समिति ने फिर उसी नजरिये को अपनाया था। झारखंड़ आन्दोलन झारखंड़ क्षेत्र में कितना सशक्त है ? इस पर सवाल खड़े किए गये। यह आन्दोलन कितना लोकप्रिय है, इसकी विवेचना किया जाने लगा। इस बात को भूला दिया गया, इस तथ्य को अनदेखा कर दिया गया कि देश में आजादी के बाद कई नये राज्यों का गठन किया गया, जिसके लिए झारखंड़ के समान कोई आन्दोलन नहीं किए गये। भाषा या भाषाई समानता, लिंगविस्टीक होमोजिनियोल्टी के आधार पर नये राज्यों का निर्माण किया गया। सांस्कृति आधार पर बिना आन्दोलन के पंजाब से हरियाणा बना। कर्नाटक बना। महाराष्ट्र से गुजरात बना। आंध्रप्रदेश बना। तो फिर इस समिति ने झारखंड़ को अलग पहचान के आधार पर अलग राज्य बनाने का सुझाव क्यों नहीं दिया, जब इसी समिति ने ऐसा ही पाया था।
समिति ने दो राज्यों पश्चिम बंगाल तथा उड़ीसा का कोई दौरा नहीं किया। इसीलिए समिति ने इन राज्यों में आन्दोलन की लोकप्रियता पर कोई टिप्पणी ही नहीं की। कोई मूल्याकंन ही नहीं किया गया। मध्यप्रदेश के विषय में समिति ने यह कह दिया कि वहाँ आन्दोलन का प्रभाव कम था। इस बात को नजर अंदाज कर दिया गया कि पुनः दौरा किया जाए, उन क्षेत्रों का जिसका दौरा समिति नहीं कर पाई थी।
समिति ने इस बात को नजर अंदाज कर दिया कि गरीब अशिक्षित भोले-भाले झारखंड़ के आदिवासी एवं मूलवासी समूह अपने ऊपर हो रहे अत्याचार, शोषण दमन के विरूद्ध आवाज उठाने से डरते थे। उन्हें बाहरी शोषण कर्त्ताओं ने, पुलिस एवं प्रशासन ने इतना आतंकित कर रखा था कि वे गूँगें एवं बहरे हो गये थे। जब-जब कोई साहस करके आगे बढ़ता तो उसके आन्दोलन को निर्ममता पूर्वक कुचल दिया जाता। ऐसा इतिहास में प्रमाणित है। ऐसी परिस्थिति में आन्दोलन की लोकप्रियता की बात करना ही बेमानी था। ऐसी सोच को पूर्वाग्रह से ग्रसित ही माना जा सकता है।
अध्याय छः पारा-22 में इस रिपोर्ट ने इसके बाद कह दिया कि “झारखंड़ पृथक राज्य” के सृजन में चार राज्यों बिहाऱ बंगाल, उड़ीसा और मध्यप्रदेश को तोड़ने और इन टुकड़ो से झारखंड़ नामक एक नई इकाई का गठन करने का कार्य अन्तग्रस्त है। प्रजातांत्रिक प्रणाली में ऐसा संबंधित पार्टियों के सहमति से ही किया जा सकता है। ये पार्टयाँ विधिवत रूप से गठित चार राज्यों की सरकारें है।
इस समिति ने अलग राज्य के बनाने के मार्ग में आनेवाली बाधा का जिक्र कर दिया। चार राज्यों की सरकारें अगर विरोध करेंगी तो झारखंड़ पृथक राज्य नहीं बन सकता।
समिति ने इस बात को भूला दिया कि संविधान की धारा 2,3 एवं 4 में यह स्पष्ट है कि राज्य सरकार की सहमति के बिना भी केन्द्र सरकार अलग राज्य का गठन उसके किसी हिस्से को अलग करके बना सकती है। फिर किसी राज्य सरकार के विरोध से झारखंड़ के मामले में केन्द्र सरकार डरेगी क्यों ? समिति को किस कारण भय पैदा हुआ ?
बिहार के झारखंड़ के हिस्से के बारे में तो समिति का सुझाव बिलकुल ही तथ्यों से परे एवं तर्कहीन था। समिति ने यह स्पष्ट कर दिया था कि सभी राजनैतिक दल एक पृथक राज्य बनाने अथवा स्वायत्तता प्रदान करने के पक्ष में है। पर समिति ने एक अजिब सा तर्क दिया कि देश के वर्त्तमान राजनैतिक परिस्थिति की मजबूरियों और माँगों को ध्यान में रखते हुए इस बारे में निर्णय लेना पड़ेगा। समिति ने आशंका जाहिर कर दिया कि “विघटनकारी बलों को छूट प्राप्त है। अलगाववादी और विघटनकारी बल देश की एकता और अखंड़ता के लिए खतरा उत्पन्न करने के लिए सभी कार्य कर रहे है। हमने राज्यों के पुर्नगठन के लिए दो बार बैठकें की जिनमें एक 1980 के मध्य में भाषा के आधार पर तथा दूसरी 1960 और 1970 के दशकों के प्रारम्भ में उत्तर पूर्व में जातीय आधार पर। यह सिलसिला अभी जारी है। झारखंड़ राज्य बनाने पर समकालीन राष्ट्रीय स्थिति को देखते हुए ध्यान पूर्वक विचार किया जाना चाहिए।“
इस प्रकार इस समिति ने तथ्यों के विरूद्ध झारखंड़ अलग राज्य बनाने को खतरनाक कहा। इसे विघटनकारी एवं देश की एकता एवं अखंड़ता के लिए खतरा कहा। ऐसी आशंका जताई गई जिसका 1990 में कहीं नामो निशान नहीं था।
समिति ने यह आशंका जाहिर किया कि मात्र राज्य या संघ शासित क्षेत्र का दर्जा दिए जाने से सभी समस्याएँ हल नहीं हो सकती है। अलग राज्य माँगा जा रहा था, जिसके समर्थन में सभी तथ्य थे, पर समिति ने एक परिषद् बनाने की या एक ऐसे माडल बनाने की सिफारिश कर दी ताकि इन क्षेत्रों की सांस्कृति रक्षा हो सके, यहाँ की भाषा की उन्नति हो सके, आदिवासी जनसंख्या की सुरक्षा के उपायों को और मजबूत बनाया जा सके। बड़े आश्चर्य की बात है कि हर बार नये प्रयोग करने की सोची जाती रही, पर जो स्थापित उपाय थे, उन्हें नहीं आजमाया गया। अलग राज्य से ज्यादे कारगार क्या कोई दूसरा मॉडल बन सकता था, कदापि नहीं।
पर जाने-अनजाने इस समिति को एक महत्वपूर्ण बात का जिक्र करना ही पड़ा जो झारखंड़ के लिए बाद में सहायक सिद्ध हुआ। समिति ने अपनी रिपोर्ट के अध्याय छः पारा दश में “निष्कर्ष” शीर्षक के अन्तर्गत कहा है कि झारखंड़ क्षेत्र की जन सांख्यिकीय परिपेक्ष में अनुसूचित जनजाति के उन समुदायों को पहली प्राथमिकता दी जाय। कुछ समय पहले बिहार के कुछ जिलों में अधिकांश जनसंख्या अनुसूचित जनजातियों से संबंधित थी जिन्होंने अपने क्षेत्र को झारखंड़ राज्य के एक भाग के रूप में रखने की माँग की। 1981 की जनगणना के अनुसार इनकी जनसंख्या 30.26 प्रतिशत बैठती है। इसके अतिरिक्त ऐसा भी बहुत जनसमुदाय है जिसका आदिवासियों के साथ घनिष्ठ संबंध है तथा जिन्हें 1981 में आदिवासियों की सूची से अलग रखा गया था, ये समुदाय कुर्मी महतो के नाम से जाना जाता है। एक बड़े सदन की जनसंख्या में इनका महत्वपूर्ण हिस्सा है तथा बाद के समय में इनके द्वारा किए गये उत्प्रवास की तुलना में उनके मूलवंश की पहचान बनाए रखने के आधार पर इन्हें मूलवासी, सदावासी अनादिवासी आदि नामक कई अन्य नामों से भी जाना जाता है। कुल जनसंख्या में इस वर्ग का कथित रूप से 50 प्रतिशत हिस्सा है।“
इसी प्रकार अध्याय तीन में पारा 25 में कहा गया है कि “झारखंड़ आन्दोलन शुरू से ही एक झारखंड़ राज्य बनाने के लिए चलाया गया जिसे बिहार के छोटानागपुर और संथाल परगना जिलों तथा मध्यप्रदेश, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल के समीपवर्त्ती जिलों में से बनाया जाना था। इन क्षेत्रों की या इनके अधिकांश हिस्सों में आदिवासी (संथाल, मुंड़ा, हो, उराँव) और गैर-सरकारी आदिवासी (कुर्मी महतो इत्यादि) समुदायों की काफी आबादी है जो जातीयता, ऐतिहासिक, सांस्कृति रूप से छोटानागपुर के पैतृक समुहों से संबंध है। झारखंड़ आन्दोलन इन समीपवर्त्ती क्षेत्रों में इन समुदायों के मध्य फैला हुआ है।”
आदिवासी शब्द का अर्थ इस रिपोर्ट में अनुसूचित जनजातियों से लगाया गया है। कुर्मी महतो इत्यादि कई अन्य जातियों को गैर-सरकारी आदिवासी कहा गया है। गैर-सरकारी आदिवासी का क्या अर्थ हो सकता है ? यही न कि वैसी जनजातियाँ जो वर्त्तमान में अनुसूचित नहीं है।
समिति द्वारा इस तथ्य को स्वीकार करने के बाद कि झारखंड़ आन्दोलन सरकारी एवं गैर-सरकारी आदिवासियों का रहा है तथा जिनकी संख्या झारखंड़ में बहुतायात में, बहुमत में है, जिनकी अपनी समान सभ्यता संस्कृति पहचान है, झारखंड़ अलग राज्य बनाने के लिए समिति द्वारा सुझाव नहीं देना, बौद्धिक बेईमानी ही कही जायेगी।
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