Friday, August 27, 2010

अध्याय पाँच

देश में अलग राज्य बनाने के आधार
अलग-अलग प्रदेश बनाने के आधारों की खोज काफी पहले से शुरू हो चुकि थी। भारतवर्ष की आजादी के पहले से ही उन कारणों या आधारों की खोज की जाने लगी थी जिनके सहारे किसी नये राज्य का गठन जनता एवं देश के हित के लिए किया जा सके।
अंग्रेजों ने राज्यों की सीमाओं को बदला एवं नये राज्यों का गठन किया था, सिर्फ अपनी राज्य सत्ता को आसानी से चलाने के लिए। उनके सामने संस्कृति, भाषा या और कोई आधार नहीं था। “फुट डालो एवं राज्य करो” की नीति के तहत यहाँ के निवासियों को विभाजित करने के लिए भी उन्होने राज्यो की सीमाओं का निर्माण उसी प्रकार किया था। सीमाओं का निर्धारण इस प्रकार किया था, कि एक सीमा के अन्दर रहने वाले लोग आसानी से एक न हो सके और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बगावत न कर सकें। यही कारण है कि हिन्दुस्तान में उत्तर की तरफ जो भूमि थी, उसे उत्तर प्रदेश का नाम दे दिया। ठीक उसी प्रकार मध्य भारत की भूमि का नाम मध्य प्रदेश दे दिया गया। इनके इतिहास, भूगोल, सभ्यता-संस्कृति का ख्याल रखते हुए, नामकरण नहीं किया गया। बंगाल के अंदर पहले बिहार, उड़ीसा, आसाम तक समाहित था। “दी इंडियन कान्सटीचूसनल रिर्फामस 1918” तथा “दी इंडियन स्टेचुटेरी कमीशन 1930” से स्पष्ट हो जाता है कि जो स्वरूप अंग्रेजों ने बनाया था, जो नक्सा ब्रिटिश हुकूमत ने बनाया था, वह सिर्फ उनके सैनिक दृष्टिकोण को मद्देनजर रखते हुए बनाया था। सिंधू एवं बाम्बे प्रोविंस भी इसी उद्देश्य से बनाये गये थे। बंगाल, बिहार, उड़ीसा, का गठन भी इसी उद्देश्य से, उसी प्रशासनिक दृष्टिकोण से किया गया था, ताकि भारतवर्ष की एक समान सभ्यता-संस्कृति के लोगों को अलग-अलग राज्यों में विभक्त करके रखा जा सके। उनकी भाषा-संस्कृति को गड़मड़ करके रखा जा सके। और तभी तो उनकी भाषा एवं उनका प्रशासन चल सकता था।
बींसवी सदी के दूसरे दशक में, 1920 में नागपुर के अधिवेशन में, तथा काँग्रेस ने 1929 में “दी स्टेचुटरी कमीशन” यानि साइमन कमीशन के समक्ष उत्कल आंध्र, सिंध एवं कर्नाटक के गठन की माँग भाषा-भाषाई आधार पर रखा था। फिर उन्नीस सौं अठाइस में “दी नेहरू कमिटी” “ऑफ ऑल पार्टी कान्फ्रेस” ने भी राज्यों के पुर्नगठन के लिए भषाई आधार की वकालत की। यहाँ तक की काँग्रेस ने अपने उन्नीस सौ पेंतालीस-छयालीस के इलेक्सन मेनिफेस्टो में इसी बात को दोहराया कि प्रशासनिक ईकाइयों का निर्माण भाषा एवं संस्कृति को देखते हुए किया जाय।
आजादी के बाद काँग्रेस ने इस दिशा में थोड़ा सा परिवर्त्तन किया। उन्नीस सौ सेंतालीस में “दी लिगविस्टीक प्रोविन्सेस कमिटी” यानि “धर-कमिटी” ने भाषाई सिद्धान्त को मान्यता देने लायक नहीं समक्षा। “जवाहरलाल विठ्ठल भाई कमिटी” जो उन्नीस सौ अड़तालीस की इंडियन नेशनल काँग्रेस की कमिटी थी, ने इस सिद्धान्त के विरूद्ध चेतावनी दी। हाँलाकि काँग्रेस के भाषाई आधार ने उन्नीस सौ तिरपन में आन्ध्रप्रदेश को जन्म दिया, जब काँग्रेस के पोट्टी श्री रामलू ने आमरण अनशन इसी संदर्भ में किया। उन्नीस सौ चौवन में भाषाई संकोर्णता एवं धार्मिक आधार से उत्पन्न संकट से उबरने के लिए न्यायमूर्ति फजल अली की अध्यक्षता में “राज्य पुर्नगठन आयोग” बना।
उन्नीस सौ छप्पन में इसकी जो रिपोर्ट आई उसमें “भाषाई-समानता” यानि “लिंग विस्टीक होमोजिनीयलिटी” को एक महत्वपुर्ण आधार माना गया, राज्यों की सीमाओं को निर्धारित करने के मामले में। इससे गहरा असंतोष जगा एवं देश में हिंसा भी भड़की। आयोग जातीय भावनाओं को संतुष्ट करने में अक्षम रहा। ये भावनाएँ देश में उस समय तक काफी प्रबल हो चुँकि थी। यही कारण है कि राज्य पुर्नगठ आयोग की रिपोर्ट का बहुतों ने स्वागत नहीं किया। काँग्रेस-पार्टी ही नहीं, बल्कि शोसलिस्ट पार्टी के राम मनोहर लोहिया ने भी भाषाई-आधार को माना एवं प्रोत्साहित किया। उन्नीस सौ साठ में बम्बई का विभाजन हुआ, तथा महाराष्ट्र एवं गुजरात भषाई-आधार पर बने। उन्नीस सौ छयासठ में पंजाब एवं हरियाणा बने। इसके बाद भी अनेक राज्य बने जिनके आधार में भाषाई-आधार एक महत्वपुर्ण तत्व के रूप में विद्यमान रहा।
वे राज्य हैं- नागालैंड (उन्नीस सौ सन्तावन) हिमाचल प्रदेश, मेघालय (उन्नीस सौ सत्तर), मणिपुर, त्रिपुरा, अरूणाचल प्रदेश एवं मिजोरम, मद्रास के विभाजन के बाद तमिलनाडू एवं कर्नाटक (उन्नीस सौ इकहत्तर) झारखंड राज्य के साथ-साथ कई अन्य जगहों पर भी पृथक राज्य की माँगे उठी। ये हैं- गोरखालैंड, (बंगाल से), उत्तराखंड (उत्तर प्रदेश से), छत्तीसगढ़ (मध्य प्रदेश से), तेलंगना (आन्ध्र प्रदेश से) विदर्भ (महाराष्ट्र), बोड़ोलैंड़।
भारत के संविधान में इस बात की चर्चा कहीं नहीं है कि नये राज्यों या पृथक राज्यों के गठन का अधार क्या हो। संविधान के प्रथम अध्याय की धारा-2 से चार तक नये राज्यों के गठन की बात कही गई है। भारतीय संविधान में सिर्फ इतना ही कहा गया है कि “जैसा कि संसद उचित समझे”, किसी निश्चित आधार के दायरे में नये राज्यों के निर्माण को बाँधा नहीं गया है। इसे संसद के द्वारा विचार करने के लिए खुला छोड़ दिया गया। परिस्थिति के अनुरूप स्वतंत्र निर्णय ले सकता है। संसद को यह भी आधिकार दिया गया है कि वह चाहे तो एक राज्य या उससे अधिक राज्यों का गठन कर सकती है। उसके लिए संबंधित राज्यों के राज्य सरकारों से सहमति प्राप्त करना भी आवश्यक नहीं माना गया है। असहमति जाहिर करने के बाद भी संसद को अधिकार है कि वह नये राज्य के गठन से संबंधित विधेयक को संसद में पारित करवा सकती है।
इस बात का भी जिक्र संविधान में नहीं है कि नये राज्य का गठन सिर्फ आदिवासी या जनजाति बाहुल क्षेत्रों के लिए ही किया जा सकता है और गैर-आदिवासी या गैर-जनजाति बाहुल क्षेत्रों के लिए नहीं किया जा सकता।

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