अध्याय तीन
झारखण्ड़ के प्रमुख विद्रोह – झारखण्ड़ के विषय में जानकारी लेने के पहले झारखण्ड़ क्षेत्र में हुए ब्रिटिश-प्रशासन के विरूद्ध की जानकारी प्राप्त कर लेना आवश्यक होगा। वास्तव में झारखण्ड़ अलग राज्य के नाम से किए गये आन्दोलन की पृष्ठभूमि को पहले समझ लेना चाहिए।
झारखण्ड़ के लोगों की अपनी परम्परागत व्यवस्था, जीवन-शैली पर कुठारघात से ही इन विद्रोह का जन्म हुआ था। 1765 से जब ईस्ट इंडिया कम्पनी को दीवानी अधिकार दिए गये, विद्रोह की शुरूआत हो गई थी। इसके प्रमुख विद्रोह थे- मलेर विद्रोह (1772), तिलका मांझी विद्रोह (1784), तमाड़ विद्रोह (1798), कोल इसरेक्सन (1820), हो विद्रोह (1820), ग्रेड कोल इन्सरेक्सन (1832), गंगानारायण विद्रोह (1832), संथाल रिवोल्ट (1855-57), सरसप्त संघर्ष (1859-65), चुहॉड़ विद्रोह।
चुहाँड़ विद्रोह – ब्रिटिश हुकमरानों से झारखण्ड़ को सदा समता की आशा और अपेक्षा थी भी नहीं क्योंकि झारखण्ड ने जितना विरोध ब्रिटिश हुकमरानों का किया था, उससे झारखण्ड़ के प्रति अंग्रेजों की चिढ़, द्वेश और प्रतिकुल भावना को समझा जा सकता है।
भारत वर्ष के कई हिस्सों में ब्रिटिश राजशक्ति को देशीय राजशक्तियों से प्रतिरोध झेलना पड़ा। अन्य जगहों पर राजे-राजवाड़ो की शक्ति से लड़ना पड़ा था जिससे आम जनता पूरी तरह शामिल नहीं थी। यहाँ ब्रिटिश शासकों को जन संग्राम का सामना करना पड़ा। मराठा, सिख हैदर टीपू आदि ने ब्रिटिश विरोधी संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी कहानी को विस्तार से लिखा एवं कहा गया। पर सुदुर खान जंगलों के बीच हुए जन संग्रामों को अनदेखी कर दी गई।
12 अगस्त 1766 को मुगल बादशाह आलम द्वितीय से ईस्ट इंडिया कम्पनी को बंगाल की दिवानी स्वीकृत की गई थी। ज्ञातव्य हो कि उस समय बिहार में वर्त्तमान बिहार, बंगाल, झारखण्ड़, उड़ीसा और असम शामिल थे। अंग्रेजो ने उसके बाद भारतवर्ष में शासन चलाने के लिए जमीन सर्वेक्षण का काम शुरू किया। बंगाल के अंदर तत्कालीन छोटानागपुर के जंगल महल जिला में जमीन का सर्वे एवं खतियान बनाने का काम शुरू किया गया था। माल गुजारी वसूलना शुरू किया था। और बहुत सारी योजनाएँ तैयार की गई थी, जिससे यहाँ के जल जंगल एंव जमीन पर कब्जा किया जा सके। जिससे यहाँ असंतोष फैलने लगा था। शासन व्यवस्था को अंग्रेजों को सबसे पहले कुड़मी आदिवासियों ने सन् 1769 में चुनोती दी थी और सन् 1769 में भारत में भारत का पहला क्रांतिवीर रघुनाथ महतो सामने आया था और अद्भूत लड़ाई लड़ी थी।
रघुनाथ महतो का जन्म झारखण्ड़ क्षेत्र के तत्कालीन जंगल महल जिला और वर्त्तमान में सराईकेला जिला के नीमडीह प्रखंड़ के धुटियाडीह ग्राम में हुआ था। 1965 में ईस्ट इंड़िया कम्पनी ने जंगल महल जिला में आदिवासियों के जल, जंगल जमीन पर अपना अधिकार जमाने के लिए राजस्व वसूलना शुरू किया, मूलवासियों के जमीन छीनकर बंगाली जमींनदारों के हाथों हस्तांतरण किया जाने लगा, अन्य क्षेत्रों से लोगों को झारखंड़ क्षेत्र में आयात करके बसाना शुरू किया, तो रघुनाथ महतो ने इसका विरोध किया और जन-संगठन तैयार करके नीमडीह गांव के पास फाल्गून पूर्णिमा 1769 को अंग्रेजों के खिलाफ एक सभा बुलाकर शंखनाद किया। आज उसी स्थान को रघुनाथपुर कहा जाता है जो नीमडीह प्रखंड का मुख्यालय है। इसी तरह पुरूलिया के उत्तर दिशा में करीब तीस किलोमीटर पर शहर रघुनाथपुर है। मेदनीपुर जिला अंत्तर्गत झाड़ग्राम में भी रघुनाथपुर है। जनतश्रुति है कि इन्ही के नाम पर ये शहर बसे।
रघुनाथपुर महतो का विद्रोह 1805 तक चलता रहा। रघुनाथ महतो का विद्रोह नीमडीह, पातकोम, से लेकर बड़ाभूम, धालभूम, मेदनीपुर तथा किचूंग परगणना तक फैल गया। किचूंग परगणना के अंत्तर्गत सराईकेला, खरसवाँ जिला के प्रखंड़ राजनगर, सराईकेला, गम्हरिया क्षेत्र को कहा जाता था। जंगल महल जिला के कई जमींदार और राजाओं ने ईस्ट इडिया कम्पनी की अधीनता स्वीकार कर ली। पर धालभूम के राजाओं ने अंग्रेजों से लोहा लिया, पर हार गये। तब उनके भतीजे जगन्नाथ धल को राजा बनाया गया। धालभूम के राजा जगन्नाथ धल का संबंध ईस्ट ईंडिया कम्पनी से बिगड़ता गया और राजा ने कम्पनी की अनसुनी कर दी। परिणाम हुआ कि अंग्रेजों ने उनके गढ़ पर धावा करके उन्हें बेदखल किया और वे किला छोड़कर जंगल-पहाड़ों में भाग गये। अंग्रेजों ने उनकी जगह नीमू धल को राजा बनाया।
जून 1773 में इस विद्रोह के महानायक रधुनाथ महतो के साथ जगन्नाथ धल की मुलाकात ग्राम पिपला में हुई। वहाँ दोनों ने मित-मितान का संबंध जोड़ लिया और अंग्रेजों के खिलाफ कूद पड़े। इधर लेफ्टीनेंट गुड़यार जगह-जगह इन्हें तलाश कर रहा था। पर रधुनाथ महतो ने जगन्नाथ धल को मदद किया और पाँच हजार विद्रोहियों के साथ धालभूम गढ़ के नील धल के धाटशीला में आक्रमण किया जिससे धाटशीला के राजा एवं ईस्ट इंड़िया कम्पनी के लोगों को भागना पड़ा और नरसिंहगढ़ में शरण लेना पड़ा। पर फिर अंग्रेजो की भारी भरकम फौज ने कप्तान फोबिस के नेतृत्व में घाटशिला में हमला किया तो विद्रोहियों को भागना पड़ा। घाटशिला के जोडसा ग्राम के माझियां महतो, बालूक महतो, रांगा महतो, कालचिंती ग्राम के आनन्द महतो, रघु महतो, जगन्नाथपुर ग्राम के पुकलू मांझी, शंकर मांझी के साथ दर्जनों की संख्या में लोग मारे गये।
ज्ञातव्य हो कि इस चुहाड़ विद्रोह के पहले छोटानागपुर क्षेत्र, पटना काउंसिल के अधीन था। लेकिन जंगल महल जिला में ईस्ट इंड़िया कम्पनी सरकार का जैसे-जैसे कब्जा बढ़ रहा था, विद्रोह भी उसी अनुपातः में बढ़ रहा था। इस विद्रोह की आक्रमकता को देखते हुए नवम्बर 1773 में छोटानागपुर क्षेत्र को पटना काउंसिल के नियत्रण से हटाकर बंगाल प्रेसीडेन्सी के अधीन इसलिए कर लिया गया ताकि स्वंय ईस्ट इंड़िया कम्पनी कलकत्ता से अपना शासन चला सके।
बहुत ही अल्प समय में चुहाड़ विद्रोह ने भयानक रूप ले लिया। अंग्रोजों को विद्रोहियों से हार माननी पड़ी तथा जगन्नाथ धल को धलभूम का पुनः राजा बहाल करना पड़ा। चुहाड़ विद्रोह अब बड़ाभूम पुरूलिया झरिया पंचेत और मेदनीपुर राजाओं के अधीनस्त क्षेत्रों में फैल चुका था। 25 जुलाई 1774 के बाद झरिया राज क्षेत्र में रघुनाथ महतो ने हमला किया था। दामोदर नदी पार कर के आए थे। 1776 तक विद्रोह का एक केन्द्र सिल्ली और झालदा के बीच मे बना।
ईस्ट इंड़िया कम्पनी को लगा कि जंगल महल जिला चुहाड़ विद्रोहियों के हाथ चला गया है और अंग्रेज अपना नियंत्रण खो चुके हैं। भारत के गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग ने विद्रोह थमता नहीं देखकर छोटानागपुर खास जंगल महल और रामगढ़ जिला के तत्कालीन कमींशनरों से रघुनाथ महतो और विद्रोहियों से बातचीत कर समस्या का समाधान करने का आदेश दिया। गवर्नर जनरल ने आदेश दिया की उन पर किसी तरह का दमनात्मक कारवाई नहीं हो। लेकिन जमींदारों ने गवर्नर जनरल की बातों को नहीं मानने के लिए कमिशनरों पर दबाव बनाया। जमींदारों ने किसी भी परिस्थिति में रघुनाथ महतो और विद्रोहियों का आन्दोलन दबाने की कोशिस की। 5 अप्रैल 1778 का दिन था, जब ईस्ट इंडिया कंपनी के पुलिस को पता चला कि रघुनाथ महतो अपने दल-बल के साथ झालदा के आसपास ग्रामीण क्षेत्र से स्वर्णरेखा नदी पार कर राँची (तत्कालीन छोटानागपुर खास) और सिल्ली के बीच जंगल में लोटा, गाँव के नजदीक सभा कर रहे है और सभा के बाद रामगढ़ की ओर बढ़ने वाले है जो ईस्ट इंड़िया कंपनी के पुलिस बैरक पर हमला करेगें। पुलिस फोर्स ने सभा स्थल में ही रघुनाथ महतो को घेर लिया और वह पुलिस का शिकार हो गये। सभा स्थल में पुलिस की गोलीबारी से दर्जन भर लोग मारे गये। सैकड़ों लोग गिरफ्तार कर जेल भेज दिये गये। रघुनाथ महतो के नेतृत्व मे करीबन दस साल तक आन्दोलन चला लेकिन उनके शहादत के बाद भी चुहॉड़ विद्रोह 1804 तक चलता रहा और समय-समय पर इस विद्रोह को कई नेताओं ने नेतृत्व प्रदान किया।
भारत देश के प्रथम क्रांतिवीर अमर शहीद रघुनाथ महतो का बलिदान व्यर्थ नहीं गया। उनकी शहादत, त्याग और अंतिम आत्माहुति की ज्वाला कालातंर में विभिन्न आन्दोलन क्रांतियों, विद्रोही का प्रेरणास्रोत बना और न सिर्फ झारखंड़, न भारतवर्ष बल्कि पूरी दुनिया के स्वतंत्रता आंदोलन में अग्रतम गाथा के रूप में रघुनाथ महतो का बलिदान चिरस्मरणी रहेगा।
Sunday, June 20, 2010
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its not raghunath mahato, it will be Raghunath singh.
ReplyDeleteJagannath Pater,the Dampara chief,was probably the father of Bajinath singh and grandfather of Raghunath singh who rebelled in 1798-1810 and 1832-33 respectively.
ReplyDeleterefer page 9, of
(The bhumij revolt 1832-33 by JAGDISH CHANDRA JHA)