Thursday, March 17, 2011

अध्याय – दश

झारखंड आन्दोलन एवं अन्य दलों की गतिविधि 1991 से पहले
वास्तव में झारखंड आन्दोलोन को झारखंड नामधारी पर्टियों ने ही जन्म दिया तथा उसे आगे बढ़ाया। अन्य राजनैतिक दलों जिसमें वामपंथी भी थे, उनकी भूमिका झारखंड आन्दोलन को आगे बढ़ाने में नगण्य रही। जब-जब झारखंड आन्दोलन आगे बढ़ाता कोई-कोई इक्का-दुक्का नेता इसपर कभी कोई ब्यान दे देता। ज्यादेतर पार्टियाँ एवं वामपंथी नेता अपनी अंतर्राष्ट्रीय अवधारणा के कारण इस इलाके को पृथक राज्य के रूप में अलग होने देना नहीं चाहते थे। भीतर ही भीतर इस आन्दोलन को कमजोर करने की साजिश रचते।
पर एक समय ऐसा भी आया जब वामपंथी पार्टियों ने सीधा विरोध खुले आम किया। पश्चिम-बंगाल में झामुमो एवं झारखंड पार्टी के द्वारा अलग राज्य की सभाओं में वामपंथी द्वारा हमले किए गये। हत्याएँ की गई। कई प्रमुख झारखंड नामधारी दलों के प्रमुख कार्यकर्त्ताओं की हत्याएँ तक की गई। उन क्षेत्रों में पश्चिम बंगाल सरकार ने ऐसा आतंक का माहौल बनाया ताकि लोग झारखंड अलग राज्य की बात तक न करें। कोई मीटिंग, सभा न कर सकें। झूठे मामलों में लादकर यातनाएँ दी गई।
काँग्रेस पार्टी के रवैये को तो सभी जानते हैं। इस पार्टी ने सीधे-सीधे इस आन्दोलन को दबाने या कुचलने या बरगलाने का काम किया।
जनसंघ पार्टी झारखंड क्षेत्र में भी सक्रिय हो रही थी। जनसंघ ने हमेशा ही एक पृथक वनांचल राज्य का समर्थन किया। झारखंड की जगह वे वंनाचल पृथक राज्य का समर्थन करते रहे थे। 1980 में जब जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी बनी, तो इस पार्टी ने भी वंनाचल राज्य का समर्थन किया। जनसंघ या भारतीय जनता पार्टी सैद्धान्तिक रूप से कभी भी झारखंड आन्दोलन के विरोध में नहीं रही। 1991 के लोक सभा चुनाव के आते-आते दक्षिण बिहार के झारखंड क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी एक सशक्त पार्टी के रूप में ऊभर कर आ चुकी थी। 1991 के लोक सभा चुनाव में इसने धनबाद (प्रो0 रीता वर्मा), राँची (रामटहल चौधरी) , गुमला (ललित उराँव) सीटें जीत ली थी। बाकी में हजारीबाग (भुवनेश्वर मेहता - सी0 पी0 आई0) पलामू, गढ़वा, कोडरमा से जनता दल तथा अन्य छः गिरीडिह, दुमका, राजमहल, पश्चिमी सिंहभूम, पूर्वी सिंहभूम (जमशेदपुर), गोड्डा सीटें झमुमो ने जीत ली थी।
भारतीय जनता पार्टी बाद में सशक्त पार्टी के रूप में उभर कर सामने आई। जनता पार्टी ने पहले तो छोटे राज्यों की वकालत की, पर बाद में वे भी इसके विरोध में हो गये।
1990 बिहार विधान सभा तथा 1991 लोक सभा के चुनाव तक झमुमो ने मात्र अपने अठारह वर्ष के सफर में इस क्षेत्र के एक सशक्त पार्टी के रूप में पहचान बना ली थी। इकासी में से उन्नीस सीटें विधान सभा में अकेले झामुमो की थी। अन्य कई झारखंड नामधारी दलों के भी विधायक विधान सभा में पहुँचे थे।
ऐसा लगने लगा था कि अब झारखंड आन्दोलन अपने मुकाम तक पहुँच जायेगा। झारखंड नामधारी दलों, वामपंथीयों, जनतादल ने मिलकर संयुक्त मोर्चा काँग्रेस के खिलाफ बनाया था।
मार्च 1990 में जनता दल के श्री लालू प्रसाद को इस संयुक्त मोर्चे ने बिहार का मुख्यमंत्री बना दिया था। इसमें बिनोद बिहारी महतो – संस्थापक अध्यक्ष झामुमो की बहुत बड़ी भूमिका रही थी। अपने उन्नीस विधायको के साथ-साथ वामपंथियों तथा अन्य झारखंड नामधारी दलों का समर्थन भी उन्होंने जुटाया था और काँग्रेस को बिहार से हटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अतः लालू प्रसाद को वे विशेष सुझाव देते रहते थे।

Sunday, March 6, 2011

“झारखंड़ मामलों से संबंधित समिति” की रिपोर्ट

समिति ने फिर उसी नजरिये को अपनाया था। झारखंड़ आन्दोलन झारखंड़ क्षेत्र में कितना सशक्त है ? इस पर सवाल खड़े किए गये। यह आन्दोलन कितना लोकप्रिय है, इसकी विवेचना किया जाने लगा। इस बात को भूला दिया गया, इस तथ्य को अनदेखा कर दिया गया कि देश में आजादी के बाद कई नये राज्यों का गठन किया गया, जिसके लिए झारखंड़ के समान कोई आन्दोलन नहीं किए गये। भाषा या भाषाई समानता, लिंगविस्टीक होमोजिनियोल्टी के आधार पर नये राज्यों का निर्माण किया गया। सांस्कृति आधार पर बिना आन्दोलन के पंजाब से हरियाणा बना। कर्नाटक बना। महाराष्ट्र से गुजरात बना। आंध्रप्रदेश बना। तो फिर इस समिति ने झारखंड़ को अलग पहचान के आधार पर अलग राज्य बनाने का सुझाव क्यों नहीं दिया, जब इसी समिति ने ऐसा ही पाया था।
समिति ने दो राज्यों पश्चिम बंगाल तथा उड़ीसा का कोई दौरा नहीं किया। इसीलिए समिति ने इन राज्यों में आन्दोलन की लोकप्रियता पर कोई टिप्पणी ही नहीं की। कोई मूल्याकंन ही नहीं किया गया। मध्यप्रदेश के विषय में समिति ने यह कह दिया कि वहाँ आन्दोलन का प्रभाव कम था। इस बात को नजर अंदाज कर दिया गया कि पुनः दौरा किया जाए, उन क्षेत्रों का जिसका दौरा समिति नहीं कर पाई थी।
समिति ने इस बात को नजर अंदाज कर दिया कि गरीब अशिक्षित भोले-भाले झारखंड़ के आदिवासी एवं मूलवासी समूह अपने ऊपर हो रहे अत्याचार, शोषण दमन के विरूद्ध आवाज उठाने से डरते थे। उन्हें बाहरी शोषण कर्त्ताओं ने, पुलिस एवं प्रशासन ने इतना आतंकित कर रखा था कि वे गूँगें एवं बहरे हो गये थे। जब-जब कोई साहस करके आगे बढ़ता तो उसके आन्दोलन को निर्ममता पूर्वक कुचल दिया जाता। ऐसा इतिहास में प्रमाणित है। ऐसी परिस्थिति में आन्दोलन की लोकप्रियता की बात करना ही बेमानी था। ऐसी सोच को पूर्वाग्रह से ग्रसित ही माना जा सकता है।
अध्याय छः पारा-22 में इस रिपोर्ट ने इसके बाद कह दिया कि “झारखंड़ पृथक राज्य” के सृजन में चार राज्यों बिहाऱ बंगाल, उड़ीसा और मध्यप्रदेश को तोड़ने और इन टुकड़ो से झारखंड़ नामक एक नई इकाई का गठन करने का कार्य अन्तग्रस्त है। प्रजातांत्रिक प्रणाली में ऐसा संबंधित पार्टियों के सहमति से ही किया जा सकता है। ये पार्टयाँ विधिवत रूप से गठित चार राज्यों की सरकारें है।
इस समिति ने अलग राज्य के बनाने के मार्ग में आनेवाली बाधा का जिक्र कर दिया। चार राज्यों की सरकारें अगर विरोध करेंगी तो झारखंड़ पृथक राज्य नहीं बन सकता।
समिति ने इस बात को भूला दिया कि संविधान की धारा 2,3 एवं 4 में यह स्पष्ट है कि राज्य सरकार की सहमति के बिना भी केन्द्र सरकार अलग राज्य का गठन उसके किसी हिस्से को अलग करके बना सकती है। फिर किसी राज्य सरकार के विरोध से झारखंड़ के मामले में केन्द्र सरकार डरेगी क्यों ? समिति को किस कारण भय पैदा हुआ ?
बिहार के झारखंड़ के हिस्से के बारे में तो समिति का सुझाव बिलकुल ही तथ्यों से परे एवं तर्कहीन था। समिति ने यह स्पष्ट कर दिया था कि सभी राजनैतिक दल एक पृथक राज्य बनाने अथवा स्वायत्तता प्रदान करने के पक्ष में है। पर समिति ने एक अजिब सा तर्क दिया कि देश के वर्त्तमान राजनैतिक परिस्थिति की मजबूरियों और माँगों को ध्यान में रखते हुए इस बारे में निर्णय लेना पड़ेगा। समिति ने आशंका जाहिर कर दिया कि “विघटनकारी बलों को छूट प्राप्त है। अलगाववादी और विघटनकारी बल देश की एकता और अखंड़ता के लिए खतरा उत्पन्न करने के लिए सभी कार्य कर रहे है। हमने राज्यों के पुर्नगठन के लिए दो बार बैठकें की जिनमें एक 1980 के मध्य में भाषा के आधार पर तथा दूसरी 1960 और 1970 के दशकों के प्रारम्भ में उत्तर पूर्व में जातीय आधार पर। यह सिलसिला अभी जारी है। झारखंड़ राज्य बनाने पर समकालीन राष्ट्रीय स्थिति को देखते हुए ध्यान पूर्वक विचार किया जाना चाहिए।“
इस प्रकार इस समिति ने तथ्यों के विरूद्ध झारखंड़ अलग राज्य बनाने को खतरनाक कहा। इसे विघटनकारी एवं देश की एकता एवं अखंड़ता के लिए खतरा कहा। ऐसी आशंका जताई गई जिसका 1990 में कहीं नामो निशान नहीं था।
समिति ने यह आशंका जाहिर किया कि मात्र राज्य या संघ शासित क्षेत्र का दर्जा दिए जाने से सभी समस्याएँ हल नहीं हो सकती है। अलग राज्य माँगा जा रहा था, जिसके समर्थन में सभी तथ्य थे, पर समिति ने एक परिषद् बनाने की या एक ऐसे माडल बनाने की सिफारिश कर दी ताकि इन क्षेत्रों की सांस्कृति रक्षा हो सके, यहाँ की भाषा की उन्नति हो सके, आदिवासी जनसंख्या की सुरक्षा के उपायों को और मजबूत बनाया जा सके। बड़े आश्चर्य की बात है कि हर बार नये प्रयोग करने की सोची जाती रही, पर जो स्थापित उपाय थे, उन्हें नहीं आजमाया गया। अलग राज्य से ज्यादे कारगार क्या कोई दूसरा मॉडल बन सकता था, कदापि नहीं।
पर जाने-अनजाने इस समिति को एक महत्वपूर्ण बात का जिक्र करना ही पड़ा जो झारखंड़ के लिए बाद में सहायक सिद्ध हुआ। समिति ने अपनी रिपोर्ट के अध्याय छः पारा दश में “निष्कर्ष” शीर्षक के अन्तर्गत कहा है कि झारखंड़ क्षेत्र की जन सांख्यिकीय परिपेक्ष में अनुसूचित जनजाति के उन समुदायों को पहली प्राथमिकता दी जाय। कुछ समय पहले बिहार के कुछ जिलों में अधिकांश जनसंख्या अनुसूचित जनजातियों से संबंधित थी जिन्होंने अपने क्षेत्र को झारखंड़ राज्य के एक भाग के रूप में रखने की माँग की। 1981 की जनगणना के अनुसार इनकी जनसंख्या 30.26 प्रतिशत बैठती है। इसके अतिरिक्त ऐसा भी बहुत जनसमुदाय है जिसका आदिवासियों के साथ घनिष्ठ संबंध है तथा जिन्हें 1981 में आदिवासियों की सूची से अलग रखा गया था, ये समुदाय कुर्मी महतो के नाम से जाना जाता है। एक बड़े सदन की जनसंख्या में इनका महत्वपूर्ण हिस्सा है तथा बाद के समय में इनके द्वारा किए गये उत्प्रवास की तुलना में उनके मूलवंश की पहचान बनाए रखने के आधार पर इन्हें मूलवासी, सदावासी अनादिवासी आदि नामक कई अन्य नामों से भी जाना जाता है। कुल जनसंख्या में इस वर्ग का कथित रूप से 50 प्रतिशत हिस्सा है।“
इसी प्रकार अध्याय तीन में पारा 25 में कहा गया है कि “झारखंड़ आन्दोलन शुरू से ही एक झारखंड़ राज्य बनाने के लिए चलाया गया जिसे बिहार के छोटानागपुर और संथाल परगना जिलों तथा मध्यप्रदेश, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल के समीपवर्त्ती जिलों में से बनाया जाना था। इन क्षेत्रों की या इनके अधिकांश हिस्सों में आदिवासी (संथाल, मुंड़ा, हो, उराँव) और गैर-सरकारी आदिवासी (कुर्मी महतो इत्यादि) समुदायों की काफी आबादी है जो जातीयता, ऐतिहासिक, सांस्कृति रूप से छोटानागपुर के पैतृक समुहों से संबंध है। झारखंड़ आन्दोलन इन समीपवर्त्ती क्षेत्रों में इन समुदायों के मध्य फैला हुआ है।”
आदिवासी शब्द का अर्थ इस रिपोर्ट में अनुसूचित जनजातियों से लगाया गया है। कुर्मी महतो इत्यादि कई अन्य जातियों को गैर-सरकारी आदिवासी कहा गया है। गैर-सरकारी आदिवासी का क्या अर्थ हो सकता है ? यही न कि वैसी जनजातियाँ जो वर्त्तमान में अनुसूचित नहीं है।
समिति द्वारा इस तथ्य को स्वीकार करने के बाद कि झारखंड़ आन्दोलन सरकारी एवं गैर-सरकारी आदिवासियों का रहा है तथा जिनकी संख्या झारखंड़ में बहुतायात में, बहुमत में है, जिनकी अपनी समान सभ्यता संस्कृति पहचान है, झारखंड़ अलग राज्य बनाने के लिए समिति द्वारा सुझाव नहीं देना, बौद्धिक बेईमानी ही कही जायेगी।

“झारखंड़ मामलों से संबंधित समिति” की रिपोर्ट

इस रिपोर्ट में जो सबसे महत्वपूर्ण बात सामने रखी, वह यह है कि जिन कारणों से राज्य पुर्नगठन आयोग ने झारखण्ड़ अलग राज्य की माँग को ठुकरा दिया था, उन कारणों को इस समिति की रिपोर्ट ने गलत ठहरा दिया।
इस समिति ने जो दूसरी महत्वपूर्ण बात कही, वह यह कि अब तक के जितने उपाय संविधान की पाँचवी सूची के अन्तर्गत इस क्षेत्र के विकास के लिए किए गये थे, वे सभी उपाय नाकामयाब साबित हुए थे। इस रिपोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि अब तक सारे प्रयास इस क्षेत्र को पाँचवीं सूची के अन्दर शामिल मानकर किए गये थे।
इस रिपोर्ट ने अपने अध्याय-तीन पारा चौबिस में यह स्पष्ट कर दिया कि “झारखण्ड़ आन्दोलन के इतिहास में जो उल्लेखनीय बात हुई है, वह आदिवासी और गैर-आदिवासी आबादी का एक जूट होना है। इस आन्दोलन में मुंड़ा, संथाल, हो और उराँव जैसे बड़े-बड़े आदिवासी समूहों और कुर्मी जैसे गैर-आदिवासी समुहों और अन्य जातियों का दबदबा है परन्तु अन्य जातियाँ भी इसमें शामिल हुई है। छोटे-छोटे आदिवासी ग्रुपों के सम्बन्ध में सूचना कम है। इस तरह झारखंड़ आन्दोलन का सामाजिक आधार पिछले बीस वर्षों में काफी फैला है।”
इस रिपोर्ट ने यह बात कह कर यह स्पष्ट कर दिया था कि 1970 से इस आन्दोलन का सामाजिक आयाम बढ़ा था। रिपोर्ट 1990 में लिखी जा रही थी और सामाजिक आयाम के बढ़ने की बात पिछले 20 वर्षों से की गई थी। इसका मतलब ही यही था कि झारखंड़ मुक्ति मोर्चा के गठन के बाद से ही आदिवासी तथा गैर-आदिवासियों का संयुक्त आन्दोलन चला। 1990 तक निश्चय ही इस आन्दोलन को मात्र आदिवासियों का आन्दोलन बतलाया गया था। इसे अब अल्पमत का नहीं कहा जा सकता था। बिनोद बिहारी महतो के झामुमो के संस्थापक- अध्यक्ष होने के साथ ही स्थिति में बदलाव शुरू हो गया था, क्योंकि उनके साथ अन्य गैर-आदिवासी समूह भी शामिल हुए जिसमें कोयलांचल के मजदूर भी थे।
इस समिति ने यह भी स्पष्ट कर दिया था कि “पिछले चालीस वर्षो से झारखंड़ क्षेत्र की एक अलग पहचान भाषा, सांस्कृतिक धारा, भौतिक विकास की एक स्पष्ट अवधारणा रही है।” इस रिपोर्ट ने स्वीकार किया कि “उपनिवेशकालीन समय में इस प्रदेश का तीन अथवा चार राज्यों में विभाजन हो गया। राजनैतिक तथा प्रशासनिक राज्यों में यह विभाजन बना हुआ है, लेकिन प्रशासनिक सीमाओं के आर-पार लोगों में परस्पर सांस्कृतिक आदान-प्रदान रूका नहीं है, वास्तव में यह विकसित हुआ है।”
झारखंड़ मामलों से संबंधित समिति ने मई 1990 में यह स्पष्ट सुझाव दे दिया कि “इसिलिए हमें इस क्षेत्र को स्पष्ट सांस्कृतिक पहचानवाले क्षेत्र के रूप में मान लेना चाहिए जिसका विकास लोगों के सम्पूर्ण विकास के एक भाग के रूप में किया जाना चाहिए।”
चूँकि इसी रिपोर्ट ने यह साबित कर दिया था कि अब तक के विकास के लिए अपनाए गये उपाय जो संविधान की पाँचवी सूची के तहत अपनाए गये थे, इस क्षेत्र के विकास में कामगार सिद्ध नहीं हुए थे, कुछ अन्य उपाय करने चाहिए। यानि इस समिति की रिपोर्ट ने यह इंगित कर दिया था कि जितने प्रकार के परिषद् या बोर्ड बनाए गये थे, सभी विफल साबित हुए थे।
पर, इस क्षेत्र का विकास कैसे हो, इस अहम् सवाल का जबाव भी इसी रिपोर्ट ने दे दिया था। अपने अध्याय छः “निष्कर्ष” शीर्षक के अन्तर्गत पारा ग्यारह में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि “झारखंड़ जनसमुदाय के पहले दो वर्गो अर्थात आदिवासी समूह और मूल गैर-आदिवसी समूह का भविष्य एक दूसरे से जुड़ा रहा। इन दोनों समूहों की संस्कृति और इतिहास एक समान है। .................. परिणाम यह है कि आज दो वर्गो ने एक समान उद्देश्य रखा है यह जब एक जातीय वर्ग का दूसरी जाति या एक धार्मिक समुदाय का दूसरे का प्रश्न नहीं है। बाहरी शोषणकर्त्ताओं के विरूद्ध मन की भावना से इन दो वर्गो को एक अलग झारखंड़ राज्य के लिए एकीकृत किया है। आशा है कि वर्त्तमान सामाजिक आर्थिक लक्ष्य को लेकर एक धर्मनिरपेक्ष झारखंड़ राज्य का परिणाम हो। यदि ऐसा होता हे तो उन सभी लोगों को प्रसन्नता होगी जो संविधान की प्रस्तावना की भावना का मूल्य समझते है।”
इस समिति की रिपोर्ट के उपर वर्णित तथ्यों को दखने के बाद इस बात पर कोई संदेह ही नहीं रह जाना चाहिए कि झारखंड़ क्षेत्र का मतलब दक्षिण बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा एवं मध्यप्रदेश के समीपवर्ती इलाके हैं जिनकी समान सभ्यता-संस्कृति है। इसकी एक अलग पहचान भी है। अब इस बात पर संदेश नहीं होना चहिए कि इस क्षेत्र को ही अलग राज्य का दर्जा मिल जाना चाहिए।
पर, बड़ी हैरत की बात है कि झारखंड़ अलग राज्य के संबंध में हमेशा ही बौधिक बेईमानी की जाती रही है। राज्य पुर्नगठन आयोग ने अगर 1955-56 में सही तथ्यों को लिखा होता तो निश्चय ही झारखण्ड़ अलग राज्य बनाने की अनुशंसा की गई होती और अन्य राज्यों के साथ-साथ इसके गठन की प्रक्रिया भी शुरू कर दी जाती। वहाँ उस समय भी बौधिक बेईमानी की गई। इसे सिर्फ आदिवासियों का आन्दोलन करार दिया गया। अन्य कारण जो अलग राज्य नहीं बनाने के लिए दर्शाये गये थे, वे भी भ्रामक एवं तथ्यों से परे थे। इस बार तो गजब ही किया गया। समिति की रिपोर्ट में सही तथ्यों को तो रखा गया एवं निष्कर्ष भी सही निकाले गये पर जो सुझाव दिए गये इस क्षेत्र के लिए वह सर्वथा गलत रहे। यहाँ भी अन्य प्रकार की बौधिक बेईमानी की गई।
राज्य पुर्नगठन आयोग के दिनों में सबसे सशक्त पार्टी झारखंड़ी पार्टी के प्रमुख नेता श्री जयपाल सिंह ने अलग राज्य बनाने के लिए आयोग पर कोई दबाव नहीं दिया। उदासीन रहे। हो सकता है, इसी कारण आयोग को बौधिक बेइमानी करने का मौका मिल गया।
इस बार भी कहीं न कहीं किसी के कारण उलटे सुझाव दे दिये गये। झामुमो के तत्कालीन अध्यक्ष शिबू सोरेन ने समिति पर ऐसा कोई दबाव नहीं दिया। बल्कि कालान्तर में पता चला कि वे ही एक प्रकार के परिषद् के समर्थक बन गये थे।
इस बात का उल्लेख करना यहाँ जरूरी हो गया है कि 1978 में ही बिहार विधान सभा द्वारा “झारखंड़ विकास परिषद् 1978” का गठन किया गया था। इसका भी जिक्र करना आवश्यक है कि ठीक राज्य पुर्नगठन आयोग के गठन के पूर्व 1951 में, बिहार जनजातीय सलाहकार परिषद् बनाया गया था। फिर 1971 में छोटानागपुर संथाल परगना स्वायत्त विकास प्राधिकरण बनाया गया था। इधर झारखंड़ विषयक समिति अपना दौरा कर रही थी। रिपोर्ट तैयार कर रही थी, तो दूसरी तरफ बिहार सरकार इसे भ्रमित करने के लिए झारखंड़ क्षेत्र विकास परिषद् 1991 के विधेयक का निर्माण कर उसे पारित कराने में लगी थी। इस विधेयक द्वारा पूर्व के छोटानागपुर संथाल परगना स्वशासी विकास प्राधिकरण 1971 एवं उसके बाद के संशोधनों को निरस्त कर दिया गया था और 1/8/1991 को 1991 एवं उसके बाद के संशोधनों को निरस्त कर दिया गया। मई 1990 के झारखंड़ मामलों से संबंधित समिति की रिपोर्ट मई 1990 उसी प्रकार ठढ़े बस्ते में पड़ी रही।