Saturday, October 23, 2010

अध्याय- सात

झारखण्ड मुक्ति मोर्चा का जन्म, उसकी पृष्ठभूमि एवं विचार-धारा
उन्नीस सौ सत्तर तक के झारखण्ड की स्वात्तता आन्दोलन का नेतृत्व अनुसूचित जनजाचि के लोगों ने किया। गैर-अनुसूचित जनजाति इस प्रकार के आन्दोलन से बहुत ज्यादे नहीं जूड़ पाये थे। इसका कारण पृथकतावाद की नीति रही और आन्दोलन के शुरूआती दौर के नेताओं की अदूरदर्दिता। झारखणड आन्दोलन के शुरूआती दौर में नेतृत्व की बागडोर उन नेताओं के हाथ में रहा जो अनुसूचित जनजाति के साथ-साथ ईशाई थे। ईशाई मिशनरियों ने वैसे जनजातियों को शिक्षा-प्रदान की जो ईशाई बनने लगे थे एवं ये लोग उच्च शिक्षा भी प्राप्त करने लगे। अतः इनका आगे आना स्वाभाविक था। दूसरी जनजातियाँ जो ईशाई नहीं बने, वे इससे वंचित रहे। वस्तुतः झारखण्ड आन्दोलन को ईशाई-मिशनरियों द्वारा उठाया गया आन्दोलन भी कहा जाता रहा था। इन मिशनरियों एवं उपनिवशवादी अधिकारियों ने अनुसूचित जनजाति एवं अन्य को यानि “आदिवासी” एवं गैर-आदिवासी को इस क्षेत्र का मूल निवासी नहीं मानकर अलग-अलग माना। “आदिवासी-आन्दोलन” को “दिकुओ” के विरूद्ध भी चलाया गया। इस नीति का दुष्परिणाम स्वतंत्रता प्राप्ति के कई वर्षो बाद भी बना रहा। “दिकु” उन्हें कहा जाता था, जो आदिवासियों को “दिक्-दिक्” यानि तंग किया करता था। यह एक आम जुमला आदिवासियों के मुँह पर जढ़ गया था। कुछ राजनैतिक दलों द्वारा आदिवासी एवं गैर-आदिवासी के बीच दरार पैदा करने की कोशिश भी की गई। अतः अगर हम कहें कि 1970 तक झारखण्ड आन्दोलन का मुख्य स्वरूप जातीय रहा तो कोई अतिशोयुक्ति नहीं होगी।
1970 आते-आते जैसा कि हमने देखा झारखंड क्षेत्र के सामाजिक आर्थिक एवं राजनैतिक परिवेश में व्यापक बदलाव आ गया। झारखंडवासियों की पहचान ही मिटने का खतरा पैदा हो गया। न सिर्फ आदिवासी बल्कि गैर-आदिवासी का भी जीवन प्रभावित होने लगा, वह भी समान रूप से। औद्योगिकरण के चलते इन दो वर्गो की विशिष्टता यानि सांस्कृतिक विशिष्टता अस्पष्ट होने लगी और क्षेत्रीय समस्याओं के प्रति उनकी धारणाओं में समानता या निकटता आई। धीरे-धीरे “झारखंड आन्दोलन” जो सिर्फ आदिवासी आन्दोलन समझा जाता रहा था या फिर झारखंड शब्द आदिवासियों में प्रिय था, धीरे-धीरे अन्य लोगों को भी ग्राह्य होने लगा।
यहाँ जनजातिय समूहों में कुड़मी-महतो का विशेष आकर्षण इस झारखंड आन्दोलन के प्रति पनपा। एक तो जनजाति होने की वजह से ये स्वयं को तथा कथित आदिवासी समुदाय, खासकर संथाल समुदाय के बहुत नजदीक महसूस करता था। इसके कुछ ऐतिहासिक कारण भी हैं, जिसकी चर्चा हम कभी बाद में करेंगे। उत्तरी छोटानागपुर, पश्चिम बंगाल, संथाल परगना एवं सिंहभूम के कुछ इलाकों तथा समीपवर्ती उड़ीसा में भी संथालों एवं कुड़मी महतो जनजाति में काफी घनिष्ठता दिखाई पड़ती है। उसी प्रकार अन्य हिस्सों में कुड़मी मुंड़ा जनजाति के साथ-साथ रहता आया है।
जनजातीय एक रूपता के अलावे औद्योगिकरण के विस्तार ने समान रूप से प्रताड़ित गैर-आदिवासी भी क्षेत्रीयता के विचार से प्रभावित होने लगे थे।
झारखंड मुक्ति मोर्चा का उदय 1972-1973 में हुआ। इसका पहला अधिवेशन चार फरवरी 1973 को धनबाद जिला स्थित धनबाद गोल्फ मैदान जो धनबाद जिले के मुख्यालय के पास है, वहीं हुआ। इसे स्थापना दिवस के रूप में मनाया गया।
झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रणेता तथा संस्थापक एवं प्रथम अध्यक्ष श्री बिनोद बिहारी महतो हुए। बिनोद बिहारी महतो पेशे से वकील थे तथा कुड़मी-महतो समुदाय से आते थे। इनका जन्म सरकारी दस्तावेजों तथा स्कूली सर्टीफिकेटों में तेईस सितम्बर उन्नीस सौ तेईस दर्ज है। वैसे यह उनकी सही जन्म तिथि नहीं। कोई-कोई कहते हैं कि यह वर्ष 1921 था। इनका जन्म ग्राम बड़ादाहा, प्रखण्ड बलियापुर, जिला धनबाद, तत्कालिन प्रदेश बिहार में हुआ। इनके पिता का नाम माहिन्दी महतो ऊर्फ महेन्द्रनाथ महतो एवं माता का नाम मन्दाकिनी देवी था। इनकी पत्नी पास के ही गाँव बंदरचुँआ की थी। एवं उनका नाम फूलमनी देवी था।
इनका जन्म एक साधारण किसान परिवार में हुआ। पढ़ने लिखने की कोई परम्परा इनके गाँव में नहीं थी, न ही कोई विद्यालय था। इनके गाँव में ज्यादातर लोग कुड़मी, कुछ रजवार, एक दो घर डोम, मोची तथा एक परिवार लोहार तथा पास में एक छोटा टोला संथालों का भी था। सभी लोग खेती-बाड़ी कर लेते थे। माहिन्दी महतो अनपढ़ थे और अपने बच्चों को पढ़ाना-लिखाना उनके बस के बाहर था। बिनोद बिहारी महतो के एक छोटे भाई थे तथा तीन छोटी बहनें थी।
बिनोद बिहारी महतो के मन में पढ़ने-लिखने की अद्भूत ललक थी। इन्होनें बड़ी कठिनाई से प्राइमरी शिक्षा बलियापुर से, हाई स्कूल की शिक्षा धनबाद एच0 ई0 स्कूल से पूरी की। इन्होनें 1941 में मैट्रीक परीक्षा पास की। इसके बाद कई छोटे-छोटे काम किए। शिक्षक का काम भी किया। टाइप-राइटर में टंकन का भी काम किया। अंतत इन्हें धनबाद समहरालय में किरानी की सरकारी नौकरी मिली। फिर नौकरी छोड़ी। पी0 के0 राय कॉलेज कतरास से इन्टर की परीक्षा पास की तथा राँची कॉलेज राँची से स्नातक की डिग्री आर्टस विषय में ली। 1955 में पटना लॉ कॉलेज से कानून की डिग्री हासिल की। 1956 से जिला कोर्ट धनबाद में अपनी वकालत शुरू किया।
राजनिति में इनकी रूची छात्र-जीवन से ही रही। 1952 के पहले आम-चुनाव में ये बिहार विधान सभा के लिए खड़े हुए। फिर भारतीय कम्यूनिष्ट पार्टी का विभाजन हुआ तो मार्क्सवादी कम्यूनिष्ट पार्टी में चले आए। 1971 में ये धनबाद लोक-सभा सीट से सी0 पी0 एम0 के टिकट से चुनाव लड़े एवं द्वितीय स्थान पर रहे थे। स्थानीय निकायों जैसे धनबाद म्युनिसिपैल्टी बलियापुर प्रखण्ड, धनबाद जिला परिषद् आदि के लिए भी 1971 तक चुनाव लड़े एवं सदस्य तथा पदाधिकारी बने।
अपने जीवन में पच्चीस वर्षो तक वामपंथियों के साथ रहने के बाद और धनबाद लोक सभा में द्वितीय स्थान प्राप्त करने के बाद भी तथा अनेक प्रकार के नक्सली संगठनों से समंबन्ध रखने के बाद भी बिनोद बिहारी महतो ने झारखंड नामधारी पार्टी का गठन क्यों किया, यह एक विचारनीय विषय है।
मार्क्सवादी कम्यूनिष्ट पार्टी को छोड़ने का निर्णय उन्होनें कोई एक दिन में नहीं ले लिया था। वर्षो के अन्तराल के बाद उन्होनें पाया कि भारतवर्ष में वमपंथी वर्ग-संघर्ष सिर्फ एक नारा बनकर रह गया है। मार्क्सवादी लाल झंडा समाज के उच्च-वर्ण, उच्च-वर्ग, शोषक-शासक वर्ग के हाथों में खेल रहा है। परजीवी-उनुत्पादक वर्ग ही समाज के उत्पदक वर्ग पर राज कर रहा है। उनकी नजर झारखंड के उत्पादक वर्ग, आदिवासी, मूलवासी, सदान, हरिजन, पिछड़ो एवं मजदूर-वर्ग की ओर घूम गई एवं एक नये दृष्टिकोण से उन्होने सोचा।
उन्होने झारखंड क्षेत्र को लक्ष्य करके अंतरराष्ट्रीय वामपंथी अवधारणा को छोड़ा और सोचा कि अगर झारखंड के लोगों के साथ न्याय नहीं हुआ, शोषण चलता रहा और वे न्याय नहीं दिला सके, तो पूरे विश्व की गांरटी कौन लेगा। उन्होने अपने झारखंड के इतिहास, भूगोल पर नजर डाली, तो उन्हें बड़ा सदमा पहुँचा।

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