Friday, February 11, 2011

झामुमो के आन्दोलन को आतंकवादी आन्दोलन कहा गया

मुरलीडीह कोलियरी की एक दिलचस्प घटना है। वहाँ पर बाहरी गुंड़ों एवं गाँव वालों के साथ अकसर गड़ाई होती रहती थी। विस्थापन की लड़ाई लड़ी जा रही थी। बिनोद बाबू का एक कार्यकर्त्ता जो पूरी तरह से उनका भक्त था उस कोलियरी के मुँहाने पर लगे हुए हेड-गियर पर चढ़ गया। हेड-गीयर का एक बड़ा सा ऊँचा मीनार, लोहे की पट्टियों के खम्भों से बनाया जाता है। कोयला निकालने के लिए जो सैकड़ों फीट नीचे कुँआ खोदा जाता है, उसके मुँह को पीट कहते है। इसी पीट के चारों तरफ लोहे के सौ-फीट, पच्चास फीट, खम्भें गाड़ कर वहाँ दो बड़ी घिरनियाँ लगाई जाती है। इन गोलाकार घिरनियों में लोहे के रस्से पार किए जाते हैं। और जिस प्रकार कुँए से बाल्टी में पानी निकालते है, उसी प्रकार नीचे से टबों में डालकर कोयले को उन्ही लोहे की रस्सियों द्वारा खींचकर बाहर निकाला जाता है।

अब माथुर महतो उसी हेड-गीयर के ऊपर घिरनी के पास बैठ गया था। छाता लिए हुए था। सुबह ही चढ़ गया था। सुबह पाली-सिफ्ट के बाद काम बंद कर देना पड़ा। वह नीचे कूद जाने की घमकी प्रबंधन के लोगों को देता जा रहा था। गर्मी का दिन था। वह बीड़ी पीता जाता, तथा खैनी यानि एक प्रकार का तम्बाकू खाता जाता। लाख समझाने पर भी वह नहीं माना। उसने सिर्फ एक ही शर्त्त रखी, कि जब तक बिनोद बाबू आकर उसे नहीं मनाएँगे तब तक वह नहीं उतरेगा। वहीं आवें। हमारे विस्थापितों का काम करायें। दूसरे दिन बिनोद बाबू सीधे कचहरी से वकील की पोशाक में ही मुरलीडीह पीट पर पहुँचे और तब जाकर माथुर महतो पीट के हैड-गीयर से उतरा।

यहाँ उनके द्वारा चलाए गये आन्दोलनों का विस्तृत विवरण नहीं दिया जा सकता है। संक्षेप में विरोध, प्रतिरोध का जो रास्ता बिनोद बाबू ने अपनाया था, वह अनूठा था। शोषणकर्त्ता स्तंभित हो जाता था। आतंकित हो जाता था। छोटी मछलियाँ जिस प्रकार बड़ी मछली के आक्रमण के पहले इकठ्ठा हो जाती हैं एवं सब मिलकर एक ऐसी आकृति बना लेती हैं जो बहुत बड़ी मछली के समान दिखे। इसी सिद्धान्त को बिनोद बाबू ने अपनाया था। आक्रामक तेवर उनलोगों में पैदा किया, जो बिलकुल निरीह थे। उनमें साहस का संचार किया।

प्रतिरोध को जन आन्दोलन का रूप दिया। अगर यह आन्दोलन सशस्त्र था, तो भी इसे आतंकवाद से जोड़ा जाना गलत होगा। आतंकवादी रात के अंधेरे में समूह में हमला करते थे और फरार हो जाते थे। ये अपनी पहचान छुपा कर चलते हैं। यहाँ तक कि छद्यनाम धारण कर लेते हैं। इनके काम करने का तरीका ही था कि चुपचाप वारदात कर डालो और फरार हो जाओ। आम जनता इनसें भयभीत रहती है। गाँव के लोगों को डरा-धमका कर उनसे खर्च करवाना। उनकी मुर्गियों, बकरियों को खा जाना। उन्हें धमकाकर रखना इनका काम था। इनकी कार्यशैली में अपराधिक मनोवृत्ति की स्पष्ट झलक है, चाहे इन वारदातों को वे किसी भी सिद्धान्त का जामा पहना दें। चाहे इसे माओवाद कहें या लेलीनवाद। वारदात करके पहचान छुपाना, पुलिस से बचके रहना, छुपके रहना। चुपके से वारदात करना। यह निश्चय ही आपराधिक कार्य हैं। पर खुला-दिन के उजाले में सशस्त्र प्रतिरोध एवं जेल जाने की मंशा लेकर आगे बढ़ना, दूसरी बात है। अपने कृत्यों को न्यायपूर्ण मानते हुए, एक बलिदान की भावना से आगे आना एक क्रांतिकारी सामाजिक परिवर्त्तन की ओर इशारा करता है। इशारा ही नहीं पथ-प्रदर्शित करता है।

बिनोद बाबू स्वयं वकील थे। इन आन्दोलनों से ऊपजे मुकदमें की देखभाल करने के लिए बुद्धिजीवि वर्ग खासकर वकीलों को प्रेरित करते थे कि वे मुफ्त इन दलित, वंचित, गरीब, शोषित के मुकदमों को लड़े। कई जिलों में उन्होंने ऐसे वकील पैदा किए, ढूँढ़ निकाले जो सुचारू रूप से उनके निर्देश पर काम करते थे। बिनोद बाबू जमीन अधिग्रहण के मामलों के विशेषज्ञ माने जाते थे। उन्होंने सरकार द्वारा कम कीमत पर ली गई जमीनों के विरूद्ध मुकदमें लड़े और विस्थापितों को उचित मुआवजा कोर्ट से दिलवाने का काम किया। पूरे देश में उन्होंने संभवत भू-अर्जन मामलों से संबधित जितने मुकदमें लड़े उतना बहुत विरले वकील ही लड़े होंगे। उन्होंने इससे बहुत पैसा कमाया, पर उस पैसे का अधिकत्तम भाग पार्टी चलाने, गरीबों को मदद करने तथा शैक्षणिक संस्थान खोलने में लगा दिए।

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