वास्तव में झारखंड अलग राज्य का आन्दोलन झारखंड के शोषित-पीड़ित, दबे-कुचले, वंचित जाति-समूहों के आत्म-निर्णय का आन्दोलन था, उनकी पहचान का आन्दोलन था, अतः उनकी मुक्ति का आन्दोलन था। उन्हें मार्क्स एवं लेनिन की उक्तियाँ याद आई। लेनिन ने भी तो कहा था कि शोषित-दलित राष्ट्रीयताओं को उनके स्वालंब का अधिकार मिलना चाहिए और वाम पंथियों का यह पहला कर्त्तव्य बनता है कि उन्हें यह अधिकार दिलाएँ।
उन्होने महसूस किया कि झारखंड आन्दोलन अब तक अनुसूचित जनजातियों के नेतृत्व में ही चलाया गया है और गैर अनुसूचित जातियों एव मजदूर वर्ग में लोक प्रिय नहीं हो पाया था। एक जुझारू संगठन बना कर उन्हें एक करने की आवश्यकता थी और एक वर्ग-संघर्ष की अवधारणा के साथ आगे बढ़ना होगा। झारखंड के सोये हुए लोगों को जागरूक करना पड़ेगा, उनके मन की निराशा को दूर करना पड़ेगा। ऐसा उन्होनें सोचा।
भारतवर्ष में वर्ग-संघर्ष की अवधारणा एवं वर्ण-संघर्ष की अवधारणा में कोई खास अंतर नहीं है। यह एक तथ्य है कि उन्नीस सौ साठ के दशक तक लोग इस बात को समझ चुके थे कि भारतवर्ष में उच्च-वर्ण ही उच्च वर्ग भी है। इन चंद लोगों के हाथ में सत्ता, सम्पत्ति केन्द्रित है। अतः निम्न वर्ग में पहले चेतना जगाना जरूरी था।
इसके लिए उन्होने सबसे पहले अपने ही समुदाय कुड़मी यानि कुरमी-महतो समुदाय के लोगों को एक सूत्र में बाँधने का सफल प्रयास किया। इसके लिए 1967 में “शिवाजी-समाज” का गठन किया। यह कोई राजनैतिक संगठन नहीं था। यह एक सामाजिक संगठन था। एक सुधारवादी संगठन जो कुड़मी समाज के सुधार के लिए बनाया गया था। इसके उद्देश्य, बाल-विवाह, बहू-विवाह, झारखंड में घूसती दहेज-प्रथा, शराब खोरी इत्यादि के विरूद्ध था। इस संगठन का उद्देश्य इस समुदाय को शोषण से मुक्ति दिलाना भी था और इससे बचाना भी।
बिहार-सरकार में इस जाति को पिछड़ी (अत्यन्त) के दर्जे में शामिल किया गया था। यद्यपि इनके पास खेती लायक जमीन थी, पर शिक्षा का नितांत अभाव था। इस अज्ञानता के चलते दूसरे होशियार लोग इनकी जमीनों की लूट-मार मचाये हुए थे। सरकारी अधिग्रहण में कल-कारखानों में, खदानों में, योजनाओं-परियोजनाओं में, बाँधों में कुड़मी-समुदाय के लोगों की सर्वाधिक भूमि अधिग्रहीत की गई। इसके अलावे खरीद-बिक्री भी खूब हुई। तीसरा उद्देश्य था समाजिक प्रतिष्ठा की खोज। उच्चवर्ण के लोग ही नहीं दूसरे भी इस समुदाय को “ढ़ोड़-कुड़मी” कहते थे। इसे हेय समझते थे। बेवकूफ एवं मूर्ख समझते थे जिन्हें आसानी से बहलाया-फुसलाया जा सकता है। शिवाजी समाज के माध्यम से बिनोद बिहारी महतो ने सामाजिक न्याय की लड़ाई को आगे बढ़ाया।
पर इस समाज के कार्यो के रास्ते में बहुत विघ्न-बाधाएँ आई। समाज के प्रतिष्ठित लोग ही इसका विरोध करने लगे। बड़ी मुश्किल से कुरीतियों को रोका जाने लगा। धीरे-धीरे अपनी जाति के लोग इसके समर्थक बने। शोषण से मुक्त होने की प्रक्रिया में इस-समुदाय ने, समाज के कार्यकर्त्ताओं ने जमीन-वापसी का आन्दोलन चलाया। सूदखोर-महाजनो के खिलाफ लोग उठ खड़े हुए तथा विस्थापन के विरूद्ध इस समाज द्वारा जोरदार आन्दोलन किए जाने लगे। शिवाजी समाज के कार्यकर्त्ता शराब-खोरी के विरूद्ध, शराब भट्टीयों को उजाड़ने लगे, तोड़-फोड़ किए गये। सामाजिक रूप से दोशी पाये जानेवाले व्यक्तियों के विरूद्ध कार्यवाही की जाती थी तथा सामाजिक दंड दिया जाता था। इसमें सामाजिक रूप से सार्वजनिक स्थल, गाँव के अन्दर उन्हें शारीरिक दंड, लाठी का प्रहार या कभी-कभी सिर मुंड़ाकर घूमना भी शामिल था। कुछ दिनों के लिए कभी-कभी हुक्का-पानी भी बंद कर दिया जाता था।
इस शिवाजी समाज का अनुकरण समाज के दूसरे-समुदाय के लोग भी करने लगे। संथाल जाति के लोगों ने बिनोद बिहारी महतो की प्रेरणा से “सोनोत् संथाल समाज” नामक संगठन खड़ा किया। शिबू-सोरेन उस समय नौजवान हुआ करते थे। अपने पिता की मृत्यु के बाद वे घर से भागकर यहाँ-वहाँ भटक रहे थे। उन दिनों शिवाजी समाज धनबाद, बोकारो, गिरीडिह, हजारीबाग एवं पश्चिम बंगाल के पुरूलिया जिला तक फैल चुका था। शिबू सोरेन बिनोद बाबू के सम्पर्क में 1971 में आए। उन्होने शिबू सोरेन के “सोनोत् संथाल समाज” का नेतृत्व संभालने के लिए आगे बढ़ाया। फिर यह संगठन भी उसी प्रकार सक्रिय हो उठा जिस प्रकार शिवाजी समाज सक्रिय था। खासकर शराब खोरी के खिलाफ आन्दोलन छेड़ा गया। फिर आदिवासी महिलाओं के विरूद्ध होने वाले शोषण, जुल्म तथा बलात्कार आदि के खिलाफ यह संगठन बखूबी काम करने लगा। इस आन्दोलन के चलते शिबू सोरेन एक सशक्त आदिवासी नेता के रूप में उभरकर सामने आए। शिबू सोरेन को बिनोद बाबू ने आर्थिक सहायता के साथ-साथ नैतिक समर्थन एवं संरक्षण दिया। शिबू सोरेन का नाम वास्तव में “शिवलाल माँझी” था और बाद में शिबू सोरेन बने। बिनोद बाबू के आवास में ही उनका डेरा-डंडा था।
इधर बिनोद बिहारी महतो ने देखा कि झारखंड क्षेत्र की जनता लाल झंड़े को स्वीकार करने में कठिनाई महसूस कर रही थी। मार्क्सवाद, लेलिनवाद की पेचीदगी को समझना झारखंड़ी जनता के वश में नहीं था। इनकी पेचिदा थ्योरी अनपढ़ भोले-भाले झारखंड़ियों, संथाल, महतो आदि समुदायों के लिए समझ पाना टेढ़ी खीर थी। लोग अन्याय के खिलाफ लड़ना तो चाहते थे, पर उनमें लाल झंड़ा स्वत-स्फूर्त जजबात पैदा नहीं कर पा रहा था।
शिवाजी समाज बनाने का उद्देश्य स्पष्ट था। कुछ लोग भ्रांति पैदा करने का काम भी करने लगे। कहने लगे थे कि बिनोद बाबू कुड़मी-महतो को क्षत्रिय बनाना चाहते हैं या फिर अपना मूल शिवाजी को मान रहे हैं यह बात लोगों को शायद पता नहीं कि झारखंड़ में जो व्यापक रूप से सरकारी शोषण एवं अन्य शोषक आतंक फेलाए हुए थे, उसका जवाब किस प्रकार दिया जाय। इतने बड़े अन्याय का मुकाबला उसी हालात में किया जा सकता था, जबकि यहाँ की बहुसंख्यक जाति कुड़मी-महतो को लड़ाकू बनाया जाता। उनके दिल से डर एवं आतंक को हटाया जाय। यह तभी संभव था जब उन्हें सीधी लड़ाई में उतारा जाय। शिवाजी दुनियाँ के मशहूर गुरिल्ला युद्ध के प्रणेता थे। अपने कम संख्या के सिपाहियों से औरंगजेब की बड़ी सेना का मुकाबला उन्होंने छापा-मार युद्ध की तकनीक विकसित करके ही किया था। इससे प्रेरित होकर ही अपने समाज का नाम शिवाजी समाज रखा। यह एक संयोग ही था कि शिवाजी भी कुनबी जाति के थे, जिस जाति को उस समय अछूत समझा जाता था। कोंकण इलाके का पहाड़ी जीवन, झारखंड़ क्षेत्र के पहाड़ी जीवन से काफी मिलता जुलता भी है। धनबाद, गिरीडिह, बोकारो, हजारीबाग ही नहीं बल्कि पश्चिम बंगाल आदि जगहों में यह समाज काफी सक्रिय हो उठा था। 1973 में बिनोद बिहारी महतो को सबसे चर्चित व्यक्ति माना जाने लगा था।
उन्हें आतंकवादी नेता कहा जाने लगा था। धन-कटवा नेता भी कहा जाता रहा था। शिवाजी समाज के बैनर में ज्यादे सशक्त लड़ाई शुरू हो गई थी। बीस-पच्चीस वर्षो में लाल झंड़े के माध्यम से बिनोद बाबू जो काम करने में अक्षम रहे थे, मात्र तीन-चार वर्षो के शिवाजी समाज के आन्दोलन ने कर दिखाया था। इसी प्रकार “सोनेत् संताल समाज” ने भी क्रांतिकारी काम मात्र दो-तीन वर्षो में कर डाला। इन दो संगठनों का व्यापक प्रभाव संथाल परगना एवं छोटानागपुर उत्तरी में पड़ा।
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment