इस रिपोर्ट में जो सबसे महत्वपूर्ण बात सामने रखी, वह यह है कि जिन कारणों से राज्य पुर्नगठन आयोग ने झारखण्ड़ अलग राज्य की माँग को ठुकरा दिया था, उन कारणों को इस समिति की रिपोर्ट ने गलत ठहरा दिया।
इस समिति ने जो दूसरी महत्वपूर्ण बात कही, वह यह कि अब तक के जितने उपाय संविधान की पाँचवी सूची के अन्तर्गत इस क्षेत्र के विकास के लिए किए गये थे, वे सभी उपाय नाकामयाब साबित हुए थे। इस रिपोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि अब तक सारे प्रयास इस क्षेत्र को पाँचवीं सूची के अन्दर शामिल मानकर किए गये थे।
इस रिपोर्ट ने अपने अध्याय-तीन पारा चौबिस में यह स्पष्ट कर दिया कि “झारखण्ड़ आन्दोलन के इतिहास में जो उल्लेखनीय बात हुई है, वह आदिवासी और गैर-आदिवासी आबादी का एक जूट होना है। इस आन्दोलन में मुंड़ा, संथाल, हो और उराँव जैसे बड़े-बड़े आदिवासी समूहों और कुर्मी जैसे गैर-आदिवासी समुहों और अन्य जातियों का दबदबा है परन्तु अन्य जातियाँ भी इसमें शामिल हुई है। छोटे-छोटे आदिवासी ग्रुपों के सम्बन्ध में सूचना कम है। इस तरह झारखंड़ आन्दोलन का सामाजिक आधार पिछले बीस वर्षों में काफी फैला है।”
इस रिपोर्ट ने यह बात कह कर यह स्पष्ट कर दिया था कि 1970 से इस आन्दोलन का सामाजिक आयाम बढ़ा था। रिपोर्ट 1990 में लिखी जा रही थी और सामाजिक आयाम के बढ़ने की बात पिछले 20 वर्षों से की गई थी। इसका मतलब ही यही था कि झारखंड़ मुक्ति मोर्चा के गठन के बाद से ही आदिवासी तथा गैर-आदिवासियों का संयुक्त आन्दोलन चला। 1990 तक निश्चय ही इस आन्दोलन को मात्र आदिवासियों का आन्दोलन बतलाया गया था। इसे अब अल्पमत का नहीं कहा जा सकता था। बिनोद बिहारी महतो के झामुमो के संस्थापक- अध्यक्ष होने के साथ ही स्थिति में बदलाव शुरू हो गया था, क्योंकि उनके साथ अन्य गैर-आदिवासी समूह भी शामिल हुए जिसमें कोयलांचल के मजदूर भी थे।
इस समिति ने यह भी स्पष्ट कर दिया था कि “पिछले चालीस वर्षो से झारखंड़ क्षेत्र की एक अलग पहचान भाषा, सांस्कृतिक धारा, भौतिक विकास की एक स्पष्ट अवधारणा रही है।” इस रिपोर्ट ने स्वीकार किया कि “उपनिवेशकालीन समय में इस प्रदेश का तीन अथवा चार राज्यों में विभाजन हो गया। राजनैतिक तथा प्रशासनिक राज्यों में यह विभाजन बना हुआ है, लेकिन प्रशासनिक सीमाओं के आर-पार लोगों में परस्पर सांस्कृतिक आदान-प्रदान रूका नहीं है, वास्तव में यह विकसित हुआ है।”
झारखंड़ मामलों से संबंधित समिति ने मई 1990 में यह स्पष्ट सुझाव दे दिया कि “इसिलिए हमें इस क्षेत्र को स्पष्ट सांस्कृतिक पहचानवाले क्षेत्र के रूप में मान लेना चाहिए जिसका विकास लोगों के सम्पूर्ण विकास के एक भाग के रूप में किया जाना चाहिए।”
चूँकि इसी रिपोर्ट ने यह साबित कर दिया था कि अब तक के विकास के लिए अपनाए गये उपाय जो संविधान की पाँचवी सूची के तहत अपनाए गये थे, इस क्षेत्र के विकास में कामगार सिद्ध नहीं हुए थे, कुछ अन्य उपाय करने चाहिए। यानि इस समिति की रिपोर्ट ने यह इंगित कर दिया था कि जितने प्रकार के परिषद् या बोर्ड बनाए गये थे, सभी विफल साबित हुए थे।
पर, इस क्षेत्र का विकास कैसे हो, इस अहम् सवाल का जबाव भी इसी रिपोर्ट ने दे दिया था। अपने अध्याय छः “निष्कर्ष” शीर्षक के अन्तर्गत पारा ग्यारह में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि “झारखंड़ जनसमुदाय के पहले दो वर्गो अर्थात आदिवासी समूह और मूल गैर-आदिवसी समूह का भविष्य एक दूसरे से जुड़ा रहा। इन दोनों समूहों की संस्कृति और इतिहास एक समान है। .................. परिणाम यह है कि आज दो वर्गो ने एक समान उद्देश्य रखा है यह जब एक जातीय वर्ग का दूसरी जाति या एक धार्मिक समुदाय का दूसरे का प्रश्न नहीं है। बाहरी शोषणकर्त्ताओं के विरूद्ध मन की भावना से इन दो वर्गो को एक अलग झारखंड़ राज्य के लिए एकीकृत किया है। आशा है कि वर्त्तमान सामाजिक आर्थिक लक्ष्य को लेकर एक धर्मनिरपेक्ष झारखंड़ राज्य का परिणाम हो। यदि ऐसा होता हे तो उन सभी लोगों को प्रसन्नता होगी जो संविधान की प्रस्तावना की भावना का मूल्य समझते है।”
इस समिति की रिपोर्ट के उपर वर्णित तथ्यों को दखने के बाद इस बात पर कोई संदेह ही नहीं रह जाना चाहिए कि झारखंड़ क्षेत्र का मतलब दक्षिण बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा एवं मध्यप्रदेश के समीपवर्ती इलाके हैं जिनकी समान सभ्यता-संस्कृति है। इसकी एक अलग पहचान भी है। अब इस बात पर संदेश नहीं होना चहिए कि इस क्षेत्र को ही अलग राज्य का दर्जा मिल जाना चाहिए।
पर, बड़ी हैरत की बात है कि झारखंड़ अलग राज्य के संबंध में हमेशा ही बौधिक बेईमानी की जाती रही है। राज्य पुर्नगठन आयोग ने अगर 1955-56 में सही तथ्यों को लिखा होता तो निश्चय ही झारखण्ड़ अलग राज्य बनाने की अनुशंसा की गई होती और अन्य राज्यों के साथ-साथ इसके गठन की प्रक्रिया भी शुरू कर दी जाती। वहाँ उस समय भी बौधिक बेईमानी की गई। इसे सिर्फ आदिवासियों का आन्दोलन करार दिया गया। अन्य कारण जो अलग राज्य नहीं बनाने के लिए दर्शाये गये थे, वे भी भ्रामक एवं तथ्यों से परे थे। इस बार तो गजब ही किया गया। समिति की रिपोर्ट में सही तथ्यों को तो रखा गया एवं निष्कर्ष भी सही निकाले गये पर जो सुझाव दिए गये इस क्षेत्र के लिए वह सर्वथा गलत रहे। यहाँ भी अन्य प्रकार की बौधिक बेईमानी की गई।
राज्य पुर्नगठन आयोग के दिनों में सबसे सशक्त पार्टी झारखंड़ी पार्टी के प्रमुख नेता श्री जयपाल सिंह ने अलग राज्य बनाने के लिए आयोग पर कोई दबाव नहीं दिया। उदासीन रहे। हो सकता है, इसी कारण आयोग को बौधिक बेइमानी करने का मौका मिल गया।
इस बार भी कहीं न कहीं किसी के कारण उलटे सुझाव दे दिये गये। झामुमो के तत्कालीन अध्यक्ष शिबू सोरेन ने समिति पर ऐसा कोई दबाव नहीं दिया। बल्कि कालान्तर में पता चला कि वे ही एक प्रकार के परिषद् के समर्थक बन गये थे।
इस बात का उल्लेख करना यहाँ जरूरी हो गया है कि 1978 में ही बिहार विधान सभा द्वारा “झारखंड़ विकास परिषद् 1978” का गठन किया गया था। इसका भी जिक्र करना आवश्यक है कि ठीक राज्य पुर्नगठन आयोग के गठन के पूर्व 1951 में, बिहार जनजातीय सलाहकार परिषद् बनाया गया था। फिर 1971 में छोटानागपुर संथाल परगना स्वायत्त विकास प्राधिकरण बनाया गया था। इधर झारखंड़ विषयक समिति अपना दौरा कर रही थी। रिपोर्ट तैयार कर रही थी, तो दूसरी तरफ बिहार सरकार इसे भ्रमित करने के लिए झारखंड़ क्षेत्र विकास परिषद् 1991 के विधेयक का निर्माण कर उसे पारित कराने में लगी थी। इस विधेयक द्वारा पूर्व के छोटानागपुर संथाल परगना स्वशासी विकास प्राधिकरण 1971 एवं उसके बाद के संशोधनों को निरस्त कर दिया गया था और 1/8/1991 को 1991 एवं उसके बाद के संशोधनों को निरस्त कर दिया गया। मई 1990 के झारखंड़ मामलों से संबंधित समिति की रिपोर्ट मई 1990 उसी प्रकार ठढ़े बस्ते में पड़ी रही।
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Sunday, March 6, 2011
Saturday, June 5, 2010
झारखण्ड की संस्कृति एंव सभ्यता
झारखण्ड की संस्कृति एंव सभ्यता : झारखण्ड क्षेत्र में बहूतायात जनसंख्या जनजातीय थी। ये आदिम लोग थे और कबिलाओं में निवास करते थे। इनकी संस्कृति आदिम संस्कृति रही है। कबिलाई जनसंख्या के सास्कृतिक विकास को हम तीन चरणों में बाँट सकते हैं। आदिम कबिले की आदिम जनजाति संस्कृति। दूसरे हिन्दु प्रभावित आदिम संस्कृति एंव तृतीय ईशाई प्रभावित आदिम संस्कृति। कबिलावाची जनजाति संस्कृति यानि कबिलाई जनजाति संस्कृति दो धाराओं में मूलत: विभक्त है। द्रविड़ संस्कृति एवं आस्ट्रीक संस्कृति। झारखण्ड क्षेत्र में प्राचीन युग में अति आदिम, (प्रमीटीव) जनजातियों के अपने स्थाई रूप से बसने के कारण द्रविड़ संस्कृति एवं आस्ट्री् संस्कृति एक दूसरे को किसी न किसी रूप में प्रभावित किया है। आदिम जनजाति अपने परम्परागत रीति-रिवाज से शासित होते है। इनकी अपनी प्रथाएँ है यानि चलन है जिनसे ये प्रशासित होते है। झारखण्ड़ के जनजाति मूर्तिपूजक नहीं, प्रकृति पूजक थे। ये हिन्दु धर्म के धारक या वाहक नहीं थे। सरना अथवा जाहिरा धर्म को मानते थे। यहाँ निवास करनेवाली जातियों की संस्कृति वैदिक नहीं थी। इनकी संस्कृति थी, कुड़मी-संस्कृति, संथाल-संस्कृति, खड़िया, उराँव, मुंड़ा संस्कृति आदि।
कालान्तर में हिन्दू विधि द्वारा प्रशासित आर्य यानि हिन्दू संस्कृति के लोगों का प्रवेश झारखण्ड़ में हुआ। अधिक विकसित क्षेत्र के लोग कम विकसित क्षेत्र के लोगों के ऊपर हावी होने का प्रयास करते हैं। हिन्दू-संस्कृति को झारखण्ड़ क्षेत्र में व्यापक प्रचार-प्रसार के माध्यम से लादा या थोपा गया। गाँव-गाँव में रामायण, महाभारत की कथाओं का प्रचार-प्रसार ब्राह्मणों के द्वारा किया गया। द्रविड़ एवं आंस्ट्रिक संस्कृति बाहर के हिन्दू-संस्कृति द्वारा प्रभावित हुआ। पर साथ ही हिन्दू धर्म भी इन संस्कृतियों से प्रभावित हुआ। केला, सुपाड़ी, नारियल, ईंख एवं सिंदूर मूलत: द्रविड़ संस्कृति की नेवेद्य है। इसे हिन्दू संस्कृति ने अपनाया है।
झारखण्ड़ के विषय में, वहाँ की जातीय परिस्थिति को समझने के पहले जनजाति की क्या विशेषताएँ होती है, इसपर थोड़ी चर्चा करना आवश्यक है एवं महत्वपूर्ण है। क्योंकि झारखण्ड़ आन्दोलन का मूल वहाँ की जातीय परिस्थिति एवं संस्कृति है। झारखण्ड़ी राष्ट्रीयता को समझने के लिए वहाँ निवास करने वाली जनजातियों की विशेषताओं को जान लेना जरूरी होगा।
जनजाति का निर्माण कई गोंष्ठियों के संकलन से होता है। एक गोष्ठी एक परिवार ही रहा है। जनसंख्या की वृद्धि के चलते परिवारों की संख्या में वृद्धि होती है। परिवार ही जनजाति समाज की मौलिक ईकाई है। जनजाति परिवार या गोष्ठी का ही एक विस्तृत रूप है। जैसे मुंड़ा जनजाति में सोंय, पूर्ति, बोदरा, तिडू, भेंगरा इत्यादि, संथाल जनजाति में हेम्ब्रम, हाँसदा, सोरेन, मरांड़ी, बेसरा इत्यादि। कुड़मी जनजाति में सांखुआर, टिडुआर, मुतरूआर, काडूआर आदि। कुडुक जनजाति में कुजुर, मिंज, खेस, किसपोट्टा, सांखआर, तिग्गा आदि खड़िया जनजाति में बाः, किडो, बिलुंग आदि। हो जनजाति में तुबिद, तियू, लुगुन इत्यादि। इन गोष्ठियों को अंग्रेजी में ट्राइब कहा जाता है, जिसका अर्थ गण या दल है।
जनजाति टोटेमिक होते है। अंग्रेजी शब्द टोटेम का अर्थ है विश्वास। ट्राइब संगठित जनजाति किसी भौतिक पदार्थ, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, फूल-फल, किड़े-मकोड़े, जल-जीव आदि से अपना एक रहस्यमय संबंध होने का दावा करते हैं। वे ही ट्राइव या गोष्ठी नाम से जाने पहचाने जाते हैं। उनपर विश्वास या टोटेम मानते है।
जनजाति टाबू मानते हैं। टाबू (Taboo) का अर्थ धार्मिक विधि या निषेद्य या व्यवहार में नहीं लाने, बध नहीं करने अथवा खाने में व्यवहृत नहीं करने से होता है। जनजाति में प्रत्येक गोष्ठी का एक निषिद्य पदार्थ होता है।
प्रत्येक जनजाति को किसी एक न एक विशिष्ट नाम से जाना जाता है। जैसे कुड़मी, मुंड़ा, उराँव, हो, खड़िया आदि।
जनजाति का एक निश्चित भू-भाग होता है। उनका एक निर्दिष्ट परम्परागत निवास भूमि होती है। किन्तु इस सम्बन्ध में विद्वानों के विचारों में भिन्नता है। डा0 रिचर्ड का मत है कि जनजाति के लिए एक निश्चित स्थाई निवास भूमि होना आवश्यक नहीं है। कई जनजातियाँ घुमक्कड़ जीवन व्यतीत करती है। किन्तु डा0 मजूमदार का मत है कि घुमक्कड़ जनजातियाँ एक निश्चित भू-भाग यानि एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में ही घुमती है, सभी जगहों पर नहीं। वैसे झारखण्ड़ क्षेत्र में बसने वाली अधिकत्तर जनजातियाँ इस क्षेत्र की स्थाई निवासी हैं। घुमक्कड़ जातियाँ भी इस क्षेत्र से बाहर नहीं निकली।
प्रत्येक जनजाति की अपनी कविलावाची भाषा होती है जिसका प्रयोग उस जनजाति के सभी लोग करते हैं। जनजाति भाषा का हस्तान्तरण प्रमुख रूप से मौखिक रूप से होता है। इन जातियों की भाषाओं को लिपिबद्ध करने का प्रयास जनजातियों ने कम किया है। अतः इनकी लिपि नहीं मिलीती। हाल-फिलहाल में ‘’लिपि ‘’ तैयार करने की चेष्टा की गई है। वर्त्तमान मे भी कुड़मी जनजाति कुड़माली भाषा का प्रयोग करती है। संथाल जनजाति की भाषा संथाली, उराँव जनजाति की कुडुक है। बाहरी लोगों के सम्पर्क में आ जाने के कारण तथा हिन्दी के राष्ट्रीय भाषा बन जाने के कारण तथा अन्य भाषा-भाषियों के सम्पर्क के फलस्वरूप अनेक बाहरी शब्दों का समावेश इन भाषाओं में हो गया है।
जनजाति व्यक्तिवादी नहीं होता। समाजवादी या समाजमूखी होता है। एक निश्चित भू-भाग के दायरे में रहने के कारण तथा अपने जीवन-ज्ञापन के कार्यो को समाज के अन्य लोगों के द्वारा सहभागिता के आधार पर करने के कारण जनजाति में सामुदायिक भावना पाई जाति है। ये परस्पर सहयोग से जीने के अभ्यस्त होते हैं। शिकार करना, जंगलों में प्रवेश करना, खेती करना, सिचाईं करना, मछली मारना आदि सभी काम गाँव के सभी लोग या अधिकत्तर लोग एकजूट होकर करते है।
कालान्तर में हिन्दू विधि द्वारा प्रशासित आर्य यानि हिन्दू संस्कृति के लोगों का प्रवेश झारखण्ड़ में हुआ। अधिक विकसित क्षेत्र के लोग कम विकसित क्षेत्र के लोगों के ऊपर हावी होने का प्रयास करते हैं। हिन्दू-संस्कृति को झारखण्ड़ क्षेत्र में व्यापक प्रचार-प्रसार के माध्यम से लादा या थोपा गया। गाँव-गाँव में रामायण, महाभारत की कथाओं का प्रचार-प्रसार ब्राह्मणों के द्वारा किया गया। द्रविड़ एवं आंस्ट्रिक संस्कृति बाहर के हिन्दू-संस्कृति द्वारा प्रभावित हुआ। पर साथ ही हिन्दू धर्म भी इन संस्कृतियों से प्रभावित हुआ। केला, सुपाड़ी, नारियल, ईंख एवं सिंदूर मूलत: द्रविड़ संस्कृति की नेवेद्य है। इसे हिन्दू संस्कृति ने अपनाया है।
झारखण्ड़ के विषय में, वहाँ की जातीय परिस्थिति को समझने के पहले जनजाति की क्या विशेषताएँ होती है, इसपर थोड़ी चर्चा करना आवश्यक है एवं महत्वपूर्ण है। क्योंकि झारखण्ड़ आन्दोलन का मूल वहाँ की जातीय परिस्थिति एवं संस्कृति है। झारखण्ड़ी राष्ट्रीयता को समझने के लिए वहाँ निवास करने वाली जनजातियों की विशेषताओं को जान लेना जरूरी होगा।
जनजाति का निर्माण कई गोंष्ठियों के संकलन से होता है। एक गोष्ठी एक परिवार ही रहा है। जनसंख्या की वृद्धि के चलते परिवारों की संख्या में वृद्धि होती है। परिवार ही जनजाति समाज की मौलिक ईकाई है। जनजाति परिवार या गोष्ठी का ही एक विस्तृत रूप है। जैसे मुंड़ा जनजाति में सोंय, पूर्ति, बोदरा, तिडू, भेंगरा इत्यादि, संथाल जनजाति में हेम्ब्रम, हाँसदा, सोरेन, मरांड़ी, बेसरा इत्यादि। कुड़मी जनजाति में सांखुआर, टिडुआर, मुतरूआर, काडूआर आदि। कुडुक जनजाति में कुजुर, मिंज, खेस, किसपोट्टा, सांखआर, तिग्गा आदि खड़िया जनजाति में बाः, किडो, बिलुंग आदि। हो जनजाति में तुबिद, तियू, लुगुन इत्यादि। इन गोष्ठियों को अंग्रेजी में ट्राइब कहा जाता है, जिसका अर्थ गण या दल है।
जनजाति टोटेमिक होते है। अंग्रेजी शब्द टोटेम का अर्थ है विश्वास। ट्राइब संगठित जनजाति किसी भौतिक पदार्थ, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, फूल-फल, किड़े-मकोड़े, जल-जीव आदि से अपना एक रहस्यमय संबंध होने का दावा करते हैं। वे ही ट्राइव या गोष्ठी नाम से जाने पहचाने जाते हैं। उनपर विश्वास या टोटेम मानते है।
जनजाति टाबू मानते हैं। टाबू (Taboo) का अर्थ धार्मिक विधि या निषेद्य या व्यवहार में नहीं लाने, बध नहीं करने अथवा खाने में व्यवहृत नहीं करने से होता है। जनजाति में प्रत्येक गोष्ठी का एक निषिद्य पदार्थ होता है।
प्रत्येक जनजाति को किसी एक न एक विशिष्ट नाम से जाना जाता है। जैसे कुड़मी, मुंड़ा, उराँव, हो, खड़िया आदि।
जनजाति का एक निश्चित भू-भाग होता है। उनका एक निर्दिष्ट परम्परागत निवास भूमि होती है। किन्तु इस सम्बन्ध में विद्वानों के विचारों में भिन्नता है। डा0 रिचर्ड का मत है कि जनजाति के लिए एक निश्चित स्थाई निवास भूमि होना आवश्यक नहीं है। कई जनजातियाँ घुमक्कड़ जीवन व्यतीत करती है। किन्तु डा0 मजूमदार का मत है कि घुमक्कड़ जनजातियाँ एक निश्चित भू-भाग यानि एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में ही घुमती है, सभी जगहों पर नहीं। वैसे झारखण्ड़ क्षेत्र में बसने वाली अधिकत्तर जनजातियाँ इस क्षेत्र की स्थाई निवासी हैं। घुमक्कड़ जातियाँ भी इस क्षेत्र से बाहर नहीं निकली।
प्रत्येक जनजाति की अपनी कविलावाची भाषा होती है जिसका प्रयोग उस जनजाति के सभी लोग करते हैं। जनजाति भाषा का हस्तान्तरण प्रमुख रूप से मौखिक रूप से होता है। इन जातियों की भाषाओं को लिपिबद्ध करने का प्रयास जनजातियों ने कम किया है। अतः इनकी लिपि नहीं मिलीती। हाल-फिलहाल में ‘’लिपि ‘’ तैयार करने की चेष्टा की गई है। वर्त्तमान मे भी कुड़मी जनजाति कुड़माली भाषा का प्रयोग करती है। संथाल जनजाति की भाषा संथाली, उराँव जनजाति की कुडुक है। बाहरी लोगों के सम्पर्क में आ जाने के कारण तथा हिन्दी के राष्ट्रीय भाषा बन जाने के कारण तथा अन्य भाषा-भाषियों के सम्पर्क के फलस्वरूप अनेक बाहरी शब्दों का समावेश इन भाषाओं में हो गया है।
जनजाति व्यक्तिवादी नहीं होता। समाजवादी या समाजमूखी होता है। एक निश्चित भू-भाग के दायरे में रहने के कारण तथा अपने जीवन-ज्ञापन के कार्यो को समाज के अन्य लोगों के द्वारा सहभागिता के आधार पर करने के कारण जनजाति में सामुदायिक भावना पाई जाति है। ये परस्पर सहयोग से जीने के अभ्यस्त होते हैं। शिकार करना, जंगलों में प्रवेश करना, खेती करना, सिचाईं करना, मछली मारना आदि सभी काम गाँव के सभी लोग या अधिकत्तर लोग एकजूट होकर करते है।
Sunday, April 11, 2010
संवैधानिक सुधार की प्रक्रिया
संवैधानिक सुधार की प्रक्रिया : अनुसूचित जिला अधिनियम 1874 से अनुसूचित जिलों की परिकल्पना शुरू हुई। कार्यपालिका को किसी अनुसूचित जिलों को साधारण कानून के प्रचालन से अलग करने और उसे आवश्यक संरक्षण प्रदान करने की शक्ति प्राप्त थी। वास्तव में इस अधिनियम का आशय असम के कुछ क्षेत्रों का जिसका एक पृथक प्रदेश के रूप में 1874 में गठन किया गया था, प्रशासन करना था।
भारत सरकार अधिनियम 1919 के पहले 1918 में मॉटंगू चेम्सफोर्ड की रिपोर्ट में यह कहा गया कि शेष भारत के लिए परिकल्पित राजनितिक सुधार पिछड़े क्षेत्रों पर लागू नहीं हो सकते, क्योंकि ऐसा कुछ भी विद्यमान नहीं था जिसपर राजनैतिक संस्थाओं को आधारित किया जा सके।
भारत सरकार अधिनियम 1919 में इन भू-भागों को दो श्रेणियों में विभाजित किया गया था। कुछ क्षेत्र इतने अधिक पिछड़े हुए माने गये कि उन्हें सुधारों के क्षेत्रों से “पूर्णतया वहिष्कृत” किया गया ? अन्य पिछड़े क्षेत्रों पर “आंशोधित वहिष्करण” की प्रणाली लागू की गई थी। इस संवैधानिक परिवर्त्तन का मुख्य जोर यह सुनिश्चित करने पर था कि भारतीय विधान मंड़ल का कोई अधिनियम गर्वनर जनरल इन कांउसिल के विशिष्ट आदेश के बिना “पिछड़े-भू-भागों” पर लागू न हो। 1974 का अनुसूचित जिला अधिनियम रद्द कर दिया गया था।
साइमन कमीशन की रिपोर्ट में इस बात को स्पष्ट भांप लिया गया था कि इन क्षेत्रों के संबंध में सरकार की नीति क्या होनी चाहिए। रिपोर्ट में यह कहा गया “पिछड़े क्षेत्रों के प्रति सरकार का उत्तरदायित्व केवल मात्र इस बात से पूरा नहीं हो जायेगा कि उन्हें शोषण से संरक्षण प्रदान कर दिया गया है और वहाँ समय-समय पर फैलानी वाली गड़बड़ी की रोकथाम कर दी गई है। प्रशासन का प्रमुख उत्तरदायित्व इन क्षेत्रों के लोगों को शिक्षित करना है ताकि वे अपने पाँवों पर खड़े हो सके और इस दिशा में लगभग नहीं के बराबर शुरूआत की गई है। आयोग ने सिफारिश की कि इन “बहिष्कृत क्षेत्रों” के विकास के लिए निधियों की आवश्यकता है और ये निधियाँ केन्द्र द्वारा उपलब्ध कराई जा सकती है। इन क्षेत्रों के प्रशासन के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा अखिल भारतीय सेवाओं के माध्यम से राज्यपालों की एजेन्सी का उपयोग किया जाना चाहिए। इसने “आंशिक रूप से बहिष्कृत क्षेत्रों” के लिए अलग ढ़ंग की पद्धति का सुझाव दिया है।
भारत-सरकार अधिनियम 1935 में “पिछड़े क्षेत्रों” को “वहिष्कृत क्षेत्रों” एवं “आंशिक रूप से वहिष्कृत क्षेत्रों” के रूप में वर्गीकृत किया गया है। “वहिष्कृत क्षेत्रों” को राज्यपाल के स्वविवेक से कार्य करने के लिए राज्यपाल के व्यक्तिगत शासन के तहत में रखा गया था, जबकि आंशिक रूप से वहिष्कृत क्षेत्र मंत्रालय के उत्तरदायित्व के क्षेत्राधिकार में आते हैं। राज्यपाल इन क्षेत्रों के प्रशासन के संबंध में विशेष उत्तरदायित्व का निर्वाह करते थे, और यदि वह उचित समझे तो अपने व्यक्तिगत निर्णय के फलस्वरूप मंत्रियों के निर्णय के विरूद्ध व्यवस्था देने का अधिकार प्राप्त था। राज्यपाल के निर्देशों के बिना संघीय या प्रादेशिक विधानमंड़ल का कोई कानून इन क्षेत्रो पर प्रयोक्तव्य नहीं था। इस अधिनियम में भी “जनजाति क्षेत्रों” को भारत की सीमाओं के साथ लगे क्षेत्रों के रूप में परिभाषित किया गया था।
भारत सरकार अधिनियम 1919 के पहले 1918 में मॉटंगू चेम्सफोर्ड की रिपोर्ट में यह कहा गया कि शेष भारत के लिए परिकल्पित राजनितिक सुधार पिछड़े क्षेत्रों पर लागू नहीं हो सकते, क्योंकि ऐसा कुछ भी विद्यमान नहीं था जिसपर राजनैतिक संस्थाओं को आधारित किया जा सके।
भारत सरकार अधिनियम 1919 में इन भू-भागों को दो श्रेणियों में विभाजित किया गया था। कुछ क्षेत्र इतने अधिक पिछड़े हुए माने गये कि उन्हें सुधारों के क्षेत्रों से “पूर्णतया वहिष्कृत” किया गया ? अन्य पिछड़े क्षेत्रों पर “आंशोधित वहिष्करण” की प्रणाली लागू की गई थी। इस संवैधानिक परिवर्त्तन का मुख्य जोर यह सुनिश्चित करने पर था कि भारतीय विधान मंड़ल का कोई अधिनियम गर्वनर जनरल इन कांउसिल के विशिष्ट आदेश के बिना “पिछड़े-भू-भागों” पर लागू न हो। 1974 का अनुसूचित जिला अधिनियम रद्द कर दिया गया था।
साइमन कमीशन की रिपोर्ट में इस बात को स्पष्ट भांप लिया गया था कि इन क्षेत्रों के संबंध में सरकार की नीति क्या होनी चाहिए। रिपोर्ट में यह कहा गया “पिछड़े क्षेत्रों के प्रति सरकार का उत्तरदायित्व केवल मात्र इस बात से पूरा नहीं हो जायेगा कि उन्हें शोषण से संरक्षण प्रदान कर दिया गया है और वहाँ समय-समय पर फैलानी वाली गड़बड़ी की रोकथाम कर दी गई है। प्रशासन का प्रमुख उत्तरदायित्व इन क्षेत्रों के लोगों को शिक्षित करना है ताकि वे अपने पाँवों पर खड़े हो सके और इस दिशा में लगभग नहीं के बराबर शुरूआत की गई है। आयोग ने सिफारिश की कि इन “बहिष्कृत क्षेत्रों” के विकास के लिए निधियों की आवश्यकता है और ये निधियाँ केन्द्र द्वारा उपलब्ध कराई जा सकती है। इन क्षेत्रों के प्रशासन के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा अखिल भारतीय सेवाओं के माध्यम से राज्यपालों की एजेन्सी का उपयोग किया जाना चाहिए। इसने “आंशिक रूप से बहिष्कृत क्षेत्रों” के लिए अलग ढ़ंग की पद्धति का सुझाव दिया है।
भारत-सरकार अधिनियम 1935 में “पिछड़े क्षेत्रों” को “वहिष्कृत क्षेत्रों” एवं “आंशिक रूप से वहिष्कृत क्षेत्रों” के रूप में वर्गीकृत किया गया है। “वहिष्कृत क्षेत्रों” को राज्यपाल के स्वविवेक से कार्य करने के लिए राज्यपाल के व्यक्तिगत शासन के तहत में रखा गया था, जबकि आंशिक रूप से वहिष्कृत क्षेत्र मंत्रालय के उत्तरदायित्व के क्षेत्राधिकार में आते हैं। राज्यपाल इन क्षेत्रों के प्रशासन के संबंध में विशेष उत्तरदायित्व का निर्वाह करते थे, और यदि वह उचित समझे तो अपने व्यक्तिगत निर्णय के फलस्वरूप मंत्रियों के निर्णय के विरूद्ध व्यवस्था देने का अधिकार प्राप्त था। राज्यपाल के निर्देशों के बिना संघीय या प्रादेशिक विधानमंड़ल का कोई कानून इन क्षेत्रो पर प्रयोक्तव्य नहीं था। इस अधिनियम में भी “जनजाति क्षेत्रों” को भारत की सीमाओं के साथ लगे क्षेत्रों के रूप में परिभाषित किया गया था।
Tuesday, March 30, 2010
बड़ी व्यापक एवं विचित्र है ब्रह्मांड की व्यवस्था
ब्रह्मांड
की यह व्यवस्था बड़ी व्यापक एवं विचित्र है। कहते हैं कि ब्रह्माड़ में कई सौर-मंडल है। कई सूर्य है।हॉल ही में वैज्ञानिकों ने यह भी पता लगाया है कि इस ब्रह्माड़ में, अंतरिक्ष में कई ऐसे शून्य हैं जिसके अन्दर अगर कोई ग्रह, तारे आदि चले जाएँ तो क्षण में उसके टुकड़े-टुकड़े हो जायें। एक ऐसे भी शून्य यानि “ब्लैक हॉल” का पता चला है जो हमारे सूर्य से भी पन्द्रह-सोलह अरब गुणा आकार में बड़ा है। सूर्य भी अगर उसमें घुस जाए तो वह भी धूल-कणों में परिवर्तित हो जाए।पर बड़े आश्चर्य की बात है कि पूरी व्यवस्था, सौर मंड़लों की व्यवस्था, सूर्य, चॉद, तारे ग्रह सभी एक दूसरे के सहारे निर्भर है। सभी एक दूसरे के आकर्षण एवं विकर्षण के चलते एक दूसरे को बॉध कर एक निश्चित दूरी बनाकर, एक संतुलन कायम रखते हुए अपने-अपने रास्ते अपनी गति से चलते है।
इस व्यवस्था में अगर अचानक परिवर्त्तन आ जाए, तो बड़े विनाश की संभावना है। तो प्रश्न उठता है कि क्या इस व्यवस्था में परिवर्त्तन नहीं होगा ? परिवर्त्तन तो हो रहा है, पर उसमें भी एक संतुलन है, संतुलन कायम रखते हुए हो रहा है। परिवर्त्तन भी व्यवस्था का अंग है। रास्ते बदल रहे हैं, दूरियाँ घट रही है, दूरियाँ बढ़ रही है।पृथ्वी पर भी परिवर्त्तन हुए है। इसके बनने के बाद से जीवों की उत्पत्ति से लेकर मानव के आर्विभाव से लेकर उसके पूरे सफर में परिवर्त्तन की ही कहानी है।मनुष्यों ने भी अपनी-अपनी व्यवस्था बनाई है। साम्राज्यों की व्यवस्था, सामंतवादी युगों की व्यवस्था, आदि-आदि। रहन-सहन की व्यवस्था, धर्म, संस्कृति, भाषा आदि सभी तो एक प्रकार की व्यवस्था है।तो क्या इन व्यवस्थाओं में परिवर्त्तन नहीं होता। होता है और होता हुआ आया भी है। व्यवस्थाओं में टकराव भी हुए हैं। व्यवस्थाओं में टकराव के चलते विनाशकारी-परिणाम भी सामने आते रहे हैं। कई व्यवस्थाएँ खत्म हो गई है। कई सभ्यताएँ-संस्कृतियाँ लूप्त हो चुकि है। यहाँ तक कि कई प्राणी भी लुप्त हो चुकें है।व्यवस्था में अगर संतुलन बनाए रखते हुए परिवर्त्तन होता है तो वह सुखद एवं लाभकारी हो सकता है, पर अगर टकराव हो तो विनाशकारी परिणाम होते हैं यानि परिवर्त्तन दुखदायी एवं अहितकर होते हैं।“परिवर्त्तन” झारखण्ड़ प्रदेश की छोटी व्यवस्था, इसकी संस्कृति-सभ्यता, इसके लोगों की सोच के साथ अन्य बड़ी व्यवस्थाओं के साथ टकराव की कहानी है। जाहिर है कि टकराव होगा तो परिणाम सुखद नहीं हो सकता।
की यह व्यवस्था बड़ी व्यापक एवं विचित्र है। कहते हैं कि ब्रह्माड़ में कई सौर-मंडल है। कई सूर्य है।हॉल ही में वैज्ञानिकों ने यह भी पता लगाया है कि इस ब्रह्माड़ में, अंतरिक्ष में कई ऐसे शून्य हैं जिसके अन्दर अगर कोई ग्रह, तारे आदि चले जाएँ तो क्षण में उसके टुकड़े-टुकड़े हो जायें। एक ऐसे भी शून्य यानि “ब्लैक हॉल” का पता चला है जो हमारे सूर्य से भी पन्द्रह-सोलह अरब गुणा आकार में बड़ा है। सूर्य भी अगर उसमें घुस जाए तो वह भी धूल-कणों में परिवर्तित हो जाए।पर बड़े आश्चर्य की बात है कि पूरी व्यवस्था, सौर मंड़लों की व्यवस्था, सूर्य, चॉद, तारे ग्रह सभी एक दूसरे के सहारे निर्भर है। सभी एक दूसरे के आकर्षण एवं विकर्षण के चलते एक दूसरे को बॉध कर एक निश्चित दूरी बनाकर, एक संतुलन कायम रखते हुए अपने-अपने रास्ते अपनी गति से चलते है।इस व्यवस्था में अगर अचानक परिवर्त्तन आ जाए, तो बड़े विनाश की संभावना है। तो प्रश्न उठता है कि क्या इस व्यवस्था में परिवर्त्तन नहीं होगा ? परिवर्त्तन तो हो रहा है, पर उसमें भी एक संतुलन है, संतुलन कायम रखते हुए हो रहा है। परिवर्त्तन भी व्यवस्था का अंग है। रास्ते बदल रहे हैं, दूरियाँ घट रही है, दूरियाँ बढ़ रही है।पृथ्वी पर भी परिवर्त्तन हुए है। इसके बनने के बाद से जीवों की उत्पत्ति से लेकर मानव के आर्विभाव से लेकर उसके पूरे सफर में परिवर्त्तन की ही कहानी है।मनुष्यों ने भी अपनी-अपनी व्यवस्था बनाई है। साम्राज्यों की व्यवस्था, सामंतवादी युगों की व्यवस्था, आदि-आदि। रहन-सहन की व्यवस्था, धर्म, संस्कृति, भाषा आदि सभी तो एक प्रकार की व्यवस्था है।तो क्या इन व्यवस्थाओं में परिवर्त्तन नहीं होता। होता है और होता हुआ आया भी है। व्यवस्थाओं में टकराव भी हुए हैं। व्यवस्थाओं में टकराव के चलते विनाशकारी-परिणाम भी सामने आते रहे हैं। कई व्यवस्थाएँ खत्म हो गई है। कई सभ्यताएँ-संस्कृतियाँ लूप्त हो चुकि है। यहाँ तक कि कई प्राणी भी लुप्त हो चुकें है।व्यवस्था में अगर संतुलन बनाए रखते हुए परिवर्त्तन होता है तो वह सुखद एवं लाभकारी हो सकता है, पर अगर टकराव हो तो विनाशकारी परिणाम होते हैं यानि परिवर्त्तन दुखदायी एवं अहितकर होते हैं।“परिवर्त्तन” झारखण्ड़ प्रदेश की छोटी व्यवस्था, इसकी संस्कृति-सभ्यता, इसके लोगों की सोच के साथ अन्य बड़ी व्यवस्थाओं के साथ टकराव की कहानी है। जाहिर है कि टकराव होगा तो परिणाम सुखद नहीं हो सकता।
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