बिरसा मुंडा का आन्दोलन एवं सुधारवादी समय – झारखंड़ आन्दोलन में प्रवेश करने के पहले इस क्षेत्र के भगवान समझे जाने वाले बिरसा मुंड़ा के विषय में कुछ जानकारी आवश्य प्राप्त कर लेनी चाहिए।
“सन् 1895 से 1900 ईस्वी तक बिरसा आन्दोलन वस्तुतः अपने अन्तिम लक्ष्य के प्रारूप में परिवर्त्तन वादी था” ऐसा श्री के0 एल0 शर्मा जी का कहना है। बिरसा मुंड़ा का आन्दोलन वास्तव में इस क्षेत्र के लोगों को संगठित करके अपनी पहचान बनाकर शोषण से मुक्ति का आन्दोलन था। इतिहासकार श्री कैथलीन गोब लिखते हैं कि “अति भौतिक और तिलस्मी उथल-पुथल उन सांस्कृति अल्प संख्यकों में बहुत अधिकता से होता है जो कि अपनी परम्परागत सुरक्षा, अपने व्यवसाय एवं अस्तित्व को गँवा बैठे हैं और अपने बीते दिनों और अपने आस-पास की तुलना में गहन शोषण के शिकार हुए हैं।” उन्होंने यह भी लिखा है कि यह व्याख्या उन आदिवासियों पर लागू होती है जो कि अपने अस्तित्व में हस्तक्षेप, भूमि से बेदखल होना, धोखेबाजी, दिवालियापन एवं पढ़े-लिखे और उच्चत्तर शैक्षणिक आक्रामक बाबूओं द्वारा अपनी संस्कृति के हनन का शिकार हुए हैं।
लेकिन बिरसा मुंड़ा का आन्दोलन कोई धार्मिक आन्दोलन नहीं था। इसमें धार्मिक-आवरण जरूर दिया गया था। बिना इस प्रकार के कोई धार्मिक आवरण दिए तथा बिना क्सी तिलिस्मी या दैवी चमत्कारिक वातावरण सृष्टि किए आदिम जातियों को संगठित करना, मुश्किल ही नहीं, बल्कि असंभव था। मुंड़ा समुदाय जिससे बिरसा मुंड़ा आते थे, कोई अल्प संख्यक जाति नहीं थी। इसके साथ अन्य जनजातियाँ मिलाकर एक बड़ी संख्या का निर्माण करती थी। वास्तव में हिन्दु जमींदार यानि ब्राह्मणवादी हिन्दु जमींदार और ब्रिटिश सरकार के लोग अल्प संख्यक थे। बिरसा आन्दोलन का मूलभूत कारण जमींदारों एवं ब्रिटिश शासकों से आर्थिक आजादी प्राप्ति का उद्देश्य था। बिरसा ने आम जनता को गोलबंद किया जिसका कि एक धार्मिक एवं सांस्कृतिक एक रूपता थी। शायद इसी कारण से इतिहासकारों ने बिरसा के आन्दोलन को राजनैतिक या आर्थिक विद्रोह की संज्ञा नहीं दी। वास्तव में बिरसा का आन्दोलन उस व्यवस्था के खिलाफ था जो ब्रिटिश शासन झारखण्ड़ क्षेत्र के मुंड़ा-समुदाय एवं अन्य जनजातियों पर जबरजस्ती लादा जा रहा था। मुंड़ा-समुदाय एवं अन्य समुदायों की अगनी जिससे खत्म करने का कठोर ग्रयास किया जा रबा था। मूलवासियों की आर्थिक व्यवस्था, जमीन संबंधी नियम, अधिकार तथा सामाजिक परिपार्टी पर भी कुठारघात किया जा रहा था। नष्ट किया जा रहा था। थाना-पुलिस ने पहड़ा एवं पंचायतों का स्थान ले लिया था कानून की प्रणाली बदली गई थी।
वास्तव में बिरसा का आन्दोलन उस छटपटाहट, उस पीड़ा का पूर्वाभास था जो बाद में झारखंड़ अलग राज्य के आन्दोलन के रूप में प्रस्फूटित हुआ। वास्तव में मूल उद्देश्य ब्रिटिश शासकों एवं उसके समर्थकों से आदिम जनजातियों को मुक्त करना था। खुली राजनैतिक गतिविधियाँ प्रतिबन्धित थी। सीधे-सीधे लड़ाई करना संभव नहीं था। अतः सामाजिक सुधार के नाम पर आन्दोलन किए गये। सन् 1895 में बिरसा आन्दोलन को बुरी तरह कुचल दिया गया। सन् 1898 में वे हजारीबाग जेल से छुटे, तीन साल जेल में रहने के बाद। उन्होंने पुनः संगठन पर जोर दिया और प्रशिक्षित साथियों के सहयोग से तथा विशाल समर्थन के माध्यम से ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ सन् 1899 में पुनः संघर्ष छेड़ दिया। लेकिन उन्हें पुनः गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया। राँची जेल में उनकी मृत्यु बिमारी के कारण 9 जून 1900 ईस्वी में हो गई। ज्ञातव्य हो कि मृत्यु के समय उनकी उम्र मात्र चौबिस वर्ष की थी।
जैसा कि मैंने कहा है कि जन समर्थन प्राप्त करने के लिए तिलस्मी वातावरण की सृष्टि जरूरी था, उन्होनें अपने आप को “धरती का अब्बा” या जगत-पिता नाम से घोषित किया। बाद में लोगों ने उन्हें भगवान का अवतार कहा।
मुंड़ा आन्दोलन का मुख्य कारण मुंड़ा लोगों की खूँटकटी जमीन व्यवस्था के बदले भूई हरी व्यवस्था को लागू करना था। बिरसा मुंड़ा को क्रिश्चियन लोगों का समर्थन भी मिला। जनजातियों का, ईसाई लोगों का समर्थन एवं उनके द्वारा जमींदारों के विरूद्ध संघर्ष को “सरदारी” लड़ाई कहा जाता है। यह संघर्ष बिरसा-आन्दोलन के रूप में उन्नीसवीं शत्ताब्दी के अंत तक विद्यमान रहा था।
ईशाई मिशनरियों को हिन्दू-जमींदारों के खिलाफ संघर्ष की उतनी चिंता नहीं थी। ईशाईयों का मूल उद्देश्य मुंड़ा एवं अन्य लोगों के बीच ईशाई घर्म का प्रचार करना था और वे लोग मुंड़ा लोगों को ब्रिटिश शासन के खिलाफ मदद देने में हिचकते थे। फलस्वरूप बिरसा मुंड़ा को ईशाई मिशनरियों से विरोध हो गया था।
बिरसा मुंड़ा के निवास स्थान खूँटी एवं आसपास के इलाकों में जोर-शोर से ईशाई धर्म का प्रचार-प्रसार किया जा रहा था। वास्तव में वह इलाका उन गति-विधियों का केन्द्र-बिन्दु था और कई विशाल चर्च वहाँ खड़े किए गये थे।
ज्ञातव्य हो बिरसा मुंड़ा को बचपन में इन चर्चो के शरण में भेजा गया था और उन्होंने ईशाई धर्म की दीक्षा भी ली थी।
कुमार सुरेश सिंह जनजातीय जीवन पर शोध करने वाले प्रख्यात विद्वान के अनुसार अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से भारतीय उप-महाद्वीप के कई हिस्सों में जनजातियों की भूमि-व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो रही थी। इसका कारण जन-जातीय क्षेत्रों में बाहरी लोगों का बड़ी संख्या में पहुँचना था। उस समय देश के अन्य भागों की तरह इन जनजातीय क्षेत्रों में भी ब्रिटिश सरकार की स्थापना और उसके पांव जमने के साथ-साथ गैर-जनजातीय लोगों का बाहर से यहाँ पहुँचने में तेजी से वृद्धि हुई। अपनी भूमि-व्यवस्था के क्षत-विक्षत होने, गैर-जनजातीय बाहरी लोगों द्वारा जमीनों के कब्जा करने तथा बाहरी व्यवसायी एवं व्यापारी द्वारा जन-जातीयों के धन दौलत के हड़पने के कारण, गहरा असंतोष एवं विद्रोह पनपा। इनकी परिणति मुंड़ाओं के उन्नसवीं शताब्दी के अन्तिम विद्रोह “उलगुलान” में हुई।
मुंड़ाओं के परम्परागत भूमि-व्यवस्था को नष्ट करने के लिए जिम्मेदार तत्व थे – राजा और उनके संबंधी जागीरदार और जीमींदार ब्रिटिश शासक और स्थानीय छोटे अफसर।
इस प्रकार सच पूछा जाय तो मुंड़ाओं का आन्दोलन भूमि के प्रश्न पर तो हुआ ही साथ ही उसके पीछे आत्म रक्षा की प्रबल इच्छा भी काम कर रही थी। आत्म रक्षा की इस भावना से प्रेरीत होकर पहले मुंड़ा तो ईशाई धर्म की ओर अपने बचाव के लिए मुड़े। और जब वहाँ उन्हें निराशा ही हाथ लगी तो वे कलकत्ता के वकीलों की ओर मुड़े। और जब अदालतों में अपने विरूद्ध चल रहे भूमि-संबंधों मुकदमों में न्याय पाने में मुंड़ाओं को विफलता मिली, तो वे अंत में कोई उपाय न देखकर बिरसा के नेतृत्व में अधिकारियों से भिड़ गये।
1895 तक आते-आते बिरसा मुंड़ा एक पैगम्बर के रूप में उभर कर सामने आए थे। रोग दूर करने वाले के रूप में पहले बिरसा लोकप्रिय हुए। फिर वे एक उपदेशक के रूप में उभरे। उन्होंने अपने धर्म का उपदेश शुरू किया। बिरसा स्वंय जनेऊ पहनते, साथ ही काठ की खड़ाऊँ पहनते। हल्दी के रंग से रंगी हुई धोती पहनते। उनकी यह वैष्णव वेश-भूषा होती। उन्होंने घोषण की थी कि वे पृथ्वी-पिता थें- धरती अरबा।
धीरे-धीरे बिरसा का धार्मिक आन्दोलन, राजनैतिक आन्दोलन के रूप में बदल गया। कारण था सरदारों का बढ़ता प्रभाव। सरदारों में यह आशा जगी थी कि अगर बिरसा का आन्दोलन अंग्रेजो के विरूद्ध एक सफल सशस्त्र विद्रोह बन सका तो उन्हें उनकी खोई प्रतिष्ठा, खोई सम्पदा एवं खोया हुआ मानकी पद वापस मिल सकेगा, जो कोल-विद्रोह के बाद खो गया था।
बिरसा और सरदार आन्दोलनों की जड़े एक भूमि-समस्या में थी और 1895-1900 में उनका विलयन हो गया था।
अनेकों लड़ाईयाँ बिरसा मुंड़ा के पहले भी इस क्षेत्र में लड़ी गई थी जिसके चलते सरकार को कुछ प्रशासनिक सुधार के लिए कदम उठाने पड़े थे। मुख्य रूप से ये निम्नलिखित हैः-
1 . सन् 1833 का रेगुलेशन (13) जिसके तहत जंगल महल जिलों का विघटन कर दिया गया था
और नया जिला मानभूम का गठन किया गया।
२. सन् 1854 का रेगुलेशन (20) जिसके अंत्तर्गत छोटानागपुर प्रखंड़ को एक आयुक्त के अंत्तर्गत गठित किया गया।
3. छोटानागपुर भूमि-कानून 1869।
4. बंगाल-एक्ट (1) 1879।
5. सन् 1895 और 1898-99 के पश्चात बिरसा मुंड़ा के समय “खुँटकाटी” व्यवस्था को पुनः लागू करना।
6. जमीन का पूर्ण-रूपेण सर्वेक्षण एवं भूमि हक संबंधी रिकार्डो का पंजीकरण।
7. बैठे-बेगारी प्रथा का उन्मूलन।
8. सम्पूर्ण छोटानागपुर का साधारण समान सर्वेक्षण।
9. एक नवम्बर 1902 को गुमला अवर प्रमंडल का गठन।
10. दिसम्बर 1905 में खूँटी अवर प्रमंडल का गठन ।
11. मुंड़ारी खूँटकाटी, भूमिव्यवस्था लागू की गई एवं रैयती और अन्य जमीनों की बिक्री एवं हस्तांतरण पर रोक लगा दी गई।
12. छोटानागपुर टेनेन्सी एक्ट 1908 को पारित करना। यह कानून बंगाल टिनेन्सी एक्ट (1) का एक विस्तृत और परिष्कृत रूप था। इसे स्थानीय रीति-रिवाज एवं मान्यताओं, धारणाओं को मद्य नजर बनाया गया था।
Tuesday, June 29, 2010
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