Thursday, September 23, 2010

अध्याय छः

झारखण्ड क्षेत्र में असमान विकास एवं झारखंडियों का विनाश –
राज्य पुर्नगठन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के सम्बन्ध में कोई कार्यवाही नहीं की गई। सोलह वर्षो बाद विकास बोर्ड का गठन हुआ। छोटानागपुर संथाल परगना विकास प्राधिकरण 1971 । कुछ अन्य सिफारिशों की अनदेखी कर दी गई। अनुसूचित क्षेत्रों को न सिर्फ उसी प्रकार रहने दिया गया, बल्कि उनका क्षेत्र भी बढ़ा दिया गया।
इस आयोग ने झारखंड वासियों के साथ न्याय नहीं किया था। झारखंड आन्दोलन को सिर्फ आदिवासियों का आन्दोलन कहकर इस पवित्र आन्दोलन के मुँह पर तमाचा मारा था। इस आयोग ने झारखंडियों के हक की बात नहीं करके उत्तर बिहारियों तथा उन लोगों के हित की बात की थी जो झारखंड क्षेत्र को पिछड़ा बनाकर रखना चाहते थे। यह कितनी बड़ी त्रासदी है कि अगर सही विचार किया जाता तो 1956 में ही यहाँ अलग प्रदेश का गठन हो गया रहता।
झारखंड में औद्योगिक मजदूरों की संख्या बढ़ी। अनुसूचि जनजाति की संख्या में साक्षरता बढ़ने लगी। इसका प्रमुख कारण मिशनरियों की शैक्षणिक गति विधियाँ है। अनुसूचित जनजाति की जनंख्या में 35% साक्षरों ने औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की थी। गैर-आदिवासी जमसंख्या में यह प्रतिशत 32.2 प्रतिशत थी। 1970 के आसपास साठ के दशक में शिक्षित युवकों के बीच बेरोजगारी की समस्या गंभीर हो गई थी। वैसे संथाल परगना के ग्रामिण क्षेत्रों में अभी भी काफी कम शैक्षणिक सुविधाएँ उपलब्ध है।
झारखंड के जिलों में उपलब्ध चिकित्सा सुविधा का औसत बिहार के औसत से कम होने लगा। झारखंड क्षेत्र की उपेक्षा के चलते ऐसा होने लगा।
जो बड़ी-बड़ी पन बिजली एवं कोयला-आधारित विद्युत परियोजनाएँ बनी, उनकी बिजली झारखंड क्षेत्र में कम, उपयोग की गइ एवं बाहर भेजी जानी लगी।
यहाँ के उद्योगिकरण के कारण बाहर से आये लोगों को बड़ी तादाद में नौकरियाँ मिली। ठीका, रोजगार सभी मिला। झारखंड के मूलवासियों की घोर उपेक्षा हुई।
आर्थिक रूप से इन उद्योगों, कल कारखानों, खदानों, परियोजनाओं का कोई लाभ झारखंडिवासियों को नहीं मिलने लगा, उल्टे उनका विनाश हुआ, एवं शोषण के शिकार हुए।
आर्थिक परिवर्त्तनों के अलावे जातीय समीकरण में भी बहुत बड़ा अंतर पैदा किया जाने लगा। झारखंड की, एकरूपता को इसकी सभ्यता एवं संस्कृति को तोड़ने के लिए शासक वर्ग ने अनेकों षड़यंत्र किए। अनेकों अनुसूचित जनजातियों को अनुसूचित जनजाति की सूचि से हटाया गया। इसमें प्रमुख जाति कुड़मी-महतो थी। फिर कोल एवं गौड़ को भी हटाया गया। इस क्षेत्र को क्रमशः आदिवासी अल्पसंख्यक बना दिया गया। यह इसिलिए किया गया ताकि आदिवासियों को यानि अनुसूचित जनजातियों को जमीन संबंधी जो सुरक्षा छोटानागपुर टेनेन्सी एक्ट एवं संथाल परगना टेनेन्सी एक्ट द्वारा प्रदान की गई थी, उनके दायरे से उन जातियों को अलग कर दिया जाय जिनके पास सार्वाधिक जमीनें थी। ऐसा इसीलिए कि सरकार को यहाँ औद्योगिकरण के लिए आसानी से जमीन उपलब्ध हो सके। सिर्फ कुड़मी-महतो समुदाय जो 1950 तक अनुसूचित जनजाति की सूचि में था, उस समुदाय की जनसंख्या झारखंड क्षेत्र में पच्चीस प्रतिशत थी । उनके हाथ में झारखंड की सार्वाधिक जमीनें थी। इनकी जमीनों पर कल-कारखानें खोले गये, बाँध-बाँधे गये। परियोजनाएँ लगाई गई। शहर बसाये गये। बाहर से आये हुए लोगों ने धड़ल्ले से इनकी जमीनें खरीदी।
इस प्रकार अनेक जातियों का योजनाबद्ध ढंग से शोषण किया गया। इन जनजातियों के अनुसूचित सूची से हटाने के कारण, ये जातियाँ सनातन धर्म की ओर मुखातिब होने लगीं।
हिन्दू धर्मावलम्बी लोग पीछे पड़ गये। इन जातियों को कभी शुद्र, कभी वैश्य एवं कभी क्षत्रिय बनाने की बात करने लगे। जनेऊ धारण कराने की बात करने लगे। उन्हें समझाया जाने लगा कि वे जनजाति नहीं है। दूसरी तरफ अन्य प्रमुख जनजातियाँ मुंड़ा, उराँव आदि ईशाई-धर्म की ओर मुखातिब होने लगे।
एक ही क्षेत्र में सदियों से रहने वाले प्रकृति पूजक आबादी जब देवताओं, भगवानों की पूजा करने लगी। लोग मंदिरों में जाने लगे, जेस्स काइस्ट के चेले हो गये, पादरी बनने लगे, नन-ब्रदर बनने लगे। गिरजाघरों को बनने का सिलशिला चालू हो गया। यहाँ के प्रकृति पूजक, एक सभ्यता-संस्कृति के लोग अलग-अलग कर दिए जाने लगे।
जो 1950 ईस्वी के बाद बचे-खूच अनुसूचित जनजाति के लोग थे उन्हें सुरक्षा प्रदान करने के लिए सेड्यूल एरिया रेगुलेशन लाया गया। इसका एक दुश्प्रभाव यह हुआ कि आदिवासियों एवं गैर-आदिवासि मूलवासियों खासकर उनमें जो पहले आदिवासी सूची में थे, बड़ा विभेद एवं विद्वेश पैदा होने लगा। उनमें अलगा की भावना बढ़ गई।
विभिन्न क्षेत्रों मे झारखंडियों का घोर शोषण एवं उपेक्षा की गई। नतीजा यह निकला कि धनी झारखंड क्षेत्र के वासी गरीब होते गये। कोई भी अखिल भारतीय स्तर की राजनैतिक पार्टी यहाँ की समस्याओं से रूबरू नहीं होना चीहती थी। उलटे यहाँ राजनैतिक उपनिवेश बनाया जाने लगा।
देश में पहले से ही उन्नत क्षेत्रों को अधिक सुविधाएँ दी गई है तथा जो अब अविकसित पहाड़ी क्षेत्र हैं, जनजाति क्षेत्र है, उन्हें विकास से दूर रखा गया। जिन्हें सबसे अधिक आवश्यकता थी देश की मूल-धारा से जुड़ने की, उन्हें पीछे धकेला गया।
झारखंड की तो पहचान ही मिट रही थी। इस क्षेत्र का चौतरफा शोषण हो रहा था। आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक शोषण। झारखंड क्षेत्र एक आंतरिक उपनिवेश बन चुका था।
यह तो सही है कि झारखंड क्षेत्र के लोग अनेकों सियासी चालों के शिकार हुए थे, पर झारखंड क्षेत्र के लोगों के हृदय में सुलगती रही गहरी निराशा की आग को कानूनी मिमांशा, राजनैतिक तर्क या कुतर्क या राजनैतिक कुटता से दबाया नहीं जा सकता था। केन्द्र सरकार एवं राज्य सरकार की उपेक्षापूर्ण नीति एवं इस क्षेत्र की समस्याओं को समाप्त करने के लिए किसी कारगार नीति का नहीं बनाया जाना, तथा उल्टे इस क्षेत्र के लोगों की सम्पत्ति को लूट कर उनका चौतरफा शोषण करने की प्रवृति ने आग में घी का काम किया। झारखंड क्षेत्र को सभी लोगों ने पिछड़ा बनाकर रखा था और अभी तक पिछड़ा है। ऐसा केवल इसलिए ताकि यह क्षेत्र एक आतंरिक उपनिवेश बना रहे ताकि बाहरी ताकत के लिए एक लाभदायक एवं शोषण के क्षेत्र के रूप में रह सके। बिहार-मूल के लोगों एवं देश के दूसरे प्रदेशों के लोगों का लालच एवं निहित स्वार्थ हरेक प्रकार से इस क्षेत्र के विकास में बाधक है। कॉलोनीवाद के सभी तरीके इस क्षेत्र की जनता के ऊपर आजमाए गए जो उनकी शक्ति एवं मनोबल के आधारों को भी क्षति पहुँचा रहे हैं।
राजनैतिक सत्ता या प्रतिनिधित्व का चेहरा बदलने लगा था। 1960 के दशक में झारखंड में झारखंडी नामधारी दलों के कमजोर हो जाने के बाद यह परिवर्त्तन बड़ी तेजी से होने लगा था। 1962 में चीन द्वारा किए गये भारत पर आक्रमण के कारण एक राष्ट्रीय आपदा आई। इस राष्ट्रीय आपदा ने भारत के विभिन्न हिस्सों को एक साथ एक दिशा में सोचने पर मजबूर किया। इस घटना ने राष्ट्र के विभिन्न भागों को इस तरह से एक सूत्र में पिरोया कि पृथक तामिलनाडू राज्य बनाने की तत्कालीन माँग को लम्बित करना पड़ा। नागालैंड और मिजोरम को स्वतंत्र राज्य बनाने की पूर्वोत्तर क्षेत्र की माँग भी आम क्षेत्र के लोकतांत्रिक संस्थाओं के अनवरत प्रयास के फलस्वरूप दब कर रह गई। “दार्जलिंग गौरखालैंड पर्वतीय परिषद्” गठित करने के फलस्वरूप गौरखालैंड की माँग दब कर रह गई।
बोड़ोलैंड, नागालैंड, खालिस्तान आदि के माँग की तरह झारखंड के आन्दोलन को राष्ट्रीय एकता में बाधक समझा गया था और इसे अलगादवादी आन्दोलन करार दिया गया था। 1962 के भारत पर चीन के हमले एवं 1965 में भारत पाकिस्तानी हमलें यानि युद्ध की वजह से यह आन्दोलन सुस्त पड़ गया।
छोटानागपुर तथा संथाल परगना में विकास सम्बन्धी कार्यक्रमों का प्रभाव बढ़ता जा रहा था। इस विकास सम्बन्धी प्रक्रिया में अखिल भारतीय दल – काँग्रेस, जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी, भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी शोसलिस्ट पार्टी आदि सक्रिय हुए और इन्होनें झारखंड में अपनी स्थिति मजबूत की। 1967 के चुनाव में जनसंघ ने भी कुछ सीट इस क्षेत्र से जीते थे। मध्य-प्रदेश एवं उड़ीसा में आदिविसियों के हितो की रक्षा के लिए कुछ प्रतिनिधित्व दिया गया था। इससे यह धारणा बनने लगी कि आदिवासी हितों की रक्षा करने के लिए उन्हें सरकार में प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए तथा यह काँग्रेस के विचारों के साथ चलकर ही किया जा सकता था संभवत इसी कारण श्री जवाहरलाल नेहरू के कहने पर श्री जयपाल सिंह ने आन्दोलन का रास्ता छोड़ मंत्रीपद की कुर्सी संभाली।
साठ के दशक में कई रोचक पहलू देखने को आए। इस क्षेत्र की राजनीति में विशिष्ट परिवर्त्तन आया। नक्सलवादी आन्दोलन के प्रभाव यहाँ पड़ने लगे। भारी संख्या में यहाँ वामपंथी दलों का आगमन शुरू हुआ। राज्य पुर्नगठन आयोग की रिपोर्ट के बाद तथा झारखंड राज्य की माँग को काँग्रेस की सरकार द्वारा ठुकरा दिए जाने के बाद, वामपंथी दलों को घूसने का भारी मौका मिला। उत्तरी छोटानागपुर संथाल परगना, सिंहभूम आदि सभी जगहों पर वाम पंथी सक्रिय हुए। जहाँ-जहाँ औद्योगिक प्रतिष्ठान, कल कारखाने, खदानों खुलने लगी एवं मजदूरों-विस्थापितों की संख्या बढ़ी, उनका काफी प्रभाव बढ़ा।

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