मैदानी “जनजातीय क्षेत्रों” का सवाल – केबिनेट मिशन के 16 मई 1946 के विवरण से उत्पन्न होकर संविधान सभा गठित की जानेवाली मौलिक अधिकारों तथा अल्प संख्यकों संबंधी सलाहकार समिति ने तीन उप समितियों का गठन किया जिनके लक्ष्य निम्नलिखित थें –
. असम के जनजातीय और वहिष्कृत तथा आंशिक रूप से वहिष्कृत क्षेत्रों पर विचार
करना ।
. उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रदेश और बलूचिश्तान में जनजातीय क्षेत्रों पर विचार करना ।
. असम से उत्तर प्रदेशों में वहिष्कृत तथा आंशिक रूप से वहिष्कृत क्षेत्रों की स्थिति पर
विचार करना ।
समिति ने निम्नलिखित दो महत्वपूर्ण प्रेक्षण दिए –
1. पहाड़ी जनजातियों का विभाजन ऐसे जनजातीय आबादी वाले या जनजातियों के समरूपी ग्रुपों की आबादी वाले काफी बड़े जिलों के रूप में किया गया है जिनके संगठन काफी लोकतांत्रिक तथा परस्पर विशिष्ट है और इनमें मैदानी सभ्यता के अवशेष बिलकुल नहीं है जो इनके समानरूपी क्षेत्रों में काम आते हैं ।
2. अन्य प्रदेशों में मैदानी जनजातीय आबादी ने मैदानी लोगों क जनजीवन का पर्याप्त रूप से आत्मघात कर दिया है और बहुत से स्थानों में जनजातीय संगठन खंड़ित हो गये है ।
दो समितियों की रिपोर्ट को लेकर असम के पहाड़ी क्षेत्रों के लिए छठी अनुसूची
बनी और मैदानी जनजातियों के लिए संविधान में पाँचवीं अनुसूची को जोड़ा गया था जिसमें उस समय केवल उन राज्यों को शामिल किया गया है जिनको छठी अनुसूची में नहीं रखा जा सका है । राष्ट्रपति द्वारा एक विशेष अधिकारी की नियुक्ति किए जाने के लिए भी एक उपबंध किया गया था जिसका कार्य सभी मामलों की जाँच करना और राष्ट्रपति को रिपोर्ट प्रस्तुत करना था ।
पाँचवीं अनुसूची में मैदानी जनजातीयों के क्षेत्रों को रखा गया । पाँजवीं अनुसूची में अनुसूचित क्षेत्रों के रूप मे जाने जाने वाले क्षेत्रो की घोषणा राष्ट्रपति द्वारा की जा सकती है । राज्य की कार्यपालिका शक्ति अनुसूचित क्षेत्रों पर लागू होती है । लेकिन राज्यपाल को कुछ उत्तरदायित्व सौंपा गया है । इन क्षेत्रों के प्रशासन के बारे में उसे राष्ट्रपति को प्रत्येक वर्ष या जब अपेक्षित हो, रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होती है । संघ की कार्यपालिका की शक्ति इन क्षेत्रों में राज्यों के प्रशासन के बारे में निर्देश करने के लिए प्रयोक्तव्य है । इस अनुसूची में एक जनजातीय सलाहकार परिषद् की परिकल्पना की गई है जिसका कार्य राज्यपाल द्वारा उन्हें भेजे गये उन मामलों पर सलाह देना है जिसका संबंध अनुसूचित जनजातियों के कल्याण तथा उन्नति से हो। राज्यपाल को इनके बारे में कायदे-कानून बनाने की शक्ति प्राप्त है। अनुलाचित क्षेत्रो मे शांति और उनके अच्छे प्रशासन चलाना-भूमि के हस्तांतरण को निषिद्ध या प्रतिबंधित करना, जनजातियों को भूमि के आवंटन को विनियमित करना, साहूकारी के कारोबार को नियंत्रण करना । राज्यपाल को संसद के या विधान मंड़ल के किसी अधिनियम को प्रयोजनीयता के सीमित या आशोघित करने की शक्ति प्राप्त है राज्यपाल के विनियमनों को कानून को शक्ति प्रदान करने के लिए अनिवार्य रुप से प्राप्त होनी चाहिए ओर उसे ऐसा कोई कानून बनाने के पहले जनजाति सलाहकार परिषद् यदि कोई हो, से परामर्श कर लेना चाहिए। संविधान शंसोधन 1976 के द्वारा राष्ट्रपति को राज्पाल के परामर्श से किसी राज्य में किसी अनुसूचित क्षेत्र को बढ़ाने की शक्ति प्राप्त है।
इस प्रकार ब्रिटिश समय के बाद से आदिवासी क्षेत्रों में प्रशासन का विकास लम्बे समय से चल रहा है । ब्रिटिश सरकार करों, राजस्व तथा सेवाओं की वसुली के साथ संतुष्ट थी। जब कभी तथा जहाँ कहीं शांति को खतरा होता था, तो उन्होने सैनिक हस्तक्षेप किया और अपना प्रशासन स्थापित किया। उनकी नीति का सार सरल और सस्ता प्रशासन और सीमाशुल्क, वसूल करना था। रीति-रीवाज, रहन-सहन, आस्था के प्रबंधन में कम से कम हस्तक्षेप करना उनका उद्देश्य था। उन्होने गैर-आदिवासियों द्वारा जन-जातियों के शोषण को रोकने के लिए कुछ उपाय किए।
परन्तु जनजातिय क्षेत्रों के आर्थिक विकास में ब्रिटिश-सरकार का योगदान नगण्य था। लगभग दो सौ वर्षो तक अँग्रेजों ने पिछड़ा क्षेत्र, अनुसूचित क्षेत्र और आर्थिक रूप से वर्जित क्षेत्र आदि अवधारणाएँ जो उन्हीं की बनाई हुई थी और जिनका उद्देश्य भारतवर्ष में में सुचारू रूप से शासन करना था के साथ खिलवाड़ किया। 1935 के भारत सरकार अधिनियम 1935 द्वारा छोटानागपुर तथा संथाल परगना को “आंशिक रूप से बहिष्कृत क्षेत्र” घोषित किया गया। इन्हें संविधान की पाँचवी अनुसूची के तहत रखा गया। यहाँ अंग्रेज प्रशासन के द्वारा एक बहुत बड़ी भूल हो गई थी। यह भूल थी या किसी प्रकार के षड़यंत्र के तहत ऐसा किया गया था, यह स्पष्ट रूप से आज पता करना कठिन है। 1931 के जातीय सर्वे की रिपोर्ट में जिन तेरह जातियों को प्रमीटीव ट्राइव माना गया था, उन्ही जातियों को 1891 में प्रकाषित रिजले साहब की रिपोर्ट ने भी प्रमीटीव ट्राइव माना गया था। दो नोटिफिकेषन इस संबंध में किए गये थे, 1913 में एवं 1921 ईस्वी में जिनमे इन जातियों को प्रमीटीव ट्राइव माना गया था। झारखण्ड़ क्षेत्र में इसी कारण 1908 में छोटानागपुर टिनेन्सी एक्ट बनाया गया। बंगाल एक्ट नं0 6, 1908। झारखंड़ क्षेत्र में इन जातियों की जनसंख्या को जोड़ने पर यह क्षेत्र जनजातीय बाहूल क्षेत्र बन जाता था। फिर यह बात समझ में नहीं आ रही है कि वर्त्तमान छोटानागपुर डीविजन एवं संथाल परगना को संविधान की पाँचवी सूची तक क्यों पहुचना पड़ा। यह तो पूर्ण रूप से बहिष्कृत क्षेत्र के दायरे में ठीक आसाम, मेघालय आदि के तरह आता था।
ब्रिटिश प्रशासन ने जाहिर है ऐसा इसलिए किया कि “फुट डालों और राज करो” झारखंड़ की अटूट धन-सम्पदा के दोहन के लिए ऐसा करना जरूरी था।
Sunday, April 25, 2010
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