अभिशप्त झारखंड़ – पृथ्वी की जब रचना हुई, देवताओं में खलबली मच गई। देवता इस बात से चिंतित हो उठे कि धरती का यानि पृथ्वी का निर्माण बड़े ही असमान ढंग से हो गया था। इसके तीन हिस्से में जल था और एक हिस्से में मिट्टी यानि धरती दिखाई देती थी। उसपर से तुर्रा यह कि कहीं-कहीं तो वर्फ से ढके पहाड़ एवं मैदान थे। छः महिने तक सूर्य दिखाई नहीं देता। छः महिने रात रहती है। कहीं-कहीं तो बालू से भरा सुखा प्रदेश दूर तक फेला हुआ। कहीं-कहीं तो इतनी घनघोर बारिश कि कभी खत्म न हो। कहीं-कहीं तो इतने घने जंगल कि प्रवेश करना असंभव। कहीं भीषण गर्मी।
पर कहीं-कहीं तो समशीतोष्ण मौसम। न ज्यादे ठंढ़ न ज्यादे गर्मी। पहाड़, नदी, नाले, झरनों, से भरपूर इलाकें। सैकड़ों प्रकार के फलदार वृक्ष एवं इमारती लकड़ी। जड़ी-बूची, औषधियों का भंड़ार। पशु-पक्षी की भरमार। इतना ही नहीं धरती के नीचे उन्ही इलाकों में खनिज पदार्थो की भरमार। देवताओं की वास्तव में चिंता हुई और वे रचनाकर्त्ता, सबके पालक विष्णु भगवान के पास पहुँचे। भगवान तो क्षीर-सागर के गहरे तल में गहरी निन्द्रा में लीन थे। पत्नी लक्ष्मी उनके पांव दबा रही थी। इतने सारे देवताओं को देखकर प्रभु को जगाया गया। प्रभु ने हाल समाचार पुछा ओर आश्चर्य व्यक्त किया कि इतने सारे स्वर्ग के देवता एक साथ किस प्रयोजन से पधारे थे। देवताओं ने कहा कि प्रभु पृथ्वी का निर्माण बड़े ही गलत ढंग से हो गया है, भविष्य में भारी समस्या देवलोक को ही हो सकती है। आपने एक ही स्थान पर सारी सम्पदा दे डाली है बाकि जगहों के साथ अन्याय हो गया। प्रभु ने उनसे पुछा कि ऐसा कहाँ हो गया है। देवताओं ने कहा कि प्रभु झारखंड़ क्षेत्र में आपने सारी न्यामतें न्योछावर कर दी हैं और बाकि जगहों के साथ अन्याय हो गया। प्रभु ने उनसे पुछा कि ऐसा कहाँ हो गया है। देवताओं ने कहा कि प्रभु झारखंड़ क्षेत्र में आपने सारी न्यायमतें न्योछावर कर दी हैं और सारी बातें प्रभु को बताया गया। भविष्य की समस्याओं की ओर ध्यान एकत्रित किया गया। प्रभु थोड़ी देर चुप रहे। फिर उन्होंने मानव-निर्माण विभाग में फोन लगाये ओर यह जानकारी प्राप्त की कि अभी पृथ्वी में मानव जाति का निर्माण हुआ था या नहीं, झारखंड़ में भी मानव बने थे कि नहीं। उधर जबाव मिला कि उस समय तक इस संबंध में कोई कदम ब्राह्माजी के द्वारा उठाया नहीं गया था। रचयिता ब्राह्मा गहन सोच में थे। प्रभु ने देवताओं को बता दिया कि उन्होने समस्या का समाधान सोच लिया है ओर देवताओं को वापस अपने-अपने काम मे लौटकर जाने को कह दिया। देवता असन्जस में पड़ गये। प्रभु फिर सो गये थे, बिना यह बताए कि आखिर समस्या का समाधान क्या था ? उन्होने फिर से प्रभु को जगाया और इस बाबत पूछा। प्रभु ने झल्लाकर कहा कि आप सबों को चिंता करने की बात नहीं है। समाधान यह है कि हम झारखंड़ में इस प्रकार के मनुष्य बनाएँगें जो इन सारी सम्पत्तियों, खनिजों को पहचानेगा ही नहीं। और अगर पहचानेगा नहीं तो उसका उपयोग भी नहीं करेगा। यह कहकर प्रभु फिर से सो गये।
और तब से झारखंड़ की सम्पदा ही झारखंड़वासियों के लिए अभिशाप बन गयी। झारखंड़ की लकड़ी, झारखंड़ की के वन-उत्पाद, झारखंड़ का कोयला, लोहा, ताँबा, अबरख आदि खनिज, उससे सम्बन्धित व्यापार, नौकरी, चाकरी, ठेकेदारी, झारखंड़ की बिजली आदि सभी सम्पदाओं पर झारखंड़ से बाहर के लोगों का कब्जा हो गया। झारखंड़ के बाहर, भी बाहर के लोगों ने बसाए। और रहने लगे। मजे की बात तो यह हो गई कि इन सम्पदाओं के दोहन के लिए जरूरी मजदूर, श्रमिक, अधिकारी भी बाहर से लाए गये। झारखंड़ के लोग झारखंड़ की प्रकृतिक सुन्दरता में भी रम गये। न बाढ़ का डर, न सुखे की त्रासदी। न गर्म न ठंड़ा। साल भर का अनाज उगा लेते ओर गीत गाते। नाचते। माँदर, ढोल, मगाड़ा, बांसुरी, करताल बजाते और मस्त रहते। अपनी संस्कृति को पकड़े बैठे रहे।
प्रभु ने झारखंड़ के मनुष्यों को भी अभिशाप दिया, उस अभिशाप का नतीजा हुआ कि झारखंड़ में शोषण चरम पर पहुँच गया। वास्तव में प्रभु से बड़ी गलती हो गई थी, उन्होंने समस्या का समाधान नहीं किया था, बल्कि समस्या का तत्काल निपटारा कर दिया था। समस्या का समाधान तो तब होता जब पृथ्वी का पुनः निर्माण किया जाता और सभी भागों को समान रूप से दौलत दी होती। पर झारखंड़ के मनुष्यों की दृष्टि को भ्रमित करके उन्होंने समस्या का अस्थाई हल ही निकाला था और इसे सिर्फ निपटा दिया था। प्रभु विष्णु की ही तरह केन्द्र सरकार एवं राज्य-सरकारों ने कोई स्थाई कदम नहीं उठाए। प्रभु विष्णु की ही तरह केन्द्र सरकार एवं राज्य-सरकारों ने कोई स्थाई कदम नहीं उठाए। प्रभु की तरह ही अब झारखंड़ को “टेकल” किया जाने लगा। “सोल्भ” करने की और किती ने ध्यान नहीं दिया। पहले तो झारखंड़ की सम्पदा दूसरों के लिए समस्या का कारण, बनने वाली थी, पर अब तो झारखंड़ की सम्पदा झारखंड़वासियों के लिए ही समस्या बन गई है।
एक दिन पुनः भगवान विष्णु को नींद से जागना पड़ा। कारण था कि स्वर्ग के सभी देवता पुनः उन्हें जगाने वहाँ पहुँचे थे। भगवान ने उठते ही पूछा कि अब क्या हो गया ? क्या किसी असूर ने स्वर्गलोक में हमला बोल दिया है ? देवताओं ने कहा कि ऐसी बात नहीं हैं। उनकी परेशानी का कारण पृथ्वी पर हो रहे अत्याचार हैं। पृथ्वी वासियों की चीख-पुकार से उनकी नींद हराम हो गई है। उस पर तो खासकर झारखंड़ क्षेत्र में सबसे ज्यादा अत्याचार अनाचार जुल्म असुरों द्वारा किये जा रहें है। इस वार्त्तालाप के दौरान ही प्रभु के कानों में क्षीर-सागर के गहरे तल तक चीख-पुकार, क्रंदन की आवाज पहुँची। उन्होनें बड़े आश्चर्य से पुछा भी यहाँ कौन रो रहा है ? देवताओं ने उन्हें बताया कि ये आवाजे पृथ्वी के झारखंड़ क्षेत्र से आ रही है। प्रभु ने देखा की झारखंड़ में मनुष्यों को जिंदा जलाया जा रहा है। वन के प्राणियों को लगातार गोली मारा जा रहा है। उन्होनें यमराज से पुछा कि मनुष्यों एवं अन्य प्राणियों पर ऐसा अत्याचार करने का किसने कानून बनाया। तुम्हारे यमलोक में तो मृत्यु के बाद प्राणियों पर ऐसा अत्याचार करने का किसने कानून बनाया। तुम्हारे यमलोक में तो मृत्यु के बाद प्राणियों के पाप-पुण्य का लेखा-जोखा करके उसे स्वर्ग या नर्क में लाया जाता है, फिर उचित सजा दिया जाता है। पर यह जीतेजी प्राणियों को जलाना, समझ में नहीं आता। क्या किसी अत्याचारी असुर का साम्राज्य झारखंड़ क्षेत्र में जल रहा है ? देवताओं से उन्हें जबाव मिलते, इसके पहले ही उन्होनें देखा कि वहाँ तो चारों तरफ असुर ही असुर दिखाई दे रहें है। जो बड़े-बड़े वाहनों उड़न खटोले पर बड़े-बड़ हथियार लिए घूम रहें हैं।
देवताओं ने भगवान से कहा कि प्रभु अब आप अवतार लेकर झारखंड़ में जाएँ एवं असुरों का नाश करें अन्यथा न तो भू-लोक बचेगा न ही स्वर्ग, न ही आपका सिंहासन। असुर अब चाँद पर पहुँच गये, मंगल की दूरी माप लिया। जल के अन्दर चलने की पन-डुब्बी बना ली है। अन्य ग्रहों पर भी कब्जा करने की तैयारी चल रही है।
प्रभु बड़े चितिंत हुए ऐर कहा कि “देखो देवताओं मैं तो अवतार लेते-लेते थक चुका हूँ।” फिर अब तो वहाँ पहले की तरह एक असुर रावण या कंस नहीं है। वहाँ तो दर्जनों एक साथ घूम रहे है। भाई! मुझसे उनका नाश करना संभव नहीं होगा। अब आप तैतींस करोड़ देवता हो, अब आप ग्रुप बना कर जाएँ-ठीक असुरो की तरह और समस्या का समाधान करें।
प्रभु फिर करवट लेकर सो गये। देवताओं के सामने अब असली समस्या आ खड़ी हुई थी। झारखंड़ के जल, जमीन एवं जंगल की रक्षा कैसे की जाए। यहाँ तक कि झारखंड़ की वायू भी प्रदुषित, हो चुकि थी कि उस वायु में साँस लेना मुश्किल हो गया। आसमान की परतों में छेद हो रहे थे। पर्यावरण तक असंतुलित हो गया था।
अब झारखंड़ी तो इतने ज्यादे शोषित-पीड़ित हो चुके थे कि इस शोषण को अपनी नियति मानने लगें थे। सिर उठाने की हिम्मत नहीं थी। हाथ-बाँधे, गर्दन झुकाए अपमानित होते रहते। चलती-फिरती लाश के समान सिर्फ हिलना-डूलना भर रह गया था।
ऐसी परिस्थिति में उनकी रक्षा कैसे हो ? उनके जीवन में परिवर्त्तन कैसे हो ? झारखंड़ियों को मुक्ति कैसे मिले ?
Thursday, August 5, 2010
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