मात्र तीन वर्षो के अंदर (1970-73) उत्तरी छोटानागपुर के हजारीबाग से धनबाद जिले तक तथा संथाल परगना के जामताड़ा, दुमका आदि जिलों तक यह धान-कटनी का आन्दोलन जोर-शोर से चलने लगा। इसमें न सिर्फ आदिवासी, बल्कि हरिजन पिछड़े वर्ग के लोग जो आदिवासियों की तरह शोषित थे, पीड़ित थे, महाजनी जुल्म से लड़ने के लिए उठ खड़े हुए तथा उन्होनें भी अपनी जमीनों पर कब्जा धान काटकर किया। पूरे क्षेत्र में एक भूचाल सा आ गया था।
उन्ही दिनों 1971 में एक दिन एक नौजवान गोला प्रखंड के नेमरा गाँव से बिनोद बाबू के पास आया था। वह नौजवान था शिबू सोरेन।
सिद्धु कान्हू, चाँद भेरव, बाबा तिलका माँझी से लेकर बिरसा भगवान तक जो लड़ाई लड़ी गई वह वास्तव में जमीन के लिए लड़ी गयी लड़ाई ही थी।
1970 के दसक में ही गाँव के झगड़ों का निपटारा गाँव में ही बिनोद बाबू की प्रेरणा एवं निर्देश से किया जाने लगा। ग्रामीण अब थाना-पुलिस एवं कोर्ट कचहरी से बचने लगे थे। गाँव के समूहों का जो निर्णय होता, उसी को मानने लगे। नतीजा यह निकला कि कई जगहों पर बकायदा ग्रामीण कोर्ट बैठने लगे जिसमें क्रांतिकारी विचार धारा के लोग हिस्सा लेने लगे। पुलिस एवं कोर्ट-कचहरी से वैसे ही लोगों का विश्वास उठ चुका था। अतः इन गाँव के कोर्टो में मामले धड़ाधड़ आने लगे। गाँव वाले कभी-कभी उस इलाके के महाजनों एवं जालिम जमींदारों की शिकायत लेकर आ जाते। तब निर्णय लेना कठिन हो जाता था, क्योंकि आरोपी एक शक्तिशाली व्यक्ति होता था जिसके हाथ मजबूत एवं लम्बे होते थे। ऐसे अवसर पर बिनोद बाबू को बुलाया जाता। बिनोद बाबू नहीं होते तो शिबू सोरेन को बुलाया जाता। वहाँ तथ्यों की सुनवाई रात-भर होती और सर्व सम्पति से निर्णय लिए जाते। अति अत्यचारी व्यक्ति के खिलाफ “बिटलाहा” का आदेश होता। कम अत्याचारी के खेतों पर जबरन कब्जा किये जाने का निर्णय होता, जिन खेतों को महाजन गलत तरीके से हड़प लेते थे। सैकड़ों की तादाद में गाँव वाले हरवे-हथियार से लैस होकर निकलते और दिन के उजाले में निर्णयों को लागू करते। “बिटलाहा” के आदेश पर गाँव वाले अत्याचारी के घर पर धावा बोलते और उसकी सम्पति को नुकसान पहुँचा देते। पर घर के महिलाओं, बच्चों पर कोई आँच नहीं आने देते। मर्द जमींदार अगर मुकाबलें में डटते तो उनके साथ मुकाबला होता। कई जगहों पर कार्यकर्त्ता मारे गये। कहीं-कहीं आततायियों के सर भी कलम कर दिए गये।
इन ग्रामीण कचहरियों का फैलाव होता गया। यहाँ तक कि गाँव तीन-पतली, जिला गिरिडीह में गुणेश्वर हाँसदा के नेतृत्व में ग्रामीण सुप्रीम कोर्ट बन गया।
इस प्रकार सीधी कार्यवाही के आन्दोलन ने जोर पकड़ा एवं यह आम जनता का आन्दोलन बन गया। चारों तरफ स्थिति तनावपूर्ण बन गई थी। पुलिस-प्रशासन की सक्रियता के बावजूद आन्दोलन रूकने का नाम नहीं ले रहा था। लोगों के अंदर आत्म बल इतना बढ़ गया था कि अन्याय के खिलाफ स्वतः र्स्फूत आन्दोलन होने लगे। प्रत्येक गाँव में नौजवान नेता, कार्यकर्त्ता तैयार होने लग गये थे।
1973 के आते-आते प्रशासन ने बिनोद बिहारी महतो पर समान्तर सरकार चलाने का आरोप लगा दिया।
समान्तर सरकार कहें या इसका कुछ और नाम दें। यह तो इसलिए उपजा था कि तत्कालिन व्यवस्था में झारखंड़ी पीस रहे थे। उस तत्कालीन व्यवस्था में उनकी समस्याओं का निदान उन्हें दूर तक दिखाई नहीं देता था। स्वाभाविक था कि वे स्वंय अपनी समस्याओं के समाधान के लिए आगे आते तथा स्व-शासन की ओर प्रेरित होते। पुराने मानकी-मुंड़ा-महतोई परगनैत आदि आदिवासी जनजाति शासन पद्धति की ओर बढ़े जो उनकी अपनी परम्परागत एवं रीति-रिवाज की उपज थी। जो उनका अपना स्वशासन था और जिसको उन्हें मजबूरी में छोड़ना पड़ा था। ब्रिटिश हुकुमत की व्यवस्था को अपनाना पड़ा था। उसी व्यवस्था को अपनाना पड़ा था। वही व्यवस्था हू-बू-हू स्वतंत्र भारत में भी लागू की गई थी। जाहिर है कि जनजातियों का आक्रोश उसी ब्रिटिश व्यवस्था को बल पूर्वक झारखंड़ी व्यवस्था पर लागू करने के विरूद्ध था। इसके लिए कितनी ही लड़ाइयाँ पूर्व में लड़ी गई थी। अतः पूनः स्वशासन की तरफ लोट जाने का आह्वान जो बिनोद बाबू ने दिया था, वह सबको ग्राह्य था। पर यह आन्दोलन था तो व्यवस्था-विरोधी। पर इसे व्यवस्था-विरोधी भी कहना गलत ही होगा। क्योंकि पंच-परमेश्वर है- यह सिद्धांत भारत वर्ष में हजारों वर्षो से चलता रहा है एवं लागू होता रहा है। तो अगर बिनोद बाबू ने फिर गाँव में ही पंचायत बुलाकर समस्याओं के समाधान की ओर कदम बढ़ाया तो उसे गलत कैसे कहा जा सकता है।
पर, गलत कहा गया। आरोप लगाए गये। ब्रिटिश शाषन-पद्धति जो आजाद भारत में हू-ब-हू लागू की गयी, उसके हित में बिनोद बाबू के कार्य कलाप नहीं थे। वे आम जनता के हित में थे। उनपर मुकदमे लादे गये। उन्हें आतंकवादी नेता करार कर दिया गया। और झामुमो के आन्दोलन को आतंकवादी आन्दोलन।
विस्थापन के विरूद्ध लड़ाई किस प्रकार लड़ी गई ? इसका जो तरीका बिनोद बाबू ने आख्तीयार किया वह भी नायाब था। अद्भूत था। टाटा कम्पनी की खदानें जिला धनबाद के जामाडोबा, डूंगरी, पटिया, भौंरा क्षेत्रों में है। साथ ही सिजुआ-भेलाटाँड़ में। फिर हजारीबाग के मांडू इलाके में कई खदानें हैं। टाटा कम्पनी वह कम्पनी है जिसकी कोयला-खदानों का राष्ट्रीयकरण नहीं किया गया। “केपटिव माइन्स” के दायरे में रखकर उन्हें राष्ट्रीयकरण से बाहर रखा गया। टाटा कम्पनी की जमशेदपुर में स्टील उत्पादन का विशाल कारखाना है। सिंहभूम जिले में लौह-अयस्क को गलाने के लिए कोयले की आवश्यकता पड़ती है। इस कम्पनी में सिर्फ कांग्रेस एवं उसकी यूनियन चलती थी। और किसी की भी बात सुनी नहीं जाती थी। टाटा कम्पनी अपने गुंड़ो के बल पर जो काँग्रेस की यूनियन के लोग होते थे और झारखंड़ से बाहरी मूल के होते थे, पूरे इलाके को आतंकित करके रखती थी। अगल बगल के गाँव के लोग जबान तक खोल नहीं सकते थे।
ऐसे माहौल में टाटा कम्पनी से विस्थापितों के लिए न्याय माँगना नक्कारखाने में तूती की आवाज साबित हो रही थी। पर बिनोद बाबू ने माँग नहीं, माँग करके जामाडोबा के पास बहती जोड़िया यानि छोटी नाली को अपने आन्दोलन का स्थल चुना। उन्होंने एक स्थान पर गाँव वालों को इकठ्ठा किया और गैंता-कुदाल लेकर स्वयं जोड़िया में उतरे। उनके पीछे सैकड़ों लोग थे। सभी मिलकर वहाँ पर मिट्टी से जोड़िया पर बाँध बाँधने लगे। अगल बगल के कॉलोनी निवासी एवं टाटा के ऑफिसरों ने सोचा कि ये लोग पागल हो गये हैं। नाला बाँधने से कहीं आन्दोलन होता है। पर जब बाँध बँध गया, दिनभर की मेहनत से, तभी लोगों को इसका प्रभाव नजर आया। पानी जमा हो गया और यह पानी बगल के कोयले की खदान में घुसने लगा। टाटा कम्पनी के ऑफिसरों को तब चिंता हुई कि अगर इसी तरह पानी घूसता रहा तो खदान बंद कर देना पड़ेगा। तब सिक्यूरिटी के लोग आए। बिनोद बाबू ने कहा कि यह जोड़िया सार्वजनिक सम्पत्ति है और इसमें बाँध-बाँधकर के गाँव के लोग अपने खेत की सिंचाई की व्यवस्था कर रहें हैं। इसे रोकने का अधिकार टाटा कम्पनी को नहीं है।
इसके बाद टाटा कम्पनी को झूकना पड़ा और वार्त्ता हुई तथा गाँव वालों एवं विस्थापितों की समस्याओं पर ध्यान दिया गया। नियोजन की पहल शुरू हुई। इस तरह के जन आन्दोलनों के चलते ही बड़ी-बड़ी कम्पनियों को विस्थपितों पर ध्यान देना पड़ा। भारत कोकिंग कोल लिमिटेड की कोलियारी में पहुँचने के लिए गाँव के रास्तों से फिर या तो रैयती जमीनों से होकर गुजरना जरूरी था। कोयला ट्रान्सपोर्ट रोड से करने के लिए, अफसरों के आवागमन के लिए, भीतर गाँव तक तथा खदानों तक जाने के लिए बीसीसीएल द्वारा जमीन अधिग्रहित नहीं की गई थी। लिहाजा बिनोद बाबू ने इन रास्तों को रोकवाना शुरू किया। बहुत सारी जमीनों पर बीसीसीएल ने जबरन कब्जा किया था। उन जमीनों पर मशीनों को चलाने पर रोक लगा दी गई। मशीनों पर झंड़े गाड़े गये।
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