Monday, December 13, 2010

झामुमो के आन्दोलन को आतंकवादी आन्दोलन कहा गया

इसके बावजूद कि शुरूआती दौर में भी झामुमो में दो विचार धाराओं का जन्म हो चुका था, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा का आन्दोलन रूका नहीं। थोड़े ही वर्षो में इसने एक व्यापक रूप ले लिया था। झारखण्ड आन्दोलन ने झारखण्ड के मूलवासियों, आदिवासियों एवं उपेक्षित शोषित जनता में एक आत्म विश्वास पैदा किया। अपने हक को पहचानना सिखाया एवं एक आत्मगोरव पैदा किया। यहाँ हो रहे सामूहिक अत्याचार, सरकारी शोषण एवं उपेक्षा के विरूद्ध उठ खड़े होने की शक्ति प्रदान की। ऐसा कह सकते हैं कि मूर्दो में जान आ गई थी। यह कैसे संभव हुआ ? बिनोद बाबू ने जब मार्क्सवाद का साथ दिया था और पच्चीस वर्षो तक लाल झंड़े को गाँव-गाँव पहुँचाया था तो भी ऐसा जागरण, ऐसी शक्ति वे पैदा नहीं कर पाये थे। अंतराष्ट्रीय अवधारणा, पूरे विश्व से शोषण को हटाने की अवधारणा यानि वामपंथी अवधारणा झारखंड़ में सफल क्यों नहीं हो पायी ? यह लगता जरूर था कि वामपंथ झारखंड में बहुत आगे बढ़ चुका है। उत्तरी छोटानागपुर ही नहीं पूरे झारखंड में करीब तीस विधान सभा सीटें ऐसी थी, जहाँ लाल झंड़ा विजयी होकर निकला था, पर ऐसा लगता था कि इस झंड़े के साथ आम जनता आत्मीयता का अनुभव नहीं कर पा रही थी।
झामुमो के जन्म ने तथा इसके जमीनी आन्दोलन ने दलितों एवं पिछड़ो, आदिवासियों, गरीबों तथा मजदूर वर्ग के अन्दर जुझारूपन पैदा किया। अगर कोई दबंग व्यक्ति, बलशाली, सामंत, पूँजीपति यानि सूदखोर, महाजन आदि किसी गरीब आदिवासी संथाल की जमीन हड़प ले, उसपर जबरन कब्जा कर ले, तो वह व्यक्ति क्या करें ? कोर्ट जाये जहाँ कि, न्यायलय की लम्बी प्रक्रिया एवं खर्चे को उठा पाना उसके लिए असंभव है। पुलिस प्रशासन के पास जायें, जहाँ थानों पर ही न्याय की निलामी हो जाए। पुलिस को अपने पक्ष में पहले से ही बना लिया जाय, सूदखोरों एवं महाजनों, पूँजूपतियों द्वारा तो पीड़ित को वहाँ न्याय नहीं मिलना। आखिर उसके पास रास्ता क्या है ? किसी राजनैतिक संगठन के पास जाना ही उसका विकल्प बचता है। पर वहाँ क्या होता है । राजनैतिक दल अगर उसके मामले को उठाता है, तो वह दल क्या करेगा ? चिट्ठी लिखेगा, पार्टी पदाधिकारियों की नहीं सुनी जायेगी। तब धरना देगी। नहीं सुनी जायेगी। तब अजीज आकर बड़ी तैयारी करके प्रर्दशन, जूलुस करेगा। प्रशासन यानि न्यायदाता अगर उससे भी नहीं जागे, तो राजनैतिक दल उसके आगे क्या कर सकता है ? या क्या करना चाहिए ? यह एक बड़ा प्रश्न चिन्ह है।
आदिवासी, हरिजन, दलितों की जूलुसों पर, मजदूर वर्ग के जूलुसों का किस प्रकार से दमन होता आया है, सभी जानते है। देश में आदिवासियों का सामुहिक कत्ल तक इन जूलुसों में किया जाता रहा है। निर्ममता पूर्वक लाठियाँ बरसाई गई है। गोलियाँ चलाई गई हैं। एक नहीं इसके कई उदाहरण हैं। झारखण्ड में तो सिर्फ झारखण्ड के नाम पर मीटिंग या सभा करने पर ही नरसंहार किए गए है।
तो आखिर कोई क्या करे। अन्याय के खिलाफ शोषण के विरूद्ध वह भी सरकारी शोषण के विरूद्ध झारखण्ड का आदमी क्या करें ? किस स्तर पर और कौन सी लड़ाई लड़े, जिससे उन्हें, न्याय मिल सके। शोषण से मुक्ति मिल सके।
एक ही रास्ता बचता है। वह रास्ता बहुत कठिन है। उस रास्ते पर चलने के लिए बहुत बड़े हिम्मत की जरूरत पड़ती है। वह रास्ता तो यही है कि सीधे शोषणकर्त्ता पर वार हो। उसे शारीरिक क्षति पहुँचाई जाय। जान का डर पैदा किया जाय। जान है तो जहान है। इसका अहसास उस जुल्मी के अन्दर हो। तभी वह भयभीत होगा, डरेगा, अन्याय करने से। शोषण करने से। पर इस रास्ते पर कमजोर व्यक्तियों को चलाना, उनमें वह संघर्ष का माद्दा पैदा करना, सीधी कार्यवाही के लिए उन्हें आगे बढ़ाना, कितना कठिन काम हो सकता है यह नेतृत्व कर्त्ता ही जान सकता है। भयभीत, डरे हुए, दबे हुए, कुचले हुए लोगों के लिए सर उठाकर चलना ही कठिन होता है। जो हाथ जोड़े रहते है, या अपने हाथ बगलों में दबाए, सर झुकाए धीमी आवाज में बोलने के आदी है, उन्हें सर सीधा करके, सीना तान करके हाथ ऊपर उठाकर नारें तक दिलवाना कठिन काम होता है। उन हाथों में कुछ कर गुजरने के लिए स्पंदन पैदा करना तो बहुत ही कठिन काम है।
झारखण्ड में कोई रास्ता नहीं बचा था। अभिशप्त झारखण्ड में आदमी अपने आप को नहीं पहचान रहा था। ऐसी परिस्थिति में बिनोद बिहारी महतो के अंदर ऐसी सोच किस प्रकार पैदा हुई, यह एक अनुसंधान का विषय हो सकता है। है भी।
1970 की एक दुपहरिया थी। पाँच छः आदिवासी-संथाल जाति के लोग बिनोद बिहारी महतो के निवास पर आए थे। उन दिनों बिनोद बाबू हीरापुर, धनबाद शहर में रेजिस्ट्री ऑफिस के निकट एक मकान में किराए पर रहा करते थे। कचहरी से वे दोपहर को लोटे थे। मार्निग कोर्ट था। वरांडे में आदिवासी जमीन पर बैठे हुए थे। दुबले-पतले। देखने से ही कुपोषण का शिकार से लगते थे। शरीर पर एक छोटी धोती लपेटे थे। आँख धँसी हुई। काले लोग। हाथों में छोटी सा टाँगी। या फिर छोटी लाठी थी। चुपचाप थे। यहाँ तक कि जब बिनोद बाबू ने उन्हें थोड़ी देर रूकने को कहा तो भी वे कुछ नहीं बोले।
दस मिनट के बाद बिनोद बाबू उन लोगों के पास आए और अपने बैठक खाना जो उनके वकालत का भी दफ्तर था, उन्हें उसमें बुला ले गये। उन्होंने उनकी समस्या पूछी स्थानीय कुड़माली भाषा में। संथाल कुरमाली समझते भी है, और बोलते भी है। उन आदिवासी संथालों ने कहा कि उनकी जमीन का जो कागजात उनके पास है, उसमें दखल का जो घर है यानि कालम है, उसमें चौधरी का नाम, लिखा हुआ है, जबकि मालिक संथालों को दिखाया गया है तथा जमीनें उनके दखल-कब्जे में भी है। वे ही धान उगाते हैं। खेत जोतते हैं। काटते हैं। पर धान को काटने के बाद चौधरी के खलिहान में ले जाकर जमा कर देते हैं। ऐसा इसलिए करना पड़ता है कि उन्हें चौधरी का कर्ज चुकाना है।
यह टुण्डी प्रखंड जिला धनबाद के गाँव पोखरिया की बात है। बिनोद बाबू ने उन आदिवासियों से पुछा कि कब उन लोगों ने कर्ज लिया था और कितना लिया था। जबाव मिला कि उनलोगों के पिताजी ने वर्षो पूर्व दो सौ रूपया कर्ज लिया और वह जमान चौधरी को सोंप दिया था। बंधक रख दिया था। बचपन से ही उनलोगों ने देखा है कि उनके बाप-दादे भी अपना धान चौधर के खलिहान में पहुँचाते रहे थे। उनकी ही जमीन। वे ही खती करते हैं। वे ही धान भी आज तक देते आए हैं, पर अभी तक खेत बंधक से मुक्त नहीं हो पाया चौधरी कहता है कि अभी सूद ही नहीं चुका है।
बिनोद बाबू कुछ सोच रहे थे। आदिवासियों ने उनसे गिड़गिड़ाकर कहा कि वे ऐसी व्यवस्था कर दे ताकि दखल के घर में उनका नाम सरकार चढ़ा दें और जमीन उनकी हो जाय। आदिवासियों की इस समझ पर बिनोद बाबू को आश्चर्य नहीं हुआ। इस प्रकार के सैकड़ो मामले उनकी नजर में आ चुके थे। पर तबतक वे कोई रास्ता निकाल नहीं पाये थे। अगर कोर्ट में मुकदमा दायर करें तो क्या नतीजा निकलेगा, उन्हें मालूम था। ये आदिवासी कोर्ट दौड़ते दौड़ते ही थक जाएगें। पर मिलेगा कुछ नहीं। आर्थिक हालात उन आदिवासियों की स्पष्ट थी। उनके पहनावे, उनका चेहरा ही उनकी कहानी कह रहा था।
उन्होंने बहुत सोचने के बाद कहा कि तुम लोग एक काम करो। इस बार तुमलोग खेत जोतो। धान लगावो। काटो। काटने के बाद धान को चौधरी के खलिहान में जमा मत करो। उस धान को अपने धर में ले जाकर रख दो। सरकार खुद-ब-खुद दखल के धर में तुम्हारा नाम लिख देगा। और कुछ करने की आवश्यकता नहीं है।
आदिवासियों को यह काम बड़ा आसान लगा। पर बिनोद बाबू जानते थे कि आदिवासी अगर ऐसा कर देते हैं तो उसके बाद क्या हो सकता है। दमन-चक्र किस प्रकार उन पर चलाया जायेगा। पर देखें तो आदिवासी क्या करते है, यह सोचकर उन्होंने उनको चले जाने को कहा और फिर धान काट लेने के बाद उनसे मिलने को कह दिया। इसके बाद शुरू हो गया, झारखंड का प्रसिद्ध “धान-कटनी” आन्दोलन। उन आदिवासियों ने वही किया जो बिनोद बाबू ने कहा था। उसकी देखा-देखी गाँव के दूसरे आदिवासियों ने जिनके जमीनें बधंक थी, वही किया। बगल के गाँवों में भी वही काम शुरू हो गया। उसी वर्ष इस कार्य ने एक आन्दोलन का रूप ले लिया। महाजनों, जमींदारों, सूदखोरों को कुछ समझ ही नहीं आया। वे सकते में आ गये। पुलिस को सक्रिय किया गया। दमन शुरू हुआ। मुकदमें दायर होने लगे। पर उसके बाद स्वतः ही आदिवासी लोग संगठीत होने लग गये। मीटिंग करने लगे। अपनी रक्षा के लिए बिनोद बाबू को बुलाने लगे। आदिवासियों के झुंड़ के झुंड़ तीर-धनुष, टाँगी से लैस होकर घूमने लगे। बड़े-बड़े जूलुस बिनोद बाबू के नेतृत्व में होने लगे।

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