Thursday, September 23, 2010

अध्याय छः

झारखण्ड क्षेत्र में असमान विकास एवं झारखंडियों का विनाश –
राज्य पुर्नगठन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के सम्बन्ध में कोई कार्यवाही नहीं की गई। सोलह वर्षो बाद विकास बोर्ड का गठन हुआ। छोटानागपुर संथाल परगना विकास प्राधिकरण 1971 । कुछ अन्य सिफारिशों की अनदेखी कर दी गई। अनुसूचित क्षेत्रों को न सिर्फ उसी प्रकार रहने दिया गया, बल्कि उनका क्षेत्र भी बढ़ा दिया गया।
इस आयोग ने झारखंड वासियों के साथ न्याय नहीं किया था। झारखंड आन्दोलन को सिर्फ आदिवासियों का आन्दोलन कहकर इस पवित्र आन्दोलन के मुँह पर तमाचा मारा था। इस आयोग ने झारखंडियों के हक की बात नहीं करके उत्तर बिहारियों तथा उन लोगों के हित की बात की थी जो झारखंड क्षेत्र को पिछड़ा बनाकर रखना चाहते थे। यह कितनी बड़ी त्रासदी है कि अगर सही विचार किया जाता तो 1956 में ही यहाँ अलग प्रदेश का गठन हो गया रहता।
झारखंड में औद्योगिक मजदूरों की संख्या बढ़ी। अनुसूचि जनजाति की संख्या में साक्षरता बढ़ने लगी। इसका प्रमुख कारण मिशनरियों की शैक्षणिक गति विधियाँ है। अनुसूचित जनजाति की जनंख्या में 35% साक्षरों ने औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की थी। गैर-आदिवासी जमसंख्या में यह प्रतिशत 32.2 प्रतिशत थी। 1970 के आसपास साठ के दशक में शिक्षित युवकों के बीच बेरोजगारी की समस्या गंभीर हो गई थी। वैसे संथाल परगना के ग्रामिण क्षेत्रों में अभी भी काफी कम शैक्षणिक सुविधाएँ उपलब्ध है।
झारखंड के जिलों में उपलब्ध चिकित्सा सुविधा का औसत बिहार के औसत से कम होने लगा। झारखंड क्षेत्र की उपेक्षा के चलते ऐसा होने लगा।
जो बड़ी-बड़ी पन बिजली एवं कोयला-आधारित विद्युत परियोजनाएँ बनी, उनकी बिजली झारखंड क्षेत्र में कम, उपयोग की गइ एवं बाहर भेजी जानी लगी।
यहाँ के उद्योगिकरण के कारण बाहर से आये लोगों को बड़ी तादाद में नौकरियाँ मिली। ठीका, रोजगार सभी मिला। झारखंड के मूलवासियों की घोर उपेक्षा हुई।
आर्थिक रूप से इन उद्योगों, कल कारखानों, खदानों, परियोजनाओं का कोई लाभ झारखंडिवासियों को नहीं मिलने लगा, उल्टे उनका विनाश हुआ, एवं शोषण के शिकार हुए।
आर्थिक परिवर्त्तनों के अलावे जातीय समीकरण में भी बहुत बड़ा अंतर पैदा किया जाने लगा। झारखंड की, एकरूपता को इसकी सभ्यता एवं संस्कृति को तोड़ने के लिए शासक वर्ग ने अनेकों षड़यंत्र किए। अनेकों अनुसूचित जनजातियों को अनुसूचित जनजाति की सूचि से हटाया गया। इसमें प्रमुख जाति कुड़मी-महतो थी। फिर कोल एवं गौड़ को भी हटाया गया। इस क्षेत्र को क्रमशः आदिवासी अल्पसंख्यक बना दिया गया। यह इसिलिए किया गया ताकि आदिवासियों को यानि अनुसूचित जनजातियों को जमीन संबंधी जो सुरक्षा छोटानागपुर टेनेन्सी एक्ट एवं संथाल परगना टेनेन्सी एक्ट द्वारा प्रदान की गई थी, उनके दायरे से उन जातियों को अलग कर दिया जाय जिनके पास सार्वाधिक जमीनें थी। ऐसा इसीलिए कि सरकार को यहाँ औद्योगिकरण के लिए आसानी से जमीन उपलब्ध हो सके। सिर्फ कुड़मी-महतो समुदाय जो 1950 तक अनुसूचित जनजाति की सूचि में था, उस समुदाय की जनसंख्या झारखंड क्षेत्र में पच्चीस प्रतिशत थी । उनके हाथ में झारखंड की सार्वाधिक जमीनें थी। इनकी जमीनों पर कल-कारखानें खोले गये, बाँध-बाँधे गये। परियोजनाएँ लगाई गई। शहर बसाये गये। बाहर से आये हुए लोगों ने धड़ल्ले से इनकी जमीनें खरीदी।
इस प्रकार अनेक जातियों का योजनाबद्ध ढंग से शोषण किया गया। इन जनजातियों के अनुसूचित सूची से हटाने के कारण, ये जातियाँ सनातन धर्म की ओर मुखातिब होने लगीं।
हिन्दू धर्मावलम्बी लोग पीछे पड़ गये। इन जातियों को कभी शुद्र, कभी वैश्य एवं कभी क्षत्रिय बनाने की बात करने लगे। जनेऊ धारण कराने की बात करने लगे। उन्हें समझाया जाने लगा कि वे जनजाति नहीं है। दूसरी तरफ अन्य प्रमुख जनजातियाँ मुंड़ा, उराँव आदि ईशाई-धर्म की ओर मुखातिब होने लगे।
एक ही क्षेत्र में सदियों से रहने वाले प्रकृति पूजक आबादी जब देवताओं, भगवानों की पूजा करने लगी। लोग मंदिरों में जाने लगे, जेस्स काइस्ट के चेले हो गये, पादरी बनने लगे, नन-ब्रदर बनने लगे। गिरजाघरों को बनने का सिलशिला चालू हो गया। यहाँ के प्रकृति पूजक, एक सभ्यता-संस्कृति के लोग अलग-अलग कर दिए जाने लगे।
जो 1950 ईस्वी के बाद बचे-खूच अनुसूचित जनजाति के लोग थे उन्हें सुरक्षा प्रदान करने के लिए सेड्यूल एरिया रेगुलेशन लाया गया। इसका एक दुश्प्रभाव यह हुआ कि आदिवासियों एवं गैर-आदिवासि मूलवासियों खासकर उनमें जो पहले आदिवासी सूची में थे, बड़ा विभेद एवं विद्वेश पैदा होने लगा। उनमें अलगा की भावना बढ़ गई।
विभिन्न क्षेत्रों मे झारखंडियों का घोर शोषण एवं उपेक्षा की गई। नतीजा यह निकला कि धनी झारखंड क्षेत्र के वासी गरीब होते गये। कोई भी अखिल भारतीय स्तर की राजनैतिक पार्टी यहाँ की समस्याओं से रूबरू नहीं होना चीहती थी। उलटे यहाँ राजनैतिक उपनिवेश बनाया जाने लगा।
देश में पहले से ही उन्नत क्षेत्रों को अधिक सुविधाएँ दी गई है तथा जो अब अविकसित पहाड़ी क्षेत्र हैं, जनजाति क्षेत्र है, उन्हें विकास से दूर रखा गया। जिन्हें सबसे अधिक आवश्यकता थी देश की मूल-धारा से जुड़ने की, उन्हें पीछे धकेला गया।
झारखंड की तो पहचान ही मिट रही थी। इस क्षेत्र का चौतरफा शोषण हो रहा था। आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक शोषण। झारखंड क्षेत्र एक आंतरिक उपनिवेश बन चुका था।
यह तो सही है कि झारखंड क्षेत्र के लोग अनेकों सियासी चालों के शिकार हुए थे, पर झारखंड क्षेत्र के लोगों के हृदय में सुलगती रही गहरी निराशा की आग को कानूनी मिमांशा, राजनैतिक तर्क या कुतर्क या राजनैतिक कुटता से दबाया नहीं जा सकता था। केन्द्र सरकार एवं राज्य सरकार की उपेक्षापूर्ण नीति एवं इस क्षेत्र की समस्याओं को समाप्त करने के लिए किसी कारगार नीति का नहीं बनाया जाना, तथा उल्टे इस क्षेत्र के लोगों की सम्पत्ति को लूट कर उनका चौतरफा शोषण करने की प्रवृति ने आग में घी का काम किया। झारखंड क्षेत्र को सभी लोगों ने पिछड़ा बनाकर रखा था और अभी तक पिछड़ा है। ऐसा केवल इसलिए ताकि यह क्षेत्र एक आतंरिक उपनिवेश बना रहे ताकि बाहरी ताकत के लिए एक लाभदायक एवं शोषण के क्षेत्र के रूप में रह सके। बिहार-मूल के लोगों एवं देश के दूसरे प्रदेशों के लोगों का लालच एवं निहित स्वार्थ हरेक प्रकार से इस क्षेत्र के विकास में बाधक है। कॉलोनीवाद के सभी तरीके इस क्षेत्र की जनता के ऊपर आजमाए गए जो उनकी शक्ति एवं मनोबल के आधारों को भी क्षति पहुँचा रहे हैं।
राजनैतिक सत्ता या प्रतिनिधित्व का चेहरा बदलने लगा था। 1960 के दशक में झारखंड में झारखंडी नामधारी दलों के कमजोर हो जाने के बाद यह परिवर्त्तन बड़ी तेजी से होने लगा था। 1962 में चीन द्वारा किए गये भारत पर आक्रमण के कारण एक राष्ट्रीय आपदा आई। इस राष्ट्रीय आपदा ने भारत के विभिन्न हिस्सों को एक साथ एक दिशा में सोचने पर मजबूर किया। इस घटना ने राष्ट्र के विभिन्न भागों को इस तरह से एक सूत्र में पिरोया कि पृथक तामिलनाडू राज्य बनाने की तत्कालीन माँग को लम्बित करना पड़ा। नागालैंड और मिजोरम को स्वतंत्र राज्य बनाने की पूर्वोत्तर क्षेत्र की माँग भी आम क्षेत्र के लोकतांत्रिक संस्थाओं के अनवरत प्रयास के फलस्वरूप दब कर रह गई। “दार्जलिंग गौरखालैंड पर्वतीय परिषद्” गठित करने के फलस्वरूप गौरखालैंड की माँग दब कर रह गई।
बोड़ोलैंड, नागालैंड, खालिस्तान आदि के माँग की तरह झारखंड के आन्दोलन को राष्ट्रीय एकता में बाधक समझा गया था और इसे अलगादवादी आन्दोलन करार दिया गया था। 1962 के भारत पर चीन के हमले एवं 1965 में भारत पाकिस्तानी हमलें यानि युद्ध की वजह से यह आन्दोलन सुस्त पड़ गया।
छोटानागपुर तथा संथाल परगना में विकास सम्बन्धी कार्यक्रमों का प्रभाव बढ़ता जा रहा था। इस विकास सम्बन्धी प्रक्रिया में अखिल भारतीय दल – काँग्रेस, जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी, भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी शोसलिस्ट पार्टी आदि सक्रिय हुए और इन्होनें झारखंड में अपनी स्थिति मजबूत की। 1967 के चुनाव में जनसंघ ने भी कुछ सीट इस क्षेत्र से जीते थे। मध्य-प्रदेश एवं उड़ीसा में आदिविसियों के हितो की रक्षा के लिए कुछ प्रतिनिधित्व दिया गया था। इससे यह धारणा बनने लगी कि आदिवासी हितों की रक्षा करने के लिए उन्हें सरकार में प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए तथा यह काँग्रेस के विचारों के साथ चलकर ही किया जा सकता था संभवत इसी कारण श्री जवाहरलाल नेहरू के कहने पर श्री जयपाल सिंह ने आन्दोलन का रास्ता छोड़ मंत्रीपद की कुर्सी संभाली।
साठ के दशक में कई रोचक पहलू देखने को आए। इस क्षेत्र की राजनीति में विशिष्ट परिवर्त्तन आया। नक्सलवादी आन्दोलन के प्रभाव यहाँ पड़ने लगे। भारी संख्या में यहाँ वामपंथी दलों का आगमन शुरू हुआ। राज्य पुर्नगठन आयोग की रिपोर्ट के बाद तथा झारखंड राज्य की माँग को काँग्रेस की सरकार द्वारा ठुकरा दिए जाने के बाद, वामपंथी दलों को घूसने का भारी मौका मिला। उत्तरी छोटानागपुर संथाल परगना, सिंहभूम आदि सभी जगहों पर वाम पंथी सक्रिय हुए। जहाँ-जहाँ औद्योगिक प्रतिष्ठान, कल कारखाने, खदानों खुलने लगी एवं मजदूरों-विस्थापितों की संख्या बढ़ी, उनका काफी प्रभाव बढ़ा।

Thursday, September 9, 2010

राज्य पुर्नगठन आयोग की रिपोर्ट एवं झारखंड आन्दोलन के प्रभाव –

आयोग ने यह भी विचार व्यक्त किया कि संविधान में प्रदत्त पाँचवीं सूची में किए गये मौजूदा प्रबन्ध उचित एवं संतोषप्रद हैं।
इसके अलावे आयोग ने यह विचार व्यक्त किए कि जैसा कि संविधान सभा की उपसमिति ने सिफारिश की है, जनजातीय लोगों को मंत्रीमंडल समेत प्रशासन की सभी शाखाओं में पर्याप्त रूप से भागीदारी होनी चाहिए और न केवल आर्थिक तथा शैक्षिक उन्नति पर ही बल्कि निवारात्मक राजनीतिक व मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर भी विचार किया जाना चाहिए।
इसके अलावे आयोग ने यह भी सुझाव दिए कि छोटानागपुर डीविजन के लिए विशेष विकास बोर्डो के प्रश्न पर भी विचार किया जाना चाहिए।
संक्षेप में कहे तो हम पाते हैं कि राज्य पुर्नगठन आयोग ने जनजातीय भावना के दृष्टीकोण से छोटानागपुर एवं संथाल परगना को स्वायत्तता प्रदान करने के प्रश्न पर विचार किया। उसने इस तथ्य को अनदेखा कर दिया कि छोटानागपुर एवं संथाल परगना क्षेत्रों की स्वायत्ता का समर्थन दो स्थानीय पार्टियाँ जनता पार्टी तथा लोक-सेवा संघ ने किया था जो कि मुख्यतयाः गैर-जनजातीय थी। झारखंड पार्टी तथा काँग्रेस के कुछ तत्वों समेत इन पार्टियों ने जिन्होंने थोड़ी सी स्वायत्तता का समर्थन किया था, इसके लिए क्षेत्र का बहुमत प्रकट किया। अलग राज्य की माँग से अलग हटकर संविधान की पाँचवी अनुसूची का प्रयोग करके विकास की बात करके स्वायत्तता प्रदान करने की बात कही है। इसके विरूद्ध स्वर्गीय राम नारायण सिंह सांसद अध्यक्ष छोटानागपुर संयुक्त संघ ने राज्य पुर्नगठन आयोग द्वारा किए गये तर्को का जोरदार खंड़न किया, जो आज इतने वर्षो बाद भी सही निकला। जब झारखंड मामलों से संबंधित समिति ने मई 1990 में अपनी रिपोर्ट दी तो राज्य पुर्नगठन आयोग की दी गई रिपोर्ट को गलत ठहराया।
झारखंड आन्दोलन ने कई उतार-चढ़ाव देखे है। झारखंड पार्टी ने उन्नीस सौ बावन – उन्नीस सौ सन्तावन में भारी सफलता हासिल किया। पर उन्नीस सौ बासठ के आम चुनाव में झारखंड के पक्ष में पड़े मतों में भारी गिरावट आई एवं यह संख्या घटकर आधी रह गई। बिहार विधान सभा में इसके नतीजे अच्छे नहीं हुए और सीटों की कुल संख्या घटकर बीस रह गई। इसका कारण निश्चित रूप से राज्य पुर्नगठन आयोग की प्रतिकुल रिपोर्ट है जिसने अलग राज्य की अनुशंसा नहीं की। इससे इस क्षेत्र के लोगों के दिलों पर यह बात घर कर गई कि झारखंड अलग राज्य का निर्माण नहीं हो सकता। इसीलिए मतदाताओं ने निराश होकर सोचा कि अब झारखंड नामधारी दलों को वोट देने से कोई लाभ नहीं होगा। निराश का संचार हुआ। स्वाभाविक था कि उनका झुकाव अखिल भारतीय पार्टियों की तरफ हुआ। क्षेत्रीय झारखंड नामधारी दल के नेताओं में गहरी निराशा बैठ गई। जब तक काँग्रेस नहीं चाहेगी, अलग राज्य नहीं बन सकता।
अतः श्री जयपाल सिंह ने काँग्रेस पार्टी के साथ समझौता कर लेना ही बेहतर समझा। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के समझाने पर श्री जयपाल सिंह उन्नीस सौ तिरसठ में काँग्रेस में शामिल हो गये। अधिकांश झारखंड पार्टी के नेता भी काँग्रेस में शामिल हो गये। झारखंड अलग राज्य की माँग को जबरजस्त झटका लगा।
श्री जयपाल सिंह को काँग्रेस ने बिहार में केबिनेट मंत्री, तत्कालीन मुख्यमंत्री विनोदानन्द झा के नेतृत्व में बना दिया। भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के ईशारे पर यह किया गया। श्री एस0 के0 बागे जो जयपाल सिंह के प्रमुख कप्तान थे, इगनियस कूजूर दूसरे नम्बर के प्रमुख नेता थे, पाँच विधायकों के साथ “झारखंड पार्टी” से अलग हो गये थे। परन्तु कुछ ही समय बाद कामराज प्लान के तहत तत्कालीन मुख्यमंत्री बिहार को स्तीफा देना पड़ा एवं उनके प्रतिद्वन्दी के0 बी0 सहाय मुख्यमंत्री बने। एस0 के0 बागे, के0 बी0 सहाय के साथ हो गये और केबिनेट मंत्री बन गये। जयपाल सिंह की कुर्सी छिन गई।
एक बार फिर जयपाल सिंह ने काँग्रेस छोड़कर झारखंड पार्टी को पुर्नजीवित करने का प्रयास किया। पर उन्नीस सौ सढ़सठ के चुनाव (1967) में इसे एक भी सीट नहीं मिली। संसद में भी कोई नहीं जा सका। जस्टिन रिचर्ड एवं एस0 हेम्ब्रम ने झारखंड पार्टी को एक और टुकड़ा किया। इन्होने “हूल झारखंड” पार्टी बनाया। इन्होने 1969 के मध्यावधि चुनाव में सात विधान सभा की सीटें जीती।
कुछ लोगों ने श्री जयपाल सिंह पर आरोप लगाया कि उनका काँग्रेस में शामिल होने का निर्णय निजी स्वार्थ से प्रेरित था तथा अपनी सुख सुविधाओं के लिए उन्होंने काँग्रेस का दामन थामा। पर एक बात गौर करने की बात है कि राज्य पुर्नगठन आयोग के विपरीत अनुशंसा करने से उनको भी धक्का लगा ही होगा। चाहे जो भी हो इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि जयपाल सिंह ने इस क्षेत्र के लोगों को जगाकर खासकर आदिवासी समुदाय को उनके हक एवं अधिकार के लिए तैयार किया था। लड़ा था। लोगों में चेतना जगाई थी। “माराँग गोमके” कहलाने का श्रेय प्राप्त किया था। परन्तु दुर्भाग्य यह रहा कि माराँग गोमके की कमजोरी का फायदा उठाकर काँग्रेस ने उन्हें तथा झारखंड आन्दोलन को ही काफी अरसे तक सुला दिया।
झारखंड आन्दोलन एक टूटे हुए शीशे की तरह बिखर गया। इसके कई नेता हो गये। श्री एन0 ई0 होरो, श्री बागुन सोमबुराई, सेत हेम्ब्रम, मोजेश गुड़िया (बिरसा सेवा दल) आदि। 1963-68 तक तीन दलों ने झारखंड आन्दोलन का नेतृत्व करने का दावा किया। 28 दिसम्बर 1967 को अखिल भारतीय झारखंड पार्टी गठित की गई। 1968 में पुनः पुरानी झारखंड पार्टी में भारी फूट पड़ गई। छोटानागपुर के आदिवासियों से अलग होकर संथाल परगना के संथालों ने अपने आप को अलग कर लिया। और एक अलग पार्टी हूल झारखंड बना लिया। इस चरण का एक और पहलू हुआ शिक्षित आदिवासियों के नेतृत्व वाले नपरीय प्रभाव वाले दलों का उभरना। ये विकसित हुए जो कि आदिवासी युवकों को प्रशासनिक एवं औद्योगिक संस्थानों में रोजगार प्रदान किए जाने की माँग करने के लिए, जो औद्योगिक परिसरों मे केन्द्रित थे। वास्तव में यह माँग एक आम माँग बन गई। बिरसा सेवादल श्री मोजेश गुड़िया के नेतृत्व में छठे दशक के अंतिम वर्षो (1967) में एक महत्वपुर्ण दल के रूप में उभरा। झारखंड पार्टी श्री एन0 ई0 होरो के नेतृत्व में चलने लगी।
कहने का तात्पर्य यह है कि झारखंड अलग राज्य की माँग एक सुविधावादी माँग में बदल गई। नेतागण या तो मंत्रीपद लेने में, विधायक या सांसद बनने में, रोजगार लेने में, ठीका लेने में, आदिवासियों के लिए सरकार में प्रतिनिधित्व लेने में या फिर आरक्षण लेने में व्यस्त हो गये। अलग राज्य का मुद्दा संविधान की पाँचवी तथा छठवीं अनुसूची के प्रावधानों के बीच दबकर रह गई। देखा यह गया कि जब जब किसी नेता या दल ने आन्दोलन पर बल दिया, उसे तेज किया तब तब झारखंड क्षेत्र में कोई बोर्ड या परिषद् या इसी प्रकार की कोई चीज गठित कर दी गई ताकि आन्दोलन के नेताओं को आत्मतुष्टि के साथ-साथ रोजी-रोटी या आराम की जिन्दगी मयस्सर हो सके।
कई नियम, अधिनियम परिषद् बनाए गये। 1951 में बिहार जनजातीय सलाहकार परिषद् बनाया गया था। छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 में ही बनाया गया था। संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम 1969 में बनाया गया। ये अधिनियम आदिवासियों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए बनाए गये थे। छोटानागपुर संथाल परगना के लिए, इसके विकास के मद्देनजर छोटानागपुर-संथाल परगना स्वायत्त विकास प्राधिकरण 1971 बनाया गया। इसके बाद 1974 में जनजातीय उपयोजना बनाई गई। 1978 में झारखंड विकास परिषद् बनाया गया। इसे 1991 में विधान सभा से पारित कराया गया।

राज्य पुर्नगठन आयोग की रिपोर्ट एवं झारखंड आन्दोलन के प्रभाव –

जस्टीस फजल अली द्वारा प्रस्तुत की गई राज्य पुर्नगठन आयोग, “स्टेट रिऑरगेनाइजेशन कमीशन” ने झारखंड पृथक राज्य के गठन की अनुशंसा नहीं की। इस आयोग ने इस माँग को अस्वीकृत करने के प्रमुख कारण दर्शाये। इसमें कहा गया कि झारखंड पार्टी को उन्नीस सौ बावन के आम-चुनाव में छोटानागपुर एवं संथाल परगना में वोटो या सिटों का स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं हुआ था। इस क्षेत्र के भीतर एवं बाहर दूसरे राजनैतिक दलों ने अलग झारखंड राज्य के गठन का विरोध किया था। फिर कहा गया कि जनजातियों की कुल जनसंख्या इस क्षेत्र में या प्रस्तावित अलग राज्य में कुल जनसंख्या में मात्र एक तिहाई से कुछ ज्यादे है। इसके अलावे जनजातियाँ कई वर्गो में बँटी थी एवं अलग-अलग भाषाएँ थी। इस प्रकार कई उपजातियों में बँटी रहने एवं अलग अलग भाषाई आधार होने तथा झारखंड अलग राज्य का विचार अल्पमत में होने तथा बहुमत के इस विचार से सहमत नहीं होने के कारण पृथक झारखंड राज्य का बनाया जाना उचित प्रतीत नहीं हुआ। आयोग ने इन्हीं कारणों के चलते अनुशंसा नहीं की।
आयोग का कहना था कि यह आन्दोलन सिर्फ जनजातियों यानि आदिवासियो का आन्दोलन है। दूसरा कारण जो यह दर्शाया गया था कि इस क्षेत्र में एक सम्पर्क भाषा का अभाव है। तीसरा कारण यह बताया गया कि अगर झारखंड अलग राज्य के लिए झारखंड को बिहार या सम्बन्धित राज्यों से अलग कर दिया जाय तो शेष बिहार या सम्बन्धित राज्यों का माली हालत का संतुलन बिगड़ जाएगा। एक दृष्टिकोण से तीसरा कारण ही अधिक महत्वपुर्ण बनाया गया था, क्योंकि बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा एवं मध्यप्रदेश के सीमावर्ती एवं समीपवर्ती दलित क्षेत्रों को मिलाकर एवं इन राज्यों से पृथक करके नये राज्य के गठन से इन राज्यों के राजस्व और रोजगार के अवसरों पर अवश्य प्रभाव पड़ेगा।
जैसा कि हमने पहले ही देख लिया है कि भारत के संविधान में कहीं इस बात का जिक्र नहीं है कि नये राज्यों का गठन किन आधारों पर किया जाय। सिर्फ इतना ही कहा गया है, भारतीय संविधान में कि जैसा कि संसद उचित समझे, नये राज्य बनाया जा सकते है।
देश की आजादी के पहले से ही इस विषय पर विवेचना की जाती रही थी कि नये राज्यों के गठन का आधार क्या हो ? सिर्फ अंग्रेजी की तरह प्रशासनिक दृष्टीकोण से नये राज्य बनाए जायें या भाषा, संस्कृति क्षेत्र या अन्य आधार पर नये राज्यों का गठन किया जाय।
इस संबंध में क्रमिक विकास हुए एवं पहले “भाषाई आधार” पर कई राज्यों का गठन किया गया। फिर आजादी के बाद अंततः राज्य पुर्नगठन आयोग का गठन किया गया। ताकि ठोस आधार पर पहुँचा जा सके। एक तरफ तो इस आयोग ने “भाषाई समानता” यानि “लींगवीस्टीक होमोजीनीयलीटी” को एक हितपुर्न आधार माना है, जिसके विरूद्ध गहरा असंतोष पनपा था, तो दूसरी ओर आयोग जातीय भावनाओं को संतुष्ट करने में अक्षम रहा। फिर आयोग ने यह नहीं कहा कि सिर्फ आदिवासी बहुल क्षेत्र का दर्जा दिया जा सकता है कि नहीं। स्पट था छोटे राज्यों के गठन की वकालत प्रशासनिक दृष्टीकोण से ही नहीं किया जाना चाहिए।
एक और महत्वपुर्ण आपत्ति जो इस माँग के विरूद्ध उठाई जाती रही थी वह यह था कि झारखण्ड क्षेत्र में बहुत भिन्नता व्याप्त थी और उसे एक सामान्य झारखण्डी सामाजिक में या राष्ट्रीयता में बाँधने की आशा नहीं की जा सकती। दूसरे शब्दों में वहाँ पर संथाल, हो, मुंडा, उराँव, खड़िया, पहाड़िया, गौंड, कोरव, भूमिज आदि अनुसूचित जनजातियाँ हैं तथा खतौरी, कुड़मी, कोयरी, तेली, कुम्हार, राजवार आदि अनेक गैर-अनुसूचित जनजातियाँ भी हैं एवं अनेक मूलवासी समुदाय तथा सदान जनसंख्या एवं उत्तर प्रदेश, उड़ीसा आदि के बाहरी लोग हैं।
यहाँ पर इस बात पर विचार करना आवश्यक था कि झारखंड क्षेत्र को केन्द्र सरकार ने बिहार, बंगाल, उड़ीसा, मध्य प्रदेश राज्य की सीमाओं के अन्दर बाँट दिया था। एक ही संस्कृति के लोगों को चार राज्यों में विभाजित कर दिया गया था। पर इतने से ही सरकार रूक नहीं गई। राज्य सरकारों एवं केन्द्र सरकार ने इस क्षेत्र की तामाम अनुसूचित मे विभेद पैदा कर दिया। कुछ को अनुसूचित जाति बना डाला, तो कुछ को अनुसूचित जनजाति की सूची से हटा दिया। उन्हें गैर-आदिवासी घोषित कर दिया और आदिवासियों को अल्प संख्यक बना डाला। आयोग ने बड़ी आसानी से कह दिया कि यह सिर्फ आदिवासियों का आन्दोलन है और इसे बहुमत प्राप्त नहीं। आयोग ने इस बात को भी नजर अंदाज कर दिया कि झारखण्ड पार्टी के विधायकों में से दश विधायक गैर-आदिवासी थे।
फिर यह दिखला दिया गया कि एक सम्पर्क भाषा का अभाव झारखण्ड में था और यह एक महत्वपुर्ण पहलू नये राज्य बनाने के लिए था कि भाषाई समानता हो। आयोग ने इस बात को नजर अंदाज कर दिया कि भारतवर्ष में पूर्व में बने किसी भी राज्य में एक ही सम्पर्क भाषा नहीं था और न आज है। बिहार को ही हम उदापरण को तौर पर लें तो उस समय और अभी भी वहाँ मगही, भोजपूरी, मैथली, मेसी, अंजिका आदि बोलियाँ है। फिर दक्षिण बिहार झारखण्ड क्षेत्र जब बिहार में शामिल था, तो खारखण्ड के भाषाओं संस्कृति की विभिन्नता तो बिहार में भी मौजूद थी। तो फिर बिल्कुल ही भिन्नता वाले उस पर बिहार एवं दक्षिणी बिहार को एक सीमा के अन्दर रखने का क्या औचित्य था। फिर इसका उदाहरण नागालैंड भी है, जिसमें पाँच प्रमुख तथा अनेक छोटी अनुसूचित जनजातियाँ हैं और यहाँ पर तेईस भिन्न-भिन्न भाषाएँ बोली जाती हैं।
अतः भाषाई भिन्नता कोई अर्थ नहीं रखती थी। जब हिन्दी पूरे देश की राजभाषा हो सकती है, तो झारखण्ड की भी हो सकती थी। फिर जब संयुक्त बिहार में हिन्दी से काम-काज चलता ही था जिस बिहार में झारखण्ड समाहित था, तो फिर नये राज्य प्रस्तावित झारखण्ड के लिए क्या कठिनाई थी और एक अलग सम्पर्क भाषा की आवश्यकता क्यों महसूस की जाने लगी ? क्या झारखण्डी सभ्यता-संस्कृति एक अलग प्रकार की संस्कृति नहीं थी ? क्या झारखण्डी राष्ट्रीयता का आधार भाषाई समानता के आधार का व्यापक रूप नहीं था ?
जहाँ तक आर्थिक असंतुलन की बात है, तो आयोग ने इस बात को नजर अंदाज कर दिया कि पंजाब एवं हरियाणा में कोई खदान नहीं। देश के अनेकों प्रदेशों में खनिज पदार्थ नहीं, जंगल नहीं तो क्या वे राज्य पीछे चले गये है। पंजाब एवं हरियाणा कृषि के बल पर देश का एक नम्बर राज्य बन सकते है तो शेष बिहार क्यों नहीं। उत्तर बिहार की जमीन की उस्पादकता पंजाब एवं हरियाणा की जमीनों से ज्यादा है। यही सरकारी रिपोर्ट है। वही बात उड़ीसा, पश्चिम बंगाल पर भी लागू होती थी।
दी स्टेट रिऑरगेनाइजेशन कमीशन (राज्य पुर्नगठन आयोग) के द्वारा कुछ विचार व्यक्त किए गये थे एवं कुछ सुझाव सरकार को दिए गये थे तथा कुछ सिफारिशें की गई थी। ये इस प्रकार थी-
दक्षिण बिहार को अगल करने से मौजूदा राज्य की सम्पूर्ण आर्थिक नीति पर प्रभाव पड़ेगा। कृषि, उद्योग और शिक्षा का संतुलन डगमगा जायेगा और उत्तरी एवं दक्षिणी बिहार के इलाके गरीब हो जायेगें। तथा विकास के अवसर एवं संसाधन कम हो जायेगें। इसीलिए दक्षिणी बिहार में सिंचाई के लिए विस्तृत योजना कार्यान्वित की जाय एवं विजाराधीन व्यापक विकास योजनाओं को प्रभावी बनाया जाय।
अनुसूचित क्षेत्रों में सामान्य प्रशासन जल्दी लाये जाने की सिफारिश की गई ताकि आदिवासियों और अन्य जातियों के बीच का भेदभाव जिस कारण या जहाँ कि वे जनजातीय क्षेत्रों को आर्थिक एवं राजनैतिक उन्नति में बाधा पहुँचाते हैं, धीरे-धीरे समाप्त किया जा सके।

Thursday, September 2, 2010

आदिवासी महासभा एवं झारखंड पार्टी –

द्वितीय विश्व-युद्ध की समाप्ति के बाद उन्नीस सौ छयालीस में भारत की “कन्सटीचूऐन्ट एसेम्बली” यानि “सांविधानिक सभा” के सदस्यों का चुनाव होने वाला था। खूँटी से श्री जयपाल सिंह आदिवासी महासभा के उम्मीद्वार बने एवं उनके विरोधी थे काँग्रेस के पूर्णचन्द मित्र। श्री जयपाल सिंह को हराने के लिए काँग्रेस ने पूरी शक्ति लगा दी। नैतिकता को ताख पर रखकर बाहर से गाड़ियों में भर-भर कर स्वंय-सेवकों के नाम से गुंडे बुलाये गये, जो नीरीह जनता पर आतंक फैलाने लगे। उन्नीस सौ छयालीस मार्च दो को श्री लियेन्डर तिड़, जो कभी आजाद हिन्द फौज में थे, गुन्डे स्वंय-सेवकों के साथ मिलकर ट्रको मे बैठकर काँग्रेस का प्रचार करने लगे। तापकरा बाजार में जब कुछ आदिवासियों ने उनका विरोध किया, क्योंकि गुंडे बाहरी थे, तो उन गुंडों ने ट्रक के उपर से गोलियों की बौछार शुरू कर दी। फिर लाठियाँ चलाई। तब वहाँ उपस्थित आदिवासियों ने नारा दिया कि काँग्रेस के दलाल वापस जाओ। भीड़ बढ़ने लगी, नारे सुनकर, तब वे वहाँ से वापस लौट गये। फिर वे खूँटी पहुँचे तथा उल्टा आदिवासियों पर हिंसा करने का आरोप लगाए गये। सूर्यास्त होने तक राँची एवं अन्य कई जगहों से गुंडे ईकट्ठा किए गये एवं बन्दूक, लाठी से लैस तापकरा बाजार में भेज दिए गये। रात्रि के करीब आठ बजे बेबस, निर्दोश, बेखबर, रास्ते से घर लौटते आदिवासियों से बन्दुक की नोक पर वोट माँगे गये तथा अंधाधुँध गोलियाँ चलाई गई। लाठियों से मार-मार कर लोगों को अधमरा कर दिया। महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया। आदिवासियों की लाशें दूसरे दिन मिली। करीब बाइस व्यक्ति घायल पाये गये। इन सब मृतकों को खूँटी लाकर एक ही गढ़े में दफन कर दिया गया। बाद में पता चला कि आततायी गुंडें सभी उत्तर बिहार के थे। मामले-मुकदमें भी दर्ज किए गये, पर सभी आततायी सबूत के अभाव में छूट गये।
इससे स्पष्ट है कि पूज्य महात्मा गाँधी की अहिंसा के नारे लगाने वाले एवं हरिजन आदिवासी के उत्थान की बात करने वाले काँग्रेस ने आदिवासियों की सामूहिक हत्याएँ करके जयपाल सिंह को पराजित किया। आदिवासी महासभा को खत्म करने के लिए ढ़ेर सारे प्रयास किए जाने लगे।
आदिवासी-क्षेत्र में दमन-चक्र चलाने का जो सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण मिलता है, वह है खरसवाँ का गोली कांड़। खरसवाँ को देशी राज्य उड़ीसा में मिलाया जाएगा, यह घोषणा की गई थी। “आदिवासी महासभा” ने घाटसिला, नरसिंहगढ़, चाईबासा, जमशेदपुर आदि अनेकों स्थानों पर आम सभा बुलाई और प्रस्ताव पास कर सरकार को सूचित किया कि खरसवाँ की जनता बिहार में ही रहना चाहती है। उड़ीसा में नहीं।
एक जनवरी उन्नीस सौ अड़तालीस को खरसावाँ बाजार में एक आम सभा बुलाई गई थी। चालीस पचास हजार की तादाद में लोग इकट्ठा हुए थे। उस समय इतनी भीड़ का पाँव-पैदल इकट्ठा होना बहुत बड़ी बात थी। “अंखड़-झारखंड” के नारों से सभा-स्थल गूँज उठा था। जमशेदपुर, राँची, संथाल परगना, मयूरभंज, रायरंगपुर आदि स्थानों से करीब पैंतीस हजार से अधिक लोग आए थे। शांतिपूर्ण तरीके से ये लोग राजा के महल तक आए और राजा से मिले। दिन दो बजे से चार बजे तक सभा हुई। सभा भंग होने के बाद नेतागणों ने जनता को अपने अपने घर वापस जाने को कहा। और स्वंय वापस चले गये।
लौटती निहत्थी भीड़ पर अचानक गोलियाँ चलाई जाने लगी। आधे घंटे तक अंधाधुँध गोलियाँ चलाई गई थी। एक हजार के करीब स्त्री, पुरूष, मासूम बच्चे मौत की घाट उतार दिए गये। स्वतंत्र भारत के पहली जनवरी, पहले ही वर्ष भारत के इतिहास में एक जघन्य अपराध किया गया।
यह घटना जलियाँवाला बाग की घटना से भी विभत्स कहा जाएगा। वहाँ तो देश में ब्रिटिश सरकार के राज्य में गोलियाँ देश-भक्तों पर चलाई गई थी जो आजादी की माँग कर रहें थे। यहाँ तो देश की आजादी के बाद इस तरह का विभत्स कांड़ किया गया, तो सिर्फ इसीलिए कि वे खरसवाँ को बिहार में ही रहने देना चाहते थे। ऐसा क्यों किया गया ? सिर्फ शोषित दलित एक जगह इकट्ठा होकर अपनी माँग रखने की कोशीश कर रहे थे। क्या आदिवासियों को इतना भी अधिकार आजाद भारत में नहीं था।
गोली चालन के बाद अधमरे लोगों को बूटों से रौंदकर मार डाला गया था। ताकि बोलने वाला कोई न बचे। उड़ीसा के अधिकारियों ने पूरे बाजार को घेर रखा था कोई समाचार बाहर जाने नहीं दिया जा रहा था। बिहार सरकार ने एक मेडिकल मिशन एवं “मिशन ऑफ मर्सी” भेजा था, किन्तु वे भी सेवा कार्य से रोक दिए गये थे। घायलों को एक-एक बूँद पानी के लिए भी तरसाया गया था।
श्रीमान् जयपाल सिंह ने कहा था कि आदिवासी, गैर-आदिवासी सभी से इस विषय पर बातचीत हुई थी ओर उससे निष्कर्ष निकलता था कि यह घटना पूर्व-नियोजित थी। खरसवाँ के आदिवासियों ने त्याग एवं बलिदान का अपूर्व आदर्श रखा। आजादी के चार महिने बाद की यह घटना बेमिसाल है। झारखंड के विभिन्न हिस्सों में खरसवाँ के शहीदों को याद करते हुए आदिवासी महासभा की ओर से “झारखंड रैली” निकाली गई। इसमे विशेष ग्यारह जनवरी, उन्नीस सौ अड़तालीस को चाईबासा में, अठारह जनवरी को जमशेदपुर में हुई। इनमें लाखों की तादाद में लोग इकट्ठा हुए।
आदिवासी महासभा एवं झारखंड पार्टी के संगठन के दिनों में इस घटना के बाद भी कई घटनाएँ हुई। इनमें एक महत्वपूर्ण कांड मिहिजाम गोली कांड है। मिहिजाम लोको बिल्डिंग वर्क्स बन रहा था। इस योजना को बनाने के लिए पन्द्रह-सोलह आदिवासी गाँवों को हटाना था। जनता बार-बार पुर्नवास एवं मुआवजा की माँग कर रही थी। पर कोई सुनने वाला नहीं था। एक फोगड़ा माँझी (मरांडी) नामक व्यक्ति ने आदिवासी महासभा को सूचना दी थी कि दिनांक एक जनवरी उन्नीस सौ उनपचास(01-01-1949) को करीब तीन सौ सिपाही पश्चिम बंगाल से लाए गये थे। दो लारी मिलिटरी भी लाई गई थी। घुड़ सवार भी थे। जबरजस्ती मिट्टी कटाई का काम शुरू कर दिया गया था और बस्तियों को उजाड़ने का भी इन्तजाम कर लिया गया था। संथाल-लोग फरियाद करने पहुँचे तो उनपर गोलियाँ चला दी गई। इसमें भी पाँच संथाल आदिवासी मारे गये। दो जनवरी को अगले ही दिन पुलिस ने चार गाँवों को घेर लिया सुबह-सुबह। पच्चीस-तीस लोगों को घेर कर जानदरों की तरह पकड़ लिया गया। एवं गिरफ्तार कर लिया गया। गाँव वालो के घरों में घुसकर सामानों को तोड़फोड़ कर दिया गया। उनके परम्परागत हथियारों, तीर-धनुष, लाठी आदि जब्त कर लिए गये। सैकड़ों लोगो पर मुकदमें दायर कर लिए गये।
आदिवासी महासभा को झारखंड पार्टी का रूप उन्नीस सौ अड़तालीस में दे दिया गया। झारखंड पार्टी के गठन के बाद श्री जयपाल सिंह ने अनुसूचित जनजातियों के अलावे अन्य लोगों को भी इसमें शामिल किया। आदिवासी महासभा का विस्तार किया गया। तथा इसमें जो सिर्फ आदिवासियों को ही सदस्य बनाया जाता था, उस प्रतिबंध को हटाकर इसे व्यापक रूप दिया जाने लगा।
इसका प्रभाव बहुत ही अच्छा रहा। उन्नीस सौ बावन के पहले आम-चुनाव में झारखंड पार्टी ने बिहार के अन्दर ही तैंतीस सीटों को विधान सभा में जीता। यह पार्टी बिहार विधान सभा मे प्रमुख विपक्षी पार्टी के रूप में बैठी। उन्नीस सौ बावन एवं उन्नीस सौ सन्तावन तक के वर्षो में झारखंड आन्दोलन बड़े जोरों पर रहा। दूसरी आम-चुनाव में यह पार्टी उड़ीसा तक पहुँची और वहाँ भी इसके पाँच विधायक बने। यह पार्टी उन दिनों उड़ीसा में भी एक प्रमुख पार्टी के रूप में उभरी। इसका कारण झारखंड पार्टी के अपनी नीतियों में सुधार एवं इसका गैर-आदिवासियों का शामिल करना था। यही कारण था कि बिहार के तैंतिस विधायकों में दश विधायक गैर-जनजाति के हुए।
पर बड़े दुःख की बात है कि बावजूद इस व्यापक आन्दोलन एवं सफलता के हजारों के शहीद होने के बावजूद राज्य पुर्नगठन आयोग (1954-1956) ने झारखंड अलग राज्य के गठन के लिए सिफराश नहीं की। इसे अलग राज्य का दर्जा नहीं मिले, इसके लिए कई गलत आघार बता दिए गये। गलत कारण रिपोर्ट में प्रस्तुत किए गये जो तथ्यों से परे थे। बौद्यिक बेईमानी की गई। इस आन्दोलन का गलत चेहरा सामनें लाया गया।
यह एक बड़ी विचित्र बात थी कि श्री जयपाल सिंह ने जिन्होनें झारखंड अलग राज्य के लिए इतने बड़े आन्दोलन को खड़ा किया था राज्य पुर्नगठन आयोग के समक्ष कोई प्रतिवेदन पेश नहीं किया। उन्होनें राज्य पुर्नगठन आयोग के समझ उपत्थित होना भी उचित नहीं समझा। यहाँ तक कि जब राज्य पुर्नगठन आयोग राँची, पहुँचा तो, वहाँ आलग राज्य की माँग को पेश करना तो दूर, श्री जयपाल सिंह राँची से ही दूर चले गये थे।
अब इसका क्या कारण था, यह कहना तो कठिन है, पर इतना तो स्पष्ट है कि सभंवत वे अलग राज्य के गठन में कोई दिलचस्पी नहीं रखते थे। फिर यह बात भी समझ में नहीं आती कि तब उन्होने इस आन्दोलन को आगे बढ़ाया ही क्यों था ? और ऐन वक्त में पीछे क्यों हट गये थे ?

आदिवासी महासभा एवं झारखंड पार्टी –

सर्वश्री जयपाल सिंह मुंड़ा के नेतृत्व में झारखंड पार्टी का जन्म हुआ। आदिवासी महासभा को भंग कर दिया गया। और उन्नीस सौ अड़तालीस में झारखंड़ पार्टी बनी। बीसवीं सदी के चालीसवें दशक में आदिवासी महासभा ने काँग्रेस पार्टी के साथ बहुत नजदीकी सम्बन्ध बनाए रखने का प्रयास किया। आदिवासी महासभा ने बिहार प्रदेश काँग्रेस कमिटी में एवं इसके कार्यकारिणी समिति में अपने प्रतिनिधि की बात की थी। काँग्रेस ने इस माँग को स्वीकार नहीं किया। मार्च उन्नीस सौ छयालीस में तत्कालीन काँग्रेस अध्यक्ष डा0 राजेन्द्र प्रसाद के सम्मुख एक स्मृति पत्र प्रस्तुत किया गया जिसमें काँग्रेस पार्टी के इन अंगो में आदिवासी समुदाय को उचित प्रतिनिधि देने की माँग की गई। सन् उन्नीस सौ छयालीस मे ही श्री जयपाल सिंह ने प्रान्तीय परिषद् के लिए एक सीट पर चुनाव लड़ा था, पर वे काँग्रेस के एक उम्मीद्वार के द्वारा पराजित हो गये थे। उनकी पराजय के कारणों में एक यह भी कहा जाता है कि आदिवासी महासभा की नीतियाँ प्रतिक्रिया वादी थी और इस कारण से अनेक आदिवासियों ने काँग्रेस का समर्थन कर दिया था।
आदिवासी महासभा के अलग राज्य की माँग के विरूद्ध, इस दौरान हमले शुरू हो गये थे। इस महासभा को बदनाम करने की साजिश शुरू हो गई थी। प्रेस ने इस महासभा को मूलतः ईशाई आदिम जातियों के एक संस्था के रूप चित्रित किया। यह भी प्रचारित किया जाता कि कुछ गैर-ईशाई जो इस संगठन या संस्था में हैं, उन्हे या तो जोर जबरजस्ती इस संस्था में रखा गया है या कुछ व्यक्तिगत स्वार्थ के कारण इस संस्था के साथ हैं। तत्कालीन प्रमुख पत्र “हिन्दुस्तान स्टैंडर्ड” तथा “सर्च लाइट” ने मार्च 19, उन्नीस सौ तैंतालीस एवं मार्च तेईस उन्नीस छयालीस को इसी आशय का समाचार छापा कि खुँटी क्षेत्र में एक ईशाई आतंक फैला रहा है। तथा यह भी छापा कि लूथरन एवं सेंट पाल मिशन गुंडागर्दी में प्रमुख हिस्सा ले रहें है। यह इसलिए कहा जा रहा था कि श्री जयपाल सिंह मुंड़ा जाति के थे ओर इनकी शिक्षा-दीक्षा ईशाई मिशनरी के द्वारा देश-विदेश में हुई थी। ज्ञातव्य हो कि ये अपने देश के हॉकि के श्रेष्ठतम् खिलाड़ियों में से एक थे और ओलम्पिक खेल में भारत की टीम की कप्तानी भी कर चुके थे। उन दिनों की बात है जब भारतीय हॉकि टीम अपने चरम उत्कर्ष में था।
इस प्रकार झारखंड आन्दोलन के शुरूआती दौर में ही इसे बदनाम करने की कोशिस की गई एवं इसे ईशाई मिशनरियों द्वारा संचालित आदिम जातियों का आन्दोलन कहा गया। इस प्रकार शासक वर्ग ने इस आन्दोलन के विरूद्ध सियासी चालें चलनी शुरू की।
उन्नीस सौ छयालीस की अपनी पराजय के बाद जयपाल सिंह खिन्न हो उठे थे और उन्होने यह घोषणा कर दी थी कि झारखंड के गैर आदिवासियों ने आदिवासियों का आर्थिक शोषण किया है एवं राजनैतिक शोषण किया है। उन्होने कहा कि आदिवासियों के पुनरूत्थान की कल्पना या आशा तब तक नहीं की जा सकती जब तक अतिक्रमण करने वाले गैर-आदिवासी झारखंड छोड़ नहीं देते। इस घोषणा से एक लाभ तो हुआ कि आदिवासी युवक आगे आये, पर नुकसान यह हुआ कि कई जगहों पर गैर-आदिवासियों के पर हमले हुए। आदिवसियों के विरूद्ध भी संघर्ष हुए। इससे पूरे झारखंड का वातावरण संकीर्ण हो गया। तथा आदिवासी नस्लवाद पैदा हुआ। यह आन्दोलन आदिवासी महासभा का यह आन्दोलन जातिवाद से प्रभावित हो गया।
यह सच है कि भारत की आजादी के पहले झारखंड अलग राज्य के आन्दोलन में ईशाई का तथा मुंड़ा एवं उराँव जाति का वर्चस्व था। इस आन्दोलन को ईशाई-मिशनरियों द्वारा संचालित आन्दोलन भी कहा गया था जिसका उद्देश्य मिशनरियों ने अपना हित एवं अपने-प्रचार के लिए और अपना पाँव जमाने के लिए किया था। शुरू से ही काँग्रेस पार्टी ने इस आन्दोलन का विरोध किया था। खासकर इसका विरोध उत्तर-बिहार के लोग कर रहें थे जिसका प्रभुत्व काँग्रेस पार्टी में था। आदिवासी भी जो ईशाई नहीं थें, सामान्यतया इस आन्दोलन से जुड़ नहीं पाये थे, पूरी तरह से, और उनकी धारणा झारखंड पृथक राज्य के सम्बन्ध में स्पष्ट नहीं थी। काँग्रेस के लोगों का ख्याल था कि अगर यह आन्दोलन जोर पकड़ेगा तो इस क्षेत्र में उनकी पकड़ कम हो जोयेगी एवं उनके लिए मुसीबत खड़ी हो जाएगी। यह धारणा काँग्रेस पार्टी के लोगों में अंत तक बनी रही।
झारखंड आन्दोलन में सियासी चालों की कमी नहीं रही। इस आन्दोलन को पहले तो गोली बन्दुक से तथा सरकारी हिंसा के द्वारा दबाए जाने का प्रयास किया गया। अनेकों सभाओं मे गोलियाँ दागी गई। नेताओं की हत्या की गई। उन्हें जेल में यातनाएँ दी गई। अगर हम थोड़ी नजर कुछ प्रमुख घटनाओं पर डालें तो इस आन्दोलन को कुचलने के लिए किए गये जुल्मों सितम को समझ सकते हैं।
उन्नीस सौ उनतीस के पूर्व गंगपुर राज्य (उड़ीसा) में गाँव-गाँव में “आदिवासी महासभा” का प्रचार हो चुका था। आम सभाओं में हजारों हजार की तादाद में जनता इकठ्ठा हो रही थी। इस एकता ने काँग्रेस पार्टी को चौंका दिया था और वह इसे दबाने का प्रयास करने लगी। उड़ीसा में उस समय श्री हरे कृष्ण महताब मुख्य मंत्री थे। गंगपुर राज्य में सुखे के कारण फसल मारी गई थी, फिर भी बड़ी बेरहमी के साथ लगान वसूल की जा रही थी। आदिवासी महासभा ने उन्नीस सौ उन्नतीस, पच्चीस अप्रेल को पाँच बजे गंगपुर के सिमको के मैदान में एक आम सभा रखी थी एवं प्रस्ताव लिया जाने वाला था कि गंगपुर राज्य को अकाल पीड़ित घोषित किया जाय, तथा कर-वसूली पर रोक लगाई जाय। सरकार से मदद माँगने की भी योजना थी। सभापति श्री निर्मल मुंड़ा थे, जिन्हें सरकार ने सभा-स्थल पर ही गिरफ्तार करने की योजना बनाई थी, पर वे लापाता हो गये। उनको नहीं पाकर उड़ीसा सरकार ने निहत्थों पर गोलियाँ चलवा दी। सैकड़ों स्त्री-पुरूष, बच्चे मारे गये। सैकड़ो घायल हुए। लाशों को गाड़ियों में लाद कर जंगलों में फेंक दिया गया। स्पष्टतः इस गोली कांड के द्वारा आदिवासियों के संगठन को छिन्न-भिन्न करने का ही उद्देश्य था। इसे कठोर एवं निर्मम ढंग से दमन किया गया ताकि भविष्य में उनकी आवाज सदा के लिए बन्द हो जाय। इसमें कहा जाता है कि मुख्य मंत्री हरे कृष्ण का हाथ था।