Tuesday, October 26, 2010

झारखण्ड मुक्ति मोर्चा का जन्म, उसकी पृष्ठभूमि एवं विचार-धारा

झारखंड में हो रहे चौतरफा शोषण से बचने के लिए बिनोद बाबू को यह महसूस हुआ कि हमारी पहचान मिट रही थी। इसीलिए सबसे पहले अपनी पहचान बचाने का सवाल आ खड़ा हुआ था। पर यह पहचान बनेगी कैसे, इसके लिए इसकी दलित, शोषित राष्ट्रीयता को पहचान दिलाना जरूरी था। ऐसा तभी हो सकता था, जब झारखंड क्षेत्र को अलग राज्य का दर्जा मिले। एक शोषण मुक्त झारखंड की परिकल्पना के रास्ते में अलग राज्य का बनना पहला एवं बड़ा कदम होगा। फिर यहाँ से दूसरे चरण में शोषण का सफाया किया जाय। ऐसी बिनोद बाबू की अवधारणा बनी। तब इसे आर्थिक सामाजिक, प्रगति के रास्ते पर ले चलना होगा।
उपरोक्त अवधारणा एक क्रांतिकारी अवधारणा थी। एक ऐसा चिंतन था जिसे सरजमीन पर उतारना कठिन काम था। क्रांतिकारी परिवर्त्तन के लिए क्रांतिकारी परिस्थिति का होना जरूरी है। बिनोद बाबू ने पाया कि झारखंड क्षेत्र में क्रांतिकारी परिस्थिति पैदा हो चुकी थी। यहाँ के लोगों एवं मजदूरों का शोषण इतना तेज था कि कभी भी विस्फोट हो सकता था। पर इस विस्फोट के लिए लोगों को संगठित करना जरूरी था एवं सही दिशा देने की आवश्यकता थी जिसे बिनोद बाबू करना चाहते थे। यानि क्रांतिकारी परिवर्त्तन के लिए क्रातिकारी दल का गठन करना चाहते थे। यह क्रांतिकारी दल निश्चित तोर पर वैसे ही लोगों के द्वारा गठित किया जाना चाहिए, जो वास्तव में समाज में परिवर्त्तन चाहते है तथा जो क्रांतिकारी परिवर्त्तन लाना जरूरी समझते है यानि जिसे वास्तव में इस परिवर्त्तन की आवश्यकता है। सिर्फ क्रांति की बातें करने वाले शौकिया लोगों से क्रांतिकारी दल का गठन नहीं हो सकता। यानि शोषित, दलित, पिछड़े-अनुसूचित जनजाति, हरिजन, गरीब, प्रताड़ित लोगों के द्वारा ही ऐसा दल गठित होना चाहिए, जिन्हें वास्तव में अपने लिए ऊपर उठना है, जिन्हें सामाजिक न्याय पाना है। वैसे नेताओं एवं लोगों द्वारा समाज में परिवर्त्तन नहीं आ सकता जो सिर्फ सत्ता तक पहुचने के लिए झूठ, दिखावा, तिकड़म का सहारा लेकर आगे बढ़ते है। अतः उस परिस्थिति में झारखंड क्षेत्र के महतो, माँझी, मुंडा, बाऊरी, डोम, चमार, रजवार, रवानी आदि दलित जातियों में से ही संगठन बनाने के लिए बिनोद बाबू आगे बढ़े।
वैचारिक शक्ति रखने वाले बिनोद बिहारी महतो ने पाया कि प्रजातंत्र यानि डेमोक्रेसी भारतवर्ष में स्थापित होने के पहले ही दम तोड़ रहा था। कोर्ट-कचहरी तक में गरीब को न्याय मिलना असंभव था। कोर्ट-कचहरियाँ बड़े लोगों की इच्छा के अनुरूप फेसला सुना रही थी। थाना-पुलिस प्रशासन निरकुंश हो चुका था। इस परिस्थिति में जब आदिवासी एवं गैर-आदिवासी दोनों वर्ग पीस रहे थे, तो इन दोनों नेताओं ने अपने जातीय संगठन के माध्यम से अपने लोगों को जगाना शुरू किया, सचेत करना शुरू किया। दोनों जातियों के झगड़ो का फेसला समाज में पंचायत बुलाकर किया जाने लगा। दोनों समाजों का अपना-अपना कायदा-कानून बहुत पहले से बना था। इन परम्पराओं में, कस्टम में, बाइसी था कुड़मी-महतो का सर्वोच्य संगठन। महतो परगनैत, प्रमुख, परगनैत होते थे। संथालों में भी माँझी मानकी कस्टम था। समाज को चलाने के लिए अपने वसूल थे। ये कायदे सदियों से चले आ रहे थे। थाना-पुलिस या कोर्ट जो ब्रिटिश-शासन ने इस क्षेत्र में स्थापित किए थे, वहाँ जाकर न्याय पाने के लिए लोग इच्छुक नहीं थे। कालान्तर में महतो-माँझी एवं अन्य जनजातिय समुहों की पंचायत व्यवस्था क्षीण होने लगी और वर्त्तमान ब्रिटिश व्यवस्था हाबी हो गया। इन दोनों नेताओं ने फिर अपने लोगों को पुरानी पंचायत, पहड़ा परगनैत व्यवस्था की तरफ मौड़ा।
कोयलाचंल में इन दो संगठनों से प्रेरणा लेकर “मंडल-समाज” एवं “तेली-समाज” आदि संगठन पिछड़ी जातियों के लोगों के द्वारा बनाये गये।
जैसा कि हमने पहले ही देख लिया है कि 1970 तक आते-आते कोलियरियों के विस्तार के साथ-साथ कोयलाचंल में अनेक बड़े-बड़े उद्योग लगे, परियोजनाएँ बनी तथा इनके अनुसंगिक उद्योग, कल कारखाने लगाए गये। इससे मजदूरों की संख्या में भारी वृद्धि हुई। यहाँ स्थानीय ग्रामीण मजदूरों से बहुत ज्यादे बाहर प्रदेशों, उत्तरी बिहार से मजदूरो का आवागमन हुआ एवं यहाँ बसने लगे। मजदूरों के बीच मजदूर ट्रेड यूनियनों का जन्म धड़ल्ले से होने लगा। 1972 तक कोल कम्पनियों के राष्ट्रीयकरण के पहले बाहरी बिदेशी कोल कम्पनियाँ हुआ करती थी। इनमें बंगाल कोल कम्पनी, बर्ड्स कोल कम्पनी, मैकलीन बैरी आदि प्रमुख थी। इनके अलावा भारतीय कोल कम्पनियाँ टाटा कम्पनी, के0 वोरा, चनचनी ग्रुप, अर्जुन अग्रवाल ग्रुप आदि थी। इसके अलावे झारखंड क्षेत्र के दूसरे हिस्सों में औद्योगिकरण जोरों पर था।
यहाँ के ज्यादातर मजदूर काँग्रेस द्वारा संचालित इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन काँग्रेस के सदस्य होते थे कोलियरियों, उद्योगों आदि प्रतिष्ठान सिर्फ इस ट्रेड यूनियन की बातें सुनते थे। इसका नतीजा यह हुआ कि ट्रेड यूनियन के नेतागण निरंकुश हो उठे अवं मजदूरों के हित की बात नहीं करके प्रबन्धन के दलाल बन गये। माफिया-नेताओं का जन्म हुआ। इन्होने न सिर्फ मजदूरों के ऊपर सूदखोरी किया, बल्कि शराब की लत डाली। ये राजनीति में, सक्रिय हो उठे और इस कोयलाचंल का प्रतिनिधित्व विधान-सभा एवं संसद में करने लगें।
पर इसी समय इस कोयलाचंल के सिन्दरी खाद कारखाने में काम करने वाले श्री अरूण कुमार राय यानि श्री ए0 के0 राय एक नौजवान ट्रेड यूनियन के नेता के रूप में उभरे। श्री राय सिन्दरी कारखाने में एक शोधकर्त्ता वैज्ञानिक थे। सिन्दरी कारखाने एवं अन्य कारखाने के मजदूर सम्बन्धी समस्याओं से ये जूड़े रहते थे तथा प्रबंधन विरोधी रवैये के कारण एवं मजदूरों के हक में आवाज उठाने के चलते उन्हें नौकरी से हाथ धोना पड़ा।
इन्होने बिनोद बिहारी महतो जिन्हें प्यार से लोग “बाबू” कहा करते थे, का नाम सुन रखा था। उस समय बिनोद बाबू भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी में थे। ए0 के0 राय ने बिनोद बिहारी महतो से सम्पर्क साधा। नौकरी छूट जाने के बाद ए0 के0 राय बिनोद बाबू के संरक्षण में सिन्दरी में टिक गये एवं राजनैतिक गतिविधियों में सक्रिय हो उठे। ये श्री राय के अभिभावक की तरह थे। ए0 के0 राय की माता जी पश्चिम बंगाल से अक्कसर बिनोद बाबू को पत्र लिखा करती थी कि वे उनके बेटे का ख्याल रखें। बिनोद बाबू उन्हे बहुत चाहने लगे थे। उन्हे बिनोद बाबू ने कई मामलों में, मुकदमें में छुड़वाया तथा जेल में सड़ने से बचाया। यहाँ तक की बिनोद बाबू ने सिन्दरी विधान सभा सीट जो उनकी गृह-सीट थी, श्री राय के लिए छोड़ दी और 1967 में उन्हें प्रथम बार विधायक बना डाला। अपनी तैयार की हुई सीट पर उन्हें स्थापित कर दिया। स्वयं टुंडी विधान सभा की तरफ चल दिए।
श्री राय झारखंड क्षेत्र के मूल निवासी नहीं थे। बंगाल के किसी स्थान के रहने वाले श्री राय को बिनोद बाबू के संरक्षण में बहुत बड़ी उपलब्धि मिली। श्री राय ने “बिहार कोलयरी कामगार यूनियन” नामक ट्रेड यूनियन का गठन किया। श्री राय की पृष्ठभूमि वामपंथी थी। बिनोद बिहारी महतो ने 1967 में जब भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी का विभाजन हुआ, कम्युनिष्ट पार्टी (मार्क्सवादी) का दामन थामा।
बिनोद बिहारी महतो ने अपने विचारों को अमली जामा पहनाने के लिए एक नई पार्टी के गठन की बात सोची। और उन्होने शिबू सोरेन ए0 के0 राय आदि सभी कार्यकर्त्ता, नेताओं को बुलाया और बैठक की। आदिवासियों की लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें शिबू सोरेन यानि उस समय के शिवलाल माँझी उन्हें उपर्युक्त लगे। तथा मजदूर आन्दोलन को झारखंड आन्दोलन के साथ जोड़ने के लिए उन्हें ए0 के0 राय उपर्युक्त लगे।
राजनैतिक दल के नामाकरण के विषय में विचार विमर्श किया जाने लगा। बिनोद बाबू तथा शिबू सोरेन चाहते थे कि नाम में “झारखंड” शब्द अवश्य रहे। झारखंड पृथक राज्य के लिए संघर्ष करना इस राजनैतिक पार्टी का उद्देश्य होगा, यही तय किया गया था, दोनों नेताओं के द्वारा। श्री राय चाहते थे कि इसमें वर्ग-संघर्ष की अवधारणा दिखाई दे। झारखंड नामधारी कई पार्टियाँ झारखंड में कार्यरत थी, अतः एक नया नाम ढूँढना मुश्किल लग रहा था। वहीं पर उस बैठक में बिनोद बाबू के बड़े पुत्र राज किशोर महतो भी उपस्थित थे। 1968 में ईंजीनियरिंग (माइनिंग) की डिग्री धनबाद के ही इंडियन स्कूल ऑफ माइन्स से हासिल किया था, और उन दिनों धनबाद के पास ही कोलियरी में कार्यरत थे। राजनैतिक गतिविधियों खासकर शिवाजी समाज के आन्दोलनों में भी प्रत्यक्ष रूप से हिस्सा लिया करते थे। नामकरण की चर्चा के दौरान उनके मन में एक विचार आया एवं एक नाम बिजली की तरह उनके दिमाग में कौंध गया। उन्होनें उस नाम का प्रस्ताव दे डाला। वह नाम था “झारखंड मुक्ति मोर्चा” ऐसे नाम के पिछे उन्हेनें जो तर्क दिया सभी को पसन्द आ गया। तीन व्यक्ति अपनी-अपनी विचार-धारा का समावेश चाहते थे, नये नाम में, अतः यह एक मोर्चा का ही रूप ले सकता था। दूसरे इसके नाम में झारखंड शब्द भी चाहते थे और झारखंड को शोषण मुक्त करना चाहते थे, सो यह नाम सबसे उचित प्रतीत हुआ। इसमें स्थानीय झारखंडी एवं वैसे लोग जो शोषण-मुक्ति की लड़ाई लड़ना चाहते थे सभी का समावेश इसमें झलकता था। इस झंड़े का रंग जाहिर है हरा ही होना था क्योंकि श्री राय ने उन्ही दिनों “मार्क्सवादी समन्वय” नामक राजनैतिक पार्टी का गठन कर लिया था और उसे अलग से चलाना चाहते थे। झारखंड मुक्ति मोर्चा को वे सिर्फ सहयोगी दल मानकर चलना चाहते थे। बिनोद बाबू के लड़के राज किशोर महतो ने इस मोर्चे का चुनाव चिन्ह “तीर-धनुष” रखवा दिया जो झारखंड का लोकप्रिय परम्परागत हथियार के साथ-साथ उसकी पहचान भी थी। इसका विधिवत् गठन चार फरवरी 1973 को किया गया एवं बिनोद बिहारी महतो इसके प्रथम अध्यक्ष बने तथा शिबू सोरेन महामंत्री। चार फरवरी को 1973 में ही धनबाद के प्रसिद्ध गोल्फ मैदान में इसका पहला स्थापना दिवस मनाया गया। और तब से प्रतिवर्ष मनाया जाता है।

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