झारखंड आन्दोलन एवं अन्य दलों की गतिविधि 1991 से पहले
वास्तव में झारखंड आन्दोलोन को झारखंड नामधारी पर्टियों ने ही जन्म दिया तथा उसे आगे बढ़ाया। अन्य राजनैतिक दलों जिसमें वामपंथी भी थे, उनकी भूमिका झारखंड आन्दोलन को आगे बढ़ाने में नगण्य रही। जब-जब झारखंड आन्दोलन आगे बढ़ाता कोई-कोई इक्का-दुक्का नेता इसपर कभी कोई ब्यान दे देता। ज्यादेतर पार्टियाँ एवं वामपंथी नेता अपनी अंतर्राष्ट्रीय अवधारणा के कारण इस इलाके को पृथक राज्य के रूप में अलग होने देना नहीं चाहते थे। भीतर ही भीतर इस आन्दोलन को कमजोर करने की साजिश रचते।
पर एक समय ऐसा भी आया जब वामपंथी पार्टियों ने सीधा विरोध खुले आम किया। पश्चिम-बंगाल में झामुमो एवं झारखंड पार्टी के द्वारा अलग राज्य की सभाओं में वामपंथी द्वारा हमले किए गये। हत्याएँ की गई। कई प्रमुख झारखंड नामधारी दलों के प्रमुख कार्यकर्त्ताओं की हत्याएँ तक की गई। उन क्षेत्रों में पश्चिम बंगाल सरकार ने ऐसा आतंक का माहौल बनाया ताकि लोग झारखंड अलग राज्य की बात तक न करें। कोई मीटिंग, सभा न कर सकें। झूठे मामलों में लादकर यातनाएँ दी गई।
काँग्रेस पार्टी के रवैये को तो सभी जानते हैं। इस पार्टी ने सीधे-सीधे इस आन्दोलन को दबाने या कुचलने या बरगलाने का काम किया।
जनसंघ पार्टी झारखंड क्षेत्र में भी सक्रिय हो रही थी। जनसंघ ने हमेशा ही एक पृथक वनांचल राज्य का समर्थन किया। झारखंड की जगह वे वंनाचल पृथक राज्य का समर्थन करते रहे थे। 1980 में जब जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी बनी, तो इस पार्टी ने भी वंनाचल राज्य का समर्थन किया। जनसंघ या भारतीय जनता पार्टी सैद्धान्तिक रूप से कभी भी झारखंड आन्दोलन के विरोध में नहीं रही। 1991 के लोक सभा चुनाव के आते-आते दक्षिण बिहार के झारखंड क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी एक सशक्त पार्टी के रूप में ऊभर कर आ चुकी थी। 1991 के लोक सभा चुनाव में इसने धनबाद (प्रो0 रीता वर्मा), राँची (रामटहल चौधरी) , गुमला (ललित उराँव) सीटें जीत ली थी। बाकी में हजारीबाग (भुवनेश्वर मेहता - सी0 पी0 आई0) पलामू, गढ़वा, कोडरमा से जनता दल तथा अन्य छः गिरीडिह, दुमका, राजमहल, पश्चिमी सिंहभूम, पूर्वी सिंहभूम (जमशेदपुर), गोड्डा सीटें झमुमो ने जीत ली थी।
भारतीय जनता पार्टी बाद में सशक्त पार्टी के रूप में उभर कर सामने आई। जनता पार्टी ने पहले तो छोटे राज्यों की वकालत की, पर बाद में वे भी इसके विरोध में हो गये।
1990 बिहार विधान सभा तथा 1991 लोक सभा के चुनाव तक झमुमो ने मात्र अपने अठारह वर्ष के सफर में इस क्षेत्र के एक सशक्त पार्टी के रूप में पहचान बना ली थी। इकासी में से उन्नीस सीटें विधान सभा में अकेले झामुमो की थी। अन्य कई झारखंड नामधारी दलों के भी विधायक विधान सभा में पहुँचे थे।
ऐसा लगने लगा था कि अब झारखंड आन्दोलन अपने मुकाम तक पहुँच जायेगा। झारखंड नामधारी दलों, वामपंथीयों, जनतादल ने मिलकर संयुक्त मोर्चा काँग्रेस के खिलाफ बनाया था।
मार्च 1990 में जनता दल के श्री लालू प्रसाद को इस संयुक्त मोर्चे ने बिहार का मुख्यमंत्री बना दिया था। इसमें बिनोद बिहारी महतो – संस्थापक अध्यक्ष झामुमो की बहुत बड़ी भूमिका रही थी। अपने उन्नीस विधायको के साथ-साथ वामपंथियों तथा अन्य झारखंड नामधारी दलों का समर्थन भी उन्होंने जुटाया था और काँग्रेस को बिहार से हटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अतः लालू प्रसाद को वे विशेष सुझाव देते रहते थे।
Thursday, March 17, 2011
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment