Sunday, April 11, 2010

संवैधानिक सुधार की प्रक्रिया

संवैधानिक सुधार की प्रक्रिया : अनुसूचित जिला अधिनियम 1874 से अनुसूचित जिलों की परिकल्पना शुरू हुई। कार्यपालिका को किसी अनुसूचित जिलों को साधारण कानून के प्रचालन से अलग करने और उसे आवश्यक संरक्षण प्रदान करने की शक्ति प्राप्त थी। वास्तव में इस अधिनियम का आशय असम के कुछ क्षेत्रों का जिसका एक पृथक प्रदेश के रूप में 1874 में गठन किया गया था, प्रशासन करना था।
भारत सरकार अधिनियम 1919 के पहले 1918 में मॉटंगू चेम्सफोर्ड की रिपोर्ट में यह कहा गया कि शेष भारत के लिए परिकल्पित राजनितिक सुधार पिछड़े क्षेत्रों पर लागू नहीं हो सकते, क्योंकि ऐसा कुछ भी विद्यमान नहीं था जिसपर राजनैतिक संस्थाओं को आधारित किया जा सके।
भारत सरकार अधिनियम 1919 में इन भू-भागों को दो श्रेणियों में विभाजित किया गया था। कुछ क्षेत्र इतने अधिक पिछड़े हुए माने गये कि उन्हें सुधारों के क्षेत्रों से “पूर्णतया वहिष्कृत” किया गया ? अन्य पिछड़े क्षेत्रों पर “आंशोधित वहिष्करण” की प्रणाली लागू की गई थी। इस संवैधानिक परिवर्त्तन का मुख्य जोर यह सुनिश्चित करने पर था कि भारतीय विधान मंड़ल का कोई अधिनियम गर्वनर जनरल इन कांउसिल के विशिष्ट आदेश के बिना “पिछड़े-भू-भागों” पर लागू न हो। 1974 का अनुसूचित जिला अधिनियम रद्द कर दिया गया था।
साइमन कमीशन की रिपोर्ट में इस बात को स्पष्ट भांप लिया गया था कि इन क्षेत्रों के संबंध में सरकार की नीति क्या होनी चाहिए। रिपोर्ट में यह कहा गया “पिछड़े क्षेत्रों के प्रति सरकार का उत्तरदायित्व केवल मात्र इस बात से पूरा नहीं हो जायेगा कि उन्हें शोषण से संरक्षण प्रदान कर दिया गया है और वहाँ समय-समय पर फैलानी वाली गड़बड़ी की रोकथाम कर दी गई है। प्रशासन का प्रमुख उत्तरदायित्व इन क्षेत्रों के लोगों को शिक्षित करना है ताकि वे अपने पाँवों पर खड़े हो सके और इस दिशा में लगभग नहीं के बराबर शुरूआत की गई है। आयोग ने सिफारिश की कि इन “बहिष्कृत क्षेत्रों” के विकास के लिए निधियों की आवश्यकता है और ये निधियाँ केन्द्र द्वारा उपलब्ध कराई जा सकती है। इन क्षेत्रों के प्रशासन के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा अखिल भारतीय सेवाओं के माध्यम से राज्यपालों की एजेन्सी का उपयोग किया जाना चाहिए। इसने “आंशिक रूप से बहिष्कृत क्षेत्रों” के लिए अलग ढ़ंग की पद्धति का सुझाव दिया है।
भारत-सरकार अधिनियम 1935 में “पिछड़े क्षेत्रों” को “वहिष्कृत क्षेत्रों” एवं “आंशिक रूप से वहिष्कृत क्षेत्रों” के रूप में वर्गीकृत किया गया है। “वहिष्कृत क्षेत्रों” को राज्यपाल के स्वविवेक से कार्य करने के लिए राज्यपाल के व्यक्तिगत शासन के तहत में रखा गया था, जबकि आंशिक रूप से वहिष्कृत क्षेत्र मंत्रालय के उत्तरदायित्व के क्षेत्राधिकार में आते हैं। राज्यपाल इन क्षेत्रों के प्रशासन के संबंध में विशेष उत्तरदायित्व का निर्वाह करते थे, और यदि वह उचित समझे तो अपने व्यक्तिगत निर्णय के फलस्वरूप मंत्रियों के निर्णय के विरूद्ध व्यवस्था देने का अधिकार प्राप्त था। राज्यपाल के निर्देशों के बिना संघीय या प्रादेशिक विधानमंड़ल का कोई कानून इन क्षेत्रो पर प्रयोक्तव्य नहीं था। इस अधिनियम में भी “जनजाति क्षेत्रों” को भारत की सीमाओं के साथ लगे क्षेत्रों के रूप में परिभाषित किया गया था।

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