Monday, August 16, 2010

झारखंड़ में बदली परिस्थिति

इस औद्योगिक विस्तार के लिए लाखों एकड़ जमीन सरकार के द्वारा अधिग्रहित की गई, सरकारी उपक्रमों एवं पब्लिक अंडरटेकिन्डस के लिए। हजारों एकड़ खेती योग्य भूमि नदियों पर बाँधे गये बाँधों में डूब गये। हजारों एकड़ जंगल साफ हो गये। इन उद्योगों में नौकरी, व्यवसाय, रोजगार, ठेकेदारी पाने के लिए झारखंड क्षेत्र से बाहर के लोग तेजी से भारी तादाद में यहाँ आने लगे। यहाँ जो शहर औद्योगिकरण के चलते बसे उनमे बाहरी क्षेत्र के लोग बसते गये। स्थानीय मूलवासी इन शहरों से दूर हटने लगे। नये नव धनाद्य लोगों का दल पनपने लगा। मॉफिया-संस्कृति पनपी। अपराध बढ़ने लगे।
झारखंड के मूलवासियों को चोतरफा मार झेलनी पड़ी। एक तो वे अपनी जमीनों से विस्थापित होने लगे। जमीनों से विस्थापित होने के साथ-साथ बाहरी संस्कृति के प्रवेश से झारखंडियों का सांस्कृतिक-विस्थापन भी शुरू होने लगा। झारखंड क्षेत्र के लोग वैसे ही सीधे-साधे स्वभाव वाले होते हैं। फिर अशिक्षा के चलते सरकारी महकमों मे भी कम थे सरकारी नौकरी से वंचित थे, नये खुलने वाले कलकारखानो, खदानो मे भा इन्हे नौकरी नहीं मिली। इन्हें कोई हिस्सेदारी नहीं दी गई। बहुत कम लोग स्वतंत्र व्यवसाय करना जानते थे। फिर इनके पास पूँजी भी नहीं थी। पदाधिकारी चाहे सरकारी हो, या प्राइवेट कम्पनियों के सभी बाहरी व्यक्ति।
जंगलों से भी मूलवासी -आदिवासियों का विस्थापन होने लगा। जंगल के कानून मूलवासियों के हक में नहीं हेने के कारण, जिन जंगलों पर उनका जीवन आश्रित था, वे जंगल ही उनके लिए बेकार होने लगे। जंगल पर आधारित झारखंडियों का जीवन नष्ट होने लगा। जंगल की सारी सम्पदा, उनका उत्पाद फूल, फल, कंद, पत्ते-पौधे, पेड़ जड़ी बूटी सभी का सरकारी करण हो गया। जंगल के पहाड़ो के पत्थर, मोरम, बाँस, घाँस, नदी, नाले सभी सरकारी हो गये।
औद्योगिकरण का यह विस्तार, झारखंड़ की सम्पदा का जोरदार दोहन 1970 तक आते-आते काफी प्रचंड रूप से हो गया था। इसके कई दुष्परिणाम सामने आए। सरकारी उपेक्षा के चलते विस्थापितों को कभी उचित मुआवजा भुगतान नहीं मिला। दशकों तक मुआवजा भुगतान नहीं किया गया। उनके पुर्नवास की कोई नीति नहीं बनाई गई। न ही उनका पुर्नवास किया गया। कोई अपने हक अधिकार की बात करता तो उन्हें गोलियों से भूँजा जाता। महाजनी शोषण, सूदखोरी अपने चरम पर पहुँच चुका था। संगठित रूप से, षंड़यंत्र करके शराब खोरी की आदत मूलवासियों, आदिवासियों में डाली जा रही थी। स्थिति ऐसी बन गई कि झारखंड़ी औने-पौने दामों पर अपनी जमीनें बेच देते। या फिर सूदखोर-महाजन उन पर कब्जा कर लेते।
प्रतिवर्ष झारखंड के गरीब लोग देश के दूसरे प्रदेशों में मजदूरी करने के लिए पलायन करने लगे। पंजाब, हरियाणा तथा पश्चिम बंगाल आदि प्रदेशों में खेत-मजदूर या ईंट भट्ठों में मजदूरी करने चले जाते। अपना परिवार, घर-द्वार छोड़कर पलायन करने लगे। त्रासदी तो यह हुई कि बाहर प्रदेशों से लोग झारखंड क्षेत्र में लोटा-कम्बल, झोंटा-सोटा लेकर आने लगे और पैरवी के बल पर करोड़पति बनने लगे, पर झारखण्ड के लोग पेट भरने के लिए बाहर पलायन करने लगे। अपने ही धर मे लगे उद्योगों, परियोजनाओं का कोई लाभ झारखंड़ियों को नहीं मिलने लगा। विकास के नाम पर झारखंड़ियों का विनाश शुरू हुआ। स्थानीय लोगों की जमीनों पर बाहर से आए लोगों ने कब्जा करना शुरू कर दिया। माफिया-संस्कृति के उदय के साथ ही पूरे झारखंड में आतंक का साम्राज्य बनने लगा। इनके आतंक से स्थानीय लोग त्रस्त रहने लगे। थाना-पुलिस, प्रशासन में स्थानीय लोगों के नहीं रहने के कारण, लूट एंव शोषण चरम सीमा पर पहुँच गया। छोटानागपुर काश्तकरी अधिनियम एवं संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम सिर्फ नाम के लिए रह गये। इन्हें ताख पर रखकर जमीनों का हस्तांतरण किया जाने लगा। सरकारी जमीनों की बन्दोबस्ती स्थानीय आदिवासी, हरिजन, गरीब, पिछड़े लोगों को नहीं करके धनी-मानी एवं बाहर से आए लोगों के हाथों कर दिया जाने लगा। झारखंडियों से जल-जंगल एवं जमीन के परम्परागत अधिकार छीनने लगे।
औद्योगिकरण के चलते प्रदुषण बढ़ने लगा। जंगल का विनाश होने लगा। प्रदुषण के चलते जमीनों की उत्पादकता पर बहुत बुरा असर पड़ा। फसल का उत्पादन घट गया। सभी नदियों, नालों, झरनों, तलाबों, जलाशयों का पानी प्रदुषित हो गया। पर्यावरण में असंतुलन पैदा हो गया। झारखंडियों की जीवन-शैली छिन्न-भिन्न होने लगी। विकाश के इस दौड़ में अशिक्षित, गरीब भोले झारखंडी पीछे पड़ गये।
आप देखेगें कि बिहार में आदिवासी जनसंख्या में लगातार कमी हुई है जो 1951 में 10.07 प्रतिशत से कम होकर 1981 की जनगणना में 8.13 प्रतिशत हो गई। यह कमी झारखंड क्षेत्र में सर्वाधिक बताई गई है। आदिवासियों की जनसंख्या 1951 में 36.81 प्रतिशत था। 1981 में यह घटकर 30.25 हो गया। आज की तारीख में यानि 2001 की जनगणना में यह मात्र 22 प्रतिशत रह गई है। यह सब बाहर से आकर बसने वाले गैर-आदिवासी जनसंख्या के कारण हुआ। इसका एक अन्य कारण भारी तादाद में आदिवासी जनसंख्या के बाहर पलायन करने का है। कई आदिवासी समुदाय तेजी से बदलती हुई परिस्थिति में अपने अस्तित्व की रक्षा भी नहीं कर पाये। बदले आर्थिक दौर एवं सामाजिक परिवेश से तालमेल नहीं बैठा पाने के कारण हतोत्साहित होकर बैठ गये। प्रायः सुप्त हो गये। इसमें बिरहोर, पहाड़ियाँ जातियाँ लुप्त हो गई है।
बिहार के अन्य जिलों यानि झारखंड क्षेत्र से बाहर के जिलों से आकर बसने वाले प्रवासियों की संख्या में धीरे-धीरे वृद्धि हुई। यह वृद्धि जो 1961 में 11.7 लाख से बढ़कर 1971 में 14.6 लाख हो गई। यह आबादी 1981 में बढ़कर 21.4 लाख हो गई। इस अवधि में बाहर से आकर बसने वाले प्रवासियों का प्रतिशत 10.6 प्रतिशत से बढ़कर 12.16 हो गई। राँची में यह प्रतिशत 5.96 से बढ़कर 8.62 प्रतिशत हो गई। औद्योगिक क्षेत्रों में यह प्रतिशत निश्चय ही इससे अधिक बढ़ गया। यह दबाव शहरों में सबसे ज्यादें हुआ। इतने लोगों के आने से जमीन एवं अन्य संशाधनों, रोजगार, शिक्षा, चिकित्सा और अन्य सुविधाओं पर अत्यधिक दबाव पड़ा।
आदिवासी बहूल जिले यानि जनजाति बाहूल जिले अल्पसंख्यक जिले हो गये। संथाल परगना एवं सिंहभूम इसके उदाहरण हैं। शहरी जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हुई है और बाहरी जनसंख्या ही इसमें ज्यादे है। इसके अलावा जनजातिय जनसंख्या का शहरीकरण हुआ है। ग्रामिण क्षेत्रों की जनजातिय जनसंख्या में कमी आई है। झारंखंड़ क्षेत्र में औद्योगिक मजदूरो की संख्या बढ़ी है। इसमें भी बाहरी मजदूर सर्वाधिक है। आज जब लोक-सभा तथा विधान सभा क्षेत्रों का परिसीमन किया जा रहा है, तो देखा जा रहा है कि शहरी क्षेत्रों में सीटें बढ़ गई एवं सूदूर आदिवासी क्षेत्रों में कम हो गई।
इस अवधि में यानि बींसवी शताब्दी के चौथे दशक के बाद से जो सबसे कठिन समस्या पैदा हुई, वह यह कि “स्थानिय” शब्द का विस्तार कर दिया गया। उसमें बिहार के सभी जिलों के व्यक्तियों को शामिल करने के परिणाम स्वरूप छोटानागपुर तथा संथाल परगना के हिस्सों में यहाँ के मूल-वासियों के स्थानों पर वे स्थानिय बनकर उनका हिस्सा खा गये। औद्योगिक प्रतिष्ठान सबसे ज्यादे झारखंड क्षेत्र में स्थापित किए गये। कारण कि यहीं वो सब संशाधन मौजूद थे।
बाहरी जनसंख्या के इस दबाव के कारण राजनैतिक क्षेत्रों में भी बाहरी व्यक्तियों का दबदबा बढ़ने लगा। ये बाहरी जनसंख्या बहुत जल्द सम्पन्न एवं धनी बनने लगे। औद्योगिक क्षेत्रों में बाहरी मजदूरों के वर्चस्व हो जाने के कारण एवं बाहरी ऑफिसरों, पदाधिकारियों, कर्मचारियों के रहने के कारण मजदूर यूनियनों में बाहरी लोग ही नेता बन कर उभरे। अखिल भारतीय पार्टियाँ इन्ही लोगों को सांसद या विधान सभा का टिकट देने लगीं। धीरे-धीरे झारखंड राजनैतिक उपनिवेश बनने लगा।
झारखंड में इस औद्योगिकरण के चलते एवं संस्कृति के प्रवेश के साथ-साथ यहाँ के सामाजिक जीवन पर भी प्रभाव पड़ने लगा। झारखंड़ क्षेत्र के लोगों को बाहर के लोगों की भाषा, रहन-सहन, वेष-भूषा प्रभावित करने लगी। भोजपुरी, बंगला, मगही, मैथली आदि भाषाएँ यहाँ के लोग भी बोलने लग गये। हिन्दी तो बोलचाल की भाषा में प्रयोग करने लगे थे। स्थिति ऐसी बनने लगी कि स्थानीय भाषा कुड़माली, संथाली, मुंडारी आदि का प्रयोग शहरों में नहीं करने लगे।
जल, जंगल, जमीन से विस्थापन के कारण झारखंडियों का सांस्कृतिक विस्थापन भी शुरू हो गया था। धार्मिक-विस्थापन भी हो रहे थें, जैसा कि हमने पहले ही देख लिया है।
सामाजिक विस्थापन का एक बड़ा भाग था, 1935 से 1970 की अवधि में लाया गया झारखंडी जातियों के सामाजिक स्तर मे बदलाव। अनेक जनजातियों को जनजाति की सूची से हटा दिया गया। इन जनजातियों की अच्छी खासी जनसंख्या थी। कुछ एक को जनजाति की सूची हटाकर “हरिजन” अनुसूची जाति की सूची बनाई गई। कुछ एक जातियों को जनजाति रहते हुए भी उन्हें जनजाति सूची से हटा दिया गया।
“हरिजन सेड्यूल कास्ट” की अवधारणा वास्तव में झारखंड से बाहर की अवधारणा है। वास्तव में झारखंड के मूलवासियों में शुद्र जाति का कोई वर्गीकरण झारखंड की सभ्यता-संस्कृति एवं सामाजिक संरचना में मौजूद नहीं था। ब्राह्मणवाद की जाति-प्रथा झारखंड में बहुत बाद मे लागू की जाने लगी। जिन जातियों को जनजाति सूची से हटाया गया, वो थी कुड़मी महतो, रजवार, खतौरी, बडाइक, गौंड़, पान कोल आदि।
इस प्रकार औद्योगिकरण के विस्तार के साथ, मूल झारखंडी चाहे वह अनुसूचित जनजाति के हो, अनुसूचित जाति के हो या अन्य गैर-आदिवासी सदान, सभी की समान रूप से उपेक्षा होने लगी, जिसके चलते दोनों वर्गो में निकटता बढ़ने लगी। बिहार सरकार एवं केन्द्र सरकार की उपेक्षापूर्ण नीतियों से इस क्षेत्र के आदिवासी एवं गैर-आदिवासी सभी मूलवासी शोषण के शिकार हुए एवं समान रूप से स्वयं को शोषित एवं उपेक्षित समझने भी लगे।
कृषि-युग की देन सामंतवाद है। औद्योगिक युग की देन पूँजीवाद-साम्राज्यवाद है। इस पूँजीवादी साम्राज्यवाद को चलाने के लिए अब सशरीर उपस्थित रहना जरूरी नहीं।
इस तेजी से बदलती परिस्थिति ने झारखंडियों को यह महसूस करा दिया कि वे इस बदलती दुनियाँ का हिस्सा नहीं। विकास की इस दौड़ में उन्हें भागीदारी ही नहीं लेने दी जा रही है। मुख्य धारा तो क्या उन्हें किसी भी धारा में लाने का कोई प्रयास नहीं हो रहा है। उन्हें यह लगने लगा कि यह व्यवस्था ही उनके शोषण के लिए बनी है। वे अपने आप को अलग-थलग अनुभव करने लगे। एक अलगाववाद की भावना का पैदा होना स्वाभाविक था, ऐसी परिस्थिति में। इस उपेक्षा एवं शोषण के प्रतिकार के रूप में उठ खड़ी हुई झारखंड अलग राज्य की माँग। कालान्तर में विख्यात हुए “झारखंड आन्दोलन” के नाम से अनेक कार्यकलाप एवं गतिदविधियाँ।

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