया। पश्चिम-बंगाल में झामुमो एवं झारखंड पार्टी के द्वारा अलग राज्य की सभाओं में वामपंथी द्वारा हमले किए गये। हत्याएँ की गई। कई प्रमुख झारखंड नामधारी दलों के प्रमुख कार्यकर्त्ताओं की हत्याएँ तक की गई। उन क्षेत्रों में पश्चिम बंगाल सरकार ने ऐसा आतंक का माहौल बनाया ताकि लोग झारखंड अलग राज्य की बात तक न करें। कोई मीटिंग, सभा न कर सकें। झूठे मामलों में लादकर यातनाएँ दी गई।
काँग्रेस पार्टी के रवैये को तो सभी जानते हैं। इस पार्टी ने सीधे-सीधे इस आन्दोलन को दबाने या कुचलने या बरगलाने का काम किया।
जनसंघ पार्टी झारखंड क्षेत्र में भी सक्रिय हो रही थी। जनसंघ ने हमेशा ही एक पृथक वनांचल राज्य का समर्थन किया। झारखंड की जगह वे वंनाचल पृथक राज्य का समर्थन करते रहे थे। 1980 में जब जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी बनी, तो इस पार्टी ने भी वंनाचल राज्य का समर्थन किया। जनसंघ या भारतीय जनता पार्टी सैद्धान्तिक रूप से कभी भी झारखंड आन्दोलन के विरोध में नहीं रही। 1991 के लोक सभा चुनाव के आते-आते दक्षिण बिहार के झारखंड क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी एक सशक्त पार्टी के रूप में ऊभर कर आ चुकी थी। 1991 के लोक सभा चुनाव में इसने धनबाद (प्रो0 रीता वर्मा), राँची (रामटहल चौधरी) , गुमला (ललित उराँव) सीटें जीत ली थी। बाकी में हजारीबाग (भुवनेश्वर मेहता - सी0 पी0 आई0) पलामू, गढ़वा, कोडरमा से जनता दल तथा अन्य छः गिरीडिह, दुमका, राजमहल, पश्चिमी सिंहभूम, पूर्वी सिंहभूम (जमशेदपुर), गोड्डा सीटें झमुमो ने जीत ली थी।
भारतीय जनता पार्टी बाद में सशक्त पार्टी के रूप में उभर कर सामने आई। जनता पार्टी ने पहले तो छोटे राज्यों की वकालत की, पर बाद में वे भी इसके विरोध में हो गये।
1990 बिहार विधान सभा तथा 1991 लोक सभा के चुनाव तक झमुमो ने मात्र अपने अठारह वर्ष के सफर में इस क्षेत्र के एक सशक्त पार्टी के रूप में पहचान बना ली थी। इकासी में से उन्नीस सीटें विधान सभा में अकेले झामुमो की थी। अन्य कई झारखंड नामधारी दलों के भी विधायक विधान सभा में पहुँचे थे।
ऐसा लगने लगा था कि अब झारखंड आन्दोलन अपने मुकाम तक पहुँच जायेगा। झारखंड नामधारी दलों, वामपंथीयों, जनतादल ने मिलकर संयुक्त मोर्चा काँग्रेस के खिलाफ बनाया था।
मार्च 1990 में जनता दल के श्री लालू प्रसाद को इस संयुक्त मोर्चे ने बिहार का मुख्यमंत्री बना दिया था। इसमें बिनोद बिहारी महतो – संस्थापक अध्यक्ष झामुमो की बहुत बड़ी भूमिका रही थी। अपने उन्नीस विधायको के साथ-साथ वामपंथियों तथा अन्य झारखंड नामधारी दलों का समर्थन भी उन्होंने जुटाया था और काँग्रेस को बिहार से हटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अतः लालू प्रसाद को वे विशेष सुझाव देते रहते थे।
Sunday, March 6, 2011
“झारखंड़ मामलों से संबंधित समिति” की रिपोर्ट
समिति ने दो राज्यों पश्चिम बंगाल तथा उड़ीसा का कोई दौरा नहीं किया। इसीलिए समिति ने इन राज्यों में आन्दोलन की लोकप्रियता पर कोई टिप्पणी ही नहीं की। कोई मूल्याकंन ही नहीं किया गया। मध्यप्रदेश के विषय में समिति ने यह कह दिया कि वहाँ आन्दोलन का प्रभाव कम था। इस बात को नजर अंदाज कर दिया गया कि पुनः दौरा किया जाए, उन क्षेत्रों का जिसका दौरा समिति नहीं कर पाई थी।
समिति ने इस बात को नजर अंदाज कर दिया कि गरीब अशिक्षित भोले-भाले झारखंड़ के आदिवासी एवं मूलवासी समूह अपने ऊपर हो रहे अत्याचार, शोषण दमन के विरूद्ध आवाज उठाने से डरते थे। उन्हें बाहरी शोषण कर्त्ताओं ने, पुलिस एवं प्रशासन ने इतना आतंकित कर रखा था कि वे गूँगें एवं बहरे हो गये थे। जब-जब कोई साहस करके आगे बढ़ता तो उसके आन्दोलन को निर्ममता पूर्वक कुचल दिया जाता। ऐसा इतिहास में प्रमाणित है। ऐसी परिस्थिति में आन्दोलन की लोकप्रियता की बात करना ही बेमानी था। ऐसी सोच को पूर्वाग्रह से ग्रसित ही माना जा सकता है।
अध्याय छः पारा-22 में इस रिपोर्ट ने इसके बाद कह दिया कि “झारखंड़ पृथक राज्य” के सृजन में चार राज्यों बिहाऱ बंगाल, उड़ीसा और मध्यप्रदेश को तोड़ने और इन टुकड़ो से झारखंड़ नामक एक नई इकाई का गठन करने का कार्य अन्तग्रस्त है। प्रजातांत्रिक प्रणाली में ऐसा संबंधित पार्टियों के सहमति से ही किया जा सकता है। ये पार्टयाँ विधिवत रूप से गठित चार राज्यों की सरकारें है।
इस समिति ने अलग राज्य के बनाने के मार्ग में आनेवाली बाधा का जिक्र कर दिया। चार राज्यों की सरकारें अगर विरोध करेंगी तो झारखंड़ पृथक राज्य नहीं बन सकता।
समिति ने इस बात को भूला दिया कि संविधान की धारा 2,3 एवं 4 में यह स्पष्ट है कि राज्य सरकार की सहमति के बिना भी केन्द्र सरकार अलग राज्य का गठन उसके किसी हिस्से को अलग करके बना सकती है। फिर किसी राज्य सरकार के विरोध से झारखंड़ के मामले में केन्द्र सरकार डरेगी क्यों ? समिति को किस कारण भय पैदा हुआ ?
बिहार के झारखंड़ के हिस्से के बारे में तो समिति का सुझाव बिलकुल ही तथ्यों से परे एवं तर्कहीन था। समिति ने यह स्पष्ट कर दिया था कि सभी राजनैतिक दल एक पृथक राज्य बनाने अथवा स्वायत्तता प्रदान करने के पक्ष में है। पर समिति ने एक अजिब सा तर्क दिया कि देश के वर्त्तमान राजनैतिक परिस्थिति की मजबूरियों और माँगों को ध्यान में रखते हुए इस बारे में निर्णय लेना पड़ेगा। समिति ने आशंका जाहिर कर दिया कि “विघटनकारी बलों को छूट प्राप्त है। अलगाववादी और विघटनकारी बल देश की एकता और अखंड़ता के लिए खतरा उत्पन्न करने के लिए सभी कार्य कर रहे है। हमने राज्यों के पुर्नगठन के लिए दो बार बैठकें की जिनमें एक 1980 के मध्य में भाषा के आधार पर तथा दूसरी 1960 और 1970 के दशकों के प्रारम्भ में उत्तर पूर्व में जातीय आधार पर। यह सिलसिला अभी जारी है। झारखंड़ राज्य बनाने पर समकालीन राष्ट्रीय स्थिति को देखते हुए ध्यान पूर्वक विचार किया जाना चाहिए।“
इस प्रकार इस समिति ने तथ्यों के विरूद्ध झारखंड़ अलग राज्य बनाने को खतरनाक कहा। इसे विघटनकारी एवं देश की एकता एवं अखंड़ता के लिए खतरा कहा। ऐसी आशंका जताई गई जिसका 1990 में कहीं नामो निशान नहीं था।
समिति ने यह आशंका जाहिर किया कि मात्र राज्य या संघ शासित क्षेत्र का दर्जा दिए जाने से सभी समस्याएँ हल नहीं हो सकती है। अलग राज्य माँगा जा रहा था, जिसके समर्थन में सभी तथ्य थे, पर समिति ने एक परिषद् बनाने की या एक ऐसे माडल बनाने की सिफारिश कर दी ताकि इन क्षेत्रों की सांस्कृति रक्षा हो सके, यहाँ की भाषा की उन्नति हो सके, आदिवासी जनसंख्या की सुरक्षा के उपायों को और मजबूत बनाया जा सके। बड़े आश्चर्य की बात है कि हर बार नये प्रयोग करने की सोची जाती रही, पर जो स्थापित उपाय थे, उन्हें नहीं आजमाया गया। अलग राज्य से ज्यादे कारगार क्या कोई दूसरा मॉडल बन सकता था, कदापि नहीं।
पर जाने-अनजाने इस समिति को एक महत्वपूर्ण बात का जिक्र करना ही पड़ा जो झारखंड़ के लिए बाद में सहायक सिद्ध हुआ। समिति ने अपनी रिपोर्ट के अध्याय छः पारा दश में “निष्कर्ष” शीर्षक के अन्तर्गत कहा है कि झारखंड़ क्षेत्र की जन सांख्यिकीय परिपेक्ष में अनुसूचित जनजाति के उन समुदायों को पहली प्राथमिकता दी जाय। कुछ समय पहले बिहार के कुछ जिलों में अधिकांश जनसंख्या अनुसूचित जनजातियों से संबंधित थी जिन्होंने अपने क्षेत्र को झारखंड़ राज्य के एक भाग के रूप में रखने की माँग की। 1981 की जनगणना के अनुसार इनकी जनसंख्या 30.26 प्रतिशत बैठती है। इसके अतिरिक्त ऐसा भी बहुत जनसमुदाय है जिसका आदिवासियों के साथ घनिष्ठ संबंध है तथा जिन्हें 1981 में आदिवासियों की सूची से अलग रखा गया था, ये समुदाय कुर्मी महतो के नाम से जाना जाता है। एक बड़े सदन की जनसंख्या में इनका महत्वपूर्ण हिस्सा है तथा बाद के समय में इनके द्वारा किए गये उत्प्रवास की तुलना में उनके मूलवंश की पहचान बनाए रखने के आधार पर इन्हें मूलवासी, सदावासी अनादिवासी आदि नामक कई अन्य नामों से भी जाना जाता है। कुल जनसंख्या में इस वर्ग का कथित रूप से 50 प्रतिशत हिस्सा है।“
इसी प्रकार अध्याय तीन में पारा 25 में कहा गया है कि “झारखंड़ आन्दोलन शुरू से ही एक झारखंड़ राज्य बनाने के लिए चलाया गया जिसे बिहार के छोटानागपुर और संथाल परगना जिलों तथा मध्यप्रदेश, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल के समीपवर्त्ती जिलों में से बनाया जाना था। इन क्षेत्रों की या इनके अधिकांश हिस्सों में आदिवासी (संथाल, मुंड़ा, हो, उराँव) और गैर-सरकारी आदिवासी (कुर्मी महतो इत्यादि) समुदायों की काफी आबादी है जो जातीयता, ऐतिहासिक, सांस्कृति रूप से छोटानागपुर के पैतृक समुहों से संबंध है। झारखंड़ आन्दोलन इन समीपवर्त्ती क्षेत्रों में इन समुदायों के मध्य फैला हुआ है।”
आदिवासी शब्द का अर्थ इस रिपोर्ट में अनुसूचित जनजातियों से लगाया गया है। कुर्मी महतो इत्यादि कई अन्य जातियों को गैर-सरकारी आदिवासी कहा गया है। गैर-सरकारी आदिवासी का क्या अर्थ हो सकता है ? यही न कि वैसी जनजातियाँ जो वर्त्तमान में अनुसूचित नहीं है।
समिति द्वारा इस तथ्य को स्वीकार करने के बाद कि झारखंड़ आन्दोलन सरकारी एवं गैर-सरकारी आदिवासियों का रहा है तथा जिनकी संख्या झारखंड़ में बहुतायात में, बहुमत में है, जिनकी अपनी समान सभ्यता संस्कृति पहचान है, झारखंड़ अलग राज्य बनाने के लिए समिति द्वारा सुझाव नहीं देना, बौद्धिक बेईमानी ही कही जायेगी।
“झारखंड़ मामलों से संबंधित समिति” की रिपोर्ट
इस समिति ने जो दूसरी महत्वपूर्ण बात कही, वह यह कि अब तक के जितने उपाय संविधान की पाँचवी सूची के अन्तर्गत इस क्षेत्र के विकास के लिए किए गये थे, वे सभी उपाय नाकामयाब साबित हुए थे। इस रिपोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि अब तक सारे प्रयास इस क्षेत्र को पाँचवीं सूची के अन्दर शामिल मानकर किए गये थे।
इस रिपोर्ट ने अपने अध्याय-तीन पारा चौबिस में यह स्पष्ट कर दिया कि “झारखण्ड़ आन्दोलन के इतिहास में जो उल्लेखनीय बात हुई है, वह आदिवासी और गैर-आदिवासी आबादी का एक जूट होना है। इस आन्दोलन में मुंड़ा, संथाल, हो और उराँव जैसे बड़े-बड़े आदिवासी समूहों और कुर्मी जैसे गैर-आदिवासी समुहों और अन्य जातियों का दबदबा है परन्तु अन्य जातियाँ भी इसमें शामिल हुई है। छोटे-छोटे आदिवासी ग्रुपों के सम्बन्ध में सूचना कम है। इस तरह झारखंड़ आन्दोलन का सामाजिक आधार पिछले बीस वर्षों में काफी फैला है।”
इस रिपोर्ट ने यह बात कह कर यह स्पष्ट कर दिया था कि 1970 से इस आन्दोलन का सामाजिक आयाम बढ़ा था। रिपोर्ट 1990 में लिखी जा रही थी और सामाजिक आयाम के बढ़ने की बात पिछले 20 वर्षों से की गई थी। इसका मतलब ही यही था कि झारखंड़ मुक्ति मोर्चा के गठन के बाद से ही आदिवासी तथा गैर-आदिवासियों का संयुक्त आन्दोलन चला। 1990 तक निश्चय ही इस आन्दोलन को मात्र आदिवासियों का आन्दोलन बतलाया गया था। इसे अब अल्पमत का नहीं कहा जा सकता था। बिनोद बिहारी महतो के झामुमो के संस्थापक- अध्यक्ष होने के साथ ही स्थिति में बदलाव शुरू हो गया था, क्योंकि उनके साथ अन्य गैर-आदिवासी समूह भी शामिल हुए जिसमें कोयलांचल के मजदूर भी थे।
इस समिति ने यह भी स्पष्ट कर दिया था कि “पिछले चालीस वर्षो से झारखंड़ क्षेत्र की एक अलग पहचान भाषा, सांस्कृतिक धारा, भौतिक विकास की एक स्पष्ट अवधारणा रही है।” इस रिपोर्ट ने स्वीकार किया कि “उपनिवेशकालीन समय में इस प्रदेश का तीन अथवा चार राज्यों में विभाजन हो गया। राजनैतिक तथा प्रशासनिक राज्यों में यह विभाजन बना हुआ है, लेकिन प्रशासनिक सीमाओं के आर-पार लोगों में परस्पर सांस्कृतिक आदान-प्रदान रूका नहीं है, वास्तव में यह विकसित हुआ है।”
झारखंड़ मामलों से संबंधित समिति ने मई 1990 में यह स्पष्ट सुझाव दे दिया कि “इसिलिए हमें इस क्षेत्र को स्पष्ट सांस्कृतिक पहचानवाले क्षेत्र के रूप में मान लेना चाहिए जिसका विकास लोगों के सम्पूर्ण विकास के एक भाग के रूप में किया जाना चाहिए।”
चूँकि इसी रिपोर्ट ने यह साबित कर दिया था कि अब तक के विकास के लिए अपनाए गये उपाय जो संविधान की पाँचवी सूची के तहत अपनाए गये थे, इस क्षेत्र के विकास में कामगार सिद्ध नहीं हुए थे, कुछ अन्य उपाय करने चाहिए। यानि इस समिति की रिपोर्ट ने यह इंगित कर दिया था कि जितने प्रकार के परिषद् या बोर्ड बनाए गये थे, सभी विफल साबित हुए थे।
पर, इस क्षेत्र का विकास कैसे हो, इस अहम् सवाल का जबाव भी इसी रिपोर्ट ने दे दिया था। अपने अध्याय छः “निष्कर्ष” शीर्षक के अन्तर्गत पारा ग्यारह में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि “झारखंड़ जनसमुदाय के पहले दो वर्गो अर्थात आदिवासी समूह और मूल गैर-आदिवसी समूह का भविष्य एक दूसरे से जुड़ा रहा। इन दोनों समूहों की संस्कृति और इतिहास एक समान है। .................. परिणाम यह है कि आज दो वर्गो ने एक समान उद्देश्य रखा है यह जब एक जातीय वर्ग का दूसरी जाति या एक धार्मिक समुदाय का दूसरे का प्रश्न नहीं है। बाहरी शोषणकर्त्ताओं के विरूद्ध मन की भावना से इन दो वर्गो को एक अलग झारखंड़ राज्य के लिए एकीकृत किया है। आशा है कि वर्त्तमान सामाजिक आर्थिक लक्ष्य को लेकर एक धर्मनिरपेक्ष झारखंड़ राज्य का परिणाम हो। यदि ऐसा होता हे तो उन सभी लोगों को प्रसन्नता होगी जो संविधान की प्रस्तावना की भावना का मूल्य समझते है।”
इस समिति की रिपोर्ट के उपर वर्णित तथ्यों को दखने के बाद इस बात पर कोई संदेह ही नहीं रह जाना चाहिए कि झारखंड़ क्षेत्र का मतलब दक्षिण बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा एवं मध्यप्रदेश के समीपवर्ती इलाके हैं जिनकी समान सभ्यता-संस्कृति है। इसकी एक अलग पहचान भी है। अब इस बात पर संदेश नहीं होना चहिए कि इस क्षेत्र को ही अलग राज्य का दर्जा मिल जाना चाहिए।
पर, बड़ी हैरत की बात है कि झारखंड़ अलग राज्य के संबंध में हमेशा ही बौधिक बेईमानी की जाती रही है। राज्य पुर्नगठन आयोग ने अगर 1955-56 में सही तथ्यों को लिखा होता तो निश्चय ही झारखण्ड़ अलग राज्य बनाने की अनुशंसा की गई होती और अन्य राज्यों के साथ-साथ इसके गठन की प्रक्रिया भी शुरू कर दी जाती। वहाँ उस समय भी बौधिक बेईमानी की गई। इसे सिर्फ आदिवासियों का आन्दोलन करार दिया गया। अन्य कारण जो अलग राज्य नहीं बनाने के लिए दर्शाये गये थे, वे भी भ्रामक एवं तथ्यों से परे थे। इस बार तो गजब ही किया गया। समिति की रिपोर्ट में सही तथ्यों को तो रखा गया एवं निष्कर्ष भी सही निकाले गये पर जो सुझाव दिए गये इस क्षेत्र के लिए वह सर्वथा गलत रहे। यहाँ भी अन्य प्रकार की बौधिक बेईमानी की गई।
राज्य पुर्नगठन आयोग के दिनों में सबसे सशक्त पार्टी झारखंड़ी पार्टी के प्रमुख नेता श्री जयपाल सिंह ने अलग राज्य बनाने के लिए आयोग पर कोई दबाव नहीं दिया। उदासीन रहे। हो सकता है, इसी कारण आयोग को बौधिक बेइमानी करने का मौका मिल गया।
इस बार भी कहीं न कहीं किसी के कारण उलटे सुझाव दे दिये गये। झामुमो के तत्कालीन अध्यक्ष शिबू सोरेन ने समिति पर ऐसा कोई दबाव नहीं दिया। बल्कि कालान्तर में पता चला कि वे ही एक प्रकार के परिषद् के समर्थक बन गये थे।
इस बात का उल्लेख करना यहाँ जरूरी हो गया है कि 1978 में ही बिहार विधान सभा द्वारा “झारखंड़ विकास परिषद् 1978” का गठन किया गया था। इसका भी जिक्र करना आवश्यक है कि ठीक राज्य पुर्नगठन आयोग के गठन के पूर्व 1951 में, बिहार जनजातीय सलाहकार परिषद् बनाया गया था। फिर 1971 में छोटानागपुर संथाल परगना स्वायत्त विकास प्राधिकरण बनाया गया था। इधर झारखंड़ विषयक समिति अपना दौरा कर रही थी। रिपोर्ट तैयार कर रही थी, तो दूसरी तरफ बिहार सरकार इसे भ्रमित करने के लिए झारखंड़ क्षेत्र विकास परिषद् 1991 के विधेयक का निर्माण कर उसे पारित कराने में लगी थी। इस विधेयक द्वारा पूर्व के छोटानागपुर संथाल परगना स्वशासी विकास प्राधिकरण 1971 एवं उसके बाद के संशोधनों को निरस्त कर दिया गया था और 1/8/1991 को 1991 एवं उसके बाद के संशोधनों को निरस्त कर दिया गया। मई 1990 के झारखंड़ मामलों से संबंधित समिति की रिपोर्ट मई 1990 उसी प्रकार ठढ़े बस्ते में पड़ी रही।
Sunday, February 20, 2011
“झारखंड़ मामलों से संबंधित समिति” की रिपोर्ट
इस समिति को दक्षिण बिहार, मध्यप्रदेश, उड़ीसा तथा पश्चिम बंगाल के उन क्षेत्रों का दौरा करना था जिसे झारखंड़ क्षेत्र माना जाता रहा था। चूँकि समय सीमा मात्र एक महिने की थी, यह समिति पूरे क्षेत्रों का दौरा नहीं कर सकी और देश में आम चुनाव की घोषणा अक्टूबर 1989 के बाद कर दी गई थी, तो दौरा बन्द हो गया और विशेषज्ञों को रिपोर्ट तैयार करने को कह दिया गया। विशेषज्ञों द्वारा तैयार किए गये मसौदे पर 25 अप्रेल 1990 को समिति की बैठक में विचार-विमर्श किया गया। फिर 14-15 मई 1990 को हुई बैठक में नये मसौदे पर चर्चा हुई और गृह-मंत्रालय को सौंप दिया गया।
इस रिपोर्ट में कुल मिलाकर छः अध्याय हैं तथा सात अनुच्छेद। इस रिपोर्ट में यह भी दर्शाया है कि किस प्रकार झारखंड़ आन्दोलन के सामाजिक एवं क्षेत्रीय आयाम का विस्तार हुआ। एक छोटे आन्दोलन ने जिसे छोटानागपुर उन्नति समाज ने शुरू किया था, किस प्रकार विशाल रूप लिया इस पर भी विवेचना किया है। झारखंड़ में औद्योगिकरण के प्रभाव इसके जातीय विशाल रूप लिया इस पर भी विवेचना किया है। झारखंड़ में औद्योगिकरण के प्रभाव इसके जातीय समीकरण, जनसांख्यिकीय स्थिति आदि कई विषयों पर भी इस रिपोर्ट में बहुत कुछ कहा गया है। इसके साथ साथ राज्य पुर्नगठन आयोग की रिपोर्ट का हवाला भी दिया गया है जो अलग राज्य से सम्बन्धित है तथा झारखंड़ आन्दोलन के कारणों पर भी विवेचना किया गया है।
Saturday, February 19, 2011
“झारखंड़ विषयक समिति” का निर्माण –
अब इस बात पर नजर डालना आवश्यक है कि बिहार विधान सभा में झारखंड़ नामधारी पार्टियों की स्थिति क्या रही थी। 1952 में 33 विधायक, 1957 में 32, 1967 में आठ, 1969 में सत्रह, 1971 में शून्य, 1972 में आठ, 1977 में फिर एक, 1980 में चौदह, 1984 में एक, 1985 में 9 तथा 1990 में 21 सीटें बिहार विधान सभा में झारखंड़ नामधारी पार्टियों को मिली। इसी प्रकार लोक सभा सीटें 1957 में 5 सीटें, 1962 में तीन सीटें, 1971 में दो सीटें, 1980 में एक सीटें, 1985 में एक भी सीटें नहीं, फिर 1989 में दो सीटें तथा 1991 में छः सीटे।
झारखंड़ अलग राज्य बनाने के संबंध में सरकार की सोच बड़ी भ्रामक थी। केन्द्र सरकार यह देखा करती कि इसके कितने जनप्रतिनिधि चुनाव जीत कर आते है जिससे झारखंड़ आन्दोलन की ताकत को नापा जाता रहा था। कम प्रतिनिधि चुनाव जीतकर आते तो कहा जाता कि झारखंड़ आन्दोलन को पर्याप्त जनसमर्थन प्राप्त नहीं है। पर यही बात दुसरे राज्यों के गठन के संबंध में नहीं सोची जाती थी। पंजाब से हरियाणा अलग हुआ। महाराष्ट्र से गुजरात बना। कर्नाटक बना मैसूर से अलग होकर। आन्ध्रप्रदेश तमिलनाडू से अलग हुआ। नागालैंड़ बना। पच्चीस राज्य बने आजादी के बाद। कहीं भी किसी भी मौके पर यह नहीं कहा गया कि इन राज्यों में अलग राज्य बनाने के लिए आन्दोलन क्यों नहीं हुए ? यह तलाश भी नहीं की गई कि आन्दोलन की जरूरत क्यों नहीं थी, इनको अलग करने के लिए। पर झारखंड़ अलग राज्य बनाने के सवाल पर आन्दोलन की आवश्यकता पर बल क्यों दिया गया? वह भी एक बड़े एवं सशक्त आन्दोलन की आवश्यकता क्यों दर्शाई जाती रही ? यह एक विचारनीय विषय है। दूसरी बात है कि इतिहास रहा है कि आधी सदी से ज्यादा समय तक यहाँ झारखंड़ अलग राज्य का सशक्त आन्दोलन चलाया गया, पर इसकी मान्यता नहीं देकर यहाँ के लोगों की आवाज को नहीं सुनकर उल्टे इस क्षेत्र के आन्दोलन को दबाया-कुचला गया। इस आन्दोलन में सैकड़ो को मारा गया, हजारो को जेल भेजा गया। लाखों लोगों ने कष्ट झेले। पर फिर भी झारखंड़ आन्दोलन को एक समस्या के रूप में देखा गया। इसका दमन किया गया जैसे कि यह माँग माँगना एवं आन्दोलन करना कोई गुनाह हो। यह कभी नहीं सोचा गया कि झारखंड़-आन्दोलन यहाँ की समस्याओं के चलते पैदा हुआ है तथा समस्या के निदान के रूप में एक राज्य माँगा जा रहा है। यह आन्दोलन अपने आप में कोई समस्या नहीं बल्कि समस्याओं का समाधान है।
झारखंड़ विषयक समिति का गठन 1989 में किया गया था। यह अपने आप में एक ऐतिहासिक घटना है तथा इसकी रिपोर्ट झारखंड़ आन्दोलन के इतिहास में एक महत्वपुर्ण तथा यादगार दस्तावेज के रूप में हमेशा जाना जाता रहेगा।
1987 में बिनोद बिहारी महतो ने “झारखंड़ समन्वय समिति” का गठन किया। ज्ञातव्य हो कि झामुमो के संस्थापक अध्यक्ष बिनोद बिहारी महतो प्रथम दश वर्षो 1983 तक झामुमो के अध्यक्ष रहे। फिर अमर शहीद निर्मल महतो अध्यक्ष बने तथा महामंत्री शिबू सोरेन ही रहे। इस समिति का गठन इसलिए किया गया कि झारखंड़ में झारखंड़ नामधारी पार्टियाँ तथा अन्य संगठन अलग-अलग से इस आन्दोलन को अंजाम दे रहे थे। बिनोद बिहारी महतो ने इस सोच के साथ इस समिति का गठन किया कि सभी मिलकर अगर जोरदार आन्दोलन करें तो केन्द्र सरकार इस विषय पर सोचने के लिए बाध्य होगी। उन्होनें इस समिति में कई संगठनों, पार्टियों तथा नेताओं को सम्मिलित किया। कुल मिलाकर बावन संगठन इसमें शामिल हुए। इसमें वामपंथी, समाजवादी, झारखंड़ नामधारी तथा कई अन्य सामाजिक संगठन भी थे। बिनोद बिहारी महतो की संयोजन शक्ति ने यह काम कर दिखाया क्योंकि वामपंथी से लेकर काँग्रेस विरोधी हर पार्टी, संगठन से उनका ताल्लूक रहा था। इसमें प्रमुख रूप से बिनोद बिहारी महतो, बी0 पी0 केशरी, संजय बसु मल्लिक, डा0 राम दयाल मुंड़ा, संतोष राणा, सर्वश्री एन0 ई0 होरो, लाल साहदेव, सूर्य सिंह बेसरा, प्रभाकर तिर्की, बिरसा उराँव, त्रिदीप घोष, मानव घोष दस्तिदार, भाई हेलेन कूजूर आदि कई नेताओं ने हिस्सा लिया था। एक विशाल रैली राँची के मोराबादी मैदान में 15 नवम्बर 1987 को भगवान बिरसा की जन्म तिथि पर आयोजित की गई। सरकारी बाधा एवं सरकार द्वारा सारे रास्तों की नाके बंदी, लाठी चार्ज के बावजूद लाखों की तादाद में भीड़ इकट्ठी हुई। नवम्बर के महिने में प्रचंड़ ठंड़ थी और बारिश भी हो गई थी, फिर भी लोगों का जोश देखने लायक था।
इसी झारखंड़ समन्वय समिति की रैली को देखते हुए केन्द्र सरकार ने इस माँग पर पुनः ध्यान दिया। केन्द्र सरकार के गृह मंत्रालय ने दिनांक 23-28 अगस्त 1989 को एक आदेश जारी करके “झारखंड़ मामलों से संबंधित समिति” नामक समिति का गठन किया। “कॉमिटि ऑन झारखंड़ मैटर्स” अंग्रेजी नाम है। इसमें झारखंड़ आन्दोलन के प्रतिनिधि, केन्द्र सरकार के प्रतिनिधि तथा झारखंड़ मामलों के विशेषज्ञों की टीम शामिल की गई। इस समिति ने मई 1990 में एक रिपोर्ट केन्द्र सरकार को सौंपी। राज्य पुर्नगठन आयोग के बाद यह एक विशेष समिति थी जो सिर्फ झारखंड़ आन्दोलन के मामलें में गठित की गई थी।
इस समिति में निम्नलिखित सदस्य थेः-
केन्द्र सरकार के प्रतिनिधि –.
1. श्री बी0 बी0 सक्सेना, संयुक्त सचिव ग्रामीण विकास विभाग।
2. श्री बी0 के0 मिश्रा, संचुक्त सचिव जनजाति विकास कल्याण मंत्रालय
राज्य सरकार के प्रतिनिधि –
श्री जे0 एल0 आर्य, गृह सचिव बिहार, सचिव-जनजाति कल्याण बिहार, क्षेत्रिय विकास आयुक्त बिहार।
झारखंड़ आन्दोलन के प्रतिनिधि –
1. डा0 आर0 डी0 मुंड़ा
2. डा0 ए0 के0 सिंह
3. सर्वश्री एन0 ई होरो
4. शिबू सोरेन
5. बिनोद बिहारी महतो
6. बी0 पी0 केसरी
7. एस0 एस0 बेसरा
8. प्रभाकर तिर्की
9. सन्तोष राणा
10. सूरज मंडल
11. शैलेन्द्र महतो
12. प्रो0 स्टीफन मरांड़ी
विशेषज्ञ –
1. डा0 एस0 के0 सिंह
महानिर्देशक भारतीय मानव शास्त्रीय सर्वेक्षण
2. डा0 भूपेन्द्र सिंह
भारत सरकार के भूतपूर्व सचिव
3. श्री के0 एन0 प्रसाद
भूतपूर्व अपर सचिव
अन्य प्रतिनिधि –
1. प्रो0 लालचन्द्र चुड़ामनी नाथ साहदेव
अध्यक्ष सदान् विकास परिषद्, राँची।
2. प्रो0 साहिद हसन्
महासचिव सदान विकास परिषद्।
उल्लेखनीय है कि झारखंड़ मुक्ति मोर्चा के तत्कालीन अध्यक्ष शिबू सोरेन, उपाध्यक्ष सूरज मंडल ने झामुमो को इस रैली में शामिल नहीं होने का निर्देश ही नहीं दिया, बल्कि इस समिति के संयोजक बिनोद बिहारी महतो का कई स्थानों में विरोध भी कराया गया था। उन्होंने रामगढ़ की आम सभा में अर्जुन राम (महतो) द्वारा खुलेआम विरोध भी करवाया था इन लोगों ने झामुमो का इस समिति में शामिल होना तथा इसके लोगों का समिति में शामिल होना तथा इसके लोगों का समिति के आन्दोल में भाग लेना उचित ही नहीं समझा था। बाद में इस समिति के आन्दोलन की सफलता देखकर “झारखंड़ मामलो से संबंधित समिति” में पैरवी करके सदस्य बन गये थे, जो झारखंड़ समन्वय समिति की देन थी। उस समय देश के प्रधान मंत्री श्री राजीव गाँधी थे तथा कॉग्रेस के श्री बूटा सिंह केन्द्रीय गृह-मंत्री थे। जब इस समिति का गठन किया गया, बिहार में कॉग्रेस के जगरनाथ मिश्रा मुख्य मंत्री थे। इस प्रकार झारखंड़ आन्दोलन को एक विस्तृत आयाम बिनोद बिहारी महतो के प्रयत्नों से मिला। सिर्फ आदिवासी आन्दोलन का जो ठप्पा लगा था, वह मिटने लगा था।
अध्याय - नौ (अतंरराष्ट्रीयता बनाम राष्ट्रीयता)
इन्ही तथ्यों के आधार पर विश्व में महाद्वीप बने। महादेश बने। देश बने। अलग-अलग देश के वासियों ने अपनी सभ्यता-सास्कृति को विश्व के पटल पर महत्व दिलवाने का प्रयास किया है एवं अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाने की चेष्टा की है एवं बनाया है। एक दूसरे से लड़ाई लड़ी गई है, सिर्फ अपने देश की सिमाओं की रक्षा करने या उसका विस्तार करने के लिए। एक देश के लोग दूसरे देश के लोगों पर शासन करते है। दूसरों को गुलाम बनाया गया है। फिर स्वतंत्रता की लड़ाईयाँ लड़ी गई है। ये सभी निश्चित ही राष्ट्रीयता के नाम पर ही किए गये है।
एक देश के अंदर भी अलग-अलग धर्मों के लोग निवास करते हैं। अलग-अलग भाषा, बोलियाँ बोलने वाले लोग निवास करते है। जाहिर है कि ऐसे में छोटे स्तर पर वहीं होना स्वाभाविक है जो एक बड़े पैमाने पर विश्व के अन्दर अलग-अलग देशों की राष्टीयताओं के बीच होता है। यानि वैमनष्य, भेदभाव, एक के द्वारा दूसरे को शासन करने की मनोवृति। उन्नत आर्थिक स्थिति वाली कौम या फिर ताकतवर कौम के द्वारा कमजोरो को दबाने की चेष्टा। पूरे भारतवर्ष को ही देखें। हम कितने ही वर्गों में बँटे है।
सवाल उठता है, एसी परिस्थिति में अन्याय, शोषण, जुल्म, उपेक्षा के विरूद्ध कहाँ से लड़ाई शुरू की जाए। इस अन्याय या शोषण पर आधारित व्यवस्था का कहीं ओर छोर तो दिखाई देता नहीं। कहाँ पर इसकी गर्दन पकड़ी जाय। सैद्धान्तिक सवाल तो शोषण मुक्त समाज का निर्माण करना है, पर व्यवहारिक सवाल है कि क्या इसे अंतराष्ट्रीय अवधारणा के तहत पूरे विश्व को एक इकाई मानकर एक साथ पूरे विश्व में लड़ाई शुरू की जाय या फिर राष्ट्रीयता को आधार मानकर एक देश को यूनिट मानकर चला जाय या फिर एक प्रदेश को इकाई माना जाय। हम इससे भी नीचे परिवार तक जा सकते है। सफलता किधर से हाथ लगेगी इसका जबाव कुछ भी नहीं है। आप इस लड़ाई को कहाँ से शुरू करेगें, सफलता के लिए तो यह व्यक्ति विशेष की सौंच पर ही निर्भर करता है।
बिनोद बाबू ने सभी आयामों को देखा था। परखा था। उन्होनें अपने जीवन के शुरूआती दौर में वामपंथ-कम्यूनिष्म का साथ दिया था। पर उस अन्तराष्ट्रीय अवधारणा के साथ चलते हुए उन्हें लगा था कि उनकी उपलब्धि कुछ भी नहीं है। वे जहाँ के तहाँ है। कोई परिवर्त्तन उन्हें दिखाई नहीं दिया था। अतः उन्होने एक क्षेत्र विशेष को, जिसकी सभयता-संस्कृति तथा रहन-सहन, विश्वास एक सा था, चुना और उसकी राष्ट्रीयता को यूनिट मानकर अपना संघर्ष शुरू किया। निश्चित ही सफलताएँ हाथ लगी।
Friday, February 11, 2011
अध्याय आठ - झारखण्ड़ में वाम-पंथ
उसी प्रकार काँग्रेस का ही बोलबाला उड़ीसा एवं मध्यप्रदेश के झारखण्ड़ क्षेत्रों में था। पर धीरे-धीरे वामपंथी ताकतों ने झारखंड़ क्षेत्र में अपना प्रभाव फैलाना शुरू कर दिया। इसका एक प्रमुख कारण झारखंड़ क्षेत्र में औद्योगिकरण था। औद्योगिकरण के चलते मजदूरों की तादाद बढ़ी। हजारों की संख्या में यहाँ के किसानों को विस्थापित होना पड़ा, अपने गाँवों, खैतो एवं घरों से। इन विस्थापितों के नियोजन एवं पुर्नवास के लिए न तो राज्य सरकार द्वारा न ही केन्द्र सरकार द्वारा कोई नीति निर्धारण की गई। इन विस्थापितों की घोर उपेक्षा की गई। न तो उन्हें मुवाअजा दिया जाता न नौकरी। इन कारणों ने तथा मजदूरों के शोषण ने यहाँ वामपंथ के लिए बहुत उपयुक्त जमीन तैयार कर दिया।
यहाँ तक कि झारखंड़ मुक्ति मोर्चा के जन्मदाता प्रथम अध्यक्ष बिनोद बिहारी महतो भी पहले वामपंथी दल भारतीय कम्यूनिष्ट पार्टी में रहें। 1967 में जब कम्यूनिष्ट पार्टी ऑफ इंड़िया का विभाजन हुआ तो वे मार्क्ससीष्ट कम्यूनिष्ट पार्टी यानि कम्यूनिष्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्कसीष्ट) के सदस्य बन गये। 1967 में ही ई0 एम0 एस0 नम्बूद्रिपाद सरीखें नेता बिनोद बाबू के निमंत्रण पर धनबाद पधारें थे और यहाँ आम सभा चिल्ड्रेन-पार्क में किया गया था। इनके समकालीन चिन्मय मुखर्जी (धनबाद विधायक), टीकाराम माँझी (जमशेदपुर), सत्य चरण वेसरा (दुमका), विशेश्वर खाँ (संथाल परगना), राजेन्द्र सिंह मुंड़ा (राँची), धनंजय महतो (इचागढ़), चतुरानन मिश्र (गिरिडीह), मंजूर आलम (रामगढ़), सफी खाँ (बेरमो), चित्तो महतो (पुरूलिया), निर्मलेन्दू भट्टाचार्य (निरसा), ए0 के0 राय (धनबाद) आदि थे। फिर बाद में भी कई वामपंथी नेता उभरे। इनमें एस0 के0 बक्सी धनबाद-झरिया, महेन्द्र सिंह (बगोदर), ओपी लाल आजाद (गिरिडीह), एस0 के0 राय (झरिया) आदि कई वामपंथी नेता उभरे। करीब-करीब तीस से ज्यादे विधान सभा क्षेत्रों में वामपंथी पार्टियों के विधायक हुए जो वर्त्तमान झारखंड़ प्रदेश में हैं। 1960 से 1970 के दशक में वामपंथी पार्टियों के मजदूर यूनियनें हुआ करती थी एवं इनके माध्यम से पूरे झारखंड़ क्षेत्र में इनका प्रभाव बढ़ा।
नक्सल बादी आन्दोलन का प्रभाव भी झारखंड़ क्षेत्र में 1970 के दशक से फैलना शुरू हो गया था। कई आतंकवादी घटनाएँ घटी थी। झारखंड़ की भौगोलिक, स्थिति इसके घने जंगल एवं पहाड़ो से भरे भू-भाग के चलते यह क्षेत्र आतंकवादियों के नेताओं के लिए काफी सुरक्षित जगह बन गया। नक्सलवादी की तर्ज पर कई घटनाओं को अंजाम दिया गया। कई जगह बम फटे। ट्रेनों पर भी बम मारे गये। सिंहभूम, हजारीबाग, पलामू जिलों में 1970 के दशक में ही नक्सलियों की घूसपैठ हो गई थी। 1980 के बाद तो इनका कार्यक्षेत्र और भी बढ़ गया, तो इनके समर्थकों की तादाद भी काफी बढ़ गई। सूदर गाँवों के लोगों को प्रभावित किया गया। झारखंड़ के लोगों में फैला असंतोष, निर्मम शोषण, गरीबी, अशिक्षा तथा औपनिवेशिक शोषण ने आग में घी का काम किया। 1980 के बाद ए0 के0 राय ने एक पुस्तक लिखी “झारखंड़ और लालखंड़” तथा उनके समर्थकों के अन्दर एक नारे का भी प्रचार-प्रसार किया गया- “झारखंड़ को लालखंड़ में बदल डालो”।
झारखंड़ में तथाकथित वामपंथी ताकतों को सबसे बड़ा झटका तब लगा जब बिनोद बिहारी महतो ने 1973 में विधिवत रूप से “झारखंड़ मुक्ति मोर्चा” को जन्म दिया। बिनोद बिहारी महतो का संबंध कम्यूनिष्ट नेताओं से रहें थे । क्योंकि ये स्वंय पुराने कम्यूनिष्ट थे। बंगाल के ज्योति बासु से लेकर बिहार के बड़े कम्यूनिष्ट नेताओं के साथ उन्होंने काम किया था और झारखंड़ में वामपंथ के व्यापक प्रजार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इन पार्टियों के लिए जमीन तैयार की थी। वामपंथी पार्टियों को सबसे बड़ा झटका तब ही लगा था जब बिनोद बिहारी महतो ने झामुमो का गठन कर लिया था।
झामुमो के जुझारू आन्दोलन ने वामपंथ को धीरे-धीरे पीछे धकेल दिया था। झामुमो का आन्दोलन सिर्फ किताबी नहीं था, बल्कि जमीन से सीधा जुड़ा हुआ होने के कारण ज्यादा जुझारू एवं आर्कषक था। वर्ग संघर्ष की अवधारणा के साथ-साथ क्षेत्रिय संघर्ष की तथा वर्ण संघर्ष का अद्भूत समन्वय इसमें दृष्टी गोचर होता था। 1977 तक तो कॉमरेड ए0 के0 राय ठीक ठाक रहे। पर उसके बाद बिनोद बाबू का इस्तेमाल वामपंथियों ने अपनी राजनीति चमकाने के लिए किया। बिनोद बाबू एवं शिबू सोरेन को धोखे में रख कर उनके साथ-साथ चलते हुए वामपंथी उन्हें कमजोर करने की चेष्टा में लग चुके थे। वे दिखावे के लिए साथ थे, पर झारखंड़ अलग राज्य के आन्दोलन का समर्थन नहीं करके से गलत दिशा देने में लगे थे।
झारखंड़ में “नक्सलवाद” एक नया नाम लेकर उभरा। इसके नेताओं ने “लालखंड़” का नारा दिया। इसे ही झारखंड़ का विकल्प दिखलाया गया। कहा गया कि झारखंड़ को लालखंड़ में बदल डालो। कॉ0 राय ने तो “झारखंड़-लालखंड़” नामक पुस्तक 1980 में लिख डाली। निश्चय ही झारखंड़ अलग राज्य के आन्दोलन को रोकने के लिए ही यह नारा दिया गया। इस स्थिति ने एक संदेहात्मक स्थिति पैदा कर दी। अपने वामपंथी पृष्ठ भूमि के चलते तो बिनोद बाबू ने कॉ0 ए0 के0 राय को बरदास्त किया। पर शिबू-सोरेन इसे पचा नहीं पाते थे। पर कालान्तर में उनका कॉ0 ए0 के0 राय से भी गहरा मतभेद हो गया। बिनोद बाबू भी इस विषय पर खिन्न थे पर वे अपने काम में लगे रहे और वामपंथियों को झारखंड़ आन्दोलन में जोड़ते रहे।
1990 में श्री ए0 के0 राय ने झामुमो के खिलाफ विधान सभा चुनाव में अपना उम्मीद्वार सिन्दरी, निरसा, बाघमारा, मांडू, चन्दनकियारी आदि कई सीटें पर खड़ा कर दिया। लाल-हरा मैत्री को तोड़ दिया। अन्य क्षेत्रों में भी झामुमो का तालमेल अन्य वामपंथी दलों से टूट गया था। 1991 के लोक सभा चुनाव में धनबाद से कॉ0 राय हार गये। भुवनेश्वर मेहता सी0 पी0 आई0 हजारीबाग से जीते। भारतीय जनता पार्टी ने 1991 में झारखंड़ के 14 सीटों में से पाँच पर कब्जा किया। झामुमो ने छः सीटें लोकसभा के जीत ली थी। झामुमो के बढ़ते प्रभाव ने न सिर्फ वामपंथियों के जनाधार को खिसका दिया था, अपितु काँग्रेस का दक्षिण बिहार से सफाया ही कर दिया था।
1991 तक झारखंड़ क्षेत्र में उग्रवादी घटनाएँ बढ़ गई थी। “लालखंड़” के नाम पर माओवादी कम्यूनिष्ट सेंटर, पीपुल्स वार ग्रुप के अलावे झारखंड़ मुक्ति मंच का प्रभाव काफी बढ़ गया था। चुनाव बहिष्कार का नारा दिया गया और वोट-बहिष्कार किया जाने लगा। उन क्षेत्रों में वोट-वहिष्कार शुरू किया गया, जहाँ बिनोद बिहारी महतो ज्यादे सक्रिय थे। झामुमो ज्यादा सक्रिय था। स्पष्ट था कि वोट बहिष्कार झामुमो को हराने के उद्देश्य से ही किया जा रहा था।
झामुमो के आन्दोलन को आतंकवादी आन्दोलन कहा गया
मुरलीडीह कोलियरी की एक दिलचस्प घटना है। वहाँ पर बाहरी गुंड़ों एवं गाँव वालों के साथ अकसर गड़ाई होती रहती थी। विस्थापन की लड़ाई लड़ी जा रही थी। बिनोद बाबू का एक कार्यकर्त्ता जो पूरी तरह से उनका भक्त था उस कोलियरी के मुँहाने पर लगे हुए हेड-गियर पर चढ़ गया। हेड-गीयर का एक बड़ा सा ऊँचा मीनार, लोहे की पट्टियों के खम्भों से बनाया जाता है। कोयला निकालने के लिए जो सैकड़ों फीट नीचे कुँआ खोदा जाता है, उसके मुँह को पीट कहते है। इसी पीट के चारों तरफ लोहे के सौ-फीट, पच्चास फीट, खम्भें गाड़ कर वहाँ दो बड़ी घिरनियाँ लगाई जाती है। इन गोलाकार घिरनियों में लोहे के रस्से पार किए जाते हैं। और जिस प्रकार कुँए से बाल्टी में पानी निकालते है, उसी प्रकार नीचे से टबों में डालकर कोयले को उन्ही लोहे की रस्सियों द्वारा खींचकर बाहर निकाला जाता है।
अब माथुर महतो उसी हेड-गीयर के ऊपर घिरनी के पास बैठ गया था। छाता लिए हुए था। सुबह ही चढ़ गया था। सुबह पाली-सिफ्ट के बाद काम बंद कर देना पड़ा। वह नीचे कूद जाने की घमकी प्रबंधन के लोगों को देता जा रहा था। गर्मी का दिन था। वह बीड़ी पीता जाता, तथा खैनी यानि एक प्रकार का तम्बाकू खाता जाता। लाख समझाने पर भी वह नहीं माना। उसने सिर्फ एक ही शर्त्त रखी, कि जब तक बिनोद बाबू आकर उसे नहीं मनाएँगे तब तक वह नहीं उतरेगा। वहीं आवें। हमारे विस्थापितों का काम करायें। दूसरे दिन बिनोद बाबू सीधे कचहरी से वकील की पोशाक में ही मुरलीडीह पीट पर पहुँचे और तब जाकर माथुर महतो पीट के हैड-गीयर से उतरा।
यहाँ उनके द्वारा चलाए गये आन्दोलनों का विस्तृत विवरण नहीं दिया जा सकता है। संक्षेप में विरोध, प्रतिरोध का जो रास्ता बिनोद बाबू ने अपनाया था, वह अनूठा था। शोषणकर्त्ता स्तंभित हो जाता था। आतंकित हो जाता था। छोटी मछलियाँ जिस प्रकार बड़ी मछली के आक्रमण के पहले इकठ्ठा हो जाती हैं एवं सब मिलकर एक ऐसी आकृति बना लेती हैं जो बहुत बड़ी मछली के समान दिखे। इसी सिद्धान्त को बिनोद बाबू ने अपनाया था। आक्रामक तेवर उनलोगों में पैदा किया, जो बिलकुल निरीह थे। उनमें साहस का संचार किया।
प्रतिरोध को जन आन्दोलन का रूप दिया। अगर यह आन्दोलन सशस्त्र था, तो भी इसे आतंकवाद से जोड़ा जाना गलत होगा। आतंकवादी रात के अंधेरे में समूह में हमला करते थे और फरार हो जाते थे। ये अपनी पहचान छुपा कर चलते हैं। यहाँ तक कि छद्यनाम धारण कर लेते हैं। इनके काम करने का तरीका ही था कि चुपचाप वारदात कर डालो और फरार हो जाओ। आम जनता इनसें भयभीत रहती है। गाँव के लोगों को डरा-धमका कर उनसे खर्च करवाना। उनकी मुर्गियों, बकरियों को खा जाना। उन्हें धमकाकर रखना इनका काम था। इनकी कार्यशैली में अपराधिक मनोवृत्ति की स्पष्ट झलक है, चाहे इन वारदातों को वे किसी भी सिद्धान्त का जामा पहना दें। चाहे इसे माओवाद कहें या लेलीनवाद। वारदात करके पहचान छुपाना, पुलिस से बचके रहना, छुपके रहना। चुपके से वारदात करना। यह निश्चय ही आपराधिक कार्य हैं। पर खुला-दिन के उजाले में सशस्त्र प्रतिरोध एवं जेल जाने की मंशा लेकर आगे बढ़ना, दूसरी बात है। अपने कृत्यों को न्यायपूर्ण मानते हुए, एक बलिदान की भावना से आगे आना एक क्रांतिकारी सामाजिक परिवर्त्तन की ओर इशारा करता है। इशारा ही नहीं पथ-प्रदर्शित करता है।
बिनोद बाबू स्वयं वकील थे। इन आन्दोलनों से ऊपजे मुकदमें की देखभाल करने के लिए बुद्धिजीवि वर्ग खासकर वकीलों को प्रेरित करते थे कि वे मुफ्त इन दलित, वंचित, गरीब, शोषित के मुकदमों को लड़े। कई जिलों में उन्होंने ऐसे वकील पैदा किए, ढूँढ़ निकाले जो सुचारू रूप से उनके निर्देश पर काम करते थे। बिनोद बाबू जमीन अधिग्रहण के मामलों के विशेषज्ञ माने जाते थे। उन्होंने सरकार द्वारा कम कीमत पर ली गई जमीनों के विरूद्ध मुकदमें लड़े और विस्थापितों को उचित मुआवजा कोर्ट से दिलवाने का काम किया। पूरे देश में उन्होंने संभवत भू-अर्जन मामलों से संबधित जितने मुकदमें लड़े उतना बहुत विरले वकील ही लड़े होंगे। उन्होंने इससे बहुत पैसा कमाया, पर उस पैसे का अधिकत्तम भाग पार्टी चलाने, गरीबों को मदद करने तथा शैक्षणिक संस्थान खोलने में लगा दिए।