Thursday, September 9, 2010

राज्य पुर्नगठन आयोग की रिपोर्ट एवं झारखंड आन्दोलन के प्रभाव –

आयोग ने यह भी विचार व्यक्त किया कि संविधान में प्रदत्त पाँचवीं सूची में किए गये मौजूदा प्रबन्ध उचित एवं संतोषप्रद हैं।
इसके अलावे आयोग ने यह विचार व्यक्त किए कि जैसा कि संविधान सभा की उपसमिति ने सिफारिश की है, जनजातीय लोगों को मंत्रीमंडल समेत प्रशासन की सभी शाखाओं में पर्याप्त रूप से भागीदारी होनी चाहिए और न केवल आर्थिक तथा शैक्षिक उन्नति पर ही बल्कि निवारात्मक राजनीतिक व मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर भी विचार किया जाना चाहिए।
इसके अलावे आयोग ने यह भी सुझाव दिए कि छोटानागपुर डीविजन के लिए विशेष विकास बोर्डो के प्रश्न पर भी विचार किया जाना चाहिए।
संक्षेप में कहे तो हम पाते हैं कि राज्य पुर्नगठन आयोग ने जनजातीय भावना के दृष्टीकोण से छोटानागपुर एवं संथाल परगना को स्वायत्तता प्रदान करने के प्रश्न पर विचार किया। उसने इस तथ्य को अनदेखा कर दिया कि छोटानागपुर एवं संथाल परगना क्षेत्रों की स्वायत्ता का समर्थन दो स्थानीय पार्टियाँ जनता पार्टी तथा लोक-सेवा संघ ने किया था जो कि मुख्यतयाः गैर-जनजातीय थी। झारखंड पार्टी तथा काँग्रेस के कुछ तत्वों समेत इन पार्टियों ने जिन्होंने थोड़ी सी स्वायत्तता का समर्थन किया था, इसके लिए क्षेत्र का बहुमत प्रकट किया। अलग राज्य की माँग से अलग हटकर संविधान की पाँचवी अनुसूची का प्रयोग करके विकास की बात करके स्वायत्तता प्रदान करने की बात कही है। इसके विरूद्ध स्वर्गीय राम नारायण सिंह सांसद अध्यक्ष छोटानागपुर संयुक्त संघ ने राज्य पुर्नगठन आयोग द्वारा किए गये तर्को का जोरदार खंड़न किया, जो आज इतने वर्षो बाद भी सही निकला। जब झारखंड मामलों से संबंधित समिति ने मई 1990 में अपनी रिपोर्ट दी तो राज्य पुर्नगठन आयोग की दी गई रिपोर्ट को गलत ठहराया।
झारखंड आन्दोलन ने कई उतार-चढ़ाव देखे है। झारखंड पार्टी ने उन्नीस सौ बावन – उन्नीस सौ सन्तावन में भारी सफलता हासिल किया। पर उन्नीस सौ बासठ के आम चुनाव में झारखंड के पक्ष में पड़े मतों में भारी गिरावट आई एवं यह संख्या घटकर आधी रह गई। बिहार विधान सभा में इसके नतीजे अच्छे नहीं हुए और सीटों की कुल संख्या घटकर बीस रह गई। इसका कारण निश्चित रूप से राज्य पुर्नगठन आयोग की प्रतिकुल रिपोर्ट है जिसने अलग राज्य की अनुशंसा नहीं की। इससे इस क्षेत्र के लोगों के दिलों पर यह बात घर कर गई कि झारखंड अलग राज्य का निर्माण नहीं हो सकता। इसीलिए मतदाताओं ने निराश होकर सोचा कि अब झारखंड नामधारी दलों को वोट देने से कोई लाभ नहीं होगा। निराश का संचार हुआ। स्वाभाविक था कि उनका झुकाव अखिल भारतीय पार्टियों की तरफ हुआ। क्षेत्रीय झारखंड नामधारी दल के नेताओं में गहरी निराशा बैठ गई। जब तक काँग्रेस नहीं चाहेगी, अलग राज्य नहीं बन सकता।
अतः श्री जयपाल सिंह ने काँग्रेस पार्टी के साथ समझौता कर लेना ही बेहतर समझा। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के समझाने पर श्री जयपाल सिंह उन्नीस सौ तिरसठ में काँग्रेस में शामिल हो गये। अधिकांश झारखंड पार्टी के नेता भी काँग्रेस में शामिल हो गये। झारखंड अलग राज्य की माँग को जबरजस्त झटका लगा।
श्री जयपाल सिंह को काँग्रेस ने बिहार में केबिनेट मंत्री, तत्कालीन मुख्यमंत्री विनोदानन्द झा के नेतृत्व में बना दिया। भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के ईशारे पर यह किया गया। श्री एस0 के0 बागे जो जयपाल सिंह के प्रमुख कप्तान थे, इगनियस कूजूर दूसरे नम्बर के प्रमुख नेता थे, पाँच विधायकों के साथ “झारखंड पार्टी” से अलग हो गये थे। परन्तु कुछ ही समय बाद कामराज प्लान के तहत तत्कालीन मुख्यमंत्री बिहार को स्तीफा देना पड़ा एवं उनके प्रतिद्वन्दी के0 बी0 सहाय मुख्यमंत्री बने। एस0 के0 बागे, के0 बी0 सहाय के साथ हो गये और केबिनेट मंत्री बन गये। जयपाल सिंह की कुर्सी छिन गई।
एक बार फिर जयपाल सिंह ने काँग्रेस छोड़कर झारखंड पार्टी को पुर्नजीवित करने का प्रयास किया। पर उन्नीस सौ सढ़सठ के चुनाव (1967) में इसे एक भी सीट नहीं मिली। संसद में भी कोई नहीं जा सका। जस्टिन रिचर्ड एवं एस0 हेम्ब्रम ने झारखंड पार्टी को एक और टुकड़ा किया। इन्होने “हूल झारखंड” पार्टी बनाया। इन्होने 1969 के मध्यावधि चुनाव में सात विधान सभा की सीटें जीती।
कुछ लोगों ने श्री जयपाल सिंह पर आरोप लगाया कि उनका काँग्रेस में शामिल होने का निर्णय निजी स्वार्थ से प्रेरित था तथा अपनी सुख सुविधाओं के लिए उन्होंने काँग्रेस का दामन थामा। पर एक बात गौर करने की बात है कि राज्य पुर्नगठन आयोग के विपरीत अनुशंसा करने से उनको भी धक्का लगा ही होगा। चाहे जो भी हो इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि जयपाल सिंह ने इस क्षेत्र के लोगों को जगाकर खासकर आदिवासी समुदाय को उनके हक एवं अधिकार के लिए तैयार किया था। लड़ा था। लोगों में चेतना जगाई थी। “माराँग गोमके” कहलाने का श्रेय प्राप्त किया था। परन्तु दुर्भाग्य यह रहा कि माराँग गोमके की कमजोरी का फायदा उठाकर काँग्रेस ने उन्हें तथा झारखंड आन्दोलन को ही काफी अरसे तक सुला दिया।
झारखंड आन्दोलन एक टूटे हुए शीशे की तरह बिखर गया। इसके कई नेता हो गये। श्री एन0 ई0 होरो, श्री बागुन सोमबुराई, सेत हेम्ब्रम, मोजेश गुड़िया (बिरसा सेवा दल) आदि। 1963-68 तक तीन दलों ने झारखंड आन्दोलन का नेतृत्व करने का दावा किया। 28 दिसम्बर 1967 को अखिल भारतीय झारखंड पार्टी गठित की गई। 1968 में पुनः पुरानी झारखंड पार्टी में भारी फूट पड़ गई। छोटानागपुर के आदिवासियों से अलग होकर संथाल परगना के संथालों ने अपने आप को अलग कर लिया। और एक अलग पार्टी हूल झारखंड बना लिया। इस चरण का एक और पहलू हुआ शिक्षित आदिवासियों के नेतृत्व वाले नपरीय प्रभाव वाले दलों का उभरना। ये विकसित हुए जो कि आदिवासी युवकों को प्रशासनिक एवं औद्योगिक संस्थानों में रोजगार प्रदान किए जाने की माँग करने के लिए, जो औद्योगिक परिसरों मे केन्द्रित थे। वास्तव में यह माँग एक आम माँग बन गई। बिरसा सेवादल श्री मोजेश गुड़िया के नेतृत्व में छठे दशक के अंतिम वर्षो (1967) में एक महत्वपुर्ण दल के रूप में उभरा। झारखंड पार्टी श्री एन0 ई0 होरो के नेतृत्व में चलने लगी।
कहने का तात्पर्य यह है कि झारखंड अलग राज्य की माँग एक सुविधावादी माँग में बदल गई। नेतागण या तो मंत्रीपद लेने में, विधायक या सांसद बनने में, रोजगार लेने में, ठीका लेने में, आदिवासियों के लिए सरकार में प्रतिनिधित्व लेने में या फिर आरक्षण लेने में व्यस्त हो गये। अलग राज्य का मुद्दा संविधान की पाँचवी तथा छठवीं अनुसूची के प्रावधानों के बीच दबकर रह गई। देखा यह गया कि जब जब किसी नेता या दल ने आन्दोलन पर बल दिया, उसे तेज किया तब तब झारखंड क्षेत्र में कोई बोर्ड या परिषद् या इसी प्रकार की कोई चीज गठित कर दी गई ताकि आन्दोलन के नेताओं को आत्मतुष्टि के साथ-साथ रोजी-रोटी या आराम की जिन्दगी मयस्सर हो सके।
कई नियम, अधिनियम परिषद् बनाए गये। 1951 में बिहार जनजातीय सलाहकार परिषद् बनाया गया था। छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 में ही बनाया गया था। संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम 1969 में बनाया गया। ये अधिनियम आदिवासियों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए बनाए गये थे। छोटानागपुर संथाल परगना के लिए, इसके विकास के मद्देनजर छोटानागपुर-संथाल परगना स्वायत्त विकास प्राधिकरण 1971 बनाया गया। इसके बाद 1974 में जनजातीय उपयोजना बनाई गई। 1978 में झारखंड विकास परिषद् बनाया गया। इसे 1991 में विधान सभा से पारित कराया गया।

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