Monday, December 13, 2010

झामुमो के आन्दोलन को आतंकवादी आन्दोलन कहा गया

मात्र तीन वर्षो के अंदर (1970-73) उत्तरी छोटानागपुर के हजारीबाग से धनबाद जिले तक तथा संथाल परगना के जामताड़ा, दुमका आदि जिलों तक यह धान-कटनी का आन्दोलन जोर-शोर से चलने लगा। इसमें न सिर्फ आदिवासी, बल्कि हरिजन पिछड़े वर्ग के लोग जो आदिवासियों की तरह शोषित थे, पीड़ित थे, महाजनी जुल्म से लड़ने के लिए उठ खड़े हुए तथा उन्होनें भी अपनी जमीनों पर कब्जा धान काटकर किया। पूरे क्षेत्र में एक भूचाल सा आ गया था।
उन्ही दिनों 1971 में एक दिन एक नौजवान गोला प्रखंड के नेमरा गाँव से बिनोद बाबू के पास आया था। वह नौजवान था शिबू सोरेन।
सिद्धु कान्हू, चाँद भेरव, बाबा तिलका माँझी से लेकर बिरसा भगवान तक जो लड़ाई लड़ी गई वह वास्तव में जमीन के लिए लड़ी गयी लड़ाई ही थी।
1970 के दसक में ही गाँव के झगड़ों का निपटारा गाँव में ही बिनोद बाबू की प्रेरणा एवं निर्देश से किया जाने लगा। ग्रामीण अब थाना-पुलिस एवं कोर्ट कचहरी से बचने लगे थे। गाँव के समूहों का जो निर्णय होता, उसी को मानने लगे। नतीजा यह निकला कि कई जगहों पर बकायदा ग्रामीण कोर्ट बैठने लगे जिसमें क्रांतिकारी विचार धारा के लोग हिस्सा लेने लगे। पुलिस एवं कोर्ट-कचहरी से वैसे ही लोगों का विश्वास उठ चुका था। अतः इन गाँव के कोर्टो में मामले धड़ाधड़ आने लगे। गाँव वाले कभी-कभी उस इलाके के महाजनों एवं जालिम जमींदारों की शिकायत लेकर आ जाते। तब निर्णय लेना कठिन हो जाता था, क्योंकि आरोपी एक शक्तिशाली व्यक्ति होता था जिसके हाथ मजबूत एवं लम्बे होते थे। ऐसे अवसर पर बिनोद बाबू को बुलाया जाता। बिनोद बाबू नहीं होते तो शिबू सोरेन को बुलाया जाता। वहाँ तथ्यों की सुनवाई रात-भर होती और सर्व सम्पति से निर्णय लिए जाते। अति अत्यचारी व्यक्ति के खिलाफ “बिटलाहा” का आदेश होता। कम अत्याचारी के खेतों पर जबरन कब्जा किये जाने का निर्णय होता, जिन खेतों को महाजन गलत तरीके से हड़प लेते थे। सैकड़ों की तादाद में गाँव वाले हरवे-हथियार से लैस होकर निकलते और दिन के उजाले में निर्णयों को लागू करते। “बिटलाहा” के आदेश पर गाँव वाले अत्याचारी के घर पर धावा बोलते और उसकी सम्पति को नुकसान पहुँचा देते। पर घर के महिलाओं, बच्चों पर कोई आँच नहीं आने देते। मर्द जमींदार अगर मुकाबलें में डटते तो उनके साथ मुकाबला होता। कई जगहों पर कार्यकर्त्ता मारे गये। कहीं-कहीं आततायियों के सर भी कलम कर दिए गये।
इन ग्रामीण कचहरियों का फैलाव होता गया। यहाँ तक कि गाँव तीन-पतली, जिला गिरिडीह में गुणेश्वर हाँसदा के नेतृत्व में ग्रामीण सुप्रीम कोर्ट बन गया।
इस प्रकार सीधी कार्यवाही के आन्दोलन ने जोर पकड़ा एवं यह आम जनता का आन्दोलन बन गया। चारों तरफ स्थिति तनावपूर्ण बन गई थी। पुलिस-प्रशासन की सक्रियता के बावजूद आन्दोलन रूकने का नाम नहीं ले रहा था। लोगों के अंदर आत्म बल इतना बढ़ गया था कि अन्याय के खिलाफ स्वतः र्स्फूत आन्दोलन होने लगे। प्रत्येक गाँव में नौजवान नेता, कार्यकर्त्ता तैयार होने लग गये थे।
1973 के आते-आते प्रशासन ने बिनोद बिहारी महतो पर समान्तर सरकार चलाने का आरोप लगा दिया।
समान्तर सरकार कहें या इसका कुछ और नाम दें। यह तो इसलिए उपजा था कि तत्कालिन व्यवस्था में झारखंड़ी पीस रहे थे। उस तत्कालीन व्यवस्था में उनकी समस्याओं का निदान उन्हें दूर तक दिखाई नहीं देता था। स्वाभाविक था कि वे स्वंय अपनी समस्याओं के समाधान के लिए आगे आते तथा स्व-शासन की ओर प्रेरित होते। पुराने मानकी-मुंड़ा-महतोई परगनैत आदि आदिवासी जनजाति शासन पद्धति की ओर बढ़े जो उनकी अपनी परम्परागत एवं रीति-रिवाज की उपज थी। जो उनका अपना स्वशासन था और जिसको उन्हें मजबूरी में छोड़ना पड़ा था। ब्रिटिश हुकुमत की व्यवस्था को अपनाना पड़ा था। उसी व्यवस्था को अपनाना पड़ा था। वही व्यवस्था हू-बू-हू स्वतंत्र भारत में भी लागू की गई थी। जाहिर है कि जनजातियों का आक्रोश उसी ब्रिटिश व्यवस्था को बल पूर्वक झारखंड़ी व्यवस्था पर लागू करने के विरूद्ध था। इसके लिए कितनी ही लड़ाइयाँ पूर्व में लड़ी गई थी। अतः पूनः स्वशासन की तरफ लोट जाने का आह्वान जो बिनोद बाबू ने दिया था, वह सबको ग्राह्य था। पर यह आन्दोलन था तो व्यवस्था-विरोधी। पर इसे व्यवस्था-विरोधी भी कहना गलत ही होगा। क्योंकि पंच-परमेश्वर है- यह सिद्धांत भारत वर्ष में हजारों वर्षो से चलता रहा है एवं लागू होता रहा है। तो अगर बिनोद बाबू ने फिर गाँव में ही पंचायत बुलाकर समस्याओं के समाधान की ओर कदम बढ़ाया तो उसे गलत कैसे कहा जा सकता है।
पर, गलत कहा गया। आरोप लगाए गये। ब्रिटिश शाषन-पद्धति जो आजाद भारत में हू-ब-हू लागू की गयी, उसके हित में बिनोद बाबू के कार्य कलाप नहीं थे। वे आम जनता के हित में थे। उनपर मुकदमे लादे गये। उन्हें आतंकवादी नेता करार कर दिया गया। और झामुमो के आन्दोलन को आतंकवादी आन्दोलन।
विस्थापन के विरूद्ध लड़ाई किस प्रकार लड़ी गई ? इसका जो तरीका बिनोद बाबू ने आख्तीयार किया वह भी नायाब था। अद्भूत था। टाटा कम्पनी की खदानें जिला धनबाद के जामाडोबा, डूंगरी, पटिया, भौंरा क्षेत्रों में है। साथ ही सिजुआ-भेलाटाँड़ में। फिर हजारीबाग के मांडू इलाके में कई खदानें हैं। टाटा कम्पनी वह कम्पनी है जिसकी कोयला-खदानों का राष्ट्रीयकरण नहीं किया गया। “केपटिव माइन्स” के दायरे में रखकर उन्हें राष्ट्रीयकरण से बाहर रखा गया। टाटा कम्पनी की जमशेदपुर में स्टील उत्पादन का विशाल कारखाना है। सिंहभूम जिले में लौह-अयस्क को गलाने के लिए कोयले की आवश्यकता पड़ती है। इस कम्पनी में सिर्फ कांग्रेस एवं उसकी यूनियन चलती थी। और किसी की भी बात सुनी नहीं जाती थी। टाटा कम्पनी अपने गुंड़ो के बल पर जो काँग्रेस की यूनियन के लोग होते थे और झारखंड़ से बाहरी मूल के होते थे, पूरे इलाके को आतंकित करके रखती थी। अगल बगल के गाँव के लोग जबान तक खोल नहीं सकते थे।
ऐसे माहौल में टाटा कम्पनी से विस्थापितों के लिए न्याय माँगना नक्कारखाने में तूती की आवाज साबित हो रही थी। पर बिनोद बाबू ने माँग नहीं, माँग करके जामाडोबा के पास बहती जोड़िया यानि छोटी नाली को अपने आन्दोलन का स्थल चुना। उन्होंने एक स्थान पर गाँव वालों को इकठ्ठा किया और गैंता-कुदाल लेकर स्वयं जोड़िया में उतरे। उनके पीछे सैकड़ों लोग थे। सभी मिलकर वहाँ पर मिट्टी से जोड़िया पर बाँध बाँधने लगे। अगल बगल के कॉलोनी निवासी एवं टाटा के ऑफिसरों ने सोचा कि ये लोग पागल हो गये हैं। नाला बाँधने से कहीं आन्दोलन होता है। पर जब बाँध बँध गया, दिनभर की मेहनत से, तभी लोगों को इसका प्रभाव नजर आया। पानी जमा हो गया और यह पानी बगल के कोयले की खदान में घुसने लगा। टाटा कम्पनी के ऑफिसरों को तब चिंता हुई कि अगर इसी तरह पानी घूसता रहा तो खदान बंद कर देना पड़ेगा। तब सिक्यूरिटी के लोग आए। बिनोद बाबू ने कहा कि यह जोड़िया सार्वजनिक सम्पत्ति है और इसमें बाँध-बाँधकर के गाँव के लोग अपने खेत की सिंचाई की व्यवस्था कर रहें हैं। इसे रोकने का अधिकार टाटा कम्पनी को नहीं है।
इसके बाद टाटा कम्पनी को झूकना पड़ा और वार्त्ता हुई तथा गाँव वालों एवं विस्थापितों की समस्याओं पर ध्यान दिया गया। नियोजन की पहल शुरू हुई। इस तरह के जन आन्दोलनों के चलते ही बड़ी-बड़ी कम्पनियों को विस्थपितों पर ध्यान देना पड़ा। भारत कोकिंग कोल लिमिटेड की कोलियारी में पहुँचने के लिए गाँव के रास्तों से फिर या तो रैयती जमीनों से होकर गुजरना जरूरी था। कोयला ट्रान्सपोर्ट रोड से करने के लिए, अफसरों के आवागमन के लिए, भीतर गाँव तक तथा खदानों तक जाने के लिए बीसीसीएल द्वारा जमीन अधिग्रहित नहीं की गई थी। लिहाजा बिनोद बाबू ने इन रास्तों को रोकवाना शुरू किया। बहुत सारी जमीनों पर बीसीसीएल ने जबरन कब्जा किया था। उन जमीनों पर मशीनों को चलाने पर रोक लगा दी गई। मशीनों पर झंड़े गाड़े गये।

झामुमो के आन्दोलन को आतंकवादी आन्दोलन कहा गया

इसके बावजूद कि शुरूआती दौर में भी झामुमो में दो विचार धाराओं का जन्म हो चुका था, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा का आन्दोलन रूका नहीं। थोड़े ही वर्षो में इसने एक व्यापक रूप ले लिया था। झारखण्ड आन्दोलन ने झारखण्ड के मूलवासियों, आदिवासियों एवं उपेक्षित शोषित जनता में एक आत्म विश्वास पैदा किया। अपने हक को पहचानना सिखाया एवं एक आत्मगोरव पैदा किया। यहाँ हो रहे सामूहिक अत्याचार, सरकारी शोषण एवं उपेक्षा के विरूद्ध उठ खड़े होने की शक्ति प्रदान की। ऐसा कह सकते हैं कि मूर्दो में जान आ गई थी। यह कैसे संभव हुआ ? बिनोद बाबू ने जब मार्क्सवाद का साथ दिया था और पच्चीस वर्षो तक लाल झंड़े को गाँव-गाँव पहुँचाया था तो भी ऐसा जागरण, ऐसी शक्ति वे पैदा नहीं कर पाये थे। अंतराष्ट्रीय अवधारणा, पूरे विश्व से शोषण को हटाने की अवधारणा यानि वामपंथी अवधारणा झारखंड़ में सफल क्यों नहीं हो पायी ? यह लगता जरूर था कि वामपंथ झारखंड में बहुत आगे बढ़ चुका है। उत्तरी छोटानागपुर ही नहीं पूरे झारखंड में करीब तीस विधान सभा सीटें ऐसी थी, जहाँ लाल झंड़ा विजयी होकर निकला था, पर ऐसा लगता था कि इस झंड़े के साथ आम जनता आत्मीयता का अनुभव नहीं कर पा रही थी।
झामुमो के जन्म ने तथा इसके जमीनी आन्दोलन ने दलितों एवं पिछड़ो, आदिवासियों, गरीबों तथा मजदूर वर्ग के अन्दर जुझारूपन पैदा किया। अगर कोई दबंग व्यक्ति, बलशाली, सामंत, पूँजीपति यानि सूदखोर, महाजन आदि किसी गरीब आदिवासी संथाल की जमीन हड़प ले, उसपर जबरन कब्जा कर ले, तो वह व्यक्ति क्या करें ? कोर्ट जाये जहाँ कि, न्यायलय की लम्बी प्रक्रिया एवं खर्चे को उठा पाना उसके लिए असंभव है। पुलिस प्रशासन के पास जायें, जहाँ थानों पर ही न्याय की निलामी हो जाए। पुलिस को अपने पक्ष में पहले से ही बना लिया जाय, सूदखोरों एवं महाजनों, पूँजूपतियों द्वारा तो पीड़ित को वहाँ न्याय नहीं मिलना। आखिर उसके पास रास्ता क्या है ? किसी राजनैतिक संगठन के पास जाना ही उसका विकल्प बचता है। पर वहाँ क्या होता है । राजनैतिक दल अगर उसके मामले को उठाता है, तो वह दल क्या करेगा ? चिट्ठी लिखेगा, पार्टी पदाधिकारियों की नहीं सुनी जायेगी। तब धरना देगी। नहीं सुनी जायेगी। तब अजीज आकर बड़ी तैयारी करके प्रर्दशन, जूलुस करेगा। प्रशासन यानि न्यायदाता अगर उससे भी नहीं जागे, तो राजनैतिक दल उसके आगे क्या कर सकता है ? या क्या करना चाहिए ? यह एक बड़ा प्रश्न चिन्ह है।
आदिवासी, हरिजन, दलितों की जूलुसों पर, मजदूर वर्ग के जूलुसों का किस प्रकार से दमन होता आया है, सभी जानते है। देश में आदिवासियों का सामुहिक कत्ल तक इन जूलुसों में किया जाता रहा है। निर्ममता पूर्वक लाठियाँ बरसाई गई है। गोलियाँ चलाई गई हैं। एक नहीं इसके कई उदाहरण हैं। झारखण्ड में तो सिर्फ झारखण्ड के नाम पर मीटिंग या सभा करने पर ही नरसंहार किए गए है।
तो आखिर कोई क्या करे। अन्याय के खिलाफ शोषण के विरूद्ध वह भी सरकारी शोषण के विरूद्ध झारखण्ड का आदमी क्या करें ? किस स्तर पर और कौन सी लड़ाई लड़े, जिससे उन्हें, न्याय मिल सके। शोषण से मुक्ति मिल सके।
एक ही रास्ता बचता है। वह रास्ता बहुत कठिन है। उस रास्ते पर चलने के लिए बहुत बड़े हिम्मत की जरूरत पड़ती है। वह रास्ता तो यही है कि सीधे शोषणकर्त्ता पर वार हो। उसे शारीरिक क्षति पहुँचाई जाय। जान का डर पैदा किया जाय। जान है तो जहान है। इसका अहसास उस जुल्मी के अन्दर हो। तभी वह भयभीत होगा, डरेगा, अन्याय करने से। शोषण करने से। पर इस रास्ते पर कमजोर व्यक्तियों को चलाना, उनमें वह संघर्ष का माद्दा पैदा करना, सीधी कार्यवाही के लिए उन्हें आगे बढ़ाना, कितना कठिन काम हो सकता है यह नेतृत्व कर्त्ता ही जान सकता है। भयभीत, डरे हुए, दबे हुए, कुचले हुए लोगों के लिए सर उठाकर चलना ही कठिन होता है। जो हाथ जोड़े रहते है, या अपने हाथ बगलों में दबाए, सर झुकाए धीमी आवाज में बोलने के आदी है, उन्हें सर सीधा करके, सीना तान करके हाथ ऊपर उठाकर नारें तक दिलवाना कठिन काम होता है। उन हाथों में कुछ कर गुजरने के लिए स्पंदन पैदा करना तो बहुत ही कठिन काम है।
झारखण्ड में कोई रास्ता नहीं बचा था। अभिशप्त झारखण्ड में आदमी अपने आप को नहीं पहचान रहा था। ऐसी परिस्थिति में बिनोद बिहारी महतो के अंदर ऐसी सोच किस प्रकार पैदा हुई, यह एक अनुसंधान का विषय हो सकता है। है भी।
1970 की एक दुपहरिया थी। पाँच छः आदिवासी-संथाल जाति के लोग बिनोद बिहारी महतो के निवास पर आए थे। उन दिनों बिनोद बाबू हीरापुर, धनबाद शहर में रेजिस्ट्री ऑफिस के निकट एक मकान में किराए पर रहा करते थे। कचहरी से वे दोपहर को लोटे थे। मार्निग कोर्ट था। वरांडे में आदिवासी जमीन पर बैठे हुए थे। दुबले-पतले। देखने से ही कुपोषण का शिकार से लगते थे। शरीर पर एक छोटी धोती लपेटे थे। आँख धँसी हुई। काले लोग। हाथों में छोटी सा टाँगी। या फिर छोटी लाठी थी। चुपचाप थे। यहाँ तक कि जब बिनोद बाबू ने उन्हें थोड़ी देर रूकने को कहा तो भी वे कुछ नहीं बोले।
दस मिनट के बाद बिनोद बाबू उन लोगों के पास आए और अपने बैठक खाना जो उनके वकालत का भी दफ्तर था, उन्हें उसमें बुला ले गये। उन्होंने उनकी समस्या पूछी स्थानीय कुड़माली भाषा में। संथाल कुरमाली समझते भी है, और बोलते भी है। उन आदिवासी संथालों ने कहा कि उनकी जमीन का जो कागजात उनके पास है, उसमें दखल का जो घर है यानि कालम है, उसमें चौधरी का नाम, लिखा हुआ है, जबकि मालिक संथालों को दिखाया गया है तथा जमीनें उनके दखल-कब्जे में भी है। वे ही धान उगाते हैं। खेत जोतते हैं। काटते हैं। पर धान को काटने के बाद चौधरी के खलिहान में ले जाकर जमा कर देते हैं। ऐसा इसलिए करना पड़ता है कि उन्हें चौधरी का कर्ज चुकाना है।
यह टुण्डी प्रखंड जिला धनबाद के गाँव पोखरिया की बात है। बिनोद बाबू ने उन आदिवासियों से पुछा कि कब उन लोगों ने कर्ज लिया था और कितना लिया था। जबाव मिला कि उनलोगों के पिताजी ने वर्षो पूर्व दो सौ रूपया कर्ज लिया और वह जमान चौधरी को सोंप दिया था। बंधक रख दिया था। बचपन से ही उनलोगों ने देखा है कि उनके बाप-दादे भी अपना धान चौधर के खलिहान में पहुँचाते रहे थे। उनकी ही जमीन। वे ही खती करते हैं। वे ही धान भी आज तक देते आए हैं, पर अभी तक खेत बंधक से मुक्त नहीं हो पाया चौधरी कहता है कि अभी सूद ही नहीं चुका है।
बिनोद बाबू कुछ सोच रहे थे। आदिवासियों ने उनसे गिड़गिड़ाकर कहा कि वे ऐसी व्यवस्था कर दे ताकि दखल के घर में उनका नाम सरकार चढ़ा दें और जमीन उनकी हो जाय। आदिवासियों की इस समझ पर बिनोद बाबू को आश्चर्य नहीं हुआ। इस प्रकार के सैकड़ो मामले उनकी नजर में आ चुके थे। पर तबतक वे कोई रास्ता निकाल नहीं पाये थे। अगर कोर्ट में मुकदमा दायर करें तो क्या नतीजा निकलेगा, उन्हें मालूम था। ये आदिवासी कोर्ट दौड़ते दौड़ते ही थक जाएगें। पर मिलेगा कुछ नहीं। आर्थिक हालात उन आदिवासियों की स्पष्ट थी। उनके पहनावे, उनका चेहरा ही उनकी कहानी कह रहा था।
उन्होंने बहुत सोचने के बाद कहा कि तुम लोग एक काम करो। इस बार तुमलोग खेत जोतो। धान लगावो। काटो। काटने के बाद धान को चौधरी के खलिहान में जमा मत करो। उस धान को अपने धर में ले जाकर रख दो। सरकार खुद-ब-खुद दखल के धर में तुम्हारा नाम लिख देगा। और कुछ करने की आवश्यकता नहीं है।
आदिवासियों को यह काम बड़ा आसान लगा। पर बिनोद बाबू जानते थे कि आदिवासी अगर ऐसा कर देते हैं तो उसके बाद क्या हो सकता है। दमन-चक्र किस प्रकार उन पर चलाया जायेगा। पर देखें तो आदिवासी क्या करते है, यह सोचकर उन्होंने उनको चले जाने को कहा और फिर धान काट लेने के बाद उनसे मिलने को कह दिया। इसके बाद शुरू हो गया, झारखंड का प्रसिद्ध “धान-कटनी” आन्दोलन। उन आदिवासियों ने वही किया जो बिनोद बाबू ने कहा था। उसकी देखा-देखी गाँव के दूसरे आदिवासियों ने जिनके जमीनें बधंक थी, वही किया। बगल के गाँवों में भी वही काम शुरू हो गया। उसी वर्ष इस कार्य ने एक आन्दोलन का रूप ले लिया। महाजनों, जमींदारों, सूदखोरों को कुछ समझ ही नहीं आया। वे सकते में आ गये। पुलिस को सक्रिय किया गया। दमन शुरू हुआ। मुकदमें दायर होने लगे। पर उसके बाद स्वतः ही आदिवासी लोग संगठीत होने लग गये। मीटिंग करने लगे। अपनी रक्षा के लिए बिनोद बाबू को बुलाने लगे। आदिवासियों के झुंड़ के झुंड़ तीर-धनुष, टाँगी से लैस होकर घूमने लगे। बड़े-बड़े जूलुस बिनोद बाबू के नेतृत्व में होने लगे।

झामुमो के आन्दोलन को आतंकवादी आन्दोलन कहा गया

इसके बावजूद कि शुरूआती दौर में भी झामुमो में दो विचार धाराओं का जन्म हो चुका था, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा का आन्दोलन रूका नहीं। थोड़े ही वर्षो में इसने एक व्यापक रूप ले लिया था। झारखण्ड आन्दोलन ने झारखण्ड के मूलवासियों, आदिवासियों एवं उपेक्षित शोषित जनता में एक आत्म विश्वास पैदा किया। अपने हक को पहचानना सिखाया एवं एक आत्मगोरव पैदा किया। यहाँ हो रहे सामूहिक अत्याचार, सरकारी शोषण एवं उपेक्षा के विरूद्ध उठ खड़े होने की शक्ति प्रदान की। ऐसा कह सकते हैं कि मूर्दो में जान आ गई थी। यह कैसे संभव हुआ ? बिनोद बाबू ने जब मार्क्सवाद का साथ दिया था और पच्चीस वर्षो तक लाल झंड़े को गाँव-गाँव पहुँचाया था तो भी ऐसा जागरण, ऐसी शक्ति वे पैदा नहीं कर पाये थे। अंतराष्ट्रीय अवधारणा, पूरे विश्व से शोषण को हटाने की अवधारणा यानि वामपंथी अवधारणा झारखंड़ में सफल क्यों नहीं हो पायी ? यह लगता जरूर था कि वामपंथ झारखंड में बहुत आगे बढ़ चुका है। उत्तरी छोटानागपुर ही नहीं पूरे झारखंड में करीब तीस विधान सभा सीटें ऐसी थी, जहाँ लाल झंड़ा विजयी होकर निकला था, पर ऐसा लगता था कि इस झंड़े के साथ आम जनता आत्मीयता का अनुभव नहीं कर पा रही थी।
झामुमो के जन्म ने तथा इसके जमीनी आन्दोलन ने दलितों एवं पिछड़ो, आदिवासियों, गरीबों तथा मजदूर वर्ग के अन्दर जुझारूपन पैदा किया। अगर कोई दबंग व्यक्ति, बलशाली, सामंत, पूँजीपति यानि सूदखोर, महाजन आदि किसी गरीब आदिवासी संथाल की जमीन हड़प ले, उसपर जबरन कब्जा कर ले, तो वह व्यक्ति क्या करें ? कोर्ट जाये जहाँ कि, न्यायलय की लम्बी प्रक्रिया एवं खर्चे को उठा पाना उसके लिए असंभव है। पुलिस प्रशासन के पास जायें, जहाँ थानों पर ही न्याय की निलामी हो जाए। पुलिस को अपने पक्ष में पहले से ही बना लिया जाय, सूदखोरों एवं महाजनों, पूँजूपतियों द्वारा तो पीड़ित को वहाँ न्याय नहीं मिलना। आखिर उसके पास रास्ता क्या है ? किसी राजनैतिक संगठन के पास जाना ही उसका विकल्प बचता है। पर वहाँ क्या होता है । राजनैतिक दल अगर उसके मामले को उठाता है, तो वह दल क्या करेगा ? चिट्ठी लिखेगा, पार्टी पदाधिकारियों की नहीं सुनी जायेगी। तब धरना देगी। नहीं सुनी जायेगी। तब अजीज आकर बड़ी तैयारी करके प्रर्दशन, जूलुस करेगा। प्रशासन यानि न्यायदाता अगर उससे भी नहीं जागे, तो राजनैतिक दल उसके आगे क्या कर सकता है ? या क्या करना चाहिए ? यह एक बड़ा प्रश्न चिन्ह है।
आदिवासी, हरिजन, दलितों की जूलुसों पर, मजदूर वर्ग के जूलुसों का किस प्रकार से दमन होता आया है, सभी जानते है। देश में आदिवासियों का सामुहिक कत्ल तक इन जूलुसों में किया जाता रहा है। निर्ममता पूर्वक लाठियाँ बरसाई गई है। गोलियाँ चलाई गई हैं। एक नहीं इसके कई उदाहरण हैं। झारखण्ड में तो सिर्फ झारखण्ड के नाम पर मीटिंग या सभा करने पर ही नरसंहार किए गए है।
तो आखिर कोई क्या करे। अन्याय के खिलाफ शोषण के विरूद्ध वह भी सरकारी शोषण के विरूद्ध झारखण्ड का आदमी क्या करें ? किस स्तर पर और कौन सी लड़ाई लड़े, जिससे उन्हें, न्याय मिल सके। शोषण से मुक्ति मिल सके।
एक ही रास्ता बचता है। वह रास्ता बहुत कठिन है। उस रास्ते पर चलने के लिए बहुत बड़े हिम्मत की जरूरत पड़ती है। वह रास्ता तो यही है कि सीधे शोषणकर्त्ता पर वार हो। उसे शारीरिक क्षति पहुँचाई जाय। जान का डर पैदा किया जाय। जान है तो जहान है। इसका अहसास उस जुल्मी के अन्दर हो। तभी वह भयभीत होगा, डरेगा, अन्याय करने से। शोषण करने से। पर इस रास्ते पर कमजोर व्यक्तियों को चलाना, उनमें वह संघर्ष का माद्दा पैदा करना, सीधी कार्यवाही के लिए उन्हें आगे बढ़ाना, कितना कठिन काम हो सकता है यह नेतृत्व कर्त्ता ही जान सकता है। भयभीत, डरे हुए, दबे हुए, कुचले हुए लोगों के लिए सर उठाकर चलना ही कठिन होता है। जो हाथ जोड़े रहते है, या अपने हाथ बगलों में दबाए, सर झुकाए धीमी आवाज में बोलने के आदी है, उन्हें सर सीधा करके, सीना तान करके हाथ ऊपर उठाकर नारें तक दिलवाना कठिन काम होता है। उन हाथों में कुछ कर गुजरने के लिए स्पंदन पैदा करना तो बहुत ही कठिन काम है।
झारखण्ड में कोई रास्ता नहीं बचा था। अभिशप्त झारखण्ड में आदमी अपने आप को नहीं पहचान रहा था। ऐसी परिस्थिति में बिनोद बिहारी महतो के अंदर ऐसी सोच किस प्रकार पैदा हुई, यह एक अनुसंधान का विषय हो सकता है। है भी।
1970 की एक दुपहरिया थी। पाँच छः आदिवासी-संथाल जाति के लोग बिनोद बिहारी महतो के निवास पर आए थे। उन दिनों बिनोद बाबू हीरापुर, धनबाद शहर में रेजिस्ट्री ऑफिस के निकट एक मकान में किराए पर रहा करते थे। कचहरी से वे दोपहर को लोटे थे। मार्निग कोर्ट था। वरांडे में आदिवासी जमीन पर बैठे हुए थे। दुबले-पतले। देखने से ही कुपोषण का शिकार से लगते थे। शरीर पर एक छोटी धोती लपेटे थे। आँख धँसी हुई। काले लोग। हाथों में छोटी सा टाँगी। या फिर छोटी लाठी थी। चुपचाप थे। यहाँ तक कि जब बिनोद बाबू ने उन्हें थोड़ी देर रूकने को कहा तो भी वे कुछ नहीं बोले।
दस मिनट के बाद बिनोद बाबू उन लोगों के पास आए और अपने बैठक खाना जो उनके वकालत का भी दफ्तर था, उन्हें उसमें बुला ले गये। उन्होंने उनकी समस्या पूछी स्थानीय कुड़माली भाषा में। संथाल कुरमाली समझते भी है, और बोलते भी है। उन आदिवासी संथालों ने कहा कि उनकी जमीन का जो कागजात उनके पास है, उसमें दखल का जो घर है यानि कालम है, उसमें चौधरी का नाम, लिखा हुआ है, जबकि मालिक संथालों को दिखाया गया है तथा जमीनें उनके दखल-कब्जे में भी है। वे ही धान उगाते हैं। खेत जोतते हैं। काटते हैं। पर धान को काटने के बाद चौधरी के खलिहान में ले जाकर जमा कर देते हैं। ऐसा इसलिए करना पड़ता है कि उन्हें चौधरी का कर्ज चुकाना है।
यह टुण्डी प्रखंड जिला धनबाद के गाँव पोखरिया की बात है। बिनोद बाबू ने उन आदिवासियों से पुछा कि कब उन लोगों ने कर्ज लिया था और कितना लिया था। जबाव मिला कि उनलोगों के पिताजी ने वर्षो पूर्व दो सौ रूपया कर्ज लिया और वह जमान चौधरी को सोंप दिया था। बंधक रख दिया था। बचपन से ही उनलोगों ने देखा है कि उनके बाप-दादे भी अपना धान चौधर के खलिहान में पहुँचाते रहे थे। उनकी ही जमीन। वे ही खती करते हैं। वे ही धान भी आज तक देते आए हैं, पर अभी तक खेत बंधक से मुक्त नहीं हो पाया चौधरी कहता है कि अभी सूद ही नहीं चुका है।
बिनोद बाबू कुछ सोच रहे थे। आदिवासियों ने उनसे गिड़गिड़ाकर कहा कि वे ऐसी व्यवस्था कर दे ताकि दखल के घर में उनका नाम सरकार चढ़ा दें और जमीन उनकी हो जाय। आदिवासियों की इस समझ पर बिनोद बाबू को आश्चर्य नहीं हुआ। इस प्रकार के सैकड़ो मामले उनकी नजर में आ चुके थे। पर तबतक वे कोई रास्ता निकाल नहीं पाये थे। अगर कोर्ट में मुकदमा दायर करें तो क्या नतीजा निकलेगा, उन्हें मालूम था। ये आदिवासी कोर्ट दौड़ते दौड़ते ही थक जाएगें। पर मिलेगा कुछ नहीं। आर्थिक हालात उन आदिवासियों की स्पष्ट थी। उनके पहनावे, उनका चेहरा ही उनकी कहानी कह रहा था।
उन्होंने बहुत सोचने के बाद कहा कि तुम लोग एक काम करो। इस बार तुमलोग खेत जोतो। धान लगावो। काटो। काटने के बाद धान को चौधरी के खलिहान में जमा मत करो। उस धान को अपने धर में ले जाकर रख दो। सरकार खुद-ब-खुद दखल के धर में तुम्हारा नाम लिख देगा। और कुछ करने की आवश्यकता नहीं है।
आदिवासियों को यह काम बड़ा आसान लगा। पर बिनोद बाबू जानते थे कि आदिवासी अगर ऐसा कर देते हैं तो उसके बाद क्या हो सकता है। दमन-चक्र किस प्रकार उन पर चलाया जायेगा। पर देखें तो आदिवासी क्या करते है, यह सोचकर उन्होंने उनको चले जाने को कहा और फिर धान काट लेने के बाद उनसे मिलने को कह दिया। इसके बाद शुरू हो गया, झारखंड का प्रसिद्ध “धान-कटनी” आन्दोलन। उन आदिवासियों ने वही किया जो बिनोद बाबू ने कहा था। उसकी देखा-देखी गाँव के दूसरे आदिवासियों ने जिनके जमीनें बधंक थी, वही किया। बगल के गाँवों में भी वही काम शुरू हो गया। उसी वर्ष इस कार्य ने एक आन्दोलन का रूप ले लिया। महाजनों, जमींदारों, सूदखोरों को कुछ समझ ही नहीं आया। वे सकते में आ गये। पुलिस को सक्रिय किया गया। दमन शुरू हुआ। मुकदमें दायर होने लगे। पर उसके बाद स्वतः ही आदिवासी लोग संगठीत होने लग गये। मीटिंग करने लगे। अपनी रक्षा के लिए बिनोद बाबू को बुलाने लगे। आदिवासियों के झुंड़ के झुंड़ तीर-धनुष, टाँगी से लैस होकर घूमने लगे। बड़े-बड़े जूलुस बिनोद बाबू के नेतृत्व में होने लगे।

Sunday, November 7, 2010

झामुमो में दो धाराओं का जन्म

दुर्भाग्य ने झारखण्ड आन्दोलन का साथ कभी नहीं छोड़ा। झारखण्ड आन्दोलन एक तरफ तो बिनोद बिहारी महतो के दिशा-निर्देश तथा विचार धारा के सहारे आगे बढ़ने लगा, तो दूसरी तरफ उनकी इमानदारी ने राजनीति में एक नये आयाम की सृष्टि की। बिना पैसे के चुनाव लड़ो। मतदाताओं को प्रलोभन देकर नहीं, समझदारी देकर चुनाव लड़ो। पर झारखण्ड मुक्ति मोर्चा में घुन उसके गठन के बाद से ही लगने लगा था। 1974 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण का सामाजवादी काँग्रेस-विरोधी आन्दोलन जो जे0 पी0 आन्दोलन के नाम से मशहूर हुआ। वह आन्दोलन तेजी पर था। काँग्रेस की सरकार जो केन्द्र तथा बिहार दोनों जगहों पर काबिज थी, ने इस आन्दोलन के दमन की पूरी व्यवस्था की। नये-नये कानून बनाए गये। मेंटटिनेन्स ऑफ इन्टरनल सेक्यूरिटी एक्ट बना। इधर श्रीमती इंदिरा गाँधी की सरकार ने देश में आपातकाल लगा दिया। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा, मासस, कम्यूनिष्ट पार्टी, जनसंघ आदि सभी काँग्रेस विरोधी पार्टी एक जुट होकर इस आपातकाल में भी काँग्रेस का विरोध कर रही थी। दर्जनों केस-मुकदमें बिनोद बिहारी महतो आदि नेताओं पर लादें गये। आपातकाल के लागू होने के ठीक पहले बिनोद बिहारी महतो को मीसा के तहत मार्च 1974 में गिरफ्तार कर लिया गया। उसी प्रकार शक्ति नाथ, सदानन्द झा, पुनित महतो, चूड़ामण महतो, हीरामण महतो, ए0 के0 राय, के0 एस0 चटर्जी आदि नेताओं को उत्तरी छोटानागपुर में गिरफ्तार किया गया, जिनका संबंध झारखण्ड आन्दोलन से रहा था। उसके अलावा भी छत्रुराम महतो इत्यादि जनसंघ के नेताओं को भी इस क्षेत्र से गिरफ्तार किया गया। इनका विवरण देना आवश्यक नहीं। यह बात सर्व विदित है, कि पूरे झारखण्ड क्षेत्र में सैकड़ों की तादाद में छोटे-बड़े विभिन्न राजनैतिक दलों के नेताओं को आपातकाल के दौरान गिरफ्तार किया गया था।
पर जो सबसे आश्चर्य की बात हुई, वह यह थी कि झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के महामंत्री शिबू सोरेन आपातकाल में जेल नहीं गये। क्या उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया ? और अगर गिरफ्तार किया गया था तो तुरंत छोड़ा कैसे गया। पाया गया कि शिबू सोरेन ने बिहार के तत्कालिन मुख्यमंत्री जगरन्नाथ मिश्रा से मिलकर समझौता कर लिया तथा काँग्रेस की नीतियों का समर्थन कर दिया। इस प्रकार काँग्रेस को समर्थन देने एवं काँग्रेस विरोधियों से अलग हो जाने के कारण शिबू सोरेन जेल जाने से बच गये। आपात काल में इसी कारण 1975 में चार फरवरी का झारखण्ड मुक्ति मोर्चा का स्थापना दिवस शिबू सोरेन ने अलग से टुण्डी मे मनाया जिसमें बतौर मुख्य अतिथि जगरनाथ मिश्रा शरीक हुए। धनबाद के गोल्फ मैदान में स्थापना दिवस मनाने के लिए कोई बड़ा नेता नहीं बचा था, सभी जेल की हवा खा रहे थे। उस साल राज किशोर महतो के नेतृत्व में वहाँ स्थापना दिवस मनाया गया। फिर भी भीड़ उमड़ पड़ी थी।
शिबू सोरेन ने आपात काल 1975 में जो बिनोद बाबू का साथ छोड़ा तो सीधे काँग्रेस में शामिल हो गये और वहीं जम गये। करीब तीन वर्षो तक बिनोद बाबू अकेले रहे एवं आन्दोलन करते रहे। उनके सहयोगी ऐ0 के0 राय रह गये थे। श्री सोरेन 1977 के लोक-सभा चुनाव तक काँग्रेस के साथ रहे।
1977 में जे0 पी0 आन्दोलन के समय लोक-सभा का चुनाव आया तो बिनोद बिहारी महतो एवं ऐ0 के0 राय को गिरिडीह एवं धनबाद लोक-सभा से चुनाव लड़वाने का फैसला लोक नायक जय प्रकाश नारायण ने ले लिया था। उस समय जनसंघ आदि पाटियों ने मिलकर “जनता पार्टी” बनाई थी।
व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा हमेशा से ही एकता में बाधक रही है। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से श्री ऐ0 के0 राय भी ग्रस्त हो गये एवं उनके समर्थकों ने धनबाद लोक-सभा सीट के लिए जनता पार्टी का समर्थन काँग्रेस के विरूद्ध श्री राय के लिए ले लिया। गिरिडीह की सीट में कुछ ऐसी हालात उनके समर्थकों ने पैदा किया कि बिनोद बाबू को बहला फुसला कर पटना से धनबाद वापस ले आया गया और वह समर्थन रामदास सिंह जी को गिरिडीह लोक-सभा के लिए मिला। ऐसा बिनोद बाबू के समर्थक दल मासस के तत्कालीन महासचिव उमाशंकर शुक्ल एवं के0 पी0 भट्ट ने किया श्री राय जेल में थे और बिनोद बाबू को भी वहाँ से हटा दिया गया था। जो लोग सीटों पर बात करने गये थे उन्होनें राय के लिए सीट माँग ली, पर बिनोद बाबू के लिए नहीं। 1977 का चुनाव बिनोद बाबू अकेले लड़े। उस लोक सभा चुनाव में काँग्रेस के टिकट से डा0 इम्तियाज अहमद (डा0 शब्बा अहमद के पिता ) गिरिडीह से लड़ रहें थे। शिबू सोरेन इस चुनाव में काँग्रेस की तरफ से खुलकर प्रचार-प्रसार कर रहें थे। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के उम्मीदवार तीर-धनुष चिन्ह से चुनाव लड़ने वाले पार्टी के अध्यक्ष बिनोद बाबू के खिलाफ शिबू सोरेन काँग्रेस के उम्मीदवार को जिताने में लगे थे। इधर ऐ0 के0 राय अपने को संयुक्त उम्मीद्वार बताकर लड़ रहें थे और बिनोद बाबू के समर्थकों शिबा महतो बगैरह को लेकर बिनोद बाबू का विरोध गिरिडीह में कर रहें थे एवं साझा उम्मीद्वार रामदास सिंह का समर्थन कर थे।
झामुमो के शुरूआती दिनों में ही इसे एक जबरजस्त झटका लगा। पर बिनोद बाबू ने इन बातों को बहुत गहराई से नहीं लिया। पुनः अपने काम में लग गये। हॉलाकि उसी साल नवम्बर के महिने में उन्हें प्रथम बार दिल का दौरा पड़ा।
1977 के लोक-सभा चुनाव में काँग्रेस की बुरी तरह हार हुई। श्रीमती इन्दिरा गाँधी स्वयं चुनाव हार गई। केन्द्र में जनता पार्टी की सरकार बन गई। शिबू सोरेन फिर डर गये एवं इधर-उधर भटकने लगे। फिर धनबाद लोटे एवं श्री ऐ0 के0 राय को पकड़ा। ऐ0 के0 राय के अनुरोध करने पर बिनोद बाबू ने पुनः शिबू सोरेन को दुमका यानि संथाल परगना भेज दिया। टुंडी के पोखरिया आश्रम में अब शिबू सोरेन नहीं जा सकते थे, क्योंकि काँग्रेस में शामिल होने एवं बिनोद बाबू को छोड़ने के कारण वहाँ आदिवासी समर्थक बहुत गुस्से में थे।
फिर 1980 के आम चुनाव के पहले से ही इस बात के संकेत मिलने लग गये थे कि पुराने आदिवासी (जनजाति) नेताओं की तरह ही शिबू सोरेन काँग्रेस की निकटता प्राप्त करना चाहते थे, उससे समझौता करके चलाना चाहते थे, विरोध करके नहीं। यही बात श्री राय एवं बिनोद बाबू को पसंद नहीं थी। 1980 के विधान सभा चुनाव में झारखण्ड मुक्ति मोर्चा एवं मासस को चौदह सीटें मिली थी। शिबू सोरेन चुँकि संथाल परगना देख रहे थे, उन्होनें चुपके से काँग्रेस से भीतर-भीतर तालमेल कर लिया, पर उत्तरी छोटानागपुर में सीटें काँग्रेस के विरोध में लड़ी गई।
1980 के लोक सभा चुनाव में श्री सोरेन से काँग्रेस से गुपचुप समझौता कर लिया और दुमका लोक सभा सीट से मात्र तीन हजार मत से जीत गये। श्री राय 1977 में ही सांसद बन गये थे। फिर 1980 में भी धनबाद से जीते। बिनोद बाबू 1980 में भी गिरिडीह लोक-सभा चुनाव हार गये।
1983, जनवरी में हुए महाधिवेशन के बाद जब बिनोद बाबू ने पार्टी का अध्यक्ष पद छोड़ा तो शिबू-सोरेन, शैलेन्द्र महतो, सूरज मंडल आदि ने गुटबाजी शुरू कर दी। बिनोद बाबू इन बातों की खबर भी रखना नहीं चाहते थे। धीरे-धीरे यह परिस्थिति ऐसी पैदा हो गई कि झामुमो में दो फाँक हो गया। बिनोद बाबू के तरफ शहीद शक्ति नाथ महतो, कॉ0 ऐ0 के0 राय (सांसद धनबाद) के0 एस0 चटर्जी (निरसा विधायक), आनन्द महतो (सिन्दरी विधायक), टेकलाल महतो (मांडू विधायक), शंकर किशोर महतो (लाठाटाँड़), शिबा महतो (डूमरी विधायक) आदि हो गये तथा एक अलग ही गुट बनाने का निश्चय किया गया। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा (बिनोद) गुट से बिनोद बाबू के साथ रहने वालों, साथ देने वालों को जाना जाने लगा। विधिवत् रूप से इस दल का पंजीकरण करने के लिए चुनाव आयोग में लिखा गया। पर इसी बीच शिवा महतो जी के प्रयास से डुमरी में फिर से दोनों गुट एक साथ हो गये एवं फिर झामुमो के बैनर में कार्य करने लगे।
बिनोद बाबू के पुत्र के उम्र के थे सभी, सिवाय, शिवा महतो के। बिनोद बाबू तो सब कुछ भूल गये, पर इन लोगों ने अपनी आदत नहीं छोड़ी।
वर्ष 1988 में जब “झारखण्ड समन्वय समिति” ने रैली निकालने की तैयारी की थी, तो अर्जुन राम महतो, शैलेन्द्र महतो आदि ने शिबू सोरेन, सूरज मंडल के कहने पर रामगढ़ में काला झंड़ा दिखाकर बिनोद बाबू का विरोध किया था तथा शिबू सोरेन, सूरज मंडल, शैलेन्द्र महतो इस समिति से दूर रहे और आन्दोलन में कोई हिस्सा नहीं लिया।
ग्यातव्य हो कि इस समिति में करीब बावन पाटियाँ शामिल थी, एवं 15 नवम्बर 1988 को मोराबादी मैदान राँची में निकाली गई थी। यह एक ऐतिहासिक रैली थी जिसने केन्द्र सरकार का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था।
वर्ष 1989 में जब दुमका के हिजला में पार्टी का तृतीय महाधिवेशन बुलाया गया उसमें बिनोद बाबू की अनुपस्थिति में, उनके विरूद्ध तत्कालीन महामोत्री शैलेन्द्र महतो ने अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया और उसमें जमकर बिनोद बाबू की आलोचना की। उस प्रतिवेदन में उन्हें सामंतवादी चरित्र वाला, पैसे के बल पर राजनीति करने वाला, विघटनकारी, व्यक्तिगत लाभ के लिए राजनीति करने वाला कहा। शैलेन्द्र महतो ने उस रिपोर्ट में यह भी कहा है कि वर्ष 1983 के सरायढेला, धनबाद में हुए महाधिवेशन में पार्टी का शुद्धिकरण करने के लिए बिनोद बिहारी महतो को निष्काषित किया गया था। यह निष्काषण की बात भी झूठी थी। उन्होनें स्वयं पद छोड़ा था।
शैलेन्द्र महतो वर्ष 1978 में पार्टी में शामिल हुए थे। जब धनबाद आए थे, तो एक हाफ कमीज एवं पैजामा पहने थे तथा कंधे पर एक झोला टंगा हुआ था।

झामुमो में दो धाराओं का जन्म

दुर्भाग्य ने झारखण्ड आन्दोलन का साथ कभी नहीं छोड़ा। झारखण्ड आन्दोलन एक तरफ तो बिनोद बिहारी महतो के दिशा-निर्देश तथा विचार धारा के सहारे आगे बढ़ने लगा, तो दूसरी तरफ उनकी इमानदारी ने राजनीति में एक नये आयाम की सृष्टि की। बिना पैसे के चुनाव लड़ो। मतदाताओं को प्रलोभन देकर नहीं, समझदारी देकर चुनाव लड़ो। पर झारखण्ड मुक्ति मोर्चा में घुन उसके गठन के बाद से ही लगने लगा था। 1974 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण का सामाजवादी काँग्रेस-विरोधी आन्दोलन जो जे0 पी0 आन्दोलन के नाम से मशहूर हुआ। वह आन्दोलन तेजी पर था। काँग्रेस की सरकार जो केन्द्र तथा बिहार दोनों जगहों पर काबिज थी, ने इस आन्दोलन के दमन की पूरी व्यवस्था की। नये-नये कानून बनाए गये। मेंटटिनेन्स ऑफ इन्टरनल सेक्यूरिटी एक्ट बना। इधर श्रीमती इंदिरा गाँधी की सरकार ने देश में आपातकाल लगा दिया। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा, मासस, कम्यूनिष्ट पार्टी, जनसंघ आदि सभी काँग्रेस विरोधी पार्टी एक जुट होकर इस आपातकाल में भी काँग्रेस का विरोध कर रही थी। दर्जनों केस-मुकदमें बिनोद बिहारी महतो आदि नेताओं पर लादें गये। आपातकाल के लागू होने के ठीक पहले बिनोद बिहारी महतो को मीसा के तहत मार्च 1974 में गिरफ्तार कर लिया गया। उसी प्रकार शक्ति नाथ, सदानन्द झा, पुनित महतो, चूड़ामण महतो, हीरामण महतो, ए0 के0 राय, के0 एस0 चटर्जी आदि नेताओं को उत्तरी छोटानागपुर में गिरफ्तार किया गया, जिनका संबंध झारखण्ड आन्दोलन से रहा था। उसके अलावा भी छत्रुराम महतो इत्यादि जनसंघ के नेताओं को भी इस क्षेत्र से गिरफ्तार किया गया। इनका विवरण देना आवश्यक नहीं। यह बात सर्व विदित है, कि पूरे झारखण्ड क्षेत्र में सैकड़ों की तादाद में छोटे-बड़े विभिन्न राजनैतिक दलों के नेताओं को आपातकाल के दौरान गिरफ्तार किया गया था।
पर जो सबसे आश्चर्य की बात हुई, वह यह थी कि झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के महामंत्री शिबू सोरेन आपातकाल में जेल नहीं गये। क्या उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया ? और अगर गिरफ्तार किया गया था तो तुरंत छोड़ा कैसे गया। पाया गया कि शिबू सोरेन ने बिहार के तत्कालिन मुख्यमंत्री जगरन्नाथ मिश्रा से मिलकर समझौता कर लिया तथा काँग्रेस की नीतियों का समर्थन कर दिया। इस प्रकार काँग्रेस को समर्थन देने एवं काँग्रेस विरोधियों से अलग हो जाने के कारण शिबू सोरेन जेल जाने से बच गये। आपात काल में इसी कारण 1975 में चार फरवरी का झारखण्ड मुक्ति मोर्चा का स्थापना दिवस शिबू सोरेन ने अलग से टुण्डी मे मनाया जिसमें बतौर मुख्य अतिथि जगरनाथ मिश्रा शरीक हुए। धनबाद के गोल्फ मैदान में स्थापना दिवस मनाने के लिए कोई बड़ा नेता नहीं बचा था, सभी जेल की हवा खा रहे थे। उस साल राज किशोर महतो के नेतृत्व में वहाँ स्थापना दिवस मनाया गया। फिर भी भीड़ उमड़ पड़ी थी।
शिबू सोरेन ने आपात काल 1975 में जो बिनोद बाबू का साथ छोड़ा तो सीधे काँग्रेस में शामिल हो गये और वहीं जम गये। करीब तीन वर्षो तक बिनोद बाबू अकेले रहे एवं आन्दोलन करते रहे। उनके सहयोगी ऐ0 के0 राय रह गये थे। श्री सोरेन 1977 के लोक-सभा चुनाव तक काँग्रेस के साथ रहे।
1977 में जे0 पी0 आन्दोलन के समय लोक-सभा का चुनाव आया तो बिनोद बिहारी महतो एवं ऐ0 के0 राय को गिरिडीह एवं धनबाद लोक-सभा से चुनाव लड़वाने का फैसला लोक नायक जय प्रकाश नारायण ने ले लिया था। उस समय जनसंघ आदि पाटियों ने मिलकर “जनता पार्टी” बनाई थी।
व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा हमेशा से ही एकता में बाधक रही है। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से श्री ऐ0 के0 राय भी ग्रस्त हो गये एवं उनके समर्थकों ने धनबाद लोक-सभा सीट के लिए जनता पार्टी का समर्थन काँग्रेस के विरूद्ध श्री राय के लिए ले लिया। गिरिडीह की सीट में कुछ ऐसी हालात उनके समर्थकों ने पैदा किया कि बिनोद बाबू को बहला फुसला कर पटना से धनबाद वापस ले आया गया और वह समर्थन रामदास सिंह जी को गिरिडीह लोक-सभा के लिए मिला। ऐसा बिनोद बाबू के समर्थक दल मासस के तत्कालीन महासचिव उमाशंकर शुक्ल एवं के0 पी0 भट्ट ने किया श्री राय जेल में थे और बिनोद बाबू को भी वहाँ से हटा दिया गया था। जो लोग सीटों पर बात करने गये थे उन्होनें राय के लिए सीट माँग ली, पर बिनोद बाबू के लिए नहीं। 1977 का चुनाव बिनोद बाबू अकेले लड़े। उस लोक सभा चुनाव में काँग्रेस के टिकट से डा0 इम्तियाज अहमद (डा0 शब्बा अहमद के पिता ) गिरिडीह से लड़ रहें थे। शिबू सोरेन इस चुनाव में काँग्रेस की तरफ से खुलकर प्रचार-प्रसार कर रहें थे। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के उम्मीदवार तीर-धनुष चिन्ह से चुनाव लड़ने वाले पार्टी के अध्यक्ष बिनोद बाबू के खिलाफ शिबू सोरेन काँग्रेस के उम्मीदवार को जिताने में लगे थे। इधर ऐ0 के0 राय अपने को संयुक्त उम्मीद्वार बताकर लड़ रहें थे और बिनोद बाबू के समर्थकों शिबा महतो बगैरह को लेकर बिनोद बाबू का विरोध गिरिडीह में कर रहें थे एवं साझा उम्मीद्वार रामदास सिंह का समर्थन कर थे।
झामुमो के शुरूआती दिनों में ही इसे एक जबरजस्त झटका लगा। पर बिनोद बाबू ने इन बातों को बहुत गहराई से नहीं लिया। पुनः अपने काम में लग गये। हॉलाकि उसी साल नवम्बर के महिने में उन्हें प्रथम बार दिल का दौरा पड़ा।
1977 के लोक-सभा चुनाव में काँग्रेस की बुरी तरह हार हुई। श्रीमती इन्दिरा गाँधी स्वयं चुनाव हार गई। केन्द्र में जनता पार्टी की सरकार बन गई। शिबू सोरेन फिर डर गये एवं इधर-उधर भटकने लगे। फिर धनबाद लोटे एवं श्री ऐ0 के0 राय को पकड़ा। ऐ0 के0 राय के अनुरोध करने पर बिनोद बाबू ने पुनः शिबू सोरेन को दुमका यानि संथाल परगना भेज दिया। टुंडी के पोखरिया आश्रम में अब शिबू सोरेन नहीं जा सकते थे, क्योंकि काँग्रेस में शामिल होने एवं बिनोद बाबू को छोड़ने के कारण वहाँ आदिवासी समर्थक बहुत गुस्से में थे।
फिर 1980 के आम चुनाव के पहले से ही इस बात के संकेत मिलने लग गये थे कि पुराने आदिवासी (जनजाति) नेताओं की तरह ही शिबू सोरेन काँग्रेस की निकटता प्राप्त करना चाहते थे, उससे समझौता करके चलाना चाहते थे, विरोध करके नहीं। यही बात श्री राय एवं बिनोद बाबू को पसंद नहीं थी। 1980 के विधान सभा चुनाव में झारखण्ड मुक्ति मोर्चा एवं मासस को चौदह सीटें मिली थी। शिबू सोरेन चुँकि संथाल परगना देख रहे थे, उन्होनें चुपके से काँग्रेस से भीतर-भीतर तालमेल कर लिया, पर उत्तरी छोटानागपुर में सीटें काँग्रेस के विरोध में लड़ी गई।
1980 के लोक सभा चुनाव में श्री सोरेन से काँग्रेस से गुपचुप समझौता कर लिया और दुमका लोक सभा सीट से मात्र तीन हजार मत से जीत गये। श्री राय 1977 में ही सांसद बन गये थे। फिर 1980 में भी धनबाद से जीते। बिनोद बाबू 1980 में भी गिरिडीह लोक-सभा चुनाव हार गये।
1983, जनवरी में हुए महाधिवेशन के बाद जब बिनोद बाबू ने पार्टी का अध्यक्ष पद छोड़ा तो शिबू-सोरेन, शैलेन्द्र महतो, सूरज मंडल आदि ने गुटबाजी शुरू कर दी। बिनोद बाबू इन बातों की खबर भी रखना नहीं चाहते थे। धीरे-धीरे यह परिस्थिति ऐसी पैदा हो गई कि झामुमो में दो फाँक हो गया। बिनोद बाबू के तरफ शहीद शक्ति नाथ महतो, कॉ0 ऐ0 के0 राय (सांसद धनबाद) के0 एस0 चटर्जी (निरसा विधायक), आनन्द महतो (सिन्दरी विधायक), टेकलाल महतो (मांडू विधायक), शंकर किशोर महतो (लाठाटाँड़), शिबा महतो (डूमरी विधायक) आदि हो गये तथा एक अलग ही गुट बनाने का निश्चय किया गया। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा (बिनोद) गुट से बिनोद बाबू के साथ रहने वालों, साथ देने वालों को जाना जाने लगा। विधिवत् रूप से इस दल का पंजीकरण करने के लिए चुनाव आयोग में लिखा गया। पर इसी बीच शिवा महतो जी के प्रयास से डुमरी में फिर से दोनों गुट एक साथ हो गये एवं फिर झामुमो के बैनर में कार्य करने लगे।
बिनोद बाबू के पुत्र के उम्र के थे सभी, सिवाय, शिवा महतो के। बिनोद बाबू तो सब कुछ भूल गये, पर इन लोगों ने अपनी आदत नहीं छोड़ी।
वर्ष 1988 में जब “झारखण्ड समन्वय समिति” ने रैली निकालने की तैयारी की थी, तो अर्जुन राम महतो, शैलेन्द्र महतो आदि ने शिबू सोरेन, सूरज मंडल के कहने पर रामगढ़ में काला झंड़ा दिखाकर बिनोद बाबू का विरोध किया था तथा शिबू सोरेन, सूरज मंडल, शैलेन्द्र महतो इस समिति से दूर रहे और आन्दोलन में कोई हिस्सा नहीं लिया।
ग्यातव्य हो कि इस समिति में करीब बावन पाटियाँ शामिल थी, एवं 15 नवम्बर 1988 को मोराबादी मैदान राँची में निकाली गई थी। यह एक ऐतिहासिक रैली थी जिसने केन्द्र सरकार का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था।
वर्ष 1989 में जब दुमका के हिजला में पार्टी का तृतीय महाधिवेशन बुलाया गया उसमें बिनोद बाबू की अनुपस्थिति में, उनके विरूद्ध तत्कालीन महामोत्री शैलेन्द्र महतो ने अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया और उसमें जमकर बिनोद बाबू की आलोचना की। उस प्रतिवेदन में उन्हें सामंतवादी चरित्र वाला, पैसे के बल पर राजनीति करने वाला, विघटनकारी, व्यक्तिगत लाभ के लिए राजनीति करने वाला कहा। शैलेन्द्र महतो ने उस रिपोर्ट में यह भी कहा है कि वर्ष 1983 के सरायढेला, धनबाद में हुए महाधिवेशन में पार्टी का शुद्धिकरण करने के लिए बिनोद बिहारी महतो को निष्काषित किया गया था। यह निष्काषण की बात भी झूठी थी। उन्होनें स्वयं पद छोड़ा था।
शैलेन्द्र महतो वर्ष 1978 में पार्टी में शामिल हुए थे। जब धनबाद आए थे, तो एक हाफ कमीज एवं पैजामा पहने थे तथा कंधे पर एक झोला टंगा हुआ था।

Sunday, October 31, 2010

झामुमो के आन्दोलन का क्रमिक विकास

सभी को ज्ञात है कि 1973 से लेकर बिनोद बिहारी महतो के स्वर्गवास तक (18-12-91) झारखंड मुक्ति मोर्चा पूरे झारखंड क्षेत्र में एक सशक्त राजनैतिक दल के रूप में उभर चुका था। धनबाद जिले से लेकर पूरे उत्तरी छोटानागपुर, दक्षिणी छोटानागपुर एवं संथाल परगना में एक मजबूत संगठन बन चुका था। न सिर्फ इतना ही, बल्कि पश्चिम बंगाल एवं उड़ीसा के समीपवर्ती झारखंड क्षेत्र में यह बहुत लोकप्रिय बन चुका था।
झारखंड मुक्ति मोर्चा की सफलता के पीछे बिनोद बिहारी महतो की विचार-धारा रही। उनका दिशा-निर्देश रहा। उनकी जोखीम उठाने की प्रवृति रही। पार्टी को शुरू के दशवर्षो तक आर्थिक मदद इन्होने किया। उन्होने प्रतिभाओं को तलाशा एवं उन्हें तरासने का काम किया। अपना स्वयं का पैसा खर्च करके नेताओं को आगे बढ़ाया, कार्यकर्त्ता तैयार किए। उनका नेतृत्व ईमानदारी का था एवं पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़े थे। जैसा कि हमने पहले ही देख लिया है कि उन्होने उन वर्गो को एकत्रित करने का काम किया। जिन्हें वास्तव में परिवर्त्तन चाहिए था। उन्ही वर्गो-जातियों में से नेतृत्व पैदा किया। बिनोद बिहारी महतो ने झारखंड आन्दोलन के संकुचित आदिवासी चेहरे को, उसके जनजातीय छवि को बदल डाला। उसे एक विस्तृत आयाम दिया। इसमें आदिवासियों के साथ-साथ गैर-आदिवासी समूहों को भी शामिल किया। इन्होने झारखंड आन्दोलन में मजदूरों की भागीदारी भी सुनिश्चित की। उन्होनें इस आन्दोलन को न सिर्फ जातीय, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक आधार प्रदान किया। झारखंड की सभ्यता-सांस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए यहाँ के लोकगीतों, लोकनृत्यों, को आन्दोलन के रूप मे लिया। तो दूसरी ओर कल-कारखानों, कोलियारियों में नौकरी एवं रोजगार के लिए आन्दोलन चलाया। सांमतवादी विचार-धारा वाले सूदखोर, महाजनों के खिलाफ सशस्त्र आन्दोलन भी हुए।
चूँकि शिवाजी समाज द्वारा आन्दोलन बहुत आगे बढ़ाया जा चुका था और संथाल समाज द्वारा भी। अतः झारखंड मुक्ति मोर्चा सिर्फ दो वर्षो में स्थापित हो गया था।
इन आन्दोलनों में प्रमुख रहा झारखंड में विस्थापन की समस्या के विरूद्ध। 1978 के पहले केन्द्र सरकार ने विस्थापितों के नियोजन, पुर्नवास एवं नोकरी देने की कोई नीति नहीं बनाई थी। प्रथम बार 1978 से कोल कम्पनियों द्वारा इन विषयों पर नीतियाँ बनाई गई एवं नियोजन, पुर्नवास देने का काम शुरू किया गया। दामोदर भैली कॉरपोरेशन लिमिटेड को भी आन्दोलनों से मजबूर होकर विस्थापितों को नौकरी, रोजगार, ठीका आदि देने का काम शुरू करना पड़ा। इन सबके साथ-साथ कम्यूनिटी डेवलोपमेंट के नाम पर अगल-बगल के गाँवों में नागरिक सुविधाएँ मुहैय्या कराने का काम भी शुरू किया गया। सड़क, पानी, बिजली, विकास भवन, स्कूल आदि बनाने में औद्योगिक संस्थान अपनी थोड़ी-बहुत भागीदारी निभाने लगें।
इसके अलावे जो एक और प्रमुख आन्दोलन शुरू किया गया, वह था जंगल बचाओं आन्दोलन एवं विदेशी वृक्ष लगाना बंद करो का आन्दोलन। जंगलों में रहने वाले आदिवासी, गैर-आदिवासी सक्रिय हो उठे। जंगल विभाग के कर्मचारियों, अधिकारियों ने नंगा नाच मचा रखा था। अंधाधुंध लकड़ियों की कटाई इनके द्वारा कराई जा रही थी। साथ ही गाँव वालों को बिना वजह लकड़ी चोरी के इल्लजाम में पकड़कर जेल भेजा जाता था। अगर गाँव के लोग जलावन के लिए या अन्य छोटे-मोटे कृषि के उपकरण बनाने के लिए लकड़ी का प्रयोग करते तो उन्हें चोरी के इल्लजाम में जेल भेज दिया जाता। सदियों से झारखंड़ियों का जीवन जंगल-आधारित था। फल-फूल, पत्ते, लकड़ी का उपयोग करते आ रहे थे। पर इनके सारे अधिकार छीन लिए गये थे। अतः इस आन्दोलन का व्यापक प्रभाव पड़ा। विदेशी-वृक्षों को सरकार द्वारा खाली जमीनों पर लगाया जाता था, जो जमीनों को उपजाऊ नहीं, बल्कि सुखा देती थी। इन वृक्षों यूकलिप्टस आदि को काट डालने का अभियान चला। इसके अलावा फलदार वृक्षों को लगाने की माँग की जाने लगी। जंगलों के इलाकों में सरकारी तंत्रों के साथ गाँव वालों का मुकाबला भी हो जाता। कई बड़ी-बड़ी घटनाएँ भी घट गई, जिसमें पुलिस, जंगल गार्ड मारे गये तो गाँव वालों को भी गोलियों का निशाना बनाया गया। जंगलों में खासकर उग्रवादी आन्दोलन चलाये गये। सरकारी कर्मचारी, जंगल विभाग के अधिकारी ठेकेदार, भागने लगे थे।
इसके अलावे गाँवों में सूदखोरों, महाजनों द्वारा गैर कानूनी ढ़ंग से हड़पी गई जमीनों को वापस करने का जोरदार आन्दोलन किया गया। छोटानागपुर टेनेन्सी एक्ट तथा संथाल परगना टेनेन्सी एक्ट के अतिक्रमण की हालत में उन जमीनों पर रैयतों द्वारा जमान वापसी के लिए सीधे कार्यवाही की जाने लगी। कोर्ट-कचहरियों में गरीबों को न्याय मिलना असंभव था। अतः बिनोद बिहारी महतो ने उन जमानों पर पुनः कब्जा करने की रणनीति तैयार की। उन्होनें कई जिलों में वकीलों को प्रोत्साहित किया कि वे गरीब, आदिवासी, हरिजन, पिछड़े लोगों के मुकदमें बिना फीस लिए लड़े एवं उन्हें कानूनी सहायता दें। जमीन वापसी का आन्दोलन भी बड़ा व्यापक स्तर पर चला। “धान-कटनी” का आन्दोलन उस जमीन वापसी का आन्दोलन का एक हिस्सा था। गाँव के गरीब, आदिवासी, हरिजन, झारखंड मुक्ति मोर्चा के कार्यकर्त्ताओं द्वारा संगठित किए जाते और तीर-धनुष, लाठी-भाला, टाँगी आदि से लैस होकर खेतों पर डुगडुगी बजाते-बजाते धावा बोलते और खड़ी फसल को काट देते एवं उसे ढोकर सही व्यक्ति के घर पहुँचा देते।
सांस्कृतिक आन्दोलन भी चलाए गये। झारखंड की सभ्यता संस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए जगह-जगह “झूमर” प्रतियोगिता रखी जाने लगी। झूमर एक लोक नृत्य है जिसमें झूमर के गीत गाये जाते हैं। बाजा बजाने वाले होते हैं। ढोल, नगाड़ा, माँदर, करताल, शहनाई का होना आवश्यक है। इसमें बारह ताल यानि लय होते हैं। बारह प्रकार की अलग-अलग धूनों पर नाचा जाता है। नाचने के लिए विशेष तौर पर लड़के ही नर्तकियों का रूप धरते है। दो से छः तक नर्तकियों की संख्या होती है। यह लोक-नृत्य अखाड़े में खड़े होकर सम्पन्न किया जाता है। दर्शक इसके चारों तरफ बैठते है। झारखंड क्षेत्र का यह एक प्रसिद्ध लोक-नृत्य है जो पूरे झारखंड में महशूर है। पर्व-त्योहार के अवसर पर या फिर धान की फसल काट लेने के बाद जाड़े की रातों में रातभर झूमर नाचा जाता है। उसी प्रकार अन्य लोक-नृत्य “छऊ-नृत्य” है जो विश्व-प्रसिद्ध हो चुका है। इसी प्रकार के अन्य लोक गीतों एवं लोक-संगीतो, लोक-नृत्यों को बढ़ावा देने के लिए बिनोद बाबू ने व्यापक प्रोत्साहन दिया। स्वयं रात-रात भर जागकर कलाकारों को उत्हाहित करते। नतीजा यह निकला कि झारखंड के समूचे इलाके में, गाँव-गाँव में झारखंडी सभयता-संस्कृति पुर्नजीवित हो उठा एवं इसकी गूँज दूर-दूर तक आगे बढ़ने लगी। इसके साथ-साथ झारखंड क्षेत्र के पर्व-त्योहार करमा, सोहराई, गोहालपूजा, जीतिया, टुसू, जावा आदि शहरों में प्रवेश कर गये। उन्हें भी प्रोत्साहित किया गया। पूरे झारखंड क्षेत्र की अपनी एक पहचान है, वह भी विशिष्ट जो अन्य किसी की नहीं हैं। इस प्रकार के सांस्कृतिक आन्दोलन से झारखंडी अपने आप को पहचानने लगे। उनमें आत्म-विश्वास जगने लगा। औद्योगिकरण एवं बाहरी संस्कृति के दबाव से जो संकुचन आया था, वह दूर होने लगा और वे जो श्रेष्ठ होते हुए भी हीन भावना से ग्रस्त हो रहे थे, पुनः स्वयं को आत्म-विश्वास से भरा हुआ पाने लगे।
झारखंड क्षेत्र में कुछ ऐसे लोक नृत्य है जो “मारसल आर्ट” के स्वरूप है। इसमें एक प्रमुख है- “पैका” यानि ”पाइक”। इसमें खिलाड़ी ढाल तलवार (या लाठी) से लैस होता है। पैंरों में घुँघरू बाँध लेता है और सर पर पगड़ी। धोती को कस कर कमर में बाँधा जाता है। “पैका” में जो पारंगत हो जाता है वह अकेले ही दर्जन हमलावरों को एक साथ धूल चटा सकता है। इसके दाँव-पेंच ही ऐसे होते हैं। झारखंड में पहले कुड़ंमी-महतो लोगो के प्रत्येक गाँव में “पाइक” की ट्रेनिंग दी जाती थी। इसके लिए उस्ताद होते थे, गुरू होते थे और यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलता आता है। पर दुर्भाग्य से आज यह प्रायः लुप्त हो रहा है। इसी पैका का दूसरा स्वरूप “नटुआ नाच” है। अब ढाल की जगह गमछा, तलवार की जगह लाठी ने ले लिया है। इसमें बजने वाला बाजा विशिष्ट लय एवं ताल का होता है, जिसे सुनकर ही यहाँ का झारखंडी मैदान में कूद पड़ता है।
फिर झारखण्ड मुक्ति मोर्चा ने गाँव-गाँव में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए “अकिल-अखाड़े” चलाए। सुदूर गाँव में रात्री-पाठशालाएँ लालटेनों की रोशनी में चलायी जाने लगीं। शिक्षा के लिए भी अभियान या आन्दोलन चलाए गये। जिन परिवारों के बच्चे स्कूल नहीं जाते थे उन्हें प्रोत्साहित किया जाने लगा। उस समय गाँव में शिक्षा की कोई व्यवस्था ही नहीं थी। बिनोद बिहारी महतो ने स्वंय कुल मिलाकर कितने संस्थाने खोले, यह पता लगाया जा रहा है। पर चालीस संस्था का पता चला है। जिनमें मिडिल-स्कूल, हाई-स्कूल, डिग्री कॉलेज तथा विधि विद्यालय भी हैं। ये सम्पूर्ण झारखण्ड में जगह-जगह शिक्षण संस्थान खोलने के लिए लोगों को उत्साहित करते फिरते। अपनी कमाई का अधिकत्तर पैसा इन कॉलेजों एवं स्कूलों के भवन निर्माण शिक्षकों के वेतन के लिए दान दे दिया।
इधर गाँव के झगड़े गाँव में ही पंचायत बुलाकर सुलझाए जाने लगें। प्रत्येक गाँव में यह एक आन्दोलन के रूप में खड़ा होने लगा। झारखण्डी की जीवन-पद्धति भी यही थी। फिर अगर गाँवों में नहीं सुलझ पाते तो उन झगड़ों को नेताओं क पास ले जाया जाता। फिर बड़े पैमाने पर तीन-चार गाँव के लोग मिलकर बैठते एवं फैसला किया जाता। किसी-किसी मामलें में समस्या जब नहीं सुलझती, तो इसे बिनोद बाबू के पास लाया जाता। धीरे-धीरे ऐसी व्यवस्था कायम हो गई कि झारखंड के कई इलाकों में इस प्रकार से झगड़े निपटाने के केन्द्र बन गये और उन्हें लोग स्वतः जिला-कोर्ट, हाई-कोर्ट कहने लगे। यही कारण था कि सरकारी रिपोर्टो में यह बात दर्ज है कि झारखंड मुक्ति मोर्चा द्वारा समानान्तर सरकार चलाई जा रही थी, जिसका अपना पुलिस फोर्स है एवं कोर्ट-कचहरी है। इन कचहरियों में यानि बैठकों में आपराधिक मामले दीवानी मामले तथा शादी-व्याह, तलाक से जुड़े मामले सभी पर विचार विमर्श होता था। आपराधिक मामलों में ज्यादातर फाइन किया जाता था। कभी-कभी शारीरिक दंड दिया जाता था और अपराधी को लाठियों से पिटा जाता। या अन्य प्रकार से अपमानित या प्रताड़ित किया जाता। किसी-किसी गंभीर मामले में हुक्का पानी भी कुछ दिनों के लिए बंद कर दिया जाता यानि सामाजिक बहिष्कार किया जाता। किसी-किसी मामले में जो जमींदारी अत्याचार एवं सामंती अत्याचार के खिलाफ फैसला लिया जाता, उसमे “बिटलाहा” भी कर दिया जाता। बिटलाहा का मतलब होता था, उसे गाँव से उजाड़ देना। घर-द्वार को तोड़-फोड़ दिया जाता था।
इनके अलावे जो एक सबसे बड़ा पहलू झारखंड मुक्ति मोर्चा के आन्दोलन का रहा, वह था शराब-खोरी के खिलाफ संघर्ष। इसमें कार्यकर्त्ता सीधे शराब की भट्टियों पर धावा बोलते, तोड़फोड़ कर डालते। शराबियों को पकड़कर पीटते। उन्हें पानी में डूबा-डूबा कर उसका नशा तोड़ते। कार्यकर्त्ता पता लगाते कि कौन चोरी-छिपे इस धंधे में लिप्त है, उसका पता लगाते एवं उसे धंधे को छोड़ने के लिए मजबूर करते। गाँवों में औरतों के बीच जाते और उन्हें अपने-अपने शराबी पतियों की आदत छुड़ाने के लिए प्रोत्साहित करते। औरते इस आन्दोलन का समर्थन जोरदार ढंग से करती एवं अपने शराबी पतियों से लडती झगड़ती।
इस प्रकार इन आन्दोलनों ने बहुत सारे जुझारू, लड़ाकू कार्यकर्त्ता पैदा किए। पर समाज का शोषक-शासक वर्ग चुप नहीं बैठे रह सकता था। इन आन्दोलों को कुचलने के लिए पुलिस-प्रसाशन, जमींदार, सूदखोर, महाजन, माफिया, गुंडे सभी सक्रिय हो उठे। नतीजा यह हुआ कि कई बड़े-बड़े संघर्ष हुए। चोरी-छिपे कार्यकर्त्ताओं, नेताओं की हत्याएँ की जाने लगीं। घात लाकर इन आन्दोलनों के अगुआओं को खोजकर मारा जाने लगे। शहीदों की लम्बी कतारें हो गई। पर कार्यकर्त्ता और जनता भी प्रतिकार में उतर आई। और वर्षो तक दोनों तरफ से संघर्ष चलने लगा।
1975 में ही गोमो में जिला धनबाद के सदानन्द झा शहिद हो गये। उन्हें अकेले पाकर आतताइयों ने गोली मार दी। 1977 में शक्ति नाथ महतो टाटा सिजुआ में शहीद हो गये। उन्हें काँग्रेस के गुंडों ने दिन दहाड़े बम गोलियों से मार डाला। उसी प्रकार इस कोयलाचंल में रसीक हाँसदा, नेपाल रवानी आदि दर्जनों शहीद हुए।
1975 में गोमो की रेल नगरी में सदानन्द झा शहीद हुए तथा 1977 में टाटा-सिजूआ तेतुलमुड़ी के शक्ति नाथ महतो शहीद हुए। ये दो प्रमुख कार्यकर्त्ता नेताओं की शहादत के बाद तो मानों पूरे दक्षिणी छोटानागपुर में आन्दोलन में उफान आ गया। फिर 1987 में जमशेदपुर में झारखंड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष निर्मल महतो को भी आतताइयों ने मार डाला। उनकी शहादत के बाद तो मानों पूरे दक्षिणी छोटानागपुर में आग ही लग गई। इसके अलावे इचागढ़ के अजीत महतो, धनंजय महतो आदि शहीद हुए। गुवा में 1982 में प्रसिद्ध गोली कांड हुआ जिसे आज गुआ गोली कांड के रूप में याद किया जाता है, इसके अलावे अनेकों शहीद हुए। हजारों जेल गये। रिटायर्ड आर्मी के जवान कंडुलना की पुलीस इन्काउटर दिखा कर हत्या कर दी।
संथाल परगना में भी यही हाल रहा। यहाँ उन तमाम घटनाओं का जिक्र करना संभव नहीं हैं। आम झारखंडी शोषित जनता ने भी प्रतित्चुर में हथियार उठा लिए। कई बड़े-बड़े संघर्ष पुलिस-प्रशासन के साथ हुए। महाजन, सामंतो के बिरूद्ध भी जम कर सशस्त्र संधंर्ष हुए। इस प्रकार 1990 तक आते-आते इस पार्टी के बीस विधायक एवं 1991 में छः सासंद बन गये। उन सांसदो के नाम है- श्री बिनोद बिहारी महतो, शिबू सोरेन, सूरज मंडल, शैलेन्द्र महतो, कृष्णा मार्डी, साइमन मरांडी। फिर बाद में 1992 के जून में गिरीडिह संसदिय क्षेत्र में बिनोद बिहारी महतो का निधन के बाद उपचुनाव हुआ जिसमें उनके पुत्र राज किशोर महतो सासंद बने।

झामुमो के आन्दोलन का क्रमिक विकास

सभी को ज्ञात है कि 1973 से लेकर बिनोद बिहारी महतो के स्वर्गवास तक (18-12-91) झारखंड मुक्ति मोर्चा पूरे झारखंड क्षेत्र में एक सशक्त राजनैतिक दल के रूप में उभर चुका था। धनबाद जिले से लेकर पूरे उत्तरी छोटानागपुर, दक्षिणी छोटानागपुर एवं संथाल परगना में एक मजबूत संगठन बन चुका था। न सिर्फ इतना ही, बल्कि पश्चिम बंगाल एवं उड़ीसा के समीपवर्ती झारखंड क्षेत्र में यह बहुत लोकप्रिय बन चुका था।
झारखंड मुक्ति मोर्चा की सफलता के पीछे बिनोद बिहारी महतो की विचार-धारा रही। उनका दिशा-निर्देश रहा। उनकी जोखीम उठाने की प्रवृति रही। पार्टी को शुरू के दशवर्षो तक आर्थिक मदद इन्होने किया। उन्होने प्रतिभाओं को तलाशा एवं उन्हें तरासने का काम किया। अपना स्वयं का पैसा खर्च करके नेताओं को आगे बढ़ाया, कार्यकर्त्ता तैयार किए। उनका नेतृत्व ईमानदारी का था एवं पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़े थे। जैसा कि हमने पहले ही देख लिया है कि उन्होने उन वर्गो को एकत्रित करने का काम किया। जिन्हें वास्तव में परिवर्त्तन चाहिए था। उन्ही वर्गो-जातियों में से नेतृत्व पैदा किया। बिनोद बिहारी महतो ने झारखंड आन्दोलन के संकुचित आदिवासी चेहरे को, उसके जनजातीय छवि को बदल डाला। उसे एक विस्तृत आयाम दिया। इसमें आदिवासियों के साथ-साथ गैर-आदिवासी समूहों को भी शामिल किया। इन्होने झारखंड आन्दोलन में मजदूरों की भागीदारी भी सुनिश्चित की। उन्होनें इस आन्दोलन को न सिर्फ जातीय, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक आधार प्रदान किया। झारखंड की सभ्यता-सांस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए यहाँ के लोकगीतों, लोकनृत्यों, को आन्दोलन के रूप मे लिया। तो दूसरी ओर कल-कारखानों, कोलियारियों में नौकरी एवं रोजगार के लिए आन्दोलन चलाया। सांमतवादी विचार-धारा वाले सूदखोर, महाजनों के खिलाफ सशस्त्र आन्दोलन भी हुए।
चूँकि शिवाजी समाज द्वारा आन्दोलन बहुत आगे बढ़ाया जा चुका था और संथाल समाज द्वारा भी। अतः झारखंड मुक्ति मोर्चा सिर्फ दो वर्षो में स्थापित हो गया था।
इन आन्दोलनों में प्रमुख रहा झारखंड में विस्थापन की समस्या के विरूद्ध। 1978 के पहले केन्द्र सरकार ने विस्थापितों के नियोजन, पुर्नवास एवं नोकरी देने की कोई नीति नहीं बनाई थी। प्रथम बार 1978 से कोल कम्पनियों द्वारा इन विषयों पर नीतियाँ बनाई गई एवं नियोजन, पुर्नवास देने का काम शुरू किया गया। दामोदर भैली कॉरपोरेशन लिमिटेड को भी आन्दोलनों से मजबूर होकर विस्थापितों को नौकरी, रोजगार, ठीका आदि देने का काम शुरू करना पड़ा। इन सबके साथ-साथ कम्यूनिटी डेवलोपमेंट के नाम पर अगल-बगल के गाँवों में नागरिक सुविधाएँ मुहैय्या कराने का काम भी शुरू किया गया। सड़क, पानी, बिजली, विकास भवन, स्कूल आदि बनाने में औद्योगिक संस्थान अपनी थोड़ी-बहुत भागीदारी निभाने लगें।
इसके अलावे जो एक और प्रमुख आन्दोलन शुरू किया गया, वह था जंगल बचाओं आन्दोलन एवं विदेशी वृक्ष लगाना बंद करो का आन्दोलन। जंगलों में रहने वाले आदिवासी, गैर-आदिवासी सक्रिय हो उठे। जंगल विभाग के कर्मचारियों, अधिकारियों ने नंगा नाच मचा रखा था। अंधाधुंध लकड़ियों की कटाई इनके द्वारा कराई जा रही थी। साथ ही गाँव वालों को बिना वजह लकड़ी चोरी के इल्लजाम में पकड़कर जेल भेजा जाता था। अगर गाँव के लोग जलावन के लिए या अन्य छोटे-मोटे कृषि के उपकरण बनाने के लिए लकड़ी का प्रयोग करते तो उन्हें चोरी के इल्लजाम में जेल भेज दिया जाता। सदियों से झारखंड़ियों का जीवन जंगल-आधारित था। फल-फूल, पत्ते, लकड़ी का उपयोग करते आ रहे थे। पर इनके सारे अधिकार छीन लिए गये थे। अतः इस आन्दोलन का व्यापक प्रभाव पड़ा। विदेशी-वृक्षों को सरकार द्वारा खाली जमीनों पर लगाया जाता था, जो जमीनों को उपजाऊ नहीं, बल्कि सुखा देती थी। इन वृक्षों यूकलिप्टस आदि को काट डालने का अभियान चला। इसके अलावा फलदार वृक्षों को लगाने की माँग की जाने लगी। जंगलों के इलाकों में सरकारी तंत्रों के साथ गाँव वालों का मुकाबला भी हो जाता। कई बड़ी-बड़ी घटनाएँ भी घट गई, जिसमें पुलिस, जंगल गार्ड मारे गये तो गाँव वालों को भी गोलियों का निशाना बनाया गया। जंगलों में खासकर उग्रवादी आन्दोलन चलाये गये। सरकारी कर्मचारी, जंगल विभाग के अधिकारी ठेकेदार, भागने लगे थे।
इसके अलावे गाँवों में सूदखोरों, महाजनों द्वारा गैर कानूनी ढ़ंग से हड़पी गई जमीनों को वापस करने का जोरदार आन्दोलन किया गया। छोटानागपुर टेनेन्सी एक्ट तथा संथाल परगना टेनेन्सी एक्ट के अतिक्रमण की हालत में उन जमीनों पर रैयतों द्वारा जमान वापसी के लिए सीधे कार्यवाही की जाने लगी। कोर्ट-कचहरियों में गरीबों को न्याय मिलना असंभव था। अतः बिनोद बिहारी महतो ने उन जमानों पर पुनः कब्जा करने की रणनीति तैयार की। उन्होनें कई जिलों में वकीलों को प्रोत्साहित किया कि वे गरीब, आदिवासी, हरिजन, पिछड़े लोगों के मुकदमें बिना फीस लिए लड़े एवं उन्हें कानूनी सहायता दें। जमीन वापसी का आन्दोलन भी बड़ा व्यापक स्तर पर चला। “धान-कटनी” का आन्दोलन उस जमीन वापसी का आन्दोलन का एक हिस्सा था। गाँव के गरीब, आदिवासी, हरिजन, झारखंड मुक्ति मोर्चा के कार्यकर्त्ताओं द्वारा संगठित किए जाते और तीर-धनुष, लाठी-भाला, टाँगी आदि से लैस होकर खेतों पर डुगडुगी बजाते-बजाते धावा बोलते और खड़ी फसल को काट देते एवं उसे ढोकर सही व्यक्ति के घर पहुँचा देते।
सांस्कृतिक आन्दोलन भी चलाए गये। झारखंड की सभ्यता संस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए जगह-जगह “झूमर” प्रतियोगिता रखी जाने लगी। झूमर एक लोक नृत्य है जिसमें झूमर के गीत गाये जाते हैं। बाजा बजाने वाले होते हैं। ढोल, नगाड़ा, माँदर, करताल, शहनाई का होना आवश्यक है। इसमें बारह ताल यानि लय होते हैं। बारह प्रकार की अलग-अलग धूनों पर नाचा जाता है। नाचने के लिए विशेष तौर पर लड़के ही नर्तकियों का रूप धरते है। दो से छः तक नर्तकियों की संख्या होती है। यह लोक-नृत्य अखाड़े में खड़े होकर सम्पन्न किया जाता है। दर्शक इसके चारों तरफ बैठते है। झारखंड क्षेत्र का यह एक प्रसिद्ध लोक-नृत्य है जो पूरे झारखंड में महशूर है। पर्व-त्योहार के अवसर पर या फिर धान की फसल काट लेने के बाद जाड़े की रातों में रातभर झूमर नाचा जाता है। उसी प्रकार अन्य लोक-नृत्य “छऊ-नृत्य” है जो विश्व-प्रसिद्ध हो चुका है। इसी प्रकार के अन्य लोक गीतों एवं लोक-संगीतो, लोक-नृत्यों को बढ़ावा देने के लिए बिनोद बाबू ने व्यापक प्रोत्साहन दिया। स्वयं रात-रात भर जागकर कलाकारों को उत्हाहित करते। नतीजा यह निकला कि झारखंड के समूचे इलाके में, गाँव-गाँव में झारखंडी सभयता-संस्कृति पुर्नजीवित हो उठा एवं इसकी गूँज दूर-दूर तक आगे बढ़ने लगी। इसके साथ-साथ झारखंड क्षेत्र के पर्व-त्योहार करमा, सोहराई, गोहालपूजा, जीतिया, टुसू, जावा आदि शहरों में प्रवेश कर गये। उन्हें भी प्रोत्साहित किया गया। पूरे झारखंड क्षेत्र की अपनी एक पहचान है, वह भी विशिष्ट जो अन्य किसी की नहीं हैं। इस प्रकार के सांस्कृतिक आन्दोलन से झारखंडी अपने आप को पहचानने लगे। उनमें आत्म-विश्वास जगने लगा। औद्योगिकरण एवं बाहरी संस्कृति के दबाव से जो संकुचन आया था, वह दूर होने लगा और वे जो श्रेष्ठ होते हुए भी हीन भावना से ग्रस्त हो रहे थे, पुनः स्वयं को आत्म-विश्वास से भरा हुआ पाने लगे।
झारखंड क्षेत्र में कुछ ऐसे लोक नृत्य है जो “मारसल आर्ट” के स्वरूप है। इसमें एक प्रमुख है- “पैका” यानि ”पाइक”। इसमें खिलाड़ी ढाल तलवार (या लाठी) से लैस होता है। पैंरों में घुँघरू बाँध लेता है और सर पर पगड़ी। धोती को कस कर कमर में बाँधा जाता है। “पैका” में जो पारंगत हो जाता है वह अकेले ही दर्जन हमलावरों को एक साथ धूल चटा सकता है। इसके दाँव-पेंच ही ऐसे होते हैं। झारखंड में पहले कुड़ंमी-महतो लोगो के प्रत्येक गाँव में “पाइक” की ट्रेनिंग दी जाती थी। इसके लिए उस्ताद होते थे, गुरू होते थे और यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलता आता है। पर दुर्भाग्य से आज यह प्रायः लुप्त हो रहा है। इसी पैका का दूसरा स्वरूप “नटुआ नाच” है। अब ढाल की जगह गमछा, तलवार की जगह लाठी ने ले लिया है। इसमें बजने वाला बाजा विशिष्ट लय एवं ताल का होता है, जिसे सुनकर ही यहाँ का झारखंडी मैदान में कूद पड़ता है।
फिर झारखण्ड मुक्ति मोर्चा ने गाँव-गाँव में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए “अकिल-अखाड़े” चलाए। सुदूर गाँव में रात्री-पाठशालाएँ लालटेनों की रोशनी में चलायी जाने लगीं। शिक्षा के लिए भी अभियान या आन्दोलन चलाए गये। जिन परिवारों के बच्चे स्कूल नहीं जाते थे उन्हें प्रोत्साहित किया जाने लगा। उस समय गाँव में शिक्षा की कोई व्यवस्था ही नहीं थी। बिनोद बिहारी महतो ने स्वंय कुल मिलाकर कितने संस्थाने खोले, यह पता लगाया जा रहा है। पर चालीस संस्था का पता चला है। जिनमें मिडिल-स्कूल, हाई-स्कूल, डिग्री कॉलेज तथा विधि विद्यालय भी हैं। ये सम्पूर्ण झारखण्ड में जगह-जगह शिक्षण संस्थान खोलने के लिए लोगों को उत्साहित करते फिरते। अपनी कमाई का अधिकत्तर पैसा इन कॉलेजों एवं स्कूलों के भवन निर्माण शिक्षकों के वेतन के लिए दान दे दिया।
इधर गाँव के झगड़े गाँव में ही पंचायत बुलाकर सुलझाए जाने लगें। प्रत्येक गाँव में यह एक आन्दोलन के रूप में खड़ा होने लगा। झारखण्डी की जीवन-पद्धति भी यही थी। फिर अगर गाँवों में नहीं सुलझ पाते तो उन झगड़ों को नेताओं क पास ले जाया जाता। फिर बड़े पैमाने पर तीन-चार गाँव के लोग मिलकर बैठते एवं फैसला किया जाता। किसी-किसी मामलें में समस्या जब नहीं सुलझती, तो इसे बिनोद बाबू के पास लाया जाता। धीरे-धीरे ऐसी व्यवस्था कायम हो गई कि झारखंड के कई इलाकों में इस प्रकार से झगड़े निपटाने के केन्द्र बन गये और उन्हें लोग स्वतः जिला-कोर्ट, हाई-कोर्ट कहने लगे। यही कारण था कि सरकारी रिपोर्टो में यह बात दर्ज है कि झारखंड मुक्ति मोर्चा द्वारा समानान्तर सरकार चलाई जा रही थी, जिसका अपना पुलिस फोर्स है एवं कोर्ट-कचहरी है। इन कचहरियों में यानि बैठकों में आपराधिक मामले दीवानी मामले तथा शादी-व्याह, तलाक से जुड़े मामले सभी पर विचार विमर्श होता था। आपराधिक मामलों में ज्यादातर फाइन किया जाता था। कभी-कभी शारीरिक दंड दिया जाता था और अपराधी को लाठियों से पिटा जाता। या अन्य प्रकार से अपमानित या प्रताड़ित किया जाता। किसी-किसी गंभीर मामले में हुक्का पानी भी कुछ दिनों के लिए बंद कर दिया जाता यानि सामाजिक बहिष्कार किया जाता। किसी-किसी मामले में जो जमींदारी अत्याचार एवं सामंती अत्याचार के खिलाफ फैसला लिया जाता, उसमे “बिटलाहा” भी कर दिया जाता। बिटलाहा का मतलब होता था, उसे गाँव से उजाड़ देना। घर-द्वार को तोड़-फोड़ दिया जाता था।
इनके अलावे जो एक सबसे बड़ा पहलू झारखंड मुक्ति मोर्चा के आन्दोलन का रहा, वह था शराब-खोरी के खिलाफ संघर्ष। इसमें कार्यकर्त्ता सीधे शराब की भट्टियों पर धावा बोलते, तोड़फोड़ कर डालते। शराबियों को पकड़कर पीटते। उन्हें पानी में डूबा-डूबा कर उसका नशा तोड़ते। कार्यकर्त्ता पता लगाते कि कौन चोरी-छिपे इस धंधे में लिप्त है, उसका पता लगाते एवं उसे धंधे को छोड़ने के लिए मजबूर करते। गाँवों में औरतों के बीच जाते और उन्हें अपने-अपने शराबी पतियों की आदत छुड़ाने के लिए प्रोत्साहित करते। औरते इस आन्दोलन का समर्थन जोरदार ढंग से करती एवं अपने शराबी पतियों से लडती झगड़ती।
इस प्रकार इन आन्दोलनों ने बहुत सारे जुझारू, लड़ाकू कार्यकर्त्ता पैदा किए। पर समाज का शोषक-शासक वर्ग चुप नहीं बैठे रह सकता था। इन आन्दोलों को कुचलने के लिए पुलिस-प्रसाशन, जमींदार, सूदखोर, महाजन, माफिया, गुंडे सभी सक्रिय हो उठे। नतीजा यह हुआ कि कई बड़े-बड़े संघर्ष हुए। चोरी-छिपे कार्यकर्त्ताओं, नेताओं की हत्याएँ की जाने लगीं। घात लाकर इन आन्दोलनों के अगुआओं को खोजकर मारा जाने लगे। शहीदों की लम्बी कतारें हो गई। पर कार्यकर्त्ता और जनता भी प्रतिकार में उतर आई। और वर्षो तक दोनों तरफ से संघर्ष चलने लगा।
1975 में ही गोमो में जिला धनबाद के सदानन्द झा शहिद हो गये। उन्हें अकेले पाकर आतताइयों ने गोली मार दी। 1977 में शक्ति नाथ महतो टाटा सिजुआ में शहीद हो गये। उन्हें काँग्रेस के गुंडों ने दिन दहाड़े बम गोलियों से मार डाला। उसी प्रकार इस कोयलाचंल में रसीक हाँसदा, नेपाल रवानी आदि दर्जनों शहीद हुए।
1975 में गोमो की रेल नगरी में सदानन्द झा शहीद हुए तथा 1977 में टाटा-सिजूआ तेतुलमुड़ी के शक्ति नाथ महतो शहीद हुए। ये दो प्रमुख कार्यकर्त्ता नेताओं की शहादत के बाद तो मानों पूरे दक्षिणी छोटानागपुर में आन्दोलन में उफान आ गया। फिर 1987 में जमशेदपुर में झारखंड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष निर्मल महतो को भी आतताइयों ने मार डाला। उनकी शहादत के बाद तो मानों पूरे दक्षिणी छोटानागपुर में आग ही लग गई। इसके अलावे इचागढ़ के अजीत महतो, धनंजय महतो आदि शहीद हुए। गुवा में 1982 में प्रसिद्ध गोली कांड हुआ जिसे आज गुआ गोली कांड के रूप में याद किया जाता है, इसके अलावे अनेकों शहीद हुए। हजारों जेल गये। रिटायर्ड आर्मी के जवान कंडुलना की पुलीस इन्काउटर दिखा कर हत्या कर दी।
संथाल परगना में भी यही हाल रहा। यहाँ उन तमाम घटनाओं का जिक्र करना संभव नहीं हैं। आम झारखंडी शोषित जनता ने भी प्रतित्चुर में हथियार उठा लिए। कई बड़े-बड़े संघर्ष पुलिस-प्रशासन के साथ हुए। महाजन, सामंतो के बिरूद्ध भी जम कर सशस्त्र संधंर्ष हुए। इस प्रकार 1990 तक आते-आते इस पार्टी के बीस विधायक एवं 1991 में छः सासंद बन गये। उन सांसदो के नाम है- श्री बिनोद बिहारी महतो, शिबू सोरेन, सूरज मंडल, शैलेन्द्र महतो, कृष्णा मार्डी, साइमन मरांडी। फिर बाद में 1992 के जून में गिरीडिह संसदिय क्षेत्र में बिनोद बिहारी महतो का निधन के बाद उपचुनाव हुआ जिसमें उनके पुत्र राज किशोर महतो सासंद बने।

Tuesday, October 26, 2010

झारखण्ड मुक्ति मोर्चा का जन्म, उसकी पृष्ठभूमि एवं विचार-धारा

झारखंड में हो रहे चौतरफा शोषण से बचने के लिए बिनोद बाबू को यह महसूस हुआ कि हमारी पहचान मिट रही थी। इसीलिए सबसे पहले अपनी पहचान बचाने का सवाल आ खड़ा हुआ था। पर यह पहचान बनेगी कैसे, इसके लिए इसकी दलित, शोषित राष्ट्रीयता को पहचान दिलाना जरूरी था। ऐसा तभी हो सकता था, जब झारखंड क्षेत्र को अलग राज्य का दर्जा मिले। एक शोषण मुक्त झारखंड की परिकल्पना के रास्ते में अलग राज्य का बनना पहला एवं बड़ा कदम होगा। फिर यहाँ से दूसरे चरण में शोषण का सफाया किया जाय। ऐसी बिनोद बाबू की अवधारणा बनी। तब इसे आर्थिक सामाजिक, प्रगति के रास्ते पर ले चलना होगा।
उपरोक्त अवधारणा एक क्रांतिकारी अवधारणा थी। एक ऐसा चिंतन था जिसे सरजमीन पर उतारना कठिन काम था। क्रांतिकारी परिवर्त्तन के लिए क्रांतिकारी परिस्थिति का होना जरूरी है। बिनोद बाबू ने पाया कि झारखंड क्षेत्र में क्रांतिकारी परिस्थिति पैदा हो चुकी थी। यहाँ के लोगों एवं मजदूरों का शोषण इतना तेज था कि कभी भी विस्फोट हो सकता था। पर इस विस्फोट के लिए लोगों को संगठित करना जरूरी था एवं सही दिशा देने की आवश्यकता थी जिसे बिनोद बाबू करना चाहते थे। यानि क्रांतिकारी परिवर्त्तन के लिए क्रातिकारी दल का गठन करना चाहते थे। यह क्रांतिकारी दल निश्चित तोर पर वैसे ही लोगों के द्वारा गठित किया जाना चाहिए, जो वास्तव में समाज में परिवर्त्तन चाहते है तथा जो क्रांतिकारी परिवर्त्तन लाना जरूरी समझते है यानि जिसे वास्तव में इस परिवर्त्तन की आवश्यकता है। सिर्फ क्रांति की बातें करने वाले शौकिया लोगों से क्रांतिकारी दल का गठन नहीं हो सकता। यानि शोषित, दलित, पिछड़े-अनुसूचित जनजाति, हरिजन, गरीब, प्रताड़ित लोगों के द्वारा ही ऐसा दल गठित होना चाहिए, जिन्हें वास्तव में अपने लिए ऊपर उठना है, जिन्हें सामाजिक न्याय पाना है। वैसे नेताओं एवं लोगों द्वारा समाज में परिवर्त्तन नहीं आ सकता जो सिर्फ सत्ता तक पहुचने के लिए झूठ, दिखावा, तिकड़म का सहारा लेकर आगे बढ़ते है। अतः उस परिस्थिति में झारखंड क्षेत्र के महतो, माँझी, मुंडा, बाऊरी, डोम, चमार, रजवार, रवानी आदि दलित जातियों में से ही संगठन बनाने के लिए बिनोद बाबू आगे बढ़े।
वैचारिक शक्ति रखने वाले बिनोद बिहारी महतो ने पाया कि प्रजातंत्र यानि डेमोक्रेसी भारतवर्ष में स्थापित होने के पहले ही दम तोड़ रहा था। कोर्ट-कचहरी तक में गरीब को न्याय मिलना असंभव था। कोर्ट-कचहरियाँ बड़े लोगों की इच्छा के अनुरूप फेसला सुना रही थी। थाना-पुलिस प्रशासन निरकुंश हो चुका था। इस परिस्थिति में जब आदिवासी एवं गैर-आदिवासी दोनों वर्ग पीस रहे थे, तो इन दोनों नेताओं ने अपने जातीय संगठन के माध्यम से अपने लोगों को जगाना शुरू किया, सचेत करना शुरू किया। दोनों जातियों के झगड़ो का फेसला समाज में पंचायत बुलाकर किया जाने लगा। दोनों समाजों का अपना-अपना कायदा-कानून बहुत पहले से बना था। इन परम्पराओं में, कस्टम में, बाइसी था कुड़मी-महतो का सर्वोच्य संगठन। महतो परगनैत, प्रमुख, परगनैत होते थे। संथालों में भी माँझी मानकी कस्टम था। समाज को चलाने के लिए अपने वसूल थे। ये कायदे सदियों से चले आ रहे थे। थाना-पुलिस या कोर्ट जो ब्रिटिश-शासन ने इस क्षेत्र में स्थापित किए थे, वहाँ जाकर न्याय पाने के लिए लोग इच्छुक नहीं थे। कालान्तर में महतो-माँझी एवं अन्य जनजातिय समुहों की पंचायत व्यवस्था क्षीण होने लगी और वर्त्तमान ब्रिटिश व्यवस्था हाबी हो गया। इन दोनों नेताओं ने फिर अपने लोगों को पुरानी पंचायत, पहड़ा परगनैत व्यवस्था की तरफ मौड़ा।
कोयलाचंल में इन दो संगठनों से प्रेरणा लेकर “मंडल-समाज” एवं “तेली-समाज” आदि संगठन पिछड़ी जातियों के लोगों के द्वारा बनाये गये।
जैसा कि हमने पहले ही देख लिया है कि 1970 तक आते-आते कोलियरियों के विस्तार के साथ-साथ कोयलाचंल में अनेक बड़े-बड़े उद्योग लगे, परियोजनाएँ बनी तथा इनके अनुसंगिक उद्योग, कल कारखाने लगाए गये। इससे मजदूरों की संख्या में भारी वृद्धि हुई। यहाँ स्थानीय ग्रामीण मजदूरों से बहुत ज्यादे बाहर प्रदेशों, उत्तरी बिहार से मजदूरो का आवागमन हुआ एवं यहाँ बसने लगे। मजदूरों के बीच मजदूर ट्रेड यूनियनों का जन्म धड़ल्ले से होने लगा। 1972 तक कोल कम्पनियों के राष्ट्रीयकरण के पहले बाहरी बिदेशी कोल कम्पनियाँ हुआ करती थी। इनमें बंगाल कोल कम्पनी, बर्ड्स कोल कम्पनी, मैकलीन बैरी आदि प्रमुख थी। इनके अलावा भारतीय कोल कम्पनियाँ टाटा कम्पनी, के0 वोरा, चनचनी ग्रुप, अर्जुन अग्रवाल ग्रुप आदि थी। इसके अलावे झारखंड क्षेत्र के दूसरे हिस्सों में औद्योगिकरण जोरों पर था।
यहाँ के ज्यादातर मजदूर काँग्रेस द्वारा संचालित इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन काँग्रेस के सदस्य होते थे कोलियरियों, उद्योगों आदि प्रतिष्ठान सिर्फ इस ट्रेड यूनियन की बातें सुनते थे। इसका नतीजा यह हुआ कि ट्रेड यूनियन के नेतागण निरंकुश हो उठे अवं मजदूरों के हित की बात नहीं करके प्रबन्धन के दलाल बन गये। माफिया-नेताओं का जन्म हुआ। इन्होने न सिर्फ मजदूरों के ऊपर सूदखोरी किया, बल्कि शराब की लत डाली। ये राजनीति में, सक्रिय हो उठे और इस कोयलाचंल का प्रतिनिधित्व विधान-सभा एवं संसद में करने लगें।
पर इसी समय इस कोयलाचंल के सिन्दरी खाद कारखाने में काम करने वाले श्री अरूण कुमार राय यानि श्री ए0 के0 राय एक नौजवान ट्रेड यूनियन के नेता के रूप में उभरे। श्री राय सिन्दरी कारखाने में एक शोधकर्त्ता वैज्ञानिक थे। सिन्दरी कारखाने एवं अन्य कारखाने के मजदूर सम्बन्धी समस्याओं से ये जूड़े रहते थे तथा प्रबंधन विरोधी रवैये के कारण एवं मजदूरों के हक में आवाज उठाने के चलते उन्हें नौकरी से हाथ धोना पड़ा।
इन्होने बिनोद बिहारी महतो जिन्हें प्यार से लोग “बाबू” कहा करते थे, का नाम सुन रखा था। उस समय बिनोद बाबू भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी में थे। ए0 के0 राय ने बिनोद बिहारी महतो से सम्पर्क साधा। नौकरी छूट जाने के बाद ए0 के0 राय बिनोद बाबू के संरक्षण में सिन्दरी में टिक गये एवं राजनैतिक गतिविधियों में सक्रिय हो उठे। ये श्री राय के अभिभावक की तरह थे। ए0 के0 राय की माता जी पश्चिम बंगाल से अक्कसर बिनोद बाबू को पत्र लिखा करती थी कि वे उनके बेटे का ख्याल रखें। बिनोद बाबू उन्हे बहुत चाहने लगे थे। उन्हे बिनोद बाबू ने कई मामलों में, मुकदमें में छुड़वाया तथा जेल में सड़ने से बचाया। यहाँ तक की बिनोद बाबू ने सिन्दरी विधान सभा सीट जो उनकी गृह-सीट थी, श्री राय के लिए छोड़ दी और 1967 में उन्हें प्रथम बार विधायक बना डाला। अपनी तैयार की हुई सीट पर उन्हें स्थापित कर दिया। स्वयं टुंडी विधान सभा की तरफ चल दिए।
श्री राय झारखंड क्षेत्र के मूल निवासी नहीं थे। बंगाल के किसी स्थान के रहने वाले श्री राय को बिनोद बाबू के संरक्षण में बहुत बड़ी उपलब्धि मिली। श्री राय ने “बिहार कोलयरी कामगार यूनियन” नामक ट्रेड यूनियन का गठन किया। श्री राय की पृष्ठभूमि वामपंथी थी। बिनोद बिहारी महतो ने 1967 में जब भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी का विभाजन हुआ, कम्युनिष्ट पार्टी (मार्क्सवादी) का दामन थामा।
बिनोद बिहारी महतो ने अपने विचारों को अमली जामा पहनाने के लिए एक नई पार्टी के गठन की बात सोची। और उन्होने शिबू सोरेन ए0 के0 राय आदि सभी कार्यकर्त्ता, नेताओं को बुलाया और बैठक की। आदिवासियों की लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें शिबू सोरेन यानि उस समय के शिवलाल माँझी उन्हें उपर्युक्त लगे। तथा मजदूर आन्दोलन को झारखंड आन्दोलन के साथ जोड़ने के लिए उन्हें ए0 के0 राय उपर्युक्त लगे।
राजनैतिक दल के नामाकरण के विषय में विचार विमर्श किया जाने लगा। बिनोद बाबू तथा शिबू सोरेन चाहते थे कि नाम में “झारखंड” शब्द अवश्य रहे। झारखंड पृथक राज्य के लिए संघर्ष करना इस राजनैतिक पार्टी का उद्देश्य होगा, यही तय किया गया था, दोनों नेताओं के द्वारा। श्री राय चाहते थे कि इसमें वर्ग-संघर्ष की अवधारणा दिखाई दे। झारखंड नामधारी कई पार्टियाँ झारखंड में कार्यरत थी, अतः एक नया नाम ढूँढना मुश्किल लग रहा था। वहीं पर उस बैठक में बिनोद बाबू के बड़े पुत्र राज किशोर महतो भी उपस्थित थे। 1968 में ईंजीनियरिंग (माइनिंग) की डिग्री धनबाद के ही इंडियन स्कूल ऑफ माइन्स से हासिल किया था, और उन दिनों धनबाद के पास ही कोलियरी में कार्यरत थे। राजनैतिक गतिविधियों खासकर शिवाजी समाज के आन्दोलनों में भी प्रत्यक्ष रूप से हिस्सा लिया करते थे। नामकरण की चर्चा के दौरान उनके मन में एक विचार आया एवं एक नाम बिजली की तरह उनके दिमाग में कौंध गया। उन्होनें उस नाम का प्रस्ताव दे डाला। वह नाम था “झारखंड मुक्ति मोर्चा” ऐसे नाम के पिछे उन्हेनें जो तर्क दिया सभी को पसन्द आ गया। तीन व्यक्ति अपनी-अपनी विचार-धारा का समावेश चाहते थे, नये नाम में, अतः यह एक मोर्चा का ही रूप ले सकता था। दूसरे इसके नाम में झारखंड शब्द भी चाहते थे और झारखंड को शोषण मुक्त करना चाहते थे, सो यह नाम सबसे उचित प्रतीत हुआ। इसमें स्थानीय झारखंडी एवं वैसे लोग जो शोषण-मुक्ति की लड़ाई लड़ना चाहते थे सभी का समावेश इसमें झलकता था। इस झंड़े का रंग जाहिर है हरा ही होना था क्योंकि श्री राय ने उन्ही दिनों “मार्क्सवादी समन्वय” नामक राजनैतिक पार्टी का गठन कर लिया था और उसे अलग से चलाना चाहते थे। झारखंड मुक्ति मोर्चा को वे सिर्फ सहयोगी दल मानकर चलना चाहते थे। बिनोद बाबू के लड़के राज किशोर महतो ने इस मोर्चे का चुनाव चिन्ह “तीर-धनुष” रखवा दिया जो झारखंड का लोकप्रिय परम्परागत हथियार के साथ-साथ उसकी पहचान भी थी। इसका विधिवत् गठन चार फरवरी 1973 को किया गया एवं बिनोद बिहारी महतो इसके प्रथम अध्यक्ष बने तथा शिबू सोरेन महामंत्री। चार फरवरी को 1973 में ही धनबाद के प्रसिद्ध गोल्फ मैदान में इसका पहला स्थापना दिवस मनाया गया। और तब से प्रतिवर्ष मनाया जाता है।

Saturday, October 23, 2010

झारखण्ड मुक्ति मोर्चा का जन्म, उसकी पृष्ठभूमि एवं विचार-धारा

वास्तव में झारखंड अलग राज्य का आन्दोलन झारखंड के शोषित-पीड़ित, दबे-कुचले, वंचित जाति-समूहों के आत्म-निर्णय का आन्दोलन था, उनकी पहचान का आन्दोलन था, अतः उनकी मुक्ति का आन्दोलन था। उन्हें मार्क्स एवं लेनिन की उक्तियाँ याद आई। लेनिन ने भी तो कहा था कि शोषित-दलित राष्ट्रीयताओं को उनके स्वालंब का अधिकार मिलना चाहिए और वाम पंथियों का यह पहला कर्त्तव्य बनता है कि उन्हें यह अधिकार दिलाएँ।
उन्होने महसूस किया कि झारखंड आन्दोलन अब तक अनुसूचित जनजातियों के नेतृत्व में ही चलाया गया है और गैर अनुसूचित जातियों एव मजदूर वर्ग में लोक प्रिय नहीं हो पाया था। एक जुझारू संगठन बना कर उन्हें एक करने की आवश्यकता थी और एक वर्ग-संघर्ष की अवधारणा के साथ आगे बढ़ना होगा। झारखंड के सोये हुए लोगों को जागरूक करना पड़ेगा, उनके मन की निराशा को दूर करना पड़ेगा। ऐसा उन्होनें सोचा।
भारतवर्ष में वर्ग-संघर्ष की अवधारणा एवं वर्ण-संघर्ष की अवधारणा में कोई खास अंतर नहीं है। यह एक तथ्य है कि उन्नीस सौ साठ के दशक तक लोग इस बात को समझ चुके थे कि भारतवर्ष में उच्च-वर्ण ही उच्च वर्ग भी है। इन चंद लोगों के हाथ में सत्ता, सम्पत्ति केन्द्रित है। अतः निम्न वर्ग में पहले चेतना जगाना जरूरी था।
इसके लिए उन्होने सबसे पहले अपने ही समुदाय कुड़मी यानि कुरमी-महतो समुदाय के लोगों को एक सूत्र में बाँधने का सफल प्रयास किया। इसके लिए 1967 में “शिवाजी-समाज” का गठन किया। यह कोई राजनैतिक संगठन नहीं था। यह एक सामाजिक संगठन था। एक सुधारवादी संगठन जो कुड़मी समाज के सुधार के लिए बनाया गया था। इसके उद्देश्य, बाल-विवाह, बहू-विवाह, झारखंड में घूसती दहेज-प्रथा, शराब खोरी इत्यादि के विरूद्ध था। इस संगठन का उद्देश्य इस समुदाय को शोषण से मुक्ति दिलाना भी था और इससे बचाना भी।
बिहार-सरकार में इस जाति को पिछड़ी (अत्यन्त) के दर्जे में शामिल किया गया था। यद्यपि इनके पास खेती लायक जमीन थी, पर शिक्षा का नितांत अभाव था। इस अज्ञानता के चलते दूसरे होशियार लोग इनकी जमीनों की लूट-मार मचाये हुए थे। सरकारी अधिग्रहण में कल-कारखानों में, खदानों में, योजनाओं-परियोजनाओं में, बाँधों में कुड़मी-समुदाय के लोगों की सर्वाधिक भूमि अधिग्रहीत की गई। इसके अलावे खरीद-बिक्री भी खूब हुई। तीसरा उद्देश्य था समाजिक प्रतिष्ठा की खोज। उच्चवर्ण के लोग ही नहीं दूसरे भी इस समुदाय को “ढ़ोड़-कुड़मी” कहते थे। इसे हेय समझते थे। बेवकूफ एवं मूर्ख समझते थे जिन्हें आसानी से बहलाया-फुसलाया जा सकता है। शिवाजी समाज के माध्यम से बिनोद बिहारी महतो ने सामाजिक न्याय की लड़ाई को आगे बढ़ाया।
पर इस समाज के कार्यो के रास्ते में बहुत विघ्न-बाधाएँ आई। समाज के प्रतिष्ठित लोग ही इसका विरोध करने लगे। बड़ी मुश्किल से कुरीतियों को रोका जाने लगा। धीरे-धीरे अपनी जाति के लोग इसके समर्थक बने। शोषण से मुक्त होने की प्रक्रिया में इस-समुदाय ने, समाज के कार्यकर्त्ताओं ने जमीन-वापसी का आन्दोलन चलाया। सूदखोर-महाजनो के खिलाफ लोग उठ खड़े हुए तथा विस्थापन के विरूद्ध इस समाज द्वारा जोरदार आन्दोलन किए जाने लगे। शिवाजी समाज के कार्यकर्त्ता शराब-खोरी के विरूद्ध, शराब भट्टीयों को उजाड़ने लगे, तोड़-फोड़ किए गये। सामाजिक रूप से दोशी पाये जानेवाले व्यक्तियों के विरूद्ध कार्यवाही की जाती थी तथा सामाजिक दंड दिया जाता था। इसमें सामाजिक रूप से सार्वजनिक स्थल, गाँव के अन्दर उन्हें शारीरिक दंड, लाठी का प्रहार या कभी-कभी सिर मुंड़ाकर घूमना भी शामिल था। कुछ दिनों के लिए कभी-कभी हुक्का-पानी भी बंद कर दिया जाता था।
इस शिवाजी समाज का अनुकरण समाज के दूसरे-समुदाय के लोग भी करने लगे। संथाल जाति के लोगों ने बिनोद बिहारी महतो की प्रेरणा से “सोनोत् संथाल समाज” नामक संगठन खड़ा किया। शिबू-सोरेन उस समय नौजवान हुआ करते थे। अपने पिता की मृत्यु के बाद वे घर से भागकर यहाँ-वहाँ भटक रहे थे। उन दिनों शिवाजी समाज धनबाद, बोकारो, गिरीडिह, हजारीबाग एवं पश्चिम बंगाल के पुरूलिया जिला तक फैल चुका था। शिबू सोरेन बिनोद बाबू के सम्पर्क में 1971 में आए। उन्होने शिबू सोरेन के “सोनोत् संथाल समाज” का नेतृत्व संभालने के लिए आगे बढ़ाया। फिर यह संगठन भी उसी प्रकार सक्रिय हो उठा जिस प्रकार शिवाजी समाज सक्रिय था। खासकर शराब खोरी के खिलाफ आन्दोलन छेड़ा गया। फिर आदिवासी महिलाओं के विरूद्ध होने वाले शोषण, जुल्म तथा बलात्कार आदि के खिलाफ यह संगठन बखूबी काम करने लगा। इस आन्दोलन के चलते शिबू सोरेन एक सशक्त आदिवासी नेता के रूप में उभरकर सामने आए। शिबू सोरेन को बिनोद बाबू ने आर्थिक सहायता के साथ-साथ नैतिक समर्थन एवं संरक्षण दिया। शिबू सोरेन का नाम वास्तव में “शिवलाल माँझी” था और बाद में शिबू सोरेन बने। बिनोद बाबू के आवास में ही उनका डेरा-डंडा था।
इधर बिनोद बिहारी महतो ने देखा कि झारखंड क्षेत्र की जनता लाल झंड़े को स्वीकार करने में कठिनाई महसूस कर रही थी। मार्क्सवाद, लेलिनवाद की पेचीदगी को समझना झारखंड़ी जनता के वश में नहीं था। इनकी पेचिदा थ्योरी अनपढ़ भोले-भाले झारखंड़ियों, संथाल, महतो आदि समुदायों के लिए समझ पाना टेढ़ी खीर थी। लोग अन्याय के खिलाफ लड़ना तो चाहते थे, पर उनमें लाल झंड़ा स्वत-स्फूर्त जजबात पैदा नहीं कर पा रहा था।
शिवाजी समाज बनाने का उद्देश्य स्पष्ट था। कुछ लोग भ्रांति पैदा करने का काम भी करने लगे। कहने लगे थे कि बिनोद बाबू कुड़मी-महतो को क्षत्रिय बनाना चाहते हैं या फिर अपना मूल शिवाजी को मान रहे हैं यह बात लोगों को शायद पता नहीं कि झारखंड़ में जो व्यापक रूप से सरकारी शोषण एवं अन्य शोषक आतंक फेलाए हुए थे, उसका जवाब किस प्रकार दिया जाय। इतने बड़े अन्याय का मुकाबला उसी हालात में किया जा सकता था, जबकि यहाँ की बहुसंख्यक जाति कुड़मी-महतो को लड़ाकू बनाया जाता। उनके दिल से डर एवं आतंक को हटाया जाय। यह तभी संभव था जब उन्हें सीधी लड़ाई में उतारा जाय। शिवाजी दुनियाँ के मशहूर गुरिल्ला युद्ध के प्रणेता थे। अपने कम संख्या के सिपाहियों से औरंगजेब की बड़ी सेना का मुकाबला उन्होंने छापा-मार युद्ध की तकनीक विकसित करके ही किया था। इससे प्रेरित होकर ही अपने समाज का नाम शिवाजी समाज रखा। यह एक संयोग ही था कि शिवाजी भी कुनबी जाति के थे, जिस जाति को उस समय अछूत समझा जाता था। कोंकण इलाके का पहाड़ी जीवन, झारखंड़ क्षेत्र के पहाड़ी जीवन से काफी मिलता जुलता भी है। धनबाद, गिरीडिह, बोकारो, हजारीबाग ही नहीं बल्कि पश्चिम बंगाल आदि जगहों में यह समाज काफी सक्रिय हो उठा था। 1973 में बिनोद बिहारी महतो को सबसे चर्चित व्यक्ति माना जाने लगा था।
उन्हें आतंकवादी नेता कहा जाने लगा था। धन-कटवा नेता भी कहा जाता रहा था। शिवाजी समाज के बैनर में ज्यादे सशक्त लड़ाई शुरू हो गई थी। बीस-पच्चीस वर्षो में लाल झंड़े के माध्यम से बिनोद बाबू जो काम करने में अक्षम रहे थे, मात्र तीन-चार वर्षो के शिवाजी समाज के आन्दोलन ने कर दिखाया था। इसी प्रकार “सोनेत् संताल समाज” ने भी क्रांतिकारी काम मात्र दो-तीन वर्षो में कर डाला। इन दो संगठनों का व्यापक प्रभाव संथाल परगना एवं छोटानागपुर उत्तरी में पड़ा।

अध्याय- सात

झारखण्ड मुक्ति मोर्चा का जन्म, उसकी पृष्ठभूमि एवं विचार-धारा
उन्नीस सौ सत्तर तक के झारखण्ड की स्वात्तता आन्दोलन का नेतृत्व अनुसूचित जनजाचि के लोगों ने किया। गैर-अनुसूचित जनजाति इस प्रकार के आन्दोलन से बहुत ज्यादे नहीं जूड़ पाये थे। इसका कारण पृथकतावाद की नीति रही और आन्दोलन के शुरूआती दौर के नेताओं की अदूरदर्दिता। झारखणड आन्दोलन के शुरूआती दौर में नेतृत्व की बागडोर उन नेताओं के हाथ में रहा जो अनुसूचित जनजाति के साथ-साथ ईशाई थे। ईशाई मिशनरियों ने वैसे जनजातियों को शिक्षा-प्रदान की जो ईशाई बनने लगे थे एवं ये लोग उच्च शिक्षा भी प्राप्त करने लगे। अतः इनका आगे आना स्वाभाविक था। दूसरी जनजातियाँ जो ईशाई नहीं बने, वे इससे वंचित रहे। वस्तुतः झारखण्ड आन्दोलन को ईशाई-मिशनरियों द्वारा उठाया गया आन्दोलन भी कहा जाता रहा था। इन मिशनरियों एवं उपनिवशवादी अधिकारियों ने अनुसूचित जनजाति एवं अन्य को यानि “आदिवासी” एवं गैर-आदिवासी को इस क्षेत्र का मूल निवासी नहीं मानकर अलग-अलग माना। “आदिवासी-आन्दोलन” को “दिकुओ” के विरूद्ध भी चलाया गया। इस नीति का दुष्परिणाम स्वतंत्रता प्राप्ति के कई वर्षो बाद भी बना रहा। “दिकु” उन्हें कहा जाता था, जो आदिवासियों को “दिक्-दिक्” यानि तंग किया करता था। यह एक आम जुमला आदिवासियों के मुँह पर जढ़ गया था। कुछ राजनैतिक दलों द्वारा आदिवासी एवं गैर-आदिवासी के बीच दरार पैदा करने की कोशिश भी की गई। अतः अगर हम कहें कि 1970 तक झारखण्ड आन्दोलन का मुख्य स्वरूप जातीय रहा तो कोई अतिशोयुक्ति नहीं होगी।
1970 आते-आते जैसा कि हमने देखा झारखंड क्षेत्र के सामाजिक आर्थिक एवं राजनैतिक परिवेश में व्यापक बदलाव आ गया। झारखंडवासियों की पहचान ही मिटने का खतरा पैदा हो गया। न सिर्फ आदिवासी बल्कि गैर-आदिवासी का भी जीवन प्रभावित होने लगा, वह भी समान रूप से। औद्योगिकरण के चलते इन दो वर्गो की विशिष्टता यानि सांस्कृतिक विशिष्टता अस्पष्ट होने लगी और क्षेत्रीय समस्याओं के प्रति उनकी धारणाओं में समानता या निकटता आई। धीरे-धीरे “झारखंड आन्दोलन” जो सिर्फ आदिवासी आन्दोलन समझा जाता रहा था या फिर झारखंड शब्द आदिवासियों में प्रिय था, धीरे-धीरे अन्य लोगों को भी ग्राह्य होने लगा।
यहाँ जनजातिय समूहों में कुड़मी-महतो का विशेष आकर्षण इस झारखंड आन्दोलन के प्रति पनपा। एक तो जनजाति होने की वजह से ये स्वयं को तथा कथित आदिवासी समुदाय, खासकर संथाल समुदाय के बहुत नजदीक महसूस करता था। इसके कुछ ऐतिहासिक कारण भी हैं, जिसकी चर्चा हम कभी बाद में करेंगे। उत्तरी छोटानागपुर, पश्चिम बंगाल, संथाल परगना एवं सिंहभूम के कुछ इलाकों तथा समीपवर्ती उड़ीसा में भी संथालों एवं कुड़मी महतो जनजाति में काफी घनिष्ठता दिखाई पड़ती है। उसी प्रकार अन्य हिस्सों में कुड़मी मुंड़ा जनजाति के साथ-साथ रहता आया है।
जनजातीय एक रूपता के अलावे औद्योगिकरण के विस्तार ने समान रूप से प्रताड़ित गैर-आदिवासी भी क्षेत्रीयता के विचार से प्रभावित होने लगे थे।
झारखंड मुक्ति मोर्चा का उदय 1972-1973 में हुआ। इसका पहला अधिवेशन चार फरवरी 1973 को धनबाद जिला स्थित धनबाद गोल्फ मैदान जो धनबाद जिले के मुख्यालय के पास है, वहीं हुआ। इसे स्थापना दिवस के रूप में मनाया गया।
झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रणेता तथा संस्थापक एवं प्रथम अध्यक्ष श्री बिनोद बिहारी महतो हुए। बिनोद बिहारी महतो पेशे से वकील थे तथा कुड़मी-महतो समुदाय से आते थे। इनका जन्म सरकारी दस्तावेजों तथा स्कूली सर्टीफिकेटों में तेईस सितम्बर उन्नीस सौ तेईस दर्ज है। वैसे यह उनकी सही जन्म तिथि नहीं। कोई-कोई कहते हैं कि यह वर्ष 1921 था। इनका जन्म ग्राम बड़ादाहा, प्रखण्ड बलियापुर, जिला धनबाद, तत्कालिन प्रदेश बिहार में हुआ। इनके पिता का नाम माहिन्दी महतो ऊर्फ महेन्द्रनाथ महतो एवं माता का नाम मन्दाकिनी देवी था। इनकी पत्नी पास के ही गाँव बंदरचुँआ की थी। एवं उनका नाम फूलमनी देवी था।
इनका जन्म एक साधारण किसान परिवार में हुआ। पढ़ने लिखने की कोई परम्परा इनके गाँव में नहीं थी, न ही कोई विद्यालय था। इनके गाँव में ज्यादातर लोग कुड़मी, कुछ रजवार, एक दो घर डोम, मोची तथा एक परिवार लोहार तथा पास में एक छोटा टोला संथालों का भी था। सभी लोग खेती-बाड़ी कर लेते थे। माहिन्दी महतो अनपढ़ थे और अपने बच्चों को पढ़ाना-लिखाना उनके बस के बाहर था। बिनोद बिहारी महतो के एक छोटे भाई थे तथा तीन छोटी बहनें थी।
बिनोद बिहारी महतो के मन में पढ़ने-लिखने की अद्भूत ललक थी। इन्होनें बड़ी कठिनाई से प्राइमरी शिक्षा बलियापुर से, हाई स्कूल की शिक्षा धनबाद एच0 ई0 स्कूल से पूरी की। इन्होनें 1941 में मैट्रीक परीक्षा पास की। इसके बाद कई छोटे-छोटे काम किए। शिक्षक का काम भी किया। टाइप-राइटर में टंकन का भी काम किया। अंतत इन्हें धनबाद समहरालय में किरानी की सरकारी नौकरी मिली। फिर नौकरी छोड़ी। पी0 के0 राय कॉलेज कतरास से इन्टर की परीक्षा पास की तथा राँची कॉलेज राँची से स्नातक की डिग्री आर्टस विषय में ली। 1955 में पटना लॉ कॉलेज से कानून की डिग्री हासिल की। 1956 से जिला कोर्ट धनबाद में अपनी वकालत शुरू किया।
राजनिति में इनकी रूची छात्र-जीवन से ही रही। 1952 के पहले आम-चुनाव में ये बिहार विधान सभा के लिए खड़े हुए। फिर भारतीय कम्यूनिष्ट पार्टी का विभाजन हुआ तो मार्क्सवादी कम्यूनिष्ट पार्टी में चले आए। 1971 में ये धनबाद लोक-सभा सीट से सी0 पी0 एम0 के टिकट से चुनाव लड़े एवं द्वितीय स्थान पर रहे थे। स्थानीय निकायों जैसे धनबाद म्युनिसिपैल्टी बलियापुर प्रखण्ड, धनबाद जिला परिषद् आदि के लिए भी 1971 तक चुनाव लड़े एवं सदस्य तथा पदाधिकारी बने।
अपने जीवन में पच्चीस वर्षो तक वामपंथियों के साथ रहने के बाद और धनबाद लोक सभा में द्वितीय स्थान प्राप्त करने के बाद भी तथा अनेक प्रकार के नक्सली संगठनों से समंबन्ध रखने के बाद भी बिनोद बिहारी महतो ने झारखंड नामधारी पार्टी का गठन क्यों किया, यह एक विचारनीय विषय है।
मार्क्सवादी कम्यूनिष्ट पार्टी को छोड़ने का निर्णय उन्होनें कोई एक दिन में नहीं ले लिया था। वर्षो के अन्तराल के बाद उन्होनें पाया कि भारतवर्ष में वमपंथी वर्ग-संघर्ष सिर्फ एक नारा बनकर रह गया है। मार्क्सवादी लाल झंडा समाज के उच्च-वर्ण, उच्च-वर्ग, शोषक-शासक वर्ग के हाथों में खेल रहा है। परजीवी-उनुत्पादक वर्ग ही समाज के उत्पदक वर्ग पर राज कर रहा है। उनकी नजर झारखंड के उत्पादक वर्ग, आदिवासी, मूलवासी, सदान, हरिजन, पिछड़ो एवं मजदूर-वर्ग की ओर घूम गई एवं एक नये दृष्टिकोण से उन्होने सोचा।
उन्होने झारखंड क्षेत्र को लक्ष्य करके अंतरराष्ट्रीय वामपंथी अवधारणा को छोड़ा और सोचा कि अगर झारखंड के लोगों के साथ न्याय नहीं हुआ, शोषण चलता रहा और वे न्याय नहीं दिला सके, तो पूरे विश्व की गांरटी कौन लेगा। उन्होने अपने झारखंड के इतिहास, भूगोल पर नजर डाली, तो उन्हें बड़ा सदमा पहुँचा।

Thursday, September 23, 2010

अध्याय छः

झारखण्ड क्षेत्र में असमान विकास एवं झारखंडियों का विनाश –
राज्य पुर्नगठन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के सम्बन्ध में कोई कार्यवाही नहीं की गई। सोलह वर्षो बाद विकास बोर्ड का गठन हुआ। छोटानागपुर संथाल परगना विकास प्राधिकरण 1971 । कुछ अन्य सिफारिशों की अनदेखी कर दी गई। अनुसूचित क्षेत्रों को न सिर्फ उसी प्रकार रहने दिया गया, बल्कि उनका क्षेत्र भी बढ़ा दिया गया।
इस आयोग ने झारखंड वासियों के साथ न्याय नहीं किया था। झारखंड आन्दोलन को सिर्फ आदिवासियों का आन्दोलन कहकर इस पवित्र आन्दोलन के मुँह पर तमाचा मारा था। इस आयोग ने झारखंडियों के हक की बात नहीं करके उत्तर बिहारियों तथा उन लोगों के हित की बात की थी जो झारखंड क्षेत्र को पिछड़ा बनाकर रखना चाहते थे। यह कितनी बड़ी त्रासदी है कि अगर सही विचार किया जाता तो 1956 में ही यहाँ अलग प्रदेश का गठन हो गया रहता।
झारखंड में औद्योगिक मजदूरों की संख्या बढ़ी। अनुसूचि जनजाति की संख्या में साक्षरता बढ़ने लगी। इसका प्रमुख कारण मिशनरियों की शैक्षणिक गति विधियाँ है। अनुसूचित जनजाति की जनंख्या में 35% साक्षरों ने औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की थी। गैर-आदिवासी जमसंख्या में यह प्रतिशत 32.2 प्रतिशत थी। 1970 के आसपास साठ के दशक में शिक्षित युवकों के बीच बेरोजगारी की समस्या गंभीर हो गई थी। वैसे संथाल परगना के ग्रामिण क्षेत्रों में अभी भी काफी कम शैक्षणिक सुविधाएँ उपलब्ध है।
झारखंड के जिलों में उपलब्ध चिकित्सा सुविधा का औसत बिहार के औसत से कम होने लगा। झारखंड क्षेत्र की उपेक्षा के चलते ऐसा होने लगा।
जो बड़ी-बड़ी पन बिजली एवं कोयला-आधारित विद्युत परियोजनाएँ बनी, उनकी बिजली झारखंड क्षेत्र में कम, उपयोग की गइ एवं बाहर भेजी जानी लगी।
यहाँ के उद्योगिकरण के कारण बाहर से आये लोगों को बड़ी तादाद में नौकरियाँ मिली। ठीका, रोजगार सभी मिला। झारखंड के मूलवासियों की घोर उपेक्षा हुई।
आर्थिक रूप से इन उद्योगों, कल कारखानों, खदानों, परियोजनाओं का कोई लाभ झारखंडिवासियों को नहीं मिलने लगा, उल्टे उनका विनाश हुआ, एवं शोषण के शिकार हुए।
आर्थिक परिवर्त्तनों के अलावे जातीय समीकरण में भी बहुत बड़ा अंतर पैदा किया जाने लगा। झारखंड की, एकरूपता को इसकी सभ्यता एवं संस्कृति को तोड़ने के लिए शासक वर्ग ने अनेकों षड़यंत्र किए। अनेकों अनुसूचित जनजातियों को अनुसूचित जनजाति की सूचि से हटाया गया। इसमें प्रमुख जाति कुड़मी-महतो थी। फिर कोल एवं गौड़ को भी हटाया गया। इस क्षेत्र को क्रमशः आदिवासी अल्पसंख्यक बना दिया गया। यह इसिलिए किया गया ताकि आदिवासियों को यानि अनुसूचित जनजातियों को जमीन संबंधी जो सुरक्षा छोटानागपुर टेनेन्सी एक्ट एवं संथाल परगना टेनेन्सी एक्ट द्वारा प्रदान की गई थी, उनके दायरे से उन जातियों को अलग कर दिया जाय जिनके पास सार्वाधिक जमीनें थी। ऐसा इसीलिए कि सरकार को यहाँ औद्योगिकरण के लिए आसानी से जमीन उपलब्ध हो सके। सिर्फ कुड़मी-महतो समुदाय जो 1950 तक अनुसूचित जनजाति की सूचि में था, उस समुदाय की जनसंख्या झारखंड क्षेत्र में पच्चीस प्रतिशत थी । उनके हाथ में झारखंड की सार्वाधिक जमीनें थी। इनकी जमीनों पर कल-कारखानें खोले गये, बाँध-बाँधे गये। परियोजनाएँ लगाई गई। शहर बसाये गये। बाहर से आये हुए लोगों ने धड़ल्ले से इनकी जमीनें खरीदी।
इस प्रकार अनेक जातियों का योजनाबद्ध ढंग से शोषण किया गया। इन जनजातियों के अनुसूचित सूची से हटाने के कारण, ये जातियाँ सनातन धर्म की ओर मुखातिब होने लगीं।
हिन्दू धर्मावलम्बी लोग पीछे पड़ गये। इन जातियों को कभी शुद्र, कभी वैश्य एवं कभी क्षत्रिय बनाने की बात करने लगे। जनेऊ धारण कराने की बात करने लगे। उन्हें समझाया जाने लगा कि वे जनजाति नहीं है। दूसरी तरफ अन्य प्रमुख जनजातियाँ मुंड़ा, उराँव आदि ईशाई-धर्म की ओर मुखातिब होने लगे।
एक ही क्षेत्र में सदियों से रहने वाले प्रकृति पूजक आबादी जब देवताओं, भगवानों की पूजा करने लगी। लोग मंदिरों में जाने लगे, जेस्स काइस्ट के चेले हो गये, पादरी बनने लगे, नन-ब्रदर बनने लगे। गिरजाघरों को बनने का सिलशिला चालू हो गया। यहाँ के प्रकृति पूजक, एक सभ्यता-संस्कृति के लोग अलग-अलग कर दिए जाने लगे।
जो 1950 ईस्वी के बाद बचे-खूच अनुसूचित जनजाति के लोग थे उन्हें सुरक्षा प्रदान करने के लिए सेड्यूल एरिया रेगुलेशन लाया गया। इसका एक दुश्प्रभाव यह हुआ कि आदिवासियों एवं गैर-आदिवासि मूलवासियों खासकर उनमें जो पहले आदिवासी सूची में थे, बड़ा विभेद एवं विद्वेश पैदा होने लगा। उनमें अलगा की भावना बढ़ गई।
विभिन्न क्षेत्रों मे झारखंडियों का घोर शोषण एवं उपेक्षा की गई। नतीजा यह निकला कि धनी झारखंड क्षेत्र के वासी गरीब होते गये। कोई भी अखिल भारतीय स्तर की राजनैतिक पार्टी यहाँ की समस्याओं से रूबरू नहीं होना चीहती थी। उलटे यहाँ राजनैतिक उपनिवेश बनाया जाने लगा।
देश में पहले से ही उन्नत क्षेत्रों को अधिक सुविधाएँ दी गई है तथा जो अब अविकसित पहाड़ी क्षेत्र हैं, जनजाति क्षेत्र है, उन्हें विकास से दूर रखा गया। जिन्हें सबसे अधिक आवश्यकता थी देश की मूल-धारा से जुड़ने की, उन्हें पीछे धकेला गया।
झारखंड की तो पहचान ही मिट रही थी। इस क्षेत्र का चौतरफा शोषण हो रहा था। आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक शोषण। झारखंड क्षेत्र एक आंतरिक उपनिवेश बन चुका था।
यह तो सही है कि झारखंड क्षेत्र के लोग अनेकों सियासी चालों के शिकार हुए थे, पर झारखंड क्षेत्र के लोगों के हृदय में सुलगती रही गहरी निराशा की आग को कानूनी मिमांशा, राजनैतिक तर्क या कुतर्क या राजनैतिक कुटता से दबाया नहीं जा सकता था। केन्द्र सरकार एवं राज्य सरकार की उपेक्षापूर्ण नीति एवं इस क्षेत्र की समस्याओं को समाप्त करने के लिए किसी कारगार नीति का नहीं बनाया जाना, तथा उल्टे इस क्षेत्र के लोगों की सम्पत्ति को लूट कर उनका चौतरफा शोषण करने की प्रवृति ने आग में घी का काम किया। झारखंड क्षेत्र को सभी लोगों ने पिछड़ा बनाकर रखा था और अभी तक पिछड़ा है। ऐसा केवल इसलिए ताकि यह क्षेत्र एक आतंरिक उपनिवेश बना रहे ताकि बाहरी ताकत के लिए एक लाभदायक एवं शोषण के क्षेत्र के रूप में रह सके। बिहार-मूल के लोगों एवं देश के दूसरे प्रदेशों के लोगों का लालच एवं निहित स्वार्थ हरेक प्रकार से इस क्षेत्र के विकास में बाधक है। कॉलोनीवाद के सभी तरीके इस क्षेत्र की जनता के ऊपर आजमाए गए जो उनकी शक्ति एवं मनोबल के आधारों को भी क्षति पहुँचा रहे हैं।
राजनैतिक सत्ता या प्रतिनिधित्व का चेहरा बदलने लगा था। 1960 के दशक में झारखंड में झारखंडी नामधारी दलों के कमजोर हो जाने के बाद यह परिवर्त्तन बड़ी तेजी से होने लगा था। 1962 में चीन द्वारा किए गये भारत पर आक्रमण के कारण एक राष्ट्रीय आपदा आई। इस राष्ट्रीय आपदा ने भारत के विभिन्न हिस्सों को एक साथ एक दिशा में सोचने पर मजबूर किया। इस घटना ने राष्ट्र के विभिन्न भागों को इस तरह से एक सूत्र में पिरोया कि पृथक तामिलनाडू राज्य बनाने की तत्कालीन माँग को लम्बित करना पड़ा। नागालैंड और मिजोरम को स्वतंत्र राज्य बनाने की पूर्वोत्तर क्षेत्र की माँग भी आम क्षेत्र के लोकतांत्रिक संस्थाओं के अनवरत प्रयास के फलस्वरूप दब कर रह गई। “दार्जलिंग गौरखालैंड पर्वतीय परिषद्” गठित करने के फलस्वरूप गौरखालैंड की माँग दब कर रह गई।
बोड़ोलैंड, नागालैंड, खालिस्तान आदि के माँग की तरह झारखंड के आन्दोलन को राष्ट्रीय एकता में बाधक समझा गया था और इसे अलगादवादी आन्दोलन करार दिया गया था। 1962 के भारत पर चीन के हमले एवं 1965 में भारत पाकिस्तानी हमलें यानि युद्ध की वजह से यह आन्दोलन सुस्त पड़ गया।
छोटानागपुर तथा संथाल परगना में विकास सम्बन्धी कार्यक्रमों का प्रभाव बढ़ता जा रहा था। इस विकास सम्बन्धी प्रक्रिया में अखिल भारतीय दल – काँग्रेस, जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी, भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी शोसलिस्ट पार्टी आदि सक्रिय हुए और इन्होनें झारखंड में अपनी स्थिति मजबूत की। 1967 के चुनाव में जनसंघ ने भी कुछ सीट इस क्षेत्र से जीते थे। मध्य-प्रदेश एवं उड़ीसा में आदिविसियों के हितो की रक्षा के लिए कुछ प्रतिनिधित्व दिया गया था। इससे यह धारणा बनने लगी कि आदिवासी हितों की रक्षा करने के लिए उन्हें सरकार में प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए तथा यह काँग्रेस के विचारों के साथ चलकर ही किया जा सकता था संभवत इसी कारण श्री जवाहरलाल नेहरू के कहने पर श्री जयपाल सिंह ने आन्दोलन का रास्ता छोड़ मंत्रीपद की कुर्सी संभाली।
साठ के दशक में कई रोचक पहलू देखने को आए। इस क्षेत्र की राजनीति में विशिष्ट परिवर्त्तन आया। नक्सलवादी आन्दोलन के प्रभाव यहाँ पड़ने लगे। भारी संख्या में यहाँ वामपंथी दलों का आगमन शुरू हुआ। राज्य पुर्नगठन आयोग की रिपोर्ट के बाद तथा झारखंड राज्य की माँग को काँग्रेस की सरकार द्वारा ठुकरा दिए जाने के बाद, वामपंथी दलों को घूसने का भारी मौका मिला। उत्तरी छोटानागपुर संथाल परगना, सिंहभूम आदि सभी जगहों पर वाम पंथी सक्रिय हुए। जहाँ-जहाँ औद्योगिक प्रतिष्ठान, कल कारखाने, खदानों खुलने लगी एवं मजदूरों-विस्थापितों की संख्या बढ़ी, उनका काफी प्रभाव बढ़ा।

Thursday, September 9, 2010

राज्य पुर्नगठन आयोग की रिपोर्ट एवं झारखंड आन्दोलन के प्रभाव –

आयोग ने यह भी विचार व्यक्त किया कि संविधान में प्रदत्त पाँचवीं सूची में किए गये मौजूदा प्रबन्ध उचित एवं संतोषप्रद हैं।
इसके अलावे आयोग ने यह विचार व्यक्त किए कि जैसा कि संविधान सभा की उपसमिति ने सिफारिश की है, जनजातीय लोगों को मंत्रीमंडल समेत प्रशासन की सभी शाखाओं में पर्याप्त रूप से भागीदारी होनी चाहिए और न केवल आर्थिक तथा शैक्षिक उन्नति पर ही बल्कि निवारात्मक राजनीतिक व मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर भी विचार किया जाना चाहिए।
इसके अलावे आयोग ने यह भी सुझाव दिए कि छोटानागपुर डीविजन के लिए विशेष विकास बोर्डो के प्रश्न पर भी विचार किया जाना चाहिए।
संक्षेप में कहे तो हम पाते हैं कि राज्य पुर्नगठन आयोग ने जनजातीय भावना के दृष्टीकोण से छोटानागपुर एवं संथाल परगना को स्वायत्तता प्रदान करने के प्रश्न पर विचार किया। उसने इस तथ्य को अनदेखा कर दिया कि छोटानागपुर एवं संथाल परगना क्षेत्रों की स्वायत्ता का समर्थन दो स्थानीय पार्टियाँ जनता पार्टी तथा लोक-सेवा संघ ने किया था जो कि मुख्यतयाः गैर-जनजातीय थी। झारखंड पार्टी तथा काँग्रेस के कुछ तत्वों समेत इन पार्टियों ने जिन्होंने थोड़ी सी स्वायत्तता का समर्थन किया था, इसके लिए क्षेत्र का बहुमत प्रकट किया। अलग राज्य की माँग से अलग हटकर संविधान की पाँचवी अनुसूची का प्रयोग करके विकास की बात करके स्वायत्तता प्रदान करने की बात कही है। इसके विरूद्ध स्वर्गीय राम नारायण सिंह सांसद अध्यक्ष छोटानागपुर संयुक्त संघ ने राज्य पुर्नगठन आयोग द्वारा किए गये तर्को का जोरदार खंड़न किया, जो आज इतने वर्षो बाद भी सही निकला। जब झारखंड मामलों से संबंधित समिति ने मई 1990 में अपनी रिपोर्ट दी तो राज्य पुर्नगठन आयोग की दी गई रिपोर्ट को गलत ठहराया।
झारखंड आन्दोलन ने कई उतार-चढ़ाव देखे है। झारखंड पार्टी ने उन्नीस सौ बावन – उन्नीस सौ सन्तावन में भारी सफलता हासिल किया। पर उन्नीस सौ बासठ के आम चुनाव में झारखंड के पक्ष में पड़े मतों में भारी गिरावट आई एवं यह संख्या घटकर आधी रह गई। बिहार विधान सभा में इसके नतीजे अच्छे नहीं हुए और सीटों की कुल संख्या घटकर बीस रह गई। इसका कारण निश्चित रूप से राज्य पुर्नगठन आयोग की प्रतिकुल रिपोर्ट है जिसने अलग राज्य की अनुशंसा नहीं की। इससे इस क्षेत्र के लोगों के दिलों पर यह बात घर कर गई कि झारखंड अलग राज्य का निर्माण नहीं हो सकता। इसीलिए मतदाताओं ने निराश होकर सोचा कि अब झारखंड नामधारी दलों को वोट देने से कोई लाभ नहीं होगा। निराश का संचार हुआ। स्वाभाविक था कि उनका झुकाव अखिल भारतीय पार्टियों की तरफ हुआ। क्षेत्रीय झारखंड नामधारी दल के नेताओं में गहरी निराशा बैठ गई। जब तक काँग्रेस नहीं चाहेगी, अलग राज्य नहीं बन सकता।
अतः श्री जयपाल सिंह ने काँग्रेस पार्टी के साथ समझौता कर लेना ही बेहतर समझा। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के समझाने पर श्री जयपाल सिंह उन्नीस सौ तिरसठ में काँग्रेस में शामिल हो गये। अधिकांश झारखंड पार्टी के नेता भी काँग्रेस में शामिल हो गये। झारखंड अलग राज्य की माँग को जबरजस्त झटका लगा।
श्री जयपाल सिंह को काँग्रेस ने बिहार में केबिनेट मंत्री, तत्कालीन मुख्यमंत्री विनोदानन्द झा के नेतृत्व में बना दिया। भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के ईशारे पर यह किया गया। श्री एस0 के0 बागे जो जयपाल सिंह के प्रमुख कप्तान थे, इगनियस कूजूर दूसरे नम्बर के प्रमुख नेता थे, पाँच विधायकों के साथ “झारखंड पार्टी” से अलग हो गये थे। परन्तु कुछ ही समय बाद कामराज प्लान के तहत तत्कालीन मुख्यमंत्री बिहार को स्तीफा देना पड़ा एवं उनके प्रतिद्वन्दी के0 बी0 सहाय मुख्यमंत्री बने। एस0 के0 बागे, के0 बी0 सहाय के साथ हो गये और केबिनेट मंत्री बन गये। जयपाल सिंह की कुर्सी छिन गई।
एक बार फिर जयपाल सिंह ने काँग्रेस छोड़कर झारखंड पार्टी को पुर्नजीवित करने का प्रयास किया। पर उन्नीस सौ सढ़सठ के चुनाव (1967) में इसे एक भी सीट नहीं मिली। संसद में भी कोई नहीं जा सका। जस्टिन रिचर्ड एवं एस0 हेम्ब्रम ने झारखंड पार्टी को एक और टुकड़ा किया। इन्होने “हूल झारखंड” पार्टी बनाया। इन्होने 1969 के मध्यावधि चुनाव में सात विधान सभा की सीटें जीती।
कुछ लोगों ने श्री जयपाल सिंह पर आरोप लगाया कि उनका काँग्रेस में शामिल होने का निर्णय निजी स्वार्थ से प्रेरित था तथा अपनी सुख सुविधाओं के लिए उन्होंने काँग्रेस का दामन थामा। पर एक बात गौर करने की बात है कि राज्य पुर्नगठन आयोग के विपरीत अनुशंसा करने से उनको भी धक्का लगा ही होगा। चाहे जो भी हो इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि जयपाल सिंह ने इस क्षेत्र के लोगों को जगाकर खासकर आदिवासी समुदाय को उनके हक एवं अधिकार के लिए तैयार किया था। लड़ा था। लोगों में चेतना जगाई थी। “माराँग गोमके” कहलाने का श्रेय प्राप्त किया था। परन्तु दुर्भाग्य यह रहा कि माराँग गोमके की कमजोरी का फायदा उठाकर काँग्रेस ने उन्हें तथा झारखंड आन्दोलन को ही काफी अरसे तक सुला दिया।
झारखंड आन्दोलन एक टूटे हुए शीशे की तरह बिखर गया। इसके कई नेता हो गये। श्री एन0 ई0 होरो, श्री बागुन सोमबुराई, सेत हेम्ब्रम, मोजेश गुड़िया (बिरसा सेवा दल) आदि। 1963-68 तक तीन दलों ने झारखंड आन्दोलन का नेतृत्व करने का दावा किया। 28 दिसम्बर 1967 को अखिल भारतीय झारखंड पार्टी गठित की गई। 1968 में पुनः पुरानी झारखंड पार्टी में भारी फूट पड़ गई। छोटानागपुर के आदिवासियों से अलग होकर संथाल परगना के संथालों ने अपने आप को अलग कर लिया। और एक अलग पार्टी हूल झारखंड बना लिया। इस चरण का एक और पहलू हुआ शिक्षित आदिवासियों के नेतृत्व वाले नपरीय प्रभाव वाले दलों का उभरना। ये विकसित हुए जो कि आदिवासी युवकों को प्रशासनिक एवं औद्योगिक संस्थानों में रोजगार प्रदान किए जाने की माँग करने के लिए, जो औद्योगिक परिसरों मे केन्द्रित थे। वास्तव में यह माँग एक आम माँग बन गई। बिरसा सेवादल श्री मोजेश गुड़िया के नेतृत्व में छठे दशक के अंतिम वर्षो (1967) में एक महत्वपुर्ण दल के रूप में उभरा। झारखंड पार्टी श्री एन0 ई0 होरो के नेतृत्व में चलने लगी।
कहने का तात्पर्य यह है कि झारखंड अलग राज्य की माँग एक सुविधावादी माँग में बदल गई। नेतागण या तो मंत्रीपद लेने में, विधायक या सांसद बनने में, रोजगार लेने में, ठीका लेने में, आदिवासियों के लिए सरकार में प्रतिनिधित्व लेने में या फिर आरक्षण लेने में व्यस्त हो गये। अलग राज्य का मुद्दा संविधान की पाँचवी तथा छठवीं अनुसूची के प्रावधानों के बीच दबकर रह गई। देखा यह गया कि जब जब किसी नेता या दल ने आन्दोलन पर बल दिया, उसे तेज किया तब तब झारखंड क्षेत्र में कोई बोर्ड या परिषद् या इसी प्रकार की कोई चीज गठित कर दी गई ताकि आन्दोलन के नेताओं को आत्मतुष्टि के साथ-साथ रोजी-रोटी या आराम की जिन्दगी मयस्सर हो सके।
कई नियम, अधिनियम परिषद् बनाए गये। 1951 में बिहार जनजातीय सलाहकार परिषद् बनाया गया था। छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 में ही बनाया गया था। संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम 1969 में बनाया गया। ये अधिनियम आदिवासियों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए बनाए गये थे। छोटानागपुर संथाल परगना के लिए, इसके विकास के मद्देनजर छोटानागपुर-संथाल परगना स्वायत्त विकास प्राधिकरण 1971 बनाया गया। इसके बाद 1974 में जनजातीय उपयोजना बनाई गई। 1978 में झारखंड विकास परिषद् बनाया गया। इसे 1991 में विधान सभा से पारित कराया गया।

राज्य पुर्नगठन आयोग की रिपोर्ट एवं झारखंड आन्दोलन के प्रभाव –

जस्टीस फजल अली द्वारा प्रस्तुत की गई राज्य पुर्नगठन आयोग, “स्टेट रिऑरगेनाइजेशन कमीशन” ने झारखंड पृथक राज्य के गठन की अनुशंसा नहीं की। इस आयोग ने इस माँग को अस्वीकृत करने के प्रमुख कारण दर्शाये। इसमें कहा गया कि झारखंड पार्टी को उन्नीस सौ बावन के आम-चुनाव में छोटानागपुर एवं संथाल परगना में वोटो या सिटों का स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं हुआ था। इस क्षेत्र के भीतर एवं बाहर दूसरे राजनैतिक दलों ने अलग झारखंड राज्य के गठन का विरोध किया था। फिर कहा गया कि जनजातियों की कुल जनसंख्या इस क्षेत्र में या प्रस्तावित अलग राज्य में कुल जनसंख्या में मात्र एक तिहाई से कुछ ज्यादे है। इसके अलावे जनजातियाँ कई वर्गो में बँटी थी एवं अलग-अलग भाषाएँ थी। इस प्रकार कई उपजातियों में बँटी रहने एवं अलग अलग भाषाई आधार होने तथा झारखंड अलग राज्य का विचार अल्पमत में होने तथा बहुमत के इस विचार से सहमत नहीं होने के कारण पृथक झारखंड राज्य का बनाया जाना उचित प्रतीत नहीं हुआ। आयोग ने इन्हीं कारणों के चलते अनुशंसा नहीं की।
आयोग का कहना था कि यह आन्दोलन सिर्फ जनजातियों यानि आदिवासियो का आन्दोलन है। दूसरा कारण जो यह दर्शाया गया था कि इस क्षेत्र में एक सम्पर्क भाषा का अभाव है। तीसरा कारण यह बताया गया कि अगर झारखंड अलग राज्य के लिए झारखंड को बिहार या सम्बन्धित राज्यों से अलग कर दिया जाय तो शेष बिहार या सम्बन्धित राज्यों का माली हालत का संतुलन बिगड़ जाएगा। एक दृष्टिकोण से तीसरा कारण ही अधिक महत्वपुर्ण बनाया गया था, क्योंकि बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा एवं मध्यप्रदेश के सीमावर्ती एवं समीपवर्ती दलित क्षेत्रों को मिलाकर एवं इन राज्यों से पृथक करके नये राज्य के गठन से इन राज्यों के राजस्व और रोजगार के अवसरों पर अवश्य प्रभाव पड़ेगा।
जैसा कि हमने पहले ही देख लिया है कि भारत के संविधान में कहीं इस बात का जिक्र नहीं है कि नये राज्यों का गठन किन आधारों पर किया जाय। सिर्फ इतना ही कहा गया है, भारतीय संविधान में कि जैसा कि संसद उचित समझे, नये राज्य बनाया जा सकते है।
देश की आजादी के पहले से ही इस विषय पर विवेचना की जाती रही थी कि नये राज्यों के गठन का आधार क्या हो ? सिर्फ अंग्रेजी की तरह प्रशासनिक दृष्टीकोण से नये राज्य बनाए जायें या भाषा, संस्कृति क्षेत्र या अन्य आधार पर नये राज्यों का गठन किया जाय।
इस संबंध में क्रमिक विकास हुए एवं पहले “भाषाई आधार” पर कई राज्यों का गठन किया गया। फिर आजादी के बाद अंततः राज्य पुर्नगठन आयोग का गठन किया गया। ताकि ठोस आधार पर पहुँचा जा सके। एक तरफ तो इस आयोग ने “भाषाई समानता” यानि “लींगवीस्टीक होमोजीनीयलीटी” को एक हितपुर्न आधार माना है, जिसके विरूद्ध गहरा असंतोष पनपा था, तो दूसरी ओर आयोग जातीय भावनाओं को संतुष्ट करने में अक्षम रहा। फिर आयोग ने यह नहीं कहा कि सिर्फ आदिवासी बहुल क्षेत्र का दर्जा दिया जा सकता है कि नहीं। स्पट था छोटे राज्यों के गठन की वकालत प्रशासनिक दृष्टीकोण से ही नहीं किया जाना चाहिए।
एक और महत्वपुर्ण आपत्ति जो इस माँग के विरूद्ध उठाई जाती रही थी वह यह था कि झारखण्ड क्षेत्र में बहुत भिन्नता व्याप्त थी और उसे एक सामान्य झारखण्डी सामाजिक में या राष्ट्रीयता में बाँधने की आशा नहीं की जा सकती। दूसरे शब्दों में वहाँ पर संथाल, हो, मुंडा, उराँव, खड़िया, पहाड़िया, गौंड, कोरव, भूमिज आदि अनुसूचित जनजातियाँ हैं तथा खतौरी, कुड़मी, कोयरी, तेली, कुम्हार, राजवार आदि अनेक गैर-अनुसूचित जनजातियाँ भी हैं एवं अनेक मूलवासी समुदाय तथा सदान जनसंख्या एवं उत्तर प्रदेश, उड़ीसा आदि के बाहरी लोग हैं।
यहाँ पर इस बात पर विचार करना आवश्यक था कि झारखंड क्षेत्र को केन्द्र सरकार ने बिहार, बंगाल, उड़ीसा, मध्य प्रदेश राज्य की सीमाओं के अन्दर बाँट दिया था। एक ही संस्कृति के लोगों को चार राज्यों में विभाजित कर दिया गया था। पर इतने से ही सरकार रूक नहीं गई। राज्य सरकारों एवं केन्द्र सरकार ने इस क्षेत्र की तामाम अनुसूचित मे विभेद पैदा कर दिया। कुछ को अनुसूचित जाति बना डाला, तो कुछ को अनुसूचित जनजाति की सूची से हटा दिया। उन्हें गैर-आदिवासी घोषित कर दिया और आदिवासियों को अल्प संख्यक बना डाला। आयोग ने बड़ी आसानी से कह दिया कि यह सिर्फ आदिवासियों का आन्दोलन है और इसे बहुमत प्राप्त नहीं। आयोग ने इस बात को भी नजर अंदाज कर दिया कि झारखण्ड पार्टी के विधायकों में से दश विधायक गैर-आदिवासी थे।
फिर यह दिखला दिया गया कि एक सम्पर्क भाषा का अभाव झारखण्ड में था और यह एक महत्वपुर्ण पहलू नये राज्य बनाने के लिए था कि भाषाई समानता हो। आयोग ने इस बात को नजर अंदाज कर दिया कि भारतवर्ष में पूर्व में बने किसी भी राज्य में एक ही सम्पर्क भाषा नहीं था और न आज है। बिहार को ही हम उदापरण को तौर पर लें तो उस समय और अभी भी वहाँ मगही, भोजपूरी, मैथली, मेसी, अंजिका आदि बोलियाँ है। फिर दक्षिण बिहार झारखण्ड क्षेत्र जब बिहार में शामिल था, तो खारखण्ड के भाषाओं संस्कृति की विभिन्नता तो बिहार में भी मौजूद थी। तो फिर बिल्कुल ही भिन्नता वाले उस पर बिहार एवं दक्षिणी बिहार को एक सीमा के अन्दर रखने का क्या औचित्य था। फिर इसका उदाहरण नागालैंड भी है, जिसमें पाँच प्रमुख तथा अनेक छोटी अनुसूचित जनजातियाँ हैं और यहाँ पर तेईस भिन्न-भिन्न भाषाएँ बोली जाती हैं।
अतः भाषाई भिन्नता कोई अर्थ नहीं रखती थी। जब हिन्दी पूरे देश की राजभाषा हो सकती है, तो झारखण्ड की भी हो सकती थी। फिर जब संयुक्त बिहार में हिन्दी से काम-काज चलता ही था जिस बिहार में झारखण्ड समाहित था, तो फिर नये राज्य प्रस्तावित झारखण्ड के लिए क्या कठिनाई थी और एक अलग सम्पर्क भाषा की आवश्यकता क्यों महसूस की जाने लगी ? क्या झारखण्डी सभ्यता-संस्कृति एक अलग प्रकार की संस्कृति नहीं थी ? क्या झारखण्डी राष्ट्रीयता का आधार भाषाई समानता के आधार का व्यापक रूप नहीं था ?
जहाँ तक आर्थिक असंतुलन की बात है, तो आयोग ने इस बात को नजर अंदाज कर दिया कि पंजाब एवं हरियाणा में कोई खदान नहीं। देश के अनेकों प्रदेशों में खनिज पदार्थ नहीं, जंगल नहीं तो क्या वे राज्य पीछे चले गये है। पंजाब एवं हरियाणा कृषि के बल पर देश का एक नम्बर राज्य बन सकते है तो शेष बिहार क्यों नहीं। उत्तर बिहार की जमीन की उस्पादकता पंजाब एवं हरियाणा की जमीनों से ज्यादा है। यही सरकारी रिपोर्ट है। वही बात उड़ीसा, पश्चिम बंगाल पर भी लागू होती थी।
दी स्टेट रिऑरगेनाइजेशन कमीशन (राज्य पुर्नगठन आयोग) के द्वारा कुछ विचार व्यक्त किए गये थे एवं कुछ सुझाव सरकार को दिए गये थे तथा कुछ सिफारिशें की गई थी। ये इस प्रकार थी-
दक्षिण बिहार को अगल करने से मौजूदा राज्य की सम्पूर्ण आर्थिक नीति पर प्रभाव पड़ेगा। कृषि, उद्योग और शिक्षा का संतुलन डगमगा जायेगा और उत्तरी एवं दक्षिणी बिहार के इलाके गरीब हो जायेगें। तथा विकास के अवसर एवं संसाधन कम हो जायेगें। इसीलिए दक्षिणी बिहार में सिंचाई के लिए विस्तृत योजना कार्यान्वित की जाय एवं विजाराधीन व्यापक विकास योजनाओं को प्रभावी बनाया जाय।
अनुसूचित क्षेत्रों में सामान्य प्रशासन जल्दी लाये जाने की सिफारिश की गई ताकि आदिवासियों और अन्य जातियों के बीच का भेदभाव जिस कारण या जहाँ कि वे जनजातीय क्षेत्रों को आर्थिक एवं राजनैतिक उन्नति में बाधा पहुँचाते हैं, धीरे-धीरे समाप्त किया जा सके।