Thursday, September 2, 2010

आदिवासी महासभा एवं झारखंड पार्टी –

सर्वश्री जयपाल सिंह मुंड़ा के नेतृत्व में झारखंड पार्टी का जन्म हुआ। आदिवासी महासभा को भंग कर दिया गया। और उन्नीस सौ अड़तालीस में झारखंड़ पार्टी बनी। बीसवीं सदी के चालीसवें दशक में आदिवासी महासभा ने काँग्रेस पार्टी के साथ बहुत नजदीकी सम्बन्ध बनाए रखने का प्रयास किया। आदिवासी महासभा ने बिहार प्रदेश काँग्रेस कमिटी में एवं इसके कार्यकारिणी समिति में अपने प्रतिनिधि की बात की थी। काँग्रेस ने इस माँग को स्वीकार नहीं किया। मार्च उन्नीस सौ छयालीस में तत्कालीन काँग्रेस अध्यक्ष डा0 राजेन्द्र प्रसाद के सम्मुख एक स्मृति पत्र प्रस्तुत किया गया जिसमें काँग्रेस पार्टी के इन अंगो में आदिवासी समुदाय को उचित प्रतिनिधि देने की माँग की गई। सन् उन्नीस सौ छयालीस मे ही श्री जयपाल सिंह ने प्रान्तीय परिषद् के लिए एक सीट पर चुनाव लड़ा था, पर वे काँग्रेस के एक उम्मीद्वार के द्वारा पराजित हो गये थे। उनकी पराजय के कारणों में एक यह भी कहा जाता है कि आदिवासी महासभा की नीतियाँ प्रतिक्रिया वादी थी और इस कारण से अनेक आदिवासियों ने काँग्रेस का समर्थन कर दिया था।
आदिवासी महासभा के अलग राज्य की माँग के विरूद्ध, इस दौरान हमले शुरू हो गये थे। इस महासभा को बदनाम करने की साजिश शुरू हो गई थी। प्रेस ने इस महासभा को मूलतः ईशाई आदिम जातियों के एक संस्था के रूप चित्रित किया। यह भी प्रचारित किया जाता कि कुछ गैर-ईशाई जो इस संगठन या संस्था में हैं, उन्हे या तो जोर जबरजस्ती इस संस्था में रखा गया है या कुछ व्यक्तिगत स्वार्थ के कारण इस संस्था के साथ हैं। तत्कालीन प्रमुख पत्र “हिन्दुस्तान स्टैंडर्ड” तथा “सर्च लाइट” ने मार्च 19, उन्नीस सौ तैंतालीस एवं मार्च तेईस उन्नीस छयालीस को इसी आशय का समाचार छापा कि खुँटी क्षेत्र में एक ईशाई आतंक फैला रहा है। तथा यह भी छापा कि लूथरन एवं सेंट पाल मिशन गुंडागर्दी में प्रमुख हिस्सा ले रहें है। यह इसलिए कहा जा रहा था कि श्री जयपाल सिंह मुंड़ा जाति के थे ओर इनकी शिक्षा-दीक्षा ईशाई मिशनरी के द्वारा देश-विदेश में हुई थी। ज्ञातव्य हो कि ये अपने देश के हॉकि के श्रेष्ठतम् खिलाड़ियों में से एक थे और ओलम्पिक खेल में भारत की टीम की कप्तानी भी कर चुके थे। उन दिनों की बात है जब भारतीय हॉकि टीम अपने चरम उत्कर्ष में था।
इस प्रकार झारखंड आन्दोलन के शुरूआती दौर में ही इसे बदनाम करने की कोशिस की गई एवं इसे ईशाई मिशनरियों द्वारा संचालित आदिम जातियों का आन्दोलन कहा गया। इस प्रकार शासक वर्ग ने इस आन्दोलन के विरूद्ध सियासी चालें चलनी शुरू की।
उन्नीस सौ छयालीस की अपनी पराजय के बाद जयपाल सिंह खिन्न हो उठे थे और उन्होने यह घोषणा कर दी थी कि झारखंड के गैर आदिवासियों ने आदिवासियों का आर्थिक शोषण किया है एवं राजनैतिक शोषण किया है। उन्होने कहा कि आदिवासियों के पुनरूत्थान की कल्पना या आशा तब तक नहीं की जा सकती जब तक अतिक्रमण करने वाले गैर-आदिवासी झारखंड छोड़ नहीं देते। इस घोषणा से एक लाभ तो हुआ कि आदिवासी युवक आगे आये, पर नुकसान यह हुआ कि कई जगहों पर गैर-आदिवासियों के पर हमले हुए। आदिवसियों के विरूद्ध भी संघर्ष हुए। इससे पूरे झारखंड का वातावरण संकीर्ण हो गया। तथा आदिवासी नस्लवाद पैदा हुआ। यह आन्दोलन आदिवासी महासभा का यह आन्दोलन जातिवाद से प्रभावित हो गया।
यह सच है कि भारत की आजादी के पहले झारखंड अलग राज्य के आन्दोलन में ईशाई का तथा मुंड़ा एवं उराँव जाति का वर्चस्व था। इस आन्दोलन को ईशाई-मिशनरियों द्वारा संचालित आन्दोलन भी कहा गया था जिसका उद्देश्य मिशनरियों ने अपना हित एवं अपने-प्रचार के लिए और अपना पाँव जमाने के लिए किया था। शुरू से ही काँग्रेस पार्टी ने इस आन्दोलन का विरोध किया था। खासकर इसका विरोध उत्तर-बिहार के लोग कर रहें थे जिसका प्रभुत्व काँग्रेस पार्टी में था। आदिवासी भी जो ईशाई नहीं थें, सामान्यतया इस आन्दोलन से जुड़ नहीं पाये थे, पूरी तरह से, और उनकी धारणा झारखंड पृथक राज्य के सम्बन्ध में स्पष्ट नहीं थी। काँग्रेस के लोगों का ख्याल था कि अगर यह आन्दोलन जोर पकड़ेगा तो इस क्षेत्र में उनकी पकड़ कम हो जोयेगी एवं उनके लिए मुसीबत खड़ी हो जाएगी। यह धारणा काँग्रेस पार्टी के लोगों में अंत तक बनी रही।
झारखंड आन्दोलन में सियासी चालों की कमी नहीं रही। इस आन्दोलन को पहले तो गोली बन्दुक से तथा सरकारी हिंसा के द्वारा दबाए जाने का प्रयास किया गया। अनेकों सभाओं मे गोलियाँ दागी गई। नेताओं की हत्या की गई। उन्हें जेल में यातनाएँ दी गई। अगर हम थोड़ी नजर कुछ प्रमुख घटनाओं पर डालें तो इस आन्दोलन को कुचलने के लिए किए गये जुल्मों सितम को समझ सकते हैं।
उन्नीस सौ उनतीस के पूर्व गंगपुर राज्य (उड़ीसा) में गाँव-गाँव में “आदिवासी महासभा” का प्रचार हो चुका था। आम सभाओं में हजारों हजार की तादाद में जनता इकठ्ठा हो रही थी। इस एकता ने काँग्रेस पार्टी को चौंका दिया था और वह इसे दबाने का प्रयास करने लगी। उड़ीसा में उस समय श्री हरे कृष्ण महताब मुख्य मंत्री थे। गंगपुर राज्य में सुखे के कारण फसल मारी गई थी, फिर भी बड़ी बेरहमी के साथ लगान वसूल की जा रही थी। आदिवासी महासभा ने उन्नीस सौ उन्नतीस, पच्चीस अप्रेल को पाँच बजे गंगपुर के सिमको के मैदान में एक आम सभा रखी थी एवं प्रस्ताव लिया जाने वाला था कि गंगपुर राज्य को अकाल पीड़ित घोषित किया जाय, तथा कर-वसूली पर रोक लगाई जाय। सरकार से मदद माँगने की भी योजना थी। सभापति श्री निर्मल मुंड़ा थे, जिन्हें सरकार ने सभा-स्थल पर ही गिरफ्तार करने की योजना बनाई थी, पर वे लापाता हो गये। उनको नहीं पाकर उड़ीसा सरकार ने निहत्थों पर गोलियाँ चलवा दी। सैकड़ों स्त्री-पुरूष, बच्चे मारे गये। सैकड़ो घायल हुए। लाशों को गाड़ियों में लाद कर जंगलों में फेंक दिया गया। स्पष्टतः इस गोली कांड के द्वारा आदिवासियों के संगठन को छिन्न-भिन्न करने का ही उद्देश्य था। इसे कठोर एवं निर्मम ढंग से दमन किया गया ताकि भविष्य में उनकी आवाज सदा के लिए बन्द हो जाय। इसमें कहा जाता है कि मुख्य मंत्री हरे कृष्ण का हाथ था।

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