Tuesday, June 21, 2011

झामुमो की आर्थिक नाकेबन्दी –

बिनोद बाबू के निधन के बाद शिबू सौरेन ने 27-28 जनवरी 1992 को ही धनबाद में स्थित सराइढेला में झामुमो के केन्द्रीय समिति की बैठक रखी। इस बैठक में यह तय किया गया कि राँची के मोराबादी मैदान में एक विशाल रैली निकाली जायेगी जिसका नाम शहीद रैली होगा और यह रैली 15 मार्च को होगी। सभी सदस्यों को आदेश दिया गया कि अपने क्षेत्र के शहीदों के नाम की ज्योती, मशाल लेकर पहुँचे। उनके नाम का बैनर लेकर आऍ। मोराबादी मैदान में शहीद ज्योती जलाई जायेगी एवं शहीदों के नाम पर यह ज्योती तब तक जलती रहेगी, जबतक झारखंड राज्य अलग नहीं हो जाता। साथ ही यह भी फैसला लिया गया कि दिनांक 21 मार्च को सम्पूर्ण झारखंड बन्द रहेगा तथा दिनांक 22 मार्च से लेकर तेरह दिन तक यानि 3 अप्रेल तक झारखंड में आर्थिक नाकेबन्दी का कार्यक्रम चलाया जायेगा। इस आर्थिक नाकेबन्दी के तहत झारखंड से खनिज पदार्थ, लकड़ी, सीमेंट आदि सभी वस्तुओं पर झारखण्ड से बाहर ले जाने पर रोक लगा दी जायेगी। कार्यकर्त्ताओं को, नेताओं को सड़क पर उतरना पड़ेगा। हर हालत में इस आन्दोलन को सफल बनाना पड़ेगा। यह भी फैसला लिया गया कि कोई भी समझौता या निर्णय केन्द्रीय समिति की राय के बिना नहीं लिया जायेगा। जो भी वार्त्ता होगी, दिल्ली में नहीं बल्कि झारखंड की धरती पर होगी।
15 मार्च को राँची के मोराबादी मैदान में ऐतिहासिक भीड़ जुटी। शहीद ज्योती जलाई गई। वहीं पर मुझे एहसास हो गया कि मुझे पार्टी में जगह देना झामुमो के केन्द्रीय नेतागण नहीं चाहते थे।
21 मार्च को बन्द शुरू हुआ। मैंने स्वंय इसमें भाग लिया। मैंने पूरे झारखंड क्षैत्र का कार से आर्थिक नाकेबन्दी के दौरान दौरा किया और कार्यकर्त्तॉओं के मनोबल को बनाए रखा। आर्थिक नाकेबन्दी का यह कार्यक्रम एक अभूतपूर्व कार्यक्रम था। झारखण्ड के आन्दोलन के इतिहास में ऐसा आन्दोलन अब तक नहीं हुआ था। सारे खनिज पदार्थो की नाकेबन्दी कर दी गई थी। जगह-जगह तमाम झारखंड क्षेत्र में कार्यकर्त्ताओं ने चेक नाका बना डाला था। ट्रकों का आवागमन बंद हो गया था। रेल गाड़ियों, खासकर मालगाड़ियों का चलना बन्द करा दिया गया था। पूरे झारखंड के खदानों से खनिज ढुलाई बंद हो गई थी। बालू, लकड़ी, सीमेंट तक की ढुलाई बन्द रही। कोयला की ढुलाई तो सम्पूर्ण रूप से बाधित रही। एक सन्नाटा छा गया झारखण्ड में। एक विचित्र आतंक का माहौल बन गया।
झारखंड मुक्ति मोर्चा के इस आन्दोलन के दौरान झारखंड की जनता ने भी साथ दिया। दूसरी झारखंड नामधारी पार्टियों तथा कई अन्य दलों नें इसका समर्थन किया। इस दौरान हजारों कार्यकर्त्ताओं ने गिरफ्तारी दी। कई जगहों पर तोड़-फोड़, बमबाजी की घटनाएँ भी हुई। लाठीचार्ज हुए। पर यह आन्दोलन रूका नही और इसने एक जन आन्दोलन का रूप ले लिया।
इस आन्दोलन में एक मुहत्वपूर्ण घटना घटी, 21 मार्च को। इसी बंद के दौरान जिला बोकारो के गोदाम कोलियरी के पास झारखंड के पुराने नेता शिबा महतो के घर के पास गोली चली। गोली भारत कोकिंग कोल के एक बस को रोकने के दौरान चली। सेन्ट्रल सेक्यूरिटी फोर्स तथा बिहार पुलिस के जवानों ने गोली चलाई थी। हॉलाकि झामुमो कार्यकर्त्ता काफी तादाद में थे और मोर्चा उन्होंने भी संभाल रखा था। उस समय दुग्धा पुलिस आउट पोस्ट पर धनबाद के उपायुक्त मौजुद थे। यद्दपि घटना दिन बारह बजे की थी, जिसमें सूदन महतो को गोली लगने से शहीद हो गये थे, पर प्रथम इत्तिला रिपोर्ट तीन दिन बाद सोच समझकर दर्ज किया गया था। सूदन महतो की लाश को पुलिस घटना स्थल से ही उठाकर ले गई थी और पोस्ट मार्टम के बाद ही इसे लौटाया था। प्रथम इत्तिला रिपोर्ट झूठा था। बिहार पुलिस ने कोई गोली नहीं चलाई थी, पर जिम्मेवारी उसके सर ठोंकी गई। गोली सी0 आइ0 एस0 एफ0 ने चलाई थी लोगों को बन्दूक के कून्दों से पीटा था। एवं अभियुक्त बनाया गया था।
उल्लेखनीय है कि पार्टी अध्यक्ष सासंद शिबू सोरेन 22 मार्च को सिजुआ पहुँचे थे जहाँ सूदन महतो मारा गया था। वे बोकारो के पुलिस अधीक्षक की गाड़ी में उनके साथ वहाँ पहुँचे थे। उन्होनें वहाँ घोषणा किया था कि मृत सूदन महतो के परिवार को एक लाख रूपया देगें। मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ था कि आन्दोलन के शुरू में ही शिबू सोरेन पुलिस अधीक्षक की गाड़ी में उनके साथ घटना के दूसरे दिन क्यों पहुँचे ? उन्हें आन्दोलन करना था पुलिस की चाकरी नहीं। उसके दूसरे दिन मैंने एवं शिबा महतो ने भारत कोकिंग कोल को दबाद डाला और सूदन महतो चुँकि वहाँ कर्मचारी था, उसकी पत्नी को नौकरी दिलवाई। शिबू सोरेन ने घोषित एक लाख रूपया आज तक नहीं दिया।
दूसरी जो महत्वपूर्ण बात हुई वह यह कि फूलचन्द सोरेन जो झामुमो के चन्द्रपुरा के नेता थे, घटना स्थल पर मौजुद थे, उनका नाम इस केस में नहीं आया। प्रथम इत्तिला रिपोर्ट करने वाला बी0 सी0 सी0 एल0 का ड्राइवर था और झारखण्ड से बाहर का व्यक्ति था, उसके लिए अभियुक्तों का नाम जानना असंभव था।
इस आर्थिक नाकेबन्दी को सभी ने साथ दिया। पर दुखः की बात यह हुई कि श्री ए0 के0 राय जिन्हें बिनोद बाबू ने हर प्रकार का संरक्षण दिया था। और जो झारखण्ड आन्दोलन के साथी के रुप में स्वंय को घोषित करते थे, उन्होनें इस आर्थिक नाकेबन्दी को “टाकाबन्दी” यानि रूपया कमाने का आन्दोलन कहा।
इस आन्दोलन का सबसे दुःखदायी पहलू नाकेबन्दी के दश दिन के बाद सामने आया। नाकेबन्दी का आन्दोलन सफलता पूर्वक चल रहा था। और दिल्ली तक में इसका प्रभाव पड़ने लगा था। अचानक 31 मार्च को इसे स्थगित करने की घोषणा कर दी गई। यह घोषणा दिल्ली से पार्टी उपाध्यक्ष सूरज मंडल ने किया। इस आन्दोलन को तीन अप्रेल तक चलाना था, पर बीच में ही स्थगित कर दिया गया। हम सभी को जो या तो आन्दोलनरत थे, या जेल में बंद हो गये थे या सक्रिय रूप से सहयोग कर रहे थे घोर आश्चर्य हुआ। जितने भी विधायक झामुमो के थे, सभी चकित थे। जनता स्तम्भित थी कि आखिर कौन सी ऐसी मजबूरी आ गई थी कि इस सफलतम आन्दोलन को स्थगित कर देना पड़ा था।
एक अप्रेल को मैंने धनबाद जिला कमिटि की मीटिंग में इस सवाल को खड़ा कर दिया। चार अप्रेल को हजारीबाग में प्रत्येक वर्ष की भाँति झामुमो का स्थापना दिवस मनाया गया। यहाँ पर सांसदो से खुले रूप में पार्टी के वरिष्ठ नेता श्री शिबा महतो ने मेरे कहने पर आन्दोलन को स्थगित करने का कारण पूछा। शिबू सोरेन के जबाव ने सबको चकित कर दिया। उन्होंने कहा कि सरकार को बहुत क्षति हो रही थी, इसीलिए आन्दोलन को बंद कर दिया।
मुझे यह जबाव खटक गया। जब आन्दोलन किया ही गया था, सरकार को क्षति पहुँचाने के लिए, दबाव बनाकर अपनी माँग मनवाने के लिए तो फिर हमें सरकार को हानि से बचाने की बात सोचनी क्यों पड़ी ? इसमें सभी के मन में संदेह पैदा हुआ कि हो न हो भीतर ही भीतर कोई गुप्त समझौता नेताओं ने दिल्ली में कर लिया है, जिसका खुलासा वे करना नहीं चाहते। पता चला कि इस स्थगन का विरोध अकेले सांसद कृष्णा मरांडी ने किया था, बाकि चार सांसद स्थगन के लिए जिम्मेवार थे।
इस घटना से कार्यकर्त्ताओं का मनोबल गिर गया। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि ऐसा क्यों किया गया। मोराबादी मैदान की घोषणा कि कोई फैसला केन्द्रीय समिति की राय के बिना नहीं ली जायेगी, झूठी साबित हुई। झारखण्ड की धरती पर फैसला होगा – वार्त्ता यहीं होगा – ये सारी घोषणाएँ झूठी साबित हुई।
31 मार्च को ही शिबू सोरेन तथा सूरज मंडल दिल्ली रवाना हो गये थे। संयोग से पेटरवार के पास हमारी तथा शिबा महतो की मुलाकात उनसे हो गई। हम राँची से सी0 सी0 एल0 के मुख्यालय से आ रहे थे, सूदन महतो की पत्नी को नौकरी दिलाने की वार्त्ता त्तकालीन डायरेक्टर परसनल श्री आई0 बी0 पाण्डे से बात कर के और इधर ये राँची जा रहे थे। रास्ते में शिबा महतो तथा मुझे, शिबू सोरेन ने गृह मंत्री एस0 बी0 चौहान के बुलाने की बात कही। मुझे उस समय भी आश्चर्य हुआ था कि समय से पहले ही आर्थिक नाकेबंदी को वापस क्यों ले लिया गया था। पर बाद में भी इस बात का खुलासा नेताओं के द्वारा नहीं किया गया कि आखिर किन शर्त्तों पर आर्थिक नाकेबंदी वापस ली गई थी।

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