Sunday, April 25, 2010

मैदानी “जनजातीय क्षेत्रों” का सवाल

मैदानी “जनजातीय क्षेत्रों” का सवाल – केबिनेट मिशन के 16 मई 1946 के विवरण से उत्पन्न होकर संविधान सभा गठित की जानेवाली मौलिक अधिकारों तथा अल्प संख्यकों संबंधी सलाहकार समिति ने तीन उप समितियों का गठन किया जिनके लक्ष्य निम्नलिखित थें –
. असम के जनजातीय और वहिष्कृत तथा आंशिक रूप से वहिष्कृत क्षेत्रों पर विचार
करना ।
. उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रदेश और बलूचिश्तान में जनजातीय क्षेत्रों पर विचार करना ।
. असम से उत्तर प्रदेशों में वहिष्कृत तथा आंशिक रूप से वहिष्कृत क्षेत्रों की स्थिति पर
विचार करना ।
समिति ने निम्नलिखित दो महत्वपूर्ण प्रेक्षण दिए –
1. पहाड़ी जनजातियों का विभाजन ऐसे जनजातीय आबादी वाले या जनजातियों के समरूपी ग्रुपों की आबादी वाले काफी बड़े जिलों के रूप में किया गया है जिनके संगठन काफी लोकतांत्रिक तथा परस्पर विशिष्ट है और इनमें मैदानी सभ्यता के अवशेष बिलकुल नहीं है जो इनके समानरूपी क्षेत्रों में काम आते हैं ।
2. अन्य प्रदेशों में मैदानी जनजातीय आबादी ने मैदानी लोगों क जनजीवन का पर्याप्त रूप से आत्मघात कर दिया है और बहुत से स्थानों में जनजातीय संगठन खंड़ित हो गये है ।
दो समितियों की रिपोर्ट को लेकर असम के पहाड़ी क्षेत्रों के लिए छठी अनुसूची
बनी और मैदानी जनजातियों के लिए संविधान में पाँचवीं अनुसूची को जोड़ा गया था जिसमें उस समय केवल उन राज्यों को शामिल किया गया है जिनको छठी अनुसूची में नहीं रखा जा सका है । राष्ट्रपति द्वारा एक विशेष अधिकारी की नियुक्ति किए जाने के लिए भी एक उपबंध किया गया था जिसका कार्य सभी मामलों की जाँच करना और राष्ट्रपति को रिपोर्ट प्रस्तुत करना था ।
पाँचवीं अनुसूची में मैदानी जनजातीयों के क्षेत्रों को रखा गया । पाँजवीं अनुसूची में अनुसूचित क्षेत्रों के रूप मे जाने जाने वाले क्षेत्रो की घोषणा राष्ट्रपति द्वारा की जा सकती है । राज्य की कार्यपालिका शक्ति अनुसूचित क्षेत्रों पर लागू होती है । लेकिन राज्यपाल को कुछ उत्तरदायित्व सौंपा गया है । इन क्षेत्रों के प्रशासन के बारे में उसे राष्ट्रपति को प्रत्येक वर्ष या जब अपेक्षित हो, रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होती है । संघ की कार्यपालिका की शक्ति इन क्षेत्रों में राज्यों के प्रशासन के बारे में निर्देश करने के लिए प्रयोक्तव्य है । इस अनुसूची में एक जनजातीय सलाहकार परिषद् की परिकल्पना की गई है जिसका कार्य राज्यपाल द्वारा उन्हें भेजे गये उन मामलों पर सलाह देना है जिसका संबंध अनुसूचित जनजातियों के कल्याण तथा उन्नति से हो। राज्यपाल को इनके बारे में कायदे-कानून बनाने की शक्ति प्राप्त है। अनुलाचित क्षेत्रो मे शांति और उनके अच्छे प्रशासन चलाना-भूमि के हस्तांतरण को निषिद्ध या प्रतिबंधित करना, जनजातियों को भूमि के आवंटन को विनियमित करना, साहूकारी के कारोबार को नियंत्रण करना । राज्यपाल को संसद के या विधान मंड़ल के किसी अधिनियम को प्रयोजनीयता के सीमित या आशोघित करने की शक्ति प्राप्त है राज्यपाल के विनियमनों को कानून को शक्ति प्रदान करने के लिए अनिवार्य रुप से प्राप्त होनी चाहिए ओर उसे ऐसा कोई कानून बनाने के पहले जनजाति सलाहकार परिषद् यदि कोई हो, से परामर्श कर लेना चाहिए। संविधान शंसोधन 1976 के द्वारा राष्ट्रपति को राज्पाल के परामर्श से किसी राज्य में किसी अनुसूचित क्षेत्र को बढ़ाने की शक्ति प्राप्त है।
इस प्रकार ब्रिटिश समय के बाद से आदिवासी क्षेत्रों में प्रशासन का विकास लम्बे समय से चल रहा है । ब्रिटिश सरकार करों, राजस्व तथा सेवाओं की वसुली के साथ संतुष्ट थी। जब कभी तथा जहाँ कहीं शांति को खतरा होता था, तो उन्होने सैनिक हस्तक्षेप किया और अपना प्रशासन स्थापित किया। उनकी नीति का सार सरल और सस्ता प्रशासन और सीमाशुल्क, वसूल करना था। रीति-रीवाज, रहन-सहन, आस्था के प्रबंधन में कम से कम हस्तक्षेप करना उनका उद्देश्य था। उन्होने गैर-आदिवासियों द्वारा जन-जातियों के शोषण को रोकने के लिए कुछ उपाय किए।
परन्तु जनजातिय क्षेत्रों के आर्थिक विकास में ब्रिटिश-सरकार का योगदान नगण्य था। लगभग दो सौ वर्षो तक अँग्रेजों ने पिछड़ा क्षेत्र, अनुसूचित क्षेत्र और आर्थिक रूप से वर्जित क्षेत्र आदि अवधारणाएँ जो उन्हीं की बनाई हुई थी और जिनका उद्देश्य भारतवर्ष में में सुचारू रूप से शासन करना था के साथ खिलवाड़ किया। 1935 के भारत सरकार अधिनियम 1935 द्वारा छोटानागपुर तथा संथाल परगना को “आंशिक रूप से बहिष्कृत क्षेत्र” घोषित किया गया। इन्हें संविधान की पाँचवी अनुसूची के तहत रखा गया। यहाँ अंग्रेज प्रशासन के द्वारा एक बहुत बड़ी भूल हो गई थी। यह भूल थी या किसी प्रकार के षड़यंत्र के तहत ऐसा किया गया था, यह स्पष्ट रूप से आज पता करना कठिन है। 1931 के जातीय सर्वे की रिपोर्ट में जिन तेरह जातियों को प्रमीटीव ट्राइव माना गया था, उन्ही जातियों को 1891 में प्रकाषित रिजले साहब की रिपोर्ट ने भी प्रमीटीव ट्राइव माना गया था। दो नोटिफिकेषन इस संबंध में किए गये थे, 1913 में एवं 1921 ईस्वी में जिनमे इन जातियों को प्रमीटीव ट्राइव माना गया था। झारखण्ड़ क्षेत्र में इसी कारण 1908 में छोटानागपुर टिनेन्सी एक्ट बनाया गया। बंगाल एक्ट नं0 6, 1908। झारखंड़ क्षेत्र में इन जातियों की जनसंख्या को जोड़ने पर यह क्षेत्र जनजातीय बाहूल क्षेत्र बन जाता था। फिर यह बात समझ में नहीं आ रही है कि वर्त्तमान छोटानागपुर डीविजन एवं संथाल परगना को संविधान की पाँचवी सूची तक क्यों पहुचना पड़ा। यह तो पूर्ण रूप से बहिष्कृत क्षेत्र के दायरे में ठीक आसाम, मेघालय आदि के तरह आता था।
ब्रिटिश प्रशासन ने जाहिर है ऐसा इसलिए किया कि “फुट डालों और राज करो” झारखंड़ की अटूट धन-सम्पदा के दोहन के लिए ऐसा करना जरूरी था।

Sunday, April 11, 2010

संवैधानिक सुधार की प्रक्रिया

संवैधानिक सुधार की प्रक्रिया : अनुसूचित जिला अधिनियम 1874 से अनुसूचित जिलों की परिकल्पना शुरू हुई। कार्यपालिका को किसी अनुसूचित जिलों को साधारण कानून के प्रचालन से अलग करने और उसे आवश्यक संरक्षण प्रदान करने की शक्ति प्राप्त थी। वास्तव में इस अधिनियम का आशय असम के कुछ क्षेत्रों का जिसका एक पृथक प्रदेश के रूप में 1874 में गठन किया गया था, प्रशासन करना था।
भारत सरकार अधिनियम 1919 के पहले 1918 में मॉटंगू चेम्सफोर्ड की रिपोर्ट में यह कहा गया कि शेष भारत के लिए परिकल्पित राजनितिक सुधार पिछड़े क्षेत्रों पर लागू नहीं हो सकते, क्योंकि ऐसा कुछ भी विद्यमान नहीं था जिसपर राजनैतिक संस्थाओं को आधारित किया जा सके।
भारत सरकार अधिनियम 1919 में इन भू-भागों को दो श्रेणियों में विभाजित किया गया था। कुछ क्षेत्र इतने अधिक पिछड़े हुए माने गये कि उन्हें सुधारों के क्षेत्रों से “पूर्णतया वहिष्कृत” किया गया ? अन्य पिछड़े क्षेत्रों पर “आंशोधित वहिष्करण” की प्रणाली लागू की गई थी। इस संवैधानिक परिवर्त्तन का मुख्य जोर यह सुनिश्चित करने पर था कि भारतीय विधान मंड़ल का कोई अधिनियम गर्वनर जनरल इन कांउसिल के विशिष्ट आदेश के बिना “पिछड़े-भू-भागों” पर लागू न हो। 1974 का अनुसूचित जिला अधिनियम रद्द कर दिया गया था।
साइमन कमीशन की रिपोर्ट में इस बात को स्पष्ट भांप लिया गया था कि इन क्षेत्रों के संबंध में सरकार की नीति क्या होनी चाहिए। रिपोर्ट में यह कहा गया “पिछड़े क्षेत्रों के प्रति सरकार का उत्तरदायित्व केवल मात्र इस बात से पूरा नहीं हो जायेगा कि उन्हें शोषण से संरक्षण प्रदान कर दिया गया है और वहाँ समय-समय पर फैलानी वाली गड़बड़ी की रोकथाम कर दी गई है। प्रशासन का प्रमुख उत्तरदायित्व इन क्षेत्रों के लोगों को शिक्षित करना है ताकि वे अपने पाँवों पर खड़े हो सके और इस दिशा में लगभग नहीं के बराबर शुरूआत की गई है। आयोग ने सिफारिश की कि इन “बहिष्कृत क्षेत्रों” के विकास के लिए निधियों की आवश्यकता है और ये निधियाँ केन्द्र द्वारा उपलब्ध कराई जा सकती है। इन क्षेत्रों के प्रशासन के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा अखिल भारतीय सेवाओं के माध्यम से राज्यपालों की एजेन्सी का उपयोग किया जाना चाहिए। इसने “आंशिक रूप से बहिष्कृत क्षेत्रों” के लिए अलग ढ़ंग की पद्धति का सुझाव दिया है।
भारत-सरकार अधिनियम 1935 में “पिछड़े क्षेत्रों” को “वहिष्कृत क्षेत्रों” एवं “आंशिक रूप से वहिष्कृत क्षेत्रों” के रूप में वर्गीकृत किया गया है। “वहिष्कृत क्षेत्रों” को राज्यपाल के स्वविवेक से कार्य करने के लिए राज्यपाल के व्यक्तिगत शासन के तहत में रखा गया था, जबकि आंशिक रूप से वहिष्कृत क्षेत्र मंत्रालय के उत्तरदायित्व के क्षेत्राधिकार में आते हैं। राज्यपाल इन क्षेत्रों के प्रशासन के संबंध में विशेष उत्तरदायित्व का निर्वाह करते थे, और यदि वह उचित समझे तो अपने व्यक्तिगत निर्णय के फलस्वरूप मंत्रियों के निर्णय के विरूद्ध व्यवस्था देने का अधिकार प्राप्त था। राज्यपाल के निर्देशों के बिना संघीय या प्रादेशिक विधानमंड़ल का कोई कानून इन क्षेत्रो पर प्रयोक्तव्य नहीं था। इस अधिनियम में भी “जनजाति क्षेत्रों” को भारत की सीमाओं के साथ लगे क्षेत्रों के रूप में परिभाषित किया गया था।

Thursday, April 1, 2010

अनुसूचित जनजाति (सेड्यूल ट्राइव) अनुसूचित जाति अवधारणा -

एच0 एच0 रिजले साहब के नेतृत्व में तत्कालीन बंगाल प्राविंस के रहने वाले लोगों का ऐथेनोग्राफिकल सर्वे यानि जातीय सर्वेक्षण कर लिया गया था। रिजले साहब की रिपोर्ट 1981 में प्रकाशित हुई थी, "दी ट्राइव एंड कास्ट आँफ बंगाल" बंगाल प्राविंस में अनेक जनजातियाँ निवास करती है। उन्होनें इन जातियों को चिन्हित किया। साइमन कमीशन की रिपोर्ट (1929-30) में आई। 1918 से लेकर आगे 1931 तक पुनः सर्वेक्षण का काम शुरू हुआ। डब्लू जी0 लेसी साहब के नेतृत्व में जनगनणा की रिपोर्ट 1931 में छपी एवं इसमें जातीय वर्गीकरण भी किए गये। यानि ऐथेनोग्राफिकल सर्वे भी किया गया एवं रिपोर्ट प्रकाशित की गई।
रिजले साहब ने 1884 में सर्वे किया था। उनकी ऐथेनोग्राफिकल सर्वे की रिपोर्ट के बाद 1913 में भारत सरकार ने एक नोटिफिकेशन निकाला जो 2 मई 1913 को गजेट आँफ इंडिया में प्रकशित हुई जिसका नम्बर 550 था। यह शिमला से प्रकाशित की गई। इस अधिसूचना ने बिहार एवं उड़ीसा क्षेत्र में निवास करने वाली मुंड़ा, उराँव, संथाल, हो, भूमिज, खड़िया, घासी, गाँड़, कंध, कोरवा, कुरमी, माल-सूरिया पान जाति को जनजाति कहा था और इसी वजह से उन्हे भारत सरकार के उत्तराधिकार अधिनियम 1865 के प्रावधानों से मुक्त रखा गया था। इन जातियों की अपनी अलग-अलग परम्परा पाई गई थी। इनके अपने उत्तराधिकार के नियम थे। सम्पति हस्तांतरण एवं प्रबंधन के अपने सामाजिक रीति-रिवाज थे। अतः इनपर विधान मंडल द्वारा पारित साधारण कानून जो मैदानी क्षेत्रों के निवासियो के लिए लागू किए जा सकते थे, इन क्षैत्रों तथा इन जातियों पर लागू नहीं किए गये। यह नोटिफिकेशन (अधिसूचना) रेस्ट्रोस्पेकटिव एफेक्ट (प्रतिलक्षी) प्रभाव यानि इंडियन सक्सेशन एक्ट 1865 के बनने के दिन से ही।
ज्ञातव्य हो कि 1931 में पुनः डब्लू जी लेसी साहब ने भारतीय जनगणना की रिपोर्ट प्रकाशित कराई एवं इसमें जनजातियों को भी सूचिबद्ध किया। इन्हे प्रीमीटीव ट्राइव का दर्जा भी दिया गया। एब-ओरिजनल कहा। 1931, 8 दिसम्बर को पुनः एक नोटिफिकेशन आया, कानून विभाग द्वारा। इसमें भी उपरोक्त तेरह जातियों को जनजाति कहा गया एवं भारतीय उत्तराधिकार नियम 1925 इंडियन संक्सेशन एक्ट 1925 के प्रभावों से मुक्त रखा गया एवं इसे भी प्रतिलक्षी प्रभाव-रेट्रोस्पेकटिव एफेक्ट से लागू किया गया यानि 1925 से ही।
इस प्रकार से हम देखते है कि झारखण्ड क्षेत्र की बहुसंख्यक जनता ब्रिटिश शासन काल में जनजाति रही थी।

झारखण्ड़ क्षेत्र का प्रारम्भिक प्रशासन -
झारखण्ड़ क्षेत्र का प्रशासन अपने आप में अनूठा था। अंग्रेजी राज से पूर्व छोटानागपूर पठार अनेक बड़े सामन्तो के कब्जे में था। संथाल परगना का पहाड़ियाँ जनजाति के कब्जे में था। इसके मैदानी क्षेत्र और घाटी में घटवार या घटवाल तथा जमींदारों का नियंत्रण था। मुगल-सम्राट के साथ साधारण निष्ठा थी।यहाँ पर मुसलमान शासकों ने पूर्ण रूपेण कब्जा नहीं किया था। झारखण्ड़ के निवासी आदिम जनजाति, प्रिमिटिव ट्राइव के लोग थे, जिनका अपना कानून था। अपने रस्मो-रिवाज थे। अपना रीति-रिवाज था। सम्पति के उत्तराधिकार के एवं हस्तांतरण के अपने नियम थे। वस्तुतः यहाँ के उस समय के निवासी हिन्दुत्व एवं ईस्लाम दोनों से अप्रभावित थे। वे प्रकृति पूजक थे।मुगलकाल के बाद सबसे ज्यादा प्रभाव ब्रिटिस शासन का इस क्षेत्र पर पड़ा। 1765 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कम्पनी को बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा की दिवानी स्वीकृति की गई थी। और इसी के साथ इस क्षेत्र में ब्रिटिश प्रशासन का अध्याय शुरू हुआ। दीवानी प्राप्त करने और सेवाएँ प्राप्त करने का अधिकार मिल गया। इस अधिकार का उपयोग कम्पनी ने अनुशासनहीन सामंतो, जमींदारो, मुखीयों के खिलाफ किया जो राजस्व या कर देने में अवहेलना या विलम्ब करते थे। ईस्ट इंडिया कम्पनी इन लोगों के वापसी झगड़े में हस्तक्षेप करती थी। इस अधिकार के तहत जनजातियों के विद्रोह को कुचलने के लिए सेना का उपयोग कम्पनी किया करती थी । 1776 में स्थाई बन्दोबस्त लागू करने के साथ कम्पनी का दामन चक्र पक्का हो गया।1788 में ईस्ट इंडिया कम्पनी की शक्ति तम्राट को हस्तांतरित हो गई। 1765 के बाद से करीब एक सौ वर्षो से भी अधिक समय तक इन क्षेत्रो में जनजातिय विद्रोह एवं आन्दोलन का समय रहा। ब्रिटिश प्रशासनिक प्रत्युत्तर पर ये विद्रोह हुए। इनमें महत्वपूर्ण है मलेर विद्रोह (1772), तिलका माँझी विद्रोह (1784), तमाड़ विद्रोह (1798), कोल इन्सरक्सन (1820), हो विद्रोह (1832) ग्रेट कोल विद्रोह आदि।सम्राट के पास शक्ति आ जाने के बाद जनजातीय क्षेत्र के प्रशासन में अनेक परिणामी परिवर्त्तन किए गये थे।मीलिटरी एक्शन के जरीए जनजातीय विद्रोहों एवं अन्य आन्दोलन को कुचलने का व्यापक इन्तजाम किया गया था। तीन तरफा कार्यवाही की गई, ग्राउंड प्राशासन को मजबूत करना, जनजातीयों की शिकायतों को दूर करके उन्हे शांत करना जो उस समय मुख्यतया ठेकेदारों, सामन्तो, जागीरदारों, महाजनों, व्यापारियों आदि के खिलाफ हुआ करती थी।अधिकांश शिकायतों का केन्द्र-बिन्दु जमीन और वनों पर उनका अधिकार एवं कभी-कभी उनकी महिलाओं का शोषण होता था।झारखण्ड क्षेत्र एक जनजातीय क्षेत्र रहा था। अधिकांश जनसंख्या जनजाति थी। ब्रिटिश प्रशासन ने अठारहवीं सदी के अन्त से ही संवैधानिक प्रक्रिया प्रारम्भ कर दिया था। जिसके अर्न्तगत प्रशासन को भारतीयों को सहयोजित करने और धीरे-धीरे उन्हे उत्तरदायित्व सौपना था। फिर भी झारखण्ड़ जैसे जनजातीय क्षेत्रों का प्रशासन इस प्रक्रिया से अछूता रह गया था।ब्रिटिश शासन ने भारतवर्ष में अपनी सत्ता चलाने के लिए एवं अपने कानूनों को लागू करने के लिए सर्वेक्षण के काम किए। जमीन का सर्वे तथा जातीय सर्वे भी किया। भारतवर्ष में निवास करने वाली जातियों का वर्गीकरण किया एवं भू-भाग का भी वर्गीकरण किया। ब्रिटिश शासन ने दो प्रकार के क्षेत्र पाये, एक तो भारत का मैदानी-समतल क्षेत्र तथा दूसरा पहाड़ी क्षेत्र। मैदानी लोगों के जीवन एवं दृष्टीकोणों में बहुत बड़ा अन्तर एवं विरोधावास पाया।इस अन्तर एवं विरोधावास का कारण यह था कि पहाड़ी क्षेत्र में भारतवर्ष की जनजातियाँ वास करती थी। जिनका रहन-सहन, रीति-रिवाज आदि अलग थे। ब्रिटिश सरकार का उद्देष्य विधान मंड़लो के सांविधानिक प्राधिकार को इन क्षेत्रों में न्यायिक एवं प्रशासनिक पद्धति को सरल तथा लचीली रखना सुनिश्चित करना चाहते थे।

अध्याय - 1

झारखण्ड़ एक परिचय –"झारखण्ड़" शब्द का शाब्दिक अर्थ झाड़-जंगल क्षेत्र से घिरा हुआ क्षेत्र है, और बिहार के छोटानागपुर एवं संथाल परगना कमीशनरी, बंगाल, बिहार तथा मध्य प्रदेश के राज्यों के समीपवर्त्ती क्षेत्र जो झाड़-जंगल से घिरे है, उस क्षेत्र को झारखण्ड़ क्षेत्र सामझा जाता रहा है।हाँलाकि "झार" शब्द झारखण्ड़ क्षेत्र में बोली जाने वाली किसी भी जनजातीय भाषा या बोली का शब्द नहीं है, न ही किसी उन्नत भाषा हिन्दी या बंगला का शब्द है। "झार" शब्द का अपभ्रंश है। "झाड़" शब्द ही सही लगता है। "झाड़" का ही अर्थ झाड़ी जंगल होता है। "खण्ड़" का अर्थ तो क्षेत्र होता है। वस्तुतः "झारखण्ड़" शब्द "झारखण्ड़" था जो "कुड़माली" भाषा का शब्द प्रतीत होता है। "ड़" की जगह "र" लिखा जाने लगा, बोला जाने लगा। "कुड़माली भाषा" झारखण्ड़ क्षेत्र के बहुसंख्यक जनजाति "कुड़मी" की भाषा है।पुरातन काल में छोटानागपुर पठार में अवस्थित क्षेत्र को ही झारखण्ड़ कहा जाता रहा था। ब्रिटिश शासन काल में आने से पहले इस क्षेत्र को "खुखरा" शब्द से भी संबोधित किया जाता था। सन् 1780 में झारखण्ड़ को "रामगढ़ पहाड़ी क्षेत्र" नाम से पुकारा गया और सन् 1833 में इसका नामकरण अंग्रेजी शासन के माध्यम से "दक्षिण पश्चिम सीमांत एजेन्सी" यानि साऊथ-वेस्ट फ्रंटियर एजेन्सी रहा। फिर इसे छोटानागपुर प्रमंड़ल का नाम दिया गया।वस्तुतः झारखण्ड़ का नाम "अकबरनामा" में भी मिलता है तथा चैतन्य महाप्रभु ने भी इस क्षेत्र को जिसका हमने शुरु में ही जिक्र किया है यानि बंगाल, बिहार, उड़ीसा मध्य प्रदेश के सीमावर्त्ती क्षेत्र को झारखण्ड़ क्षेत्र कहा गया है।वास्तव में छोटानागपुर पठार की भूमि 1912 ईस्वी से पहले बंगाल की प्रशासनिक सीमा के अन्दर थी। 1912 में बिहार एवं बंगाल दो प्रदेश बनाए गये, बंगाल से बिहार अलग करके। छोटानागपुर पठार के कुछ हिस्से बंगाल बिहार अलग करके। छोटानागपुर पठार के कुछ हिस्से बंगाल में ही रह गये। फिर 1936 ईस्वी मे बिहार से उड़ीसा को अलग किया गया। इस विभाजन के समय भी छोटानागपुर पठार का कुछ भाग उड़ीसा में शामिल कर लिया गया था। बिहार से उड़ीसा में शामिल कर लिया गया था। बिहार में छोटानागपुर कमिशनरी, संथाल परगना कमिशनरी ही झारखण्ड़ क्षेत्र के रुप में बच गये। बिहार, बंगाल, उड़ीसा तथा मध्यप्रदेश के राज्यों के गठन के फलस्वरुप वृहत् झारखण्ड़ प्रदेश चार टुकड़े में बँट गया।झारखण्ड़ अलग राज्य का आन्दोलन इसी झारखण्ड़ क्षेत्र को इन प्रदेशों से अलग करके एक अलग राज्य का दर्जा दिलाने का आन्दोलन रहा है। इस वृहत झारखण्ड़ क्षेत्र के दायरे में बिहार के अठारह जिले धनबाद, गिरिडीह, हजारीबाग, चतरा, गढ़वा, पलामू, कोडरमा, दुमका, देवघर, साहिबगमज, पाकुड़, गोड्डा पश्चिम सिंहभूम, पूर्वी सिंहभूम, राँची, लोहरदग्गा, गुमला तथा उड़ीसा के सुन्दरगढ़, म्यूरभंज, क्योंझर तथा बंगाल के पुरुलिया, बाकुँड़ा, मेदनीपुर तथा मध्यप्रदेश के सरगूँजा, रायगढ़, सम्बलपुर जिले है।क्षेत्रफल के हिसाब से वृहत झारखण्ड़ का क्षेत्रफल 3.75 लाख वर्गकिलोमीटर होगा तथा वृहत झारखण्ड़ की जनसंख्या 1981 की जनगणना के हिसाब से तीन करोड़ थी। सिर्फ बिहार में अवस्थित झारखण्ड़ का क्षेत्रफल 1.90 लाख वर्गकिलोमीटर है एवं 1981 की जनगणना के हिसाब से जनसंख्या 1.80 करोड़ थी। दौ हजार एक की जनगणना के हिसाब से वर्त्तमान झारखण्ड़ प्रदेश की आबादी पौने तीन करोड़ है।

परिवर्त्तन

प्रस्तावना - ब्रह्मांड की यह व्यवस्था बड़ी व्यापक एवं विचित्र है। कहते हैं कि ब्रह्माड़ में कई सौर-मंडल है। कई सूर्य है।हॉल ही में वैज्ञानिकों ने यह भी पता लगाया है कि इस ब्रह्माड़ में, अंतरिक्ष में कई ऐसे शून्य हैं जिसके अन्दर अगर कोई ग्रह, तारे आदि चले जाएँ तो क्षण में उसके टुकड़े-टुकड़े हो जायें। एक ऐसे भी शून्य यानि “ब्लैक हॉल” का पता चला है जो हमारे सूर्य से भी पन्द्रह-सोलह अरब गुणा आकार में बड़ा है। सूर्य भी अगर उसमें घुस जाए तो वह भी धूल-कणों में परिवर्तित हो जाए।पर बड़े आश्चर्य की बात है कि पूरी व्यवस्था, सौर मंड़लों की व्यवस्था, सूर्य, चॉद, तारे ग्रह सभी एक दूसरे के सहारे निर्भर है। सभी एक दूसरे के आकर्षण एवं विकर्षण के चलते एक दूसरे को बॉध कर एक निश्चित दूरी बनाकर, एक संतुलन कायम रखते हुए अपने-अपने रास्ते अपनी गति से चलते हैं।इस व्यवस्था में अगर अचानक परिवर्त्तन आ जाए, तो बड़े विनाश की संभावना है। तो प्रश्न उठता है कि क्या इस व्यवस्था में परिवर्त्तन नहीं होगा ? परिवर्त्तन तो हो रहा है, पर उसमें भी एक संतुलन है, संतुलन कायम रखते हुए हो रहा है। परिवर्त्तन भी व्यवस्था का अंग है। रास्ते बदल रहे हैं, दूरियाँ घट रही है, दूरियाँ बढ़ रही है।पृथ्वी पर भी परिवर्त्तन हुए है। इसके बनने के बाद से जीवों की उत्पत्ति से लेकर मानव के आर्विभाव से लेकर उसके पूरे सफर में परिवर्त्तन की ही कहानी है।मनुष्यों ने भी अपनी-अपनी व्यवस्था बनाई है। साम्राज्यों की व्यवस्था, सामंतवादी युगों की व्यवस्था, आदि-आदि। रहन-सहन की व्यवस्था, धर्म, संस्कृति, भाषा आदि सभी तो एक प्रकार की व्यवस्था है।तो क्या इन व्यवस्थाओं में परिवर्त्तन नहीं होता। होता है और होता हुआ आया भी है। व्यवस्थाओं में टकराव भी हुए हैं। व्यवस्थाओं में टकराव के चलते विनाशकारी-परिणाम भी सामने आते रहे हैं। कई व्यवस्थाएँ खत्म हो गई है। कई सभ्यताएँ-संस्कृतियाँ लूप्त हो चुकि है। यहाँ तक कि कई प्राणी भी लुप्त हो चुकें है।व्यवस्था में अगर संतुलन बनाए रखते हुए परिवर्त्तन होता है तो वह सुखद एवं लाभकारी हो सकता है, पर अगर टकराव हो तो विनाशकारी परिणाम होते हैं यानि परिवर्त्तन दुखदायी एवं अहितकर होते हैं।“परिवर्त्तन” झारखण्ड़ प्रदेश की छोटी व्यवस्था, इसकी संस्कृति-सभ्यता, इसके लोगों की सोच के साथ अन्य बड़ी व्यवस्थाओं के साथ टकराव की कहानी है। जाहिर है कि टकराव होगा तो परिणाम सुखद नहीं हो सकता।