द्वितीय विश्व-युद्ध की समाप्ति के बाद उन्नीस सौ छयालीस में भारत की “कन्सटीचूऐन्ट एसेम्बली” यानि “सांविधानिक सभा” के सदस्यों का चुनाव होने वाला था। खूँटी से श्री जयपाल सिंह आदिवासी महासभा के उम्मीद्वार बने एवं उनके विरोधी थे काँग्रेस के पूर्णचन्द मित्र। श्री जयपाल सिंह को हराने के लिए काँग्रेस ने पूरी शक्ति लगा दी। नैतिकता को ताख पर रखकर बाहर से गाड़ियों में भर-भर कर स्वंय-सेवकों के नाम से गुंडे बुलाये गये, जो नीरीह जनता पर आतंक फैलाने लगे। उन्नीस सौ छयालीस मार्च दो को श्री लियेन्डर तिड़, जो कभी आजाद हिन्द फौज में थे, गुन्डे स्वंय-सेवकों के साथ मिलकर ट्रको मे बैठकर काँग्रेस का प्रचार करने लगे। तापकरा बाजार में जब कुछ आदिवासियों ने उनका विरोध किया, क्योंकि गुंडे बाहरी थे, तो उन गुंडों ने ट्रक के उपर से गोलियों की बौछार शुरू कर दी। फिर लाठियाँ चलाई। तब वहाँ उपस्थित आदिवासियों ने नारा दिया कि काँग्रेस के दलाल वापस जाओ। भीड़ बढ़ने लगी, नारे सुनकर, तब वे वहाँ से वापस लौट गये। फिर वे खूँटी पहुँचे तथा उल्टा आदिवासियों पर हिंसा करने का आरोप लगाए गये। सूर्यास्त होने तक राँची एवं अन्य कई जगहों से गुंडे ईकट्ठा किए गये एवं बन्दूक, लाठी से लैस तापकरा बाजार में भेज दिए गये। रात्रि के करीब आठ बजे बेबस, निर्दोश, बेखबर, रास्ते से घर लौटते आदिवासियों से बन्दुक की नोक पर वोट माँगे गये तथा अंधाधुँध गोलियाँ चलाई गई। लाठियों से मार-मार कर लोगों को अधमरा कर दिया। महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया। आदिवासियों की लाशें दूसरे दिन मिली। करीब बाइस व्यक्ति घायल पाये गये। इन सब मृतकों को खूँटी लाकर एक ही गढ़े में दफन कर दिया गया। बाद में पता चला कि आततायी गुंडें सभी उत्तर बिहार के थे। मामले-मुकदमें भी दर्ज किए गये, पर सभी आततायी सबूत के अभाव में छूट गये।
इससे स्पष्ट है कि पूज्य महात्मा गाँधी की अहिंसा के नारे लगाने वाले एवं हरिजन आदिवासी के उत्थान की बात करने वाले काँग्रेस ने आदिवासियों की सामूहिक हत्याएँ करके जयपाल सिंह को पराजित किया। आदिवासी महासभा को खत्म करने के लिए ढ़ेर सारे प्रयास किए जाने लगे।
आदिवासी-क्षेत्र में दमन-चक्र चलाने का जो सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण मिलता है, वह है खरसवाँ का गोली कांड़। खरसवाँ को देशी राज्य उड़ीसा में मिलाया जाएगा, यह घोषणा की गई थी। “आदिवासी महासभा” ने घाटसिला, नरसिंहगढ़, चाईबासा, जमशेदपुर आदि अनेकों स्थानों पर आम सभा बुलाई और प्रस्ताव पास कर सरकार को सूचित किया कि खरसवाँ की जनता बिहार में ही रहना चाहती है। उड़ीसा में नहीं।
एक जनवरी उन्नीस सौ अड़तालीस को खरसावाँ बाजार में एक आम सभा बुलाई गई थी। चालीस पचास हजार की तादाद में लोग इकट्ठा हुए थे। उस समय इतनी भीड़ का पाँव-पैदल इकट्ठा होना बहुत बड़ी बात थी। “अंखड़-झारखंड” के नारों से सभा-स्थल गूँज उठा था। जमशेदपुर, राँची, संथाल परगना, मयूरभंज, रायरंगपुर आदि स्थानों से करीब पैंतीस हजार से अधिक लोग आए थे। शांतिपूर्ण तरीके से ये लोग राजा के महल तक आए और राजा से मिले। दिन दो बजे से चार बजे तक सभा हुई। सभा भंग होने के बाद नेतागणों ने जनता को अपने अपने घर वापस जाने को कहा। और स्वंय वापस चले गये।
लौटती निहत्थी भीड़ पर अचानक गोलियाँ चलाई जाने लगी। आधे घंटे तक अंधाधुँध गोलियाँ चलाई गई थी। एक हजार के करीब स्त्री, पुरूष, मासूम बच्चे मौत की घाट उतार दिए गये। स्वतंत्र भारत के पहली जनवरी, पहले ही वर्ष भारत के इतिहास में एक जघन्य अपराध किया गया।
यह घटना जलियाँवाला बाग की घटना से भी विभत्स कहा जाएगा। वहाँ तो देश में ब्रिटिश सरकार के राज्य में गोलियाँ देश-भक्तों पर चलाई गई थी जो आजादी की माँग कर रहें थे। यहाँ तो देश की आजादी के बाद इस तरह का विभत्स कांड़ किया गया, तो सिर्फ इसीलिए कि वे खरसवाँ को बिहार में ही रहने देना चाहते थे। ऐसा क्यों किया गया ? सिर्फ शोषित दलित एक जगह इकट्ठा होकर अपनी माँग रखने की कोशीश कर रहे थे। क्या आदिवासियों को इतना भी अधिकार आजाद भारत में नहीं था।
गोली चालन के बाद अधमरे लोगों को बूटों से रौंदकर मार डाला गया था। ताकि बोलने वाला कोई न बचे। उड़ीसा के अधिकारियों ने पूरे बाजार को घेर रखा था कोई समाचार बाहर जाने नहीं दिया जा रहा था। बिहार सरकार ने एक मेडिकल मिशन एवं “मिशन ऑफ मर्सी” भेजा था, किन्तु वे भी सेवा कार्य से रोक दिए गये थे। घायलों को एक-एक बूँद पानी के लिए भी तरसाया गया था।
श्रीमान् जयपाल सिंह ने कहा था कि आदिवासी, गैर-आदिवासी सभी से इस विषय पर बातचीत हुई थी ओर उससे निष्कर्ष निकलता था कि यह घटना पूर्व-नियोजित थी। खरसवाँ के आदिवासियों ने त्याग एवं बलिदान का अपूर्व आदर्श रखा। आजादी के चार महिने बाद की यह घटना बेमिसाल है। झारखंड के विभिन्न हिस्सों में खरसवाँ के शहीदों को याद करते हुए आदिवासी महासभा की ओर से “झारखंड रैली” निकाली गई। इसमे विशेष ग्यारह जनवरी, उन्नीस सौ अड़तालीस को चाईबासा में, अठारह जनवरी को जमशेदपुर में हुई। इनमें लाखों की तादाद में लोग इकट्ठा हुए।
आदिवासी महासभा एवं झारखंड पार्टी के संगठन के दिनों में इस घटना के बाद भी कई घटनाएँ हुई। इनमें एक महत्वपूर्ण कांड मिहिजाम गोली कांड है। मिहिजाम लोको बिल्डिंग वर्क्स बन रहा था। इस योजना को बनाने के लिए पन्द्रह-सोलह आदिवासी गाँवों को हटाना था। जनता बार-बार पुर्नवास एवं मुआवजा की माँग कर रही थी। पर कोई सुनने वाला नहीं था। एक फोगड़ा माँझी (मरांडी) नामक व्यक्ति ने आदिवासी महासभा को सूचना दी थी कि दिनांक एक जनवरी उन्नीस सौ उनपचास(01-01-1949) को करीब तीन सौ सिपाही पश्चिम बंगाल से लाए गये थे। दो लारी मिलिटरी भी लाई गई थी। घुड़ सवार भी थे। जबरजस्ती मिट्टी कटाई का काम शुरू कर दिया गया था और बस्तियों को उजाड़ने का भी इन्तजाम कर लिया गया था। संथाल-लोग फरियाद करने पहुँचे तो उनपर गोलियाँ चला दी गई। इसमें भी पाँच संथाल आदिवासी मारे गये। दो जनवरी को अगले ही दिन पुलिस ने चार गाँवों को घेर लिया सुबह-सुबह। पच्चीस-तीस लोगों को घेर कर जानदरों की तरह पकड़ लिया गया। एवं गिरफ्तार कर लिया गया। गाँव वालो के घरों में घुसकर सामानों को तोड़फोड़ कर दिया गया। उनके परम्परागत हथियारों, तीर-धनुष, लाठी आदि जब्त कर लिए गये। सैकड़ों लोगो पर मुकदमें दायर कर लिए गये।
आदिवासी महासभा को झारखंड पार्टी का रूप उन्नीस सौ अड़तालीस में दे दिया गया। झारखंड पार्टी के गठन के बाद श्री जयपाल सिंह ने अनुसूचित जनजातियों के अलावे अन्य लोगों को भी इसमें शामिल किया। आदिवासी महासभा का विस्तार किया गया। तथा इसमें जो सिर्फ आदिवासियों को ही सदस्य बनाया जाता था, उस प्रतिबंध को हटाकर इसे व्यापक रूप दिया जाने लगा।
इसका प्रभाव बहुत ही अच्छा रहा। उन्नीस सौ बावन के पहले आम-चुनाव में झारखंड पार्टी ने बिहार के अन्दर ही तैंतीस सीटों को विधान सभा में जीता। यह पार्टी बिहार विधान सभा मे प्रमुख विपक्षी पार्टी के रूप में बैठी। उन्नीस सौ बावन एवं उन्नीस सौ सन्तावन तक के वर्षो में झारखंड आन्दोलन बड़े जोरों पर रहा। दूसरी आम-चुनाव में यह पार्टी उड़ीसा तक पहुँची और वहाँ भी इसके पाँच विधायक बने। यह पार्टी उन दिनों उड़ीसा में भी एक प्रमुख पार्टी के रूप में उभरी। इसका कारण झारखंड पार्टी के अपनी नीतियों में सुधार एवं इसका गैर-आदिवासियों का शामिल करना था। यही कारण था कि बिहार के तैंतिस विधायकों में दश विधायक गैर-जनजाति के हुए।
पर बड़े दुःख की बात है कि बावजूद इस व्यापक आन्दोलन एवं सफलता के हजारों के शहीद होने के बावजूद राज्य पुर्नगठन आयोग (1954-1956) ने झारखंड अलग राज्य के गठन के लिए सिफराश नहीं की। इसे अलग राज्य का दर्जा नहीं मिले, इसके लिए कई गलत आघार बता दिए गये। गलत कारण रिपोर्ट में प्रस्तुत किए गये जो तथ्यों से परे थे। बौद्यिक बेईमानी की गई। इस आन्दोलन का गलत चेहरा सामनें लाया गया।
यह एक बड़ी विचित्र बात थी कि श्री जयपाल सिंह ने जिन्होनें झारखंड अलग राज्य के लिए इतने बड़े आन्दोलन को खड़ा किया था राज्य पुर्नगठन आयोग के समक्ष कोई प्रतिवेदन पेश नहीं किया। उन्होनें राज्य पुर्नगठन आयोग के समझ उपत्थित होना भी उचित नहीं समझा। यहाँ तक कि जब राज्य पुर्नगठन आयोग राँची, पहुँचा तो, वहाँ आलग राज्य की माँग को पेश करना तो दूर, श्री जयपाल सिंह राँची से ही दूर चले गये थे।
अब इसका क्या कारण था, यह कहना तो कठिन है, पर इतना तो स्पष्ट है कि सभंवत वे अलग राज्य के गठन में कोई दिलचस्पी नहीं रखते थे। फिर यह बात भी समझ में नहीं आती कि तब उन्होने इस आन्दोलन को आगे बढ़ाया ही क्यों था ? और ऐन वक्त में पीछे क्यों हट गये थे ?
Thursday, September 2, 2010
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