Friday, May 20, 2011
बिनोद बिहारी महतो का निधन एवं प्रभाव
बिनोद बिहारी महतो जब पहली बार सांसद पहुँचे, तो कई काँग्रेस के नेता एवं मंत्री उनसे बात करने के लिए उनके पास गये । श्री नरसिंहा राव उस समय काँग्रेस सरकार के प्रधानमंत्री थे। श्री राजीव गाँधी को लोक सभा चुनाव के दौरान ही प्रचार के समय चिकमंगलूर में हत्या कर दी गई थी। वरना श्री राजीव गाँधी ही पुनः भारत के प्रधानमंत्री बनते । पर ऐसा नहीं हुआ। पर नरसिंहा राव ने झारखण्ड आन्लोलन के विषय में सोचना छोड़ा नहीं था। स्व0 राजीव राजीव गाँधी ने अपने कार्यकाल में “झारखण्ड मामलों से संबंधित समिति” का गठन किया था, जिसका जिक्र हमने पहले ही किया है। इसकी रिपोर्ट जो मई 1990 में तैयार की गई, रखी हुई थी। 1991 में लोक-सभा चुनाव मई तक सम्पन्न हो सका था। राजीव गाँधी के समान ही झारखंड आन्दोलन एवं इसके प्रभावों की जानकारी श्री नरसिंह राव को थी और वे इसे एक मुकाम देना चाहते थे।
उनके मंत्रियों ने बिनोद बाबू से इस सम्बंध में वार्त्ता की थी। बिनोद बिहारी महतो से सरकार बनाने के लिए समर्थन भी माँगा था। पर बिनोद बाबू का स्पष्ट कहना था कि झारखंड राज्य के विषय में सकारात्मक निर्णय लेने पर ही वे समर्थन दे सकते थे। तब तक श्री नरसिंह राव स्पष्ट नहीं थे कि झारखंड आन्दोलन के विषय में कौन सा निर्णय लिया जाय। कई कठिनाईयाँ थी। कुछ भी स्पष्ट नहीं था।
पर अचानक दिसम्बर 18, 1991 को बिनोद बिहारी महतो का निधन हो गया था, पर स्थिति डाँमाडोल थी और विपक्ष अविस्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा था। बिनोद बाबू के निधन के बाद न सिर्फ बिहार की राजनीति में व्यापक प्रभाव पड़ा, वरन पूरे देश में राजनैतिक हलचल बढ़ गई। झामुमो के छः सांसद थे और वे विपक्ष में बैठे थे। शिबू सोरेन काँग्रेस के नजदीकी माने जाते थे और बिनोद बाबू वामपंथी पृष्ठ भूमि के थे। विपक्ष में उस समय भारतीय जनता पार्टी, जनता दल, वामपंथी पार्टियाँ एवं अन्य कई दल काँग्रेस के विरोध में थे।
बिनोद बाबू की मृत्यु के पश्चात बिहार में राजनैतिक समीकरण गड़बड़ाने लगा था। लालू प्रसाद के लिए परेशानी थी। उसी प्रकार केन्द्र में काग्रेस इस चक्कर में थी कि झामुमो के सांसदों को अपने पक्ष में कर लिया जाय। राजनैतिक शह-मात का खेल शुरू हो गया था।
झारखंड क्षेत्र में न सिर्फ झामुमो समर्थकों, वरन् झारखण्ड नामधारी दलों के साथ-साथ वामपंथियों, शिक्षा-विदों एवं अन्य कई सामजि संगठनों में शोक की लहर दौड़ गई। झारखंड की आम-गरीब जनता उनके निधन से आहत थी ओर किंकर्त्तव्यविमूड़ थी। दूसरी तरफ झारखंड के शोषणकर्त्ता खुश थे। खुले आम जश्न मनाकर अपनि खुशी का इजहकर कर चुके थे। झारखंड आन्दोलन को एक जोरदार झटका बिनोद बाबू के निधन से लगा।
राष्ट्रीय दलों जैसे काँग्रेस पार्टी तथा भारतीय जनता पार्टी के साथ-साथ वामपंथी दलों ने अपनी सक्रियता झारखंड क्षेत्र में बढ़ानी शुरू कर दी थी। वह समय एक ऐसा समय था जब राजनैतिक महकमें में कई अटकले लगाई जा रही थी।
इससे एक समस्या और उत्पन्न हो गई थी। कई जगहों के विस्थापितों के हजारों मामले बिनोद बाबू विभिन्न कोर्ट-कचहरियों में लड़ रहें थे, उन मामलों में भी ग्रहण लगना शुरू हो गया था। खासकर बोकारो, धनबाद आदि जिलों में भू-अर्जन अधिनियम के तहत हजारों केस बिनोद बाबू ने एक वकील की हैसियत से दायर किए थे, जो उनकी मृत्यु के बाद दूसरे वकीलों द्वारा चलाए जाने के प्रयास भी शुरू हो गये थे। दर्जनों शिक्षण संस्थाओं का भविष्य भी खतरे में पड़ गया था जो उनके द्वारा स्थापित या संचालित थे।
मैं झारखंड आन्दोलन के साथ शुरू से ही जुड़ा हुआ था। तथा अपने पिता बिनोद बिहारी महतो का प्रशंसक रहा था। अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई इंडियन स्कूल ऑफ माइन्स धनबाद से पूरी करके मैं सुदामडीह कोलियरी में कार्यरत था तथा 1972 में कोलियरी छोड़ दिया था। 1969 के आस पास शिवाजी समाज के आन्दोलनों में तथा अन्य प्रकार के कई कार्यक्रमों में ज्यादे सक्रिय हो जाने के कारण बिनोद बाबू पर कई मुकदमें लादे गये थे। उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा था। आपात काल के लागू होने के पहले वे इतने ज्यादे उलझ गये कि उन्हे “मिसा” के तहत 1974 में गिरफ्तार करके कारागार में बंद कर दिया गया। पहले उन्हें भागलपूर सेंट्रल जेल तथा बाद में उन्हें बाँकीपुर पटना सेंट्रल जेल में बंद रखा गया था। मैं घर का बड़ा था। मुझे छोड़कर सभी भाई बहन पढ़ाई कर रहें थे। बड़ी मुश्किल हो गई थी। कोलियरी में मेरा आना-जाना का हो गया। इन्हीं झंझटो से आजिज आकर मैंने कोलियरी से सदा के लिए अलविदा कह दिया। यहीं पर छोटा-मोटा कारोबार करके घर में ही रहने लगा। पिताजी के मुकदमों को पटना हाईकोर्ट सेलेकर सुप्रीम कोर्ट तक मुझे लड़ना पड़ा। पिताजी के “मिसा” कानून के तहत दायर किया गया केस अपने आप में एक अनूठा केस था जो 1974 के ए0 आइ0 आर0 के सुप्रीम कोर्ट के फेसलों में दर्ज है। इस दौरान मुझे कोर्ट कचहरी तथा जेलों के चक्कर काटने पड़े थे। इस केस में हार जाने के बाद मैंने तय कर लिया कि वकील बनूँगा। 1971 में मैंने लॉ कॉलेज छोटानागपुर, राँची में दाखीला ले लिया था। पर परीक्षा में 1975 में बैठा। इस प्रकार 1977 तक मैं धनबाद, गिरिडीह, हजारीबाग जिलों में झमुमो के आन्दोलन के साथ-साथ जुड़ा रहा।
मैंने 1973 में धनबाद म्यूनिसिपैलटी का चुनाव लड़ा, वार्डो में अपना उम्मीद्वार दिया। बिनोद बाबू, कॉमरेड राय मेरे साथ तो थे, पर उन्होनें इस चुनाव में मुझे अपने ढंग से कार्य करने दिया। नतीजा यह निकला कि मैनें अपने साथियों का बहुमत प्राप्त कर लिया। काँग्रेस के दबंग नेताओं, वी0 पी0 सिन्हा, शंकर दयाल सिंह जैसे दिग्गज नेतओं के प्रतिरोध के बावजूद यह बहुमत हासिल किया था, तथा बिनोद बाबू के कथनानुसार उनके पुराने साथियों सचिन चन्द्र मल्लिक को चैयरमैन तथा हरिहरप्रसाद जी को वाइस चैयरमैन बनाया। 1977 के बाद मैं 1978 में राँची चला आया था, पर राजनीति से अलग नहीं हो सका। राँची जिले में तब झारखंड मुक्ति मोर्चा का कोई संगठन नहीं था। इस समय तक झामुमो का संगठन उत्तरी छोटानागपुर तथा संथाल परगना तक ही सीमित था। दक्षिणी छोटानागपुर में झारखंड नामधारी अन्य दल सक्रिय थे।
मैं श्री इन्द्रनाथ महतो अधिवक्ता, त्रिदीप घोष, बिरसा उराँव, मानवघोष दस्तीदार भाई हॉलेन कुजूर, शिव नन्दन महतो, बिरसा उराँव आदि कुछ गिने चुने लोगों के साथ झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन राँची में किया। 1980 में हिनू मे हमारे एक साथी एतवा उराँव आदिवासी जमीन बचाने के विवाद में जमीन-माफियाओं के द्वारा मार दिया गया। तब झामुमो के आन्दोलन ने जोर पकड़ा। कई सहकारी समितियों के जमीनों पर हमने हरा झंड़ा गाड़कर उनके कार्यो को रोका। तथा कई जगहों पर विस्थापित आन्दोलन की शुरूआत की।
इसके बाद सिंहभूम जिलों से कई साथी आए एवं मुझसे मिले। इस बीच मैने कई कार्यक्रमों में बिनोद बाबू एवं ए0 के0 राय एवं शिबू सोरेन को शिरकत करवाया। सघनू भगत (बाद में मंत्री) भी पार्टी में शामिल हुए। मेरी सिफारिश पर 1980 में भाई हॉलेन कूजूर को झामुमो तथा मासस ने विधान परिषद् का सदस्य बनवाया। अर्जुन महतो (बाद में विधायक) मेरे कहने पर झामुमो में आए। मैने उन्हें बिनोद बाबू के पास भेज दिया था।
पर धीरे-धीरे मैं वकालत में मशगुल हो गया। पर इससे राजनीति से मेरा सम्बन्ध टूटा नहीं। सक्रिय राजनीति में मेरा दखल का जरूर हो गया। पर फिर भी बिनोद बाबू के चुनाओं मे मैं ही चुनाव प्रभारी हुआ करता और तब क्षेत्र का दौरा करता। आनन्द महतो, कॉमरेड राय को भी चुनावों में क्षेत्र मे जाकर मदद करता। एक फायदा तो वकालत से हो ही गया था। विभिन्न राजनैतिक दलों के लोग जो मेरे पिताजी से संबंध रखते थे, मेरे पास अपने मुकदमें की पैरवी करने आते। इसके अलावा मेरा आयाम राँची मे रहने के कारण बढ़ गया था। पूरे झारखंड के लोग मेरे पास मुकदमें लेकर आते।
मेरे पिता बिनोद बिहारी महतो की अचानक मृत्यु ने मुझे बड़ी असमंजस की स्थिति मे डाल दिया था। परिस्थिति ऐसी पैदा हो गई कि मुझे अपने सरकारी वकील का पद छोड़कर राजनीति मे वापस आना पड़ा। तेरह वर्षो की कड़ी मेहनत के बाद मै सरकारी वकील बना था, केरियर को बनाया था। भविष्य मे हाईकोर्ट जज के पद पर जा सकता था, पर जहाँ से चला वहीं आकर फिर खड़ा हो गया। एक कैरियर माइनिंग इंजीनियर का छोड़ चुका था तो दूसरा भी छूट गया था। राजनीति में वर्चस्व की लड़ाई में अक्सर मुद्दे पीछे छूट जाते है। मैं झारखंड आन्दोलन को आगे बढ़ाने तथा पृथक झारंखड राज्य बनाने के मुद्दे के साथ राजनीति में आया था, पर मुझे घोर आश्चर्य हुआ कि बिनोद बिहारी महतो की मृत्यु के बाद राजनैतिक महत्वाकांक्षा ने व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का रूप ले लिया था। कॉमरेड ए0 के0 राय तथा शिबू सोरेन व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को पूरा करने में लग गये थे। अलग राज्य का मुद्दा भूला दिया गया। न सिर्फ भूला दिया गया था, वरन् इसके विरूद्ध कॉमरेड राय तथा शिबू सोरेन दोनों ने मुहिम छेड़ दिया।
इस महत्वाकांक्षा की लड़ाई में काँग्रेस ने शिबू सोरेन को पटाकर बिहार से लालू प्रसाद की सरकार को गिराने का प्रयास शुरू कर दिया। पुनः काँग्रेस को बिहार की गद्दी में बैठने के लिए शिबू सोरेन सक्रिय हो गये।
केन्द्र में काँग्रेस शिबू सोरेन के सांसदों को अपने पक्ष में करने का प्रयास करने लगी।
Thursday, March 17, 2011
अध्याय – दश
वास्तव में झारखंड आन्दोलोन को झारखंड नामधारी पर्टियों ने ही जन्म दिया तथा उसे आगे बढ़ाया। अन्य राजनैतिक दलों जिसमें वामपंथी भी थे, उनकी भूमिका झारखंड आन्दोलन को आगे बढ़ाने में नगण्य रही। जब-जब झारखंड आन्दोलन आगे बढ़ाता कोई-कोई इक्का-दुक्का नेता इसपर कभी कोई ब्यान दे देता। ज्यादेतर पार्टियाँ एवं वामपंथी नेता अपनी अंतर्राष्ट्रीय अवधारणा के कारण इस इलाके को पृथक राज्य के रूप में अलग होने देना नहीं चाहते थे। भीतर ही भीतर इस आन्दोलन को कमजोर करने की साजिश रचते।
पर एक समय ऐसा भी आया जब वामपंथी पार्टियों ने सीधा विरोध खुले आम किया। पश्चिम-बंगाल में झामुमो एवं झारखंड पार्टी के द्वारा अलग राज्य की सभाओं में वामपंथी द्वारा हमले किए गये। हत्याएँ की गई। कई प्रमुख झारखंड नामधारी दलों के प्रमुख कार्यकर्त्ताओं की हत्याएँ तक की गई। उन क्षेत्रों में पश्चिम बंगाल सरकार ने ऐसा आतंक का माहौल बनाया ताकि लोग झारखंड अलग राज्य की बात तक न करें। कोई मीटिंग, सभा न कर सकें। झूठे मामलों में लादकर यातनाएँ दी गई।
काँग्रेस पार्टी के रवैये को तो सभी जानते हैं। इस पार्टी ने सीधे-सीधे इस आन्दोलन को दबाने या कुचलने या बरगलाने का काम किया।
जनसंघ पार्टी झारखंड क्षेत्र में भी सक्रिय हो रही थी। जनसंघ ने हमेशा ही एक पृथक वनांचल राज्य का समर्थन किया। झारखंड की जगह वे वंनाचल पृथक राज्य का समर्थन करते रहे थे। 1980 में जब जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी बनी, तो इस पार्टी ने भी वंनाचल राज्य का समर्थन किया। जनसंघ या भारतीय जनता पार्टी सैद्धान्तिक रूप से कभी भी झारखंड आन्दोलन के विरोध में नहीं रही। 1991 के लोक सभा चुनाव के आते-आते दक्षिण बिहार के झारखंड क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी एक सशक्त पार्टी के रूप में ऊभर कर आ चुकी थी। 1991 के लोक सभा चुनाव में इसने धनबाद (प्रो0 रीता वर्मा), राँची (रामटहल चौधरी) , गुमला (ललित उराँव) सीटें जीत ली थी। बाकी में हजारीबाग (भुवनेश्वर मेहता - सी0 पी0 आई0) पलामू, गढ़वा, कोडरमा से जनता दल तथा अन्य छः गिरीडिह, दुमका, राजमहल, पश्चिमी सिंहभूम, पूर्वी सिंहभूम (जमशेदपुर), गोड्डा सीटें झमुमो ने जीत ली थी।
भारतीय जनता पार्टी बाद में सशक्त पार्टी के रूप में उभर कर सामने आई। जनता पार्टी ने पहले तो छोटे राज्यों की वकालत की, पर बाद में वे भी इसके विरोध में हो गये।
1990 बिहार विधान सभा तथा 1991 लोक सभा के चुनाव तक झमुमो ने मात्र अपने अठारह वर्ष के सफर में इस क्षेत्र के एक सशक्त पार्टी के रूप में पहचान बना ली थी। इकासी में से उन्नीस सीटें विधान सभा में अकेले झामुमो की थी। अन्य कई झारखंड नामधारी दलों के भी विधायक विधान सभा में पहुँचे थे।
ऐसा लगने लगा था कि अब झारखंड आन्दोलन अपने मुकाम तक पहुँच जायेगा। झारखंड नामधारी दलों, वामपंथीयों, जनतादल ने मिलकर संयुक्त मोर्चा काँग्रेस के खिलाफ बनाया था।
मार्च 1990 में जनता दल के श्री लालू प्रसाद को इस संयुक्त मोर्चे ने बिहार का मुख्यमंत्री बना दिया था। इसमें बिनोद बिहारी महतो – संस्थापक अध्यक्ष झामुमो की बहुत बड़ी भूमिका रही थी। अपने उन्नीस विधायको के साथ-साथ वामपंथियों तथा अन्य झारखंड नामधारी दलों का समर्थन भी उन्होंने जुटाया था और काँग्रेस को बिहार से हटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अतः लालू प्रसाद को वे विशेष सुझाव देते रहते थे।
Sunday, March 6, 2011
“झारखंड़ मामलों से संबंधित समिति” की रिपोर्ट
समिति ने दो राज्यों पश्चिम बंगाल तथा उड़ीसा का कोई दौरा नहीं किया। इसीलिए समिति ने इन राज्यों में आन्दोलन की लोकप्रियता पर कोई टिप्पणी ही नहीं की। कोई मूल्याकंन ही नहीं किया गया। मध्यप्रदेश के विषय में समिति ने यह कह दिया कि वहाँ आन्दोलन का प्रभाव कम था। इस बात को नजर अंदाज कर दिया गया कि पुनः दौरा किया जाए, उन क्षेत्रों का जिसका दौरा समिति नहीं कर पाई थी।
समिति ने इस बात को नजर अंदाज कर दिया कि गरीब अशिक्षित भोले-भाले झारखंड़ के आदिवासी एवं मूलवासी समूह अपने ऊपर हो रहे अत्याचार, शोषण दमन के विरूद्ध आवाज उठाने से डरते थे। उन्हें बाहरी शोषण कर्त्ताओं ने, पुलिस एवं प्रशासन ने इतना आतंकित कर रखा था कि वे गूँगें एवं बहरे हो गये थे। जब-जब कोई साहस करके आगे बढ़ता तो उसके आन्दोलन को निर्ममता पूर्वक कुचल दिया जाता। ऐसा इतिहास में प्रमाणित है। ऐसी परिस्थिति में आन्दोलन की लोकप्रियता की बात करना ही बेमानी था। ऐसी सोच को पूर्वाग्रह से ग्रसित ही माना जा सकता है।
अध्याय छः पारा-22 में इस रिपोर्ट ने इसके बाद कह दिया कि “झारखंड़ पृथक राज्य” के सृजन में चार राज्यों बिहाऱ बंगाल, उड़ीसा और मध्यप्रदेश को तोड़ने और इन टुकड़ो से झारखंड़ नामक एक नई इकाई का गठन करने का कार्य अन्तग्रस्त है। प्रजातांत्रिक प्रणाली में ऐसा संबंधित पार्टियों के सहमति से ही किया जा सकता है। ये पार्टयाँ विधिवत रूप से गठित चार राज्यों की सरकारें है।
इस समिति ने अलग राज्य के बनाने के मार्ग में आनेवाली बाधा का जिक्र कर दिया। चार राज्यों की सरकारें अगर विरोध करेंगी तो झारखंड़ पृथक राज्य नहीं बन सकता।
समिति ने इस बात को भूला दिया कि संविधान की धारा 2,3 एवं 4 में यह स्पष्ट है कि राज्य सरकार की सहमति के बिना भी केन्द्र सरकार अलग राज्य का गठन उसके किसी हिस्से को अलग करके बना सकती है। फिर किसी राज्य सरकार के विरोध से झारखंड़ के मामले में केन्द्र सरकार डरेगी क्यों ? समिति को किस कारण भय पैदा हुआ ?
बिहार के झारखंड़ के हिस्से के बारे में तो समिति का सुझाव बिलकुल ही तथ्यों से परे एवं तर्कहीन था। समिति ने यह स्पष्ट कर दिया था कि सभी राजनैतिक दल एक पृथक राज्य बनाने अथवा स्वायत्तता प्रदान करने के पक्ष में है। पर समिति ने एक अजिब सा तर्क दिया कि देश के वर्त्तमान राजनैतिक परिस्थिति की मजबूरियों और माँगों को ध्यान में रखते हुए इस बारे में निर्णय लेना पड़ेगा। समिति ने आशंका जाहिर कर दिया कि “विघटनकारी बलों को छूट प्राप्त है। अलगाववादी और विघटनकारी बल देश की एकता और अखंड़ता के लिए खतरा उत्पन्न करने के लिए सभी कार्य कर रहे है। हमने राज्यों के पुर्नगठन के लिए दो बार बैठकें की जिनमें एक 1980 के मध्य में भाषा के आधार पर तथा दूसरी 1960 और 1970 के दशकों के प्रारम्भ में उत्तर पूर्व में जातीय आधार पर। यह सिलसिला अभी जारी है। झारखंड़ राज्य बनाने पर समकालीन राष्ट्रीय स्थिति को देखते हुए ध्यान पूर्वक विचार किया जाना चाहिए।“
इस प्रकार इस समिति ने तथ्यों के विरूद्ध झारखंड़ अलग राज्य बनाने को खतरनाक कहा। इसे विघटनकारी एवं देश की एकता एवं अखंड़ता के लिए खतरा कहा। ऐसी आशंका जताई गई जिसका 1990 में कहीं नामो निशान नहीं था।
समिति ने यह आशंका जाहिर किया कि मात्र राज्य या संघ शासित क्षेत्र का दर्जा दिए जाने से सभी समस्याएँ हल नहीं हो सकती है। अलग राज्य माँगा जा रहा था, जिसके समर्थन में सभी तथ्य थे, पर समिति ने एक परिषद् बनाने की या एक ऐसे माडल बनाने की सिफारिश कर दी ताकि इन क्षेत्रों की सांस्कृति रक्षा हो सके, यहाँ की भाषा की उन्नति हो सके, आदिवासी जनसंख्या की सुरक्षा के उपायों को और मजबूत बनाया जा सके। बड़े आश्चर्य की बात है कि हर बार नये प्रयोग करने की सोची जाती रही, पर जो स्थापित उपाय थे, उन्हें नहीं आजमाया गया। अलग राज्य से ज्यादे कारगार क्या कोई दूसरा मॉडल बन सकता था, कदापि नहीं।
पर जाने-अनजाने इस समिति को एक महत्वपूर्ण बात का जिक्र करना ही पड़ा जो झारखंड़ के लिए बाद में सहायक सिद्ध हुआ। समिति ने अपनी रिपोर्ट के अध्याय छः पारा दश में “निष्कर्ष” शीर्षक के अन्तर्गत कहा है कि झारखंड़ क्षेत्र की जन सांख्यिकीय परिपेक्ष में अनुसूचित जनजाति के उन समुदायों को पहली प्राथमिकता दी जाय। कुछ समय पहले बिहार के कुछ जिलों में अधिकांश जनसंख्या अनुसूचित जनजातियों से संबंधित थी जिन्होंने अपने क्षेत्र को झारखंड़ राज्य के एक भाग के रूप में रखने की माँग की। 1981 की जनगणना के अनुसार इनकी जनसंख्या 30.26 प्रतिशत बैठती है। इसके अतिरिक्त ऐसा भी बहुत जनसमुदाय है जिसका आदिवासियों के साथ घनिष्ठ संबंध है तथा जिन्हें 1981 में आदिवासियों की सूची से अलग रखा गया था, ये समुदाय कुर्मी महतो के नाम से जाना जाता है। एक बड़े सदन की जनसंख्या में इनका महत्वपूर्ण हिस्सा है तथा बाद के समय में इनके द्वारा किए गये उत्प्रवास की तुलना में उनके मूलवंश की पहचान बनाए रखने के आधार पर इन्हें मूलवासी, सदावासी अनादिवासी आदि नामक कई अन्य नामों से भी जाना जाता है। कुल जनसंख्या में इस वर्ग का कथित रूप से 50 प्रतिशत हिस्सा है।“
इसी प्रकार अध्याय तीन में पारा 25 में कहा गया है कि “झारखंड़ आन्दोलन शुरू से ही एक झारखंड़ राज्य बनाने के लिए चलाया गया जिसे बिहार के छोटानागपुर और संथाल परगना जिलों तथा मध्यप्रदेश, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल के समीपवर्त्ती जिलों में से बनाया जाना था। इन क्षेत्रों की या इनके अधिकांश हिस्सों में आदिवासी (संथाल, मुंड़ा, हो, उराँव) और गैर-सरकारी आदिवासी (कुर्मी महतो इत्यादि) समुदायों की काफी आबादी है जो जातीयता, ऐतिहासिक, सांस्कृति रूप से छोटानागपुर के पैतृक समुहों से संबंध है। झारखंड़ आन्दोलन इन समीपवर्त्ती क्षेत्रों में इन समुदायों के मध्य फैला हुआ है।”
आदिवासी शब्द का अर्थ इस रिपोर्ट में अनुसूचित जनजातियों से लगाया गया है। कुर्मी महतो इत्यादि कई अन्य जातियों को गैर-सरकारी आदिवासी कहा गया है। गैर-सरकारी आदिवासी का क्या अर्थ हो सकता है ? यही न कि वैसी जनजातियाँ जो वर्त्तमान में अनुसूचित नहीं है।
समिति द्वारा इस तथ्य को स्वीकार करने के बाद कि झारखंड़ आन्दोलन सरकारी एवं गैर-सरकारी आदिवासियों का रहा है तथा जिनकी संख्या झारखंड़ में बहुतायात में, बहुमत में है, जिनकी अपनी समान सभ्यता संस्कृति पहचान है, झारखंड़ अलग राज्य बनाने के लिए समिति द्वारा सुझाव नहीं देना, बौद्धिक बेईमानी ही कही जायेगी।
Sunday, February 20, 2011
“झारखंड़ मामलों से संबंधित समिति” की रिपोर्ट
इस समिति को दक्षिण बिहार, मध्यप्रदेश, उड़ीसा तथा पश्चिम बंगाल के उन क्षेत्रों का दौरा करना था जिसे झारखंड़ क्षेत्र माना जाता रहा था। चूँकि समय सीमा मात्र एक महिने की थी, यह समिति पूरे क्षेत्रों का दौरा नहीं कर सकी और देश में आम चुनाव की घोषणा अक्टूबर 1989 के बाद कर दी गई थी, तो दौरा बन्द हो गया और विशेषज्ञों को रिपोर्ट तैयार करने को कह दिया गया। विशेषज्ञों द्वारा तैयार किए गये मसौदे पर 25 अप्रेल 1990 को समिति की बैठक में विचार-विमर्श किया गया। फिर 14-15 मई 1990 को हुई बैठक में नये मसौदे पर चर्चा हुई और गृह-मंत्रालय को सौंप दिया गया।
इस रिपोर्ट में कुल मिलाकर छः अध्याय हैं तथा सात अनुच्छेद। इस रिपोर्ट में यह भी दर्शाया है कि किस प्रकार झारखंड़ आन्दोलन के सामाजिक एवं क्षेत्रीय आयाम का विस्तार हुआ। एक छोटे आन्दोलन ने जिसे छोटानागपुर उन्नति समाज ने शुरू किया था, किस प्रकार विशाल रूप लिया इस पर भी विवेचना किया है। झारखंड़ में औद्योगिकरण के प्रभाव इसके जातीय विशाल रूप लिया इस पर भी विवेचना किया है। झारखंड़ में औद्योगिकरण के प्रभाव इसके जातीय समीकरण, जनसांख्यिकीय स्थिति आदि कई विषयों पर भी इस रिपोर्ट में बहुत कुछ कहा गया है। इसके साथ साथ राज्य पुर्नगठन आयोग की रिपोर्ट का हवाला भी दिया गया है जो अलग राज्य से सम्बन्धित है तथा झारखंड़ आन्दोलन के कारणों पर भी विवेचना किया गया है।
Saturday, February 19, 2011
“झारखंड़ विषयक समिति” का निर्माण –
अब इस बात पर नजर डालना आवश्यक है कि बिहार विधान सभा में झारखंड़ नामधारी पार्टियों की स्थिति क्या रही थी। 1952 में 33 विधायक, 1957 में 32, 1967 में आठ, 1969 में सत्रह, 1971 में शून्य, 1972 में आठ, 1977 में फिर एक, 1980 में चौदह, 1984 में एक, 1985 में 9 तथा 1990 में 21 सीटें बिहार विधान सभा में झारखंड़ नामधारी पार्टियों को मिली। इसी प्रकार लोक सभा सीटें 1957 में 5 सीटें, 1962 में तीन सीटें, 1971 में दो सीटें, 1980 में एक सीटें, 1985 में एक भी सीटें नहीं, फिर 1989 में दो सीटें तथा 1991 में छः सीटे।
झारखंड़ अलग राज्य बनाने के संबंध में सरकार की सोच बड़ी भ्रामक थी। केन्द्र सरकार यह देखा करती कि इसके कितने जनप्रतिनिधि चुनाव जीत कर आते है जिससे झारखंड़ आन्दोलन की ताकत को नापा जाता रहा था। कम प्रतिनिधि चुनाव जीतकर आते तो कहा जाता कि झारखंड़ आन्दोलन को पर्याप्त जनसमर्थन प्राप्त नहीं है। पर यही बात दुसरे राज्यों के गठन के संबंध में नहीं सोची जाती थी। पंजाब से हरियाणा अलग हुआ। महाराष्ट्र से गुजरात बना। कर्नाटक बना मैसूर से अलग होकर। आन्ध्रप्रदेश तमिलनाडू से अलग हुआ। नागालैंड़ बना। पच्चीस राज्य बने आजादी के बाद। कहीं भी किसी भी मौके पर यह नहीं कहा गया कि इन राज्यों में अलग राज्य बनाने के लिए आन्दोलन क्यों नहीं हुए ? यह तलाश भी नहीं की गई कि आन्दोलन की जरूरत क्यों नहीं थी, इनको अलग करने के लिए। पर झारखंड़ अलग राज्य बनाने के सवाल पर आन्दोलन की आवश्यकता पर बल क्यों दिया गया? वह भी एक बड़े एवं सशक्त आन्दोलन की आवश्यकता क्यों दर्शाई जाती रही ? यह एक विचारनीय विषय है। दूसरी बात है कि इतिहास रहा है कि आधी सदी से ज्यादा समय तक यहाँ झारखंड़ अलग राज्य का सशक्त आन्दोलन चलाया गया, पर इसकी मान्यता नहीं देकर यहाँ के लोगों की आवाज को नहीं सुनकर उल्टे इस क्षेत्र के आन्दोलन को दबाया-कुचला गया। इस आन्दोलन में सैकड़ो को मारा गया, हजारो को जेल भेजा गया। लाखों लोगों ने कष्ट झेले। पर फिर भी झारखंड़ आन्दोलन को एक समस्या के रूप में देखा गया। इसका दमन किया गया जैसे कि यह माँग माँगना एवं आन्दोलन करना कोई गुनाह हो। यह कभी नहीं सोचा गया कि झारखंड़-आन्दोलन यहाँ की समस्याओं के चलते पैदा हुआ है तथा समस्या के निदान के रूप में एक राज्य माँगा जा रहा है। यह आन्दोलन अपने आप में कोई समस्या नहीं बल्कि समस्याओं का समाधान है।
झारखंड़ विषयक समिति का गठन 1989 में किया गया था। यह अपने आप में एक ऐतिहासिक घटना है तथा इसकी रिपोर्ट झारखंड़ आन्दोलन के इतिहास में एक महत्वपुर्ण तथा यादगार दस्तावेज के रूप में हमेशा जाना जाता रहेगा।
1987 में बिनोद बिहारी महतो ने “झारखंड़ समन्वय समिति” का गठन किया। ज्ञातव्य हो कि झामुमो के संस्थापक अध्यक्ष बिनोद बिहारी महतो प्रथम दश वर्षो 1983 तक झामुमो के अध्यक्ष रहे। फिर अमर शहीद निर्मल महतो अध्यक्ष बने तथा महामंत्री शिबू सोरेन ही रहे। इस समिति का गठन इसलिए किया गया कि झारखंड़ में झारखंड़ नामधारी पार्टियाँ तथा अन्य संगठन अलग-अलग से इस आन्दोलन को अंजाम दे रहे थे। बिनोद बिहारी महतो ने इस सोच के साथ इस समिति का गठन किया कि सभी मिलकर अगर जोरदार आन्दोलन करें तो केन्द्र सरकार इस विषय पर सोचने के लिए बाध्य होगी। उन्होनें इस समिति में कई संगठनों, पार्टियों तथा नेताओं को सम्मिलित किया। कुल मिलाकर बावन संगठन इसमें शामिल हुए। इसमें वामपंथी, समाजवादी, झारखंड़ नामधारी तथा कई अन्य सामाजिक संगठन भी थे। बिनोद बिहारी महतो की संयोजन शक्ति ने यह काम कर दिखाया क्योंकि वामपंथी से लेकर काँग्रेस विरोधी हर पार्टी, संगठन से उनका ताल्लूक रहा था। इसमें प्रमुख रूप से बिनोद बिहारी महतो, बी0 पी0 केशरी, संजय बसु मल्लिक, डा0 राम दयाल मुंड़ा, संतोष राणा, सर्वश्री एन0 ई0 होरो, लाल साहदेव, सूर्य सिंह बेसरा, प्रभाकर तिर्की, बिरसा उराँव, त्रिदीप घोष, मानव घोष दस्तिदार, भाई हेलेन कूजूर आदि कई नेताओं ने हिस्सा लिया था। एक विशाल रैली राँची के मोराबादी मैदान में 15 नवम्बर 1987 को भगवान बिरसा की जन्म तिथि पर आयोजित की गई। सरकारी बाधा एवं सरकार द्वारा सारे रास्तों की नाके बंदी, लाठी चार्ज के बावजूद लाखों की तादाद में भीड़ इकट्ठी हुई। नवम्बर के महिने में प्रचंड़ ठंड़ थी और बारिश भी हो गई थी, फिर भी लोगों का जोश देखने लायक था।
इसी झारखंड़ समन्वय समिति की रैली को देखते हुए केन्द्र सरकार ने इस माँग पर पुनः ध्यान दिया। केन्द्र सरकार के गृह मंत्रालय ने दिनांक 23-28 अगस्त 1989 को एक आदेश जारी करके “झारखंड़ मामलों से संबंधित समिति” नामक समिति का गठन किया। “कॉमिटि ऑन झारखंड़ मैटर्स” अंग्रेजी नाम है। इसमें झारखंड़ आन्दोलन के प्रतिनिधि, केन्द्र सरकार के प्रतिनिधि तथा झारखंड़ मामलों के विशेषज्ञों की टीम शामिल की गई। इस समिति ने मई 1990 में एक रिपोर्ट केन्द्र सरकार को सौंपी। राज्य पुर्नगठन आयोग के बाद यह एक विशेष समिति थी जो सिर्फ झारखंड़ आन्दोलन के मामलें में गठित की गई थी।
इस समिति में निम्नलिखित सदस्य थेः-
केन्द्र सरकार के प्रतिनिधि –.
1. श्री बी0 बी0 सक्सेना, संयुक्त सचिव ग्रामीण विकास विभाग।
2. श्री बी0 के0 मिश्रा, संचुक्त सचिव जनजाति विकास कल्याण मंत्रालय
राज्य सरकार के प्रतिनिधि –
श्री जे0 एल0 आर्य, गृह सचिव बिहार, सचिव-जनजाति कल्याण बिहार, क्षेत्रिय विकास आयुक्त बिहार।
झारखंड़ आन्दोलन के प्रतिनिधि –
1. डा0 आर0 डी0 मुंड़ा
2. डा0 ए0 के0 सिंह
3. सर्वश्री एन0 ई होरो
4. शिबू सोरेन
5. बिनोद बिहारी महतो
6. बी0 पी0 केसरी
7. एस0 एस0 बेसरा
8. प्रभाकर तिर्की
9. सन्तोष राणा
10. सूरज मंडल
11. शैलेन्द्र महतो
12. प्रो0 स्टीफन मरांड़ी
विशेषज्ञ –
1. डा0 एस0 के0 सिंह
महानिर्देशक भारतीय मानव शास्त्रीय सर्वेक्षण
2. डा0 भूपेन्द्र सिंह
भारत सरकार के भूतपूर्व सचिव
3. श्री के0 एन0 प्रसाद
भूतपूर्व अपर सचिव
अन्य प्रतिनिधि –
1. प्रो0 लालचन्द्र चुड़ामनी नाथ साहदेव
अध्यक्ष सदान् विकास परिषद्, राँची।
2. प्रो0 साहिद हसन्
महासचिव सदान विकास परिषद्।
उल्लेखनीय है कि झारखंड़ मुक्ति मोर्चा के तत्कालीन अध्यक्ष शिबू सोरेन, उपाध्यक्ष सूरज मंडल ने झामुमो को इस रैली में शामिल नहीं होने का निर्देश ही नहीं दिया, बल्कि इस समिति के संयोजक बिनोद बिहारी महतो का कई स्थानों में विरोध भी कराया गया था। उन्होंने रामगढ़ की आम सभा में अर्जुन राम (महतो) द्वारा खुलेआम विरोध भी करवाया था इन लोगों ने झामुमो का इस समिति में शामिल होना तथा इसके लोगों का समिति में शामिल होना तथा इसके लोगों का समिति के आन्दोल में भाग लेना उचित ही नहीं समझा था। बाद में इस समिति के आन्दोलन की सफलता देखकर “झारखंड़ मामलो से संबंधित समिति” में पैरवी करके सदस्य बन गये थे, जो झारखंड़ समन्वय समिति की देन थी। उस समय देश के प्रधान मंत्री श्री राजीव गाँधी थे तथा कॉग्रेस के श्री बूटा सिंह केन्द्रीय गृह-मंत्री थे। जब इस समिति का गठन किया गया, बिहार में कॉग्रेस के जगरनाथ मिश्रा मुख्य मंत्री थे। इस प्रकार झारखंड़ आन्दोलन को एक विस्तृत आयाम बिनोद बिहारी महतो के प्रयत्नों से मिला। सिर्फ आदिवासी आन्दोलन का जो ठप्पा लगा था, वह मिटने लगा था।
अध्याय - नौ (अतंरराष्ट्रीयता बनाम राष्ट्रीयता)
इन्ही तथ्यों के आधार पर विश्व में महाद्वीप बने। महादेश बने। देश बने। अलग-अलग देश के वासियों ने अपनी सभ्यता-सास्कृति को विश्व के पटल पर महत्व दिलवाने का प्रयास किया है एवं अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाने की चेष्टा की है एवं बनाया है। एक दूसरे से लड़ाई लड़ी गई है, सिर्फ अपने देश की सिमाओं की रक्षा करने या उसका विस्तार करने के लिए। एक देश के लोग दूसरे देश के लोगों पर शासन करते है। दूसरों को गुलाम बनाया गया है। फिर स्वतंत्रता की लड़ाईयाँ लड़ी गई है। ये सभी निश्चित ही राष्ट्रीयता के नाम पर ही किए गये है।
एक देश के अंदर भी अलग-अलग धर्मों के लोग निवास करते हैं। अलग-अलग भाषा, बोलियाँ बोलने वाले लोग निवास करते है। जाहिर है कि ऐसे में छोटे स्तर पर वहीं होना स्वाभाविक है जो एक बड़े पैमाने पर विश्व के अन्दर अलग-अलग देशों की राष्टीयताओं के बीच होता है। यानि वैमनष्य, भेदभाव, एक के द्वारा दूसरे को शासन करने की मनोवृति। उन्नत आर्थिक स्थिति वाली कौम या फिर ताकतवर कौम के द्वारा कमजोरो को दबाने की चेष्टा। पूरे भारतवर्ष को ही देखें। हम कितने ही वर्गों में बँटे है।
सवाल उठता है, एसी परिस्थिति में अन्याय, शोषण, जुल्म, उपेक्षा के विरूद्ध कहाँ से लड़ाई शुरू की जाए। इस अन्याय या शोषण पर आधारित व्यवस्था का कहीं ओर छोर तो दिखाई देता नहीं। कहाँ पर इसकी गर्दन पकड़ी जाय। सैद्धान्तिक सवाल तो शोषण मुक्त समाज का निर्माण करना है, पर व्यवहारिक सवाल है कि क्या इसे अंतराष्ट्रीय अवधारणा के तहत पूरे विश्व को एक इकाई मानकर एक साथ पूरे विश्व में लड़ाई शुरू की जाय या फिर राष्ट्रीयता को आधार मानकर एक देश को यूनिट मानकर चला जाय या फिर एक प्रदेश को इकाई माना जाय। हम इससे भी नीचे परिवार तक जा सकते है। सफलता किधर से हाथ लगेगी इसका जबाव कुछ भी नहीं है। आप इस लड़ाई को कहाँ से शुरू करेगें, सफलता के लिए तो यह व्यक्ति विशेष की सौंच पर ही निर्भर करता है।
बिनोद बाबू ने सभी आयामों को देखा था। परखा था। उन्होनें अपने जीवन के शुरूआती दौर में वामपंथ-कम्यूनिष्म का साथ दिया था। पर उस अन्तराष्ट्रीय अवधारणा के साथ चलते हुए उन्हें लगा था कि उनकी उपलब्धि कुछ भी नहीं है। वे जहाँ के तहाँ है। कोई परिवर्त्तन उन्हें दिखाई नहीं दिया था। अतः उन्होने एक क्षेत्र विशेष को, जिसकी सभयता-संस्कृति तथा रहन-सहन, विश्वास एक सा था, चुना और उसकी राष्ट्रीयता को यूनिट मानकर अपना संघर्ष शुरू किया। निश्चित ही सफलताएँ हाथ लगी।
Friday, February 11, 2011
अध्याय आठ - झारखण्ड़ में वाम-पंथ
उसी प्रकार काँग्रेस का ही बोलबाला उड़ीसा एवं मध्यप्रदेश के झारखण्ड़ क्षेत्रों में था। पर धीरे-धीरे वामपंथी ताकतों ने झारखंड़ क्षेत्र में अपना प्रभाव फैलाना शुरू कर दिया। इसका एक प्रमुख कारण झारखंड़ क्षेत्र में औद्योगिकरण था। औद्योगिकरण के चलते मजदूरों की तादाद बढ़ी। हजारों की संख्या में यहाँ के किसानों को विस्थापित होना पड़ा, अपने गाँवों, खैतो एवं घरों से। इन विस्थापितों के नियोजन एवं पुर्नवास के लिए न तो राज्य सरकार द्वारा न ही केन्द्र सरकार द्वारा कोई नीति निर्धारण की गई। इन विस्थापितों की घोर उपेक्षा की गई। न तो उन्हें मुवाअजा दिया जाता न नौकरी। इन कारणों ने तथा मजदूरों के शोषण ने यहाँ वामपंथ के लिए बहुत उपयुक्त जमीन तैयार कर दिया।
यहाँ तक कि झारखंड़ मुक्ति मोर्चा के जन्मदाता प्रथम अध्यक्ष बिनोद बिहारी महतो भी पहले वामपंथी दल भारतीय कम्यूनिष्ट पार्टी में रहें। 1967 में जब कम्यूनिष्ट पार्टी ऑफ इंड़िया का विभाजन हुआ तो वे मार्क्ससीष्ट कम्यूनिष्ट पार्टी यानि कम्यूनिष्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्कसीष्ट) के सदस्य बन गये। 1967 में ही ई0 एम0 एस0 नम्बूद्रिपाद सरीखें नेता बिनोद बाबू के निमंत्रण पर धनबाद पधारें थे और यहाँ आम सभा चिल्ड्रेन-पार्क में किया गया था। इनके समकालीन चिन्मय मुखर्जी (धनबाद विधायक), टीकाराम माँझी (जमशेदपुर), सत्य चरण वेसरा (दुमका), विशेश्वर खाँ (संथाल परगना), राजेन्द्र सिंह मुंड़ा (राँची), धनंजय महतो (इचागढ़), चतुरानन मिश्र (गिरिडीह), मंजूर आलम (रामगढ़), सफी खाँ (बेरमो), चित्तो महतो (पुरूलिया), निर्मलेन्दू भट्टाचार्य (निरसा), ए0 के0 राय (धनबाद) आदि थे। फिर बाद में भी कई वामपंथी नेता उभरे। इनमें एस0 के0 बक्सी धनबाद-झरिया, महेन्द्र सिंह (बगोदर), ओपी लाल आजाद (गिरिडीह), एस0 के0 राय (झरिया) आदि कई वामपंथी नेता उभरे। करीब-करीब तीस से ज्यादे विधान सभा क्षेत्रों में वामपंथी पार्टियों के विधायक हुए जो वर्त्तमान झारखंड़ प्रदेश में हैं। 1960 से 1970 के दशक में वामपंथी पार्टियों के मजदूर यूनियनें हुआ करती थी एवं इनके माध्यम से पूरे झारखंड़ क्षेत्र में इनका प्रभाव बढ़ा।
नक्सल बादी आन्दोलन का प्रभाव भी झारखंड़ क्षेत्र में 1970 के दशक से फैलना शुरू हो गया था। कई आतंकवादी घटनाएँ घटी थी। झारखंड़ की भौगोलिक, स्थिति इसके घने जंगल एवं पहाड़ो से भरे भू-भाग के चलते यह क्षेत्र आतंकवादियों के नेताओं के लिए काफी सुरक्षित जगह बन गया। नक्सलवादी की तर्ज पर कई घटनाओं को अंजाम दिया गया। कई जगह बम फटे। ट्रेनों पर भी बम मारे गये। सिंहभूम, हजारीबाग, पलामू जिलों में 1970 के दशक में ही नक्सलियों की घूसपैठ हो गई थी। 1980 के बाद तो इनका कार्यक्षेत्र और भी बढ़ गया, तो इनके समर्थकों की तादाद भी काफी बढ़ गई। सूदर गाँवों के लोगों को प्रभावित किया गया। झारखंड़ के लोगों में फैला असंतोष, निर्मम शोषण, गरीबी, अशिक्षा तथा औपनिवेशिक शोषण ने आग में घी का काम किया। 1980 के बाद ए0 के0 राय ने एक पुस्तक लिखी “झारखंड़ और लालखंड़” तथा उनके समर्थकों के अन्दर एक नारे का भी प्रचार-प्रसार किया गया- “झारखंड़ को लालखंड़ में बदल डालो”।
झारखंड़ में तथाकथित वामपंथी ताकतों को सबसे बड़ा झटका तब लगा जब बिनोद बिहारी महतो ने 1973 में विधिवत रूप से “झारखंड़ मुक्ति मोर्चा” को जन्म दिया। बिनोद बिहारी महतो का संबंध कम्यूनिष्ट नेताओं से रहें थे । क्योंकि ये स्वंय पुराने कम्यूनिष्ट थे। बंगाल के ज्योति बासु से लेकर बिहार के बड़े कम्यूनिष्ट नेताओं के साथ उन्होंने काम किया था और झारखंड़ में वामपंथ के व्यापक प्रजार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इन पार्टियों के लिए जमीन तैयार की थी। वामपंथी पार्टियों को सबसे बड़ा झटका तब ही लगा था जब बिनोद बिहारी महतो ने झामुमो का गठन कर लिया था।
झामुमो के जुझारू आन्दोलन ने वामपंथ को धीरे-धीरे पीछे धकेल दिया था। झामुमो का आन्दोलन सिर्फ किताबी नहीं था, बल्कि जमीन से सीधा जुड़ा हुआ होने के कारण ज्यादा जुझारू एवं आर्कषक था। वर्ग संघर्ष की अवधारणा के साथ-साथ क्षेत्रिय संघर्ष की तथा वर्ण संघर्ष का अद्भूत समन्वय इसमें दृष्टी गोचर होता था। 1977 तक तो कॉमरेड ए0 के0 राय ठीक ठाक रहे। पर उसके बाद बिनोद बाबू का इस्तेमाल वामपंथियों ने अपनी राजनीति चमकाने के लिए किया। बिनोद बाबू एवं शिबू सोरेन को धोखे में रख कर उनके साथ-साथ चलते हुए वामपंथी उन्हें कमजोर करने की चेष्टा में लग चुके थे। वे दिखावे के लिए साथ थे, पर झारखंड़ अलग राज्य के आन्दोलन का समर्थन नहीं करके से गलत दिशा देने में लगे थे।
झारखंड़ में “नक्सलवाद” एक नया नाम लेकर उभरा। इसके नेताओं ने “लालखंड़” का नारा दिया। इसे ही झारखंड़ का विकल्प दिखलाया गया। कहा गया कि झारखंड़ को लालखंड़ में बदल डालो। कॉ0 राय ने तो “झारखंड़-लालखंड़” नामक पुस्तक 1980 में लिख डाली। निश्चय ही झारखंड़ अलग राज्य के आन्दोलन को रोकने के लिए ही यह नारा दिया गया। इस स्थिति ने एक संदेहात्मक स्थिति पैदा कर दी। अपने वामपंथी पृष्ठ भूमि के चलते तो बिनोद बाबू ने कॉ0 ए0 के0 राय को बरदास्त किया। पर शिबू-सोरेन इसे पचा नहीं पाते थे। पर कालान्तर में उनका कॉ0 ए0 के0 राय से भी गहरा मतभेद हो गया। बिनोद बाबू भी इस विषय पर खिन्न थे पर वे अपने काम में लगे रहे और वामपंथियों को झारखंड़ आन्दोलन में जोड़ते रहे।
1990 में श्री ए0 के0 राय ने झामुमो के खिलाफ विधान सभा चुनाव में अपना उम्मीद्वार सिन्दरी, निरसा, बाघमारा, मांडू, चन्दनकियारी आदि कई सीटें पर खड़ा कर दिया। लाल-हरा मैत्री को तोड़ दिया। अन्य क्षेत्रों में भी झामुमो का तालमेल अन्य वामपंथी दलों से टूट गया था। 1991 के लोक सभा चुनाव में धनबाद से कॉ0 राय हार गये। भुवनेश्वर मेहता सी0 पी0 आई0 हजारीबाग से जीते। भारतीय जनता पार्टी ने 1991 में झारखंड़ के 14 सीटों में से पाँच पर कब्जा किया। झामुमो ने छः सीटें लोकसभा के जीत ली थी। झामुमो के बढ़ते प्रभाव ने न सिर्फ वामपंथियों के जनाधार को खिसका दिया था, अपितु काँग्रेस का दक्षिण बिहार से सफाया ही कर दिया था।
1991 तक झारखंड़ क्षेत्र में उग्रवादी घटनाएँ बढ़ गई थी। “लालखंड़” के नाम पर माओवादी कम्यूनिष्ट सेंटर, पीपुल्स वार ग्रुप के अलावे झारखंड़ मुक्ति मंच का प्रभाव काफी बढ़ गया था। चुनाव बहिष्कार का नारा दिया गया और वोट-बहिष्कार किया जाने लगा। उन क्षेत्रों में वोट-वहिष्कार शुरू किया गया, जहाँ बिनोद बिहारी महतो ज्यादे सक्रिय थे। झामुमो ज्यादा सक्रिय था। स्पष्ट था कि वोट बहिष्कार झामुमो को हराने के उद्देश्य से ही किया जा रहा था।
झामुमो के आन्दोलन को आतंकवादी आन्दोलन कहा गया
मुरलीडीह कोलियरी की एक दिलचस्प घटना है। वहाँ पर बाहरी गुंड़ों एवं गाँव वालों के साथ अकसर गड़ाई होती रहती थी। विस्थापन की लड़ाई लड़ी जा रही थी। बिनोद बाबू का एक कार्यकर्त्ता जो पूरी तरह से उनका भक्त था उस कोलियरी के मुँहाने पर लगे हुए हेड-गियर पर चढ़ गया। हेड-गीयर का एक बड़ा सा ऊँचा मीनार, लोहे की पट्टियों के खम्भों से बनाया जाता है। कोयला निकालने के लिए जो सैकड़ों फीट नीचे कुँआ खोदा जाता है, उसके मुँह को पीट कहते है। इसी पीट के चारों तरफ लोहे के सौ-फीट, पच्चास फीट, खम्भें गाड़ कर वहाँ दो बड़ी घिरनियाँ लगाई जाती है। इन गोलाकार घिरनियों में लोहे के रस्से पार किए जाते हैं। और जिस प्रकार कुँए से बाल्टी में पानी निकालते है, उसी प्रकार नीचे से टबों में डालकर कोयले को उन्ही लोहे की रस्सियों द्वारा खींचकर बाहर निकाला जाता है।
अब माथुर महतो उसी हेड-गीयर के ऊपर घिरनी के पास बैठ गया था। छाता लिए हुए था। सुबह ही चढ़ गया था। सुबह पाली-सिफ्ट के बाद काम बंद कर देना पड़ा। वह नीचे कूद जाने की घमकी प्रबंधन के लोगों को देता जा रहा था। गर्मी का दिन था। वह बीड़ी पीता जाता, तथा खैनी यानि एक प्रकार का तम्बाकू खाता जाता। लाख समझाने पर भी वह नहीं माना। उसने सिर्फ एक ही शर्त्त रखी, कि जब तक बिनोद बाबू आकर उसे नहीं मनाएँगे तब तक वह नहीं उतरेगा। वहीं आवें। हमारे विस्थापितों का काम करायें। दूसरे दिन बिनोद बाबू सीधे कचहरी से वकील की पोशाक में ही मुरलीडीह पीट पर पहुँचे और तब जाकर माथुर महतो पीट के हैड-गीयर से उतरा।
यहाँ उनके द्वारा चलाए गये आन्दोलनों का विस्तृत विवरण नहीं दिया जा सकता है। संक्षेप में विरोध, प्रतिरोध का जो रास्ता बिनोद बाबू ने अपनाया था, वह अनूठा था। शोषणकर्त्ता स्तंभित हो जाता था। आतंकित हो जाता था। छोटी मछलियाँ जिस प्रकार बड़ी मछली के आक्रमण के पहले इकठ्ठा हो जाती हैं एवं सब मिलकर एक ऐसी आकृति बना लेती हैं जो बहुत बड़ी मछली के समान दिखे। इसी सिद्धान्त को बिनोद बाबू ने अपनाया था। आक्रामक तेवर उनलोगों में पैदा किया, जो बिलकुल निरीह थे। उनमें साहस का संचार किया।
प्रतिरोध को जन आन्दोलन का रूप दिया। अगर यह आन्दोलन सशस्त्र था, तो भी इसे आतंकवाद से जोड़ा जाना गलत होगा। आतंकवादी रात के अंधेरे में समूह में हमला करते थे और फरार हो जाते थे। ये अपनी पहचान छुपा कर चलते हैं। यहाँ तक कि छद्यनाम धारण कर लेते हैं। इनके काम करने का तरीका ही था कि चुपचाप वारदात कर डालो और फरार हो जाओ। आम जनता इनसें भयभीत रहती है। गाँव के लोगों को डरा-धमका कर उनसे खर्च करवाना। उनकी मुर्गियों, बकरियों को खा जाना। उन्हें धमकाकर रखना इनका काम था। इनकी कार्यशैली में अपराधिक मनोवृत्ति की स्पष्ट झलक है, चाहे इन वारदातों को वे किसी भी सिद्धान्त का जामा पहना दें। चाहे इसे माओवाद कहें या लेलीनवाद। वारदात करके पहचान छुपाना, पुलिस से बचके रहना, छुपके रहना। चुपके से वारदात करना। यह निश्चय ही आपराधिक कार्य हैं। पर खुला-दिन के उजाले में सशस्त्र प्रतिरोध एवं जेल जाने की मंशा लेकर आगे बढ़ना, दूसरी बात है। अपने कृत्यों को न्यायपूर्ण मानते हुए, एक बलिदान की भावना से आगे आना एक क्रांतिकारी सामाजिक परिवर्त्तन की ओर इशारा करता है। इशारा ही नहीं पथ-प्रदर्शित करता है।
बिनोद बाबू स्वयं वकील थे। इन आन्दोलनों से ऊपजे मुकदमें की देखभाल करने के लिए बुद्धिजीवि वर्ग खासकर वकीलों को प्रेरित करते थे कि वे मुफ्त इन दलित, वंचित, गरीब, शोषित के मुकदमों को लड़े। कई जिलों में उन्होंने ऐसे वकील पैदा किए, ढूँढ़ निकाले जो सुचारू रूप से उनके निर्देश पर काम करते थे। बिनोद बाबू जमीन अधिग्रहण के मामलों के विशेषज्ञ माने जाते थे। उन्होंने सरकार द्वारा कम कीमत पर ली गई जमीनों के विरूद्ध मुकदमें लड़े और विस्थापितों को उचित मुआवजा कोर्ट से दिलवाने का काम किया। पूरे देश में उन्होंने संभवत भू-अर्जन मामलों से संबधित जितने मुकदमें लड़े उतना बहुत विरले वकील ही लड़े होंगे। उन्होंने इससे बहुत पैसा कमाया, पर उस पैसे का अधिकत्तम भाग पार्टी चलाने, गरीबों को मदद करने तथा शैक्षणिक संस्थान खोलने में लगा दिए।
Monday, December 13, 2010
झामुमो के आन्दोलन को आतंकवादी आन्दोलन कहा गया
उन्ही दिनों 1971 में एक दिन एक नौजवान गोला प्रखंड के नेमरा गाँव से बिनोद बाबू के पास आया था। वह नौजवान था शिबू सोरेन।
सिद्धु कान्हू, चाँद भेरव, बाबा तिलका माँझी से लेकर बिरसा भगवान तक जो लड़ाई लड़ी गई वह वास्तव में जमीन के लिए लड़ी गयी लड़ाई ही थी।
1970 के दसक में ही गाँव के झगड़ों का निपटारा गाँव में ही बिनोद बाबू की प्रेरणा एवं निर्देश से किया जाने लगा। ग्रामीण अब थाना-पुलिस एवं कोर्ट कचहरी से बचने लगे थे। गाँव के समूहों का जो निर्णय होता, उसी को मानने लगे। नतीजा यह निकला कि कई जगहों पर बकायदा ग्रामीण कोर्ट बैठने लगे जिसमें क्रांतिकारी विचार धारा के लोग हिस्सा लेने लगे। पुलिस एवं कोर्ट-कचहरी से वैसे ही लोगों का विश्वास उठ चुका था। अतः इन गाँव के कोर्टो में मामले धड़ाधड़ आने लगे। गाँव वाले कभी-कभी उस इलाके के महाजनों एवं जालिम जमींदारों की शिकायत लेकर आ जाते। तब निर्णय लेना कठिन हो जाता था, क्योंकि आरोपी एक शक्तिशाली व्यक्ति होता था जिसके हाथ मजबूत एवं लम्बे होते थे। ऐसे अवसर पर बिनोद बाबू को बुलाया जाता। बिनोद बाबू नहीं होते तो शिबू सोरेन को बुलाया जाता। वहाँ तथ्यों की सुनवाई रात-भर होती और सर्व सम्पति से निर्णय लिए जाते। अति अत्यचारी व्यक्ति के खिलाफ “बिटलाहा” का आदेश होता। कम अत्याचारी के खेतों पर जबरन कब्जा किये जाने का निर्णय होता, जिन खेतों को महाजन गलत तरीके से हड़प लेते थे। सैकड़ों की तादाद में गाँव वाले हरवे-हथियार से लैस होकर निकलते और दिन के उजाले में निर्णयों को लागू करते। “बिटलाहा” के आदेश पर गाँव वाले अत्याचारी के घर पर धावा बोलते और उसकी सम्पति को नुकसान पहुँचा देते। पर घर के महिलाओं, बच्चों पर कोई आँच नहीं आने देते। मर्द जमींदार अगर मुकाबलें में डटते तो उनके साथ मुकाबला होता। कई जगहों पर कार्यकर्त्ता मारे गये। कहीं-कहीं आततायियों के सर भी कलम कर दिए गये।
इन ग्रामीण कचहरियों का फैलाव होता गया। यहाँ तक कि गाँव तीन-पतली, जिला गिरिडीह में गुणेश्वर हाँसदा के नेतृत्व में ग्रामीण सुप्रीम कोर्ट बन गया।
इस प्रकार सीधी कार्यवाही के आन्दोलन ने जोर पकड़ा एवं यह आम जनता का आन्दोलन बन गया। चारों तरफ स्थिति तनावपूर्ण बन गई थी। पुलिस-प्रशासन की सक्रियता के बावजूद आन्दोलन रूकने का नाम नहीं ले रहा था। लोगों के अंदर आत्म बल इतना बढ़ गया था कि अन्याय के खिलाफ स्वतः र्स्फूत आन्दोलन होने लगे। प्रत्येक गाँव में नौजवान नेता, कार्यकर्त्ता तैयार होने लग गये थे।
1973 के आते-आते प्रशासन ने बिनोद बिहारी महतो पर समान्तर सरकार चलाने का आरोप लगा दिया।
समान्तर सरकार कहें या इसका कुछ और नाम दें। यह तो इसलिए उपजा था कि तत्कालिन व्यवस्था में झारखंड़ी पीस रहे थे। उस तत्कालीन व्यवस्था में उनकी समस्याओं का निदान उन्हें दूर तक दिखाई नहीं देता था। स्वाभाविक था कि वे स्वंय अपनी समस्याओं के समाधान के लिए आगे आते तथा स्व-शासन की ओर प्रेरित होते। पुराने मानकी-मुंड़ा-महतोई परगनैत आदि आदिवासी जनजाति शासन पद्धति की ओर बढ़े जो उनकी अपनी परम्परागत एवं रीति-रिवाज की उपज थी। जो उनका अपना स्वशासन था और जिसको उन्हें मजबूरी में छोड़ना पड़ा था। ब्रिटिश हुकुमत की व्यवस्था को अपनाना पड़ा था। उसी व्यवस्था को अपनाना पड़ा था। वही व्यवस्था हू-बू-हू स्वतंत्र भारत में भी लागू की गई थी। जाहिर है कि जनजातियों का आक्रोश उसी ब्रिटिश व्यवस्था को बल पूर्वक झारखंड़ी व्यवस्था पर लागू करने के विरूद्ध था। इसके लिए कितनी ही लड़ाइयाँ पूर्व में लड़ी गई थी। अतः पूनः स्वशासन की तरफ लोट जाने का आह्वान जो बिनोद बाबू ने दिया था, वह सबको ग्राह्य था। पर यह आन्दोलन था तो व्यवस्था-विरोधी। पर इसे व्यवस्था-विरोधी भी कहना गलत ही होगा। क्योंकि पंच-परमेश्वर है- यह सिद्धांत भारत वर्ष में हजारों वर्षो से चलता रहा है एवं लागू होता रहा है। तो अगर बिनोद बाबू ने फिर गाँव में ही पंचायत बुलाकर समस्याओं के समाधान की ओर कदम बढ़ाया तो उसे गलत कैसे कहा जा सकता है।
पर, गलत कहा गया। आरोप लगाए गये। ब्रिटिश शाषन-पद्धति जो आजाद भारत में हू-ब-हू लागू की गयी, उसके हित में बिनोद बाबू के कार्य कलाप नहीं थे। वे आम जनता के हित में थे। उनपर मुकदमे लादे गये। उन्हें आतंकवादी नेता करार कर दिया गया। और झामुमो के आन्दोलन को आतंकवादी आन्दोलन।
विस्थापन के विरूद्ध लड़ाई किस प्रकार लड़ी गई ? इसका जो तरीका बिनोद बाबू ने आख्तीयार किया वह भी नायाब था। अद्भूत था। टाटा कम्पनी की खदानें जिला धनबाद के जामाडोबा, डूंगरी, पटिया, भौंरा क्षेत्रों में है। साथ ही सिजुआ-भेलाटाँड़ में। फिर हजारीबाग के मांडू इलाके में कई खदानें हैं। टाटा कम्पनी वह कम्पनी है जिसकी कोयला-खदानों का राष्ट्रीयकरण नहीं किया गया। “केपटिव माइन्स” के दायरे में रखकर उन्हें राष्ट्रीयकरण से बाहर रखा गया। टाटा कम्पनी की जमशेदपुर में स्टील उत्पादन का विशाल कारखाना है। सिंहभूम जिले में लौह-अयस्क को गलाने के लिए कोयले की आवश्यकता पड़ती है। इस कम्पनी में सिर्फ कांग्रेस एवं उसकी यूनियन चलती थी। और किसी की भी बात सुनी नहीं जाती थी। टाटा कम्पनी अपने गुंड़ो के बल पर जो काँग्रेस की यूनियन के लोग होते थे और झारखंड़ से बाहरी मूल के होते थे, पूरे इलाके को आतंकित करके रखती थी। अगल बगल के गाँव के लोग जबान तक खोल नहीं सकते थे।
ऐसे माहौल में टाटा कम्पनी से विस्थापितों के लिए न्याय माँगना नक्कारखाने में तूती की आवाज साबित हो रही थी। पर बिनोद बाबू ने माँग नहीं, माँग करके जामाडोबा के पास बहती जोड़िया यानि छोटी नाली को अपने आन्दोलन का स्थल चुना। उन्होंने एक स्थान पर गाँव वालों को इकठ्ठा किया और गैंता-कुदाल लेकर स्वयं जोड़िया में उतरे। उनके पीछे सैकड़ों लोग थे। सभी मिलकर वहाँ पर मिट्टी से जोड़िया पर बाँध बाँधने लगे। अगल बगल के कॉलोनी निवासी एवं टाटा के ऑफिसरों ने सोचा कि ये लोग पागल हो गये हैं। नाला बाँधने से कहीं आन्दोलन होता है। पर जब बाँध बँध गया, दिनभर की मेहनत से, तभी लोगों को इसका प्रभाव नजर आया। पानी जमा हो गया और यह पानी बगल के कोयले की खदान में घुसने लगा। टाटा कम्पनी के ऑफिसरों को तब चिंता हुई कि अगर इसी तरह पानी घूसता रहा तो खदान बंद कर देना पड़ेगा। तब सिक्यूरिटी के लोग आए। बिनोद बाबू ने कहा कि यह जोड़िया सार्वजनिक सम्पत्ति है और इसमें बाँध-बाँधकर के गाँव के लोग अपने खेत की सिंचाई की व्यवस्था कर रहें हैं। इसे रोकने का अधिकार टाटा कम्पनी को नहीं है।
इसके बाद टाटा कम्पनी को झूकना पड़ा और वार्त्ता हुई तथा गाँव वालों एवं विस्थापितों की समस्याओं पर ध्यान दिया गया। नियोजन की पहल शुरू हुई। इस तरह के जन आन्दोलनों के चलते ही बड़ी-बड़ी कम्पनियों को विस्थपितों पर ध्यान देना पड़ा। भारत कोकिंग कोल लिमिटेड की कोलियारी में पहुँचने के लिए गाँव के रास्तों से फिर या तो रैयती जमीनों से होकर गुजरना जरूरी था। कोयला ट्रान्सपोर्ट रोड से करने के लिए, अफसरों के आवागमन के लिए, भीतर गाँव तक तथा खदानों तक जाने के लिए बीसीसीएल द्वारा जमीन अधिग्रहित नहीं की गई थी। लिहाजा बिनोद बाबू ने इन रास्तों को रोकवाना शुरू किया। बहुत सारी जमीनों पर बीसीसीएल ने जबरन कब्जा किया था। उन जमीनों पर मशीनों को चलाने पर रोक लगा दी गई। मशीनों पर झंड़े गाड़े गये।
झामुमो के आन्दोलन को आतंकवादी आन्दोलन कहा गया
झामुमो के जन्म ने तथा इसके जमीनी आन्दोलन ने दलितों एवं पिछड़ो, आदिवासियों, गरीबों तथा मजदूर वर्ग के अन्दर जुझारूपन पैदा किया। अगर कोई दबंग व्यक्ति, बलशाली, सामंत, पूँजीपति यानि सूदखोर, महाजन आदि किसी गरीब आदिवासी संथाल की जमीन हड़प ले, उसपर जबरन कब्जा कर ले, तो वह व्यक्ति क्या करें ? कोर्ट जाये जहाँ कि, न्यायलय की लम्बी प्रक्रिया एवं खर्चे को उठा पाना उसके लिए असंभव है। पुलिस प्रशासन के पास जायें, जहाँ थानों पर ही न्याय की निलामी हो जाए। पुलिस को अपने पक्ष में पहले से ही बना लिया जाय, सूदखोरों एवं महाजनों, पूँजूपतियों द्वारा तो पीड़ित को वहाँ न्याय नहीं मिलना। आखिर उसके पास रास्ता क्या है ? किसी राजनैतिक संगठन के पास जाना ही उसका विकल्प बचता है। पर वहाँ क्या होता है । राजनैतिक दल अगर उसके मामले को उठाता है, तो वह दल क्या करेगा ? चिट्ठी लिखेगा, पार्टी पदाधिकारियों की नहीं सुनी जायेगी। तब धरना देगी। नहीं सुनी जायेगी। तब अजीज आकर बड़ी तैयारी करके प्रर्दशन, जूलुस करेगा। प्रशासन यानि न्यायदाता अगर उससे भी नहीं जागे, तो राजनैतिक दल उसके आगे क्या कर सकता है ? या क्या करना चाहिए ? यह एक बड़ा प्रश्न चिन्ह है।
आदिवासी, हरिजन, दलितों की जूलुसों पर, मजदूर वर्ग के जूलुसों का किस प्रकार से दमन होता आया है, सभी जानते है। देश में आदिवासियों का सामुहिक कत्ल तक इन जूलुसों में किया जाता रहा है। निर्ममता पूर्वक लाठियाँ बरसाई गई है। गोलियाँ चलाई गई हैं। एक नहीं इसके कई उदाहरण हैं। झारखण्ड में तो सिर्फ झारखण्ड के नाम पर मीटिंग या सभा करने पर ही नरसंहार किए गए है।
तो आखिर कोई क्या करे। अन्याय के खिलाफ शोषण के विरूद्ध वह भी सरकारी शोषण के विरूद्ध झारखण्ड का आदमी क्या करें ? किस स्तर पर और कौन सी लड़ाई लड़े, जिससे उन्हें, न्याय मिल सके। शोषण से मुक्ति मिल सके।
एक ही रास्ता बचता है। वह रास्ता बहुत कठिन है। उस रास्ते पर चलने के लिए बहुत बड़े हिम्मत की जरूरत पड़ती है। वह रास्ता तो यही है कि सीधे शोषणकर्त्ता पर वार हो। उसे शारीरिक क्षति पहुँचाई जाय। जान का डर पैदा किया जाय। जान है तो जहान है। इसका अहसास उस जुल्मी के अन्दर हो। तभी वह भयभीत होगा, डरेगा, अन्याय करने से। शोषण करने से। पर इस रास्ते पर कमजोर व्यक्तियों को चलाना, उनमें वह संघर्ष का माद्दा पैदा करना, सीधी कार्यवाही के लिए उन्हें आगे बढ़ाना, कितना कठिन काम हो सकता है यह नेतृत्व कर्त्ता ही जान सकता है। भयभीत, डरे हुए, दबे हुए, कुचले हुए लोगों के लिए सर उठाकर चलना ही कठिन होता है। जो हाथ जोड़े रहते है, या अपने हाथ बगलों में दबाए, सर झुकाए धीमी आवाज में बोलने के आदी है, उन्हें सर सीधा करके, सीना तान करके हाथ ऊपर उठाकर नारें तक दिलवाना कठिन काम होता है। उन हाथों में कुछ कर गुजरने के लिए स्पंदन पैदा करना तो बहुत ही कठिन काम है।
झारखण्ड में कोई रास्ता नहीं बचा था। अभिशप्त झारखण्ड में आदमी अपने आप को नहीं पहचान रहा था। ऐसी परिस्थिति में बिनोद बिहारी महतो के अंदर ऐसी सोच किस प्रकार पैदा हुई, यह एक अनुसंधान का विषय हो सकता है। है भी।
1970 की एक दुपहरिया थी। पाँच छः आदिवासी-संथाल जाति के लोग बिनोद बिहारी महतो के निवास पर आए थे। उन दिनों बिनोद बाबू हीरापुर, धनबाद शहर में रेजिस्ट्री ऑफिस के निकट एक मकान में किराए पर रहा करते थे। कचहरी से वे दोपहर को लोटे थे। मार्निग कोर्ट था। वरांडे में आदिवासी जमीन पर बैठे हुए थे। दुबले-पतले। देखने से ही कुपोषण का शिकार से लगते थे। शरीर पर एक छोटी धोती लपेटे थे। आँख धँसी हुई। काले लोग। हाथों में छोटी सा टाँगी। या फिर छोटी लाठी थी। चुपचाप थे। यहाँ तक कि जब बिनोद बाबू ने उन्हें थोड़ी देर रूकने को कहा तो भी वे कुछ नहीं बोले।
दस मिनट के बाद बिनोद बाबू उन लोगों के पास आए और अपने बैठक खाना जो उनके वकालत का भी दफ्तर था, उन्हें उसमें बुला ले गये। उन्होंने उनकी समस्या पूछी स्थानीय कुड़माली भाषा में। संथाल कुरमाली समझते भी है, और बोलते भी है। उन आदिवासी संथालों ने कहा कि उनकी जमीन का जो कागजात उनके पास है, उसमें दखल का जो घर है यानि कालम है, उसमें चौधरी का नाम, लिखा हुआ है, जबकि मालिक संथालों को दिखाया गया है तथा जमीनें उनके दखल-कब्जे में भी है। वे ही धान उगाते हैं। खेत जोतते हैं। काटते हैं। पर धान को काटने के बाद चौधरी के खलिहान में ले जाकर जमा कर देते हैं। ऐसा इसलिए करना पड़ता है कि उन्हें चौधरी का कर्ज चुकाना है।
यह टुण्डी प्रखंड जिला धनबाद के गाँव पोखरिया की बात है। बिनोद बाबू ने उन आदिवासियों से पुछा कि कब उन लोगों ने कर्ज लिया था और कितना लिया था। जबाव मिला कि उनलोगों के पिताजी ने वर्षो पूर्व दो सौ रूपया कर्ज लिया और वह जमान चौधरी को सोंप दिया था। बंधक रख दिया था। बचपन से ही उनलोगों ने देखा है कि उनके बाप-दादे भी अपना धान चौधर के खलिहान में पहुँचाते रहे थे। उनकी ही जमीन। वे ही खती करते हैं। वे ही धान भी आज तक देते आए हैं, पर अभी तक खेत बंधक से मुक्त नहीं हो पाया चौधरी कहता है कि अभी सूद ही नहीं चुका है।
बिनोद बाबू कुछ सोच रहे थे। आदिवासियों ने उनसे गिड़गिड़ाकर कहा कि वे ऐसी व्यवस्था कर दे ताकि दखल के घर में उनका नाम सरकार चढ़ा दें और जमीन उनकी हो जाय। आदिवासियों की इस समझ पर बिनोद बाबू को आश्चर्य नहीं हुआ। इस प्रकार के सैकड़ो मामले उनकी नजर में आ चुके थे। पर तबतक वे कोई रास्ता निकाल नहीं पाये थे। अगर कोर्ट में मुकदमा दायर करें तो क्या नतीजा निकलेगा, उन्हें मालूम था। ये आदिवासी कोर्ट दौड़ते दौड़ते ही थक जाएगें। पर मिलेगा कुछ नहीं। आर्थिक हालात उन आदिवासियों की स्पष्ट थी। उनके पहनावे, उनका चेहरा ही उनकी कहानी कह रहा था।
उन्होंने बहुत सोचने के बाद कहा कि तुम लोग एक काम करो। इस बार तुमलोग खेत जोतो। धान लगावो। काटो। काटने के बाद धान को चौधरी के खलिहान में जमा मत करो। उस धान को अपने धर में ले जाकर रख दो। सरकार खुद-ब-खुद दखल के धर में तुम्हारा नाम लिख देगा। और कुछ करने की आवश्यकता नहीं है।
आदिवासियों को यह काम बड़ा आसान लगा। पर बिनोद बाबू जानते थे कि आदिवासी अगर ऐसा कर देते हैं तो उसके बाद क्या हो सकता है। दमन-चक्र किस प्रकार उन पर चलाया जायेगा। पर देखें तो आदिवासी क्या करते है, यह सोचकर उन्होंने उनको चले जाने को कहा और फिर धान काट लेने के बाद उनसे मिलने को कह दिया। इसके बाद शुरू हो गया, झारखंड का प्रसिद्ध “धान-कटनी” आन्दोलन। उन आदिवासियों ने वही किया जो बिनोद बाबू ने कहा था। उसकी देखा-देखी गाँव के दूसरे आदिवासियों ने जिनके जमीनें बधंक थी, वही किया। बगल के गाँवों में भी वही काम शुरू हो गया। उसी वर्ष इस कार्य ने एक आन्दोलन का रूप ले लिया। महाजनों, जमींदारों, सूदखोरों को कुछ समझ ही नहीं आया। वे सकते में आ गये। पुलिस को सक्रिय किया गया। दमन शुरू हुआ। मुकदमें दायर होने लगे। पर उसके बाद स्वतः ही आदिवासी लोग संगठीत होने लग गये। मीटिंग करने लगे। अपनी रक्षा के लिए बिनोद बाबू को बुलाने लगे। आदिवासियों के झुंड़ के झुंड़ तीर-धनुष, टाँगी से लैस होकर घूमने लगे। बड़े-बड़े जूलुस बिनोद बाबू के नेतृत्व में होने लगे।
झामुमो के आन्दोलन को आतंकवादी आन्दोलन कहा गया
झामुमो के जन्म ने तथा इसके जमीनी आन्दोलन ने दलितों एवं पिछड़ो, आदिवासियों, गरीबों तथा मजदूर वर्ग के अन्दर जुझारूपन पैदा किया। अगर कोई दबंग व्यक्ति, बलशाली, सामंत, पूँजीपति यानि सूदखोर, महाजन आदि किसी गरीब आदिवासी संथाल की जमीन हड़प ले, उसपर जबरन कब्जा कर ले, तो वह व्यक्ति क्या करें ? कोर्ट जाये जहाँ कि, न्यायलय की लम्बी प्रक्रिया एवं खर्चे को उठा पाना उसके लिए असंभव है। पुलिस प्रशासन के पास जायें, जहाँ थानों पर ही न्याय की निलामी हो जाए। पुलिस को अपने पक्ष में पहले से ही बना लिया जाय, सूदखोरों एवं महाजनों, पूँजूपतियों द्वारा तो पीड़ित को वहाँ न्याय नहीं मिलना। आखिर उसके पास रास्ता क्या है ? किसी राजनैतिक संगठन के पास जाना ही उसका विकल्प बचता है। पर वहाँ क्या होता है । राजनैतिक दल अगर उसके मामले को उठाता है, तो वह दल क्या करेगा ? चिट्ठी लिखेगा, पार्टी पदाधिकारियों की नहीं सुनी जायेगी। तब धरना देगी। नहीं सुनी जायेगी। तब अजीज आकर बड़ी तैयारी करके प्रर्दशन, जूलुस करेगा। प्रशासन यानि न्यायदाता अगर उससे भी नहीं जागे, तो राजनैतिक दल उसके आगे क्या कर सकता है ? या क्या करना चाहिए ? यह एक बड़ा प्रश्न चिन्ह है।
आदिवासी, हरिजन, दलितों की जूलुसों पर, मजदूर वर्ग के जूलुसों का किस प्रकार से दमन होता आया है, सभी जानते है। देश में आदिवासियों का सामुहिक कत्ल तक इन जूलुसों में किया जाता रहा है। निर्ममता पूर्वक लाठियाँ बरसाई गई है। गोलियाँ चलाई गई हैं। एक नहीं इसके कई उदाहरण हैं। झारखण्ड में तो सिर्फ झारखण्ड के नाम पर मीटिंग या सभा करने पर ही नरसंहार किए गए है।
तो आखिर कोई क्या करे। अन्याय के खिलाफ शोषण के विरूद्ध वह भी सरकारी शोषण के विरूद्ध झारखण्ड का आदमी क्या करें ? किस स्तर पर और कौन सी लड़ाई लड़े, जिससे उन्हें, न्याय मिल सके। शोषण से मुक्ति मिल सके।
एक ही रास्ता बचता है। वह रास्ता बहुत कठिन है। उस रास्ते पर चलने के लिए बहुत बड़े हिम्मत की जरूरत पड़ती है। वह रास्ता तो यही है कि सीधे शोषणकर्त्ता पर वार हो। उसे शारीरिक क्षति पहुँचाई जाय। जान का डर पैदा किया जाय। जान है तो जहान है। इसका अहसास उस जुल्मी के अन्दर हो। तभी वह भयभीत होगा, डरेगा, अन्याय करने से। शोषण करने से। पर इस रास्ते पर कमजोर व्यक्तियों को चलाना, उनमें वह संघर्ष का माद्दा पैदा करना, सीधी कार्यवाही के लिए उन्हें आगे बढ़ाना, कितना कठिन काम हो सकता है यह नेतृत्व कर्त्ता ही जान सकता है। भयभीत, डरे हुए, दबे हुए, कुचले हुए लोगों के लिए सर उठाकर चलना ही कठिन होता है। जो हाथ जोड़े रहते है, या अपने हाथ बगलों में दबाए, सर झुकाए धीमी आवाज में बोलने के आदी है, उन्हें सर सीधा करके, सीना तान करके हाथ ऊपर उठाकर नारें तक दिलवाना कठिन काम होता है। उन हाथों में कुछ कर गुजरने के लिए स्पंदन पैदा करना तो बहुत ही कठिन काम है।
झारखण्ड में कोई रास्ता नहीं बचा था। अभिशप्त झारखण्ड में आदमी अपने आप को नहीं पहचान रहा था। ऐसी परिस्थिति में बिनोद बिहारी महतो के अंदर ऐसी सोच किस प्रकार पैदा हुई, यह एक अनुसंधान का विषय हो सकता है। है भी।
1970 की एक दुपहरिया थी। पाँच छः आदिवासी-संथाल जाति के लोग बिनोद बिहारी महतो के निवास पर आए थे। उन दिनों बिनोद बाबू हीरापुर, धनबाद शहर में रेजिस्ट्री ऑफिस के निकट एक मकान में किराए पर रहा करते थे। कचहरी से वे दोपहर को लोटे थे। मार्निग कोर्ट था। वरांडे में आदिवासी जमीन पर बैठे हुए थे। दुबले-पतले। देखने से ही कुपोषण का शिकार से लगते थे। शरीर पर एक छोटी धोती लपेटे थे। आँख धँसी हुई। काले लोग। हाथों में छोटी सा टाँगी। या फिर छोटी लाठी थी। चुपचाप थे। यहाँ तक कि जब बिनोद बाबू ने उन्हें थोड़ी देर रूकने को कहा तो भी वे कुछ नहीं बोले।
दस मिनट के बाद बिनोद बाबू उन लोगों के पास आए और अपने बैठक खाना जो उनके वकालत का भी दफ्तर था, उन्हें उसमें बुला ले गये। उन्होंने उनकी समस्या पूछी स्थानीय कुड़माली भाषा में। संथाल कुरमाली समझते भी है, और बोलते भी है। उन आदिवासी संथालों ने कहा कि उनकी जमीन का जो कागजात उनके पास है, उसमें दखल का जो घर है यानि कालम है, उसमें चौधरी का नाम, लिखा हुआ है, जबकि मालिक संथालों को दिखाया गया है तथा जमीनें उनके दखल-कब्जे में भी है। वे ही धान उगाते हैं। खेत जोतते हैं। काटते हैं। पर धान को काटने के बाद चौधरी के खलिहान में ले जाकर जमा कर देते हैं। ऐसा इसलिए करना पड़ता है कि उन्हें चौधरी का कर्ज चुकाना है।
यह टुण्डी प्रखंड जिला धनबाद के गाँव पोखरिया की बात है। बिनोद बाबू ने उन आदिवासियों से पुछा कि कब उन लोगों ने कर्ज लिया था और कितना लिया था। जबाव मिला कि उनलोगों के पिताजी ने वर्षो पूर्व दो सौ रूपया कर्ज लिया और वह जमान चौधरी को सोंप दिया था। बंधक रख दिया था। बचपन से ही उनलोगों ने देखा है कि उनके बाप-दादे भी अपना धान चौधर के खलिहान में पहुँचाते रहे थे। उनकी ही जमीन। वे ही खती करते हैं। वे ही धान भी आज तक देते आए हैं, पर अभी तक खेत बंधक से मुक्त नहीं हो पाया चौधरी कहता है कि अभी सूद ही नहीं चुका है।
बिनोद बाबू कुछ सोच रहे थे। आदिवासियों ने उनसे गिड़गिड़ाकर कहा कि वे ऐसी व्यवस्था कर दे ताकि दखल के घर में उनका नाम सरकार चढ़ा दें और जमीन उनकी हो जाय। आदिवासियों की इस समझ पर बिनोद बाबू को आश्चर्य नहीं हुआ। इस प्रकार के सैकड़ो मामले उनकी नजर में आ चुके थे। पर तबतक वे कोई रास्ता निकाल नहीं पाये थे। अगर कोर्ट में मुकदमा दायर करें तो क्या नतीजा निकलेगा, उन्हें मालूम था। ये आदिवासी कोर्ट दौड़ते दौड़ते ही थक जाएगें। पर मिलेगा कुछ नहीं। आर्थिक हालात उन आदिवासियों की स्पष्ट थी। उनके पहनावे, उनका चेहरा ही उनकी कहानी कह रहा था।
उन्होंने बहुत सोचने के बाद कहा कि तुम लोग एक काम करो। इस बार तुमलोग खेत जोतो। धान लगावो। काटो। काटने के बाद धान को चौधरी के खलिहान में जमा मत करो। उस धान को अपने धर में ले जाकर रख दो। सरकार खुद-ब-खुद दखल के धर में तुम्हारा नाम लिख देगा। और कुछ करने की आवश्यकता नहीं है।
आदिवासियों को यह काम बड़ा आसान लगा। पर बिनोद बाबू जानते थे कि आदिवासी अगर ऐसा कर देते हैं तो उसके बाद क्या हो सकता है। दमन-चक्र किस प्रकार उन पर चलाया जायेगा। पर देखें तो आदिवासी क्या करते है, यह सोचकर उन्होंने उनको चले जाने को कहा और फिर धान काट लेने के बाद उनसे मिलने को कह दिया। इसके बाद शुरू हो गया, झारखंड का प्रसिद्ध “धान-कटनी” आन्दोलन। उन आदिवासियों ने वही किया जो बिनोद बाबू ने कहा था। उसकी देखा-देखी गाँव के दूसरे आदिवासियों ने जिनके जमीनें बधंक थी, वही किया। बगल के गाँवों में भी वही काम शुरू हो गया। उसी वर्ष इस कार्य ने एक आन्दोलन का रूप ले लिया। महाजनों, जमींदारों, सूदखोरों को कुछ समझ ही नहीं आया। वे सकते में आ गये। पुलिस को सक्रिय किया गया। दमन शुरू हुआ। मुकदमें दायर होने लगे। पर उसके बाद स्वतः ही आदिवासी लोग संगठीत होने लग गये। मीटिंग करने लगे। अपनी रक्षा के लिए बिनोद बाबू को बुलाने लगे। आदिवासियों के झुंड़ के झुंड़ तीर-धनुष, टाँगी से लैस होकर घूमने लगे। बड़े-बड़े जूलुस बिनोद बाबू के नेतृत्व में होने लगे।
Sunday, November 7, 2010
झामुमो में दो धाराओं का जन्म
पर जो सबसे आश्चर्य की बात हुई, वह यह थी कि झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के महामंत्री शिबू सोरेन आपातकाल में जेल नहीं गये। क्या उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया ? और अगर गिरफ्तार किया गया था तो तुरंत छोड़ा कैसे गया। पाया गया कि शिबू सोरेन ने बिहार के तत्कालिन मुख्यमंत्री जगरन्नाथ मिश्रा से मिलकर समझौता कर लिया तथा काँग्रेस की नीतियों का समर्थन कर दिया। इस प्रकार काँग्रेस को समर्थन देने एवं काँग्रेस विरोधियों से अलग हो जाने के कारण शिबू सोरेन जेल जाने से बच गये। आपात काल में इसी कारण 1975 में चार फरवरी का झारखण्ड मुक्ति मोर्चा का स्थापना दिवस शिबू सोरेन ने अलग से टुण्डी मे मनाया जिसमें बतौर मुख्य अतिथि जगरनाथ मिश्रा शरीक हुए। धनबाद के गोल्फ मैदान में स्थापना दिवस मनाने के लिए कोई बड़ा नेता नहीं बचा था, सभी जेल की हवा खा रहे थे। उस साल राज किशोर महतो के नेतृत्व में वहाँ स्थापना दिवस मनाया गया। फिर भी भीड़ उमड़ पड़ी थी।
शिबू सोरेन ने आपात काल 1975 में जो बिनोद बाबू का साथ छोड़ा तो सीधे काँग्रेस में शामिल हो गये और वहीं जम गये। करीब तीन वर्षो तक बिनोद बाबू अकेले रहे एवं आन्दोलन करते रहे। उनके सहयोगी ऐ0 के0 राय रह गये थे। श्री सोरेन 1977 के लोक-सभा चुनाव तक काँग्रेस के साथ रहे।
1977 में जे0 पी0 आन्दोलन के समय लोक-सभा का चुनाव आया तो बिनोद बिहारी महतो एवं ऐ0 के0 राय को गिरिडीह एवं धनबाद लोक-सभा से चुनाव लड़वाने का फैसला लोक नायक जय प्रकाश नारायण ने ले लिया था। उस समय जनसंघ आदि पाटियों ने मिलकर “जनता पार्टी” बनाई थी।
व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा हमेशा से ही एकता में बाधक रही है। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से श्री ऐ0 के0 राय भी ग्रस्त हो गये एवं उनके समर्थकों ने धनबाद लोक-सभा सीट के लिए जनता पार्टी का समर्थन काँग्रेस के विरूद्ध श्री राय के लिए ले लिया। गिरिडीह की सीट में कुछ ऐसी हालात उनके समर्थकों ने पैदा किया कि बिनोद बाबू को बहला फुसला कर पटना से धनबाद वापस ले आया गया और वह समर्थन रामदास सिंह जी को गिरिडीह लोक-सभा के लिए मिला। ऐसा बिनोद बाबू के समर्थक दल मासस के तत्कालीन महासचिव उमाशंकर शुक्ल एवं के0 पी0 भट्ट ने किया श्री राय जेल में थे और बिनोद बाबू को भी वहाँ से हटा दिया गया था। जो लोग सीटों पर बात करने गये थे उन्होनें राय के लिए सीट माँग ली, पर बिनोद बाबू के लिए नहीं। 1977 का चुनाव बिनोद बाबू अकेले लड़े। उस लोक सभा चुनाव में काँग्रेस के टिकट से डा0 इम्तियाज अहमद (डा0 शब्बा अहमद के पिता ) गिरिडीह से लड़ रहें थे। शिबू सोरेन इस चुनाव में काँग्रेस की तरफ से खुलकर प्रचार-प्रसार कर रहें थे। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के उम्मीदवार तीर-धनुष चिन्ह से चुनाव लड़ने वाले पार्टी के अध्यक्ष बिनोद बाबू के खिलाफ शिबू सोरेन काँग्रेस के उम्मीदवार को जिताने में लगे थे। इधर ऐ0 के0 राय अपने को संयुक्त उम्मीद्वार बताकर लड़ रहें थे और बिनोद बाबू के समर्थकों शिबा महतो बगैरह को लेकर बिनोद बाबू का विरोध गिरिडीह में कर रहें थे एवं साझा उम्मीद्वार रामदास सिंह का समर्थन कर थे।
झामुमो के शुरूआती दिनों में ही इसे एक जबरजस्त झटका लगा। पर बिनोद बाबू ने इन बातों को बहुत गहराई से नहीं लिया। पुनः अपने काम में लग गये। हॉलाकि उसी साल नवम्बर के महिने में उन्हें प्रथम बार दिल का दौरा पड़ा।
1977 के लोक-सभा चुनाव में काँग्रेस की बुरी तरह हार हुई। श्रीमती इन्दिरा गाँधी स्वयं चुनाव हार गई। केन्द्र में जनता पार्टी की सरकार बन गई। शिबू सोरेन फिर डर गये एवं इधर-उधर भटकने लगे। फिर धनबाद लोटे एवं श्री ऐ0 के0 राय को पकड़ा। ऐ0 के0 राय के अनुरोध करने पर बिनोद बाबू ने पुनः शिबू सोरेन को दुमका यानि संथाल परगना भेज दिया। टुंडी के पोखरिया आश्रम में अब शिबू सोरेन नहीं जा सकते थे, क्योंकि काँग्रेस में शामिल होने एवं बिनोद बाबू को छोड़ने के कारण वहाँ आदिवासी समर्थक बहुत गुस्से में थे।
फिर 1980 के आम चुनाव के पहले से ही इस बात के संकेत मिलने लग गये थे कि पुराने आदिवासी (जनजाति) नेताओं की तरह ही शिबू सोरेन काँग्रेस की निकटता प्राप्त करना चाहते थे, उससे समझौता करके चलाना चाहते थे, विरोध करके नहीं। यही बात श्री राय एवं बिनोद बाबू को पसंद नहीं थी। 1980 के विधान सभा चुनाव में झारखण्ड मुक्ति मोर्चा एवं मासस को चौदह सीटें मिली थी। शिबू सोरेन चुँकि संथाल परगना देख रहे थे, उन्होनें चुपके से काँग्रेस से भीतर-भीतर तालमेल कर लिया, पर उत्तरी छोटानागपुर में सीटें काँग्रेस के विरोध में लड़ी गई।
1980 के लोक सभा चुनाव में श्री सोरेन से काँग्रेस से गुपचुप समझौता कर लिया और दुमका लोक सभा सीट से मात्र तीन हजार मत से जीत गये। श्री राय 1977 में ही सांसद बन गये थे। फिर 1980 में भी धनबाद से जीते। बिनोद बाबू 1980 में भी गिरिडीह लोक-सभा चुनाव हार गये।
1983, जनवरी में हुए महाधिवेशन के बाद जब बिनोद बाबू ने पार्टी का अध्यक्ष पद छोड़ा तो शिबू-सोरेन, शैलेन्द्र महतो, सूरज मंडल आदि ने गुटबाजी शुरू कर दी। बिनोद बाबू इन बातों की खबर भी रखना नहीं चाहते थे। धीरे-धीरे यह परिस्थिति ऐसी पैदा हो गई कि झामुमो में दो फाँक हो गया। बिनोद बाबू के तरफ शहीद शक्ति नाथ महतो, कॉ0 ऐ0 के0 राय (सांसद धनबाद) के0 एस0 चटर्जी (निरसा विधायक), आनन्द महतो (सिन्दरी विधायक), टेकलाल महतो (मांडू विधायक), शंकर किशोर महतो (लाठाटाँड़), शिबा महतो (डूमरी विधायक) आदि हो गये तथा एक अलग ही गुट बनाने का निश्चय किया गया। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा (बिनोद) गुट से बिनोद बाबू के साथ रहने वालों, साथ देने वालों को जाना जाने लगा। विधिवत् रूप से इस दल का पंजीकरण करने के लिए चुनाव आयोग में लिखा गया। पर इसी बीच शिवा महतो जी के प्रयास से डुमरी में फिर से दोनों गुट एक साथ हो गये एवं फिर झामुमो के बैनर में कार्य करने लगे।
बिनोद बाबू के पुत्र के उम्र के थे सभी, सिवाय, शिवा महतो के। बिनोद बाबू तो सब कुछ भूल गये, पर इन लोगों ने अपनी आदत नहीं छोड़ी।
वर्ष 1988 में जब “झारखण्ड समन्वय समिति” ने रैली निकालने की तैयारी की थी, तो अर्जुन राम महतो, शैलेन्द्र महतो आदि ने शिबू सोरेन, सूरज मंडल के कहने पर रामगढ़ में काला झंड़ा दिखाकर बिनोद बाबू का विरोध किया था तथा शिबू सोरेन, सूरज मंडल, शैलेन्द्र महतो इस समिति से दूर रहे और आन्दोलन में कोई हिस्सा नहीं लिया।
ग्यातव्य हो कि इस समिति में करीब बावन पाटियाँ शामिल थी, एवं 15 नवम्बर 1988 को मोराबादी मैदान राँची में निकाली गई थी। यह एक ऐतिहासिक रैली थी जिसने केन्द्र सरकार का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था।
वर्ष 1989 में जब दुमका के हिजला में पार्टी का तृतीय महाधिवेशन बुलाया गया उसमें बिनोद बाबू की अनुपस्थिति में, उनके विरूद्ध तत्कालीन महामोत्री शैलेन्द्र महतो ने अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया और उसमें जमकर बिनोद बाबू की आलोचना की। उस प्रतिवेदन में उन्हें सामंतवादी चरित्र वाला, पैसे के बल पर राजनीति करने वाला, विघटनकारी, व्यक्तिगत लाभ के लिए राजनीति करने वाला कहा। शैलेन्द्र महतो ने उस रिपोर्ट में यह भी कहा है कि वर्ष 1983 के सरायढेला, धनबाद में हुए महाधिवेशन में पार्टी का शुद्धिकरण करने के लिए बिनोद बिहारी महतो को निष्काषित किया गया था। यह निष्काषण की बात भी झूठी थी। उन्होनें स्वयं पद छोड़ा था।
शैलेन्द्र महतो वर्ष 1978 में पार्टी में शामिल हुए थे। जब धनबाद आए थे, तो एक हाफ कमीज एवं पैजामा पहने थे तथा कंधे पर एक झोला टंगा हुआ था।
झामुमो में दो धाराओं का जन्म
पर जो सबसे आश्चर्य की बात हुई, वह यह थी कि झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के महामंत्री शिबू सोरेन आपातकाल में जेल नहीं गये। क्या उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया ? और अगर गिरफ्तार किया गया था तो तुरंत छोड़ा कैसे गया। पाया गया कि शिबू सोरेन ने बिहार के तत्कालिन मुख्यमंत्री जगरन्नाथ मिश्रा से मिलकर समझौता कर लिया तथा काँग्रेस की नीतियों का समर्थन कर दिया। इस प्रकार काँग्रेस को समर्थन देने एवं काँग्रेस विरोधियों से अलग हो जाने के कारण शिबू सोरेन जेल जाने से बच गये। आपात काल में इसी कारण 1975 में चार फरवरी का झारखण्ड मुक्ति मोर्चा का स्थापना दिवस शिबू सोरेन ने अलग से टुण्डी मे मनाया जिसमें बतौर मुख्य अतिथि जगरनाथ मिश्रा शरीक हुए। धनबाद के गोल्फ मैदान में स्थापना दिवस मनाने के लिए कोई बड़ा नेता नहीं बचा था, सभी जेल की हवा खा रहे थे। उस साल राज किशोर महतो के नेतृत्व में वहाँ स्थापना दिवस मनाया गया। फिर भी भीड़ उमड़ पड़ी थी।
शिबू सोरेन ने आपात काल 1975 में जो बिनोद बाबू का साथ छोड़ा तो सीधे काँग्रेस में शामिल हो गये और वहीं जम गये। करीब तीन वर्षो तक बिनोद बाबू अकेले रहे एवं आन्दोलन करते रहे। उनके सहयोगी ऐ0 के0 राय रह गये थे। श्री सोरेन 1977 के लोक-सभा चुनाव तक काँग्रेस के साथ रहे।
1977 में जे0 पी0 आन्दोलन के समय लोक-सभा का चुनाव आया तो बिनोद बिहारी महतो एवं ऐ0 के0 राय को गिरिडीह एवं धनबाद लोक-सभा से चुनाव लड़वाने का फैसला लोक नायक जय प्रकाश नारायण ने ले लिया था। उस समय जनसंघ आदि पाटियों ने मिलकर “जनता पार्टी” बनाई थी।
व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा हमेशा से ही एकता में बाधक रही है। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से श्री ऐ0 के0 राय भी ग्रस्त हो गये एवं उनके समर्थकों ने धनबाद लोक-सभा सीट के लिए जनता पार्टी का समर्थन काँग्रेस के विरूद्ध श्री राय के लिए ले लिया। गिरिडीह की सीट में कुछ ऐसी हालात उनके समर्थकों ने पैदा किया कि बिनोद बाबू को बहला फुसला कर पटना से धनबाद वापस ले आया गया और वह समर्थन रामदास सिंह जी को गिरिडीह लोक-सभा के लिए मिला। ऐसा बिनोद बाबू के समर्थक दल मासस के तत्कालीन महासचिव उमाशंकर शुक्ल एवं के0 पी0 भट्ट ने किया श्री राय जेल में थे और बिनोद बाबू को भी वहाँ से हटा दिया गया था। जो लोग सीटों पर बात करने गये थे उन्होनें राय के लिए सीट माँग ली, पर बिनोद बाबू के लिए नहीं। 1977 का चुनाव बिनोद बाबू अकेले लड़े। उस लोक सभा चुनाव में काँग्रेस के टिकट से डा0 इम्तियाज अहमद (डा0 शब्बा अहमद के पिता ) गिरिडीह से लड़ रहें थे। शिबू सोरेन इस चुनाव में काँग्रेस की तरफ से खुलकर प्रचार-प्रसार कर रहें थे। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के उम्मीदवार तीर-धनुष चिन्ह से चुनाव लड़ने वाले पार्टी के अध्यक्ष बिनोद बाबू के खिलाफ शिबू सोरेन काँग्रेस के उम्मीदवार को जिताने में लगे थे। इधर ऐ0 के0 राय अपने को संयुक्त उम्मीद्वार बताकर लड़ रहें थे और बिनोद बाबू के समर्थकों शिबा महतो बगैरह को लेकर बिनोद बाबू का विरोध गिरिडीह में कर रहें थे एवं साझा उम्मीद्वार रामदास सिंह का समर्थन कर थे।
झामुमो के शुरूआती दिनों में ही इसे एक जबरजस्त झटका लगा। पर बिनोद बाबू ने इन बातों को बहुत गहराई से नहीं लिया। पुनः अपने काम में लग गये। हॉलाकि उसी साल नवम्बर के महिने में उन्हें प्रथम बार दिल का दौरा पड़ा।
1977 के लोक-सभा चुनाव में काँग्रेस की बुरी तरह हार हुई। श्रीमती इन्दिरा गाँधी स्वयं चुनाव हार गई। केन्द्र में जनता पार्टी की सरकार बन गई। शिबू सोरेन फिर डर गये एवं इधर-उधर भटकने लगे। फिर धनबाद लोटे एवं श्री ऐ0 के0 राय को पकड़ा। ऐ0 के0 राय के अनुरोध करने पर बिनोद बाबू ने पुनः शिबू सोरेन को दुमका यानि संथाल परगना भेज दिया। टुंडी के पोखरिया आश्रम में अब शिबू सोरेन नहीं जा सकते थे, क्योंकि काँग्रेस में शामिल होने एवं बिनोद बाबू को छोड़ने के कारण वहाँ आदिवासी समर्थक बहुत गुस्से में थे।
फिर 1980 के आम चुनाव के पहले से ही इस बात के संकेत मिलने लग गये थे कि पुराने आदिवासी (जनजाति) नेताओं की तरह ही शिबू सोरेन काँग्रेस की निकटता प्राप्त करना चाहते थे, उससे समझौता करके चलाना चाहते थे, विरोध करके नहीं। यही बात श्री राय एवं बिनोद बाबू को पसंद नहीं थी। 1980 के विधान सभा चुनाव में झारखण्ड मुक्ति मोर्चा एवं मासस को चौदह सीटें मिली थी। शिबू सोरेन चुँकि संथाल परगना देख रहे थे, उन्होनें चुपके से काँग्रेस से भीतर-भीतर तालमेल कर लिया, पर उत्तरी छोटानागपुर में सीटें काँग्रेस के विरोध में लड़ी गई।
1980 के लोक सभा चुनाव में श्री सोरेन से काँग्रेस से गुपचुप समझौता कर लिया और दुमका लोक सभा सीट से मात्र तीन हजार मत से जीत गये। श्री राय 1977 में ही सांसद बन गये थे। फिर 1980 में भी धनबाद से जीते। बिनोद बाबू 1980 में भी गिरिडीह लोक-सभा चुनाव हार गये।
1983, जनवरी में हुए महाधिवेशन के बाद जब बिनोद बाबू ने पार्टी का अध्यक्ष पद छोड़ा तो शिबू-सोरेन, शैलेन्द्र महतो, सूरज मंडल आदि ने गुटबाजी शुरू कर दी। बिनोद बाबू इन बातों की खबर भी रखना नहीं चाहते थे। धीरे-धीरे यह परिस्थिति ऐसी पैदा हो गई कि झामुमो में दो फाँक हो गया। बिनोद बाबू के तरफ शहीद शक्ति नाथ महतो, कॉ0 ऐ0 के0 राय (सांसद धनबाद) के0 एस0 चटर्जी (निरसा विधायक), आनन्द महतो (सिन्दरी विधायक), टेकलाल महतो (मांडू विधायक), शंकर किशोर महतो (लाठाटाँड़), शिबा महतो (डूमरी विधायक) आदि हो गये तथा एक अलग ही गुट बनाने का निश्चय किया गया। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा (बिनोद) गुट से बिनोद बाबू के साथ रहने वालों, साथ देने वालों को जाना जाने लगा। विधिवत् रूप से इस दल का पंजीकरण करने के लिए चुनाव आयोग में लिखा गया। पर इसी बीच शिवा महतो जी के प्रयास से डुमरी में फिर से दोनों गुट एक साथ हो गये एवं फिर झामुमो के बैनर में कार्य करने लगे।
बिनोद बाबू के पुत्र के उम्र के थे सभी, सिवाय, शिवा महतो के। बिनोद बाबू तो सब कुछ भूल गये, पर इन लोगों ने अपनी आदत नहीं छोड़ी।
वर्ष 1988 में जब “झारखण्ड समन्वय समिति” ने रैली निकालने की तैयारी की थी, तो अर्जुन राम महतो, शैलेन्द्र महतो आदि ने शिबू सोरेन, सूरज मंडल के कहने पर रामगढ़ में काला झंड़ा दिखाकर बिनोद बाबू का विरोध किया था तथा शिबू सोरेन, सूरज मंडल, शैलेन्द्र महतो इस समिति से दूर रहे और आन्दोलन में कोई हिस्सा नहीं लिया।
ग्यातव्य हो कि इस समिति में करीब बावन पाटियाँ शामिल थी, एवं 15 नवम्बर 1988 को मोराबादी मैदान राँची में निकाली गई थी। यह एक ऐतिहासिक रैली थी जिसने केन्द्र सरकार का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था।
वर्ष 1989 में जब दुमका के हिजला में पार्टी का तृतीय महाधिवेशन बुलाया गया उसमें बिनोद बाबू की अनुपस्थिति में, उनके विरूद्ध तत्कालीन महामोत्री शैलेन्द्र महतो ने अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया और उसमें जमकर बिनोद बाबू की आलोचना की। उस प्रतिवेदन में उन्हें सामंतवादी चरित्र वाला, पैसे के बल पर राजनीति करने वाला, विघटनकारी, व्यक्तिगत लाभ के लिए राजनीति करने वाला कहा। शैलेन्द्र महतो ने उस रिपोर्ट में यह भी कहा है कि वर्ष 1983 के सरायढेला, धनबाद में हुए महाधिवेशन में पार्टी का शुद्धिकरण करने के लिए बिनोद बिहारी महतो को निष्काषित किया गया था। यह निष्काषण की बात भी झूठी थी। उन्होनें स्वयं पद छोड़ा था।
शैलेन्द्र महतो वर्ष 1978 में पार्टी में शामिल हुए थे। जब धनबाद आए थे, तो एक हाफ कमीज एवं पैजामा पहने थे तथा कंधे पर एक झोला टंगा हुआ था।
Sunday, October 31, 2010
झामुमो के आन्दोलन का क्रमिक विकास
झारखंड मुक्ति मोर्चा की सफलता के पीछे बिनोद बिहारी महतो की विचार-धारा रही। उनका दिशा-निर्देश रहा। उनकी जोखीम उठाने की प्रवृति रही। पार्टी को शुरू के दशवर्षो तक आर्थिक मदद इन्होने किया। उन्होने प्रतिभाओं को तलाशा एवं उन्हें तरासने का काम किया। अपना स्वयं का पैसा खर्च करके नेताओं को आगे बढ़ाया, कार्यकर्त्ता तैयार किए। उनका नेतृत्व ईमानदारी का था एवं पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़े थे। जैसा कि हमने पहले ही देख लिया है कि उन्होने उन वर्गो को एकत्रित करने का काम किया। जिन्हें वास्तव में परिवर्त्तन चाहिए था। उन्ही वर्गो-जातियों में से नेतृत्व पैदा किया। बिनोद बिहारी महतो ने झारखंड आन्दोलन के संकुचित आदिवासी चेहरे को, उसके जनजातीय छवि को बदल डाला। उसे एक विस्तृत आयाम दिया। इसमें आदिवासियों के साथ-साथ गैर-आदिवासी समूहों को भी शामिल किया। इन्होने झारखंड आन्दोलन में मजदूरों की भागीदारी भी सुनिश्चित की। उन्होनें इस आन्दोलन को न सिर्फ जातीय, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक आधार प्रदान किया। झारखंड की सभ्यता-सांस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए यहाँ के लोकगीतों, लोकनृत्यों, को आन्दोलन के रूप मे लिया। तो दूसरी ओर कल-कारखानों, कोलियारियों में नौकरी एवं रोजगार के लिए आन्दोलन चलाया। सांमतवादी विचार-धारा वाले सूदखोर, महाजनों के खिलाफ सशस्त्र आन्दोलन भी हुए।
चूँकि शिवाजी समाज द्वारा आन्दोलन बहुत आगे बढ़ाया जा चुका था और संथाल समाज द्वारा भी। अतः झारखंड मुक्ति मोर्चा सिर्फ दो वर्षो में स्थापित हो गया था।
इन आन्दोलनों में प्रमुख रहा झारखंड में विस्थापन की समस्या के विरूद्ध। 1978 के पहले केन्द्र सरकार ने विस्थापितों के नियोजन, पुर्नवास एवं नोकरी देने की कोई नीति नहीं बनाई थी। प्रथम बार 1978 से कोल कम्पनियों द्वारा इन विषयों पर नीतियाँ बनाई गई एवं नियोजन, पुर्नवास देने का काम शुरू किया गया। दामोदर भैली कॉरपोरेशन लिमिटेड को भी आन्दोलनों से मजबूर होकर विस्थापितों को नौकरी, रोजगार, ठीका आदि देने का काम शुरू करना पड़ा। इन सबके साथ-साथ कम्यूनिटी डेवलोपमेंट के नाम पर अगल-बगल के गाँवों में नागरिक सुविधाएँ मुहैय्या कराने का काम भी शुरू किया गया। सड़क, पानी, बिजली, विकास भवन, स्कूल आदि बनाने में औद्योगिक संस्थान अपनी थोड़ी-बहुत भागीदारी निभाने लगें।
इसके अलावे जो एक और प्रमुख आन्दोलन शुरू किया गया, वह था जंगल बचाओं आन्दोलन एवं विदेशी वृक्ष लगाना बंद करो का आन्दोलन। जंगलों में रहने वाले आदिवासी, गैर-आदिवासी सक्रिय हो उठे। जंगल विभाग के कर्मचारियों, अधिकारियों ने नंगा नाच मचा रखा था। अंधाधुंध लकड़ियों की कटाई इनके द्वारा कराई जा रही थी। साथ ही गाँव वालों को बिना वजह लकड़ी चोरी के इल्लजाम में पकड़कर जेल भेजा जाता था। अगर गाँव के लोग जलावन के लिए या अन्य छोटे-मोटे कृषि के उपकरण बनाने के लिए लकड़ी का प्रयोग करते तो उन्हें चोरी के इल्लजाम में जेल भेज दिया जाता। सदियों से झारखंड़ियों का जीवन जंगल-आधारित था। फल-फूल, पत्ते, लकड़ी का उपयोग करते आ रहे थे। पर इनके सारे अधिकार छीन लिए गये थे। अतः इस आन्दोलन का व्यापक प्रभाव पड़ा। विदेशी-वृक्षों को सरकार द्वारा खाली जमीनों पर लगाया जाता था, जो जमीनों को उपजाऊ नहीं, बल्कि सुखा देती थी। इन वृक्षों यूकलिप्टस आदि को काट डालने का अभियान चला। इसके अलावा फलदार वृक्षों को लगाने की माँग की जाने लगी। जंगलों के इलाकों में सरकारी तंत्रों के साथ गाँव वालों का मुकाबला भी हो जाता। कई बड़ी-बड़ी घटनाएँ भी घट गई, जिसमें पुलिस, जंगल गार्ड मारे गये तो गाँव वालों को भी गोलियों का निशाना बनाया गया। जंगलों में खासकर उग्रवादी आन्दोलन चलाये गये। सरकारी कर्मचारी, जंगल विभाग के अधिकारी ठेकेदार, भागने लगे थे।
इसके अलावे गाँवों में सूदखोरों, महाजनों द्वारा गैर कानूनी ढ़ंग से हड़पी गई जमीनों को वापस करने का जोरदार आन्दोलन किया गया। छोटानागपुर टेनेन्सी एक्ट तथा संथाल परगना टेनेन्सी एक्ट के अतिक्रमण की हालत में उन जमीनों पर रैयतों द्वारा जमान वापसी के लिए सीधे कार्यवाही की जाने लगी। कोर्ट-कचहरियों में गरीबों को न्याय मिलना असंभव था। अतः बिनोद बिहारी महतो ने उन जमानों पर पुनः कब्जा करने की रणनीति तैयार की। उन्होनें कई जिलों में वकीलों को प्रोत्साहित किया कि वे गरीब, आदिवासी, हरिजन, पिछड़े लोगों के मुकदमें बिना फीस लिए लड़े एवं उन्हें कानूनी सहायता दें। जमीन वापसी का आन्दोलन भी बड़ा व्यापक स्तर पर चला। “धान-कटनी” का आन्दोलन उस जमीन वापसी का आन्दोलन का एक हिस्सा था। गाँव के गरीब, आदिवासी, हरिजन, झारखंड मुक्ति मोर्चा के कार्यकर्त्ताओं द्वारा संगठित किए जाते और तीर-धनुष, लाठी-भाला, टाँगी आदि से लैस होकर खेतों पर डुगडुगी बजाते-बजाते धावा बोलते और खड़ी फसल को काट देते एवं उसे ढोकर सही व्यक्ति के घर पहुँचा देते।
सांस्कृतिक आन्दोलन भी चलाए गये। झारखंड की सभ्यता संस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए जगह-जगह “झूमर” प्रतियोगिता रखी जाने लगी। झूमर एक लोक नृत्य है जिसमें झूमर के गीत गाये जाते हैं। बाजा बजाने वाले होते हैं। ढोल, नगाड़ा, माँदर, करताल, शहनाई का होना आवश्यक है। इसमें बारह ताल यानि लय होते हैं। बारह प्रकार की अलग-अलग धूनों पर नाचा जाता है। नाचने के लिए विशेष तौर पर लड़के ही नर्तकियों का रूप धरते है। दो से छः तक नर्तकियों की संख्या होती है। यह लोक-नृत्य अखाड़े में खड़े होकर सम्पन्न किया जाता है। दर्शक इसके चारों तरफ बैठते है। झारखंड क्षेत्र का यह एक प्रसिद्ध लोक-नृत्य है जो पूरे झारखंड में महशूर है। पर्व-त्योहार के अवसर पर या फिर धान की फसल काट लेने के बाद जाड़े की रातों में रातभर झूमर नाचा जाता है। उसी प्रकार अन्य लोक-नृत्य “छऊ-नृत्य” है जो विश्व-प्रसिद्ध हो चुका है। इसी प्रकार के अन्य लोक गीतों एवं लोक-संगीतो, लोक-नृत्यों को बढ़ावा देने के लिए बिनोद बाबू ने व्यापक प्रोत्साहन दिया। स्वयं रात-रात भर जागकर कलाकारों को उत्हाहित करते। नतीजा यह निकला कि झारखंड के समूचे इलाके में, गाँव-गाँव में झारखंडी सभयता-संस्कृति पुर्नजीवित हो उठा एवं इसकी गूँज दूर-दूर तक आगे बढ़ने लगी। इसके साथ-साथ झारखंड क्षेत्र के पर्व-त्योहार करमा, सोहराई, गोहालपूजा, जीतिया, टुसू, जावा आदि शहरों में प्रवेश कर गये। उन्हें भी प्रोत्साहित किया गया। पूरे झारखंड क्षेत्र की अपनी एक पहचान है, वह भी विशिष्ट जो अन्य किसी की नहीं हैं। इस प्रकार के सांस्कृतिक आन्दोलन से झारखंडी अपने आप को पहचानने लगे। उनमें आत्म-विश्वास जगने लगा। औद्योगिकरण एवं बाहरी संस्कृति के दबाव से जो संकुचन आया था, वह दूर होने लगा और वे जो श्रेष्ठ होते हुए भी हीन भावना से ग्रस्त हो रहे थे, पुनः स्वयं को आत्म-विश्वास से भरा हुआ पाने लगे।
झारखंड क्षेत्र में कुछ ऐसे लोक नृत्य है जो “मारसल आर्ट” के स्वरूप है। इसमें एक प्रमुख है- “पैका” यानि ”पाइक”। इसमें खिलाड़ी ढाल तलवार (या लाठी) से लैस होता है। पैंरों में घुँघरू बाँध लेता है और सर पर पगड़ी। धोती को कस कर कमर में बाँधा जाता है। “पैका” में जो पारंगत हो जाता है वह अकेले ही दर्जन हमलावरों को एक साथ धूल चटा सकता है। इसके दाँव-पेंच ही ऐसे होते हैं। झारखंड में पहले कुड़ंमी-महतो लोगो के प्रत्येक गाँव में “पाइक” की ट्रेनिंग दी जाती थी। इसके लिए उस्ताद होते थे, गुरू होते थे और यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलता आता है। पर दुर्भाग्य से आज यह प्रायः लुप्त हो रहा है। इसी पैका का दूसरा स्वरूप “नटुआ नाच” है। अब ढाल की जगह गमछा, तलवार की जगह लाठी ने ले लिया है। इसमें बजने वाला बाजा विशिष्ट लय एवं ताल का होता है, जिसे सुनकर ही यहाँ का झारखंडी मैदान में कूद पड़ता है।
फिर झारखण्ड मुक्ति मोर्चा ने गाँव-गाँव में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए “अकिल-अखाड़े” चलाए। सुदूर गाँव में रात्री-पाठशालाएँ लालटेनों की रोशनी में चलायी जाने लगीं। शिक्षा के लिए भी अभियान या आन्दोलन चलाए गये। जिन परिवारों के बच्चे स्कूल नहीं जाते थे उन्हें प्रोत्साहित किया जाने लगा। उस समय गाँव में शिक्षा की कोई व्यवस्था ही नहीं थी। बिनोद बिहारी महतो ने स्वंय कुल मिलाकर कितने संस्थाने खोले, यह पता लगाया जा रहा है। पर चालीस संस्था का पता चला है। जिनमें मिडिल-स्कूल, हाई-स्कूल, डिग्री कॉलेज तथा विधि विद्यालय भी हैं। ये सम्पूर्ण झारखण्ड में जगह-जगह शिक्षण संस्थान खोलने के लिए लोगों को उत्साहित करते फिरते। अपनी कमाई का अधिकत्तर पैसा इन कॉलेजों एवं स्कूलों के भवन निर्माण शिक्षकों के वेतन के लिए दान दे दिया।
इधर गाँव के झगड़े गाँव में ही पंचायत बुलाकर सुलझाए जाने लगें। प्रत्येक गाँव में यह एक आन्दोलन के रूप में खड़ा होने लगा। झारखण्डी की जीवन-पद्धति भी यही थी। फिर अगर गाँवों में नहीं सुलझ पाते तो उन झगड़ों को नेताओं क पास ले जाया जाता। फिर बड़े पैमाने पर तीन-चार गाँव के लोग मिलकर बैठते एवं फैसला किया जाता। किसी-किसी मामलें में समस्या जब नहीं सुलझती, तो इसे बिनोद बाबू के पास लाया जाता। धीरे-धीरे ऐसी व्यवस्था कायम हो गई कि झारखंड के कई इलाकों में इस प्रकार से झगड़े निपटाने के केन्द्र बन गये और उन्हें लोग स्वतः जिला-कोर्ट, हाई-कोर्ट कहने लगे। यही कारण था कि सरकारी रिपोर्टो में यह बात दर्ज है कि झारखंड मुक्ति मोर्चा द्वारा समानान्तर सरकार चलाई जा रही थी, जिसका अपना पुलिस फोर्स है एवं कोर्ट-कचहरी है। इन कचहरियों में यानि बैठकों में आपराधिक मामले दीवानी मामले तथा शादी-व्याह, तलाक से जुड़े मामले सभी पर विचार विमर्श होता था। आपराधिक मामलों में ज्यादातर फाइन किया जाता था। कभी-कभी शारीरिक दंड दिया जाता था और अपराधी को लाठियों से पिटा जाता। या अन्य प्रकार से अपमानित या प्रताड़ित किया जाता। किसी-किसी गंभीर मामले में हुक्का पानी भी कुछ दिनों के लिए बंद कर दिया जाता यानि सामाजिक बहिष्कार किया जाता। किसी-किसी मामले में जो जमींदारी अत्याचार एवं सामंती अत्याचार के खिलाफ फैसला लिया जाता, उसमे “बिटलाहा” भी कर दिया जाता। बिटलाहा का मतलब होता था, उसे गाँव से उजाड़ देना। घर-द्वार को तोड़-फोड़ दिया जाता था।
इनके अलावे जो एक सबसे बड़ा पहलू झारखंड मुक्ति मोर्चा के आन्दोलन का रहा, वह था शराब-खोरी के खिलाफ संघर्ष। इसमें कार्यकर्त्ता सीधे शराब की भट्टियों पर धावा बोलते, तोड़फोड़ कर डालते। शराबियों को पकड़कर पीटते। उन्हें पानी में डूबा-डूबा कर उसका नशा तोड़ते। कार्यकर्त्ता पता लगाते कि कौन चोरी-छिपे इस धंधे में लिप्त है, उसका पता लगाते एवं उसे धंधे को छोड़ने के लिए मजबूर करते। गाँवों में औरतों के बीच जाते और उन्हें अपने-अपने शराबी पतियों की आदत छुड़ाने के लिए प्रोत्साहित करते। औरते इस आन्दोलन का समर्थन जोरदार ढंग से करती एवं अपने शराबी पतियों से लडती झगड़ती।
इस प्रकार इन आन्दोलनों ने बहुत सारे जुझारू, लड़ाकू कार्यकर्त्ता पैदा किए। पर समाज का शोषक-शासक वर्ग चुप नहीं बैठे रह सकता था। इन आन्दोलों को कुचलने के लिए पुलिस-प्रसाशन, जमींदार, सूदखोर, महाजन, माफिया, गुंडे सभी सक्रिय हो उठे। नतीजा यह हुआ कि कई बड़े-बड़े संघर्ष हुए। चोरी-छिपे कार्यकर्त्ताओं, नेताओं की हत्याएँ की जाने लगीं। घात लाकर इन आन्दोलनों के अगुआओं को खोजकर मारा जाने लगे। शहीदों की लम्बी कतारें हो गई। पर कार्यकर्त्ता और जनता भी प्रतिकार में उतर आई। और वर्षो तक दोनों तरफ से संघर्ष चलने लगा।
1975 में ही गोमो में जिला धनबाद के सदानन्द झा शहिद हो गये। उन्हें अकेले पाकर आतताइयों ने गोली मार दी। 1977 में शक्ति नाथ महतो टाटा सिजुआ में शहीद हो गये। उन्हें काँग्रेस के गुंडों ने दिन दहाड़े बम गोलियों से मार डाला। उसी प्रकार इस कोयलाचंल में रसीक हाँसदा, नेपाल रवानी आदि दर्जनों शहीद हुए।
1975 में गोमो की रेल नगरी में सदानन्द झा शहीद हुए तथा 1977 में टाटा-सिजूआ तेतुलमुड़ी के शक्ति नाथ महतो शहीद हुए। ये दो प्रमुख कार्यकर्त्ता नेताओं की शहादत के बाद तो मानों पूरे दक्षिणी छोटानागपुर में आन्दोलन में उफान आ गया। फिर 1987 में जमशेदपुर में झारखंड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष निर्मल महतो को भी आतताइयों ने मार डाला। उनकी शहादत के बाद तो मानों पूरे दक्षिणी छोटानागपुर में आग ही लग गई। इसके अलावे इचागढ़ के अजीत महतो, धनंजय महतो आदि शहीद हुए। गुवा में 1982 में प्रसिद्ध गोली कांड हुआ जिसे आज गुआ गोली कांड के रूप में याद किया जाता है, इसके अलावे अनेकों शहीद हुए। हजारों जेल गये। रिटायर्ड आर्मी के जवान कंडुलना की पुलीस इन्काउटर दिखा कर हत्या कर दी।
संथाल परगना में भी यही हाल रहा। यहाँ उन तमाम घटनाओं का जिक्र करना संभव नहीं हैं। आम झारखंडी शोषित जनता ने भी प्रतित्चुर में हथियार उठा लिए। कई बड़े-बड़े संघर्ष पुलिस-प्रशासन के साथ हुए। महाजन, सामंतो के बिरूद्ध भी जम कर सशस्त्र संधंर्ष हुए। इस प्रकार 1990 तक आते-आते इस पार्टी के बीस विधायक एवं 1991 में छः सासंद बन गये। उन सांसदो के नाम है- श्री बिनोद बिहारी महतो, शिबू सोरेन, सूरज मंडल, शैलेन्द्र महतो, कृष्णा मार्डी, साइमन मरांडी। फिर बाद में 1992 के जून में गिरीडिह संसदिय क्षेत्र में बिनोद बिहारी महतो का निधन के बाद उपचुनाव हुआ जिसमें उनके पुत्र राज किशोर महतो सासंद बने।
झामुमो के आन्दोलन का क्रमिक विकास
झारखंड मुक्ति मोर्चा की सफलता के पीछे बिनोद बिहारी महतो की विचार-धारा रही। उनका दिशा-निर्देश रहा। उनकी जोखीम उठाने की प्रवृति रही। पार्टी को शुरू के दशवर्षो तक आर्थिक मदद इन्होने किया। उन्होने प्रतिभाओं को तलाशा एवं उन्हें तरासने का काम किया। अपना स्वयं का पैसा खर्च करके नेताओं को आगे बढ़ाया, कार्यकर्त्ता तैयार किए। उनका नेतृत्व ईमानदारी का था एवं पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़े थे। जैसा कि हमने पहले ही देख लिया है कि उन्होने उन वर्गो को एकत्रित करने का काम किया। जिन्हें वास्तव में परिवर्त्तन चाहिए था। उन्ही वर्गो-जातियों में से नेतृत्व पैदा किया। बिनोद बिहारी महतो ने झारखंड आन्दोलन के संकुचित आदिवासी चेहरे को, उसके जनजातीय छवि को बदल डाला। उसे एक विस्तृत आयाम दिया। इसमें आदिवासियों के साथ-साथ गैर-आदिवासी समूहों को भी शामिल किया। इन्होने झारखंड आन्दोलन में मजदूरों की भागीदारी भी सुनिश्चित की। उन्होनें इस आन्दोलन को न सिर्फ जातीय, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक आधार प्रदान किया। झारखंड की सभ्यता-सांस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए यहाँ के लोकगीतों, लोकनृत्यों, को आन्दोलन के रूप मे लिया। तो दूसरी ओर कल-कारखानों, कोलियारियों में नौकरी एवं रोजगार के लिए आन्दोलन चलाया। सांमतवादी विचार-धारा वाले सूदखोर, महाजनों के खिलाफ सशस्त्र आन्दोलन भी हुए।
चूँकि शिवाजी समाज द्वारा आन्दोलन बहुत आगे बढ़ाया जा चुका था और संथाल समाज द्वारा भी। अतः झारखंड मुक्ति मोर्चा सिर्फ दो वर्षो में स्थापित हो गया था।
इन आन्दोलनों में प्रमुख रहा झारखंड में विस्थापन की समस्या के विरूद्ध। 1978 के पहले केन्द्र सरकार ने विस्थापितों के नियोजन, पुर्नवास एवं नोकरी देने की कोई नीति नहीं बनाई थी। प्रथम बार 1978 से कोल कम्पनियों द्वारा इन विषयों पर नीतियाँ बनाई गई एवं नियोजन, पुर्नवास देने का काम शुरू किया गया। दामोदर भैली कॉरपोरेशन लिमिटेड को भी आन्दोलनों से मजबूर होकर विस्थापितों को नौकरी, रोजगार, ठीका आदि देने का काम शुरू करना पड़ा। इन सबके साथ-साथ कम्यूनिटी डेवलोपमेंट के नाम पर अगल-बगल के गाँवों में नागरिक सुविधाएँ मुहैय्या कराने का काम भी शुरू किया गया। सड़क, पानी, बिजली, विकास भवन, स्कूल आदि बनाने में औद्योगिक संस्थान अपनी थोड़ी-बहुत भागीदारी निभाने लगें।
इसके अलावे जो एक और प्रमुख आन्दोलन शुरू किया गया, वह था जंगल बचाओं आन्दोलन एवं विदेशी वृक्ष लगाना बंद करो का आन्दोलन। जंगलों में रहने वाले आदिवासी, गैर-आदिवासी सक्रिय हो उठे। जंगल विभाग के कर्मचारियों, अधिकारियों ने नंगा नाच मचा रखा था। अंधाधुंध लकड़ियों की कटाई इनके द्वारा कराई जा रही थी। साथ ही गाँव वालों को बिना वजह लकड़ी चोरी के इल्लजाम में पकड़कर जेल भेजा जाता था। अगर गाँव के लोग जलावन के लिए या अन्य छोटे-मोटे कृषि के उपकरण बनाने के लिए लकड़ी का प्रयोग करते तो उन्हें चोरी के इल्लजाम में जेल भेज दिया जाता। सदियों से झारखंड़ियों का जीवन जंगल-आधारित था। फल-फूल, पत्ते, लकड़ी का उपयोग करते आ रहे थे। पर इनके सारे अधिकार छीन लिए गये थे। अतः इस आन्दोलन का व्यापक प्रभाव पड़ा। विदेशी-वृक्षों को सरकार द्वारा खाली जमीनों पर लगाया जाता था, जो जमीनों को उपजाऊ नहीं, बल्कि सुखा देती थी। इन वृक्षों यूकलिप्टस आदि को काट डालने का अभियान चला। इसके अलावा फलदार वृक्षों को लगाने की माँग की जाने लगी। जंगलों के इलाकों में सरकारी तंत्रों के साथ गाँव वालों का मुकाबला भी हो जाता। कई बड़ी-बड़ी घटनाएँ भी घट गई, जिसमें पुलिस, जंगल गार्ड मारे गये तो गाँव वालों को भी गोलियों का निशाना बनाया गया। जंगलों में खासकर उग्रवादी आन्दोलन चलाये गये। सरकारी कर्मचारी, जंगल विभाग के अधिकारी ठेकेदार, भागने लगे थे।
इसके अलावे गाँवों में सूदखोरों, महाजनों द्वारा गैर कानूनी ढ़ंग से हड़पी गई जमीनों को वापस करने का जोरदार आन्दोलन किया गया। छोटानागपुर टेनेन्सी एक्ट तथा संथाल परगना टेनेन्सी एक्ट के अतिक्रमण की हालत में उन जमीनों पर रैयतों द्वारा जमान वापसी के लिए सीधे कार्यवाही की जाने लगी। कोर्ट-कचहरियों में गरीबों को न्याय मिलना असंभव था। अतः बिनोद बिहारी महतो ने उन जमानों पर पुनः कब्जा करने की रणनीति तैयार की। उन्होनें कई जिलों में वकीलों को प्रोत्साहित किया कि वे गरीब, आदिवासी, हरिजन, पिछड़े लोगों के मुकदमें बिना फीस लिए लड़े एवं उन्हें कानूनी सहायता दें। जमीन वापसी का आन्दोलन भी बड़ा व्यापक स्तर पर चला। “धान-कटनी” का आन्दोलन उस जमीन वापसी का आन्दोलन का एक हिस्सा था। गाँव के गरीब, आदिवासी, हरिजन, झारखंड मुक्ति मोर्चा के कार्यकर्त्ताओं द्वारा संगठित किए जाते और तीर-धनुष, लाठी-भाला, टाँगी आदि से लैस होकर खेतों पर डुगडुगी बजाते-बजाते धावा बोलते और खड़ी फसल को काट देते एवं उसे ढोकर सही व्यक्ति के घर पहुँचा देते।
सांस्कृतिक आन्दोलन भी चलाए गये। झारखंड की सभ्यता संस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए जगह-जगह “झूमर” प्रतियोगिता रखी जाने लगी। झूमर एक लोक नृत्य है जिसमें झूमर के गीत गाये जाते हैं। बाजा बजाने वाले होते हैं। ढोल, नगाड़ा, माँदर, करताल, शहनाई का होना आवश्यक है। इसमें बारह ताल यानि लय होते हैं। बारह प्रकार की अलग-अलग धूनों पर नाचा जाता है। नाचने के लिए विशेष तौर पर लड़के ही नर्तकियों का रूप धरते है। दो से छः तक नर्तकियों की संख्या होती है। यह लोक-नृत्य अखाड़े में खड़े होकर सम्पन्न किया जाता है। दर्शक इसके चारों तरफ बैठते है। झारखंड क्षेत्र का यह एक प्रसिद्ध लोक-नृत्य है जो पूरे झारखंड में महशूर है। पर्व-त्योहार के अवसर पर या फिर धान की फसल काट लेने के बाद जाड़े की रातों में रातभर झूमर नाचा जाता है। उसी प्रकार अन्य लोक-नृत्य “छऊ-नृत्य” है जो विश्व-प्रसिद्ध हो चुका है। इसी प्रकार के अन्य लोक गीतों एवं लोक-संगीतो, लोक-नृत्यों को बढ़ावा देने के लिए बिनोद बाबू ने व्यापक प्रोत्साहन दिया। स्वयं रात-रात भर जागकर कलाकारों को उत्हाहित करते। नतीजा यह निकला कि झारखंड के समूचे इलाके में, गाँव-गाँव में झारखंडी सभयता-संस्कृति पुर्नजीवित हो उठा एवं इसकी गूँज दूर-दूर तक आगे बढ़ने लगी। इसके साथ-साथ झारखंड क्षेत्र के पर्व-त्योहार करमा, सोहराई, गोहालपूजा, जीतिया, टुसू, जावा आदि शहरों में प्रवेश कर गये। उन्हें भी प्रोत्साहित किया गया। पूरे झारखंड क्षेत्र की अपनी एक पहचान है, वह भी विशिष्ट जो अन्य किसी की नहीं हैं। इस प्रकार के सांस्कृतिक आन्दोलन से झारखंडी अपने आप को पहचानने लगे। उनमें आत्म-विश्वास जगने लगा। औद्योगिकरण एवं बाहरी संस्कृति के दबाव से जो संकुचन आया था, वह दूर होने लगा और वे जो श्रेष्ठ होते हुए भी हीन भावना से ग्रस्त हो रहे थे, पुनः स्वयं को आत्म-विश्वास से भरा हुआ पाने लगे।
झारखंड क्षेत्र में कुछ ऐसे लोक नृत्य है जो “मारसल आर्ट” के स्वरूप है। इसमें एक प्रमुख है- “पैका” यानि ”पाइक”। इसमें खिलाड़ी ढाल तलवार (या लाठी) से लैस होता है। पैंरों में घुँघरू बाँध लेता है और सर पर पगड़ी। धोती को कस कर कमर में बाँधा जाता है। “पैका” में जो पारंगत हो जाता है वह अकेले ही दर्जन हमलावरों को एक साथ धूल चटा सकता है। इसके दाँव-पेंच ही ऐसे होते हैं। झारखंड में पहले कुड़ंमी-महतो लोगो के प्रत्येक गाँव में “पाइक” की ट्रेनिंग दी जाती थी। इसके लिए उस्ताद होते थे, गुरू होते थे और यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलता आता है। पर दुर्भाग्य से आज यह प्रायः लुप्त हो रहा है। इसी पैका का दूसरा स्वरूप “नटुआ नाच” है। अब ढाल की जगह गमछा, तलवार की जगह लाठी ने ले लिया है। इसमें बजने वाला बाजा विशिष्ट लय एवं ताल का होता है, जिसे सुनकर ही यहाँ का झारखंडी मैदान में कूद पड़ता है।
फिर झारखण्ड मुक्ति मोर्चा ने गाँव-गाँव में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए “अकिल-अखाड़े” चलाए। सुदूर गाँव में रात्री-पाठशालाएँ लालटेनों की रोशनी में चलायी जाने लगीं। शिक्षा के लिए भी अभियान या आन्दोलन चलाए गये। जिन परिवारों के बच्चे स्कूल नहीं जाते थे उन्हें प्रोत्साहित किया जाने लगा। उस समय गाँव में शिक्षा की कोई व्यवस्था ही नहीं थी। बिनोद बिहारी महतो ने स्वंय कुल मिलाकर कितने संस्थाने खोले, यह पता लगाया जा रहा है। पर चालीस संस्था का पता चला है। जिनमें मिडिल-स्कूल, हाई-स्कूल, डिग्री कॉलेज तथा विधि विद्यालय भी हैं। ये सम्पूर्ण झारखण्ड में जगह-जगह शिक्षण संस्थान खोलने के लिए लोगों को उत्साहित करते फिरते। अपनी कमाई का अधिकत्तर पैसा इन कॉलेजों एवं स्कूलों के भवन निर्माण शिक्षकों के वेतन के लिए दान दे दिया।
इधर गाँव के झगड़े गाँव में ही पंचायत बुलाकर सुलझाए जाने लगें। प्रत्येक गाँव में यह एक आन्दोलन के रूप में खड़ा होने लगा। झारखण्डी की जीवन-पद्धति भी यही थी। फिर अगर गाँवों में नहीं सुलझ पाते तो उन झगड़ों को नेताओं क पास ले जाया जाता। फिर बड़े पैमाने पर तीन-चार गाँव के लोग मिलकर बैठते एवं फैसला किया जाता। किसी-किसी मामलें में समस्या जब नहीं सुलझती, तो इसे बिनोद बाबू के पास लाया जाता। धीरे-धीरे ऐसी व्यवस्था कायम हो गई कि झारखंड के कई इलाकों में इस प्रकार से झगड़े निपटाने के केन्द्र बन गये और उन्हें लोग स्वतः जिला-कोर्ट, हाई-कोर्ट कहने लगे। यही कारण था कि सरकारी रिपोर्टो में यह बात दर्ज है कि झारखंड मुक्ति मोर्चा द्वारा समानान्तर सरकार चलाई जा रही थी, जिसका अपना पुलिस फोर्स है एवं कोर्ट-कचहरी है। इन कचहरियों में यानि बैठकों में आपराधिक मामले दीवानी मामले तथा शादी-व्याह, तलाक से जुड़े मामले सभी पर विचार विमर्श होता था। आपराधिक मामलों में ज्यादातर फाइन किया जाता था। कभी-कभी शारीरिक दंड दिया जाता था और अपराधी को लाठियों से पिटा जाता। या अन्य प्रकार से अपमानित या प्रताड़ित किया जाता। किसी-किसी गंभीर मामले में हुक्का पानी भी कुछ दिनों के लिए बंद कर दिया जाता यानि सामाजिक बहिष्कार किया जाता। किसी-किसी मामले में जो जमींदारी अत्याचार एवं सामंती अत्याचार के खिलाफ फैसला लिया जाता, उसमे “बिटलाहा” भी कर दिया जाता। बिटलाहा का मतलब होता था, उसे गाँव से उजाड़ देना। घर-द्वार को तोड़-फोड़ दिया जाता था।
इनके अलावे जो एक सबसे बड़ा पहलू झारखंड मुक्ति मोर्चा के आन्दोलन का रहा, वह था शराब-खोरी के खिलाफ संघर्ष। इसमें कार्यकर्त्ता सीधे शराब की भट्टियों पर धावा बोलते, तोड़फोड़ कर डालते। शराबियों को पकड़कर पीटते। उन्हें पानी में डूबा-डूबा कर उसका नशा तोड़ते। कार्यकर्त्ता पता लगाते कि कौन चोरी-छिपे इस धंधे में लिप्त है, उसका पता लगाते एवं उसे धंधे को छोड़ने के लिए मजबूर करते। गाँवों में औरतों के बीच जाते और उन्हें अपने-अपने शराबी पतियों की आदत छुड़ाने के लिए प्रोत्साहित करते। औरते इस आन्दोलन का समर्थन जोरदार ढंग से करती एवं अपने शराबी पतियों से लडती झगड़ती।
इस प्रकार इन आन्दोलनों ने बहुत सारे जुझारू, लड़ाकू कार्यकर्त्ता पैदा किए। पर समाज का शोषक-शासक वर्ग चुप नहीं बैठे रह सकता था। इन आन्दोलों को कुचलने के लिए पुलिस-प्रसाशन, जमींदार, सूदखोर, महाजन, माफिया, गुंडे सभी सक्रिय हो उठे। नतीजा यह हुआ कि कई बड़े-बड़े संघर्ष हुए। चोरी-छिपे कार्यकर्त्ताओं, नेताओं की हत्याएँ की जाने लगीं। घात लाकर इन आन्दोलनों के अगुआओं को खोजकर मारा जाने लगे। शहीदों की लम्बी कतारें हो गई। पर कार्यकर्त्ता और जनता भी प्रतिकार में उतर आई। और वर्षो तक दोनों तरफ से संघर्ष चलने लगा।
1975 में ही गोमो में जिला धनबाद के सदानन्द झा शहिद हो गये। उन्हें अकेले पाकर आतताइयों ने गोली मार दी। 1977 में शक्ति नाथ महतो टाटा सिजुआ में शहीद हो गये। उन्हें काँग्रेस के गुंडों ने दिन दहाड़े बम गोलियों से मार डाला। उसी प्रकार इस कोयलाचंल में रसीक हाँसदा, नेपाल रवानी आदि दर्जनों शहीद हुए।
1975 में गोमो की रेल नगरी में सदानन्द झा शहीद हुए तथा 1977 में टाटा-सिजूआ तेतुलमुड़ी के शक्ति नाथ महतो शहीद हुए। ये दो प्रमुख कार्यकर्त्ता नेताओं की शहादत के बाद तो मानों पूरे दक्षिणी छोटानागपुर में आन्दोलन में उफान आ गया। फिर 1987 में जमशेदपुर में झारखंड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष निर्मल महतो को भी आतताइयों ने मार डाला। उनकी शहादत के बाद तो मानों पूरे दक्षिणी छोटानागपुर में आग ही लग गई। इसके अलावे इचागढ़ के अजीत महतो, धनंजय महतो आदि शहीद हुए। गुवा में 1982 में प्रसिद्ध गोली कांड हुआ जिसे आज गुआ गोली कांड के रूप में याद किया जाता है, इसके अलावे अनेकों शहीद हुए। हजारों जेल गये। रिटायर्ड आर्मी के जवान कंडुलना की पुलीस इन्काउटर दिखा कर हत्या कर दी।
संथाल परगना में भी यही हाल रहा। यहाँ उन तमाम घटनाओं का जिक्र करना संभव नहीं हैं। आम झारखंडी शोषित जनता ने भी प्रतित्चुर में हथियार उठा लिए। कई बड़े-बड़े संघर्ष पुलिस-प्रशासन के साथ हुए। महाजन, सामंतो के बिरूद्ध भी जम कर सशस्त्र संधंर्ष हुए। इस प्रकार 1990 तक आते-आते इस पार्टी के बीस विधायक एवं 1991 में छः सासंद बन गये। उन सांसदो के नाम है- श्री बिनोद बिहारी महतो, शिबू सोरेन, सूरज मंडल, शैलेन्द्र महतो, कृष्णा मार्डी, साइमन मरांडी। फिर बाद में 1992 के जून में गिरीडिह संसदिय क्षेत्र में बिनोद बिहारी महतो का निधन के बाद उपचुनाव हुआ जिसमें उनके पुत्र राज किशोर महतो सासंद बने।
Tuesday, October 26, 2010
झारखण्ड मुक्ति मोर्चा का जन्म, उसकी पृष्ठभूमि एवं विचार-धारा
उपरोक्त अवधारणा एक क्रांतिकारी अवधारणा थी। एक ऐसा चिंतन था जिसे सरजमीन पर उतारना कठिन काम था। क्रांतिकारी परिवर्त्तन के लिए क्रांतिकारी परिस्थिति का होना जरूरी है। बिनोद बाबू ने पाया कि झारखंड क्षेत्र में क्रांतिकारी परिस्थिति पैदा हो चुकी थी। यहाँ के लोगों एवं मजदूरों का शोषण इतना तेज था कि कभी भी विस्फोट हो सकता था। पर इस विस्फोट के लिए लोगों को संगठित करना जरूरी था एवं सही दिशा देने की आवश्यकता थी जिसे बिनोद बाबू करना चाहते थे। यानि क्रांतिकारी परिवर्त्तन के लिए क्रातिकारी दल का गठन करना चाहते थे। यह क्रांतिकारी दल निश्चित तोर पर वैसे ही लोगों के द्वारा गठित किया जाना चाहिए, जो वास्तव में समाज में परिवर्त्तन चाहते है तथा जो क्रांतिकारी परिवर्त्तन लाना जरूरी समझते है यानि जिसे वास्तव में इस परिवर्त्तन की आवश्यकता है। सिर्फ क्रांति की बातें करने वाले शौकिया लोगों से क्रांतिकारी दल का गठन नहीं हो सकता। यानि शोषित, दलित, पिछड़े-अनुसूचित जनजाति, हरिजन, गरीब, प्रताड़ित लोगों के द्वारा ही ऐसा दल गठित होना चाहिए, जिन्हें वास्तव में अपने लिए ऊपर उठना है, जिन्हें सामाजिक न्याय पाना है। वैसे नेताओं एवं लोगों द्वारा समाज में परिवर्त्तन नहीं आ सकता जो सिर्फ सत्ता तक पहुचने के लिए झूठ, दिखावा, तिकड़म का सहारा लेकर आगे बढ़ते है। अतः उस परिस्थिति में झारखंड क्षेत्र के महतो, माँझी, मुंडा, बाऊरी, डोम, चमार, रजवार, रवानी आदि दलित जातियों में से ही संगठन बनाने के लिए बिनोद बाबू आगे बढ़े।
वैचारिक शक्ति रखने वाले बिनोद बिहारी महतो ने पाया कि प्रजातंत्र यानि डेमोक्रेसी भारतवर्ष में स्थापित होने के पहले ही दम तोड़ रहा था। कोर्ट-कचहरी तक में गरीब को न्याय मिलना असंभव था। कोर्ट-कचहरियाँ बड़े लोगों की इच्छा के अनुरूप फेसला सुना रही थी। थाना-पुलिस प्रशासन निरकुंश हो चुका था। इस परिस्थिति में जब आदिवासी एवं गैर-आदिवासी दोनों वर्ग पीस रहे थे, तो इन दोनों नेताओं ने अपने जातीय संगठन के माध्यम से अपने लोगों को जगाना शुरू किया, सचेत करना शुरू किया। दोनों जातियों के झगड़ो का फेसला समाज में पंचायत बुलाकर किया जाने लगा। दोनों समाजों का अपना-अपना कायदा-कानून बहुत पहले से बना था। इन परम्पराओं में, कस्टम में, बाइसी था कुड़मी-महतो का सर्वोच्य संगठन। महतो परगनैत, प्रमुख, परगनैत होते थे। संथालों में भी माँझी मानकी कस्टम था। समाज को चलाने के लिए अपने वसूल थे। ये कायदे सदियों से चले आ रहे थे। थाना-पुलिस या कोर्ट जो ब्रिटिश-शासन ने इस क्षेत्र में स्थापित किए थे, वहाँ जाकर न्याय पाने के लिए लोग इच्छुक नहीं थे। कालान्तर में महतो-माँझी एवं अन्य जनजातिय समुहों की पंचायत व्यवस्था क्षीण होने लगी और वर्त्तमान ब्रिटिश व्यवस्था हाबी हो गया। इन दोनों नेताओं ने फिर अपने लोगों को पुरानी पंचायत, पहड़ा परगनैत व्यवस्था की तरफ मौड़ा।
कोयलाचंल में इन दो संगठनों से प्रेरणा लेकर “मंडल-समाज” एवं “तेली-समाज” आदि संगठन पिछड़ी जातियों के लोगों के द्वारा बनाये गये।
जैसा कि हमने पहले ही देख लिया है कि 1970 तक आते-आते कोलियरियों के विस्तार के साथ-साथ कोयलाचंल में अनेक बड़े-बड़े उद्योग लगे, परियोजनाएँ बनी तथा इनके अनुसंगिक उद्योग, कल कारखाने लगाए गये। इससे मजदूरों की संख्या में भारी वृद्धि हुई। यहाँ स्थानीय ग्रामीण मजदूरों से बहुत ज्यादे बाहर प्रदेशों, उत्तरी बिहार से मजदूरो का आवागमन हुआ एवं यहाँ बसने लगे। मजदूरों के बीच मजदूर ट्रेड यूनियनों का जन्म धड़ल्ले से होने लगा। 1972 तक कोल कम्पनियों के राष्ट्रीयकरण के पहले बाहरी बिदेशी कोल कम्पनियाँ हुआ करती थी। इनमें बंगाल कोल कम्पनी, बर्ड्स कोल कम्पनी, मैकलीन बैरी आदि प्रमुख थी। इनके अलावा भारतीय कोल कम्पनियाँ टाटा कम्पनी, के0 वोरा, चनचनी ग्रुप, अर्जुन अग्रवाल ग्रुप आदि थी। इसके अलावे झारखंड क्षेत्र के दूसरे हिस्सों में औद्योगिकरण जोरों पर था।
यहाँ के ज्यादातर मजदूर काँग्रेस द्वारा संचालित इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन काँग्रेस के सदस्य होते थे कोलियरियों, उद्योगों आदि प्रतिष्ठान सिर्फ इस ट्रेड यूनियन की बातें सुनते थे। इसका नतीजा यह हुआ कि ट्रेड यूनियन के नेतागण निरंकुश हो उठे अवं मजदूरों के हित की बात नहीं करके प्रबन्धन के दलाल बन गये। माफिया-नेताओं का जन्म हुआ। इन्होने न सिर्फ मजदूरों के ऊपर सूदखोरी किया, बल्कि शराब की लत डाली। ये राजनीति में, सक्रिय हो उठे और इस कोयलाचंल का प्रतिनिधित्व विधान-सभा एवं संसद में करने लगें।
पर इसी समय इस कोयलाचंल के सिन्दरी खाद कारखाने में काम करने वाले श्री अरूण कुमार राय यानि श्री ए0 के0 राय एक नौजवान ट्रेड यूनियन के नेता के रूप में उभरे। श्री राय सिन्दरी कारखाने में एक शोधकर्त्ता वैज्ञानिक थे। सिन्दरी कारखाने एवं अन्य कारखाने के मजदूर सम्बन्धी समस्याओं से ये जूड़े रहते थे तथा प्रबंधन विरोधी रवैये के कारण एवं मजदूरों के हक में आवाज उठाने के चलते उन्हें नौकरी से हाथ धोना पड़ा।
इन्होने बिनोद बिहारी महतो जिन्हें प्यार से लोग “बाबू” कहा करते थे, का नाम सुन रखा था। उस समय बिनोद बाबू भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी में थे। ए0 के0 राय ने बिनोद बिहारी महतो से सम्पर्क साधा। नौकरी छूट जाने के बाद ए0 के0 राय बिनोद बाबू के संरक्षण में सिन्दरी में टिक गये एवं राजनैतिक गतिविधियों में सक्रिय हो उठे। ये श्री राय के अभिभावक की तरह थे। ए0 के0 राय की माता जी पश्चिम बंगाल से अक्कसर बिनोद बाबू को पत्र लिखा करती थी कि वे उनके बेटे का ख्याल रखें। बिनोद बाबू उन्हे बहुत चाहने लगे थे। उन्हे बिनोद बाबू ने कई मामलों में, मुकदमें में छुड़वाया तथा जेल में सड़ने से बचाया। यहाँ तक की बिनोद बाबू ने सिन्दरी विधान सभा सीट जो उनकी गृह-सीट थी, श्री राय के लिए छोड़ दी और 1967 में उन्हें प्रथम बार विधायक बना डाला। अपनी तैयार की हुई सीट पर उन्हें स्थापित कर दिया। स्वयं टुंडी विधान सभा की तरफ चल दिए।
श्री राय झारखंड क्षेत्र के मूल निवासी नहीं थे। बंगाल के किसी स्थान के रहने वाले श्री राय को बिनोद बाबू के संरक्षण में बहुत बड़ी उपलब्धि मिली। श्री राय ने “बिहार कोलयरी कामगार यूनियन” नामक ट्रेड यूनियन का गठन किया। श्री राय की पृष्ठभूमि वामपंथी थी। बिनोद बिहारी महतो ने 1967 में जब भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी का विभाजन हुआ, कम्युनिष्ट पार्टी (मार्क्सवादी) का दामन थामा।
बिनोद बिहारी महतो ने अपने विचारों को अमली जामा पहनाने के लिए एक नई पार्टी के गठन की बात सोची। और उन्होने शिबू सोरेन ए0 के0 राय आदि सभी कार्यकर्त्ता, नेताओं को बुलाया और बैठक की। आदिवासियों की लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें शिबू सोरेन यानि उस समय के शिवलाल माँझी उन्हें उपर्युक्त लगे। तथा मजदूर आन्दोलन को झारखंड आन्दोलन के साथ जोड़ने के लिए उन्हें ए0 के0 राय उपर्युक्त लगे।
राजनैतिक दल के नामाकरण के विषय में विचार विमर्श किया जाने लगा। बिनोद बाबू तथा शिबू सोरेन चाहते थे कि नाम में “झारखंड” शब्द अवश्य रहे। झारखंड पृथक राज्य के लिए संघर्ष करना इस राजनैतिक पार्टी का उद्देश्य होगा, यही तय किया गया था, दोनों नेताओं के द्वारा। श्री राय चाहते थे कि इसमें वर्ग-संघर्ष की अवधारणा दिखाई दे। झारखंड नामधारी कई पार्टियाँ झारखंड में कार्यरत थी, अतः एक नया नाम ढूँढना मुश्किल लग रहा था। वहीं पर उस बैठक में बिनोद बाबू के बड़े पुत्र राज किशोर महतो भी उपस्थित थे। 1968 में ईंजीनियरिंग (माइनिंग) की डिग्री धनबाद के ही इंडियन स्कूल ऑफ माइन्स से हासिल किया था, और उन दिनों धनबाद के पास ही कोलियरी में कार्यरत थे। राजनैतिक गतिविधियों खासकर शिवाजी समाज के आन्दोलनों में भी प्रत्यक्ष रूप से हिस्सा लिया करते थे। नामकरण की चर्चा के दौरान उनके मन में एक विचार आया एवं एक नाम बिजली की तरह उनके दिमाग में कौंध गया। उन्होनें उस नाम का प्रस्ताव दे डाला। वह नाम था “झारखंड मुक्ति मोर्चा” ऐसे नाम के पिछे उन्हेनें जो तर्क दिया सभी को पसन्द आ गया। तीन व्यक्ति अपनी-अपनी विचार-धारा का समावेश चाहते थे, नये नाम में, अतः यह एक मोर्चा का ही रूप ले सकता था। दूसरे इसके नाम में झारखंड शब्द भी चाहते थे और झारखंड को शोषण मुक्त करना चाहते थे, सो यह नाम सबसे उचित प्रतीत हुआ। इसमें स्थानीय झारखंडी एवं वैसे लोग जो शोषण-मुक्ति की लड़ाई लड़ना चाहते थे सभी का समावेश इसमें झलकता था। इस झंड़े का रंग जाहिर है हरा ही होना था क्योंकि श्री राय ने उन्ही दिनों “मार्क्सवादी समन्वय” नामक राजनैतिक पार्टी का गठन कर लिया था और उसे अलग से चलाना चाहते थे। झारखंड मुक्ति मोर्चा को वे सिर्फ सहयोगी दल मानकर चलना चाहते थे। बिनोद बाबू के लड़के राज किशोर महतो ने इस मोर्चे का चुनाव चिन्ह “तीर-धनुष” रखवा दिया जो झारखंड का लोकप्रिय परम्परागत हथियार के साथ-साथ उसकी पहचान भी थी। इसका विधिवत् गठन चार फरवरी 1973 को किया गया एवं बिनोद बिहारी महतो इसके प्रथम अध्यक्ष बने तथा शिबू सोरेन महामंत्री। चार फरवरी को 1973 में ही धनबाद के प्रसिद्ध गोल्फ मैदान में इसका पहला स्थापना दिवस मनाया गया। और तब से प्रतिवर्ष मनाया जाता है।