Monday, August 16, 2010

झारखंड़ में बदली परिस्थिति –

कहते हैं कि पृथ्वी आग का गोला थी। यह आग का गोला बहुत देर से ठंड़ा हुआ। पृथ्वी ठंड़ी हुई तो जल, जमीन और जंगल पैदा हुए। जल, जंगल से जीव की सृष्टि हुई। इसी में से धीरे-धीरे कोई जीव मानव बन गया।
अगर पृथ्वी की आयु चौबीस घंटे की ऑकी जाय तो मानव-जीवन की सम्पूर्ण आयु मात्र दो मिनट की आयेगी। मानव-जीवन का अर्थ है मानव की सृष्टि से आज तक का उसका अस्तित्व का समय। ऐसा भू-गर्भ शास्त्रियों एवं खनन वैज्ञानिकों का कहना है। मानव ने अपनी उत्पत्ति से आजतक कई युगों की यात्र की है। पाषाण-युग से आज तक की यात्रा। जल, जंगल एवं जमीन ने मानव को पैदा किया है, अतः उनकी शारीरिक बनावट उसके रहन-सहन का ढंग, उसकी भाषा उसकी संस्कृति पर इन्हीं का प्रभाव पड़ा। संसार के विभिन्न इलाकों, द्वीपों, महाद्वीपों के मानव अलग परिस्थितियों में जीवन-यापन करने के कारण अलग-अलग साँचों में ढल गये। अलग-अलग प्रकृति के हो गये। अलग-अलग प्राकृतिक परिवेश के चलते अलग-अलग स्वभाव के हो गये। अलग-अलग बोलियाँ, भाषाएँ बोलने लगे। अलग-अलग सभ्यताएँ उभर कर सामने आई। अलग-अलग राष्ट्रीयताओं का जन्म हुआ। अलग-अलग राष्ट्र, देश बने। प्रदेश बने।
मानव की सभ्यता का इतिहास कृषि युग से शुरू हुआ, जब मानव ने अनाज उगाना शुरू किया। अनाज के लिए समतल जमीन पर खेती करना आवश्यक था, जहाँ पानी की प्रचुरता थी। मनुष्य की सभ्यता के विकास के मूल में पानी एक बहुत बड़े तत्व के रूप में मौजुद रहा। पानी के साथ लकड़ी तथा बाद में लोहे का नम्बर आया। यही कारण था कि रेनासाँ-पीरियड तक बड़े-बड़े शहरों, नगरों का अर्विभाव बड़ी-बड़ी नदियों एवं समुन्दर के किनारों पर हुआ। इंगलैंड, रोम, एथेन्स, ग्रीस, दिल्ली, वाराणसी, इलाहाबाद, पटना, कलकत्ता, मद्रास, बम्बई आदि शहर नदियों के किनारे या समुद्र के किनारे बसे।
कृषि-युग में राजतंत्र का उदय हुआ। भारतवर्ष में समाज को जातियों एवं सामुदायों मे बाँटा गया। भारतीय समाज विभिन्न समुदायों यानि जातियों में बँट गया। यह बँटवारा काम के आधार पर हो गया।
विश्व के सभी जगहों में खान-पान, रहन-सहन एवं सामाजिक मूल्यों का निर्धारण भी वहाँ के जमीन, जल एवं जंगल के अनुरूप हुए। कृषि-युग एवं धार्मिक उत्थानों के युगों में मानव का जीवन अपेक्षाकृत शांत एवं प्रकृति के अनुरूप चलता रहा। अशांति भी हुई। राज-तंत्र के लिए लड़ाई लड़ी गई। धार्मिक युद्ध भी हुए। इसके विरोध में समाजवाद लागू करने के लिए भी आन्दोलन होते रहे। पर आम जनता की जीवन शैली पर इन सबका कोई बड़ा प्रभाव नहीं हुआ। जीवन यापन की शैली का क्रमिक विकास होता रहा। सभ्यता एवं संस्कृतियों का क्रमिक विकास होता रहा। जीवन-यापन की शैली पर आम जनता के बीच कोई खास या अचानक परिवर्त्तन नहीं आया।
मनुष्य के जीवन की इस श्रृखला में जो सबसे बड़ी बात हुई वह थी भाप के इंजिन का अविष्कार, बिजली की खोज। यानि औद्योगिकरण के युग का प्रारम्भ। इसने पूरी मानव-जाति के इतिहास में अचानक नया मोड़ पैदा कर दिया। मानव-जाति को बहुत सीघ्र नये रास्ते पर सींच कर जला गया। मानव जाति की सोच को, उसकी जीवन शैली को औद्योगिकरण ने बूरी तरह प्रभावित किया। मानव जिन चीजों की कलपना तक नहीं कर पाया था, उन चीजों को वैज्ञानिकों ने सामने लाकर खड़ा कर दिया। तब शुरू हो गया वैज्ञानिक सभ्यता का युग। टेलिविजन, दूरभाष, रेडियो, मोबाईल फोन, रेलगाड़ी, हवाई जहाज से लेकर अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक हथियार, रसायनिक हथियार, आर0 डी0 एक्स0 बम, बारूद, प्रक्षेपात्र, परमाणु बम आदि। ग्रहों की दूरियाँ भी मानव मापने लगा। चाँद पर पहुँच गया और चन्दामामा की असलियत का पर्दाफास कर दिया। धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक मान्यताओं को कड़ा झटका लगा।
अब अगर यूँ कहें कि वैज्ञानिक युग में मानव का काम अब सिर्फ पानी एवं उपजाऊ जमीन से नहीं चलने लगा तो कोई गलत न होगा। अब मानव को चाहिए था, लोहा, कोयला, बॉक्साइट, जस्ता, ताँबा, सोना, युरेनियम, चाँदि, प्लेटिनम, अबरख, लकड़ी, बाँस, घास, तरह-तरह के खनिज पदार्थ तथा बिजली। पर ये चीजें बड़ी-बड़ी नदियों की समतल जमीनों पर नहीं मिले। तब इनकी खोज जंगलों भरे इलाकों, पहाड़ों से भरे भू-भागों में होने लगी। तब पाया गया कि वैज्ञानिक सभ्यता को बरकरार रखने के लिए सभी आवश्यक चीजें, सभी संसाधन जंगलों-पहाड़ो से भरे भू-भागों में मौजूद थी। बिजली पैदा करने वाली तेज धार वाली नदियाँ भी इन्ही इलाकों में मौजूद थी। विनमय के साधन को बनाने के लिए यानि सिक्के, नोट, कागज बनाने के तथा सोना, ताँबा, लकड़ी, सेवई घास, बाँस भी इन्ही भू-भागों में वर्त्तमान में है। आवागमन के लिए सड़कों को बनाने के लिए पत्थर, अलकत्तरा भी इन्ही पहाडो पर मिले। भवन निर्माण के लिए सिमेंट, चुना पत्थर भी यहीं। लोहा भी यहाँ, युरेनियम भी यहाँ। ऊर्जा के लिए कोयला भी इन्ही भू-भागों में मिले।
जंगल-झाड़ से घिरे भू-भाग ही झारखंड़ कहे जाते है। भारतवर्ष में कई झारखंड है। हमारा झारखंड, बिहार, बंगाल, उड़ीसा, मध्यप्रदेश, के हिस्सों में फैला है। वैज्ञानिक सभ्यता को चलाने के लिए आवश्यक सभी वस्तुएँ यहाँ मौजूद है। इस सभ्यता को चलाने के लिए आज झारखंड की जमीन, जल एवं जंगल तथा इसके खनिजों का किस प्रकार दोहन किया जा रहा है, एवं इसके क्या दुष्परिणाम हुए है, किस प्रकार झारखंड एक आंतरिक उपनिवेश बन गया है, इस पर हम चर्चा करेंगे।
भारतवर्ष ही नहीं, विश्व की वैज्ञानिक सभ्यता को चलाने के लिए झारखंड का क्या योगदान रहा है, इसे हमने अब जान लिया है। भारतवर्ष में एक नहीं कई झारखंड है, जहाँ औपनिवेशिक शोषण जारी है। झारखंड का धन झारखंड के लिए अभिशाप बन गया। इन सम्पदाओं का औद्योगिक विकास के लिए दोहन जरूरी था और इसी ने झारखंड को एक आंतरिक उपनिवेश बना डाला। बींसवी सदी के शुरूआती द्वितीय एवं तृतीय दशक से औद्योगिक जगत का प्रारम्भ झारखंड क्षेत्र में कोयले की खदानों की शुरूआत से हुआ। इसी शुरूआती दौर के समय से उन्नींस सौ पचास तक औद्योगिकरण की पृष्ठभूमि भारतवर्ष में भी तैयार हो चुकी थी। बम्बई, कानपुर आदि जगहों के कपड़ा-मिलों एवं चमड़े के कारखानों आदि के साथ-साथ ताँबा की खदानें बनने लगी थी। भारतवर्ष को आजादी 1947 मे मिली। इसके संविधान को मान्यता छब्बीस जनवरी उन्नींस सौ पचास मे मिली। आजादी मिलने के बाद तो इस क्षेत्र में सैकड़ों प्रकार की खनिजों के दोहन की प्रक्रिया में तेजी आ गई। औद्योगिकरण में तेजी आई। बड़ी-बड़ी ताप-विद्युत परियोजनाएँ लगाई जाने लगी। नदियों को बाँधा जाने लगा। बाँध बनाए जाने लगे। दामोदर, बराकर, स्वर्ण-रेखा, कोनार, खरकाई आदि कई बड़ी नदियों पर बाँध बाँधे गये। इसके साथ ही छोटी नदियों के जल को भी घेरा गया। पत्थर तोड़ने के हजारों क्रेशर लगने लगे। इन खनिजों पर आधारित सैकड़ों प्रकार के कल-कारखाने बनने लगे। कई औद्योगिक शहरों का जन्म हुआ, जैसे धनबाद, बोकारो, गिरिडीह, हजारीबाग, राँची, जमशेदपुर, सिन्दरी, घाटशिला वगैरह-वगैरह है। झारखंड के जंगलों एवं पहाड़ों के बीच ये शहर बसते गये।

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