देश में अलग राज्य बनाने के आधार
अलग-अलग प्रदेश बनाने के आधारों की खोज काफी पहले से शुरू हो चुकि थी। भारतवर्ष की आजादी के पहले से ही उन कारणों या आधारों की खोज की जाने लगी थी जिनके सहारे किसी नये राज्य का गठन जनता एवं देश के हित के लिए किया जा सके।
अंग्रेजों ने राज्यों की सीमाओं को बदला एवं नये राज्यों का गठन किया था, सिर्फ अपनी राज्य सत्ता को आसानी से चलाने के लिए। उनके सामने संस्कृति, भाषा या और कोई आधार नहीं था। “फुट डालो एवं राज्य करो” की नीति के तहत यहाँ के निवासियों को विभाजित करने के लिए भी उन्होने राज्यो की सीमाओं का निर्माण उसी प्रकार किया था। सीमाओं का निर्धारण इस प्रकार किया था, कि एक सीमा के अन्दर रहने वाले लोग आसानी से एक न हो सके और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बगावत न कर सकें। यही कारण है कि हिन्दुस्तान में उत्तर की तरफ जो भूमि थी, उसे उत्तर प्रदेश का नाम दे दिया। ठीक उसी प्रकार मध्य भारत की भूमि का नाम मध्य प्रदेश दे दिया गया। इनके इतिहास, भूगोल, सभ्यता-संस्कृति का ख्याल रखते हुए, नामकरण नहीं किया गया। बंगाल के अंदर पहले बिहार, उड़ीसा, आसाम तक समाहित था। “दी इंडियन कान्सटीचूसनल रिर्फामस 1918” तथा “दी इंडियन स्टेचुटेरी कमीशन 1930” से स्पष्ट हो जाता है कि जो स्वरूप अंग्रेजों ने बनाया था, जो नक्सा ब्रिटिश हुकूमत ने बनाया था, वह सिर्फ उनके सैनिक दृष्टिकोण को मद्देनजर रखते हुए बनाया था। सिंधू एवं बाम्बे प्रोविंस भी इसी उद्देश्य से बनाये गये थे। बंगाल, बिहार, उड़ीसा, का गठन भी इसी उद्देश्य से, उसी प्रशासनिक दृष्टिकोण से किया गया था, ताकि भारतवर्ष की एक समान सभ्यता-संस्कृति के लोगों को अलग-अलग राज्यों में विभक्त करके रखा जा सके। उनकी भाषा-संस्कृति को गड़मड़ करके रखा जा सके। और तभी तो उनकी भाषा एवं उनका प्रशासन चल सकता था।
बींसवी सदी के दूसरे दशक में, 1920 में नागपुर के अधिवेशन में, तथा काँग्रेस ने 1929 में “दी स्टेचुटरी कमीशन” यानि साइमन कमीशन के समक्ष उत्कल आंध्र, सिंध एवं कर्नाटक के गठन की माँग भाषा-भाषाई आधार पर रखा था। फिर उन्नीस सौं अठाइस में “दी नेहरू कमिटी” “ऑफ ऑल पार्टी कान्फ्रेस” ने भी राज्यों के पुर्नगठन के लिए भषाई आधार की वकालत की। यहाँ तक की काँग्रेस ने अपने उन्नीस सौ पेंतालीस-छयालीस के इलेक्सन मेनिफेस्टो में इसी बात को दोहराया कि प्रशासनिक ईकाइयों का निर्माण भाषा एवं संस्कृति को देखते हुए किया जाय।
आजादी के बाद काँग्रेस ने इस दिशा में थोड़ा सा परिवर्त्तन किया। उन्नीस सौ सेंतालीस में “दी लिगविस्टीक प्रोविन्सेस कमिटी” यानि “धर-कमिटी” ने भाषाई सिद्धान्त को मान्यता देने लायक नहीं समक्षा। “जवाहरलाल विठ्ठल भाई कमिटी” जो उन्नीस सौ अड़तालीस की इंडियन नेशनल काँग्रेस की कमिटी थी, ने इस सिद्धान्त के विरूद्ध चेतावनी दी। हाँलाकि काँग्रेस के भाषाई आधार ने उन्नीस सौ तिरपन में आन्ध्रप्रदेश को जन्म दिया, जब काँग्रेस के पोट्टी श्री रामलू ने आमरण अनशन इसी संदर्भ में किया। उन्नीस सौ चौवन में भाषाई संकोर्णता एवं धार्मिक आधार से उत्पन्न संकट से उबरने के लिए न्यायमूर्ति फजल अली की अध्यक्षता में “राज्य पुर्नगठन आयोग” बना।
उन्नीस सौ छप्पन में इसकी जो रिपोर्ट आई उसमें “भाषाई-समानता” यानि “लिंग विस्टीक होमोजिनीयलिटी” को एक महत्वपुर्ण आधार माना गया, राज्यों की सीमाओं को निर्धारित करने के मामले में। इससे गहरा असंतोष जगा एवं देश में हिंसा भी भड़की। आयोग जातीय भावनाओं को संतुष्ट करने में अक्षम रहा। ये भावनाएँ देश में उस समय तक काफी प्रबल हो चुँकि थी। यही कारण है कि राज्य पुर्नगठ आयोग की रिपोर्ट का बहुतों ने स्वागत नहीं किया। काँग्रेस-पार्टी ही नहीं, बल्कि शोसलिस्ट पार्टी के राम मनोहर लोहिया ने भी भाषाई-आधार को माना एवं प्रोत्साहित किया। उन्नीस सौ साठ में बम्बई का विभाजन हुआ, तथा महाराष्ट्र एवं गुजरात भषाई-आधार पर बने। उन्नीस सौ छयासठ में पंजाब एवं हरियाणा बने। इसके बाद भी अनेक राज्य बने जिनके आधार में भाषाई-आधार एक महत्वपुर्ण तत्व के रूप में विद्यमान रहा।
वे राज्य हैं- नागालैंड (उन्नीस सौ सन्तावन) हिमाचल प्रदेश, मेघालय (उन्नीस सौ सत्तर), मणिपुर, त्रिपुरा, अरूणाचल प्रदेश एवं मिजोरम, मद्रास के विभाजन के बाद तमिलनाडू एवं कर्नाटक (उन्नीस सौ इकहत्तर) झारखंड राज्य के साथ-साथ कई अन्य जगहों पर भी पृथक राज्य की माँगे उठी। ये हैं- गोरखालैंड, (बंगाल से), उत्तराखंड (उत्तर प्रदेश से), छत्तीसगढ़ (मध्य प्रदेश से), तेलंगना (आन्ध्र प्रदेश से) विदर्भ (महाराष्ट्र), बोड़ोलैंड़।
भारत के संविधान में इस बात की चर्चा कहीं नहीं है कि नये राज्यों या पृथक राज्यों के गठन का अधार क्या हो। संविधान के प्रथम अध्याय की धारा-2 से चार तक नये राज्यों के गठन की बात कही गई है। भारतीय संविधान में सिर्फ इतना ही कहा गया है कि “जैसा कि संसद उचित समझे”, किसी निश्चित आधार के दायरे में नये राज्यों के निर्माण को बाँधा नहीं गया है। इसे संसद के द्वारा विचार करने के लिए खुला छोड़ दिया गया। परिस्थिति के अनुरूप स्वतंत्र निर्णय ले सकता है। संसद को यह भी आधिकार दिया गया है कि वह चाहे तो एक राज्य या उससे अधिक राज्यों का गठन कर सकती है। उसके लिए संबंधित राज्यों के राज्य सरकारों से सहमति प्राप्त करना भी आवश्यक नहीं माना गया है। असहमति जाहिर करने के बाद भी संसद को अधिकार है कि वह नये राज्य के गठन से संबंधित विधेयक को संसद में पारित करवा सकती है।
इस बात का भी जिक्र संविधान में नहीं है कि नये राज्य का गठन सिर्फ आदिवासी या जनजाति बाहुल क्षेत्रों के लिए ही किया जा सकता है और गैर-आदिवासी या गैर-जनजाति बाहुल क्षेत्रों के लिए नहीं किया जा सकता।
Friday, August 27, 2010
Monday, August 16, 2010
झारखंड अलग राज्य की माँग –
जैसा कि हमने देखा कि बिरसा आन्दोलन के समय एवं उसके बाद बींसवी सदी के प्रारम्भिक दो-तीन दशकों तक सामाजिक सुधारों, धार्मिक गति-विधियों का जोर झारखंड़ क्षेत्र में रहा। शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए यानि ब्रिटिश-सरकार द्वारा चलाए गए शिक्षा के प्रचार एवं प्रसार के लिए ईशाई मिशनरियों ने काम करना शुरू दिया था। “सुयारन ग्रेजुएट” ने शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए “क्रिसचीयन एसोसिएशन” की स्थापना की थी। आंगलिक मिशन के जे0 बोर्थेलमैन ने 1911-12 में ढाका में आयोजित छात्र संघ का उद्देश्य गरीब ईशाई छात्रों की शिक्षा के लिए राशि जुटाना था। एक और ईशाई नेता ने मुंडा-उराँव एजुकेशन काँग्रेस (यक्षा-सभा) तथा राँची यूनियन ने शहरी आदिवासियों के बीच शिक्षा का प्रसार करने का कार्य किया। 1918 ईस्वी के बाद जब संवैधानिक सुधारों के युग का सूत्रपात हुआ, तथा क्षेत्रिय एवं छोटे हितों की रक्षा तथा संवर्द्धन की मांग जोर पकड़ने लगी, तो शिक्षित ईशाई जनजातियों ने राँची के आंगलिक विषय के कहने पर छोटानागपुर विकास सोसाईटी को संगठित करने में सहायता की थी। ये शिक्षित आदिवासी अधिकत्तर जर्मन एवं आंगलिक मिशनों के छात्र थे।
जे0 बोर्थेलमैन आदिवासी ईशाई थे। इनके बाद स्टुडेन्ट यूनियन छात्र संघ का संचालन जोयले लकड़ा तथा बेदी उराँव ने किया। 1920 ईस्वी में छोटानागपुर उन्नति समाज की स्थापना हुई। “किसान सभा” बनाई गई जिसकी स्थापना थेबले उराँव ने की थी। इसके अलावे कैथोलिक ईशाईयों ने कैथोलिक सभा की स्थापना की थी। इसमें सदस्यता आंगलिक मिशन, लूथेरन मिशन तथा आदिवासियों तक ही सीमित रखा गया था। “छोटानागपुर कैथोलिक सभा” एक सामाजिक, धार्मिक संस्था थी। बाद में इसका राजमैतिक रूप भी उभरा। “छोटानागपुर उन्नति समाज” में भी गैर-आदिवासियों यानि गैर-जनजातियों को सदस्य नहीं बनाया जाता था।
कालान्तर में “छोटानागपुर उन्नति समाज” “किसान सभा” एवं छोटानागपुर कैथेलिक सभा ने मिलकर “आदिवासी महासभा” 1938 में बनाई। इसे पहले इगनियस बेक के नेतृत्व में बनाया गया।
जे0 बोर्थेलमैन ने छोटानागपुर उन्नति समाज के मंच से पहली बार झारखंड अलग राज्य बनाने की माँग को उठाया। आदिवासी बाहूल क्षेत्रों को मिलाकर एक अलग प्रदेश की माँग इस प्रकार 1920 में उठी। इस उन्नति समाज की गतिविधियाँ 1920 से 1938 तक चली, जबतक “”आदिलवासी महासभा” गठित नहीं हो गई।
जे0 बोर्थेलमैन आदिवासी ईशाई थे। इनके बाद स्टुडेन्ट यूनियन छात्र संघ का संचालन जोयले लकड़ा तथा बेदी उराँव ने किया। 1920 ईस्वी में छोटानागपुर उन्नति समाज की स्थापना हुई। “किसान सभा” बनाई गई जिसकी स्थापना थेबले उराँव ने की थी। इसके अलावे कैथोलिक ईशाईयों ने कैथोलिक सभा की स्थापना की थी। इसमें सदस्यता आंगलिक मिशन, लूथेरन मिशन तथा आदिवासियों तक ही सीमित रखा गया था। “छोटानागपुर कैथोलिक सभा” एक सामाजिक, धार्मिक संस्था थी। बाद में इसका राजमैतिक रूप भी उभरा। “छोटानागपुर उन्नति समाज” में भी गैर-आदिवासियों यानि गैर-जनजातियों को सदस्य नहीं बनाया जाता था।
कालान्तर में “छोटानागपुर उन्नति समाज” “किसान सभा” एवं छोटानागपुर कैथेलिक सभा ने मिलकर “आदिवासी महासभा” 1938 में बनाई। इसे पहले इगनियस बेक के नेतृत्व में बनाया गया।
जे0 बोर्थेलमैन ने छोटानागपुर उन्नति समाज के मंच से पहली बार झारखंड अलग राज्य बनाने की माँग को उठाया। आदिवासी बाहूल क्षेत्रों को मिलाकर एक अलग प्रदेश की माँग इस प्रकार 1920 में उठी। इस उन्नति समाज की गतिविधियाँ 1920 से 1938 तक चली, जबतक “”आदिलवासी महासभा” गठित नहीं हो गई।
झारखंड़ में बदली परिस्थिति
इस औद्योगिक विस्तार के लिए लाखों एकड़ जमीन सरकार के द्वारा अधिग्रहित की गई, सरकारी उपक्रमों एवं पब्लिक अंडरटेकिन्डस के लिए। हजारों एकड़ खेती योग्य भूमि नदियों पर बाँधे गये बाँधों में डूब गये। हजारों एकड़ जंगल साफ हो गये। इन उद्योगों में नौकरी, व्यवसाय, रोजगार, ठेकेदारी पाने के लिए झारखंड क्षेत्र से बाहर के लोग तेजी से भारी तादाद में यहाँ आने लगे। यहाँ जो शहर औद्योगिकरण के चलते बसे उनमे बाहरी क्षेत्र के लोग बसते गये। स्थानीय मूलवासी इन शहरों से दूर हटने लगे। नये नव धनाद्य लोगों का दल पनपने लगा। मॉफिया-संस्कृति पनपी। अपराध बढ़ने लगे।
झारखंड के मूलवासियों को चोतरफा मार झेलनी पड़ी। एक तो वे अपनी जमीनों से विस्थापित होने लगे। जमीनों से विस्थापित होने के साथ-साथ बाहरी संस्कृति के प्रवेश से झारखंडियों का सांस्कृतिक-विस्थापन भी शुरू होने लगा। झारखंड क्षेत्र के लोग वैसे ही सीधे-साधे स्वभाव वाले होते हैं। फिर अशिक्षा के चलते सरकारी महकमों मे भी कम थे सरकारी नौकरी से वंचित थे, नये खुलने वाले कलकारखानो, खदानो मे भा इन्हे नौकरी नहीं मिली। इन्हें कोई हिस्सेदारी नहीं दी गई। बहुत कम लोग स्वतंत्र व्यवसाय करना जानते थे। फिर इनके पास पूँजी भी नहीं थी। पदाधिकारी चाहे सरकारी हो, या प्राइवेट कम्पनियों के सभी बाहरी व्यक्ति।
जंगलों से भी मूलवासी -आदिवासियों का विस्थापन होने लगा। जंगल के कानून मूलवासियों के हक में नहीं हेने के कारण, जिन जंगलों पर उनका जीवन आश्रित था, वे जंगल ही उनके लिए बेकार होने लगे। जंगल पर आधारित झारखंडियों का जीवन नष्ट होने लगा। जंगल की सारी सम्पदा, उनका उत्पाद फूल, फल, कंद, पत्ते-पौधे, पेड़ जड़ी बूटी सभी का सरकारी करण हो गया। जंगल के पहाड़ो के पत्थर, मोरम, बाँस, घाँस, नदी, नाले सभी सरकारी हो गये।
औद्योगिकरण का यह विस्तार, झारखंड़ की सम्पदा का जोरदार दोहन 1970 तक आते-आते काफी प्रचंड रूप से हो गया था। इसके कई दुष्परिणाम सामने आए। सरकारी उपेक्षा के चलते विस्थापितों को कभी उचित मुआवजा भुगतान नहीं मिला। दशकों तक मुआवजा भुगतान नहीं किया गया। उनके पुर्नवास की कोई नीति नहीं बनाई गई। न ही उनका पुर्नवास किया गया। कोई अपने हक अधिकार की बात करता तो उन्हें गोलियों से भूँजा जाता। महाजनी शोषण, सूदखोरी अपने चरम पर पहुँच चुका था। संगठित रूप से, षंड़यंत्र करके शराब खोरी की आदत मूलवासियों, आदिवासियों में डाली जा रही थी। स्थिति ऐसी बन गई कि झारखंड़ी औने-पौने दामों पर अपनी जमीनें बेच देते। या फिर सूदखोर-महाजन उन पर कब्जा कर लेते।
प्रतिवर्ष झारखंड के गरीब लोग देश के दूसरे प्रदेशों में मजदूरी करने के लिए पलायन करने लगे। पंजाब, हरियाणा तथा पश्चिम बंगाल आदि प्रदेशों में खेत-मजदूर या ईंट भट्ठों में मजदूरी करने चले जाते। अपना परिवार, घर-द्वार छोड़कर पलायन करने लगे। त्रासदी तो यह हुई कि बाहर प्रदेशों से लोग झारखंड क्षेत्र में लोटा-कम्बल, झोंटा-सोटा लेकर आने लगे और पैरवी के बल पर करोड़पति बनने लगे, पर झारखण्ड के लोग पेट भरने के लिए बाहर पलायन करने लगे। अपने ही धर मे लगे उद्योगों, परियोजनाओं का कोई लाभ झारखंड़ियों को नहीं मिलने लगा। विकास के नाम पर झारखंड़ियों का विनाश शुरू हुआ। स्थानीय लोगों की जमीनों पर बाहर से आए लोगों ने कब्जा करना शुरू कर दिया। माफिया-संस्कृति के उदय के साथ ही पूरे झारखंड में आतंक का साम्राज्य बनने लगा। इनके आतंक से स्थानीय लोग त्रस्त रहने लगे। थाना-पुलिस, प्रशासन में स्थानीय लोगों के नहीं रहने के कारण, लूट एंव शोषण चरम सीमा पर पहुँच गया। छोटानागपुर काश्तकरी अधिनियम एवं संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम सिर्फ नाम के लिए रह गये। इन्हें ताख पर रखकर जमीनों का हस्तांतरण किया जाने लगा। सरकारी जमीनों की बन्दोबस्ती स्थानीय आदिवासी, हरिजन, गरीब, पिछड़े लोगों को नहीं करके धनी-मानी एवं बाहर से आए लोगों के हाथों कर दिया जाने लगा। झारखंडियों से जल-जंगल एवं जमीन के परम्परागत अधिकार छीनने लगे।
औद्योगिकरण के चलते प्रदुषण बढ़ने लगा। जंगल का विनाश होने लगा। प्रदुषण के चलते जमीनों की उत्पादकता पर बहुत बुरा असर पड़ा। फसल का उत्पादन घट गया। सभी नदियों, नालों, झरनों, तलाबों, जलाशयों का पानी प्रदुषित हो गया। पर्यावरण में असंतुलन पैदा हो गया। झारखंडियों की जीवन-शैली छिन्न-भिन्न होने लगी। विकाश के इस दौड़ में अशिक्षित, गरीब भोले झारखंडी पीछे पड़ गये।
आप देखेगें कि बिहार में आदिवासी जनसंख्या में लगातार कमी हुई है जो 1951 में 10.07 प्रतिशत से कम होकर 1981 की जनगणना में 8.13 प्रतिशत हो गई। यह कमी झारखंड क्षेत्र में सर्वाधिक बताई गई है। आदिवासियों की जनसंख्या 1951 में 36.81 प्रतिशत था। 1981 में यह घटकर 30.25 हो गया। आज की तारीख में यानि 2001 की जनगणना में यह मात्र 22 प्रतिशत रह गई है। यह सब बाहर से आकर बसने वाले गैर-आदिवासी जनसंख्या के कारण हुआ। इसका एक अन्य कारण भारी तादाद में आदिवासी जनसंख्या के बाहर पलायन करने का है। कई आदिवासी समुदाय तेजी से बदलती हुई परिस्थिति में अपने अस्तित्व की रक्षा भी नहीं कर पाये। बदले आर्थिक दौर एवं सामाजिक परिवेश से तालमेल नहीं बैठा पाने के कारण हतोत्साहित होकर बैठ गये। प्रायः सुप्त हो गये। इसमें बिरहोर, पहाड़ियाँ जातियाँ लुप्त हो गई है।
बिहार के अन्य जिलों यानि झारखंड क्षेत्र से बाहर के जिलों से आकर बसने वाले प्रवासियों की संख्या में धीरे-धीरे वृद्धि हुई। यह वृद्धि जो 1961 में 11.7 लाख से बढ़कर 1971 में 14.6 लाख हो गई। यह आबादी 1981 में बढ़कर 21.4 लाख हो गई। इस अवधि में बाहर से आकर बसने वाले प्रवासियों का प्रतिशत 10.6 प्रतिशत से बढ़कर 12.16 हो गई। राँची में यह प्रतिशत 5.96 से बढ़कर 8.62 प्रतिशत हो गई। औद्योगिक क्षेत्रों में यह प्रतिशत निश्चय ही इससे अधिक बढ़ गया। यह दबाव शहरों में सबसे ज्यादें हुआ। इतने लोगों के आने से जमीन एवं अन्य संशाधनों, रोजगार, शिक्षा, चिकित्सा और अन्य सुविधाओं पर अत्यधिक दबाव पड़ा।
आदिवासी बहूल जिले यानि जनजाति बाहूल जिले अल्पसंख्यक जिले हो गये। संथाल परगना एवं सिंहभूम इसके उदाहरण हैं। शहरी जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हुई है और बाहरी जनसंख्या ही इसमें ज्यादे है। इसके अलावा जनजातिय जनसंख्या का शहरीकरण हुआ है। ग्रामिण क्षेत्रों की जनजातिय जनसंख्या में कमी आई है। झारंखंड़ क्षेत्र में औद्योगिक मजदूरो की संख्या बढ़ी है। इसमें भी बाहरी मजदूर सर्वाधिक है। आज जब लोक-सभा तथा विधान सभा क्षेत्रों का परिसीमन किया जा रहा है, तो देखा जा रहा है कि शहरी क्षेत्रों में सीटें बढ़ गई एवं सूदूर आदिवासी क्षेत्रों में कम हो गई।
इस अवधि में यानि बींसवी शताब्दी के चौथे दशक के बाद से जो सबसे कठिन समस्या पैदा हुई, वह यह कि “स्थानिय” शब्द का विस्तार कर दिया गया। उसमें बिहार के सभी जिलों के व्यक्तियों को शामिल करने के परिणाम स्वरूप छोटानागपुर तथा संथाल परगना के हिस्सों में यहाँ के मूल-वासियों के स्थानों पर वे स्थानिय बनकर उनका हिस्सा खा गये। औद्योगिक प्रतिष्ठान सबसे ज्यादे झारखंड क्षेत्र में स्थापित किए गये। कारण कि यहीं वो सब संशाधन मौजूद थे।
बाहरी जनसंख्या के इस दबाव के कारण राजनैतिक क्षेत्रों में भी बाहरी व्यक्तियों का दबदबा बढ़ने लगा। ये बाहरी जनसंख्या बहुत जल्द सम्पन्न एवं धनी बनने लगे। औद्योगिक क्षेत्रों में बाहरी मजदूरों के वर्चस्व हो जाने के कारण एवं बाहरी ऑफिसरों, पदाधिकारियों, कर्मचारियों के रहने के कारण मजदूर यूनियनों में बाहरी लोग ही नेता बन कर उभरे। अखिल भारतीय पार्टियाँ इन्ही लोगों को सांसद या विधान सभा का टिकट देने लगीं। धीरे-धीरे झारखंड राजनैतिक उपनिवेश बनने लगा।
झारखंड में इस औद्योगिकरण के चलते एवं संस्कृति के प्रवेश के साथ-साथ यहाँ के सामाजिक जीवन पर भी प्रभाव पड़ने लगा। झारखंड़ क्षेत्र के लोगों को बाहर के लोगों की भाषा, रहन-सहन, वेष-भूषा प्रभावित करने लगी। भोजपुरी, बंगला, मगही, मैथली आदि भाषाएँ यहाँ के लोग भी बोलने लग गये। हिन्दी तो बोलचाल की भाषा में प्रयोग करने लगे थे। स्थिति ऐसी बनने लगी कि स्थानीय भाषा कुड़माली, संथाली, मुंडारी आदि का प्रयोग शहरों में नहीं करने लगे।
जल, जंगल, जमीन से विस्थापन के कारण झारखंडियों का सांस्कृतिक विस्थापन भी शुरू हो गया था। धार्मिक-विस्थापन भी हो रहे थें, जैसा कि हमने पहले ही देख लिया है।
सामाजिक विस्थापन का एक बड़ा भाग था, 1935 से 1970 की अवधि में लाया गया झारखंडी जातियों के सामाजिक स्तर मे बदलाव। अनेक जनजातियों को जनजाति की सूची से हटा दिया गया। इन जनजातियों की अच्छी खासी जनसंख्या थी। कुछ एक को जनजाति की सूची हटाकर “हरिजन” अनुसूची जाति की सूची बनाई गई। कुछ एक जातियों को जनजाति रहते हुए भी उन्हें जनजाति सूची से हटा दिया गया।
“हरिजन सेड्यूल कास्ट” की अवधारणा वास्तव में झारखंड से बाहर की अवधारणा है। वास्तव में झारखंड के मूलवासियों में शुद्र जाति का कोई वर्गीकरण झारखंड की सभ्यता-संस्कृति एवं सामाजिक संरचना में मौजूद नहीं था। ब्राह्मणवाद की जाति-प्रथा झारखंड में बहुत बाद मे लागू की जाने लगी। जिन जातियों को जनजाति सूची से हटाया गया, वो थी कुड़मी महतो, रजवार, खतौरी, बडाइक, गौंड़, पान कोल आदि।
इस प्रकार औद्योगिकरण के विस्तार के साथ, मूल झारखंडी चाहे वह अनुसूचित जनजाति के हो, अनुसूचित जाति के हो या अन्य गैर-आदिवासी सदान, सभी की समान रूप से उपेक्षा होने लगी, जिसके चलते दोनों वर्गो में निकटता बढ़ने लगी। बिहार सरकार एवं केन्द्र सरकार की उपेक्षापूर्ण नीतियों से इस क्षेत्र के आदिवासी एवं गैर-आदिवासी सभी मूलवासी शोषण के शिकार हुए एवं समान रूप से स्वयं को शोषित एवं उपेक्षित समझने भी लगे।
कृषि-युग की देन सामंतवाद है। औद्योगिक युग की देन पूँजीवाद-साम्राज्यवाद है। इस पूँजीवादी साम्राज्यवाद को चलाने के लिए अब सशरीर उपस्थित रहना जरूरी नहीं।
इस तेजी से बदलती परिस्थिति ने झारखंडियों को यह महसूस करा दिया कि वे इस बदलती दुनियाँ का हिस्सा नहीं। विकास की इस दौड़ में उन्हें भागीदारी ही नहीं लेने दी जा रही है। मुख्य धारा तो क्या उन्हें किसी भी धारा में लाने का कोई प्रयास नहीं हो रहा है। उन्हें यह लगने लगा कि यह व्यवस्था ही उनके शोषण के लिए बनी है। वे अपने आप को अलग-थलग अनुभव करने लगे। एक अलगाववाद की भावना का पैदा होना स्वाभाविक था, ऐसी परिस्थिति में। इस उपेक्षा एवं शोषण के प्रतिकार के रूप में उठ खड़ी हुई झारखंड अलग राज्य की माँग। कालान्तर में विख्यात हुए “झारखंड आन्दोलन” के नाम से अनेक कार्यकलाप एवं गतिदविधियाँ।
झारखंड के मूलवासियों को चोतरफा मार झेलनी पड़ी। एक तो वे अपनी जमीनों से विस्थापित होने लगे। जमीनों से विस्थापित होने के साथ-साथ बाहरी संस्कृति के प्रवेश से झारखंडियों का सांस्कृतिक-विस्थापन भी शुरू होने लगा। झारखंड क्षेत्र के लोग वैसे ही सीधे-साधे स्वभाव वाले होते हैं। फिर अशिक्षा के चलते सरकारी महकमों मे भी कम थे सरकारी नौकरी से वंचित थे, नये खुलने वाले कलकारखानो, खदानो मे भा इन्हे नौकरी नहीं मिली। इन्हें कोई हिस्सेदारी नहीं दी गई। बहुत कम लोग स्वतंत्र व्यवसाय करना जानते थे। फिर इनके पास पूँजी भी नहीं थी। पदाधिकारी चाहे सरकारी हो, या प्राइवेट कम्पनियों के सभी बाहरी व्यक्ति।
जंगलों से भी मूलवासी -आदिवासियों का विस्थापन होने लगा। जंगल के कानून मूलवासियों के हक में नहीं हेने के कारण, जिन जंगलों पर उनका जीवन आश्रित था, वे जंगल ही उनके लिए बेकार होने लगे। जंगल पर आधारित झारखंडियों का जीवन नष्ट होने लगा। जंगल की सारी सम्पदा, उनका उत्पाद फूल, फल, कंद, पत्ते-पौधे, पेड़ जड़ी बूटी सभी का सरकारी करण हो गया। जंगल के पहाड़ो के पत्थर, मोरम, बाँस, घाँस, नदी, नाले सभी सरकारी हो गये।
औद्योगिकरण का यह विस्तार, झारखंड़ की सम्पदा का जोरदार दोहन 1970 तक आते-आते काफी प्रचंड रूप से हो गया था। इसके कई दुष्परिणाम सामने आए। सरकारी उपेक्षा के चलते विस्थापितों को कभी उचित मुआवजा भुगतान नहीं मिला। दशकों तक मुआवजा भुगतान नहीं किया गया। उनके पुर्नवास की कोई नीति नहीं बनाई गई। न ही उनका पुर्नवास किया गया। कोई अपने हक अधिकार की बात करता तो उन्हें गोलियों से भूँजा जाता। महाजनी शोषण, सूदखोरी अपने चरम पर पहुँच चुका था। संगठित रूप से, षंड़यंत्र करके शराब खोरी की आदत मूलवासियों, आदिवासियों में डाली जा रही थी। स्थिति ऐसी बन गई कि झारखंड़ी औने-पौने दामों पर अपनी जमीनें बेच देते। या फिर सूदखोर-महाजन उन पर कब्जा कर लेते।
प्रतिवर्ष झारखंड के गरीब लोग देश के दूसरे प्रदेशों में मजदूरी करने के लिए पलायन करने लगे। पंजाब, हरियाणा तथा पश्चिम बंगाल आदि प्रदेशों में खेत-मजदूर या ईंट भट्ठों में मजदूरी करने चले जाते। अपना परिवार, घर-द्वार छोड़कर पलायन करने लगे। त्रासदी तो यह हुई कि बाहर प्रदेशों से लोग झारखंड क्षेत्र में लोटा-कम्बल, झोंटा-सोटा लेकर आने लगे और पैरवी के बल पर करोड़पति बनने लगे, पर झारखण्ड के लोग पेट भरने के लिए बाहर पलायन करने लगे। अपने ही धर मे लगे उद्योगों, परियोजनाओं का कोई लाभ झारखंड़ियों को नहीं मिलने लगा। विकास के नाम पर झारखंड़ियों का विनाश शुरू हुआ। स्थानीय लोगों की जमीनों पर बाहर से आए लोगों ने कब्जा करना शुरू कर दिया। माफिया-संस्कृति के उदय के साथ ही पूरे झारखंड में आतंक का साम्राज्य बनने लगा। इनके आतंक से स्थानीय लोग त्रस्त रहने लगे। थाना-पुलिस, प्रशासन में स्थानीय लोगों के नहीं रहने के कारण, लूट एंव शोषण चरम सीमा पर पहुँच गया। छोटानागपुर काश्तकरी अधिनियम एवं संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम सिर्फ नाम के लिए रह गये। इन्हें ताख पर रखकर जमीनों का हस्तांतरण किया जाने लगा। सरकारी जमीनों की बन्दोबस्ती स्थानीय आदिवासी, हरिजन, गरीब, पिछड़े लोगों को नहीं करके धनी-मानी एवं बाहर से आए लोगों के हाथों कर दिया जाने लगा। झारखंडियों से जल-जंगल एवं जमीन के परम्परागत अधिकार छीनने लगे।
औद्योगिकरण के चलते प्रदुषण बढ़ने लगा। जंगल का विनाश होने लगा। प्रदुषण के चलते जमीनों की उत्पादकता पर बहुत बुरा असर पड़ा। फसल का उत्पादन घट गया। सभी नदियों, नालों, झरनों, तलाबों, जलाशयों का पानी प्रदुषित हो गया। पर्यावरण में असंतुलन पैदा हो गया। झारखंडियों की जीवन-शैली छिन्न-भिन्न होने लगी। विकाश के इस दौड़ में अशिक्षित, गरीब भोले झारखंडी पीछे पड़ गये।
आप देखेगें कि बिहार में आदिवासी जनसंख्या में लगातार कमी हुई है जो 1951 में 10.07 प्रतिशत से कम होकर 1981 की जनगणना में 8.13 प्रतिशत हो गई। यह कमी झारखंड क्षेत्र में सर्वाधिक बताई गई है। आदिवासियों की जनसंख्या 1951 में 36.81 प्रतिशत था। 1981 में यह घटकर 30.25 हो गया। आज की तारीख में यानि 2001 की जनगणना में यह मात्र 22 प्रतिशत रह गई है। यह सब बाहर से आकर बसने वाले गैर-आदिवासी जनसंख्या के कारण हुआ। इसका एक अन्य कारण भारी तादाद में आदिवासी जनसंख्या के बाहर पलायन करने का है। कई आदिवासी समुदाय तेजी से बदलती हुई परिस्थिति में अपने अस्तित्व की रक्षा भी नहीं कर पाये। बदले आर्थिक दौर एवं सामाजिक परिवेश से तालमेल नहीं बैठा पाने के कारण हतोत्साहित होकर बैठ गये। प्रायः सुप्त हो गये। इसमें बिरहोर, पहाड़ियाँ जातियाँ लुप्त हो गई है।
बिहार के अन्य जिलों यानि झारखंड क्षेत्र से बाहर के जिलों से आकर बसने वाले प्रवासियों की संख्या में धीरे-धीरे वृद्धि हुई। यह वृद्धि जो 1961 में 11.7 लाख से बढ़कर 1971 में 14.6 लाख हो गई। यह आबादी 1981 में बढ़कर 21.4 लाख हो गई। इस अवधि में बाहर से आकर बसने वाले प्रवासियों का प्रतिशत 10.6 प्रतिशत से बढ़कर 12.16 हो गई। राँची में यह प्रतिशत 5.96 से बढ़कर 8.62 प्रतिशत हो गई। औद्योगिक क्षेत्रों में यह प्रतिशत निश्चय ही इससे अधिक बढ़ गया। यह दबाव शहरों में सबसे ज्यादें हुआ। इतने लोगों के आने से जमीन एवं अन्य संशाधनों, रोजगार, शिक्षा, चिकित्सा और अन्य सुविधाओं पर अत्यधिक दबाव पड़ा।
आदिवासी बहूल जिले यानि जनजाति बाहूल जिले अल्पसंख्यक जिले हो गये। संथाल परगना एवं सिंहभूम इसके उदाहरण हैं। शहरी जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हुई है और बाहरी जनसंख्या ही इसमें ज्यादे है। इसके अलावा जनजातिय जनसंख्या का शहरीकरण हुआ है। ग्रामिण क्षेत्रों की जनजातिय जनसंख्या में कमी आई है। झारंखंड़ क्षेत्र में औद्योगिक मजदूरो की संख्या बढ़ी है। इसमें भी बाहरी मजदूर सर्वाधिक है। आज जब लोक-सभा तथा विधान सभा क्षेत्रों का परिसीमन किया जा रहा है, तो देखा जा रहा है कि शहरी क्षेत्रों में सीटें बढ़ गई एवं सूदूर आदिवासी क्षेत्रों में कम हो गई।
इस अवधि में यानि बींसवी शताब्दी के चौथे दशक के बाद से जो सबसे कठिन समस्या पैदा हुई, वह यह कि “स्थानिय” शब्द का विस्तार कर दिया गया। उसमें बिहार के सभी जिलों के व्यक्तियों को शामिल करने के परिणाम स्वरूप छोटानागपुर तथा संथाल परगना के हिस्सों में यहाँ के मूल-वासियों के स्थानों पर वे स्थानिय बनकर उनका हिस्सा खा गये। औद्योगिक प्रतिष्ठान सबसे ज्यादे झारखंड क्षेत्र में स्थापित किए गये। कारण कि यहीं वो सब संशाधन मौजूद थे।
बाहरी जनसंख्या के इस दबाव के कारण राजनैतिक क्षेत्रों में भी बाहरी व्यक्तियों का दबदबा बढ़ने लगा। ये बाहरी जनसंख्या बहुत जल्द सम्पन्न एवं धनी बनने लगे। औद्योगिक क्षेत्रों में बाहरी मजदूरों के वर्चस्व हो जाने के कारण एवं बाहरी ऑफिसरों, पदाधिकारियों, कर्मचारियों के रहने के कारण मजदूर यूनियनों में बाहरी लोग ही नेता बन कर उभरे। अखिल भारतीय पार्टियाँ इन्ही लोगों को सांसद या विधान सभा का टिकट देने लगीं। धीरे-धीरे झारखंड राजनैतिक उपनिवेश बनने लगा।
झारखंड में इस औद्योगिकरण के चलते एवं संस्कृति के प्रवेश के साथ-साथ यहाँ के सामाजिक जीवन पर भी प्रभाव पड़ने लगा। झारखंड़ क्षेत्र के लोगों को बाहर के लोगों की भाषा, रहन-सहन, वेष-भूषा प्रभावित करने लगी। भोजपुरी, बंगला, मगही, मैथली आदि भाषाएँ यहाँ के लोग भी बोलने लग गये। हिन्दी तो बोलचाल की भाषा में प्रयोग करने लगे थे। स्थिति ऐसी बनने लगी कि स्थानीय भाषा कुड़माली, संथाली, मुंडारी आदि का प्रयोग शहरों में नहीं करने लगे।
जल, जंगल, जमीन से विस्थापन के कारण झारखंडियों का सांस्कृतिक विस्थापन भी शुरू हो गया था। धार्मिक-विस्थापन भी हो रहे थें, जैसा कि हमने पहले ही देख लिया है।
सामाजिक विस्थापन का एक बड़ा भाग था, 1935 से 1970 की अवधि में लाया गया झारखंडी जातियों के सामाजिक स्तर मे बदलाव। अनेक जनजातियों को जनजाति की सूची से हटा दिया गया। इन जनजातियों की अच्छी खासी जनसंख्या थी। कुछ एक को जनजाति की सूची हटाकर “हरिजन” अनुसूची जाति की सूची बनाई गई। कुछ एक जातियों को जनजाति रहते हुए भी उन्हें जनजाति सूची से हटा दिया गया।
“हरिजन सेड्यूल कास्ट” की अवधारणा वास्तव में झारखंड से बाहर की अवधारणा है। वास्तव में झारखंड के मूलवासियों में शुद्र जाति का कोई वर्गीकरण झारखंड की सभ्यता-संस्कृति एवं सामाजिक संरचना में मौजूद नहीं था। ब्राह्मणवाद की जाति-प्रथा झारखंड में बहुत बाद मे लागू की जाने लगी। जिन जातियों को जनजाति सूची से हटाया गया, वो थी कुड़मी महतो, रजवार, खतौरी, बडाइक, गौंड़, पान कोल आदि।
इस प्रकार औद्योगिकरण के विस्तार के साथ, मूल झारखंडी चाहे वह अनुसूचित जनजाति के हो, अनुसूचित जाति के हो या अन्य गैर-आदिवासी सदान, सभी की समान रूप से उपेक्षा होने लगी, जिसके चलते दोनों वर्गो में निकटता बढ़ने लगी। बिहार सरकार एवं केन्द्र सरकार की उपेक्षापूर्ण नीतियों से इस क्षेत्र के आदिवासी एवं गैर-आदिवासी सभी मूलवासी शोषण के शिकार हुए एवं समान रूप से स्वयं को शोषित एवं उपेक्षित समझने भी लगे।
कृषि-युग की देन सामंतवाद है। औद्योगिक युग की देन पूँजीवाद-साम्राज्यवाद है। इस पूँजीवादी साम्राज्यवाद को चलाने के लिए अब सशरीर उपस्थित रहना जरूरी नहीं।
इस तेजी से बदलती परिस्थिति ने झारखंडियों को यह महसूस करा दिया कि वे इस बदलती दुनियाँ का हिस्सा नहीं। विकास की इस दौड़ में उन्हें भागीदारी ही नहीं लेने दी जा रही है। मुख्य धारा तो क्या उन्हें किसी भी धारा में लाने का कोई प्रयास नहीं हो रहा है। उन्हें यह लगने लगा कि यह व्यवस्था ही उनके शोषण के लिए बनी है। वे अपने आप को अलग-थलग अनुभव करने लगे। एक अलगाववाद की भावना का पैदा होना स्वाभाविक था, ऐसी परिस्थिति में। इस उपेक्षा एवं शोषण के प्रतिकार के रूप में उठ खड़ी हुई झारखंड अलग राज्य की माँग। कालान्तर में विख्यात हुए “झारखंड आन्दोलन” के नाम से अनेक कार्यकलाप एवं गतिदविधियाँ।
झारखंड़ में बदली परिस्थिति –
कहते हैं कि पृथ्वी आग का गोला थी। यह आग का गोला बहुत देर से ठंड़ा हुआ। पृथ्वी ठंड़ी हुई तो जल, जमीन और जंगल पैदा हुए। जल, जंगल से जीव की सृष्टि हुई। इसी में से धीरे-धीरे कोई जीव मानव बन गया।
अगर पृथ्वी की आयु चौबीस घंटे की ऑकी जाय तो मानव-जीवन की सम्पूर्ण आयु मात्र दो मिनट की आयेगी। मानव-जीवन का अर्थ है मानव की सृष्टि से आज तक का उसका अस्तित्व का समय। ऐसा भू-गर्भ शास्त्रियों एवं खनन वैज्ञानिकों का कहना है। मानव ने अपनी उत्पत्ति से आजतक कई युगों की यात्र की है। पाषाण-युग से आज तक की यात्रा। जल, जंगल एवं जमीन ने मानव को पैदा किया है, अतः उनकी शारीरिक बनावट उसके रहन-सहन का ढंग, उसकी भाषा उसकी संस्कृति पर इन्हीं का प्रभाव पड़ा। संसार के विभिन्न इलाकों, द्वीपों, महाद्वीपों के मानव अलग परिस्थितियों में जीवन-यापन करने के कारण अलग-अलग साँचों में ढल गये। अलग-अलग प्रकृति के हो गये। अलग-अलग प्राकृतिक परिवेश के चलते अलग-अलग स्वभाव के हो गये। अलग-अलग बोलियाँ, भाषाएँ बोलने लगे। अलग-अलग सभ्यताएँ उभर कर सामने आई। अलग-अलग राष्ट्रीयताओं का जन्म हुआ। अलग-अलग राष्ट्र, देश बने। प्रदेश बने।
मानव की सभ्यता का इतिहास कृषि युग से शुरू हुआ, जब मानव ने अनाज उगाना शुरू किया। अनाज के लिए समतल जमीन पर खेती करना आवश्यक था, जहाँ पानी की प्रचुरता थी। मनुष्य की सभ्यता के विकास के मूल में पानी एक बहुत बड़े तत्व के रूप में मौजुद रहा। पानी के साथ लकड़ी तथा बाद में लोहे का नम्बर आया। यही कारण था कि रेनासाँ-पीरियड तक बड़े-बड़े शहरों, नगरों का अर्विभाव बड़ी-बड़ी नदियों एवं समुन्दर के किनारों पर हुआ। इंगलैंड, रोम, एथेन्स, ग्रीस, दिल्ली, वाराणसी, इलाहाबाद, पटना, कलकत्ता, मद्रास, बम्बई आदि शहर नदियों के किनारे या समुद्र के किनारे बसे।
कृषि-युग में राजतंत्र का उदय हुआ। भारतवर्ष में समाज को जातियों एवं सामुदायों मे बाँटा गया। भारतीय समाज विभिन्न समुदायों यानि जातियों में बँट गया। यह बँटवारा काम के आधार पर हो गया।
विश्व के सभी जगहों में खान-पान, रहन-सहन एवं सामाजिक मूल्यों का निर्धारण भी वहाँ के जमीन, जल एवं जंगल के अनुरूप हुए। कृषि-युग एवं धार्मिक उत्थानों के युगों में मानव का जीवन अपेक्षाकृत शांत एवं प्रकृति के अनुरूप चलता रहा। अशांति भी हुई। राज-तंत्र के लिए लड़ाई लड़ी गई। धार्मिक युद्ध भी हुए। इसके विरोध में समाजवाद लागू करने के लिए भी आन्दोलन होते रहे। पर आम जनता की जीवन शैली पर इन सबका कोई बड़ा प्रभाव नहीं हुआ। जीवन यापन की शैली का क्रमिक विकास होता रहा। सभ्यता एवं संस्कृतियों का क्रमिक विकास होता रहा। जीवन-यापन की शैली पर आम जनता के बीच कोई खास या अचानक परिवर्त्तन नहीं आया।
मनुष्य के जीवन की इस श्रृखला में जो सबसे बड़ी बात हुई वह थी भाप के इंजिन का अविष्कार, बिजली की खोज। यानि औद्योगिकरण के युग का प्रारम्भ। इसने पूरी मानव-जाति के इतिहास में अचानक नया मोड़ पैदा कर दिया। मानव-जाति को बहुत सीघ्र नये रास्ते पर सींच कर जला गया। मानव जाति की सोच को, उसकी जीवन शैली को औद्योगिकरण ने बूरी तरह प्रभावित किया। मानव जिन चीजों की कलपना तक नहीं कर पाया था, उन चीजों को वैज्ञानिकों ने सामने लाकर खड़ा कर दिया। तब शुरू हो गया वैज्ञानिक सभ्यता का युग। टेलिविजन, दूरभाष, रेडियो, मोबाईल फोन, रेलगाड़ी, हवाई जहाज से लेकर अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक हथियार, रसायनिक हथियार, आर0 डी0 एक्स0 बम, बारूद, प्रक्षेपात्र, परमाणु बम आदि। ग्रहों की दूरियाँ भी मानव मापने लगा। चाँद पर पहुँच गया और चन्दामामा की असलियत का पर्दाफास कर दिया। धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक मान्यताओं को कड़ा झटका लगा।
अब अगर यूँ कहें कि वैज्ञानिक युग में मानव का काम अब सिर्फ पानी एवं उपजाऊ जमीन से नहीं चलने लगा तो कोई गलत न होगा। अब मानव को चाहिए था, लोहा, कोयला, बॉक्साइट, जस्ता, ताँबा, सोना, युरेनियम, चाँदि, प्लेटिनम, अबरख, लकड़ी, बाँस, घास, तरह-तरह के खनिज पदार्थ तथा बिजली। पर ये चीजें बड़ी-बड़ी नदियों की समतल जमीनों पर नहीं मिले। तब इनकी खोज जंगलों भरे इलाकों, पहाड़ों से भरे भू-भागों में होने लगी। तब पाया गया कि वैज्ञानिक सभ्यता को बरकरार रखने के लिए सभी आवश्यक चीजें, सभी संसाधन जंगलों-पहाड़ो से भरे भू-भागों में मौजूद थी। बिजली पैदा करने वाली तेज धार वाली नदियाँ भी इन्ही इलाकों में मौजूद थी। विनमय के साधन को बनाने के लिए यानि सिक्के, नोट, कागज बनाने के तथा सोना, ताँबा, लकड़ी, सेवई घास, बाँस भी इन्ही भू-भागों में वर्त्तमान में है। आवागमन के लिए सड़कों को बनाने के लिए पत्थर, अलकत्तरा भी इन्ही पहाडो पर मिले। भवन निर्माण के लिए सिमेंट, चुना पत्थर भी यहीं। लोहा भी यहाँ, युरेनियम भी यहाँ। ऊर्जा के लिए कोयला भी इन्ही भू-भागों में मिले।
जंगल-झाड़ से घिरे भू-भाग ही झारखंड़ कहे जाते है। भारतवर्ष में कई झारखंड है। हमारा झारखंड, बिहार, बंगाल, उड़ीसा, मध्यप्रदेश, के हिस्सों में फैला है। वैज्ञानिक सभ्यता को चलाने के लिए आवश्यक सभी वस्तुएँ यहाँ मौजूद है। इस सभ्यता को चलाने के लिए आज झारखंड की जमीन, जल एवं जंगल तथा इसके खनिजों का किस प्रकार दोहन किया जा रहा है, एवं इसके क्या दुष्परिणाम हुए है, किस प्रकार झारखंड एक आंतरिक उपनिवेश बन गया है, इस पर हम चर्चा करेंगे।
भारतवर्ष ही नहीं, विश्व की वैज्ञानिक सभ्यता को चलाने के लिए झारखंड का क्या योगदान रहा है, इसे हमने अब जान लिया है। भारतवर्ष में एक नहीं कई झारखंड है, जहाँ औपनिवेशिक शोषण जारी है। झारखंड का धन झारखंड के लिए अभिशाप बन गया। इन सम्पदाओं का औद्योगिक विकास के लिए दोहन जरूरी था और इसी ने झारखंड को एक आंतरिक उपनिवेश बना डाला। बींसवी सदी के शुरूआती द्वितीय एवं तृतीय दशक से औद्योगिक जगत का प्रारम्भ झारखंड क्षेत्र में कोयले की खदानों की शुरूआत से हुआ। इसी शुरूआती दौर के समय से उन्नींस सौ पचास तक औद्योगिकरण की पृष्ठभूमि भारतवर्ष में भी तैयार हो चुकी थी। बम्बई, कानपुर आदि जगहों के कपड़ा-मिलों एवं चमड़े के कारखानों आदि के साथ-साथ ताँबा की खदानें बनने लगी थी। भारतवर्ष को आजादी 1947 मे मिली। इसके संविधान को मान्यता छब्बीस जनवरी उन्नींस सौ पचास मे मिली। आजादी मिलने के बाद तो इस क्षेत्र में सैकड़ों प्रकार की खनिजों के दोहन की प्रक्रिया में तेजी आ गई। औद्योगिकरण में तेजी आई। बड़ी-बड़ी ताप-विद्युत परियोजनाएँ लगाई जाने लगी। नदियों को बाँधा जाने लगा। बाँध बनाए जाने लगे। दामोदर, बराकर, स्वर्ण-रेखा, कोनार, खरकाई आदि कई बड़ी नदियों पर बाँध बाँधे गये। इसके साथ ही छोटी नदियों के जल को भी घेरा गया। पत्थर तोड़ने के हजारों क्रेशर लगने लगे। इन खनिजों पर आधारित सैकड़ों प्रकार के कल-कारखाने बनने लगे। कई औद्योगिक शहरों का जन्म हुआ, जैसे धनबाद, बोकारो, गिरिडीह, हजारीबाग, राँची, जमशेदपुर, सिन्दरी, घाटशिला वगैरह-वगैरह है। झारखंड के जंगलों एवं पहाड़ों के बीच ये शहर बसते गये।
अगर पृथ्वी की आयु चौबीस घंटे की ऑकी जाय तो मानव-जीवन की सम्पूर्ण आयु मात्र दो मिनट की आयेगी। मानव-जीवन का अर्थ है मानव की सृष्टि से आज तक का उसका अस्तित्व का समय। ऐसा भू-गर्भ शास्त्रियों एवं खनन वैज्ञानिकों का कहना है। मानव ने अपनी उत्पत्ति से आजतक कई युगों की यात्र की है। पाषाण-युग से आज तक की यात्रा। जल, जंगल एवं जमीन ने मानव को पैदा किया है, अतः उनकी शारीरिक बनावट उसके रहन-सहन का ढंग, उसकी भाषा उसकी संस्कृति पर इन्हीं का प्रभाव पड़ा। संसार के विभिन्न इलाकों, द्वीपों, महाद्वीपों के मानव अलग परिस्थितियों में जीवन-यापन करने के कारण अलग-अलग साँचों में ढल गये। अलग-अलग प्रकृति के हो गये। अलग-अलग प्राकृतिक परिवेश के चलते अलग-अलग स्वभाव के हो गये। अलग-अलग बोलियाँ, भाषाएँ बोलने लगे। अलग-अलग सभ्यताएँ उभर कर सामने आई। अलग-अलग राष्ट्रीयताओं का जन्म हुआ। अलग-अलग राष्ट्र, देश बने। प्रदेश बने।
मानव की सभ्यता का इतिहास कृषि युग से शुरू हुआ, जब मानव ने अनाज उगाना शुरू किया। अनाज के लिए समतल जमीन पर खेती करना आवश्यक था, जहाँ पानी की प्रचुरता थी। मनुष्य की सभ्यता के विकास के मूल में पानी एक बहुत बड़े तत्व के रूप में मौजुद रहा। पानी के साथ लकड़ी तथा बाद में लोहे का नम्बर आया। यही कारण था कि रेनासाँ-पीरियड तक बड़े-बड़े शहरों, नगरों का अर्विभाव बड़ी-बड़ी नदियों एवं समुन्दर के किनारों पर हुआ। इंगलैंड, रोम, एथेन्स, ग्रीस, दिल्ली, वाराणसी, इलाहाबाद, पटना, कलकत्ता, मद्रास, बम्बई आदि शहर नदियों के किनारे या समुद्र के किनारे बसे।
कृषि-युग में राजतंत्र का उदय हुआ। भारतवर्ष में समाज को जातियों एवं सामुदायों मे बाँटा गया। भारतीय समाज विभिन्न समुदायों यानि जातियों में बँट गया। यह बँटवारा काम के आधार पर हो गया।
विश्व के सभी जगहों में खान-पान, रहन-सहन एवं सामाजिक मूल्यों का निर्धारण भी वहाँ के जमीन, जल एवं जंगल के अनुरूप हुए। कृषि-युग एवं धार्मिक उत्थानों के युगों में मानव का जीवन अपेक्षाकृत शांत एवं प्रकृति के अनुरूप चलता रहा। अशांति भी हुई। राज-तंत्र के लिए लड़ाई लड़ी गई। धार्मिक युद्ध भी हुए। इसके विरोध में समाजवाद लागू करने के लिए भी आन्दोलन होते रहे। पर आम जनता की जीवन शैली पर इन सबका कोई बड़ा प्रभाव नहीं हुआ। जीवन यापन की शैली का क्रमिक विकास होता रहा। सभ्यता एवं संस्कृतियों का क्रमिक विकास होता रहा। जीवन-यापन की शैली पर आम जनता के बीच कोई खास या अचानक परिवर्त्तन नहीं आया।
मनुष्य के जीवन की इस श्रृखला में जो सबसे बड़ी बात हुई वह थी भाप के इंजिन का अविष्कार, बिजली की खोज। यानि औद्योगिकरण के युग का प्रारम्भ। इसने पूरी मानव-जाति के इतिहास में अचानक नया मोड़ पैदा कर दिया। मानव-जाति को बहुत सीघ्र नये रास्ते पर सींच कर जला गया। मानव जाति की सोच को, उसकी जीवन शैली को औद्योगिकरण ने बूरी तरह प्रभावित किया। मानव जिन चीजों की कलपना तक नहीं कर पाया था, उन चीजों को वैज्ञानिकों ने सामने लाकर खड़ा कर दिया। तब शुरू हो गया वैज्ञानिक सभ्यता का युग। टेलिविजन, दूरभाष, रेडियो, मोबाईल फोन, रेलगाड़ी, हवाई जहाज से लेकर अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक हथियार, रसायनिक हथियार, आर0 डी0 एक्स0 बम, बारूद, प्रक्षेपात्र, परमाणु बम आदि। ग्रहों की दूरियाँ भी मानव मापने लगा। चाँद पर पहुँच गया और चन्दामामा की असलियत का पर्दाफास कर दिया। धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक मान्यताओं को कड़ा झटका लगा।
अब अगर यूँ कहें कि वैज्ञानिक युग में मानव का काम अब सिर्फ पानी एवं उपजाऊ जमीन से नहीं चलने लगा तो कोई गलत न होगा। अब मानव को चाहिए था, लोहा, कोयला, बॉक्साइट, जस्ता, ताँबा, सोना, युरेनियम, चाँदि, प्लेटिनम, अबरख, लकड़ी, बाँस, घास, तरह-तरह के खनिज पदार्थ तथा बिजली। पर ये चीजें बड़ी-बड़ी नदियों की समतल जमीनों पर नहीं मिले। तब इनकी खोज जंगलों भरे इलाकों, पहाड़ों से भरे भू-भागों में होने लगी। तब पाया गया कि वैज्ञानिक सभ्यता को बरकरार रखने के लिए सभी आवश्यक चीजें, सभी संसाधन जंगलों-पहाड़ो से भरे भू-भागों में मौजूद थी। बिजली पैदा करने वाली तेज धार वाली नदियाँ भी इन्ही इलाकों में मौजूद थी। विनमय के साधन को बनाने के लिए यानि सिक्के, नोट, कागज बनाने के तथा सोना, ताँबा, लकड़ी, सेवई घास, बाँस भी इन्ही भू-भागों में वर्त्तमान में है। आवागमन के लिए सड़कों को बनाने के लिए पत्थर, अलकत्तरा भी इन्ही पहाडो पर मिले। भवन निर्माण के लिए सिमेंट, चुना पत्थर भी यहीं। लोहा भी यहाँ, युरेनियम भी यहाँ। ऊर्जा के लिए कोयला भी इन्ही भू-भागों में मिले।
जंगल-झाड़ से घिरे भू-भाग ही झारखंड़ कहे जाते है। भारतवर्ष में कई झारखंड है। हमारा झारखंड, बिहार, बंगाल, उड़ीसा, मध्यप्रदेश, के हिस्सों में फैला है। वैज्ञानिक सभ्यता को चलाने के लिए आवश्यक सभी वस्तुएँ यहाँ मौजूद है। इस सभ्यता को चलाने के लिए आज झारखंड की जमीन, जल एवं जंगल तथा इसके खनिजों का किस प्रकार दोहन किया जा रहा है, एवं इसके क्या दुष्परिणाम हुए है, किस प्रकार झारखंड एक आंतरिक उपनिवेश बन गया है, इस पर हम चर्चा करेंगे।
भारतवर्ष ही नहीं, विश्व की वैज्ञानिक सभ्यता को चलाने के लिए झारखंड का क्या योगदान रहा है, इसे हमने अब जान लिया है। भारतवर्ष में एक नहीं कई झारखंड है, जहाँ औपनिवेशिक शोषण जारी है। झारखंड का धन झारखंड के लिए अभिशाप बन गया। इन सम्पदाओं का औद्योगिक विकास के लिए दोहन जरूरी था और इसी ने झारखंड को एक आंतरिक उपनिवेश बना डाला। बींसवी सदी के शुरूआती द्वितीय एवं तृतीय दशक से औद्योगिक जगत का प्रारम्भ झारखंड क्षेत्र में कोयले की खदानों की शुरूआत से हुआ। इसी शुरूआती दौर के समय से उन्नींस सौ पचास तक औद्योगिकरण की पृष्ठभूमि भारतवर्ष में भी तैयार हो चुकी थी। बम्बई, कानपुर आदि जगहों के कपड़ा-मिलों एवं चमड़े के कारखानों आदि के साथ-साथ ताँबा की खदानें बनने लगी थी। भारतवर्ष को आजादी 1947 मे मिली। इसके संविधान को मान्यता छब्बीस जनवरी उन्नींस सौ पचास मे मिली। आजादी मिलने के बाद तो इस क्षेत्र में सैकड़ों प्रकार की खनिजों के दोहन की प्रक्रिया में तेजी आ गई। औद्योगिकरण में तेजी आई। बड़ी-बड़ी ताप-विद्युत परियोजनाएँ लगाई जाने लगी। नदियों को बाँधा जाने लगा। बाँध बनाए जाने लगे। दामोदर, बराकर, स्वर्ण-रेखा, कोनार, खरकाई आदि कई बड़ी नदियों पर बाँध बाँधे गये। इसके साथ ही छोटी नदियों के जल को भी घेरा गया। पत्थर तोड़ने के हजारों क्रेशर लगने लगे। इन खनिजों पर आधारित सैकड़ों प्रकार के कल-कारखाने बनने लगे। कई औद्योगिक शहरों का जन्म हुआ, जैसे धनबाद, बोकारो, गिरिडीह, हजारीबाग, राँची, जमशेदपुर, सिन्दरी, घाटशिला वगैरह-वगैरह है। झारखंड के जंगलों एवं पहाड़ों के बीच ये शहर बसते गये।
Thursday, August 5, 2010
अध्याय-चार
अभिशप्त झारखंड़ – पृथ्वी की जब रचना हुई, देवताओं में खलबली मच गई। देवता इस बात से चिंतित हो उठे कि धरती का यानि पृथ्वी का निर्माण बड़े ही असमान ढंग से हो गया था। इसके तीन हिस्से में जल था और एक हिस्से में मिट्टी यानि धरती दिखाई देती थी। उसपर से तुर्रा यह कि कहीं-कहीं तो वर्फ से ढके पहाड़ एवं मैदान थे। छः महिने तक सूर्य दिखाई नहीं देता। छः महिने रात रहती है। कहीं-कहीं तो बालू से भरा सुखा प्रदेश दूर तक फेला हुआ। कहीं-कहीं तो इतनी घनघोर बारिश कि कभी खत्म न हो। कहीं-कहीं तो इतने घने जंगल कि प्रवेश करना असंभव। कहीं भीषण गर्मी।
पर कहीं-कहीं तो समशीतोष्ण मौसम। न ज्यादे ठंढ़ न ज्यादे गर्मी। पहाड़, नदी, नाले, झरनों, से भरपूर इलाकें। सैकड़ों प्रकार के फलदार वृक्ष एवं इमारती लकड़ी। जड़ी-बूची, औषधियों का भंड़ार। पशु-पक्षी की भरमार। इतना ही नहीं धरती के नीचे उन्ही इलाकों में खनिज पदार्थो की भरमार। देवताओं की वास्तव में चिंता हुई और वे रचनाकर्त्ता, सबके पालक विष्णु भगवान के पास पहुँचे। भगवान तो क्षीर-सागर के गहरे तल में गहरी निन्द्रा में लीन थे। पत्नी लक्ष्मी उनके पांव दबा रही थी। इतने सारे देवताओं को देखकर प्रभु को जगाया गया। प्रभु ने हाल समाचार पुछा ओर आश्चर्य व्यक्त किया कि इतने सारे स्वर्ग के देवता एक साथ किस प्रयोजन से पधारे थे। देवताओं ने कहा कि प्रभु पृथ्वी का निर्माण बड़े ही गलत ढंग से हो गया है, भविष्य में भारी समस्या देवलोक को ही हो सकती है। आपने एक ही स्थान पर सारी सम्पदा दे डाली है बाकि जगहों के साथ अन्याय हो गया। प्रभु ने उनसे पुछा कि ऐसा कहाँ हो गया है। देवताओं ने कहा कि प्रभु झारखंड़ क्षेत्र में आपने सारी न्यामतें न्योछावर कर दी हैं और बाकि जगहों के साथ अन्याय हो गया। प्रभु ने उनसे पुछा कि ऐसा कहाँ हो गया है। देवताओं ने कहा कि प्रभु झारखंड़ क्षेत्र में आपने सारी न्यायमतें न्योछावर कर दी हैं और सारी बातें प्रभु को बताया गया। भविष्य की समस्याओं की ओर ध्यान एकत्रित किया गया। प्रभु थोड़ी देर चुप रहे। फिर उन्होंने मानव-निर्माण विभाग में फोन लगाये ओर यह जानकारी प्राप्त की कि अभी पृथ्वी में मानव जाति का निर्माण हुआ था या नहीं, झारखंड़ में भी मानव बने थे कि नहीं। उधर जबाव मिला कि उस समय तक इस संबंध में कोई कदम ब्राह्माजी के द्वारा उठाया नहीं गया था। रचयिता ब्राह्मा गहन सोच में थे। प्रभु ने देवताओं को बता दिया कि उन्होने समस्या का समाधान सोच लिया है ओर देवताओं को वापस अपने-अपने काम मे लौटकर जाने को कह दिया। देवता असन्जस में पड़ गये। प्रभु फिर सो गये थे, बिना यह बताए कि आखिर समस्या का समाधान क्या था ? उन्होने फिर से प्रभु को जगाया और इस बाबत पूछा। प्रभु ने झल्लाकर कहा कि आप सबों को चिंता करने की बात नहीं है। समाधान यह है कि हम झारखंड़ में इस प्रकार के मनुष्य बनाएँगें जो इन सारी सम्पत्तियों, खनिजों को पहचानेगा ही नहीं। और अगर पहचानेगा नहीं तो उसका उपयोग भी नहीं करेगा। यह कहकर प्रभु फिर से सो गये।
और तब से झारखंड़ की सम्पदा ही झारखंड़वासियों के लिए अभिशाप बन गयी। झारखंड़ की लकड़ी, झारखंड़ की के वन-उत्पाद, झारखंड़ का कोयला, लोहा, ताँबा, अबरख आदि खनिज, उससे सम्बन्धित व्यापार, नौकरी, चाकरी, ठेकेदारी, झारखंड़ की बिजली आदि सभी सम्पदाओं पर झारखंड़ से बाहर के लोगों का कब्जा हो गया। झारखंड़ के बाहर, भी बाहर के लोगों ने बसाए। और रहने लगे। मजे की बात तो यह हो गई कि इन सम्पदाओं के दोहन के लिए जरूरी मजदूर, श्रमिक, अधिकारी भी बाहर से लाए गये। झारखंड़ के लोग झारखंड़ की प्रकृतिक सुन्दरता में भी रम गये। न बाढ़ का डर, न सुखे की त्रासदी। न गर्म न ठंड़ा। साल भर का अनाज उगा लेते ओर गीत गाते। नाचते। माँदर, ढोल, मगाड़ा, बांसुरी, करताल बजाते और मस्त रहते। अपनी संस्कृति को पकड़े बैठे रहे।
प्रभु ने झारखंड़ के मनुष्यों को भी अभिशाप दिया, उस अभिशाप का नतीजा हुआ कि झारखंड़ में शोषण चरम पर पहुँच गया। वास्तव में प्रभु से बड़ी गलती हो गई थी, उन्होंने समस्या का समाधान नहीं किया था, बल्कि समस्या का तत्काल निपटारा कर दिया था। समस्या का समाधान तो तब होता जब पृथ्वी का पुनः निर्माण किया जाता और सभी भागों को समान रूप से दौलत दी होती। पर झारखंड़ के मनुष्यों की दृष्टि को भ्रमित करके उन्होंने समस्या का अस्थाई हल ही निकाला था और इसे सिर्फ निपटा दिया था। प्रभु विष्णु की ही तरह केन्द्र सरकार एवं राज्य-सरकारों ने कोई स्थाई कदम नहीं उठाए। प्रभु विष्णु की ही तरह केन्द्र सरकार एवं राज्य-सरकारों ने कोई स्थाई कदम नहीं उठाए। प्रभु की तरह ही अब झारखंड़ को “टेकल” किया जाने लगा। “सोल्भ” करने की और किती ने ध्यान नहीं दिया। पहले तो झारखंड़ की सम्पदा दूसरों के लिए समस्या का कारण, बनने वाली थी, पर अब तो झारखंड़ की सम्पदा झारखंड़वासियों के लिए ही समस्या बन गई है।
एक दिन पुनः भगवान विष्णु को नींद से जागना पड़ा। कारण था कि स्वर्ग के सभी देवता पुनः उन्हें जगाने वहाँ पहुँचे थे। भगवान ने उठते ही पूछा कि अब क्या हो गया ? क्या किसी असूर ने स्वर्गलोक में हमला बोल दिया है ? देवताओं ने कहा कि ऐसी बात नहीं हैं। उनकी परेशानी का कारण पृथ्वी पर हो रहे अत्याचार हैं। पृथ्वी वासियों की चीख-पुकार से उनकी नींद हराम हो गई है। उस पर तो खासकर झारखंड़ क्षेत्र में सबसे ज्यादा अत्याचार अनाचार जुल्म असुरों द्वारा किये जा रहें है। इस वार्त्तालाप के दौरान ही प्रभु के कानों में क्षीर-सागर के गहरे तल तक चीख-पुकार, क्रंदन की आवाज पहुँची। उन्होनें बड़े आश्चर्य से पुछा भी यहाँ कौन रो रहा है ? देवताओं ने उन्हें बताया कि ये आवाजे पृथ्वी के झारखंड़ क्षेत्र से आ रही है। प्रभु ने देखा की झारखंड़ में मनुष्यों को जिंदा जलाया जा रहा है। वन के प्राणियों को लगातार गोली मारा जा रहा है। उन्होनें यमराज से पुछा कि मनुष्यों एवं अन्य प्राणियों पर ऐसा अत्याचार करने का किसने कानून बनाया। तुम्हारे यमलोक में तो मृत्यु के बाद प्राणियों पर ऐसा अत्याचार करने का किसने कानून बनाया। तुम्हारे यमलोक में तो मृत्यु के बाद प्राणियों के पाप-पुण्य का लेखा-जोखा करके उसे स्वर्ग या नर्क में लाया जाता है, फिर उचित सजा दिया जाता है। पर यह जीतेजी प्राणियों को जलाना, समझ में नहीं आता। क्या किसी अत्याचारी असुर का साम्राज्य झारखंड़ क्षेत्र में जल रहा है ? देवताओं से उन्हें जबाव मिलते, इसके पहले ही उन्होनें देखा कि वहाँ तो चारों तरफ असुर ही असुर दिखाई दे रहें है। जो बड़े-बड़े वाहनों उड़न खटोले पर बड़े-बड़ हथियार लिए घूम रहें हैं।
देवताओं ने भगवान से कहा कि प्रभु अब आप अवतार लेकर झारखंड़ में जाएँ एवं असुरों का नाश करें अन्यथा न तो भू-लोक बचेगा न ही स्वर्ग, न ही आपका सिंहासन। असुर अब चाँद पर पहुँच गये, मंगल की दूरी माप लिया। जल के अन्दर चलने की पन-डुब्बी बना ली है। अन्य ग्रहों पर भी कब्जा करने की तैयारी चल रही है।
प्रभु बड़े चितिंत हुए ऐर कहा कि “देखो देवताओं मैं तो अवतार लेते-लेते थक चुका हूँ।” फिर अब तो वहाँ पहले की तरह एक असुर रावण या कंस नहीं है। वहाँ तो दर्जनों एक साथ घूम रहे है। भाई! मुझसे उनका नाश करना संभव नहीं होगा। अब आप तैतींस करोड़ देवता हो, अब आप ग्रुप बना कर जाएँ-ठीक असुरो की तरह और समस्या का समाधान करें।
प्रभु फिर करवट लेकर सो गये। देवताओं के सामने अब असली समस्या आ खड़ी हुई थी। झारखंड़ के जल, जमीन एवं जंगल की रक्षा कैसे की जाए। यहाँ तक कि झारखंड़ की वायू भी प्रदुषित, हो चुकि थी कि उस वायु में साँस लेना मुश्किल हो गया। आसमान की परतों में छेद हो रहे थे। पर्यावरण तक असंतुलित हो गया था।
अब झारखंड़ी तो इतने ज्यादे शोषित-पीड़ित हो चुके थे कि इस शोषण को अपनी नियति मानने लगें थे। सिर उठाने की हिम्मत नहीं थी। हाथ-बाँधे, गर्दन झुकाए अपमानित होते रहते। चलती-फिरती लाश के समान सिर्फ हिलना-डूलना भर रह गया था।
ऐसी परिस्थिति में उनकी रक्षा कैसे हो ? उनके जीवन में परिवर्त्तन कैसे हो ? झारखंड़ियों को मुक्ति कैसे मिले ?
पर कहीं-कहीं तो समशीतोष्ण मौसम। न ज्यादे ठंढ़ न ज्यादे गर्मी। पहाड़, नदी, नाले, झरनों, से भरपूर इलाकें। सैकड़ों प्रकार के फलदार वृक्ष एवं इमारती लकड़ी। जड़ी-बूची, औषधियों का भंड़ार। पशु-पक्षी की भरमार। इतना ही नहीं धरती के नीचे उन्ही इलाकों में खनिज पदार्थो की भरमार। देवताओं की वास्तव में चिंता हुई और वे रचनाकर्त्ता, सबके पालक विष्णु भगवान के पास पहुँचे। भगवान तो क्षीर-सागर के गहरे तल में गहरी निन्द्रा में लीन थे। पत्नी लक्ष्मी उनके पांव दबा रही थी। इतने सारे देवताओं को देखकर प्रभु को जगाया गया। प्रभु ने हाल समाचार पुछा ओर आश्चर्य व्यक्त किया कि इतने सारे स्वर्ग के देवता एक साथ किस प्रयोजन से पधारे थे। देवताओं ने कहा कि प्रभु पृथ्वी का निर्माण बड़े ही गलत ढंग से हो गया है, भविष्य में भारी समस्या देवलोक को ही हो सकती है। आपने एक ही स्थान पर सारी सम्पदा दे डाली है बाकि जगहों के साथ अन्याय हो गया। प्रभु ने उनसे पुछा कि ऐसा कहाँ हो गया है। देवताओं ने कहा कि प्रभु झारखंड़ क्षेत्र में आपने सारी न्यामतें न्योछावर कर दी हैं और बाकि जगहों के साथ अन्याय हो गया। प्रभु ने उनसे पुछा कि ऐसा कहाँ हो गया है। देवताओं ने कहा कि प्रभु झारखंड़ क्षेत्र में आपने सारी न्यायमतें न्योछावर कर दी हैं और सारी बातें प्रभु को बताया गया। भविष्य की समस्याओं की ओर ध्यान एकत्रित किया गया। प्रभु थोड़ी देर चुप रहे। फिर उन्होंने मानव-निर्माण विभाग में फोन लगाये ओर यह जानकारी प्राप्त की कि अभी पृथ्वी में मानव जाति का निर्माण हुआ था या नहीं, झारखंड़ में भी मानव बने थे कि नहीं। उधर जबाव मिला कि उस समय तक इस संबंध में कोई कदम ब्राह्माजी के द्वारा उठाया नहीं गया था। रचयिता ब्राह्मा गहन सोच में थे। प्रभु ने देवताओं को बता दिया कि उन्होने समस्या का समाधान सोच लिया है ओर देवताओं को वापस अपने-अपने काम मे लौटकर जाने को कह दिया। देवता असन्जस में पड़ गये। प्रभु फिर सो गये थे, बिना यह बताए कि आखिर समस्या का समाधान क्या था ? उन्होने फिर से प्रभु को जगाया और इस बाबत पूछा। प्रभु ने झल्लाकर कहा कि आप सबों को चिंता करने की बात नहीं है। समाधान यह है कि हम झारखंड़ में इस प्रकार के मनुष्य बनाएँगें जो इन सारी सम्पत्तियों, खनिजों को पहचानेगा ही नहीं। और अगर पहचानेगा नहीं तो उसका उपयोग भी नहीं करेगा। यह कहकर प्रभु फिर से सो गये।
और तब से झारखंड़ की सम्पदा ही झारखंड़वासियों के लिए अभिशाप बन गयी। झारखंड़ की लकड़ी, झारखंड़ की के वन-उत्पाद, झारखंड़ का कोयला, लोहा, ताँबा, अबरख आदि खनिज, उससे सम्बन्धित व्यापार, नौकरी, चाकरी, ठेकेदारी, झारखंड़ की बिजली आदि सभी सम्पदाओं पर झारखंड़ से बाहर के लोगों का कब्जा हो गया। झारखंड़ के बाहर, भी बाहर के लोगों ने बसाए। और रहने लगे। मजे की बात तो यह हो गई कि इन सम्पदाओं के दोहन के लिए जरूरी मजदूर, श्रमिक, अधिकारी भी बाहर से लाए गये। झारखंड़ के लोग झारखंड़ की प्रकृतिक सुन्दरता में भी रम गये। न बाढ़ का डर, न सुखे की त्रासदी। न गर्म न ठंड़ा। साल भर का अनाज उगा लेते ओर गीत गाते। नाचते। माँदर, ढोल, मगाड़ा, बांसुरी, करताल बजाते और मस्त रहते। अपनी संस्कृति को पकड़े बैठे रहे।
प्रभु ने झारखंड़ के मनुष्यों को भी अभिशाप दिया, उस अभिशाप का नतीजा हुआ कि झारखंड़ में शोषण चरम पर पहुँच गया। वास्तव में प्रभु से बड़ी गलती हो गई थी, उन्होंने समस्या का समाधान नहीं किया था, बल्कि समस्या का तत्काल निपटारा कर दिया था। समस्या का समाधान तो तब होता जब पृथ्वी का पुनः निर्माण किया जाता और सभी भागों को समान रूप से दौलत दी होती। पर झारखंड़ के मनुष्यों की दृष्टि को भ्रमित करके उन्होंने समस्या का अस्थाई हल ही निकाला था और इसे सिर्फ निपटा दिया था। प्रभु विष्णु की ही तरह केन्द्र सरकार एवं राज्य-सरकारों ने कोई स्थाई कदम नहीं उठाए। प्रभु विष्णु की ही तरह केन्द्र सरकार एवं राज्य-सरकारों ने कोई स्थाई कदम नहीं उठाए। प्रभु की तरह ही अब झारखंड़ को “टेकल” किया जाने लगा। “सोल्भ” करने की और किती ने ध्यान नहीं दिया। पहले तो झारखंड़ की सम्पदा दूसरों के लिए समस्या का कारण, बनने वाली थी, पर अब तो झारखंड़ की सम्पदा झारखंड़वासियों के लिए ही समस्या बन गई है।
एक दिन पुनः भगवान विष्णु को नींद से जागना पड़ा। कारण था कि स्वर्ग के सभी देवता पुनः उन्हें जगाने वहाँ पहुँचे थे। भगवान ने उठते ही पूछा कि अब क्या हो गया ? क्या किसी असूर ने स्वर्गलोक में हमला बोल दिया है ? देवताओं ने कहा कि ऐसी बात नहीं हैं। उनकी परेशानी का कारण पृथ्वी पर हो रहे अत्याचार हैं। पृथ्वी वासियों की चीख-पुकार से उनकी नींद हराम हो गई है। उस पर तो खासकर झारखंड़ क्षेत्र में सबसे ज्यादा अत्याचार अनाचार जुल्म असुरों द्वारा किये जा रहें है। इस वार्त्तालाप के दौरान ही प्रभु के कानों में क्षीर-सागर के गहरे तल तक चीख-पुकार, क्रंदन की आवाज पहुँची। उन्होनें बड़े आश्चर्य से पुछा भी यहाँ कौन रो रहा है ? देवताओं ने उन्हें बताया कि ये आवाजे पृथ्वी के झारखंड़ क्षेत्र से आ रही है। प्रभु ने देखा की झारखंड़ में मनुष्यों को जिंदा जलाया जा रहा है। वन के प्राणियों को लगातार गोली मारा जा रहा है। उन्होनें यमराज से पुछा कि मनुष्यों एवं अन्य प्राणियों पर ऐसा अत्याचार करने का किसने कानून बनाया। तुम्हारे यमलोक में तो मृत्यु के बाद प्राणियों पर ऐसा अत्याचार करने का किसने कानून बनाया। तुम्हारे यमलोक में तो मृत्यु के बाद प्राणियों के पाप-पुण्य का लेखा-जोखा करके उसे स्वर्ग या नर्क में लाया जाता है, फिर उचित सजा दिया जाता है। पर यह जीतेजी प्राणियों को जलाना, समझ में नहीं आता। क्या किसी अत्याचारी असुर का साम्राज्य झारखंड़ क्षेत्र में जल रहा है ? देवताओं से उन्हें जबाव मिलते, इसके पहले ही उन्होनें देखा कि वहाँ तो चारों तरफ असुर ही असुर दिखाई दे रहें है। जो बड़े-बड़े वाहनों उड़न खटोले पर बड़े-बड़ हथियार लिए घूम रहें हैं।
देवताओं ने भगवान से कहा कि प्रभु अब आप अवतार लेकर झारखंड़ में जाएँ एवं असुरों का नाश करें अन्यथा न तो भू-लोक बचेगा न ही स्वर्ग, न ही आपका सिंहासन। असुर अब चाँद पर पहुँच गये, मंगल की दूरी माप लिया। जल के अन्दर चलने की पन-डुब्बी बना ली है। अन्य ग्रहों पर भी कब्जा करने की तैयारी चल रही है।
प्रभु बड़े चितिंत हुए ऐर कहा कि “देखो देवताओं मैं तो अवतार लेते-लेते थक चुका हूँ।” फिर अब तो वहाँ पहले की तरह एक असुर रावण या कंस नहीं है। वहाँ तो दर्जनों एक साथ घूम रहे है। भाई! मुझसे उनका नाश करना संभव नहीं होगा। अब आप तैतींस करोड़ देवता हो, अब आप ग्रुप बना कर जाएँ-ठीक असुरो की तरह और समस्या का समाधान करें।
प्रभु फिर करवट लेकर सो गये। देवताओं के सामने अब असली समस्या आ खड़ी हुई थी। झारखंड़ के जल, जमीन एवं जंगल की रक्षा कैसे की जाए। यहाँ तक कि झारखंड़ की वायू भी प्रदुषित, हो चुकि थी कि उस वायु में साँस लेना मुश्किल हो गया। आसमान की परतों में छेद हो रहे थे। पर्यावरण तक असंतुलित हो गया था।
अब झारखंड़ी तो इतने ज्यादे शोषित-पीड़ित हो चुके थे कि इस शोषण को अपनी नियति मानने लगें थे। सिर उठाने की हिम्मत नहीं थी। हाथ-बाँधे, गर्दन झुकाए अपमानित होते रहते। चलती-फिरती लाश के समान सिर्फ हिलना-डूलना भर रह गया था।
ऐसी परिस्थिति में उनकी रक्षा कैसे हो ? उनके जीवन में परिवर्त्तन कैसे हो ? झारखंड़ियों को मुक्ति कैसे मिले ?
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