Sunday, March 6, 2011

“झारखंड़ मामलों से संबंधित समिति” की रिपोर्ट

इस रिपोर्ट में जो सबसे महत्वपूर्ण बात सामने रखी, वह यह है कि जिन कारणों से राज्य पुर्नगठन आयोग ने झारखण्ड़ अलग राज्य की माँग को ठुकरा दिया था, उन कारणों को इस समिति की रिपोर्ट ने गलत ठहरा दिया।
इस समिति ने जो दूसरी महत्वपूर्ण बात कही, वह यह कि अब तक के जितने उपाय संविधान की पाँचवी सूची के अन्तर्गत इस क्षेत्र के विकास के लिए किए गये थे, वे सभी उपाय नाकामयाब साबित हुए थे। इस रिपोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि अब तक सारे प्रयास इस क्षेत्र को पाँचवीं सूची के अन्दर शामिल मानकर किए गये थे।
इस रिपोर्ट ने अपने अध्याय-तीन पारा चौबिस में यह स्पष्ट कर दिया कि “झारखण्ड़ आन्दोलन के इतिहास में जो उल्लेखनीय बात हुई है, वह आदिवासी और गैर-आदिवासी आबादी का एक जूट होना है। इस आन्दोलन में मुंड़ा, संथाल, हो और उराँव जैसे बड़े-बड़े आदिवासी समूहों और कुर्मी जैसे गैर-आदिवासी समुहों और अन्य जातियों का दबदबा है परन्तु अन्य जातियाँ भी इसमें शामिल हुई है। छोटे-छोटे आदिवासी ग्रुपों के सम्बन्ध में सूचना कम है। इस तरह झारखंड़ आन्दोलन का सामाजिक आधार पिछले बीस वर्षों में काफी फैला है।”
इस रिपोर्ट ने यह बात कह कर यह स्पष्ट कर दिया था कि 1970 से इस आन्दोलन का सामाजिक आयाम बढ़ा था। रिपोर्ट 1990 में लिखी जा रही थी और सामाजिक आयाम के बढ़ने की बात पिछले 20 वर्षों से की गई थी। इसका मतलब ही यही था कि झारखंड़ मुक्ति मोर्चा के गठन के बाद से ही आदिवासी तथा गैर-आदिवासियों का संयुक्त आन्दोलन चला। 1990 तक निश्चय ही इस आन्दोलन को मात्र आदिवासियों का आन्दोलन बतलाया गया था। इसे अब अल्पमत का नहीं कहा जा सकता था। बिनोद बिहारी महतो के झामुमो के संस्थापक- अध्यक्ष होने के साथ ही स्थिति में बदलाव शुरू हो गया था, क्योंकि उनके साथ अन्य गैर-आदिवासी समूह भी शामिल हुए जिसमें कोयलांचल के मजदूर भी थे।
इस समिति ने यह भी स्पष्ट कर दिया था कि “पिछले चालीस वर्षो से झारखंड़ क्षेत्र की एक अलग पहचान भाषा, सांस्कृतिक धारा, भौतिक विकास की एक स्पष्ट अवधारणा रही है।” इस रिपोर्ट ने स्वीकार किया कि “उपनिवेशकालीन समय में इस प्रदेश का तीन अथवा चार राज्यों में विभाजन हो गया। राजनैतिक तथा प्रशासनिक राज्यों में यह विभाजन बना हुआ है, लेकिन प्रशासनिक सीमाओं के आर-पार लोगों में परस्पर सांस्कृतिक आदान-प्रदान रूका नहीं है, वास्तव में यह विकसित हुआ है।”
झारखंड़ मामलों से संबंधित समिति ने मई 1990 में यह स्पष्ट सुझाव दे दिया कि “इसिलिए हमें इस क्षेत्र को स्पष्ट सांस्कृतिक पहचानवाले क्षेत्र के रूप में मान लेना चाहिए जिसका विकास लोगों के सम्पूर्ण विकास के एक भाग के रूप में किया जाना चाहिए।”
चूँकि इसी रिपोर्ट ने यह साबित कर दिया था कि अब तक के विकास के लिए अपनाए गये उपाय जो संविधान की पाँचवी सूची के तहत अपनाए गये थे, इस क्षेत्र के विकास में कामगार सिद्ध नहीं हुए थे, कुछ अन्य उपाय करने चाहिए। यानि इस समिति की रिपोर्ट ने यह इंगित कर दिया था कि जितने प्रकार के परिषद् या बोर्ड बनाए गये थे, सभी विफल साबित हुए थे।
पर, इस क्षेत्र का विकास कैसे हो, इस अहम् सवाल का जबाव भी इसी रिपोर्ट ने दे दिया था। अपने अध्याय छः “निष्कर्ष” शीर्षक के अन्तर्गत पारा ग्यारह में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि “झारखंड़ जनसमुदाय के पहले दो वर्गो अर्थात आदिवासी समूह और मूल गैर-आदिवसी समूह का भविष्य एक दूसरे से जुड़ा रहा। इन दोनों समूहों की संस्कृति और इतिहास एक समान है। .................. परिणाम यह है कि आज दो वर्गो ने एक समान उद्देश्य रखा है यह जब एक जातीय वर्ग का दूसरी जाति या एक धार्मिक समुदाय का दूसरे का प्रश्न नहीं है। बाहरी शोषणकर्त्ताओं के विरूद्ध मन की भावना से इन दो वर्गो को एक अलग झारखंड़ राज्य के लिए एकीकृत किया है। आशा है कि वर्त्तमान सामाजिक आर्थिक लक्ष्य को लेकर एक धर्मनिरपेक्ष झारखंड़ राज्य का परिणाम हो। यदि ऐसा होता हे तो उन सभी लोगों को प्रसन्नता होगी जो संविधान की प्रस्तावना की भावना का मूल्य समझते है।”
इस समिति की रिपोर्ट के उपर वर्णित तथ्यों को दखने के बाद इस बात पर कोई संदेह ही नहीं रह जाना चाहिए कि झारखंड़ क्षेत्र का मतलब दक्षिण बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा एवं मध्यप्रदेश के समीपवर्ती इलाके हैं जिनकी समान सभ्यता-संस्कृति है। इसकी एक अलग पहचान भी है। अब इस बात पर संदेश नहीं होना चहिए कि इस क्षेत्र को ही अलग राज्य का दर्जा मिल जाना चाहिए।
पर, बड़ी हैरत की बात है कि झारखंड़ अलग राज्य के संबंध में हमेशा ही बौधिक बेईमानी की जाती रही है। राज्य पुर्नगठन आयोग ने अगर 1955-56 में सही तथ्यों को लिखा होता तो निश्चय ही झारखण्ड़ अलग राज्य बनाने की अनुशंसा की गई होती और अन्य राज्यों के साथ-साथ इसके गठन की प्रक्रिया भी शुरू कर दी जाती। वहाँ उस समय भी बौधिक बेईमानी की गई। इसे सिर्फ आदिवासियों का आन्दोलन करार दिया गया। अन्य कारण जो अलग राज्य नहीं बनाने के लिए दर्शाये गये थे, वे भी भ्रामक एवं तथ्यों से परे थे। इस बार तो गजब ही किया गया। समिति की रिपोर्ट में सही तथ्यों को तो रखा गया एवं निष्कर्ष भी सही निकाले गये पर जो सुझाव दिए गये इस क्षेत्र के लिए वह सर्वथा गलत रहे। यहाँ भी अन्य प्रकार की बौधिक बेईमानी की गई।
राज्य पुर्नगठन आयोग के दिनों में सबसे सशक्त पार्टी झारखंड़ी पार्टी के प्रमुख नेता श्री जयपाल सिंह ने अलग राज्य बनाने के लिए आयोग पर कोई दबाव नहीं दिया। उदासीन रहे। हो सकता है, इसी कारण आयोग को बौधिक बेइमानी करने का मौका मिल गया।
इस बार भी कहीं न कहीं किसी के कारण उलटे सुझाव दे दिये गये। झामुमो के तत्कालीन अध्यक्ष शिबू सोरेन ने समिति पर ऐसा कोई दबाव नहीं दिया। बल्कि कालान्तर में पता चला कि वे ही एक प्रकार के परिषद् के समर्थक बन गये थे।
इस बात का उल्लेख करना यहाँ जरूरी हो गया है कि 1978 में ही बिहार विधान सभा द्वारा “झारखंड़ विकास परिषद् 1978” का गठन किया गया था। इसका भी जिक्र करना आवश्यक है कि ठीक राज्य पुर्नगठन आयोग के गठन के पूर्व 1951 में, बिहार जनजातीय सलाहकार परिषद् बनाया गया था। फिर 1971 में छोटानागपुर संथाल परगना स्वायत्त विकास प्राधिकरण बनाया गया था। इधर झारखंड़ विषयक समिति अपना दौरा कर रही थी। रिपोर्ट तैयार कर रही थी, तो दूसरी तरफ बिहार सरकार इसे भ्रमित करने के लिए झारखंड़ क्षेत्र विकास परिषद् 1991 के विधेयक का निर्माण कर उसे पारित कराने में लगी थी। इस विधेयक द्वारा पूर्व के छोटानागपुर संथाल परगना स्वशासी विकास प्राधिकरण 1971 एवं उसके बाद के संशोधनों को निरस्त कर दिया गया था और 1/8/1991 को 1991 एवं उसके बाद के संशोधनों को निरस्त कर दिया गया। मई 1990 के झारखंड़ मामलों से संबंधित समिति की रिपोर्ट मई 1990 उसी प्रकार ठढ़े बस्ते में पड़ी रही।

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