Friday, May 28, 2010

आर्थिक परिस्थिति : ब्रिटिश शासन काल एवं पूर्व

आर्थिक परिस्थिति : ब्रिटिश शासन काल एवं पूर्व
झारखंड़ क्षेत्र झाड़-जंगल से घिरा क्षेत्र है। यहाँ सैकड़ो प्रकार के पैड़-पौधे है। कन्द-मूल है। बाँस है। घास है। पूरा इलाका टीलों एवं पहाड़ो से भरा हुआ है। उबड़-खाबड़ जमीन है। समतल मैदान बहुत कम है और ये पहाड़ो की तलहटियों पर फेले हैं। यहाँ छोटे-छोटे नाले, झरने आदि हैं तो बड़ी-बड़ी नदियाँ भी है। जल की प्रचुरता रही है। यहाँ का मौसम समशीतोष्ण है। न ज्यादे ठंड़, न ज्यादे गरमी पड़ती है।
ब्रिटिश शासन काल एवं पूर्व में घने जंगल थे। बाघ, भालू, मोर, हाथी, हीरण, जंगली सुअर आदि बड़े एवं खतरनाक जानवरों से ये जंगल एवं पहाड़ भरे हुए थे। इसके अलावा सैकड़ो प्रकार के पक्षी थे। प्रसिद्ध शिकारी जिम कारर्वेट ने छोटानागपुर के पक्षियों-जानवरों के विषय में काफी कुछ लिखा है। यहाँ पर दामोदर, सुवर्ण रेखा, बराकर, कंषावती, कोनार आदि बड़ी नदियाँ है। यहाँ के गाँवों में लोग टोलो में निवास करते थे जो दूर-दूर होते थे। एवं इन गाँवो की जनसंख्या भी कम होती थी। पहाड़ो पर भी जनजातियाँ घर बना लेती थी। इनका प्रमुख व्यवसाय कृषि था एंव इसके बाद शिकार। ये चावल की खेती करते थे। छोटे-छोटे खेत पहाड़ों की तलहटी वाले समतल मैदान में होते थे और पहाड़ की ढलानों पर भी। जमीन उपर-नीचे होने के कारण खेत भी उपर-नीचे होते हैं। चावल की तरह “गुदली”, मड़ुआ, कोदो, जो, मकई, बाजरा पैदा करते थे। दलहन में अरहर, कुरथी, उरद, खेसारी पैदा करते थे। सरसों भी पैदा करते थे। सुरगुजा, कुदरूम आदि फसलें भी यहाँ पैदा किया जाता रहा था। जोगल के फल-फुल, कंद भी खाते थे। कुछ जंगल के जानवरों का शिकार करके भी अपनी खुराक जुटा लेते थे। इसके अलावा बकरी पालना, सुअर पालना मुख्य काम था। प्रत्येक घर में इन्हें पालने की परिपाटी थी। गाय-भैंस पालने का चलन नहीं था। बैलों एवं भैंसों से खेती करते थे। हल चलाकर। जीवन बहूत सरल था। साग सब्जी बेगन टमाटर आदि उगा लेते थे। तम्बाकू भी उगाते थे। महुआ के पेड़ से महुआ उतार कर शराब भी बना लेते एवं चावल की शराब “हँड़िया” भी।
यहाँ के निवासी सामुहिक जीवन पद्धति के आदि थे। व्यक्तिवादी नहीं थे। सामंतवादी नहीं थे। ज्यादे की लालसा नहीं थी। शादी विवाह पास के गाँवों में ही हो जाते थे। आवागमन की सुविधा नहीं थी। उस समय लोग बैल-गाड़ियों में ही यात्राएँ किया करते थे। झारखंड़ के मुल निवासी घोड़े की सवारी का उपयोग नहीं करते थे। झारखंड़ वासियों का जीवन जंगल पर आधारित जीवन था। जंगल की लड़की का प्रयोग एवं उपयोग मकान बनाने, हल बनाने एवं कृषि के अन्य उपकरण बैलगाड़ी आदि बनाने में करते थे। जलावन का काम सुखी लकड़ियों से चल जाता था। अनेक प्रकार के पेड़ थे जिनके पत्तों से बीड़ी, “चुटी” बनाकर घुम्रपान करते। फल-मूल-कंद खाते थे। दवाई भी जंगल की जड़ी-बूटी से बनाते थे। पहाड़ के पत्थरों से या मिट्टी से मकान की दिवार बनाते थे। बरसात के दिनों में जिन दिनों कपड़े का “छाता” का अविष्कार नहीं हुआ था। उन दिनों “घोंघ” या “पोतरो” (गूँग चोंगा) होता था और सामने की ओर खुला। इसे एक प्रकार की लत्तर के पत्तों से बनाया जाता था जिन पत्तों का आकार काफी बड़ा होता था। इसे पहनकर किसान बरसात के दिनों मे हल चलाते, धान रोपते या खेतों में अन्य काम करते थे। बाँस की पत्तियों को चीरकर पतली-पतली सीकें बनाते थे और उसे बुनकर बाँस का छाता बनाते थे। इसके अलावा कृषि एवं घरेलू उपकरण जैसे धान कुटने के लिए “ढ़ेकी”, धान साफ करने के लिए “सूप”, बाँस की पत्तियों से टोकरी, “खाँची” यानि बड़ी टोकरी सामान ढोने के लिए, “डेमनी” आदि जरूरत के मुताबिक। यहाँ तक कि सिचाईं के लिए नालों में, कुएँ में “टेड़ा-डाँग”। लाट-खुटाँ, रहट का एक प्रकार हैं। तथा “सिनी” “चाड़या”, “डाबका” भी सिचाईं के लिए बनाया जाता था। झारखंड़ के निवासी अपने जंगलों की रक्षा भी करते थे। घास-फूस काटकर जानवरों को खिलाते थे। मछली-मारने के लिए नदी या तालाब में प्रयुक्त करने के लिए आवश्यक उपकरण जैसे “घूँघी”, “जाल”, “पोलाई” आदि घाँस या लकड़ी से बनाते थे।
करंज का तेल, नीम का तेल तथा महुआ के वृक्ष से तैयार “कोचड़ा” की सब्जी तथा तेल बनाते थे उसके बीज से । महुआ के पेड़ में जो फूल आते है, उन्हे महुआ कहते हैं। इससे शराब बनाती है। आदमी एवं जानवर इसे कच्चे रूप में भी खाते थे। फूल के गिरजाने के बाद फल आता है जो हरे रंग का आँवला के बराबर होता है और इसके बीज से “कोचड़ा का तेल” यानि ढौरी का तेल बनाया जाता है। यह औषधि है और विभिन्न कामों के लिए प्रयोग किया जाता है। खटिया की रस्सी भी जंगल के सवाई घास से तैयार करते हैं तथा बिछाने के लिए चटाई भी खजूर एवं ताड़ के पत्ते से बनाते थे। ओढ़ने की रजाई के लिए समेल की रूई वृक्षों से काफी तादाद मे प्राप्त करतें थे। यहाँ तक की तेल बनाने के “धनी” बनाया जाता था जो सरसों एवं अन्य बीजों को पेरकर, पीसकर तेल निकालता था। “जाँता” बनता था, दाल बनानें के लिए “जाँता ” हाथ से चलाने वाली छोटी चक्की को कहते हैं।
जंगल से लोहा की मिट्टी, ताँबा की मिट्टी आदि मिलते थे। झारखंड़ के लोग लोहा, ताँबा आदि गलाना जानते थे। हथियार भी लकड़ी एंव लोहा से बना लेते। इसके अलावे घर को लीपने-पोतने के लिए चिकनी सफेद मिट्टी, लाल मिट्टी भी उपलब्ध थी।
इस प्रकार झारखंड़ के लोग अपना काम आप चलाते थे। ये गरीब जरूर थे, पर शांत होते थे। इनका स्वभाव था कि ये बाहर के लोगों के साथ जल्दी मिलना जुलना पसन्द नही करते थे। अपने जीवन-शैली, कार्य-शैली में हस्तक्षेप पसन्द नहीं था।
व्यवसाय, व्यवपार करने वाली जातियाँ झारखंड़ क्षेत्र में बाजार के विस्तार के साथ मैदानी इलाकों से आकर बसने लगी थी। ये बिचौलियों का काम करने वाली जातियाँ थी।

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