जस्टीस फजल अली द्वारा प्रस्तुत की गई राज्य पुर्नगठन आयोग, “स्टेट रिऑरगेनाइजेशन कमीशन” ने झारखंड पृथक राज्य के गठन की अनुशंसा नहीं की। इस आयोग ने इस माँग को अस्वीकृत करने के प्रमुख कारण दर्शाये। इसमें कहा गया कि झारखंड पार्टी को उन्नीस सौ बावन के आम-चुनाव में छोटानागपुर एवं संथाल परगना में वोटो या सिटों का स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं हुआ था। इस क्षेत्र के भीतर एवं बाहर दूसरे राजनैतिक दलों ने अलग झारखंड राज्य के गठन का विरोध किया था। फिर कहा गया कि जनजातियों की कुल जनसंख्या इस क्षेत्र में या प्रस्तावित अलग राज्य में कुल जनसंख्या में मात्र एक तिहाई से कुछ ज्यादे है। इसके अलावे जनजातियाँ कई वर्गो में बँटी थी एवं अलग-अलग भाषाएँ थी। इस प्रकार कई उपजातियों में बँटी रहने एवं अलग अलग भाषाई आधार होने तथा झारखंड अलग राज्य का विचार अल्पमत में होने तथा बहुमत के इस विचार से सहमत नहीं होने के कारण पृथक झारखंड राज्य का बनाया जाना उचित प्रतीत नहीं हुआ। आयोग ने इन्हीं कारणों के चलते अनुशंसा नहीं की।
आयोग का कहना था कि यह आन्दोलन सिर्फ जनजातियों यानि आदिवासियो का आन्दोलन है। दूसरा कारण जो यह दर्शाया गया था कि इस क्षेत्र में एक सम्पर्क भाषा का अभाव है। तीसरा कारण यह बताया गया कि अगर झारखंड अलग राज्य के लिए झारखंड को बिहार या सम्बन्धित राज्यों से अलग कर दिया जाय तो शेष बिहार या सम्बन्धित राज्यों का माली हालत का संतुलन बिगड़ जाएगा। एक दृष्टिकोण से तीसरा कारण ही अधिक महत्वपुर्ण बनाया गया था, क्योंकि बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा एवं मध्यप्रदेश के सीमावर्ती एवं समीपवर्ती दलित क्षेत्रों को मिलाकर एवं इन राज्यों से पृथक करके नये राज्य के गठन से इन राज्यों के राजस्व और रोजगार के अवसरों पर अवश्य प्रभाव पड़ेगा।
जैसा कि हमने पहले ही देख लिया है कि भारत के संविधान में कहीं इस बात का जिक्र नहीं है कि नये राज्यों का गठन किन आधारों पर किया जाय। सिर्फ इतना ही कहा गया है, भारतीय संविधान में कि जैसा कि संसद उचित समझे, नये राज्य बनाया जा सकते है।
देश की आजादी के पहले से ही इस विषय पर विवेचना की जाती रही थी कि नये राज्यों के गठन का आधार क्या हो ? सिर्फ अंग्रेजी की तरह प्रशासनिक दृष्टीकोण से नये राज्य बनाए जायें या भाषा, संस्कृति क्षेत्र या अन्य आधार पर नये राज्यों का गठन किया जाय।
इस संबंध में क्रमिक विकास हुए एवं पहले “भाषाई आधार” पर कई राज्यों का गठन किया गया। फिर आजादी के बाद अंततः राज्य पुर्नगठन आयोग का गठन किया गया। ताकि ठोस आधार पर पहुँचा जा सके। एक तरफ तो इस आयोग ने “भाषाई समानता” यानि “लींगवीस्टीक होमोजीनीयलीटी” को एक हितपुर्न आधार माना है, जिसके विरूद्ध गहरा असंतोष पनपा था, तो दूसरी ओर आयोग जातीय भावनाओं को संतुष्ट करने में अक्षम रहा। फिर आयोग ने यह नहीं कहा कि सिर्फ आदिवासी बहुल क्षेत्र का दर्जा दिया जा सकता है कि नहीं। स्पट था छोटे राज्यों के गठन की वकालत प्रशासनिक दृष्टीकोण से ही नहीं किया जाना चाहिए।
एक और महत्वपुर्ण आपत्ति जो इस माँग के विरूद्ध उठाई जाती रही थी वह यह था कि झारखण्ड क्षेत्र में बहुत भिन्नता व्याप्त थी और उसे एक सामान्य झारखण्डी सामाजिक में या राष्ट्रीयता में बाँधने की आशा नहीं की जा सकती। दूसरे शब्दों में वहाँ पर संथाल, हो, मुंडा, उराँव, खड़िया, पहाड़िया, गौंड, कोरव, भूमिज आदि अनुसूचित जनजातियाँ हैं तथा खतौरी, कुड़मी, कोयरी, तेली, कुम्हार, राजवार आदि अनेक गैर-अनुसूचित जनजातियाँ भी हैं एवं अनेक मूलवासी समुदाय तथा सदान जनसंख्या एवं उत्तर प्रदेश, उड़ीसा आदि के बाहरी लोग हैं।
यहाँ पर इस बात पर विचार करना आवश्यक था कि झारखंड क्षेत्र को केन्द्र सरकार ने बिहार, बंगाल, उड़ीसा, मध्य प्रदेश राज्य की सीमाओं के अन्दर बाँट दिया था। एक ही संस्कृति के लोगों को चार राज्यों में विभाजित कर दिया गया था। पर इतने से ही सरकार रूक नहीं गई। राज्य सरकारों एवं केन्द्र सरकार ने इस क्षेत्र की तामाम अनुसूचित मे विभेद पैदा कर दिया। कुछ को अनुसूचित जाति बना डाला, तो कुछ को अनुसूचित जनजाति की सूची से हटा दिया। उन्हें गैर-आदिवासी घोषित कर दिया और आदिवासियों को अल्प संख्यक बना डाला। आयोग ने बड़ी आसानी से कह दिया कि यह सिर्फ आदिवासियों का आन्दोलन है और इसे बहुमत प्राप्त नहीं। आयोग ने इस बात को भी नजर अंदाज कर दिया कि झारखण्ड पार्टी के विधायकों में से दश विधायक गैर-आदिवासी थे।
फिर यह दिखला दिया गया कि एक सम्पर्क भाषा का अभाव झारखण्ड में था और यह एक महत्वपुर्ण पहलू नये राज्य बनाने के लिए था कि भाषाई समानता हो। आयोग ने इस बात को नजर अंदाज कर दिया कि भारतवर्ष में पूर्व में बने किसी भी राज्य में एक ही सम्पर्क भाषा नहीं था और न आज है। बिहार को ही हम उदापरण को तौर पर लें तो उस समय और अभी भी वहाँ मगही, भोजपूरी, मैथली, मेसी, अंजिका आदि बोलियाँ है। फिर दक्षिण बिहार झारखण्ड क्षेत्र जब बिहार में शामिल था, तो खारखण्ड के भाषाओं संस्कृति की विभिन्नता तो बिहार में भी मौजूद थी। तो फिर बिल्कुल ही भिन्नता वाले उस पर बिहार एवं दक्षिणी बिहार को एक सीमा के अन्दर रखने का क्या औचित्य था। फिर इसका उदाहरण नागालैंड भी है, जिसमें पाँच प्रमुख तथा अनेक छोटी अनुसूचित जनजातियाँ हैं और यहाँ पर तेईस भिन्न-भिन्न भाषाएँ बोली जाती हैं।
अतः भाषाई भिन्नता कोई अर्थ नहीं रखती थी। जब हिन्दी पूरे देश की राजभाषा हो सकती है, तो झारखण्ड की भी हो सकती थी। फिर जब संयुक्त बिहार में हिन्दी से काम-काज चलता ही था जिस बिहार में झारखण्ड समाहित था, तो फिर नये राज्य प्रस्तावित झारखण्ड के लिए क्या कठिनाई थी और एक अलग सम्पर्क भाषा की आवश्यकता क्यों महसूस की जाने लगी ? क्या झारखण्डी सभ्यता-संस्कृति एक अलग प्रकार की संस्कृति नहीं थी ? क्या झारखण्डी राष्ट्रीयता का आधार भाषाई समानता के आधार का व्यापक रूप नहीं था ?
जहाँ तक आर्थिक असंतुलन की बात है, तो आयोग ने इस बात को नजर अंदाज कर दिया कि पंजाब एवं हरियाणा में कोई खदान नहीं। देश के अनेकों प्रदेशों में खनिज पदार्थ नहीं, जंगल नहीं तो क्या वे राज्य पीछे चले गये है। पंजाब एवं हरियाणा कृषि के बल पर देश का एक नम्बर राज्य बन सकते है तो शेष बिहार क्यों नहीं। उत्तर बिहार की जमीन की उस्पादकता पंजाब एवं हरियाणा की जमीनों से ज्यादा है। यही सरकारी रिपोर्ट है। वही बात उड़ीसा, पश्चिम बंगाल पर भी लागू होती थी।
दी स्टेट रिऑरगेनाइजेशन कमीशन (राज्य पुर्नगठन आयोग) के द्वारा कुछ विचार व्यक्त किए गये थे एवं कुछ सुझाव सरकार को दिए गये थे तथा कुछ सिफारिशें की गई थी। ये इस प्रकार थी-
दक्षिण बिहार को अगल करने से मौजूदा राज्य की सम्पूर्ण आर्थिक नीति पर प्रभाव पड़ेगा। कृषि, उद्योग और शिक्षा का संतुलन डगमगा जायेगा और उत्तरी एवं दक्षिणी बिहार के इलाके गरीब हो जायेगें। तथा विकास के अवसर एवं संसाधन कम हो जायेगें। इसीलिए दक्षिणी बिहार में सिंचाई के लिए विस्तृत योजना कार्यान्वित की जाय एवं विजाराधीन व्यापक विकास योजनाओं को प्रभावी बनाया जाय।
अनुसूचित क्षेत्रों में सामान्य प्रशासन जल्दी लाये जाने की सिफारिश की गई ताकि आदिवासियों और अन्य जातियों के बीच का भेदभाव जिस कारण या जहाँ कि वे जनजातीय क्षेत्रों को आर्थिक एवं राजनैतिक उन्नति में बाधा पहुँचाते हैं, धीरे-धीरे समाप्त किया जा सके।
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