झारखण्ड की संस्कृति एंव सभ्यता : झारखण्ड़ में यह सहकारिता की भावना तथा समानता की भावना बहुत अधिक है। यहाँ जब लोग शिकार पर निकलते थे या अब भी निकलते हैं तो साथ में चलने वाले कुत्ते को भी उसी शिकार का हिस्सा देते हैं जिसका शिकार किया जाता है। झारखण्ड़ में पेड़-पौधो, फल-फुल पर किसी का व्यक्तिगत मालिकाना हक नहीं होता है। यहाँ तक कि तालाब, नदी, नाले में मछली भी सामुहिक रूप से मारा जाता था और वापस में बाँट कर खाया जाता था।
जनजातियाँ अपनी ही जाति में विवाह करतें है। एक गोष्ठी के लोग दूसरे गोष्ठी में विवाह करते हैं, अपनी ही गोष्ठी में यानि अपनी ही गोष्ठी में विवाह निषिद्ध होता है। दूसरी जातियों में भी विवाह निषिद्ध होता है। अगर कोई व्यक्ति ऐसा करता है तो उसे समाज से वहिष्कार करने की प्रथा है। इसे “बिटलाहा” कहा जाता है, झारखण्ड़ में।
प्रत्येक जनजाति की अपनी संस्कृति होती है। एक जनजाति के रीति-रिवाज, जन्म, शादी, मृत्यु के अवसर पर अपनाए गये अनुष्ठान, कर्म-कांड़ अलग-अलग प्रकार के होते है। इनका अपना धार्मिक विश्वास होता है। प्रत्येक जनजाति अपने स्वतंत्र रूप-ढंग से सोचता है। किसी-किसी विषय पर इनका कार्यकलाप अन्य जनजातियों के समरूप भी होता है।
इसकी अपनी एक शासन-व्यवस्था होती है। पंचायत होती है, जिसमे अपराधियों की सुनवाई, सजा होती है। जमीन-संबंधी झगड़े एवं अन्य मामले निपटाएँ जाते है। झारखण्ड़ में कुड़मी जनजाति इसे “बाइसी” कहती है। अपने जनजातीय समाज का आदिवासी या जनजातीय स्वशासन कहा जाता है।
सामान्यता झारखण्ड़ की जनजातियों की अर्थव्यवस्था खेती एवं शिकार पर निर्भर करती रही थी। इसपर हमने पहले ही चर्चा किया है। आत्म निर्भरता झारखंड़ियों का एक गुण है। पर वे उतना ही मेहनत करते है जितना कि उन्हे जरूरत है। सामंतवादी शासन-व्यवस्था झारखंड़ में जनजातियों के बीच नहीं थी। वस्तुओं का आदान प्रदान किया जाता था। विनियम के लिए रूपयों की कमी थी और बाजार में एक व्यक्ति की उपज दूसरे की उपज के साथ अदला-बदली कर ली जाती थी। मापने का पैमाने होता था – “पैला” जिससे अनाज मापा जाता था। आज भी है। लम्बाई मापने का पैमाने होता था –“हाथ” एवं “बित्ता”। वजन का पैमाना होता था – “सेर”, “पौवा”, ”छटाक” आदि।
जनजाति समुदाय का एक अपना विशिष्ट धर्म होता है। ये मूर्ति पूजक नहीं होते। इनके धर्म में प्रकृति पूजा, आत्मवाद और जीववाद की प्रधानता पाई जाती है। ये पहाड़ो, पेड़ो, पत्थरों, फसल आदि की पूजा करते हैं। इनका धर्म अपनी ही समाज तक सीमीत रहता है। जनजातियों के लोग कई प्रकार की जादुई क्रियाऍ भी किया करते है।
मैदानी क्षैत्र के धर्म हिन्दुत्व में एक बहुत बड़ा तत्व है जो हिन्दु धर्म का आधार है। वह है “भक्ति” भाव। हिन्दुत्व में भक्ति-भाव का होना आवश्यक है। राम की भक्ति करने वाले राम-भक्त कहे जाते है। उसी प्रकार कृष्ण-भक्त एवं विभिन्न देवी-देवताओं के भक्त होते है। भक्ति का जन्म समर्पण की भावना से उत्पन्न होता है। यहाँ भक्त अपने भगवान के सामने पूर्ण समर्पण करता है। बाद में इसी भक्ति का प्रसार ईस्लाम एवं ईशाई-धर्म में प्रवेश कर गया।
इस भक्ति को ईश्वर से वरदान प्राप्त करने का आधार माना गया है। पूर्ण-समर्पण हो तो ही फल मिलता है- ईश्वर या अराध्य देव की कृपा मिलती है। ओर बगैर कृपा के मनुष्य को कोई फल नहीं मिलता। यही बड़े-धर्मो हिन्दु-धर्म, ईस्लाम, ईशाई की देन है, बोद्ध-धर्म में भी “बोद्धम-शरणम् गच्छामी” का भाव है। इन सभी धर्मो में “मसीहा” हैँ भगवान है। देवी-देवता हैं। जिनकी कृपा चाहिए। कृपा के लिए “भक्ति” की जरूरत है।
जनजाति धर्म में ऐसी बात नहीं है। ये छोटे-विश्वास के लोग हैं। इनका सीधे विश्वास प्रकृति पर है। प्रकृति ही मसीहा है। पेड़-पौधे, पत्थर, पहाड़, फसल ही इनके अराध्य देव हैं। जनजाति समुदाय का सदस्य इस भक्ति-भाव से दूर रहता है। वह किसी की आराधना नहीं करता। समर्पण नहीं करता। बराबरी का भाव एक दूसरे सदस्य के साथ रखता है। चाहे वह सदस्य उसके दल का मुखिया ही क्यों न हो।
भक्ति-भाव सामन्तवाद की देन है जो मैदानी क्षेत्रों की देन है। पहाड़ी क्षेत्रों में जनजातियों में सामंतवाद नहीं था। झारखंड़ के मूलवासी इस सामन्तवादी व्यवस्था से अछुते रहे हैं। अतः इनमे सामंत का भय पैदा नहीं हुआ। भय नहीं तो फिर समर्पण किस प्रकार का। अगर समर्पण नहीं तो फिर भक्ति का अस्तित्व नहीं। झारखंड़ का आदमी गुलामी पसंद नहीं करता। यह उसके स्वभाव में नहीं। “ठकुर-सुहाती” नहीं कर सकता। यह उसने सीखा नहीं। जनजाति विद्रोह करेगा। यह जानते हुए भी कि इससे उसके बड़े शत्रु का नाश नहीं हो पायेगा, पर वह समर्पण नहीं कर के मिट जाना पसंद करेगा। अपने स्वभाव को वह जल्दी नहीं बदल पाता। बाहरी तत्वों के साथ जल्दी समझौता नहीं कर पाता। अपने आप को अपने दायरे में सीमित कर लेना ज्यादा अच्छा समझता है, वजाय बाहरी तत्वों में स्वंय को विलिन कर लेने के।
संकुचित स्वभाव के झारखंड़ी अंतरमुखी है। हल्ला नहीं कर सकते। प्रचार तंत्र से दूर रहते है। बढ़-चढ़ कर बोलने का आदत उनके पास नहीं। चुप-चाप अपना काम करते हैं। अपनी प्रतिभा के प्रचार-प्रसार को बुरा मानते है और मानते है कि इससे गुण खत्म हो जाते है। अपना इतिहास स्वंय नहीं लिखते या बोलते हैं। यही कारण है झारखंड़ियों का इतिहास बहुत कम लिखा हुआ मिलता है। मिलता भी है वह अन्य लोगों द्वारा अति रंजित व्याख्यान ही मिलता है। सही तथ्यों की जानकारी नही मिल पाती।
Monday, June 14, 2010
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment