Thursday, April 1, 2010

अनुसूचित जनजाति (सेड्यूल ट्राइव) अनुसूचित जाति अवधारणा -

एच0 एच0 रिजले साहब के नेतृत्व में तत्कालीन बंगाल प्राविंस के रहने वाले लोगों का ऐथेनोग्राफिकल सर्वे यानि जातीय सर्वेक्षण कर लिया गया था। रिजले साहब की रिपोर्ट 1981 में प्रकाशित हुई थी, "दी ट्राइव एंड कास्ट आँफ बंगाल" बंगाल प्राविंस में अनेक जनजातियाँ निवास करती है। उन्होनें इन जातियों को चिन्हित किया। साइमन कमीशन की रिपोर्ट (1929-30) में आई। 1918 से लेकर आगे 1931 तक पुनः सर्वेक्षण का काम शुरू हुआ। डब्लू जी0 लेसी साहब के नेतृत्व में जनगनणा की रिपोर्ट 1931 में छपी एवं इसमें जातीय वर्गीकरण भी किए गये। यानि ऐथेनोग्राफिकल सर्वे भी किया गया एवं रिपोर्ट प्रकाशित की गई।
रिजले साहब ने 1884 में सर्वे किया था। उनकी ऐथेनोग्राफिकल सर्वे की रिपोर्ट के बाद 1913 में भारत सरकार ने एक नोटिफिकेशन निकाला जो 2 मई 1913 को गजेट आँफ इंडिया में प्रकशित हुई जिसका नम्बर 550 था। यह शिमला से प्रकाशित की गई। इस अधिसूचना ने बिहार एवं उड़ीसा क्षेत्र में निवास करने वाली मुंड़ा, उराँव, संथाल, हो, भूमिज, खड़िया, घासी, गाँड़, कंध, कोरवा, कुरमी, माल-सूरिया पान जाति को जनजाति कहा था और इसी वजह से उन्हे भारत सरकार के उत्तराधिकार अधिनियम 1865 के प्रावधानों से मुक्त रखा गया था। इन जातियों की अपनी अलग-अलग परम्परा पाई गई थी। इनके अपने उत्तराधिकार के नियम थे। सम्पति हस्तांतरण एवं प्रबंधन के अपने सामाजिक रीति-रिवाज थे। अतः इनपर विधान मंडल द्वारा पारित साधारण कानून जो मैदानी क्षेत्रों के निवासियो के लिए लागू किए जा सकते थे, इन क्षैत्रों तथा इन जातियों पर लागू नहीं किए गये। यह नोटिफिकेशन (अधिसूचना) रेस्ट्रोस्पेकटिव एफेक्ट (प्रतिलक्षी) प्रभाव यानि इंडियन सक्सेशन एक्ट 1865 के बनने के दिन से ही।
ज्ञातव्य हो कि 1931 में पुनः डब्लू जी लेसी साहब ने भारतीय जनगणना की रिपोर्ट प्रकाशित कराई एवं इसमें जनजातियों को भी सूचिबद्ध किया। इन्हे प्रीमीटीव ट्राइव का दर्जा भी दिया गया। एब-ओरिजनल कहा। 1931, 8 दिसम्बर को पुनः एक नोटिफिकेशन आया, कानून विभाग द्वारा। इसमें भी उपरोक्त तेरह जातियों को जनजाति कहा गया एवं भारतीय उत्तराधिकार नियम 1925 इंडियन संक्सेशन एक्ट 1925 के प्रभावों से मुक्त रखा गया एवं इसे भी प्रतिलक्षी प्रभाव-रेट्रोस्पेकटिव एफेक्ट से लागू किया गया यानि 1925 से ही।
इस प्रकार से हम देखते है कि झारखण्ड क्षेत्र की बहुसंख्यक जनता ब्रिटिश शासन काल में जनजाति रही थी।

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