Sunday, October 31, 2010

झामुमो के आन्दोलन का क्रमिक विकास

सभी को ज्ञात है कि 1973 से लेकर बिनोद बिहारी महतो के स्वर्गवास तक (18-12-91) झारखंड मुक्ति मोर्चा पूरे झारखंड क्षेत्र में एक सशक्त राजनैतिक दल के रूप में उभर चुका था। धनबाद जिले से लेकर पूरे उत्तरी छोटानागपुर, दक्षिणी छोटानागपुर एवं संथाल परगना में एक मजबूत संगठन बन चुका था। न सिर्फ इतना ही, बल्कि पश्चिम बंगाल एवं उड़ीसा के समीपवर्ती झारखंड क्षेत्र में यह बहुत लोकप्रिय बन चुका था।
झारखंड मुक्ति मोर्चा की सफलता के पीछे बिनोद बिहारी महतो की विचार-धारा रही। उनका दिशा-निर्देश रहा। उनकी जोखीम उठाने की प्रवृति रही। पार्टी को शुरू के दशवर्षो तक आर्थिक मदद इन्होने किया। उन्होने प्रतिभाओं को तलाशा एवं उन्हें तरासने का काम किया। अपना स्वयं का पैसा खर्च करके नेताओं को आगे बढ़ाया, कार्यकर्त्ता तैयार किए। उनका नेतृत्व ईमानदारी का था एवं पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़े थे। जैसा कि हमने पहले ही देख लिया है कि उन्होने उन वर्गो को एकत्रित करने का काम किया। जिन्हें वास्तव में परिवर्त्तन चाहिए था। उन्ही वर्गो-जातियों में से नेतृत्व पैदा किया। बिनोद बिहारी महतो ने झारखंड आन्दोलन के संकुचित आदिवासी चेहरे को, उसके जनजातीय छवि को बदल डाला। उसे एक विस्तृत आयाम दिया। इसमें आदिवासियों के साथ-साथ गैर-आदिवासी समूहों को भी शामिल किया। इन्होने झारखंड आन्दोलन में मजदूरों की भागीदारी भी सुनिश्चित की। उन्होनें इस आन्दोलन को न सिर्फ जातीय, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक आधार प्रदान किया। झारखंड की सभ्यता-सांस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए यहाँ के लोकगीतों, लोकनृत्यों, को आन्दोलन के रूप मे लिया। तो दूसरी ओर कल-कारखानों, कोलियारियों में नौकरी एवं रोजगार के लिए आन्दोलन चलाया। सांमतवादी विचार-धारा वाले सूदखोर, महाजनों के खिलाफ सशस्त्र आन्दोलन भी हुए।
चूँकि शिवाजी समाज द्वारा आन्दोलन बहुत आगे बढ़ाया जा चुका था और संथाल समाज द्वारा भी। अतः झारखंड मुक्ति मोर्चा सिर्फ दो वर्षो में स्थापित हो गया था।
इन आन्दोलनों में प्रमुख रहा झारखंड में विस्थापन की समस्या के विरूद्ध। 1978 के पहले केन्द्र सरकार ने विस्थापितों के नियोजन, पुर्नवास एवं नोकरी देने की कोई नीति नहीं बनाई थी। प्रथम बार 1978 से कोल कम्पनियों द्वारा इन विषयों पर नीतियाँ बनाई गई एवं नियोजन, पुर्नवास देने का काम शुरू किया गया। दामोदर भैली कॉरपोरेशन लिमिटेड को भी आन्दोलनों से मजबूर होकर विस्थापितों को नौकरी, रोजगार, ठीका आदि देने का काम शुरू करना पड़ा। इन सबके साथ-साथ कम्यूनिटी डेवलोपमेंट के नाम पर अगल-बगल के गाँवों में नागरिक सुविधाएँ मुहैय्या कराने का काम भी शुरू किया गया। सड़क, पानी, बिजली, विकास भवन, स्कूल आदि बनाने में औद्योगिक संस्थान अपनी थोड़ी-बहुत भागीदारी निभाने लगें।
इसके अलावे जो एक और प्रमुख आन्दोलन शुरू किया गया, वह था जंगल बचाओं आन्दोलन एवं विदेशी वृक्ष लगाना बंद करो का आन्दोलन। जंगलों में रहने वाले आदिवासी, गैर-आदिवासी सक्रिय हो उठे। जंगल विभाग के कर्मचारियों, अधिकारियों ने नंगा नाच मचा रखा था। अंधाधुंध लकड़ियों की कटाई इनके द्वारा कराई जा रही थी। साथ ही गाँव वालों को बिना वजह लकड़ी चोरी के इल्लजाम में पकड़कर जेल भेजा जाता था। अगर गाँव के लोग जलावन के लिए या अन्य छोटे-मोटे कृषि के उपकरण बनाने के लिए लकड़ी का प्रयोग करते तो उन्हें चोरी के इल्लजाम में जेल भेज दिया जाता। सदियों से झारखंड़ियों का जीवन जंगल-आधारित था। फल-फूल, पत्ते, लकड़ी का उपयोग करते आ रहे थे। पर इनके सारे अधिकार छीन लिए गये थे। अतः इस आन्दोलन का व्यापक प्रभाव पड़ा। विदेशी-वृक्षों को सरकार द्वारा खाली जमीनों पर लगाया जाता था, जो जमीनों को उपजाऊ नहीं, बल्कि सुखा देती थी। इन वृक्षों यूकलिप्टस आदि को काट डालने का अभियान चला। इसके अलावा फलदार वृक्षों को लगाने की माँग की जाने लगी। जंगलों के इलाकों में सरकारी तंत्रों के साथ गाँव वालों का मुकाबला भी हो जाता। कई बड़ी-बड़ी घटनाएँ भी घट गई, जिसमें पुलिस, जंगल गार्ड मारे गये तो गाँव वालों को भी गोलियों का निशाना बनाया गया। जंगलों में खासकर उग्रवादी आन्दोलन चलाये गये। सरकारी कर्मचारी, जंगल विभाग के अधिकारी ठेकेदार, भागने लगे थे।
इसके अलावे गाँवों में सूदखोरों, महाजनों द्वारा गैर कानूनी ढ़ंग से हड़पी गई जमीनों को वापस करने का जोरदार आन्दोलन किया गया। छोटानागपुर टेनेन्सी एक्ट तथा संथाल परगना टेनेन्सी एक्ट के अतिक्रमण की हालत में उन जमीनों पर रैयतों द्वारा जमान वापसी के लिए सीधे कार्यवाही की जाने लगी। कोर्ट-कचहरियों में गरीबों को न्याय मिलना असंभव था। अतः बिनोद बिहारी महतो ने उन जमानों पर पुनः कब्जा करने की रणनीति तैयार की। उन्होनें कई जिलों में वकीलों को प्रोत्साहित किया कि वे गरीब, आदिवासी, हरिजन, पिछड़े लोगों के मुकदमें बिना फीस लिए लड़े एवं उन्हें कानूनी सहायता दें। जमीन वापसी का आन्दोलन भी बड़ा व्यापक स्तर पर चला। “धान-कटनी” का आन्दोलन उस जमीन वापसी का आन्दोलन का एक हिस्सा था। गाँव के गरीब, आदिवासी, हरिजन, झारखंड मुक्ति मोर्चा के कार्यकर्त्ताओं द्वारा संगठित किए जाते और तीर-धनुष, लाठी-भाला, टाँगी आदि से लैस होकर खेतों पर डुगडुगी बजाते-बजाते धावा बोलते और खड़ी फसल को काट देते एवं उसे ढोकर सही व्यक्ति के घर पहुँचा देते।
सांस्कृतिक आन्दोलन भी चलाए गये। झारखंड की सभ्यता संस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए जगह-जगह “झूमर” प्रतियोगिता रखी जाने लगी। झूमर एक लोक नृत्य है जिसमें झूमर के गीत गाये जाते हैं। बाजा बजाने वाले होते हैं। ढोल, नगाड़ा, माँदर, करताल, शहनाई का होना आवश्यक है। इसमें बारह ताल यानि लय होते हैं। बारह प्रकार की अलग-अलग धूनों पर नाचा जाता है। नाचने के लिए विशेष तौर पर लड़के ही नर्तकियों का रूप धरते है। दो से छः तक नर्तकियों की संख्या होती है। यह लोक-नृत्य अखाड़े में खड़े होकर सम्पन्न किया जाता है। दर्शक इसके चारों तरफ बैठते है। झारखंड क्षेत्र का यह एक प्रसिद्ध लोक-नृत्य है जो पूरे झारखंड में महशूर है। पर्व-त्योहार के अवसर पर या फिर धान की फसल काट लेने के बाद जाड़े की रातों में रातभर झूमर नाचा जाता है। उसी प्रकार अन्य लोक-नृत्य “छऊ-नृत्य” है जो विश्व-प्रसिद्ध हो चुका है। इसी प्रकार के अन्य लोक गीतों एवं लोक-संगीतो, लोक-नृत्यों को बढ़ावा देने के लिए बिनोद बाबू ने व्यापक प्रोत्साहन दिया। स्वयं रात-रात भर जागकर कलाकारों को उत्हाहित करते। नतीजा यह निकला कि झारखंड के समूचे इलाके में, गाँव-गाँव में झारखंडी सभयता-संस्कृति पुर्नजीवित हो उठा एवं इसकी गूँज दूर-दूर तक आगे बढ़ने लगी। इसके साथ-साथ झारखंड क्षेत्र के पर्व-त्योहार करमा, सोहराई, गोहालपूजा, जीतिया, टुसू, जावा आदि शहरों में प्रवेश कर गये। उन्हें भी प्रोत्साहित किया गया। पूरे झारखंड क्षेत्र की अपनी एक पहचान है, वह भी विशिष्ट जो अन्य किसी की नहीं हैं। इस प्रकार के सांस्कृतिक आन्दोलन से झारखंडी अपने आप को पहचानने लगे। उनमें आत्म-विश्वास जगने लगा। औद्योगिकरण एवं बाहरी संस्कृति के दबाव से जो संकुचन आया था, वह दूर होने लगा और वे जो श्रेष्ठ होते हुए भी हीन भावना से ग्रस्त हो रहे थे, पुनः स्वयं को आत्म-विश्वास से भरा हुआ पाने लगे।
झारखंड क्षेत्र में कुछ ऐसे लोक नृत्य है जो “मारसल आर्ट” के स्वरूप है। इसमें एक प्रमुख है- “पैका” यानि ”पाइक”। इसमें खिलाड़ी ढाल तलवार (या लाठी) से लैस होता है। पैंरों में घुँघरू बाँध लेता है और सर पर पगड़ी। धोती को कस कर कमर में बाँधा जाता है। “पैका” में जो पारंगत हो जाता है वह अकेले ही दर्जन हमलावरों को एक साथ धूल चटा सकता है। इसके दाँव-पेंच ही ऐसे होते हैं। झारखंड में पहले कुड़ंमी-महतो लोगो के प्रत्येक गाँव में “पाइक” की ट्रेनिंग दी जाती थी। इसके लिए उस्ताद होते थे, गुरू होते थे और यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलता आता है। पर दुर्भाग्य से आज यह प्रायः लुप्त हो रहा है। इसी पैका का दूसरा स्वरूप “नटुआ नाच” है। अब ढाल की जगह गमछा, तलवार की जगह लाठी ने ले लिया है। इसमें बजने वाला बाजा विशिष्ट लय एवं ताल का होता है, जिसे सुनकर ही यहाँ का झारखंडी मैदान में कूद पड़ता है।
फिर झारखण्ड मुक्ति मोर्चा ने गाँव-गाँव में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए “अकिल-अखाड़े” चलाए। सुदूर गाँव में रात्री-पाठशालाएँ लालटेनों की रोशनी में चलायी जाने लगीं। शिक्षा के लिए भी अभियान या आन्दोलन चलाए गये। जिन परिवारों के बच्चे स्कूल नहीं जाते थे उन्हें प्रोत्साहित किया जाने लगा। उस समय गाँव में शिक्षा की कोई व्यवस्था ही नहीं थी। बिनोद बिहारी महतो ने स्वंय कुल मिलाकर कितने संस्थाने खोले, यह पता लगाया जा रहा है। पर चालीस संस्था का पता चला है। जिनमें मिडिल-स्कूल, हाई-स्कूल, डिग्री कॉलेज तथा विधि विद्यालय भी हैं। ये सम्पूर्ण झारखण्ड में जगह-जगह शिक्षण संस्थान खोलने के लिए लोगों को उत्साहित करते फिरते। अपनी कमाई का अधिकत्तर पैसा इन कॉलेजों एवं स्कूलों के भवन निर्माण शिक्षकों के वेतन के लिए दान दे दिया।
इधर गाँव के झगड़े गाँव में ही पंचायत बुलाकर सुलझाए जाने लगें। प्रत्येक गाँव में यह एक आन्दोलन के रूप में खड़ा होने लगा। झारखण्डी की जीवन-पद्धति भी यही थी। फिर अगर गाँवों में नहीं सुलझ पाते तो उन झगड़ों को नेताओं क पास ले जाया जाता। फिर बड़े पैमाने पर तीन-चार गाँव के लोग मिलकर बैठते एवं फैसला किया जाता। किसी-किसी मामलें में समस्या जब नहीं सुलझती, तो इसे बिनोद बाबू के पास लाया जाता। धीरे-धीरे ऐसी व्यवस्था कायम हो गई कि झारखंड के कई इलाकों में इस प्रकार से झगड़े निपटाने के केन्द्र बन गये और उन्हें लोग स्वतः जिला-कोर्ट, हाई-कोर्ट कहने लगे। यही कारण था कि सरकारी रिपोर्टो में यह बात दर्ज है कि झारखंड मुक्ति मोर्चा द्वारा समानान्तर सरकार चलाई जा रही थी, जिसका अपना पुलिस फोर्स है एवं कोर्ट-कचहरी है। इन कचहरियों में यानि बैठकों में आपराधिक मामले दीवानी मामले तथा शादी-व्याह, तलाक से जुड़े मामले सभी पर विचार विमर्श होता था। आपराधिक मामलों में ज्यादातर फाइन किया जाता था। कभी-कभी शारीरिक दंड दिया जाता था और अपराधी को लाठियों से पिटा जाता। या अन्य प्रकार से अपमानित या प्रताड़ित किया जाता। किसी-किसी गंभीर मामले में हुक्का पानी भी कुछ दिनों के लिए बंद कर दिया जाता यानि सामाजिक बहिष्कार किया जाता। किसी-किसी मामले में जो जमींदारी अत्याचार एवं सामंती अत्याचार के खिलाफ फैसला लिया जाता, उसमे “बिटलाहा” भी कर दिया जाता। बिटलाहा का मतलब होता था, उसे गाँव से उजाड़ देना। घर-द्वार को तोड़-फोड़ दिया जाता था।
इनके अलावे जो एक सबसे बड़ा पहलू झारखंड मुक्ति मोर्चा के आन्दोलन का रहा, वह था शराब-खोरी के खिलाफ संघर्ष। इसमें कार्यकर्त्ता सीधे शराब की भट्टियों पर धावा बोलते, तोड़फोड़ कर डालते। शराबियों को पकड़कर पीटते। उन्हें पानी में डूबा-डूबा कर उसका नशा तोड़ते। कार्यकर्त्ता पता लगाते कि कौन चोरी-छिपे इस धंधे में लिप्त है, उसका पता लगाते एवं उसे धंधे को छोड़ने के लिए मजबूर करते। गाँवों में औरतों के बीच जाते और उन्हें अपने-अपने शराबी पतियों की आदत छुड़ाने के लिए प्रोत्साहित करते। औरते इस आन्दोलन का समर्थन जोरदार ढंग से करती एवं अपने शराबी पतियों से लडती झगड़ती।
इस प्रकार इन आन्दोलनों ने बहुत सारे जुझारू, लड़ाकू कार्यकर्त्ता पैदा किए। पर समाज का शोषक-शासक वर्ग चुप नहीं बैठे रह सकता था। इन आन्दोलों को कुचलने के लिए पुलिस-प्रसाशन, जमींदार, सूदखोर, महाजन, माफिया, गुंडे सभी सक्रिय हो उठे। नतीजा यह हुआ कि कई बड़े-बड़े संघर्ष हुए। चोरी-छिपे कार्यकर्त्ताओं, नेताओं की हत्याएँ की जाने लगीं। घात लाकर इन आन्दोलनों के अगुआओं को खोजकर मारा जाने लगे। शहीदों की लम्बी कतारें हो गई। पर कार्यकर्त्ता और जनता भी प्रतिकार में उतर आई। और वर्षो तक दोनों तरफ से संघर्ष चलने लगा।
1975 में ही गोमो में जिला धनबाद के सदानन्द झा शहिद हो गये। उन्हें अकेले पाकर आतताइयों ने गोली मार दी। 1977 में शक्ति नाथ महतो टाटा सिजुआ में शहीद हो गये। उन्हें काँग्रेस के गुंडों ने दिन दहाड़े बम गोलियों से मार डाला। उसी प्रकार इस कोयलाचंल में रसीक हाँसदा, नेपाल रवानी आदि दर्जनों शहीद हुए।
1975 में गोमो की रेल नगरी में सदानन्द झा शहीद हुए तथा 1977 में टाटा-सिजूआ तेतुलमुड़ी के शक्ति नाथ महतो शहीद हुए। ये दो प्रमुख कार्यकर्त्ता नेताओं की शहादत के बाद तो मानों पूरे दक्षिणी छोटानागपुर में आन्दोलन में उफान आ गया। फिर 1987 में जमशेदपुर में झारखंड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष निर्मल महतो को भी आतताइयों ने मार डाला। उनकी शहादत के बाद तो मानों पूरे दक्षिणी छोटानागपुर में आग ही लग गई। इसके अलावे इचागढ़ के अजीत महतो, धनंजय महतो आदि शहीद हुए। गुवा में 1982 में प्रसिद्ध गोली कांड हुआ जिसे आज गुआ गोली कांड के रूप में याद किया जाता है, इसके अलावे अनेकों शहीद हुए। हजारों जेल गये। रिटायर्ड आर्मी के जवान कंडुलना की पुलीस इन्काउटर दिखा कर हत्या कर दी।
संथाल परगना में भी यही हाल रहा। यहाँ उन तमाम घटनाओं का जिक्र करना संभव नहीं हैं। आम झारखंडी शोषित जनता ने भी प्रतित्चुर में हथियार उठा लिए। कई बड़े-बड़े संघर्ष पुलिस-प्रशासन के साथ हुए। महाजन, सामंतो के बिरूद्ध भी जम कर सशस्त्र संधंर्ष हुए। इस प्रकार 1990 तक आते-आते इस पार्टी के बीस विधायक एवं 1991 में छः सासंद बन गये। उन सांसदो के नाम है- श्री बिनोद बिहारी महतो, शिबू सोरेन, सूरज मंडल, शैलेन्द्र महतो, कृष्णा मार्डी, साइमन मरांडी। फिर बाद में 1992 के जून में गिरीडिह संसदिय क्षेत्र में बिनोद बिहारी महतो का निधन के बाद उपचुनाव हुआ जिसमें उनके पुत्र राज किशोर महतो सासंद बने।

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