Sunday, October 31, 2010

झामुमो के आन्दोलन का क्रमिक विकास

सभी को ज्ञात है कि 1973 से लेकर बिनोद बिहारी महतो के स्वर्गवास तक (18-12-91) झारखंड मुक्ति मोर्चा पूरे झारखंड क्षेत्र में एक सशक्त राजनैतिक दल के रूप में उभर चुका था। धनबाद जिले से लेकर पूरे उत्तरी छोटानागपुर, दक्षिणी छोटानागपुर एवं संथाल परगना में एक मजबूत संगठन बन चुका था। न सिर्फ इतना ही, बल्कि पश्चिम बंगाल एवं उड़ीसा के समीपवर्ती झारखंड क्षेत्र में यह बहुत लोकप्रिय बन चुका था।
झारखंड मुक्ति मोर्चा की सफलता के पीछे बिनोद बिहारी महतो की विचार-धारा रही। उनका दिशा-निर्देश रहा। उनकी जोखीम उठाने की प्रवृति रही। पार्टी को शुरू के दशवर्षो तक आर्थिक मदद इन्होने किया। उन्होने प्रतिभाओं को तलाशा एवं उन्हें तरासने का काम किया। अपना स्वयं का पैसा खर्च करके नेताओं को आगे बढ़ाया, कार्यकर्त्ता तैयार किए। उनका नेतृत्व ईमानदारी का था एवं पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़े थे। जैसा कि हमने पहले ही देख लिया है कि उन्होने उन वर्गो को एकत्रित करने का काम किया। जिन्हें वास्तव में परिवर्त्तन चाहिए था। उन्ही वर्गो-जातियों में से नेतृत्व पैदा किया। बिनोद बिहारी महतो ने झारखंड आन्दोलन के संकुचित आदिवासी चेहरे को, उसके जनजातीय छवि को बदल डाला। उसे एक विस्तृत आयाम दिया। इसमें आदिवासियों के साथ-साथ गैर-आदिवासी समूहों को भी शामिल किया। इन्होने झारखंड आन्दोलन में मजदूरों की भागीदारी भी सुनिश्चित की। उन्होनें इस आन्दोलन को न सिर्फ जातीय, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक आधार प्रदान किया। झारखंड की सभ्यता-सांस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए यहाँ के लोकगीतों, लोकनृत्यों, को आन्दोलन के रूप मे लिया। तो दूसरी ओर कल-कारखानों, कोलियारियों में नौकरी एवं रोजगार के लिए आन्दोलन चलाया। सांमतवादी विचार-धारा वाले सूदखोर, महाजनों के खिलाफ सशस्त्र आन्दोलन भी हुए।
चूँकि शिवाजी समाज द्वारा आन्दोलन बहुत आगे बढ़ाया जा चुका था और संथाल समाज द्वारा भी। अतः झारखंड मुक्ति मोर्चा सिर्फ दो वर्षो में स्थापित हो गया था।
इन आन्दोलनों में प्रमुख रहा झारखंड में विस्थापन की समस्या के विरूद्ध। 1978 के पहले केन्द्र सरकार ने विस्थापितों के नियोजन, पुर्नवास एवं नोकरी देने की कोई नीति नहीं बनाई थी। प्रथम बार 1978 से कोल कम्पनियों द्वारा इन विषयों पर नीतियाँ बनाई गई एवं नियोजन, पुर्नवास देने का काम शुरू किया गया। दामोदर भैली कॉरपोरेशन लिमिटेड को भी आन्दोलनों से मजबूर होकर विस्थापितों को नौकरी, रोजगार, ठीका आदि देने का काम शुरू करना पड़ा। इन सबके साथ-साथ कम्यूनिटी डेवलोपमेंट के नाम पर अगल-बगल के गाँवों में नागरिक सुविधाएँ मुहैय्या कराने का काम भी शुरू किया गया। सड़क, पानी, बिजली, विकास भवन, स्कूल आदि बनाने में औद्योगिक संस्थान अपनी थोड़ी-बहुत भागीदारी निभाने लगें।
इसके अलावे जो एक और प्रमुख आन्दोलन शुरू किया गया, वह था जंगल बचाओं आन्दोलन एवं विदेशी वृक्ष लगाना बंद करो का आन्दोलन। जंगलों में रहने वाले आदिवासी, गैर-आदिवासी सक्रिय हो उठे। जंगल विभाग के कर्मचारियों, अधिकारियों ने नंगा नाच मचा रखा था। अंधाधुंध लकड़ियों की कटाई इनके द्वारा कराई जा रही थी। साथ ही गाँव वालों को बिना वजह लकड़ी चोरी के इल्लजाम में पकड़कर जेल भेजा जाता था। अगर गाँव के लोग जलावन के लिए या अन्य छोटे-मोटे कृषि के उपकरण बनाने के लिए लकड़ी का प्रयोग करते तो उन्हें चोरी के इल्लजाम में जेल भेज दिया जाता। सदियों से झारखंड़ियों का जीवन जंगल-आधारित था। फल-फूल, पत्ते, लकड़ी का उपयोग करते आ रहे थे। पर इनके सारे अधिकार छीन लिए गये थे। अतः इस आन्दोलन का व्यापक प्रभाव पड़ा। विदेशी-वृक्षों को सरकार द्वारा खाली जमीनों पर लगाया जाता था, जो जमीनों को उपजाऊ नहीं, बल्कि सुखा देती थी। इन वृक्षों यूकलिप्टस आदि को काट डालने का अभियान चला। इसके अलावा फलदार वृक्षों को लगाने की माँग की जाने लगी। जंगलों के इलाकों में सरकारी तंत्रों के साथ गाँव वालों का मुकाबला भी हो जाता। कई बड़ी-बड़ी घटनाएँ भी घट गई, जिसमें पुलिस, जंगल गार्ड मारे गये तो गाँव वालों को भी गोलियों का निशाना बनाया गया। जंगलों में खासकर उग्रवादी आन्दोलन चलाये गये। सरकारी कर्मचारी, जंगल विभाग के अधिकारी ठेकेदार, भागने लगे थे।
इसके अलावे गाँवों में सूदखोरों, महाजनों द्वारा गैर कानूनी ढ़ंग से हड़पी गई जमीनों को वापस करने का जोरदार आन्दोलन किया गया। छोटानागपुर टेनेन्सी एक्ट तथा संथाल परगना टेनेन्सी एक्ट के अतिक्रमण की हालत में उन जमीनों पर रैयतों द्वारा जमान वापसी के लिए सीधे कार्यवाही की जाने लगी। कोर्ट-कचहरियों में गरीबों को न्याय मिलना असंभव था। अतः बिनोद बिहारी महतो ने उन जमानों पर पुनः कब्जा करने की रणनीति तैयार की। उन्होनें कई जिलों में वकीलों को प्रोत्साहित किया कि वे गरीब, आदिवासी, हरिजन, पिछड़े लोगों के मुकदमें बिना फीस लिए लड़े एवं उन्हें कानूनी सहायता दें। जमीन वापसी का आन्दोलन भी बड़ा व्यापक स्तर पर चला। “धान-कटनी” का आन्दोलन उस जमीन वापसी का आन्दोलन का एक हिस्सा था। गाँव के गरीब, आदिवासी, हरिजन, झारखंड मुक्ति मोर्चा के कार्यकर्त्ताओं द्वारा संगठित किए जाते और तीर-धनुष, लाठी-भाला, टाँगी आदि से लैस होकर खेतों पर डुगडुगी बजाते-बजाते धावा बोलते और खड़ी फसल को काट देते एवं उसे ढोकर सही व्यक्ति के घर पहुँचा देते।
सांस्कृतिक आन्दोलन भी चलाए गये। झारखंड की सभ्यता संस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए जगह-जगह “झूमर” प्रतियोगिता रखी जाने लगी। झूमर एक लोक नृत्य है जिसमें झूमर के गीत गाये जाते हैं। बाजा बजाने वाले होते हैं। ढोल, नगाड़ा, माँदर, करताल, शहनाई का होना आवश्यक है। इसमें बारह ताल यानि लय होते हैं। बारह प्रकार की अलग-अलग धूनों पर नाचा जाता है। नाचने के लिए विशेष तौर पर लड़के ही नर्तकियों का रूप धरते है। दो से छः तक नर्तकियों की संख्या होती है। यह लोक-नृत्य अखाड़े में खड़े होकर सम्पन्न किया जाता है। दर्शक इसके चारों तरफ बैठते है। झारखंड क्षेत्र का यह एक प्रसिद्ध लोक-नृत्य है जो पूरे झारखंड में महशूर है। पर्व-त्योहार के अवसर पर या फिर धान की फसल काट लेने के बाद जाड़े की रातों में रातभर झूमर नाचा जाता है। उसी प्रकार अन्य लोक-नृत्य “छऊ-नृत्य” है जो विश्व-प्रसिद्ध हो चुका है। इसी प्रकार के अन्य लोक गीतों एवं लोक-संगीतो, लोक-नृत्यों को बढ़ावा देने के लिए बिनोद बाबू ने व्यापक प्रोत्साहन दिया। स्वयं रात-रात भर जागकर कलाकारों को उत्हाहित करते। नतीजा यह निकला कि झारखंड के समूचे इलाके में, गाँव-गाँव में झारखंडी सभयता-संस्कृति पुर्नजीवित हो उठा एवं इसकी गूँज दूर-दूर तक आगे बढ़ने लगी। इसके साथ-साथ झारखंड क्षेत्र के पर्व-त्योहार करमा, सोहराई, गोहालपूजा, जीतिया, टुसू, जावा आदि शहरों में प्रवेश कर गये। उन्हें भी प्रोत्साहित किया गया। पूरे झारखंड क्षेत्र की अपनी एक पहचान है, वह भी विशिष्ट जो अन्य किसी की नहीं हैं। इस प्रकार के सांस्कृतिक आन्दोलन से झारखंडी अपने आप को पहचानने लगे। उनमें आत्म-विश्वास जगने लगा। औद्योगिकरण एवं बाहरी संस्कृति के दबाव से जो संकुचन आया था, वह दूर होने लगा और वे जो श्रेष्ठ होते हुए भी हीन भावना से ग्रस्त हो रहे थे, पुनः स्वयं को आत्म-विश्वास से भरा हुआ पाने लगे।
झारखंड क्षेत्र में कुछ ऐसे लोक नृत्य है जो “मारसल आर्ट” के स्वरूप है। इसमें एक प्रमुख है- “पैका” यानि ”पाइक”। इसमें खिलाड़ी ढाल तलवार (या लाठी) से लैस होता है। पैंरों में घुँघरू बाँध लेता है और सर पर पगड़ी। धोती को कस कर कमर में बाँधा जाता है। “पैका” में जो पारंगत हो जाता है वह अकेले ही दर्जन हमलावरों को एक साथ धूल चटा सकता है। इसके दाँव-पेंच ही ऐसे होते हैं। झारखंड में पहले कुड़ंमी-महतो लोगो के प्रत्येक गाँव में “पाइक” की ट्रेनिंग दी जाती थी। इसके लिए उस्ताद होते थे, गुरू होते थे और यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलता आता है। पर दुर्भाग्य से आज यह प्रायः लुप्त हो रहा है। इसी पैका का दूसरा स्वरूप “नटुआ नाच” है। अब ढाल की जगह गमछा, तलवार की जगह लाठी ने ले लिया है। इसमें बजने वाला बाजा विशिष्ट लय एवं ताल का होता है, जिसे सुनकर ही यहाँ का झारखंडी मैदान में कूद पड़ता है।
फिर झारखण्ड मुक्ति मोर्चा ने गाँव-गाँव में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए “अकिल-अखाड़े” चलाए। सुदूर गाँव में रात्री-पाठशालाएँ लालटेनों की रोशनी में चलायी जाने लगीं। शिक्षा के लिए भी अभियान या आन्दोलन चलाए गये। जिन परिवारों के बच्चे स्कूल नहीं जाते थे उन्हें प्रोत्साहित किया जाने लगा। उस समय गाँव में शिक्षा की कोई व्यवस्था ही नहीं थी। बिनोद बिहारी महतो ने स्वंय कुल मिलाकर कितने संस्थाने खोले, यह पता लगाया जा रहा है। पर चालीस संस्था का पता चला है। जिनमें मिडिल-स्कूल, हाई-स्कूल, डिग्री कॉलेज तथा विधि विद्यालय भी हैं। ये सम्पूर्ण झारखण्ड में जगह-जगह शिक्षण संस्थान खोलने के लिए लोगों को उत्साहित करते फिरते। अपनी कमाई का अधिकत्तर पैसा इन कॉलेजों एवं स्कूलों के भवन निर्माण शिक्षकों के वेतन के लिए दान दे दिया।
इधर गाँव के झगड़े गाँव में ही पंचायत बुलाकर सुलझाए जाने लगें। प्रत्येक गाँव में यह एक आन्दोलन के रूप में खड़ा होने लगा। झारखण्डी की जीवन-पद्धति भी यही थी। फिर अगर गाँवों में नहीं सुलझ पाते तो उन झगड़ों को नेताओं क पास ले जाया जाता। फिर बड़े पैमाने पर तीन-चार गाँव के लोग मिलकर बैठते एवं फैसला किया जाता। किसी-किसी मामलें में समस्या जब नहीं सुलझती, तो इसे बिनोद बाबू के पास लाया जाता। धीरे-धीरे ऐसी व्यवस्था कायम हो गई कि झारखंड के कई इलाकों में इस प्रकार से झगड़े निपटाने के केन्द्र बन गये और उन्हें लोग स्वतः जिला-कोर्ट, हाई-कोर्ट कहने लगे। यही कारण था कि सरकारी रिपोर्टो में यह बात दर्ज है कि झारखंड मुक्ति मोर्चा द्वारा समानान्तर सरकार चलाई जा रही थी, जिसका अपना पुलिस फोर्स है एवं कोर्ट-कचहरी है। इन कचहरियों में यानि बैठकों में आपराधिक मामले दीवानी मामले तथा शादी-व्याह, तलाक से जुड़े मामले सभी पर विचार विमर्श होता था। आपराधिक मामलों में ज्यादातर फाइन किया जाता था। कभी-कभी शारीरिक दंड दिया जाता था और अपराधी को लाठियों से पिटा जाता। या अन्य प्रकार से अपमानित या प्रताड़ित किया जाता। किसी-किसी गंभीर मामले में हुक्का पानी भी कुछ दिनों के लिए बंद कर दिया जाता यानि सामाजिक बहिष्कार किया जाता। किसी-किसी मामले में जो जमींदारी अत्याचार एवं सामंती अत्याचार के खिलाफ फैसला लिया जाता, उसमे “बिटलाहा” भी कर दिया जाता। बिटलाहा का मतलब होता था, उसे गाँव से उजाड़ देना। घर-द्वार को तोड़-फोड़ दिया जाता था।
इनके अलावे जो एक सबसे बड़ा पहलू झारखंड मुक्ति मोर्चा के आन्दोलन का रहा, वह था शराब-खोरी के खिलाफ संघर्ष। इसमें कार्यकर्त्ता सीधे शराब की भट्टियों पर धावा बोलते, तोड़फोड़ कर डालते। शराबियों को पकड़कर पीटते। उन्हें पानी में डूबा-डूबा कर उसका नशा तोड़ते। कार्यकर्त्ता पता लगाते कि कौन चोरी-छिपे इस धंधे में लिप्त है, उसका पता लगाते एवं उसे धंधे को छोड़ने के लिए मजबूर करते। गाँवों में औरतों के बीच जाते और उन्हें अपने-अपने शराबी पतियों की आदत छुड़ाने के लिए प्रोत्साहित करते। औरते इस आन्दोलन का समर्थन जोरदार ढंग से करती एवं अपने शराबी पतियों से लडती झगड़ती।
इस प्रकार इन आन्दोलनों ने बहुत सारे जुझारू, लड़ाकू कार्यकर्त्ता पैदा किए। पर समाज का शोषक-शासक वर्ग चुप नहीं बैठे रह सकता था। इन आन्दोलों को कुचलने के लिए पुलिस-प्रसाशन, जमींदार, सूदखोर, महाजन, माफिया, गुंडे सभी सक्रिय हो उठे। नतीजा यह हुआ कि कई बड़े-बड़े संघर्ष हुए। चोरी-छिपे कार्यकर्त्ताओं, नेताओं की हत्याएँ की जाने लगीं। घात लाकर इन आन्दोलनों के अगुआओं को खोजकर मारा जाने लगे। शहीदों की लम्बी कतारें हो गई। पर कार्यकर्त्ता और जनता भी प्रतिकार में उतर आई। और वर्षो तक दोनों तरफ से संघर्ष चलने लगा।
1975 में ही गोमो में जिला धनबाद के सदानन्द झा शहिद हो गये। उन्हें अकेले पाकर आतताइयों ने गोली मार दी। 1977 में शक्ति नाथ महतो टाटा सिजुआ में शहीद हो गये। उन्हें काँग्रेस के गुंडों ने दिन दहाड़े बम गोलियों से मार डाला। उसी प्रकार इस कोयलाचंल में रसीक हाँसदा, नेपाल रवानी आदि दर्जनों शहीद हुए।
1975 में गोमो की रेल नगरी में सदानन्द झा शहीद हुए तथा 1977 में टाटा-सिजूआ तेतुलमुड़ी के शक्ति नाथ महतो शहीद हुए। ये दो प्रमुख कार्यकर्त्ता नेताओं की शहादत के बाद तो मानों पूरे दक्षिणी छोटानागपुर में आन्दोलन में उफान आ गया। फिर 1987 में जमशेदपुर में झारखंड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष निर्मल महतो को भी आतताइयों ने मार डाला। उनकी शहादत के बाद तो मानों पूरे दक्षिणी छोटानागपुर में आग ही लग गई। इसके अलावे इचागढ़ के अजीत महतो, धनंजय महतो आदि शहीद हुए। गुवा में 1982 में प्रसिद्ध गोली कांड हुआ जिसे आज गुआ गोली कांड के रूप में याद किया जाता है, इसके अलावे अनेकों शहीद हुए। हजारों जेल गये। रिटायर्ड आर्मी के जवान कंडुलना की पुलीस इन्काउटर दिखा कर हत्या कर दी।
संथाल परगना में भी यही हाल रहा। यहाँ उन तमाम घटनाओं का जिक्र करना संभव नहीं हैं। आम झारखंडी शोषित जनता ने भी प्रतित्चुर में हथियार उठा लिए। कई बड़े-बड़े संघर्ष पुलिस-प्रशासन के साथ हुए। महाजन, सामंतो के बिरूद्ध भी जम कर सशस्त्र संधंर्ष हुए। इस प्रकार 1990 तक आते-आते इस पार्टी के बीस विधायक एवं 1991 में छः सासंद बन गये। उन सांसदो के नाम है- श्री बिनोद बिहारी महतो, शिबू सोरेन, सूरज मंडल, शैलेन्द्र महतो, कृष्णा मार्डी, साइमन मरांडी। फिर बाद में 1992 के जून में गिरीडिह संसदिय क्षेत्र में बिनोद बिहारी महतो का निधन के बाद उपचुनाव हुआ जिसमें उनके पुत्र राज किशोर महतो सासंद बने।

झामुमो के आन्दोलन का क्रमिक विकास

सभी को ज्ञात है कि 1973 से लेकर बिनोद बिहारी महतो के स्वर्गवास तक (18-12-91) झारखंड मुक्ति मोर्चा पूरे झारखंड क्षेत्र में एक सशक्त राजनैतिक दल के रूप में उभर चुका था। धनबाद जिले से लेकर पूरे उत्तरी छोटानागपुर, दक्षिणी छोटानागपुर एवं संथाल परगना में एक मजबूत संगठन बन चुका था। न सिर्फ इतना ही, बल्कि पश्चिम बंगाल एवं उड़ीसा के समीपवर्ती झारखंड क्षेत्र में यह बहुत लोकप्रिय बन चुका था।
झारखंड मुक्ति मोर्चा की सफलता के पीछे बिनोद बिहारी महतो की विचार-धारा रही। उनका दिशा-निर्देश रहा। उनकी जोखीम उठाने की प्रवृति रही। पार्टी को शुरू के दशवर्षो तक आर्थिक मदद इन्होने किया। उन्होने प्रतिभाओं को तलाशा एवं उन्हें तरासने का काम किया। अपना स्वयं का पैसा खर्च करके नेताओं को आगे बढ़ाया, कार्यकर्त्ता तैयार किए। उनका नेतृत्व ईमानदारी का था एवं पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़े थे। जैसा कि हमने पहले ही देख लिया है कि उन्होने उन वर्गो को एकत्रित करने का काम किया। जिन्हें वास्तव में परिवर्त्तन चाहिए था। उन्ही वर्गो-जातियों में से नेतृत्व पैदा किया। बिनोद बिहारी महतो ने झारखंड आन्दोलन के संकुचित आदिवासी चेहरे को, उसके जनजातीय छवि को बदल डाला। उसे एक विस्तृत आयाम दिया। इसमें आदिवासियों के साथ-साथ गैर-आदिवासी समूहों को भी शामिल किया। इन्होने झारखंड आन्दोलन में मजदूरों की भागीदारी भी सुनिश्चित की। उन्होनें इस आन्दोलन को न सिर्फ जातीय, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक आधार प्रदान किया। झारखंड की सभ्यता-सांस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए यहाँ के लोकगीतों, लोकनृत्यों, को आन्दोलन के रूप मे लिया। तो दूसरी ओर कल-कारखानों, कोलियारियों में नौकरी एवं रोजगार के लिए आन्दोलन चलाया। सांमतवादी विचार-धारा वाले सूदखोर, महाजनों के खिलाफ सशस्त्र आन्दोलन भी हुए।
चूँकि शिवाजी समाज द्वारा आन्दोलन बहुत आगे बढ़ाया जा चुका था और संथाल समाज द्वारा भी। अतः झारखंड मुक्ति मोर्चा सिर्फ दो वर्षो में स्थापित हो गया था।
इन आन्दोलनों में प्रमुख रहा झारखंड में विस्थापन की समस्या के विरूद्ध। 1978 के पहले केन्द्र सरकार ने विस्थापितों के नियोजन, पुर्नवास एवं नोकरी देने की कोई नीति नहीं बनाई थी। प्रथम बार 1978 से कोल कम्पनियों द्वारा इन विषयों पर नीतियाँ बनाई गई एवं नियोजन, पुर्नवास देने का काम शुरू किया गया। दामोदर भैली कॉरपोरेशन लिमिटेड को भी आन्दोलनों से मजबूर होकर विस्थापितों को नौकरी, रोजगार, ठीका आदि देने का काम शुरू करना पड़ा। इन सबके साथ-साथ कम्यूनिटी डेवलोपमेंट के नाम पर अगल-बगल के गाँवों में नागरिक सुविधाएँ मुहैय्या कराने का काम भी शुरू किया गया। सड़क, पानी, बिजली, विकास भवन, स्कूल आदि बनाने में औद्योगिक संस्थान अपनी थोड़ी-बहुत भागीदारी निभाने लगें।
इसके अलावे जो एक और प्रमुख आन्दोलन शुरू किया गया, वह था जंगल बचाओं आन्दोलन एवं विदेशी वृक्ष लगाना बंद करो का आन्दोलन। जंगलों में रहने वाले आदिवासी, गैर-आदिवासी सक्रिय हो उठे। जंगल विभाग के कर्मचारियों, अधिकारियों ने नंगा नाच मचा रखा था। अंधाधुंध लकड़ियों की कटाई इनके द्वारा कराई जा रही थी। साथ ही गाँव वालों को बिना वजह लकड़ी चोरी के इल्लजाम में पकड़कर जेल भेजा जाता था। अगर गाँव के लोग जलावन के लिए या अन्य छोटे-मोटे कृषि के उपकरण बनाने के लिए लकड़ी का प्रयोग करते तो उन्हें चोरी के इल्लजाम में जेल भेज दिया जाता। सदियों से झारखंड़ियों का जीवन जंगल-आधारित था। फल-फूल, पत्ते, लकड़ी का उपयोग करते आ रहे थे। पर इनके सारे अधिकार छीन लिए गये थे। अतः इस आन्दोलन का व्यापक प्रभाव पड़ा। विदेशी-वृक्षों को सरकार द्वारा खाली जमीनों पर लगाया जाता था, जो जमीनों को उपजाऊ नहीं, बल्कि सुखा देती थी। इन वृक्षों यूकलिप्टस आदि को काट डालने का अभियान चला। इसके अलावा फलदार वृक्षों को लगाने की माँग की जाने लगी। जंगलों के इलाकों में सरकारी तंत्रों के साथ गाँव वालों का मुकाबला भी हो जाता। कई बड़ी-बड़ी घटनाएँ भी घट गई, जिसमें पुलिस, जंगल गार्ड मारे गये तो गाँव वालों को भी गोलियों का निशाना बनाया गया। जंगलों में खासकर उग्रवादी आन्दोलन चलाये गये। सरकारी कर्मचारी, जंगल विभाग के अधिकारी ठेकेदार, भागने लगे थे।
इसके अलावे गाँवों में सूदखोरों, महाजनों द्वारा गैर कानूनी ढ़ंग से हड़पी गई जमीनों को वापस करने का जोरदार आन्दोलन किया गया। छोटानागपुर टेनेन्सी एक्ट तथा संथाल परगना टेनेन्सी एक्ट के अतिक्रमण की हालत में उन जमीनों पर रैयतों द्वारा जमान वापसी के लिए सीधे कार्यवाही की जाने लगी। कोर्ट-कचहरियों में गरीबों को न्याय मिलना असंभव था। अतः बिनोद बिहारी महतो ने उन जमानों पर पुनः कब्जा करने की रणनीति तैयार की। उन्होनें कई जिलों में वकीलों को प्रोत्साहित किया कि वे गरीब, आदिवासी, हरिजन, पिछड़े लोगों के मुकदमें बिना फीस लिए लड़े एवं उन्हें कानूनी सहायता दें। जमीन वापसी का आन्दोलन भी बड़ा व्यापक स्तर पर चला। “धान-कटनी” का आन्दोलन उस जमीन वापसी का आन्दोलन का एक हिस्सा था। गाँव के गरीब, आदिवासी, हरिजन, झारखंड मुक्ति मोर्चा के कार्यकर्त्ताओं द्वारा संगठित किए जाते और तीर-धनुष, लाठी-भाला, टाँगी आदि से लैस होकर खेतों पर डुगडुगी बजाते-बजाते धावा बोलते और खड़ी फसल को काट देते एवं उसे ढोकर सही व्यक्ति के घर पहुँचा देते।
सांस्कृतिक आन्दोलन भी चलाए गये। झारखंड की सभ्यता संस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए जगह-जगह “झूमर” प्रतियोगिता रखी जाने लगी। झूमर एक लोक नृत्य है जिसमें झूमर के गीत गाये जाते हैं। बाजा बजाने वाले होते हैं। ढोल, नगाड़ा, माँदर, करताल, शहनाई का होना आवश्यक है। इसमें बारह ताल यानि लय होते हैं। बारह प्रकार की अलग-अलग धूनों पर नाचा जाता है। नाचने के लिए विशेष तौर पर लड़के ही नर्तकियों का रूप धरते है। दो से छः तक नर्तकियों की संख्या होती है। यह लोक-नृत्य अखाड़े में खड़े होकर सम्पन्न किया जाता है। दर्शक इसके चारों तरफ बैठते है। झारखंड क्षेत्र का यह एक प्रसिद्ध लोक-नृत्य है जो पूरे झारखंड में महशूर है। पर्व-त्योहार के अवसर पर या फिर धान की फसल काट लेने के बाद जाड़े की रातों में रातभर झूमर नाचा जाता है। उसी प्रकार अन्य लोक-नृत्य “छऊ-नृत्य” है जो विश्व-प्रसिद्ध हो चुका है। इसी प्रकार के अन्य लोक गीतों एवं लोक-संगीतो, लोक-नृत्यों को बढ़ावा देने के लिए बिनोद बाबू ने व्यापक प्रोत्साहन दिया। स्वयं रात-रात भर जागकर कलाकारों को उत्हाहित करते। नतीजा यह निकला कि झारखंड के समूचे इलाके में, गाँव-गाँव में झारखंडी सभयता-संस्कृति पुर्नजीवित हो उठा एवं इसकी गूँज दूर-दूर तक आगे बढ़ने लगी। इसके साथ-साथ झारखंड क्षेत्र के पर्व-त्योहार करमा, सोहराई, गोहालपूजा, जीतिया, टुसू, जावा आदि शहरों में प्रवेश कर गये। उन्हें भी प्रोत्साहित किया गया। पूरे झारखंड क्षेत्र की अपनी एक पहचान है, वह भी विशिष्ट जो अन्य किसी की नहीं हैं। इस प्रकार के सांस्कृतिक आन्दोलन से झारखंडी अपने आप को पहचानने लगे। उनमें आत्म-विश्वास जगने लगा। औद्योगिकरण एवं बाहरी संस्कृति के दबाव से जो संकुचन आया था, वह दूर होने लगा और वे जो श्रेष्ठ होते हुए भी हीन भावना से ग्रस्त हो रहे थे, पुनः स्वयं को आत्म-विश्वास से भरा हुआ पाने लगे।
झारखंड क्षेत्र में कुछ ऐसे लोक नृत्य है जो “मारसल आर्ट” के स्वरूप है। इसमें एक प्रमुख है- “पैका” यानि ”पाइक”। इसमें खिलाड़ी ढाल तलवार (या लाठी) से लैस होता है। पैंरों में घुँघरू बाँध लेता है और सर पर पगड़ी। धोती को कस कर कमर में बाँधा जाता है। “पैका” में जो पारंगत हो जाता है वह अकेले ही दर्जन हमलावरों को एक साथ धूल चटा सकता है। इसके दाँव-पेंच ही ऐसे होते हैं। झारखंड में पहले कुड़ंमी-महतो लोगो के प्रत्येक गाँव में “पाइक” की ट्रेनिंग दी जाती थी। इसके लिए उस्ताद होते थे, गुरू होते थे और यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलता आता है। पर दुर्भाग्य से आज यह प्रायः लुप्त हो रहा है। इसी पैका का दूसरा स्वरूप “नटुआ नाच” है। अब ढाल की जगह गमछा, तलवार की जगह लाठी ने ले लिया है। इसमें बजने वाला बाजा विशिष्ट लय एवं ताल का होता है, जिसे सुनकर ही यहाँ का झारखंडी मैदान में कूद पड़ता है।
फिर झारखण्ड मुक्ति मोर्चा ने गाँव-गाँव में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए “अकिल-अखाड़े” चलाए। सुदूर गाँव में रात्री-पाठशालाएँ लालटेनों की रोशनी में चलायी जाने लगीं। शिक्षा के लिए भी अभियान या आन्दोलन चलाए गये। जिन परिवारों के बच्चे स्कूल नहीं जाते थे उन्हें प्रोत्साहित किया जाने लगा। उस समय गाँव में शिक्षा की कोई व्यवस्था ही नहीं थी। बिनोद बिहारी महतो ने स्वंय कुल मिलाकर कितने संस्थाने खोले, यह पता लगाया जा रहा है। पर चालीस संस्था का पता चला है। जिनमें मिडिल-स्कूल, हाई-स्कूल, डिग्री कॉलेज तथा विधि विद्यालय भी हैं। ये सम्पूर्ण झारखण्ड में जगह-जगह शिक्षण संस्थान खोलने के लिए लोगों को उत्साहित करते फिरते। अपनी कमाई का अधिकत्तर पैसा इन कॉलेजों एवं स्कूलों के भवन निर्माण शिक्षकों के वेतन के लिए दान दे दिया।
इधर गाँव के झगड़े गाँव में ही पंचायत बुलाकर सुलझाए जाने लगें। प्रत्येक गाँव में यह एक आन्दोलन के रूप में खड़ा होने लगा। झारखण्डी की जीवन-पद्धति भी यही थी। फिर अगर गाँवों में नहीं सुलझ पाते तो उन झगड़ों को नेताओं क पास ले जाया जाता। फिर बड़े पैमाने पर तीन-चार गाँव के लोग मिलकर बैठते एवं फैसला किया जाता। किसी-किसी मामलें में समस्या जब नहीं सुलझती, तो इसे बिनोद बाबू के पास लाया जाता। धीरे-धीरे ऐसी व्यवस्था कायम हो गई कि झारखंड के कई इलाकों में इस प्रकार से झगड़े निपटाने के केन्द्र बन गये और उन्हें लोग स्वतः जिला-कोर्ट, हाई-कोर्ट कहने लगे। यही कारण था कि सरकारी रिपोर्टो में यह बात दर्ज है कि झारखंड मुक्ति मोर्चा द्वारा समानान्तर सरकार चलाई जा रही थी, जिसका अपना पुलिस फोर्स है एवं कोर्ट-कचहरी है। इन कचहरियों में यानि बैठकों में आपराधिक मामले दीवानी मामले तथा शादी-व्याह, तलाक से जुड़े मामले सभी पर विचार विमर्श होता था। आपराधिक मामलों में ज्यादातर फाइन किया जाता था। कभी-कभी शारीरिक दंड दिया जाता था और अपराधी को लाठियों से पिटा जाता। या अन्य प्रकार से अपमानित या प्रताड़ित किया जाता। किसी-किसी गंभीर मामले में हुक्का पानी भी कुछ दिनों के लिए बंद कर दिया जाता यानि सामाजिक बहिष्कार किया जाता। किसी-किसी मामले में जो जमींदारी अत्याचार एवं सामंती अत्याचार के खिलाफ फैसला लिया जाता, उसमे “बिटलाहा” भी कर दिया जाता। बिटलाहा का मतलब होता था, उसे गाँव से उजाड़ देना। घर-द्वार को तोड़-फोड़ दिया जाता था।
इनके अलावे जो एक सबसे बड़ा पहलू झारखंड मुक्ति मोर्चा के आन्दोलन का रहा, वह था शराब-खोरी के खिलाफ संघर्ष। इसमें कार्यकर्त्ता सीधे शराब की भट्टियों पर धावा बोलते, तोड़फोड़ कर डालते। शराबियों को पकड़कर पीटते। उन्हें पानी में डूबा-डूबा कर उसका नशा तोड़ते। कार्यकर्त्ता पता लगाते कि कौन चोरी-छिपे इस धंधे में लिप्त है, उसका पता लगाते एवं उसे धंधे को छोड़ने के लिए मजबूर करते। गाँवों में औरतों के बीच जाते और उन्हें अपने-अपने शराबी पतियों की आदत छुड़ाने के लिए प्रोत्साहित करते। औरते इस आन्दोलन का समर्थन जोरदार ढंग से करती एवं अपने शराबी पतियों से लडती झगड़ती।
इस प्रकार इन आन्दोलनों ने बहुत सारे जुझारू, लड़ाकू कार्यकर्त्ता पैदा किए। पर समाज का शोषक-शासक वर्ग चुप नहीं बैठे रह सकता था। इन आन्दोलों को कुचलने के लिए पुलिस-प्रसाशन, जमींदार, सूदखोर, महाजन, माफिया, गुंडे सभी सक्रिय हो उठे। नतीजा यह हुआ कि कई बड़े-बड़े संघर्ष हुए। चोरी-छिपे कार्यकर्त्ताओं, नेताओं की हत्याएँ की जाने लगीं। घात लाकर इन आन्दोलनों के अगुआओं को खोजकर मारा जाने लगे। शहीदों की लम्बी कतारें हो गई। पर कार्यकर्त्ता और जनता भी प्रतिकार में उतर आई। और वर्षो तक दोनों तरफ से संघर्ष चलने लगा।
1975 में ही गोमो में जिला धनबाद के सदानन्द झा शहिद हो गये। उन्हें अकेले पाकर आतताइयों ने गोली मार दी। 1977 में शक्ति नाथ महतो टाटा सिजुआ में शहीद हो गये। उन्हें काँग्रेस के गुंडों ने दिन दहाड़े बम गोलियों से मार डाला। उसी प्रकार इस कोयलाचंल में रसीक हाँसदा, नेपाल रवानी आदि दर्जनों शहीद हुए।
1975 में गोमो की रेल नगरी में सदानन्द झा शहीद हुए तथा 1977 में टाटा-सिजूआ तेतुलमुड़ी के शक्ति नाथ महतो शहीद हुए। ये दो प्रमुख कार्यकर्त्ता नेताओं की शहादत के बाद तो मानों पूरे दक्षिणी छोटानागपुर में आन्दोलन में उफान आ गया। फिर 1987 में जमशेदपुर में झारखंड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष निर्मल महतो को भी आतताइयों ने मार डाला। उनकी शहादत के बाद तो मानों पूरे दक्षिणी छोटानागपुर में आग ही लग गई। इसके अलावे इचागढ़ के अजीत महतो, धनंजय महतो आदि शहीद हुए। गुवा में 1982 में प्रसिद्ध गोली कांड हुआ जिसे आज गुआ गोली कांड के रूप में याद किया जाता है, इसके अलावे अनेकों शहीद हुए। हजारों जेल गये। रिटायर्ड आर्मी के जवान कंडुलना की पुलीस इन्काउटर दिखा कर हत्या कर दी।
संथाल परगना में भी यही हाल रहा। यहाँ उन तमाम घटनाओं का जिक्र करना संभव नहीं हैं। आम झारखंडी शोषित जनता ने भी प्रतित्चुर में हथियार उठा लिए। कई बड़े-बड़े संघर्ष पुलिस-प्रशासन के साथ हुए। महाजन, सामंतो के बिरूद्ध भी जम कर सशस्त्र संधंर्ष हुए। इस प्रकार 1990 तक आते-आते इस पार्टी के बीस विधायक एवं 1991 में छः सासंद बन गये। उन सांसदो के नाम है- श्री बिनोद बिहारी महतो, शिबू सोरेन, सूरज मंडल, शैलेन्द्र महतो, कृष्णा मार्डी, साइमन मरांडी। फिर बाद में 1992 के जून में गिरीडिह संसदिय क्षेत्र में बिनोद बिहारी महतो का निधन के बाद उपचुनाव हुआ जिसमें उनके पुत्र राज किशोर महतो सासंद बने।

Tuesday, October 26, 2010

झारखण्ड मुक्ति मोर्चा का जन्म, उसकी पृष्ठभूमि एवं विचार-धारा

झारखंड में हो रहे चौतरफा शोषण से बचने के लिए बिनोद बाबू को यह महसूस हुआ कि हमारी पहचान मिट रही थी। इसीलिए सबसे पहले अपनी पहचान बचाने का सवाल आ खड़ा हुआ था। पर यह पहचान बनेगी कैसे, इसके लिए इसकी दलित, शोषित राष्ट्रीयता को पहचान दिलाना जरूरी था। ऐसा तभी हो सकता था, जब झारखंड क्षेत्र को अलग राज्य का दर्जा मिले। एक शोषण मुक्त झारखंड की परिकल्पना के रास्ते में अलग राज्य का बनना पहला एवं बड़ा कदम होगा। फिर यहाँ से दूसरे चरण में शोषण का सफाया किया जाय। ऐसी बिनोद बाबू की अवधारणा बनी। तब इसे आर्थिक सामाजिक, प्रगति के रास्ते पर ले चलना होगा।
उपरोक्त अवधारणा एक क्रांतिकारी अवधारणा थी। एक ऐसा चिंतन था जिसे सरजमीन पर उतारना कठिन काम था। क्रांतिकारी परिवर्त्तन के लिए क्रांतिकारी परिस्थिति का होना जरूरी है। बिनोद बाबू ने पाया कि झारखंड क्षेत्र में क्रांतिकारी परिस्थिति पैदा हो चुकी थी। यहाँ के लोगों एवं मजदूरों का शोषण इतना तेज था कि कभी भी विस्फोट हो सकता था। पर इस विस्फोट के लिए लोगों को संगठित करना जरूरी था एवं सही दिशा देने की आवश्यकता थी जिसे बिनोद बाबू करना चाहते थे। यानि क्रांतिकारी परिवर्त्तन के लिए क्रातिकारी दल का गठन करना चाहते थे। यह क्रांतिकारी दल निश्चित तोर पर वैसे ही लोगों के द्वारा गठित किया जाना चाहिए, जो वास्तव में समाज में परिवर्त्तन चाहते है तथा जो क्रांतिकारी परिवर्त्तन लाना जरूरी समझते है यानि जिसे वास्तव में इस परिवर्त्तन की आवश्यकता है। सिर्फ क्रांति की बातें करने वाले शौकिया लोगों से क्रांतिकारी दल का गठन नहीं हो सकता। यानि शोषित, दलित, पिछड़े-अनुसूचित जनजाति, हरिजन, गरीब, प्रताड़ित लोगों के द्वारा ही ऐसा दल गठित होना चाहिए, जिन्हें वास्तव में अपने लिए ऊपर उठना है, जिन्हें सामाजिक न्याय पाना है। वैसे नेताओं एवं लोगों द्वारा समाज में परिवर्त्तन नहीं आ सकता जो सिर्फ सत्ता तक पहुचने के लिए झूठ, दिखावा, तिकड़म का सहारा लेकर आगे बढ़ते है। अतः उस परिस्थिति में झारखंड क्षेत्र के महतो, माँझी, मुंडा, बाऊरी, डोम, चमार, रजवार, रवानी आदि दलित जातियों में से ही संगठन बनाने के लिए बिनोद बाबू आगे बढ़े।
वैचारिक शक्ति रखने वाले बिनोद बिहारी महतो ने पाया कि प्रजातंत्र यानि डेमोक्रेसी भारतवर्ष में स्थापित होने के पहले ही दम तोड़ रहा था। कोर्ट-कचहरी तक में गरीब को न्याय मिलना असंभव था। कोर्ट-कचहरियाँ बड़े लोगों की इच्छा के अनुरूप फेसला सुना रही थी। थाना-पुलिस प्रशासन निरकुंश हो चुका था। इस परिस्थिति में जब आदिवासी एवं गैर-आदिवासी दोनों वर्ग पीस रहे थे, तो इन दोनों नेताओं ने अपने जातीय संगठन के माध्यम से अपने लोगों को जगाना शुरू किया, सचेत करना शुरू किया। दोनों जातियों के झगड़ो का फेसला समाज में पंचायत बुलाकर किया जाने लगा। दोनों समाजों का अपना-अपना कायदा-कानून बहुत पहले से बना था। इन परम्पराओं में, कस्टम में, बाइसी था कुड़मी-महतो का सर्वोच्य संगठन। महतो परगनैत, प्रमुख, परगनैत होते थे। संथालों में भी माँझी मानकी कस्टम था। समाज को चलाने के लिए अपने वसूल थे। ये कायदे सदियों से चले आ रहे थे। थाना-पुलिस या कोर्ट जो ब्रिटिश-शासन ने इस क्षेत्र में स्थापित किए थे, वहाँ जाकर न्याय पाने के लिए लोग इच्छुक नहीं थे। कालान्तर में महतो-माँझी एवं अन्य जनजातिय समुहों की पंचायत व्यवस्था क्षीण होने लगी और वर्त्तमान ब्रिटिश व्यवस्था हाबी हो गया। इन दोनों नेताओं ने फिर अपने लोगों को पुरानी पंचायत, पहड़ा परगनैत व्यवस्था की तरफ मौड़ा।
कोयलाचंल में इन दो संगठनों से प्रेरणा लेकर “मंडल-समाज” एवं “तेली-समाज” आदि संगठन पिछड़ी जातियों के लोगों के द्वारा बनाये गये।
जैसा कि हमने पहले ही देख लिया है कि 1970 तक आते-आते कोलियरियों के विस्तार के साथ-साथ कोयलाचंल में अनेक बड़े-बड़े उद्योग लगे, परियोजनाएँ बनी तथा इनके अनुसंगिक उद्योग, कल कारखाने लगाए गये। इससे मजदूरों की संख्या में भारी वृद्धि हुई। यहाँ स्थानीय ग्रामीण मजदूरों से बहुत ज्यादे बाहर प्रदेशों, उत्तरी बिहार से मजदूरो का आवागमन हुआ एवं यहाँ बसने लगे। मजदूरों के बीच मजदूर ट्रेड यूनियनों का जन्म धड़ल्ले से होने लगा। 1972 तक कोल कम्पनियों के राष्ट्रीयकरण के पहले बाहरी बिदेशी कोल कम्पनियाँ हुआ करती थी। इनमें बंगाल कोल कम्पनी, बर्ड्स कोल कम्पनी, मैकलीन बैरी आदि प्रमुख थी। इनके अलावा भारतीय कोल कम्पनियाँ टाटा कम्पनी, के0 वोरा, चनचनी ग्रुप, अर्जुन अग्रवाल ग्रुप आदि थी। इसके अलावे झारखंड क्षेत्र के दूसरे हिस्सों में औद्योगिकरण जोरों पर था।
यहाँ के ज्यादातर मजदूर काँग्रेस द्वारा संचालित इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन काँग्रेस के सदस्य होते थे कोलियरियों, उद्योगों आदि प्रतिष्ठान सिर्फ इस ट्रेड यूनियन की बातें सुनते थे। इसका नतीजा यह हुआ कि ट्रेड यूनियन के नेतागण निरंकुश हो उठे अवं मजदूरों के हित की बात नहीं करके प्रबन्धन के दलाल बन गये। माफिया-नेताओं का जन्म हुआ। इन्होने न सिर्फ मजदूरों के ऊपर सूदखोरी किया, बल्कि शराब की लत डाली। ये राजनीति में, सक्रिय हो उठे और इस कोयलाचंल का प्रतिनिधित्व विधान-सभा एवं संसद में करने लगें।
पर इसी समय इस कोयलाचंल के सिन्दरी खाद कारखाने में काम करने वाले श्री अरूण कुमार राय यानि श्री ए0 के0 राय एक नौजवान ट्रेड यूनियन के नेता के रूप में उभरे। श्री राय सिन्दरी कारखाने में एक शोधकर्त्ता वैज्ञानिक थे। सिन्दरी कारखाने एवं अन्य कारखाने के मजदूर सम्बन्धी समस्याओं से ये जूड़े रहते थे तथा प्रबंधन विरोधी रवैये के कारण एवं मजदूरों के हक में आवाज उठाने के चलते उन्हें नौकरी से हाथ धोना पड़ा।
इन्होने बिनोद बिहारी महतो जिन्हें प्यार से लोग “बाबू” कहा करते थे, का नाम सुन रखा था। उस समय बिनोद बाबू भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी में थे। ए0 के0 राय ने बिनोद बिहारी महतो से सम्पर्क साधा। नौकरी छूट जाने के बाद ए0 के0 राय बिनोद बाबू के संरक्षण में सिन्दरी में टिक गये एवं राजनैतिक गतिविधियों में सक्रिय हो उठे। ये श्री राय के अभिभावक की तरह थे। ए0 के0 राय की माता जी पश्चिम बंगाल से अक्कसर बिनोद बाबू को पत्र लिखा करती थी कि वे उनके बेटे का ख्याल रखें। बिनोद बाबू उन्हे बहुत चाहने लगे थे। उन्हे बिनोद बाबू ने कई मामलों में, मुकदमें में छुड़वाया तथा जेल में सड़ने से बचाया। यहाँ तक की बिनोद बाबू ने सिन्दरी विधान सभा सीट जो उनकी गृह-सीट थी, श्री राय के लिए छोड़ दी और 1967 में उन्हें प्रथम बार विधायक बना डाला। अपनी तैयार की हुई सीट पर उन्हें स्थापित कर दिया। स्वयं टुंडी विधान सभा की तरफ चल दिए।
श्री राय झारखंड क्षेत्र के मूल निवासी नहीं थे। बंगाल के किसी स्थान के रहने वाले श्री राय को बिनोद बाबू के संरक्षण में बहुत बड़ी उपलब्धि मिली। श्री राय ने “बिहार कोलयरी कामगार यूनियन” नामक ट्रेड यूनियन का गठन किया। श्री राय की पृष्ठभूमि वामपंथी थी। बिनोद बिहारी महतो ने 1967 में जब भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी का विभाजन हुआ, कम्युनिष्ट पार्टी (मार्क्सवादी) का दामन थामा।
बिनोद बिहारी महतो ने अपने विचारों को अमली जामा पहनाने के लिए एक नई पार्टी के गठन की बात सोची। और उन्होने शिबू सोरेन ए0 के0 राय आदि सभी कार्यकर्त्ता, नेताओं को बुलाया और बैठक की। आदिवासियों की लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें शिबू सोरेन यानि उस समय के शिवलाल माँझी उन्हें उपर्युक्त लगे। तथा मजदूर आन्दोलन को झारखंड आन्दोलन के साथ जोड़ने के लिए उन्हें ए0 के0 राय उपर्युक्त लगे।
राजनैतिक दल के नामाकरण के विषय में विचार विमर्श किया जाने लगा। बिनोद बाबू तथा शिबू सोरेन चाहते थे कि नाम में “झारखंड” शब्द अवश्य रहे। झारखंड पृथक राज्य के लिए संघर्ष करना इस राजनैतिक पार्टी का उद्देश्य होगा, यही तय किया गया था, दोनों नेताओं के द्वारा। श्री राय चाहते थे कि इसमें वर्ग-संघर्ष की अवधारणा दिखाई दे। झारखंड नामधारी कई पार्टियाँ झारखंड में कार्यरत थी, अतः एक नया नाम ढूँढना मुश्किल लग रहा था। वहीं पर उस बैठक में बिनोद बाबू के बड़े पुत्र राज किशोर महतो भी उपस्थित थे। 1968 में ईंजीनियरिंग (माइनिंग) की डिग्री धनबाद के ही इंडियन स्कूल ऑफ माइन्स से हासिल किया था, और उन दिनों धनबाद के पास ही कोलियरी में कार्यरत थे। राजनैतिक गतिविधियों खासकर शिवाजी समाज के आन्दोलनों में भी प्रत्यक्ष रूप से हिस्सा लिया करते थे। नामकरण की चर्चा के दौरान उनके मन में एक विचार आया एवं एक नाम बिजली की तरह उनके दिमाग में कौंध गया। उन्होनें उस नाम का प्रस्ताव दे डाला। वह नाम था “झारखंड मुक्ति मोर्चा” ऐसे नाम के पिछे उन्हेनें जो तर्क दिया सभी को पसन्द आ गया। तीन व्यक्ति अपनी-अपनी विचार-धारा का समावेश चाहते थे, नये नाम में, अतः यह एक मोर्चा का ही रूप ले सकता था। दूसरे इसके नाम में झारखंड शब्द भी चाहते थे और झारखंड को शोषण मुक्त करना चाहते थे, सो यह नाम सबसे उचित प्रतीत हुआ। इसमें स्थानीय झारखंडी एवं वैसे लोग जो शोषण-मुक्ति की लड़ाई लड़ना चाहते थे सभी का समावेश इसमें झलकता था। इस झंड़े का रंग जाहिर है हरा ही होना था क्योंकि श्री राय ने उन्ही दिनों “मार्क्सवादी समन्वय” नामक राजनैतिक पार्टी का गठन कर लिया था और उसे अलग से चलाना चाहते थे। झारखंड मुक्ति मोर्चा को वे सिर्फ सहयोगी दल मानकर चलना चाहते थे। बिनोद बाबू के लड़के राज किशोर महतो ने इस मोर्चे का चुनाव चिन्ह “तीर-धनुष” रखवा दिया जो झारखंड का लोकप्रिय परम्परागत हथियार के साथ-साथ उसकी पहचान भी थी। इसका विधिवत् गठन चार फरवरी 1973 को किया गया एवं बिनोद बिहारी महतो इसके प्रथम अध्यक्ष बने तथा शिबू सोरेन महामंत्री। चार फरवरी को 1973 में ही धनबाद के प्रसिद्ध गोल्फ मैदान में इसका पहला स्थापना दिवस मनाया गया। और तब से प्रतिवर्ष मनाया जाता है।

Saturday, October 23, 2010

झारखण्ड मुक्ति मोर्चा का जन्म, उसकी पृष्ठभूमि एवं विचार-धारा

वास्तव में झारखंड अलग राज्य का आन्दोलन झारखंड के शोषित-पीड़ित, दबे-कुचले, वंचित जाति-समूहों के आत्म-निर्णय का आन्दोलन था, उनकी पहचान का आन्दोलन था, अतः उनकी मुक्ति का आन्दोलन था। उन्हें मार्क्स एवं लेनिन की उक्तियाँ याद आई। लेनिन ने भी तो कहा था कि शोषित-दलित राष्ट्रीयताओं को उनके स्वालंब का अधिकार मिलना चाहिए और वाम पंथियों का यह पहला कर्त्तव्य बनता है कि उन्हें यह अधिकार दिलाएँ।
उन्होने महसूस किया कि झारखंड आन्दोलन अब तक अनुसूचित जनजातियों के नेतृत्व में ही चलाया गया है और गैर अनुसूचित जातियों एव मजदूर वर्ग में लोक प्रिय नहीं हो पाया था। एक जुझारू संगठन बना कर उन्हें एक करने की आवश्यकता थी और एक वर्ग-संघर्ष की अवधारणा के साथ आगे बढ़ना होगा। झारखंड के सोये हुए लोगों को जागरूक करना पड़ेगा, उनके मन की निराशा को दूर करना पड़ेगा। ऐसा उन्होनें सोचा।
भारतवर्ष में वर्ग-संघर्ष की अवधारणा एवं वर्ण-संघर्ष की अवधारणा में कोई खास अंतर नहीं है। यह एक तथ्य है कि उन्नीस सौ साठ के दशक तक लोग इस बात को समझ चुके थे कि भारतवर्ष में उच्च-वर्ण ही उच्च वर्ग भी है। इन चंद लोगों के हाथ में सत्ता, सम्पत्ति केन्द्रित है। अतः निम्न वर्ग में पहले चेतना जगाना जरूरी था।
इसके लिए उन्होने सबसे पहले अपने ही समुदाय कुड़मी यानि कुरमी-महतो समुदाय के लोगों को एक सूत्र में बाँधने का सफल प्रयास किया। इसके लिए 1967 में “शिवाजी-समाज” का गठन किया। यह कोई राजनैतिक संगठन नहीं था। यह एक सामाजिक संगठन था। एक सुधारवादी संगठन जो कुड़मी समाज के सुधार के लिए बनाया गया था। इसके उद्देश्य, बाल-विवाह, बहू-विवाह, झारखंड में घूसती दहेज-प्रथा, शराब खोरी इत्यादि के विरूद्ध था। इस संगठन का उद्देश्य इस समुदाय को शोषण से मुक्ति दिलाना भी था और इससे बचाना भी।
बिहार-सरकार में इस जाति को पिछड़ी (अत्यन्त) के दर्जे में शामिल किया गया था। यद्यपि इनके पास खेती लायक जमीन थी, पर शिक्षा का नितांत अभाव था। इस अज्ञानता के चलते दूसरे होशियार लोग इनकी जमीनों की लूट-मार मचाये हुए थे। सरकारी अधिग्रहण में कल-कारखानों में, खदानों में, योजनाओं-परियोजनाओं में, बाँधों में कुड़मी-समुदाय के लोगों की सर्वाधिक भूमि अधिग्रहीत की गई। इसके अलावे खरीद-बिक्री भी खूब हुई। तीसरा उद्देश्य था समाजिक प्रतिष्ठा की खोज। उच्चवर्ण के लोग ही नहीं दूसरे भी इस समुदाय को “ढ़ोड़-कुड़मी” कहते थे। इसे हेय समझते थे। बेवकूफ एवं मूर्ख समझते थे जिन्हें आसानी से बहलाया-फुसलाया जा सकता है। शिवाजी समाज के माध्यम से बिनोद बिहारी महतो ने सामाजिक न्याय की लड़ाई को आगे बढ़ाया।
पर इस समाज के कार्यो के रास्ते में बहुत विघ्न-बाधाएँ आई। समाज के प्रतिष्ठित लोग ही इसका विरोध करने लगे। बड़ी मुश्किल से कुरीतियों को रोका जाने लगा। धीरे-धीरे अपनी जाति के लोग इसके समर्थक बने। शोषण से मुक्त होने की प्रक्रिया में इस-समुदाय ने, समाज के कार्यकर्त्ताओं ने जमीन-वापसी का आन्दोलन चलाया। सूदखोर-महाजनो के खिलाफ लोग उठ खड़े हुए तथा विस्थापन के विरूद्ध इस समाज द्वारा जोरदार आन्दोलन किए जाने लगे। शिवाजी समाज के कार्यकर्त्ता शराब-खोरी के विरूद्ध, शराब भट्टीयों को उजाड़ने लगे, तोड़-फोड़ किए गये। सामाजिक रूप से दोशी पाये जानेवाले व्यक्तियों के विरूद्ध कार्यवाही की जाती थी तथा सामाजिक दंड दिया जाता था। इसमें सामाजिक रूप से सार्वजनिक स्थल, गाँव के अन्दर उन्हें शारीरिक दंड, लाठी का प्रहार या कभी-कभी सिर मुंड़ाकर घूमना भी शामिल था। कुछ दिनों के लिए कभी-कभी हुक्का-पानी भी बंद कर दिया जाता था।
इस शिवाजी समाज का अनुकरण समाज के दूसरे-समुदाय के लोग भी करने लगे। संथाल जाति के लोगों ने बिनोद बिहारी महतो की प्रेरणा से “सोनोत् संथाल समाज” नामक संगठन खड़ा किया। शिबू-सोरेन उस समय नौजवान हुआ करते थे। अपने पिता की मृत्यु के बाद वे घर से भागकर यहाँ-वहाँ भटक रहे थे। उन दिनों शिवाजी समाज धनबाद, बोकारो, गिरीडिह, हजारीबाग एवं पश्चिम बंगाल के पुरूलिया जिला तक फैल चुका था। शिबू सोरेन बिनोद बाबू के सम्पर्क में 1971 में आए। उन्होने शिबू सोरेन के “सोनोत् संथाल समाज” का नेतृत्व संभालने के लिए आगे बढ़ाया। फिर यह संगठन भी उसी प्रकार सक्रिय हो उठा जिस प्रकार शिवाजी समाज सक्रिय था। खासकर शराब खोरी के खिलाफ आन्दोलन छेड़ा गया। फिर आदिवासी महिलाओं के विरूद्ध होने वाले शोषण, जुल्म तथा बलात्कार आदि के खिलाफ यह संगठन बखूबी काम करने लगा। इस आन्दोलन के चलते शिबू सोरेन एक सशक्त आदिवासी नेता के रूप में उभरकर सामने आए। शिबू सोरेन को बिनोद बाबू ने आर्थिक सहायता के साथ-साथ नैतिक समर्थन एवं संरक्षण दिया। शिबू सोरेन का नाम वास्तव में “शिवलाल माँझी” था और बाद में शिबू सोरेन बने। बिनोद बाबू के आवास में ही उनका डेरा-डंडा था।
इधर बिनोद बिहारी महतो ने देखा कि झारखंड क्षेत्र की जनता लाल झंड़े को स्वीकार करने में कठिनाई महसूस कर रही थी। मार्क्सवाद, लेलिनवाद की पेचीदगी को समझना झारखंड़ी जनता के वश में नहीं था। इनकी पेचिदा थ्योरी अनपढ़ भोले-भाले झारखंड़ियों, संथाल, महतो आदि समुदायों के लिए समझ पाना टेढ़ी खीर थी। लोग अन्याय के खिलाफ लड़ना तो चाहते थे, पर उनमें लाल झंड़ा स्वत-स्फूर्त जजबात पैदा नहीं कर पा रहा था।
शिवाजी समाज बनाने का उद्देश्य स्पष्ट था। कुछ लोग भ्रांति पैदा करने का काम भी करने लगे। कहने लगे थे कि बिनोद बाबू कुड़मी-महतो को क्षत्रिय बनाना चाहते हैं या फिर अपना मूल शिवाजी को मान रहे हैं यह बात लोगों को शायद पता नहीं कि झारखंड़ में जो व्यापक रूप से सरकारी शोषण एवं अन्य शोषक आतंक फेलाए हुए थे, उसका जवाब किस प्रकार दिया जाय। इतने बड़े अन्याय का मुकाबला उसी हालात में किया जा सकता था, जबकि यहाँ की बहुसंख्यक जाति कुड़मी-महतो को लड़ाकू बनाया जाता। उनके दिल से डर एवं आतंक को हटाया जाय। यह तभी संभव था जब उन्हें सीधी लड़ाई में उतारा जाय। शिवाजी दुनियाँ के मशहूर गुरिल्ला युद्ध के प्रणेता थे। अपने कम संख्या के सिपाहियों से औरंगजेब की बड़ी सेना का मुकाबला उन्होंने छापा-मार युद्ध की तकनीक विकसित करके ही किया था। इससे प्रेरित होकर ही अपने समाज का नाम शिवाजी समाज रखा। यह एक संयोग ही था कि शिवाजी भी कुनबी जाति के थे, जिस जाति को उस समय अछूत समझा जाता था। कोंकण इलाके का पहाड़ी जीवन, झारखंड़ क्षेत्र के पहाड़ी जीवन से काफी मिलता जुलता भी है। धनबाद, गिरीडिह, बोकारो, हजारीबाग ही नहीं बल्कि पश्चिम बंगाल आदि जगहों में यह समाज काफी सक्रिय हो उठा था। 1973 में बिनोद बिहारी महतो को सबसे चर्चित व्यक्ति माना जाने लगा था।
उन्हें आतंकवादी नेता कहा जाने लगा था। धन-कटवा नेता भी कहा जाता रहा था। शिवाजी समाज के बैनर में ज्यादे सशक्त लड़ाई शुरू हो गई थी। बीस-पच्चीस वर्षो में लाल झंड़े के माध्यम से बिनोद बाबू जो काम करने में अक्षम रहे थे, मात्र तीन-चार वर्षो के शिवाजी समाज के आन्दोलन ने कर दिखाया था। इसी प्रकार “सोनेत् संताल समाज” ने भी क्रांतिकारी काम मात्र दो-तीन वर्षो में कर डाला। इन दो संगठनों का व्यापक प्रभाव संथाल परगना एवं छोटानागपुर उत्तरी में पड़ा।

अध्याय- सात

झारखण्ड मुक्ति मोर्चा का जन्म, उसकी पृष्ठभूमि एवं विचार-धारा
उन्नीस सौ सत्तर तक के झारखण्ड की स्वात्तता आन्दोलन का नेतृत्व अनुसूचित जनजाचि के लोगों ने किया। गैर-अनुसूचित जनजाति इस प्रकार के आन्दोलन से बहुत ज्यादे नहीं जूड़ पाये थे। इसका कारण पृथकतावाद की नीति रही और आन्दोलन के शुरूआती दौर के नेताओं की अदूरदर्दिता। झारखणड आन्दोलन के शुरूआती दौर में नेतृत्व की बागडोर उन नेताओं के हाथ में रहा जो अनुसूचित जनजाति के साथ-साथ ईशाई थे। ईशाई मिशनरियों ने वैसे जनजातियों को शिक्षा-प्रदान की जो ईशाई बनने लगे थे एवं ये लोग उच्च शिक्षा भी प्राप्त करने लगे। अतः इनका आगे आना स्वाभाविक था। दूसरी जनजातियाँ जो ईशाई नहीं बने, वे इससे वंचित रहे। वस्तुतः झारखण्ड आन्दोलन को ईशाई-मिशनरियों द्वारा उठाया गया आन्दोलन भी कहा जाता रहा था। इन मिशनरियों एवं उपनिवशवादी अधिकारियों ने अनुसूचित जनजाति एवं अन्य को यानि “आदिवासी” एवं गैर-आदिवासी को इस क्षेत्र का मूल निवासी नहीं मानकर अलग-अलग माना। “आदिवासी-आन्दोलन” को “दिकुओ” के विरूद्ध भी चलाया गया। इस नीति का दुष्परिणाम स्वतंत्रता प्राप्ति के कई वर्षो बाद भी बना रहा। “दिकु” उन्हें कहा जाता था, जो आदिवासियों को “दिक्-दिक्” यानि तंग किया करता था। यह एक आम जुमला आदिवासियों के मुँह पर जढ़ गया था। कुछ राजनैतिक दलों द्वारा आदिवासी एवं गैर-आदिवासी के बीच दरार पैदा करने की कोशिश भी की गई। अतः अगर हम कहें कि 1970 तक झारखण्ड आन्दोलन का मुख्य स्वरूप जातीय रहा तो कोई अतिशोयुक्ति नहीं होगी।
1970 आते-आते जैसा कि हमने देखा झारखंड क्षेत्र के सामाजिक आर्थिक एवं राजनैतिक परिवेश में व्यापक बदलाव आ गया। झारखंडवासियों की पहचान ही मिटने का खतरा पैदा हो गया। न सिर्फ आदिवासी बल्कि गैर-आदिवासी का भी जीवन प्रभावित होने लगा, वह भी समान रूप से। औद्योगिकरण के चलते इन दो वर्गो की विशिष्टता यानि सांस्कृतिक विशिष्टता अस्पष्ट होने लगी और क्षेत्रीय समस्याओं के प्रति उनकी धारणाओं में समानता या निकटता आई। धीरे-धीरे “झारखंड आन्दोलन” जो सिर्फ आदिवासी आन्दोलन समझा जाता रहा था या फिर झारखंड शब्द आदिवासियों में प्रिय था, धीरे-धीरे अन्य लोगों को भी ग्राह्य होने लगा।
यहाँ जनजातिय समूहों में कुड़मी-महतो का विशेष आकर्षण इस झारखंड आन्दोलन के प्रति पनपा। एक तो जनजाति होने की वजह से ये स्वयं को तथा कथित आदिवासी समुदाय, खासकर संथाल समुदाय के बहुत नजदीक महसूस करता था। इसके कुछ ऐतिहासिक कारण भी हैं, जिसकी चर्चा हम कभी बाद में करेंगे। उत्तरी छोटानागपुर, पश्चिम बंगाल, संथाल परगना एवं सिंहभूम के कुछ इलाकों तथा समीपवर्ती उड़ीसा में भी संथालों एवं कुड़मी महतो जनजाति में काफी घनिष्ठता दिखाई पड़ती है। उसी प्रकार अन्य हिस्सों में कुड़मी मुंड़ा जनजाति के साथ-साथ रहता आया है।
जनजातीय एक रूपता के अलावे औद्योगिकरण के विस्तार ने समान रूप से प्रताड़ित गैर-आदिवासी भी क्षेत्रीयता के विचार से प्रभावित होने लगे थे।
झारखंड मुक्ति मोर्चा का उदय 1972-1973 में हुआ। इसका पहला अधिवेशन चार फरवरी 1973 को धनबाद जिला स्थित धनबाद गोल्फ मैदान जो धनबाद जिले के मुख्यालय के पास है, वहीं हुआ। इसे स्थापना दिवस के रूप में मनाया गया।
झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रणेता तथा संस्थापक एवं प्रथम अध्यक्ष श्री बिनोद बिहारी महतो हुए। बिनोद बिहारी महतो पेशे से वकील थे तथा कुड़मी-महतो समुदाय से आते थे। इनका जन्म सरकारी दस्तावेजों तथा स्कूली सर्टीफिकेटों में तेईस सितम्बर उन्नीस सौ तेईस दर्ज है। वैसे यह उनकी सही जन्म तिथि नहीं। कोई-कोई कहते हैं कि यह वर्ष 1921 था। इनका जन्म ग्राम बड़ादाहा, प्रखण्ड बलियापुर, जिला धनबाद, तत्कालिन प्रदेश बिहार में हुआ। इनके पिता का नाम माहिन्दी महतो ऊर्फ महेन्द्रनाथ महतो एवं माता का नाम मन्दाकिनी देवी था। इनकी पत्नी पास के ही गाँव बंदरचुँआ की थी। एवं उनका नाम फूलमनी देवी था।
इनका जन्म एक साधारण किसान परिवार में हुआ। पढ़ने लिखने की कोई परम्परा इनके गाँव में नहीं थी, न ही कोई विद्यालय था। इनके गाँव में ज्यादातर लोग कुड़मी, कुछ रजवार, एक दो घर डोम, मोची तथा एक परिवार लोहार तथा पास में एक छोटा टोला संथालों का भी था। सभी लोग खेती-बाड़ी कर लेते थे। माहिन्दी महतो अनपढ़ थे और अपने बच्चों को पढ़ाना-लिखाना उनके बस के बाहर था। बिनोद बिहारी महतो के एक छोटे भाई थे तथा तीन छोटी बहनें थी।
बिनोद बिहारी महतो के मन में पढ़ने-लिखने की अद्भूत ललक थी। इन्होनें बड़ी कठिनाई से प्राइमरी शिक्षा बलियापुर से, हाई स्कूल की शिक्षा धनबाद एच0 ई0 स्कूल से पूरी की। इन्होनें 1941 में मैट्रीक परीक्षा पास की। इसके बाद कई छोटे-छोटे काम किए। शिक्षक का काम भी किया। टाइप-राइटर में टंकन का भी काम किया। अंतत इन्हें धनबाद समहरालय में किरानी की सरकारी नौकरी मिली। फिर नौकरी छोड़ी। पी0 के0 राय कॉलेज कतरास से इन्टर की परीक्षा पास की तथा राँची कॉलेज राँची से स्नातक की डिग्री आर्टस विषय में ली। 1955 में पटना लॉ कॉलेज से कानून की डिग्री हासिल की। 1956 से जिला कोर्ट धनबाद में अपनी वकालत शुरू किया।
राजनिति में इनकी रूची छात्र-जीवन से ही रही। 1952 के पहले आम-चुनाव में ये बिहार विधान सभा के लिए खड़े हुए। फिर भारतीय कम्यूनिष्ट पार्टी का विभाजन हुआ तो मार्क्सवादी कम्यूनिष्ट पार्टी में चले आए। 1971 में ये धनबाद लोक-सभा सीट से सी0 पी0 एम0 के टिकट से चुनाव लड़े एवं द्वितीय स्थान पर रहे थे। स्थानीय निकायों जैसे धनबाद म्युनिसिपैल्टी बलियापुर प्रखण्ड, धनबाद जिला परिषद् आदि के लिए भी 1971 तक चुनाव लड़े एवं सदस्य तथा पदाधिकारी बने।
अपने जीवन में पच्चीस वर्षो तक वामपंथियों के साथ रहने के बाद और धनबाद लोक सभा में द्वितीय स्थान प्राप्त करने के बाद भी तथा अनेक प्रकार के नक्सली संगठनों से समंबन्ध रखने के बाद भी बिनोद बिहारी महतो ने झारखंड नामधारी पार्टी का गठन क्यों किया, यह एक विचारनीय विषय है।
मार्क्सवादी कम्यूनिष्ट पार्टी को छोड़ने का निर्णय उन्होनें कोई एक दिन में नहीं ले लिया था। वर्षो के अन्तराल के बाद उन्होनें पाया कि भारतवर्ष में वमपंथी वर्ग-संघर्ष सिर्फ एक नारा बनकर रह गया है। मार्क्सवादी लाल झंडा समाज के उच्च-वर्ण, उच्च-वर्ग, शोषक-शासक वर्ग के हाथों में खेल रहा है। परजीवी-उनुत्पादक वर्ग ही समाज के उत्पदक वर्ग पर राज कर रहा है। उनकी नजर झारखंड के उत्पादक वर्ग, आदिवासी, मूलवासी, सदान, हरिजन, पिछड़ो एवं मजदूर-वर्ग की ओर घूम गई एवं एक नये दृष्टिकोण से उन्होने सोचा।
उन्होने झारखंड क्षेत्र को लक्ष्य करके अंतरराष्ट्रीय वामपंथी अवधारणा को छोड़ा और सोचा कि अगर झारखंड के लोगों के साथ न्याय नहीं हुआ, शोषण चलता रहा और वे न्याय नहीं दिला सके, तो पूरे विश्व की गांरटी कौन लेगा। उन्होने अपने झारखंड के इतिहास, भूगोल पर नजर डाली, तो उन्हें बड़ा सदमा पहुँचा।