झारखंड़ मामलों से संबंधित समिति 1989, को केन्द्र सरकार का आदेश था कि पूरे झारखंड़ क्षेत्र का दौरा यह समिति करे तथा अपनी रिपोर्ट दे। इस समिति को संविधान के ढाँचे के अन्तर्गत क्षेत्र के लोगों की अपेक्षाओं पर विचार करना था और उन्हें पूरा करने को लिए रूप रेखाएँ बनाना था यह आन्दोलन कारियों के द्वारा गृह मंत्री को लिए गये ज्ञापनों एवं उनके साथ हुए जून 1989 में हुई बैठकों में उठाए गये मुद्दो पर भी विचार-विमर्श करना था, केन्द्र सरकार ने इस विषय पर झारखंड़ क्षेत्र के सासंदो को पर्यवेक्षक नियुक्त किया था।
इस समिति को दक्षिण बिहार, मध्यप्रदेश, उड़ीसा तथा पश्चिम बंगाल के उन क्षेत्रों का दौरा करना था जिसे झारखंड़ क्षेत्र माना जाता रहा था। चूँकि समय सीमा मात्र एक महिने की थी, यह समिति पूरे क्षेत्रों का दौरा नहीं कर सकी और देश में आम चुनाव की घोषणा अक्टूबर 1989 के बाद कर दी गई थी, तो दौरा बन्द हो गया और विशेषज्ञों को रिपोर्ट तैयार करने को कह दिया गया। विशेषज्ञों द्वारा तैयार किए गये मसौदे पर 25 अप्रेल 1990 को समिति की बैठक में विचार-विमर्श किया गया। फिर 14-15 मई 1990 को हुई बैठक में नये मसौदे पर चर्चा हुई और गृह-मंत्रालय को सौंप दिया गया।
इस रिपोर्ट में कुल मिलाकर छः अध्याय हैं तथा सात अनुच्छेद। इस रिपोर्ट में यह भी दर्शाया है कि किस प्रकार झारखंड़ आन्दोलन के सामाजिक एवं क्षेत्रीय आयाम का विस्तार हुआ। एक छोटे आन्दोलन ने जिसे छोटानागपुर उन्नति समाज ने शुरू किया था, किस प्रकार विशाल रूप लिया इस पर भी विवेचना किया है। झारखंड़ में औद्योगिकरण के प्रभाव इसके जातीय विशाल रूप लिया इस पर भी विवेचना किया है। झारखंड़ में औद्योगिकरण के प्रभाव इसके जातीय समीकरण, जनसांख्यिकीय स्थिति आदि कई विषयों पर भी इस रिपोर्ट में बहुत कुछ कहा गया है। इसके साथ साथ राज्य पुर्नगठन आयोग की रिपोर्ट का हवाला भी दिया गया है जो अलग राज्य से सम्बन्धित है तथा झारखंड़ आन्दोलन के कारणों पर भी विवेचना किया गया है।
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