Monday, December 13, 2010

झामुमो के आन्दोलन को आतंकवादी आन्दोलन कहा गया

मात्र तीन वर्षो के अंदर (1970-73) उत्तरी छोटानागपुर के हजारीबाग से धनबाद जिले तक तथा संथाल परगना के जामताड़ा, दुमका आदि जिलों तक यह धान-कटनी का आन्दोलन जोर-शोर से चलने लगा। इसमें न सिर्फ आदिवासी, बल्कि हरिजन पिछड़े वर्ग के लोग जो आदिवासियों की तरह शोषित थे, पीड़ित थे, महाजनी जुल्म से लड़ने के लिए उठ खड़े हुए तथा उन्होनें भी अपनी जमीनों पर कब्जा धान काटकर किया। पूरे क्षेत्र में एक भूचाल सा आ गया था।
उन्ही दिनों 1971 में एक दिन एक नौजवान गोला प्रखंड के नेमरा गाँव से बिनोद बाबू के पास आया था। वह नौजवान था शिबू सोरेन।
सिद्धु कान्हू, चाँद भेरव, बाबा तिलका माँझी से लेकर बिरसा भगवान तक जो लड़ाई लड़ी गई वह वास्तव में जमीन के लिए लड़ी गयी लड़ाई ही थी।
1970 के दसक में ही गाँव के झगड़ों का निपटारा गाँव में ही बिनोद बाबू की प्रेरणा एवं निर्देश से किया जाने लगा। ग्रामीण अब थाना-पुलिस एवं कोर्ट कचहरी से बचने लगे थे। गाँव के समूहों का जो निर्णय होता, उसी को मानने लगे। नतीजा यह निकला कि कई जगहों पर बकायदा ग्रामीण कोर्ट बैठने लगे जिसमें क्रांतिकारी विचार धारा के लोग हिस्सा लेने लगे। पुलिस एवं कोर्ट-कचहरी से वैसे ही लोगों का विश्वास उठ चुका था। अतः इन गाँव के कोर्टो में मामले धड़ाधड़ आने लगे। गाँव वाले कभी-कभी उस इलाके के महाजनों एवं जालिम जमींदारों की शिकायत लेकर आ जाते। तब निर्णय लेना कठिन हो जाता था, क्योंकि आरोपी एक शक्तिशाली व्यक्ति होता था जिसके हाथ मजबूत एवं लम्बे होते थे। ऐसे अवसर पर बिनोद बाबू को बुलाया जाता। बिनोद बाबू नहीं होते तो शिबू सोरेन को बुलाया जाता। वहाँ तथ्यों की सुनवाई रात-भर होती और सर्व सम्पति से निर्णय लिए जाते। अति अत्यचारी व्यक्ति के खिलाफ “बिटलाहा” का आदेश होता। कम अत्याचारी के खेतों पर जबरन कब्जा किये जाने का निर्णय होता, जिन खेतों को महाजन गलत तरीके से हड़प लेते थे। सैकड़ों की तादाद में गाँव वाले हरवे-हथियार से लैस होकर निकलते और दिन के उजाले में निर्णयों को लागू करते। “बिटलाहा” के आदेश पर गाँव वाले अत्याचारी के घर पर धावा बोलते और उसकी सम्पति को नुकसान पहुँचा देते। पर घर के महिलाओं, बच्चों पर कोई आँच नहीं आने देते। मर्द जमींदार अगर मुकाबलें में डटते तो उनके साथ मुकाबला होता। कई जगहों पर कार्यकर्त्ता मारे गये। कहीं-कहीं आततायियों के सर भी कलम कर दिए गये।
इन ग्रामीण कचहरियों का फैलाव होता गया। यहाँ तक कि गाँव तीन-पतली, जिला गिरिडीह में गुणेश्वर हाँसदा के नेतृत्व में ग्रामीण सुप्रीम कोर्ट बन गया।
इस प्रकार सीधी कार्यवाही के आन्दोलन ने जोर पकड़ा एवं यह आम जनता का आन्दोलन बन गया। चारों तरफ स्थिति तनावपूर्ण बन गई थी। पुलिस-प्रशासन की सक्रियता के बावजूद आन्दोलन रूकने का नाम नहीं ले रहा था। लोगों के अंदर आत्म बल इतना बढ़ गया था कि अन्याय के खिलाफ स्वतः र्स्फूत आन्दोलन होने लगे। प्रत्येक गाँव में नौजवान नेता, कार्यकर्त्ता तैयार होने लग गये थे।
1973 के आते-आते प्रशासन ने बिनोद बिहारी महतो पर समान्तर सरकार चलाने का आरोप लगा दिया।
समान्तर सरकार कहें या इसका कुछ और नाम दें। यह तो इसलिए उपजा था कि तत्कालिन व्यवस्था में झारखंड़ी पीस रहे थे। उस तत्कालीन व्यवस्था में उनकी समस्याओं का निदान उन्हें दूर तक दिखाई नहीं देता था। स्वाभाविक था कि वे स्वंय अपनी समस्याओं के समाधान के लिए आगे आते तथा स्व-शासन की ओर प्रेरित होते। पुराने मानकी-मुंड़ा-महतोई परगनैत आदि आदिवासी जनजाति शासन पद्धति की ओर बढ़े जो उनकी अपनी परम्परागत एवं रीति-रिवाज की उपज थी। जो उनका अपना स्वशासन था और जिसको उन्हें मजबूरी में छोड़ना पड़ा था। ब्रिटिश हुकुमत की व्यवस्था को अपनाना पड़ा था। उसी व्यवस्था को अपनाना पड़ा था। वही व्यवस्था हू-बू-हू स्वतंत्र भारत में भी लागू की गई थी। जाहिर है कि जनजातियों का आक्रोश उसी ब्रिटिश व्यवस्था को बल पूर्वक झारखंड़ी व्यवस्था पर लागू करने के विरूद्ध था। इसके लिए कितनी ही लड़ाइयाँ पूर्व में लड़ी गई थी। अतः पूनः स्वशासन की तरफ लोट जाने का आह्वान जो बिनोद बाबू ने दिया था, वह सबको ग्राह्य था। पर यह आन्दोलन था तो व्यवस्था-विरोधी। पर इसे व्यवस्था-विरोधी भी कहना गलत ही होगा। क्योंकि पंच-परमेश्वर है- यह सिद्धांत भारत वर्ष में हजारों वर्षो से चलता रहा है एवं लागू होता रहा है। तो अगर बिनोद बाबू ने फिर गाँव में ही पंचायत बुलाकर समस्याओं के समाधान की ओर कदम बढ़ाया तो उसे गलत कैसे कहा जा सकता है।
पर, गलत कहा गया। आरोप लगाए गये। ब्रिटिश शाषन-पद्धति जो आजाद भारत में हू-ब-हू लागू की गयी, उसके हित में बिनोद बाबू के कार्य कलाप नहीं थे। वे आम जनता के हित में थे। उनपर मुकदमे लादे गये। उन्हें आतंकवादी नेता करार कर दिया गया। और झामुमो के आन्दोलन को आतंकवादी आन्दोलन।
विस्थापन के विरूद्ध लड़ाई किस प्रकार लड़ी गई ? इसका जो तरीका बिनोद बाबू ने आख्तीयार किया वह भी नायाब था। अद्भूत था। टाटा कम्पनी की खदानें जिला धनबाद के जामाडोबा, डूंगरी, पटिया, भौंरा क्षेत्रों में है। साथ ही सिजुआ-भेलाटाँड़ में। फिर हजारीबाग के मांडू इलाके में कई खदानें हैं। टाटा कम्पनी वह कम्पनी है जिसकी कोयला-खदानों का राष्ट्रीयकरण नहीं किया गया। “केपटिव माइन्स” के दायरे में रखकर उन्हें राष्ट्रीयकरण से बाहर रखा गया। टाटा कम्पनी की जमशेदपुर में स्टील उत्पादन का विशाल कारखाना है। सिंहभूम जिले में लौह-अयस्क को गलाने के लिए कोयले की आवश्यकता पड़ती है। इस कम्पनी में सिर्फ कांग्रेस एवं उसकी यूनियन चलती थी। और किसी की भी बात सुनी नहीं जाती थी। टाटा कम्पनी अपने गुंड़ो के बल पर जो काँग्रेस की यूनियन के लोग होते थे और झारखंड़ से बाहरी मूल के होते थे, पूरे इलाके को आतंकित करके रखती थी। अगल बगल के गाँव के लोग जबान तक खोल नहीं सकते थे।
ऐसे माहौल में टाटा कम्पनी से विस्थापितों के लिए न्याय माँगना नक्कारखाने में तूती की आवाज साबित हो रही थी। पर बिनोद बाबू ने माँग नहीं, माँग करके जामाडोबा के पास बहती जोड़िया यानि छोटी नाली को अपने आन्दोलन का स्थल चुना। उन्होंने एक स्थान पर गाँव वालों को इकठ्ठा किया और गैंता-कुदाल लेकर स्वयं जोड़िया में उतरे। उनके पीछे सैकड़ों लोग थे। सभी मिलकर वहाँ पर मिट्टी से जोड़िया पर बाँध बाँधने लगे। अगल बगल के कॉलोनी निवासी एवं टाटा के ऑफिसरों ने सोचा कि ये लोग पागल हो गये हैं। नाला बाँधने से कहीं आन्दोलन होता है। पर जब बाँध बँध गया, दिनभर की मेहनत से, तभी लोगों को इसका प्रभाव नजर आया। पानी जमा हो गया और यह पानी बगल के कोयले की खदान में घुसने लगा। टाटा कम्पनी के ऑफिसरों को तब चिंता हुई कि अगर इसी तरह पानी घूसता रहा तो खदान बंद कर देना पड़ेगा। तब सिक्यूरिटी के लोग आए। बिनोद बाबू ने कहा कि यह जोड़िया सार्वजनिक सम्पत्ति है और इसमें बाँध-बाँधकर के गाँव के लोग अपने खेत की सिंचाई की व्यवस्था कर रहें हैं। इसे रोकने का अधिकार टाटा कम्पनी को नहीं है।
इसके बाद टाटा कम्पनी को झूकना पड़ा और वार्त्ता हुई तथा गाँव वालों एवं विस्थापितों की समस्याओं पर ध्यान दिया गया। नियोजन की पहल शुरू हुई। इस तरह के जन आन्दोलनों के चलते ही बड़ी-बड़ी कम्पनियों को विस्थपितों पर ध्यान देना पड़ा। भारत कोकिंग कोल लिमिटेड की कोलियारी में पहुँचने के लिए गाँव के रास्तों से फिर या तो रैयती जमीनों से होकर गुजरना जरूरी था। कोयला ट्रान्सपोर्ट रोड से करने के लिए, अफसरों के आवागमन के लिए, भीतर गाँव तक तथा खदानों तक जाने के लिए बीसीसीएल द्वारा जमीन अधिग्रहित नहीं की गई थी। लिहाजा बिनोद बाबू ने इन रास्तों को रोकवाना शुरू किया। बहुत सारी जमीनों पर बीसीसीएल ने जबरन कब्जा किया था। उन जमीनों पर मशीनों को चलाने पर रोक लगा दी गई। मशीनों पर झंड़े गाड़े गये।

झामुमो के आन्दोलन को आतंकवादी आन्दोलन कहा गया

इसके बावजूद कि शुरूआती दौर में भी झामुमो में दो विचार धाराओं का जन्म हो चुका था, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा का आन्दोलन रूका नहीं। थोड़े ही वर्षो में इसने एक व्यापक रूप ले लिया था। झारखण्ड आन्दोलन ने झारखण्ड के मूलवासियों, आदिवासियों एवं उपेक्षित शोषित जनता में एक आत्म विश्वास पैदा किया। अपने हक को पहचानना सिखाया एवं एक आत्मगोरव पैदा किया। यहाँ हो रहे सामूहिक अत्याचार, सरकारी शोषण एवं उपेक्षा के विरूद्ध उठ खड़े होने की शक्ति प्रदान की। ऐसा कह सकते हैं कि मूर्दो में जान आ गई थी। यह कैसे संभव हुआ ? बिनोद बाबू ने जब मार्क्सवाद का साथ दिया था और पच्चीस वर्षो तक लाल झंड़े को गाँव-गाँव पहुँचाया था तो भी ऐसा जागरण, ऐसी शक्ति वे पैदा नहीं कर पाये थे। अंतराष्ट्रीय अवधारणा, पूरे विश्व से शोषण को हटाने की अवधारणा यानि वामपंथी अवधारणा झारखंड़ में सफल क्यों नहीं हो पायी ? यह लगता जरूर था कि वामपंथ झारखंड में बहुत आगे बढ़ चुका है। उत्तरी छोटानागपुर ही नहीं पूरे झारखंड में करीब तीस विधान सभा सीटें ऐसी थी, जहाँ लाल झंड़ा विजयी होकर निकला था, पर ऐसा लगता था कि इस झंड़े के साथ आम जनता आत्मीयता का अनुभव नहीं कर पा रही थी।
झामुमो के जन्म ने तथा इसके जमीनी आन्दोलन ने दलितों एवं पिछड़ो, आदिवासियों, गरीबों तथा मजदूर वर्ग के अन्दर जुझारूपन पैदा किया। अगर कोई दबंग व्यक्ति, बलशाली, सामंत, पूँजीपति यानि सूदखोर, महाजन आदि किसी गरीब आदिवासी संथाल की जमीन हड़प ले, उसपर जबरन कब्जा कर ले, तो वह व्यक्ति क्या करें ? कोर्ट जाये जहाँ कि, न्यायलय की लम्बी प्रक्रिया एवं खर्चे को उठा पाना उसके लिए असंभव है। पुलिस प्रशासन के पास जायें, जहाँ थानों पर ही न्याय की निलामी हो जाए। पुलिस को अपने पक्ष में पहले से ही बना लिया जाय, सूदखोरों एवं महाजनों, पूँजूपतियों द्वारा तो पीड़ित को वहाँ न्याय नहीं मिलना। आखिर उसके पास रास्ता क्या है ? किसी राजनैतिक संगठन के पास जाना ही उसका विकल्प बचता है। पर वहाँ क्या होता है । राजनैतिक दल अगर उसके मामले को उठाता है, तो वह दल क्या करेगा ? चिट्ठी लिखेगा, पार्टी पदाधिकारियों की नहीं सुनी जायेगी। तब धरना देगी। नहीं सुनी जायेगी। तब अजीज आकर बड़ी तैयारी करके प्रर्दशन, जूलुस करेगा। प्रशासन यानि न्यायदाता अगर उससे भी नहीं जागे, तो राजनैतिक दल उसके आगे क्या कर सकता है ? या क्या करना चाहिए ? यह एक बड़ा प्रश्न चिन्ह है।
आदिवासी, हरिजन, दलितों की जूलुसों पर, मजदूर वर्ग के जूलुसों का किस प्रकार से दमन होता आया है, सभी जानते है। देश में आदिवासियों का सामुहिक कत्ल तक इन जूलुसों में किया जाता रहा है। निर्ममता पूर्वक लाठियाँ बरसाई गई है। गोलियाँ चलाई गई हैं। एक नहीं इसके कई उदाहरण हैं। झारखण्ड में तो सिर्फ झारखण्ड के नाम पर मीटिंग या सभा करने पर ही नरसंहार किए गए है।
तो आखिर कोई क्या करे। अन्याय के खिलाफ शोषण के विरूद्ध वह भी सरकारी शोषण के विरूद्ध झारखण्ड का आदमी क्या करें ? किस स्तर पर और कौन सी लड़ाई लड़े, जिससे उन्हें, न्याय मिल सके। शोषण से मुक्ति मिल सके।
एक ही रास्ता बचता है। वह रास्ता बहुत कठिन है। उस रास्ते पर चलने के लिए बहुत बड़े हिम्मत की जरूरत पड़ती है। वह रास्ता तो यही है कि सीधे शोषणकर्त्ता पर वार हो। उसे शारीरिक क्षति पहुँचाई जाय। जान का डर पैदा किया जाय। जान है तो जहान है। इसका अहसास उस जुल्मी के अन्दर हो। तभी वह भयभीत होगा, डरेगा, अन्याय करने से। शोषण करने से। पर इस रास्ते पर कमजोर व्यक्तियों को चलाना, उनमें वह संघर्ष का माद्दा पैदा करना, सीधी कार्यवाही के लिए उन्हें आगे बढ़ाना, कितना कठिन काम हो सकता है यह नेतृत्व कर्त्ता ही जान सकता है। भयभीत, डरे हुए, दबे हुए, कुचले हुए लोगों के लिए सर उठाकर चलना ही कठिन होता है। जो हाथ जोड़े रहते है, या अपने हाथ बगलों में दबाए, सर झुकाए धीमी आवाज में बोलने के आदी है, उन्हें सर सीधा करके, सीना तान करके हाथ ऊपर उठाकर नारें तक दिलवाना कठिन काम होता है। उन हाथों में कुछ कर गुजरने के लिए स्पंदन पैदा करना तो बहुत ही कठिन काम है।
झारखण्ड में कोई रास्ता नहीं बचा था। अभिशप्त झारखण्ड में आदमी अपने आप को नहीं पहचान रहा था। ऐसी परिस्थिति में बिनोद बिहारी महतो के अंदर ऐसी सोच किस प्रकार पैदा हुई, यह एक अनुसंधान का विषय हो सकता है। है भी।
1970 की एक दुपहरिया थी। पाँच छः आदिवासी-संथाल जाति के लोग बिनोद बिहारी महतो के निवास पर आए थे। उन दिनों बिनोद बाबू हीरापुर, धनबाद शहर में रेजिस्ट्री ऑफिस के निकट एक मकान में किराए पर रहा करते थे। कचहरी से वे दोपहर को लोटे थे। मार्निग कोर्ट था। वरांडे में आदिवासी जमीन पर बैठे हुए थे। दुबले-पतले। देखने से ही कुपोषण का शिकार से लगते थे। शरीर पर एक छोटी धोती लपेटे थे। आँख धँसी हुई। काले लोग। हाथों में छोटी सा टाँगी। या फिर छोटी लाठी थी। चुपचाप थे। यहाँ तक कि जब बिनोद बाबू ने उन्हें थोड़ी देर रूकने को कहा तो भी वे कुछ नहीं बोले।
दस मिनट के बाद बिनोद बाबू उन लोगों के पास आए और अपने बैठक खाना जो उनके वकालत का भी दफ्तर था, उन्हें उसमें बुला ले गये। उन्होंने उनकी समस्या पूछी स्थानीय कुड़माली भाषा में। संथाल कुरमाली समझते भी है, और बोलते भी है। उन आदिवासी संथालों ने कहा कि उनकी जमीन का जो कागजात उनके पास है, उसमें दखल का जो घर है यानि कालम है, उसमें चौधरी का नाम, लिखा हुआ है, जबकि मालिक संथालों को दिखाया गया है तथा जमीनें उनके दखल-कब्जे में भी है। वे ही धान उगाते हैं। खेत जोतते हैं। काटते हैं। पर धान को काटने के बाद चौधरी के खलिहान में ले जाकर जमा कर देते हैं। ऐसा इसलिए करना पड़ता है कि उन्हें चौधरी का कर्ज चुकाना है।
यह टुण्डी प्रखंड जिला धनबाद के गाँव पोखरिया की बात है। बिनोद बाबू ने उन आदिवासियों से पुछा कि कब उन लोगों ने कर्ज लिया था और कितना लिया था। जबाव मिला कि उनलोगों के पिताजी ने वर्षो पूर्व दो सौ रूपया कर्ज लिया और वह जमान चौधरी को सोंप दिया था। बंधक रख दिया था। बचपन से ही उनलोगों ने देखा है कि उनके बाप-दादे भी अपना धान चौधर के खलिहान में पहुँचाते रहे थे। उनकी ही जमीन। वे ही खती करते हैं। वे ही धान भी आज तक देते आए हैं, पर अभी तक खेत बंधक से मुक्त नहीं हो पाया चौधरी कहता है कि अभी सूद ही नहीं चुका है।
बिनोद बाबू कुछ सोच रहे थे। आदिवासियों ने उनसे गिड़गिड़ाकर कहा कि वे ऐसी व्यवस्था कर दे ताकि दखल के घर में उनका नाम सरकार चढ़ा दें और जमीन उनकी हो जाय। आदिवासियों की इस समझ पर बिनोद बाबू को आश्चर्य नहीं हुआ। इस प्रकार के सैकड़ो मामले उनकी नजर में आ चुके थे। पर तबतक वे कोई रास्ता निकाल नहीं पाये थे। अगर कोर्ट में मुकदमा दायर करें तो क्या नतीजा निकलेगा, उन्हें मालूम था। ये आदिवासी कोर्ट दौड़ते दौड़ते ही थक जाएगें। पर मिलेगा कुछ नहीं। आर्थिक हालात उन आदिवासियों की स्पष्ट थी। उनके पहनावे, उनका चेहरा ही उनकी कहानी कह रहा था।
उन्होंने बहुत सोचने के बाद कहा कि तुम लोग एक काम करो। इस बार तुमलोग खेत जोतो। धान लगावो। काटो। काटने के बाद धान को चौधरी के खलिहान में जमा मत करो। उस धान को अपने धर में ले जाकर रख दो। सरकार खुद-ब-खुद दखल के धर में तुम्हारा नाम लिख देगा। और कुछ करने की आवश्यकता नहीं है।
आदिवासियों को यह काम बड़ा आसान लगा। पर बिनोद बाबू जानते थे कि आदिवासी अगर ऐसा कर देते हैं तो उसके बाद क्या हो सकता है। दमन-चक्र किस प्रकार उन पर चलाया जायेगा। पर देखें तो आदिवासी क्या करते है, यह सोचकर उन्होंने उनको चले जाने को कहा और फिर धान काट लेने के बाद उनसे मिलने को कह दिया। इसके बाद शुरू हो गया, झारखंड का प्रसिद्ध “धान-कटनी” आन्दोलन। उन आदिवासियों ने वही किया जो बिनोद बाबू ने कहा था। उसकी देखा-देखी गाँव के दूसरे आदिवासियों ने जिनके जमीनें बधंक थी, वही किया। बगल के गाँवों में भी वही काम शुरू हो गया। उसी वर्ष इस कार्य ने एक आन्दोलन का रूप ले लिया। महाजनों, जमींदारों, सूदखोरों को कुछ समझ ही नहीं आया। वे सकते में आ गये। पुलिस को सक्रिय किया गया। दमन शुरू हुआ। मुकदमें दायर होने लगे। पर उसके बाद स्वतः ही आदिवासी लोग संगठीत होने लग गये। मीटिंग करने लगे। अपनी रक्षा के लिए बिनोद बाबू को बुलाने लगे। आदिवासियों के झुंड़ के झुंड़ तीर-धनुष, टाँगी से लैस होकर घूमने लगे। बड़े-बड़े जूलुस बिनोद बाबू के नेतृत्व में होने लगे।

झामुमो के आन्दोलन को आतंकवादी आन्दोलन कहा गया

इसके बावजूद कि शुरूआती दौर में भी झामुमो में दो विचार धाराओं का जन्म हो चुका था, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा का आन्दोलन रूका नहीं। थोड़े ही वर्षो में इसने एक व्यापक रूप ले लिया था। झारखण्ड आन्दोलन ने झारखण्ड के मूलवासियों, आदिवासियों एवं उपेक्षित शोषित जनता में एक आत्म विश्वास पैदा किया। अपने हक को पहचानना सिखाया एवं एक आत्मगोरव पैदा किया। यहाँ हो रहे सामूहिक अत्याचार, सरकारी शोषण एवं उपेक्षा के विरूद्ध उठ खड़े होने की शक्ति प्रदान की। ऐसा कह सकते हैं कि मूर्दो में जान आ गई थी। यह कैसे संभव हुआ ? बिनोद बाबू ने जब मार्क्सवाद का साथ दिया था और पच्चीस वर्षो तक लाल झंड़े को गाँव-गाँव पहुँचाया था तो भी ऐसा जागरण, ऐसी शक्ति वे पैदा नहीं कर पाये थे। अंतराष्ट्रीय अवधारणा, पूरे विश्व से शोषण को हटाने की अवधारणा यानि वामपंथी अवधारणा झारखंड़ में सफल क्यों नहीं हो पायी ? यह लगता जरूर था कि वामपंथ झारखंड में बहुत आगे बढ़ चुका है। उत्तरी छोटानागपुर ही नहीं पूरे झारखंड में करीब तीस विधान सभा सीटें ऐसी थी, जहाँ लाल झंड़ा विजयी होकर निकला था, पर ऐसा लगता था कि इस झंड़े के साथ आम जनता आत्मीयता का अनुभव नहीं कर पा रही थी।
झामुमो के जन्म ने तथा इसके जमीनी आन्दोलन ने दलितों एवं पिछड़ो, आदिवासियों, गरीबों तथा मजदूर वर्ग के अन्दर जुझारूपन पैदा किया। अगर कोई दबंग व्यक्ति, बलशाली, सामंत, पूँजीपति यानि सूदखोर, महाजन आदि किसी गरीब आदिवासी संथाल की जमीन हड़प ले, उसपर जबरन कब्जा कर ले, तो वह व्यक्ति क्या करें ? कोर्ट जाये जहाँ कि, न्यायलय की लम्बी प्रक्रिया एवं खर्चे को उठा पाना उसके लिए असंभव है। पुलिस प्रशासन के पास जायें, जहाँ थानों पर ही न्याय की निलामी हो जाए। पुलिस को अपने पक्ष में पहले से ही बना लिया जाय, सूदखोरों एवं महाजनों, पूँजूपतियों द्वारा तो पीड़ित को वहाँ न्याय नहीं मिलना। आखिर उसके पास रास्ता क्या है ? किसी राजनैतिक संगठन के पास जाना ही उसका विकल्प बचता है। पर वहाँ क्या होता है । राजनैतिक दल अगर उसके मामले को उठाता है, तो वह दल क्या करेगा ? चिट्ठी लिखेगा, पार्टी पदाधिकारियों की नहीं सुनी जायेगी। तब धरना देगी। नहीं सुनी जायेगी। तब अजीज आकर बड़ी तैयारी करके प्रर्दशन, जूलुस करेगा। प्रशासन यानि न्यायदाता अगर उससे भी नहीं जागे, तो राजनैतिक दल उसके आगे क्या कर सकता है ? या क्या करना चाहिए ? यह एक बड़ा प्रश्न चिन्ह है।
आदिवासी, हरिजन, दलितों की जूलुसों पर, मजदूर वर्ग के जूलुसों का किस प्रकार से दमन होता आया है, सभी जानते है। देश में आदिवासियों का सामुहिक कत्ल तक इन जूलुसों में किया जाता रहा है। निर्ममता पूर्वक लाठियाँ बरसाई गई है। गोलियाँ चलाई गई हैं। एक नहीं इसके कई उदाहरण हैं। झारखण्ड में तो सिर्फ झारखण्ड के नाम पर मीटिंग या सभा करने पर ही नरसंहार किए गए है।
तो आखिर कोई क्या करे। अन्याय के खिलाफ शोषण के विरूद्ध वह भी सरकारी शोषण के विरूद्ध झारखण्ड का आदमी क्या करें ? किस स्तर पर और कौन सी लड़ाई लड़े, जिससे उन्हें, न्याय मिल सके। शोषण से मुक्ति मिल सके।
एक ही रास्ता बचता है। वह रास्ता बहुत कठिन है। उस रास्ते पर चलने के लिए बहुत बड़े हिम्मत की जरूरत पड़ती है। वह रास्ता तो यही है कि सीधे शोषणकर्त्ता पर वार हो। उसे शारीरिक क्षति पहुँचाई जाय। जान का डर पैदा किया जाय। जान है तो जहान है। इसका अहसास उस जुल्मी के अन्दर हो। तभी वह भयभीत होगा, डरेगा, अन्याय करने से। शोषण करने से। पर इस रास्ते पर कमजोर व्यक्तियों को चलाना, उनमें वह संघर्ष का माद्दा पैदा करना, सीधी कार्यवाही के लिए उन्हें आगे बढ़ाना, कितना कठिन काम हो सकता है यह नेतृत्व कर्त्ता ही जान सकता है। भयभीत, डरे हुए, दबे हुए, कुचले हुए लोगों के लिए सर उठाकर चलना ही कठिन होता है। जो हाथ जोड़े रहते है, या अपने हाथ बगलों में दबाए, सर झुकाए धीमी आवाज में बोलने के आदी है, उन्हें सर सीधा करके, सीना तान करके हाथ ऊपर उठाकर नारें तक दिलवाना कठिन काम होता है। उन हाथों में कुछ कर गुजरने के लिए स्पंदन पैदा करना तो बहुत ही कठिन काम है।
झारखण्ड में कोई रास्ता नहीं बचा था। अभिशप्त झारखण्ड में आदमी अपने आप को नहीं पहचान रहा था। ऐसी परिस्थिति में बिनोद बिहारी महतो के अंदर ऐसी सोच किस प्रकार पैदा हुई, यह एक अनुसंधान का विषय हो सकता है। है भी।
1970 की एक दुपहरिया थी। पाँच छः आदिवासी-संथाल जाति के लोग बिनोद बिहारी महतो के निवास पर आए थे। उन दिनों बिनोद बाबू हीरापुर, धनबाद शहर में रेजिस्ट्री ऑफिस के निकट एक मकान में किराए पर रहा करते थे। कचहरी से वे दोपहर को लोटे थे। मार्निग कोर्ट था। वरांडे में आदिवासी जमीन पर बैठे हुए थे। दुबले-पतले। देखने से ही कुपोषण का शिकार से लगते थे। शरीर पर एक छोटी धोती लपेटे थे। आँख धँसी हुई। काले लोग। हाथों में छोटी सा टाँगी। या फिर छोटी लाठी थी। चुपचाप थे। यहाँ तक कि जब बिनोद बाबू ने उन्हें थोड़ी देर रूकने को कहा तो भी वे कुछ नहीं बोले।
दस मिनट के बाद बिनोद बाबू उन लोगों के पास आए और अपने बैठक खाना जो उनके वकालत का भी दफ्तर था, उन्हें उसमें बुला ले गये। उन्होंने उनकी समस्या पूछी स्थानीय कुड़माली भाषा में। संथाल कुरमाली समझते भी है, और बोलते भी है। उन आदिवासी संथालों ने कहा कि उनकी जमीन का जो कागजात उनके पास है, उसमें दखल का जो घर है यानि कालम है, उसमें चौधरी का नाम, लिखा हुआ है, जबकि मालिक संथालों को दिखाया गया है तथा जमीनें उनके दखल-कब्जे में भी है। वे ही धान उगाते हैं। खेत जोतते हैं। काटते हैं। पर धान को काटने के बाद चौधरी के खलिहान में ले जाकर जमा कर देते हैं। ऐसा इसलिए करना पड़ता है कि उन्हें चौधरी का कर्ज चुकाना है।
यह टुण्डी प्रखंड जिला धनबाद के गाँव पोखरिया की बात है। बिनोद बाबू ने उन आदिवासियों से पुछा कि कब उन लोगों ने कर्ज लिया था और कितना लिया था। जबाव मिला कि उनलोगों के पिताजी ने वर्षो पूर्व दो सौ रूपया कर्ज लिया और वह जमान चौधरी को सोंप दिया था। बंधक रख दिया था। बचपन से ही उनलोगों ने देखा है कि उनके बाप-दादे भी अपना धान चौधर के खलिहान में पहुँचाते रहे थे। उनकी ही जमीन। वे ही खती करते हैं। वे ही धान भी आज तक देते आए हैं, पर अभी तक खेत बंधक से मुक्त नहीं हो पाया चौधरी कहता है कि अभी सूद ही नहीं चुका है।
बिनोद बाबू कुछ सोच रहे थे। आदिवासियों ने उनसे गिड़गिड़ाकर कहा कि वे ऐसी व्यवस्था कर दे ताकि दखल के घर में उनका नाम सरकार चढ़ा दें और जमीन उनकी हो जाय। आदिवासियों की इस समझ पर बिनोद बाबू को आश्चर्य नहीं हुआ। इस प्रकार के सैकड़ो मामले उनकी नजर में आ चुके थे। पर तबतक वे कोई रास्ता निकाल नहीं पाये थे। अगर कोर्ट में मुकदमा दायर करें तो क्या नतीजा निकलेगा, उन्हें मालूम था। ये आदिवासी कोर्ट दौड़ते दौड़ते ही थक जाएगें। पर मिलेगा कुछ नहीं। आर्थिक हालात उन आदिवासियों की स्पष्ट थी। उनके पहनावे, उनका चेहरा ही उनकी कहानी कह रहा था।
उन्होंने बहुत सोचने के बाद कहा कि तुम लोग एक काम करो। इस बार तुमलोग खेत जोतो। धान लगावो। काटो। काटने के बाद धान को चौधरी के खलिहान में जमा मत करो। उस धान को अपने धर में ले जाकर रख दो। सरकार खुद-ब-खुद दखल के धर में तुम्हारा नाम लिख देगा। और कुछ करने की आवश्यकता नहीं है।
आदिवासियों को यह काम बड़ा आसान लगा। पर बिनोद बाबू जानते थे कि आदिवासी अगर ऐसा कर देते हैं तो उसके बाद क्या हो सकता है। दमन-चक्र किस प्रकार उन पर चलाया जायेगा। पर देखें तो आदिवासी क्या करते है, यह सोचकर उन्होंने उनको चले जाने को कहा और फिर धान काट लेने के बाद उनसे मिलने को कह दिया। इसके बाद शुरू हो गया, झारखंड का प्रसिद्ध “धान-कटनी” आन्दोलन। उन आदिवासियों ने वही किया जो बिनोद बाबू ने कहा था। उसकी देखा-देखी गाँव के दूसरे आदिवासियों ने जिनके जमीनें बधंक थी, वही किया। बगल के गाँवों में भी वही काम शुरू हो गया। उसी वर्ष इस कार्य ने एक आन्दोलन का रूप ले लिया। महाजनों, जमींदारों, सूदखोरों को कुछ समझ ही नहीं आया। वे सकते में आ गये। पुलिस को सक्रिय किया गया। दमन शुरू हुआ। मुकदमें दायर होने लगे। पर उसके बाद स्वतः ही आदिवासी लोग संगठीत होने लग गये। मीटिंग करने लगे। अपनी रक्षा के लिए बिनोद बाबू को बुलाने लगे। आदिवासियों के झुंड़ के झुंड़ तीर-धनुष, टाँगी से लैस होकर घूमने लगे। बड़े-बड़े जूलुस बिनोद बाबू के नेतृत्व में होने लगे।

Sunday, November 7, 2010

झामुमो में दो धाराओं का जन्म

दुर्भाग्य ने झारखण्ड आन्दोलन का साथ कभी नहीं छोड़ा। झारखण्ड आन्दोलन एक तरफ तो बिनोद बिहारी महतो के दिशा-निर्देश तथा विचार धारा के सहारे आगे बढ़ने लगा, तो दूसरी तरफ उनकी इमानदारी ने राजनीति में एक नये आयाम की सृष्टि की। बिना पैसे के चुनाव लड़ो। मतदाताओं को प्रलोभन देकर नहीं, समझदारी देकर चुनाव लड़ो। पर झारखण्ड मुक्ति मोर्चा में घुन उसके गठन के बाद से ही लगने लगा था। 1974 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण का सामाजवादी काँग्रेस-विरोधी आन्दोलन जो जे0 पी0 आन्दोलन के नाम से मशहूर हुआ। वह आन्दोलन तेजी पर था। काँग्रेस की सरकार जो केन्द्र तथा बिहार दोनों जगहों पर काबिज थी, ने इस आन्दोलन के दमन की पूरी व्यवस्था की। नये-नये कानून बनाए गये। मेंटटिनेन्स ऑफ इन्टरनल सेक्यूरिटी एक्ट बना। इधर श्रीमती इंदिरा गाँधी की सरकार ने देश में आपातकाल लगा दिया। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा, मासस, कम्यूनिष्ट पार्टी, जनसंघ आदि सभी काँग्रेस विरोधी पार्टी एक जुट होकर इस आपातकाल में भी काँग्रेस का विरोध कर रही थी। दर्जनों केस-मुकदमें बिनोद बिहारी महतो आदि नेताओं पर लादें गये। आपातकाल के लागू होने के ठीक पहले बिनोद बिहारी महतो को मीसा के तहत मार्च 1974 में गिरफ्तार कर लिया गया। उसी प्रकार शक्ति नाथ, सदानन्द झा, पुनित महतो, चूड़ामण महतो, हीरामण महतो, ए0 के0 राय, के0 एस0 चटर्जी आदि नेताओं को उत्तरी छोटानागपुर में गिरफ्तार किया गया, जिनका संबंध झारखण्ड आन्दोलन से रहा था। उसके अलावा भी छत्रुराम महतो इत्यादि जनसंघ के नेताओं को भी इस क्षेत्र से गिरफ्तार किया गया। इनका विवरण देना आवश्यक नहीं। यह बात सर्व विदित है, कि पूरे झारखण्ड क्षेत्र में सैकड़ों की तादाद में छोटे-बड़े विभिन्न राजनैतिक दलों के नेताओं को आपातकाल के दौरान गिरफ्तार किया गया था।
पर जो सबसे आश्चर्य की बात हुई, वह यह थी कि झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के महामंत्री शिबू सोरेन आपातकाल में जेल नहीं गये। क्या उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया ? और अगर गिरफ्तार किया गया था तो तुरंत छोड़ा कैसे गया। पाया गया कि शिबू सोरेन ने बिहार के तत्कालिन मुख्यमंत्री जगरन्नाथ मिश्रा से मिलकर समझौता कर लिया तथा काँग्रेस की नीतियों का समर्थन कर दिया। इस प्रकार काँग्रेस को समर्थन देने एवं काँग्रेस विरोधियों से अलग हो जाने के कारण शिबू सोरेन जेल जाने से बच गये। आपात काल में इसी कारण 1975 में चार फरवरी का झारखण्ड मुक्ति मोर्चा का स्थापना दिवस शिबू सोरेन ने अलग से टुण्डी मे मनाया जिसमें बतौर मुख्य अतिथि जगरनाथ मिश्रा शरीक हुए। धनबाद के गोल्फ मैदान में स्थापना दिवस मनाने के लिए कोई बड़ा नेता नहीं बचा था, सभी जेल की हवा खा रहे थे। उस साल राज किशोर महतो के नेतृत्व में वहाँ स्थापना दिवस मनाया गया। फिर भी भीड़ उमड़ पड़ी थी।
शिबू सोरेन ने आपात काल 1975 में जो बिनोद बाबू का साथ छोड़ा तो सीधे काँग्रेस में शामिल हो गये और वहीं जम गये। करीब तीन वर्षो तक बिनोद बाबू अकेले रहे एवं आन्दोलन करते रहे। उनके सहयोगी ऐ0 के0 राय रह गये थे। श्री सोरेन 1977 के लोक-सभा चुनाव तक काँग्रेस के साथ रहे।
1977 में जे0 पी0 आन्दोलन के समय लोक-सभा का चुनाव आया तो बिनोद बिहारी महतो एवं ऐ0 के0 राय को गिरिडीह एवं धनबाद लोक-सभा से चुनाव लड़वाने का फैसला लोक नायक जय प्रकाश नारायण ने ले लिया था। उस समय जनसंघ आदि पाटियों ने मिलकर “जनता पार्टी” बनाई थी।
व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा हमेशा से ही एकता में बाधक रही है। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से श्री ऐ0 के0 राय भी ग्रस्त हो गये एवं उनके समर्थकों ने धनबाद लोक-सभा सीट के लिए जनता पार्टी का समर्थन काँग्रेस के विरूद्ध श्री राय के लिए ले लिया। गिरिडीह की सीट में कुछ ऐसी हालात उनके समर्थकों ने पैदा किया कि बिनोद बाबू को बहला फुसला कर पटना से धनबाद वापस ले आया गया और वह समर्थन रामदास सिंह जी को गिरिडीह लोक-सभा के लिए मिला। ऐसा बिनोद बाबू के समर्थक दल मासस के तत्कालीन महासचिव उमाशंकर शुक्ल एवं के0 पी0 भट्ट ने किया श्री राय जेल में थे और बिनोद बाबू को भी वहाँ से हटा दिया गया था। जो लोग सीटों पर बात करने गये थे उन्होनें राय के लिए सीट माँग ली, पर बिनोद बाबू के लिए नहीं। 1977 का चुनाव बिनोद बाबू अकेले लड़े। उस लोक सभा चुनाव में काँग्रेस के टिकट से डा0 इम्तियाज अहमद (डा0 शब्बा अहमद के पिता ) गिरिडीह से लड़ रहें थे। शिबू सोरेन इस चुनाव में काँग्रेस की तरफ से खुलकर प्रचार-प्रसार कर रहें थे। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के उम्मीदवार तीर-धनुष चिन्ह से चुनाव लड़ने वाले पार्टी के अध्यक्ष बिनोद बाबू के खिलाफ शिबू सोरेन काँग्रेस के उम्मीदवार को जिताने में लगे थे। इधर ऐ0 के0 राय अपने को संयुक्त उम्मीद्वार बताकर लड़ रहें थे और बिनोद बाबू के समर्थकों शिबा महतो बगैरह को लेकर बिनोद बाबू का विरोध गिरिडीह में कर रहें थे एवं साझा उम्मीद्वार रामदास सिंह का समर्थन कर थे।
झामुमो के शुरूआती दिनों में ही इसे एक जबरजस्त झटका लगा। पर बिनोद बाबू ने इन बातों को बहुत गहराई से नहीं लिया। पुनः अपने काम में लग गये। हॉलाकि उसी साल नवम्बर के महिने में उन्हें प्रथम बार दिल का दौरा पड़ा।
1977 के लोक-सभा चुनाव में काँग्रेस की बुरी तरह हार हुई। श्रीमती इन्दिरा गाँधी स्वयं चुनाव हार गई। केन्द्र में जनता पार्टी की सरकार बन गई। शिबू सोरेन फिर डर गये एवं इधर-उधर भटकने लगे। फिर धनबाद लोटे एवं श्री ऐ0 के0 राय को पकड़ा। ऐ0 के0 राय के अनुरोध करने पर बिनोद बाबू ने पुनः शिबू सोरेन को दुमका यानि संथाल परगना भेज दिया। टुंडी के पोखरिया आश्रम में अब शिबू सोरेन नहीं जा सकते थे, क्योंकि काँग्रेस में शामिल होने एवं बिनोद बाबू को छोड़ने के कारण वहाँ आदिवासी समर्थक बहुत गुस्से में थे।
फिर 1980 के आम चुनाव के पहले से ही इस बात के संकेत मिलने लग गये थे कि पुराने आदिवासी (जनजाति) नेताओं की तरह ही शिबू सोरेन काँग्रेस की निकटता प्राप्त करना चाहते थे, उससे समझौता करके चलाना चाहते थे, विरोध करके नहीं। यही बात श्री राय एवं बिनोद बाबू को पसंद नहीं थी। 1980 के विधान सभा चुनाव में झारखण्ड मुक्ति मोर्चा एवं मासस को चौदह सीटें मिली थी। शिबू सोरेन चुँकि संथाल परगना देख रहे थे, उन्होनें चुपके से काँग्रेस से भीतर-भीतर तालमेल कर लिया, पर उत्तरी छोटानागपुर में सीटें काँग्रेस के विरोध में लड़ी गई।
1980 के लोक सभा चुनाव में श्री सोरेन से काँग्रेस से गुपचुप समझौता कर लिया और दुमका लोक सभा सीट से मात्र तीन हजार मत से जीत गये। श्री राय 1977 में ही सांसद बन गये थे। फिर 1980 में भी धनबाद से जीते। बिनोद बाबू 1980 में भी गिरिडीह लोक-सभा चुनाव हार गये।
1983, जनवरी में हुए महाधिवेशन के बाद जब बिनोद बाबू ने पार्टी का अध्यक्ष पद छोड़ा तो शिबू-सोरेन, शैलेन्द्र महतो, सूरज मंडल आदि ने गुटबाजी शुरू कर दी। बिनोद बाबू इन बातों की खबर भी रखना नहीं चाहते थे। धीरे-धीरे यह परिस्थिति ऐसी पैदा हो गई कि झामुमो में दो फाँक हो गया। बिनोद बाबू के तरफ शहीद शक्ति नाथ महतो, कॉ0 ऐ0 के0 राय (सांसद धनबाद) के0 एस0 चटर्जी (निरसा विधायक), आनन्द महतो (सिन्दरी विधायक), टेकलाल महतो (मांडू विधायक), शंकर किशोर महतो (लाठाटाँड़), शिबा महतो (डूमरी विधायक) आदि हो गये तथा एक अलग ही गुट बनाने का निश्चय किया गया। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा (बिनोद) गुट से बिनोद बाबू के साथ रहने वालों, साथ देने वालों को जाना जाने लगा। विधिवत् रूप से इस दल का पंजीकरण करने के लिए चुनाव आयोग में लिखा गया। पर इसी बीच शिवा महतो जी के प्रयास से डुमरी में फिर से दोनों गुट एक साथ हो गये एवं फिर झामुमो के बैनर में कार्य करने लगे।
बिनोद बाबू के पुत्र के उम्र के थे सभी, सिवाय, शिवा महतो के। बिनोद बाबू तो सब कुछ भूल गये, पर इन लोगों ने अपनी आदत नहीं छोड़ी।
वर्ष 1988 में जब “झारखण्ड समन्वय समिति” ने रैली निकालने की तैयारी की थी, तो अर्जुन राम महतो, शैलेन्द्र महतो आदि ने शिबू सोरेन, सूरज मंडल के कहने पर रामगढ़ में काला झंड़ा दिखाकर बिनोद बाबू का विरोध किया था तथा शिबू सोरेन, सूरज मंडल, शैलेन्द्र महतो इस समिति से दूर रहे और आन्दोलन में कोई हिस्सा नहीं लिया।
ग्यातव्य हो कि इस समिति में करीब बावन पाटियाँ शामिल थी, एवं 15 नवम्बर 1988 को मोराबादी मैदान राँची में निकाली गई थी। यह एक ऐतिहासिक रैली थी जिसने केन्द्र सरकार का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था।
वर्ष 1989 में जब दुमका के हिजला में पार्टी का तृतीय महाधिवेशन बुलाया गया उसमें बिनोद बाबू की अनुपस्थिति में, उनके विरूद्ध तत्कालीन महामोत्री शैलेन्द्र महतो ने अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया और उसमें जमकर बिनोद बाबू की आलोचना की। उस प्रतिवेदन में उन्हें सामंतवादी चरित्र वाला, पैसे के बल पर राजनीति करने वाला, विघटनकारी, व्यक्तिगत लाभ के लिए राजनीति करने वाला कहा। शैलेन्द्र महतो ने उस रिपोर्ट में यह भी कहा है कि वर्ष 1983 के सरायढेला, धनबाद में हुए महाधिवेशन में पार्टी का शुद्धिकरण करने के लिए बिनोद बिहारी महतो को निष्काषित किया गया था। यह निष्काषण की बात भी झूठी थी। उन्होनें स्वयं पद छोड़ा था।
शैलेन्द्र महतो वर्ष 1978 में पार्टी में शामिल हुए थे। जब धनबाद आए थे, तो एक हाफ कमीज एवं पैजामा पहने थे तथा कंधे पर एक झोला टंगा हुआ था।

झामुमो में दो धाराओं का जन्म

दुर्भाग्य ने झारखण्ड आन्दोलन का साथ कभी नहीं छोड़ा। झारखण्ड आन्दोलन एक तरफ तो बिनोद बिहारी महतो के दिशा-निर्देश तथा विचार धारा के सहारे आगे बढ़ने लगा, तो दूसरी तरफ उनकी इमानदारी ने राजनीति में एक नये आयाम की सृष्टि की। बिना पैसे के चुनाव लड़ो। मतदाताओं को प्रलोभन देकर नहीं, समझदारी देकर चुनाव लड़ो। पर झारखण्ड मुक्ति मोर्चा में घुन उसके गठन के बाद से ही लगने लगा था। 1974 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण का सामाजवादी काँग्रेस-विरोधी आन्दोलन जो जे0 पी0 आन्दोलन के नाम से मशहूर हुआ। वह आन्दोलन तेजी पर था। काँग्रेस की सरकार जो केन्द्र तथा बिहार दोनों जगहों पर काबिज थी, ने इस आन्दोलन के दमन की पूरी व्यवस्था की। नये-नये कानून बनाए गये। मेंटटिनेन्स ऑफ इन्टरनल सेक्यूरिटी एक्ट बना। इधर श्रीमती इंदिरा गाँधी की सरकार ने देश में आपातकाल लगा दिया। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा, मासस, कम्यूनिष्ट पार्टी, जनसंघ आदि सभी काँग्रेस विरोधी पार्टी एक जुट होकर इस आपातकाल में भी काँग्रेस का विरोध कर रही थी। दर्जनों केस-मुकदमें बिनोद बिहारी महतो आदि नेताओं पर लादें गये। आपातकाल के लागू होने के ठीक पहले बिनोद बिहारी महतो को मीसा के तहत मार्च 1974 में गिरफ्तार कर लिया गया। उसी प्रकार शक्ति नाथ, सदानन्द झा, पुनित महतो, चूड़ामण महतो, हीरामण महतो, ए0 के0 राय, के0 एस0 चटर्जी आदि नेताओं को उत्तरी छोटानागपुर में गिरफ्तार किया गया, जिनका संबंध झारखण्ड आन्दोलन से रहा था। उसके अलावा भी छत्रुराम महतो इत्यादि जनसंघ के नेताओं को भी इस क्षेत्र से गिरफ्तार किया गया। इनका विवरण देना आवश्यक नहीं। यह बात सर्व विदित है, कि पूरे झारखण्ड क्षेत्र में सैकड़ों की तादाद में छोटे-बड़े विभिन्न राजनैतिक दलों के नेताओं को आपातकाल के दौरान गिरफ्तार किया गया था।
पर जो सबसे आश्चर्य की बात हुई, वह यह थी कि झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के महामंत्री शिबू सोरेन आपातकाल में जेल नहीं गये। क्या उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया ? और अगर गिरफ्तार किया गया था तो तुरंत छोड़ा कैसे गया। पाया गया कि शिबू सोरेन ने बिहार के तत्कालिन मुख्यमंत्री जगरन्नाथ मिश्रा से मिलकर समझौता कर लिया तथा काँग्रेस की नीतियों का समर्थन कर दिया। इस प्रकार काँग्रेस को समर्थन देने एवं काँग्रेस विरोधियों से अलग हो जाने के कारण शिबू सोरेन जेल जाने से बच गये। आपात काल में इसी कारण 1975 में चार फरवरी का झारखण्ड मुक्ति मोर्चा का स्थापना दिवस शिबू सोरेन ने अलग से टुण्डी मे मनाया जिसमें बतौर मुख्य अतिथि जगरनाथ मिश्रा शरीक हुए। धनबाद के गोल्फ मैदान में स्थापना दिवस मनाने के लिए कोई बड़ा नेता नहीं बचा था, सभी जेल की हवा खा रहे थे। उस साल राज किशोर महतो के नेतृत्व में वहाँ स्थापना दिवस मनाया गया। फिर भी भीड़ उमड़ पड़ी थी।
शिबू सोरेन ने आपात काल 1975 में जो बिनोद बाबू का साथ छोड़ा तो सीधे काँग्रेस में शामिल हो गये और वहीं जम गये। करीब तीन वर्षो तक बिनोद बाबू अकेले रहे एवं आन्दोलन करते रहे। उनके सहयोगी ऐ0 के0 राय रह गये थे। श्री सोरेन 1977 के लोक-सभा चुनाव तक काँग्रेस के साथ रहे।
1977 में जे0 पी0 आन्दोलन के समय लोक-सभा का चुनाव आया तो बिनोद बिहारी महतो एवं ऐ0 के0 राय को गिरिडीह एवं धनबाद लोक-सभा से चुनाव लड़वाने का फैसला लोक नायक जय प्रकाश नारायण ने ले लिया था। उस समय जनसंघ आदि पाटियों ने मिलकर “जनता पार्टी” बनाई थी।
व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा हमेशा से ही एकता में बाधक रही है। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से श्री ऐ0 के0 राय भी ग्रस्त हो गये एवं उनके समर्थकों ने धनबाद लोक-सभा सीट के लिए जनता पार्टी का समर्थन काँग्रेस के विरूद्ध श्री राय के लिए ले लिया। गिरिडीह की सीट में कुछ ऐसी हालात उनके समर्थकों ने पैदा किया कि बिनोद बाबू को बहला फुसला कर पटना से धनबाद वापस ले आया गया और वह समर्थन रामदास सिंह जी को गिरिडीह लोक-सभा के लिए मिला। ऐसा बिनोद बाबू के समर्थक दल मासस के तत्कालीन महासचिव उमाशंकर शुक्ल एवं के0 पी0 भट्ट ने किया श्री राय जेल में थे और बिनोद बाबू को भी वहाँ से हटा दिया गया था। जो लोग सीटों पर बात करने गये थे उन्होनें राय के लिए सीट माँग ली, पर बिनोद बाबू के लिए नहीं। 1977 का चुनाव बिनोद बाबू अकेले लड़े। उस लोक सभा चुनाव में काँग्रेस के टिकट से डा0 इम्तियाज अहमद (डा0 शब्बा अहमद के पिता ) गिरिडीह से लड़ रहें थे। शिबू सोरेन इस चुनाव में काँग्रेस की तरफ से खुलकर प्रचार-प्रसार कर रहें थे। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के उम्मीदवार तीर-धनुष चिन्ह से चुनाव लड़ने वाले पार्टी के अध्यक्ष बिनोद बाबू के खिलाफ शिबू सोरेन काँग्रेस के उम्मीदवार को जिताने में लगे थे। इधर ऐ0 के0 राय अपने को संयुक्त उम्मीद्वार बताकर लड़ रहें थे और बिनोद बाबू के समर्थकों शिबा महतो बगैरह को लेकर बिनोद बाबू का विरोध गिरिडीह में कर रहें थे एवं साझा उम्मीद्वार रामदास सिंह का समर्थन कर थे।
झामुमो के शुरूआती दिनों में ही इसे एक जबरजस्त झटका लगा। पर बिनोद बाबू ने इन बातों को बहुत गहराई से नहीं लिया। पुनः अपने काम में लग गये। हॉलाकि उसी साल नवम्बर के महिने में उन्हें प्रथम बार दिल का दौरा पड़ा।
1977 के लोक-सभा चुनाव में काँग्रेस की बुरी तरह हार हुई। श्रीमती इन्दिरा गाँधी स्वयं चुनाव हार गई। केन्द्र में जनता पार्टी की सरकार बन गई। शिबू सोरेन फिर डर गये एवं इधर-उधर भटकने लगे। फिर धनबाद लोटे एवं श्री ऐ0 के0 राय को पकड़ा। ऐ0 के0 राय के अनुरोध करने पर बिनोद बाबू ने पुनः शिबू सोरेन को दुमका यानि संथाल परगना भेज दिया। टुंडी के पोखरिया आश्रम में अब शिबू सोरेन नहीं जा सकते थे, क्योंकि काँग्रेस में शामिल होने एवं बिनोद बाबू को छोड़ने के कारण वहाँ आदिवासी समर्थक बहुत गुस्से में थे।
फिर 1980 के आम चुनाव के पहले से ही इस बात के संकेत मिलने लग गये थे कि पुराने आदिवासी (जनजाति) नेताओं की तरह ही शिबू सोरेन काँग्रेस की निकटता प्राप्त करना चाहते थे, उससे समझौता करके चलाना चाहते थे, विरोध करके नहीं। यही बात श्री राय एवं बिनोद बाबू को पसंद नहीं थी। 1980 के विधान सभा चुनाव में झारखण्ड मुक्ति मोर्चा एवं मासस को चौदह सीटें मिली थी। शिबू सोरेन चुँकि संथाल परगना देख रहे थे, उन्होनें चुपके से काँग्रेस से भीतर-भीतर तालमेल कर लिया, पर उत्तरी छोटानागपुर में सीटें काँग्रेस के विरोध में लड़ी गई।
1980 के लोक सभा चुनाव में श्री सोरेन से काँग्रेस से गुपचुप समझौता कर लिया और दुमका लोक सभा सीट से मात्र तीन हजार मत से जीत गये। श्री राय 1977 में ही सांसद बन गये थे। फिर 1980 में भी धनबाद से जीते। बिनोद बाबू 1980 में भी गिरिडीह लोक-सभा चुनाव हार गये।
1983, जनवरी में हुए महाधिवेशन के बाद जब बिनोद बाबू ने पार्टी का अध्यक्ष पद छोड़ा तो शिबू-सोरेन, शैलेन्द्र महतो, सूरज मंडल आदि ने गुटबाजी शुरू कर दी। बिनोद बाबू इन बातों की खबर भी रखना नहीं चाहते थे। धीरे-धीरे यह परिस्थिति ऐसी पैदा हो गई कि झामुमो में दो फाँक हो गया। बिनोद बाबू के तरफ शहीद शक्ति नाथ महतो, कॉ0 ऐ0 के0 राय (सांसद धनबाद) के0 एस0 चटर्जी (निरसा विधायक), आनन्द महतो (सिन्दरी विधायक), टेकलाल महतो (मांडू विधायक), शंकर किशोर महतो (लाठाटाँड़), शिबा महतो (डूमरी विधायक) आदि हो गये तथा एक अलग ही गुट बनाने का निश्चय किया गया। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा (बिनोद) गुट से बिनोद बाबू के साथ रहने वालों, साथ देने वालों को जाना जाने लगा। विधिवत् रूप से इस दल का पंजीकरण करने के लिए चुनाव आयोग में लिखा गया। पर इसी बीच शिवा महतो जी के प्रयास से डुमरी में फिर से दोनों गुट एक साथ हो गये एवं फिर झामुमो के बैनर में कार्य करने लगे।
बिनोद बाबू के पुत्र के उम्र के थे सभी, सिवाय, शिवा महतो के। बिनोद बाबू तो सब कुछ भूल गये, पर इन लोगों ने अपनी आदत नहीं छोड़ी।
वर्ष 1988 में जब “झारखण्ड समन्वय समिति” ने रैली निकालने की तैयारी की थी, तो अर्जुन राम महतो, शैलेन्द्र महतो आदि ने शिबू सोरेन, सूरज मंडल के कहने पर रामगढ़ में काला झंड़ा दिखाकर बिनोद बाबू का विरोध किया था तथा शिबू सोरेन, सूरज मंडल, शैलेन्द्र महतो इस समिति से दूर रहे और आन्दोलन में कोई हिस्सा नहीं लिया।
ग्यातव्य हो कि इस समिति में करीब बावन पाटियाँ शामिल थी, एवं 15 नवम्बर 1988 को मोराबादी मैदान राँची में निकाली गई थी। यह एक ऐतिहासिक रैली थी जिसने केन्द्र सरकार का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था।
वर्ष 1989 में जब दुमका के हिजला में पार्टी का तृतीय महाधिवेशन बुलाया गया उसमें बिनोद बाबू की अनुपस्थिति में, उनके विरूद्ध तत्कालीन महामोत्री शैलेन्द्र महतो ने अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया और उसमें जमकर बिनोद बाबू की आलोचना की। उस प्रतिवेदन में उन्हें सामंतवादी चरित्र वाला, पैसे के बल पर राजनीति करने वाला, विघटनकारी, व्यक्तिगत लाभ के लिए राजनीति करने वाला कहा। शैलेन्द्र महतो ने उस रिपोर्ट में यह भी कहा है कि वर्ष 1983 के सरायढेला, धनबाद में हुए महाधिवेशन में पार्टी का शुद्धिकरण करने के लिए बिनोद बिहारी महतो को निष्काषित किया गया था। यह निष्काषण की बात भी झूठी थी। उन्होनें स्वयं पद छोड़ा था।
शैलेन्द्र महतो वर्ष 1978 में पार्टी में शामिल हुए थे। जब धनबाद आए थे, तो एक हाफ कमीज एवं पैजामा पहने थे तथा कंधे पर एक झोला टंगा हुआ था।

Sunday, October 31, 2010

झामुमो के आन्दोलन का क्रमिक विकास

सभी को ज्ञात है कि 1973 से लेकर बिनोद बिहारी महतो के स्वर्गवास तक (18-12-91) झारखंड मुक्ति मोर्चा पूरे झारखंड क्षेत्र में एक सशक्त राजनैतिक दल के रूप में उभर चुका था। धनबाद जिले से लेकर पूरे उत्तरी छोटानागपुर, दक्षिणी छोटानागपुर एवं संथाल परगना में एक मजबूत संगठन बन चुका था। न सिर्फ इतना ही, बल्कि पश्चिम बंगाल एवं उड़ीसा के समीपवर्ती झारखंड क्षेत्र में यह बहुत लोकप्रिय बन चुका था।
झारखंड मुक्ति मोर्चा की सफलता के पीछे बिनोद बिहारी महतो की विचार-धारा रही। उनका दिशा-निर्देश रहा। उनकी जोखीम उठाने की प्रवृति रही। पार्टी को शुरू के दशवर्षो तक आर्थिक मदद इन्होने किया। उन्होने प्रतिभाओं को तलाशा एवं उन्हें तरासने का काम किया। अपना स्वयं का पैसा खर्च करके नेताओं को आगे बढ़ाया, कार्यकर्त्ता तैयार किए। उनका नेतृत्व ईमानदारी का था एवं पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़े थे। जैसा कि हमने पहले ही देख लिया है कि उन्होने उन वर्गो को एकत्रित करने का काम किया। जिन्हें वास्तव में परिवर्त्तन चाहिए था। उन्ही वर्गो-जातियों में से नेतृत्व पैदा किया। बिनोद बिहारी महतो ने झारखंड आन्दोलन के संकुचित आदिवासी चेहरे को, उसके जनजातीय छवि को बदल डाला। उसे एक विस्तृत आयाम दिया। इसमें आदिवासियों के साथ-साथ गैर-आदिवासी समूहों को भी शामिल किया। इन्होने झारखंड आन्दोलन में मजदूरों की भागीदारी भी सुनिश्चित की। उन्होनें इस आन्दोलन को न सिर्फ जातीय, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक आधार प्रदान किया। झारखंड की सभ्यता-सांस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए यहाँ के लोकगीतों, लोकनृत्यों, को आन्दोलन के रूप मे लिया। तो दूसरी ओर कल-कारखानों, कोलियारियों में नौकरी एवं रोजगार के लिए आन्दोलन चलाया। सांमतवादी विचार-धारा वाले सूदखोर, महाजनों के खिलाफ सशस्त्र आन्दोलन भी हुए।
चूँकि शिवाजी समाज द्वारा आन्दोलन बहुत आगे बढ़ाया जा चुका था और संथाल समाज द्वारा भी। अतः झारखंड मुक्ति मोर्चा सिर्फ दो वर्षो में स्थापित हो गया था।
इन आन्दोलनों में प्रमुख रहा झारखंड में विस्थापन की समस्या के विरूद्ध। 1978 के पहले केन्द्र सरकार ने विस्थापितों के नियोजन, पुर्नवास एवं नोकरी देने की कोई नीति नहीं बनाई थी। प्रथम बार 1978 से कोल कम्पनियों द्वारा इन विषयों पर नीतियाँ बनाई गई एवं नियोजन, पुर्नवास देने का काम शुरू किया गया। दामोदर भैली कॉरपोरेशन लिमिटेड को भी आन्दोलनों से मजबूर होकर विस्थापितों को नौकरी, रोजगार, ठीका आदि देने का काम शुरू करना पड़ा। इन सबके साथ-साथ कम्यूनिटी डेवलोपमेंट के नाम पर अगल-बगल के गाँवों में नागरिक सुविधाएँ मुहैय्या कराने का काम भी शुरू किया गया। सड़क, पानी, बिजली, विकास भवन, स्कूल आदि बनाने में औद्योगिक संस्थान अपनी थोड़ी-बहुत भागीदारी निभाने लगें।
इसके अलावे जो एक और प्रमुख आन्दोलन शुरू किया गया, वह था जंगल बचाओं आन्दोलन एवं विदेशी वृक्ष लगाना बंद करो का आन्दोलन। जंगलों में रहने वाले आदिवासी, गैर-आदिवासी सक्रिय हो उठे। जंगल विभाग के कर्मचारियों, अधिकारियों ने नंगा नाच मचा रखा था। अंधाधुंध लकड़ियों की कटाई इनके द्वारा कराई जा रही थी। साथ ही गाँव वालों को बिना वजह लकड़ी चोरी के इल्लजाम में पकड़कर जेल भेजा जाता था। अगर गाँव के लोग जलावन के लिए या अन्य छोटे-मोटे कृषि के उपकरण बनाने के लिए लकड़ी का प्रयोग करते तो उन्हें चोरी के इल्लजाम में जेल भेज दिया जाता। सदियों से झारखंड़ियों का जीवन जंगल-आधारित था। फल-फूल, पत्ते, लकड़ी का उपयोग करते आ रहे थे। पर इनके सारे अधिकार छीन लिए गये थे। अतः इस आन्दोलन का व्यापक प्रभाव पड़ा। विदेशी-वृक्षों को सरकार द्वारा खाली जमीनों पर लगाया जाता था, जो जमीनों को उपजाऊ नहीं, बल्कि सुखा देती थी। इन वृक्षों यूकलिप्टस आदि को काट डालने का अभियान चला। इसके अलावा फलदार वृक्षों को लगाने की माँग की जाने लगी। जंगलों के इलाकों में सरकारी तंत्रों के साथ गाँव वालों का मुकाबला भी हो जाता। कई बड़ी-बड़ी घटनाएँ भी घट गई, जिसमें पुलिस, जंगल गार्ड मारे गये तो गाँव वालों को भी गोलियों का निशाना बनाया गया। जंगलों में खासकर उग्रवादी आन्दोलन चलाये गये। सरकारी कर्मचारी, जंगल विभाग के अधिकारी ठेकेदार, भागने लगे थे।
इसके अलावे गाँवों में सूदखोरों, महाजनों द्वारा गैर कानूनी ढ़ंग से हड़पी गई जमीनों को वापस करने का जोरदार आन्दोलन किया गया। छोटानागपुर टेनेन्सी एक्ट तथा संथाल परगना टेनेन्सी एक्ट के अतिक्रमण की हालत में उन जमीनों पर रैयतों द्वारा जमान वापसी के लिए सीधे कार्यवाही की जाने लगी। कोर्ट-कचहरियों में गरीबों को न्याय मिलना असंभव था। अतः बिनोद बिहारी महतो ने उन जमानों पर पुनः कब्जा करने की रणनीति तैयार की। उन्होनें कई जिलों में वकीलों को प्रोत्साहित किया कि वे गरीब, आदिवासी, हरिजन, पिछड़े लोगों के मुकदमें बिना फीस लिए लड़े एवं उन्हें कानूनी सहायता दें। जमीन वापसी का आन्दोलन भी बड़ा व्यापक स्तर पर चला। “धान-कटनी” का आन्दोलन उस जमीन वापसी का आन्दोलन का एक हिस्सा था। गाँव के गरीब, आदिवासी, हरिजन, झारखंड मुक्ति मोर्चा के कार्यकर्त्ताओं द्वारा संगठित किए जाते और तीर-धनुष, लाठी-भाला, टाँगी आदि से लैस होकर खेतों पर डुगडुगी बजाते-बजाते धावा बोलते और खड़ी फसल को काट देते एवं उसे ढोकर सही व्यक्ति के घर पहुँचा देते।
सांस्कृतिक आन्दोलन भी चलाए गये। झारखंड की सभ्यता संस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए जगह-जगह “झूमर” प्रतियोगिता रखी जाने लगी। झूमर एक लोक नृत्य है जिसमें झूमर के गीत गाये जाते हैं। बाजा बजाने वाले होते हैं। ढोल, नगाड़ा, माँदर, करताल, शहनाई का होना आवश्यक है। इसमें बारह ताल यानि लय होते हैं। बारह प्रकार की अलग-अलग धूनों पर नाचा जाता है। नाचने के लिए विशेष तौर पर लड़के ही नर्तकियों का रूप धरते है। दो से छः तक नर्तकियों की संख्या होती है। यह लोक-नृत्य अखाड़े में खड़े होकर सम्पन्न किया जाता है। दर्शक इसके चारों तरफ बैठते है। झारखंड क्षेत्र का यह एक प्रसिद्ध लोक-नृत्य है जो पूरे झारखंड में महशूर है। पर्व-त्योहार के अवसर पर या फिर धान की फसल काट लेने के बाद जाड़े की रातों में रातभर झूमर नाचा जाता है। उसी प्रकार अन्य लोक-नृत्य “छऊ-नृत्य” है जो विश्व-प्रसिद्ध हो चुका है। इसी प्रकार के अन्य लोक गीतों एवं लोक-संगीतो, लोक-नृत्यों को बढ़ावा देने के लिए बिनोद बाबू ने व्यापक प्रोत्साहन दिया। स्वयं रात-रात भर जागकर कलाकारों को उत्हाहित करते। नतीजा यह निकला कि झारखंड के समूचे इलाके में, गाँव-गाँव में झारखंडी सभयता-संस्कृति पुर्नजीवित हो उठा एवं इसकी गूँज दूर-दूर तक आगे बढ़ने लगी। इसके साथ-साथ झारखंड क्षेत्र के पर्व-त्योहार करमा, सोहराई, गोहालपूजा, जीतिया, टुसू, जावा आदि शहरों में प्रवेश कर गये। उन्हें भी प्रोत्साहित किया गया। पूरे झारखंड क्षेत्र की अपनी एक पहचान है, वह भी विशिष्ट जो अन्य किसी की नहीं हैं। इस प्रकार के सांस्कृतिक आन्दोलन से झारखंडी अपने आप को पहचानने लगे। उनमें आत्म-विश्वास जगने लगा। औद्योगिकरण एवं बाहरी संस्कृति के दबाव से जो संकुचन आया था, वह दूर होने लगा और वे जो श्रेष्ठ होते हुए भी हीन भावना से ग्रस्त हो रहे थे, पुनः स्वयं को आत्म-विश्वास से भरा हुआ पाने लगे।
झारखंड क्षेत्र में कुछ ऐसे लोक नृत्य है जो “मारसल आर्ट” के स्वरूप है। इसमें एक प्रमुख है- “पैका” यानि ”पाइक”। इसमें खिलाड़ी ढाल तलवार (या लाठी) से लैस होता है। पैंरों में घुँघरू बाँध लेता है और सर पर पगड़ी। धोती को कस कर कमर में बाँधा जाता है। “पैका” में जो पारंगत हो जाता है वह अकेले ही दर्जन हमलावरों को एक साथ धूल चटा सकता है। इसके दाँव-पेंच ही ऐसे होते हैं। झारखंड में पहले कुड़ंमी-महतो लोगो के प्रत्येक गाँव में “पाइक” की ट्रेनिंग दी जाती थी। इसके लिए उस्ताद होते थे, गुरू होते थे और यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलता आता है। पर दुर्भाग्य से आज यह प्रायः लुप्त हो रहा है। इसी पैका का दूसरा स्वरूप “नटुआ नाच” है। अब ढाल की जगह गमछा, तलवार की जगह लाठी ने ले लिया है। इसमें बजने वाला बाजा विशिष्ट लय एवं ताल का होता है, जिसे सुनकर ही यहाँ का झारखंडी मैदान में कूद पड़ता है।
फिर झारखण्ड मुक्ति मोर्चा ने गाँव-गाँव में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए “अकिल-अखाड़े” चलाए। सुदूर गाँव में रात्री-पाठशालाएँ लालटेनों की रोशनी में चलायी जाने लगीं। शिक्षा के लिए भी अभियान या आन्दोलन चलाए गये। जिन परिवारों के बच्चे स्कूल नहीं जाते थे उन्हें प्रोत्साहित किया जाने लगा। उस समय गाँव में शिक्षा की कोई व्यवस्था ही नहीं थी। बिनोद बिहारी महतो ने स्वंय कुल मिलाकर कितने संस्थाने खोले, यह पता लगाया जा रहा है। पर चालीस संस्था का पता चला है। जिनमें मिडिल-स्कूल, हाई-स्कूल, डिग्री कॉलेज तथा विधि विद्यालय भी हैं। ये सम्पूर्ण झारखण्ड में जगह-जगह शिक्षण संस्थान खोलने के लिए लोगों को उत्साहित करते फिरते। अपनी कमाई का अधिकत्तर पैसा इन कॉलेजों एवं स्कूलों के भवन निर्माण शिक्षकों के वेतन के लिए दान दे दिया।
इधर गाँव के झगड़े गाँव में ही पंचायत बुलाकर सुलझाए जाने लगें। प्रत्येक गाँव में यह एक आन्दोलन के रूप में खड़ा होने लगा। झारखण्डी की जीवन-पद्धति भी यही थी। फिर अगर गाँवों में नहीं सुलझ पाते तो उन झगड़ों को नेताओं क पास ले जाया जाता। फिर बड़े पैमाने पर तीन-चार गाँव के लोग मिलकर बैठते एवं फैसला किया जाता। किसी-किसी मामलें में समस्या जब नहीं सुलझती, तो इसे बिनोद बाबू के पास लाया जाता। धीरे-धीरे ऐसी व्यवस्था कायम हो गई कि झारखंड के कई इलाकों में इस प्रकार से झगड़े निपटाने के केन्द्र बन गये और उन्हें लोग स्वतः जिला-कोर्ट, हाई-कोर्ट कहने लगे। यही कारण था कि सरकारी रिपोर्टो में यह बात दर्ज है कि झारखंड मुक्ति मोर्चा द्वारा समानान्तर सरकार चलाई जा रही थी, जिसका अपना पुलिस फोर्स है एवं कोर्ट-कचहरी है। इन कचहरियों में यानि बैठकों में आपराधिक मामले दीवानी मामले तथा शादी-व्याह, तलाक से जुड़े मामले सभी पर विचार विमर्श होता था। आपराधिक मामलों में ज्यादातर फाइन किया जाता था। कभी-कभी शारीरिक दंड दिया जाता था और अपराधी को लाठियों से पिटा जाता। या अन्य प्रकार से अपमानित या प्रताड़ित किया जाता। किसी-किसी गंभीर मामले में हुक्का पानी भी कुछ दिनों के लिए बंद कर दिया जाता यानि सामाजिक बहिष्कार किया जाता। किसी-किसी मामले में जो जमींदारी अत्याचार एवं सामंती अत्याचार के खिलाफ फैसला लिया जाता, उसमे “बिटलाहा” भी कर दिया जाता। बिटलाहा का मतलब होता था, उसे गाँव से उजाड़ देना। घर-द्वार को तोड़-फोड़ दिया जाता था।
इनके अलावे जो एक सबसे बड़ा पहलू झारखंड मुक्ति मोर्चा के आन्दोलन का रहा, वह था शराब-खोरी के खिलाफ संघर्ष। इसमें कार्यकर्त्ता सीधे शराब की भट्टियों पर धावा बोलते, तोड़फोड़ कर डालते। शराबियों को पकड़कर पीटते। उन्हें पानी में डूबा-डूबा कर उसका नशा तोड़ते। कार्यकर्त्ता पता लगाते कि कौन चोरी-छिपे इस धंधे में लिप्त है, उसका पता लगाते एवं उसे धंधे को छोड़ने के लिए मजबूर करते। गाँवों में औरतों के बीच जाते और उन्हें अपने-अपने शराबी पतियों की आदत छुड़ाने के लिए प्रोत्साहित करते। औरते इस आन्दोलन का समर्थन जोरदार ढंग से करती एवं अपने शराबी पतियों से लडती झगड़ती।
इस प्रकार इन आन्दोलनों ने बहुत सारे जुझारू, लड़ाकू कार्यकर्त्ता पैदा किए। पर समाज का शोषक-शासक वर्ग चुप नहीं बैठे रह सकता था। इन आन्दोलों को कुचलने के लिए पुलिस-प्रसाशन, जमींदार, सूदखोर, महाजन, माफिया, गुंडे सभी सक्रिय हो उठे। नतीजा यह हुआ कि कई बड़े-बड़े संघर्ष हुए। चोरी-छिपे कार्यकर्त्ताओं, नेताओं की हत्याएँ की जाने लगीं। घात लाकर इन आन्दोलनों के अगुआओं को खोजकर मारा जाने लगे। शहीदों की लम्बी कतारें हो गई। पर कार्यकर्त्ता और जनता भी प्रतिकार में उतर आई। और वर्षो तक दोनों तरफ से संघर्ष चलने लगा।
1975 में ही गोमो में जिला धनबाद के सदानन्द झा शहिद हो गये। उन्हें अकेले पाकर आतताइयों ने गोली मार दी। 1977 में शक्ति नाथ महतो टाटा सिजुआ में शहीद हो गये। उन्हें काँग्रेस के गुंडों ने दिन दहाड़े बम गोलियों से मार डाला। उसी प्रकार इस कोयलाचंल में रसीक हाँसदा, नेपाल रवानी आदि दर्जनों शहीद हुए।
1975 में गोमो की रेल नगरी में सदानन्द झा शहीद हुए तथा 1977 में टाटा-सिजूआ तेतुलमुड़ी के शक्ति नाथ महतो शहीद हुए। ये दो प्रमुख कार्यकर्त्ता नेताओं की शहादत के बाद तो मानों पूरे दक्षिणी छोटानागपुर में आन्दोलन में उफान आ गया। फिर 1987 में जमशेदपुर में झारखंड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष निर्मल महतो को भी आतताइयों ने मार डाला। उनकी शहादत के बाद तो मानों पूरे दक्षिणी छोटानागपुर में आग ही लग गई। इसके अलावे इचागढ़ के अजीत महतो, धनंजय महतो आदि शहीद हुए। गुवा में 1982 में प्रसिद्ध गोली कांड हुआ जिसे आज गुआ गोली कांड के रूप में याद किया जाता है, इसके अलावे अनेकों शहीद हुए। हजारों जेल गये। रिटायर्ड आर्मी के जवान कंडुलना की पुलीस इन्काउटर दिखा कर हत्या कर दी।
संथाल परगना में भी यही हाल रहा। यहाँ उन तमाम घटनाओं का जिक्र करना संभव नहीं हैं। आम झारखंडी शोषित जनता ने भी प्रतित्चुर में हथियार उठा लिए। कई बड़े-बड़े संघर्ष पुलिस-प्रशासन के साथ हुए। महाजन, सामंतो के बिरूद्ध भी जम कर सशस्त्र संधंर्ष हुए। इस प्रकार 1990 तक आते-आते इस पार्टी के बीस विधायक एवं 1991 में छः सासंद बन गये। उन सांसदो के नाम है- श्री बिनोद बिहारी महतो, शिबू सोरेन, सूरज मंडल, शैलेन्द्र महतो, कृष्णा मार्डी, साइमन मरांडी। फिर बाद में 1992 के जून में गिरीडिह संसदिय क्षेत्र में बिनोद बिहारी महतो का निधन के बाद उपचुनाव हुआ जिसमें उनके पुत्र राज किशोर महतो सासंद बने।

झामुमो के आन्दोलन का क्रमिक विकास

सभी को ज्ञात है कि 1973 से लेकर बिनोद बिहारी महतो के स्वर्गवास तक (18-12-91) झारखंड मुक्ति मोर्चा पूरे झारखंड क्षेत्र में एक सशक्त राजनैतिक दल के रूप में उभर चुका था। धनबाद जिले से लेकर पूरे उत्तरी छोटानागपुर, दक्षिणी छोटानागपुर एवं संथाल परगना में एक मजबूत संगठन बन चुका था। न सिर्फ इतना ही, बल्कि पश्चिम बंगाल एवं उड़ीसा के समीपवर्ती झारखंड क्षेत्र में यह बहुत लोकप्रिय बन चुका था।
झारखंड मुक्ति मोर्चा की सफलता के पीछे बिनोद बिहारी महतो की विचार-धारा रही। उनका दिशा-निर्देश रहा। उनकी जोखीम उठाने की प्रवृति रही। पार्टी को शुरू के दशवर्षो तक आर्थिक मदद इन्होने किया। उन्होने प्रतिभाओं को तलाशा एवं उन्हें तरासने का काम किया। अपना स्वयं का पैसा खर्च करके नेताओं को आगे बढ़ाया, कार्यकर्त्ता तैयार किए। उनका नेतृत्व ईमानदारी का था एवं पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़े थे। जैसा कि हमने पहले ही देख लिया है कि उन्होने उन वर्गो को एकत्रित करने का काम किया। जिन्हें वास्तव में परिवर्त्तन चाहिए था। उन्ही वर्गो-जातियों में से नेतृत्व पैदा किया। बिनोद बिहारी महतो ने झारखंड आन्दोलन के संकुचित आदिवासी चेहरे को, उसके जनजातीय छवि को बदल डाला। उसे एक विस्तृत आयाम दिया। इसमें आदिवासियों के साथ-साथ गैर-आदिवासी समूहों को भी शामिल किया। इन्होने झारखंड आन्दोलन में मजदूरों की भागीदारी भी सुनिश्चित की। उन्होनें इस आन्दोलन को न सिर्फ जातीय, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक आधार प्रदान किया। झारखंड की सभ्यता-सांस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए यहाँ के लोकगीतों, लोकनृत्यों, को आन्दोलन के रूप मे लिया। तो दूसरी ओर कल-कारखानों, कोलियारियों में नौकरी एवं रोजगार के लिए आन्दोलन चलाया। सांमतवादी विचार-धारा वाले सूदखोर, महाजनों के खिलाफ सशस्त्र आन्दोलन भी हुए।
चूँकि शिवाजी समाज द्वारा आन्दोलन बहुत आगे बढ़ाया जा चुका था और संथाल समाज द्वारा भी। अतः झारखंड मुक्ति मोर्चा सिर्फ दो वर्षो में स्थापित हो गया था।
इन आन्दोलनों में प्रमुख रहा झारखंड में विस्थापन की समस्या के विरूद्ध। 1978 के पहले केन्द्र सरकार ने विस्थापितों के नियोजन, पुर्नवास एवं नोकरी देने की कोई नीति नहीं बनाई थी। प्रथम बार 1978 से कोल कम्पनियों द्वारा इन विषयों पर नीतियाँ बनाई गई एवं नियोजन, पुर्नवास देने का काम शुरू किया गया। दामोदर भैली कॉरपोरेशन लिमिटेड को भी आन्दोलनों से मजबूर होकर विस्थापितों को नौकरी, रोजगार, ठीका आदि देने का काम शुरू करना पड़ा। इन सबके साथ-साथ कम्यूनिटी डेवलोपमेंट के नाम पर अगल-बगल के गाँवों में नागरिक सुविधाएँ मुहैय्या कराने का काम भी शुरू किया गया। सड़क, पानी, बिजली, विकास भवन, स्कूल आदि बनाने में औद्योगिक संस्थान अपनी थोड़ी-बहुत भागीदारी निभाने लगें।
इसके अलावे जो एक और प्रमुख आन्दोलन शुरू किया गया, वह था जंगल बचाओं आन्दोलन एवं विदेशी वृक्ष लगाना बंद करो का आन्दोलन। जंगलों में रहने वाले आदिवासी, गैर-आदिवासी सक्रिय हो उठे। जंगल विभाग के कर्मचारियों, अधिकारियों ने नंगा नाच मचा रखा था। अंधाधुंध लकड़ियों की कटाई इनके द्वारा कराई जा रही थी। साथ ही गाँव वालों को बिना वजह लकड़ी चोरी के इल्लजाम में पकड़कर जेल भेजा जाता था। अगर गाँव के लोग जलावन के लिए या अन्य छोटे-मोटे कृषि के उपकरण बनाने के लिए लकड़ी का प्रयोग करते तो उन्हें चोरी के इल्लजाम में जेल भेज दिया जाता। सदियों से झारखंड़ियों का जीवन जंगल-आधारित था। फल-फूल, पत्ते, लकड़ी का उपयोग करते आ रहे थे। पर इनके सारे अधिकार छीन लिए गये थे। अतः इस आन्दोलन का व्यापक प्रभाव पड़ा। विदेशी-वृक्षों को सरकार द्वारा खाली जमीनों पर लगाया जाता था, जो जमीनों को उपजाऊ नहीं, बल्कि सुखा देती थी। इन वृक्षों यूकलिप्टस आदि को काट डालने का अभियान चला। इसके अलावा फलदार वृक्षों को लगाने की माँग की जाने लगी। जंगलों के इलाकों में सरकारी तंत्रों के साथ गाँव वालों का मुकाबला भी हो जाता। कई बड़ी-बड़ी घटनाएँ भी घट गई, जिसमें पुलिस, जंगल गार्ड मारे गये तो गाँव वालों को भी गोलियों का निशाना बनाया गया। जंगलों में खासकर उग्रवादी आन्दोलन चलाये गये। सरकारी कर्मचारी, जंगल विभाग के अधिकारी ठेकेदार, भागने लगे थे।
इसके अलावे गाँवों में सूदखोरों, महाजनों द्वारा गैर कानूनी ढ़ंग से हड़पी गई जमीनों को वापस करने का जोरदार आन्दोलन किया गया। छोटानागपुर टेनेन्सी एक्ट तथा संथाल परगना टेनेन्सी एक्ट के अतिक्रमण की हालत में उन जमीनों पर रैयतों द्वारा जमान वापसी के लिए सीधे कार्यवाही की जाने लगी। कोर्ट-कचहरियों में गरीबों को न्याय मिलना असंभव था। अतः बिनोद बिहारी महतो ने उन जमानों पर पुनः कब्जा करने की रणनीति तैयार की। उन्होनें कई जिलों में वकीलों को प्रोत्साहित किया कि वे गरीब, आदिवासी, हरिजन, पिछड़े लोगों के मुकदमें बिना फीस लिए लड़े एवं उन्हें कानूनी सहायता दें। जमीन वापसी का आन्दोलन भी बड़ा व्यापक स्तर पर चला। “धान-कटनी” का आन्दोलन उस जमीन वापसी का आन्दोलन का एक हिस्सा था। गाँव के गरीब, आदिवासी, हरिजन, झारखंड मुक्ति मोर्चा के कार्यकर्त्ताओं द्वारा संगठित किए जाते और तीर-धनुष, लाठी-भाला, टाँगी आदि से लैस होकर खेतों पर डुगडुगी बजाते-बजाते धावा बोलते और खड़ी फसल को काट देते एवं उसे ढोकर सही व्यक्ति के घर पहुँचा देते।
सांस्कृतिक आन्दोलन भी चलाए गये। झारखंड की सभ्यता संस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए जगह-जगह “झूमर” प्रतियोगिता रखी जाने लगी। झूमर एक लोक नृत्य है जिसमें झूमर के गीत गाये जाते हैं। बाजा बजाने वाले होते हैं। ढोल, नगाड़ा, माँदर, करताल, शहनाई का होना आवश्यक है। इसमें बारह ताल यानि लय होते हैं। बारह प्रकार की अलग-अलग धूनों पर नाचा जाता है। नाचने के लिए विशेष तौर पर लड़के ही नर्तकियों का रूप धरते है। दो से छः तक नर्तकियों की संख्या होती है। यह लोक-नृत्य अखाड़े में खड़े होकर सम्पन्न किया जाता है। दर्शक इसके चारों तरफ बैठते है। झारखंड क्षेत्र का यह एक प्रसिद्ध लोक-नृत्य है जो पूरे झारखंड में महशूर है। पर्व-त्योहार के अवसर पर या फिर धान की फसल काट लेने के बाद जाड़े की रातों में रातभर झूमर नाचा जाता है। उसी प्रकार अन्य लोक-नृत्य “छऊ-नृत्य” है जो विश्व-प्रसिद्ध हो चुका है। इसी प्रकार के अन्य लोक गीतों एवं लोक-संगीतो, लोक-नृत्यों को बढ़ावा देने के लिए बिनोद बाबू ने व्यापक प्रोत्साहन दिया। स्वयं रात-रात भर जागकर कलाकारों को उत्हाहित करते। नतीजा यह निकला कि झारखंड के समूचे इलाके में, गाँव-गाँव में झारखंडी सभयता-संस्कृति पुर्नजीवित हो उठा एवं इसकी गूँज दूर-दूर तक आगे बढ़ने लगी। इसके साथ-साथ झारखंड क्षेत्र के पर्व-त्योहार करमा, सोहराई, गोहालपूजा, जीतिया, टुसू, जावा आदि शहरों में प्रवेश कर गये। उन्हें भी प्रोत्साहित किया गया। पूरे झारखंड क्षेत्र की अपनी एक पहचान है, वह भी विशिष्ट जो अन्य किसी की नहीं हैं। इस प्रकार के सांस्कृतिक आन्दोलन से झारखंडी अपने आप को पहचानने लगे। उनमें आत्म-विश्वास जगने लगा। औद्योगिकरण एवं बाहरी संस्कृति के दबाव से जो संकुचन आया था, वह दूर होने लगा और वे जो श्रेष्ठ होते हुए भी हीन भावना से ग्रस्त हो रहे थे, पुनः स्वयं को आत्म-विश्वास से भरा हुआ पाने लगे।
झारखंड क्षेत्र में कुछ ऐसे लोक नृत्य है जो “मारसल आर्ट” के स्वरूप है। इसमें एक प्रमुख है- “पैका” यानि ”पाइक”। इसमें खिलाड़ी ढाल तलवार (या लाठी) से लैस होता है। पैंरों में घुँघरू बाँध लेता है और सर पर पगड़ी। धोती को कस कर कमर में बाँधा जाता है। “पैका” में जो पारंगत हो जाता है वह अकेले ही दर्जन हमलावरों को एक साथ धूल चटा सकता है। इसके दाँव-पेंच ही ऐसे होते हैं। झारखंड में पहले कुड़ंमी-महतो लोगो के प्रत्येक गाँव में “पाइक” की ट्रेनिंग दी जाती थी। इसके लिए उस्ताद होते थे, गुरू होते थे और यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलता आता है। पर दुर्भाग्य से आज यह प्रायः लुप्त हो रहा है। इसी पैका का दूसरा स्वरूप “नटुआ नाच” है। अब ढाल की जगह गमछा, तलवार की जगह लाठी ने ले लिया है। इसमें बजने वाला बाजा विशिष्ट लय एवं ताल का होता है, जिसे सुनकर ही यहाँ का झारखंडी मैदान में कूद पड़ता है।
फिर झारखण्ड मुक्ति मोर्चा ने गाँव-गाँव में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए “अकिल-अखाड़े” चलाए। सुदूर गाँव में रात्री-पाठशालाएँ लालटेनों की रोशनी में चलायी जाने लगीं। शिक्षा के लिए भी अभियान या आन्दोलन चलाए गये। जिन परिवारों के बच्चे स्कूल नहीं जाते थे उन्हें प्रोत्साहित किया जाने लगा। उस समय गाँव में शिक्षा की कोई व्यवस्था ही नहीं थी। बिनोद बिहारी महतो ने स्वंय कुल मिलाकर कितने संस्थाने खोले, यह पता लगाया जा रहा है। पर चालीस संस्था का पता चला है। जिनमें मिडिल-स्कूल, हाई-स्कूल, डिग्री कॉलेज तथा विधि विद्यालय भी हैं। ये सम्पूर्ण झारखण्ड में जगह-जगह शिक्षण संस्थान खोलने के लिए लोगों को उत्साहित करते फिरते। अपनी कमाई का अधिकत्तर पैसा इन कॉलेजों एवं स्कूलों के भवन निर्माण शिक्षकों के वेतन के लिए दान दे दिया।
इधर गाँव के झगड़े गाँव में ही पंचायत बुलाकर सुलझाए जाने लगें। प्रत्येक गाँव में यह एक आन्दोलन के रूप में खड़ा होने लगा। झारखण्डी की जीवन-पद्धति भी यही थी। फिर अगर गाँवों में नहीं सुलझ पाते तो उन झगड़ों को नेताओं क पास ले जाया जाता। फिर बड़े पैमाने पर तीन-चार गाँव के लोग मिलकर बैठते एवं फैसला किया जाता। किसी-किसी मामलें में समस्या जब नहीं सुलझती, तो इसे बिनोद बाबू के पास लाया जाता। धीरे-धीरे ऐसी व्यवस्था कायम हो गई कि झारखंड के कई इलाकों में इस प्रकार से झगड़े निपटाने के केन्द्र बन गये और उन्हें लोग स्वतः जिला-कोर्ट, हाई-कोर्ट कहने लगे। यही कारण था कि सरकारी रिपोर्टो में यह बात दर्ज है कि झारखंड मुक्ति मोर्चा द्वारा समानान्तर सरकार चलाई जा रही थी, जिसका अपना पुलिस फोर्स है एवं कोर्ट-कचहरी है। इन कचहरियों में यानि बैठकों में आपराधिक मामले दीवानी मामले तथा शादी-व्याह, तलाक से जुड़े मामले सभी पर विचार विमर्श होता था। आपराधिक मामलों में ज्यादातर फाइन किया जाता था। कभी-कभी शारीरिक दंड दिया जाता था और अपराधी को लाठियों से पिटा जाता। या अन्य प्रकार से अपमानित या प्रताड़ित किया जाता। किसी-किसी गंभीर मामले में हुक्का पानी भी कुछ दिनों के लिए बंद कर दिया जाता यानि सामाजिक बहिष्कार किया जाता। किसी-किसी मामले में जो जमींदारी अत्याचार एवं सामंती अत्याचार के खिलाफ फैसला लिया जाता, उसमे “बिटलाहा” भी कर दिया जाता। बिटलाहा का मतलब होता था, उसे गाँव से उजाड़ देना। घर-द्वार को तोड़-फोड़ दिया जाता था।
इनके अलावे जो एक सबसे बड़ा पहलू झारखंड मुक्ति मोर्चा के आन्दोलन का रहा, वह था शराब-खोरी के खिलाफ संघर्ष। इसमें कार्यकर्त्ता सीधे शराब की भट्टियों पर धावा बोलते, तोड़फोड़ कर डालते। शराबियों को पकड़कर पीटते। उन्हें पानी में डूबा-डूबा कर उसका नशा तोड़ते। कार्यकर्त्ता पता लगाते कि कौन चोरी-छिपे इस धंधे में लिप्त है, उसका पता लगाते एवं उसे धंधे को छोड़ने के लिए मजबूर करते। गाँवों में औरतों के बीच जाते और उन्हें अपने-अपने शराबी पतियों की आदत छुड़ाने के लिए प्रोत्साहित करते। औरते इस आन्दोलन का समर्थन जोरदार ढंग से करती एवं अपने शराबी पतियों से लडती झगड़ती।
इस प्रकार इन आन्दोलनों ने बहुत सारे जुझारू, लड़ाकू कार्यकर्त्ता पैदा किए। पर समाज का शोषक-शासक वर्ग चुप नहीं बैठे रह सकता था। इन आन्दोलों को कुचलने के लिए पुलिस-प्रसाशन, जमींदार, सूदखोर, महाजन, माफिया, गुंडे सभी सक्रिय हो उठे। नतीजा यह हुआ कि कई बड़े-बड़े संघर्ष हुए। चोरी-छिपे कार्यकर्त्ताओं, नेताओं की हत्याएँ की जाने लगीं। घात लाकर इन आन्दोलनों के अगुआओं को खोजकर मारा जाने लगे। शहीदों की लम्बी कतारें हो गई। पर कार्यकर्त्ता और जनता भी प्रतिकार में उतर आई। और वर्षो तक दोनों तरफ से संघर्ष चलने लगा।
1975 में ही गोमो में जिला धनबाद के सदानन्द झा शहिद हो गये। उन्हें अकेले पाकर आतताइयों ने गोली मार दी। 1977 में शक्ति नाथ महतो टाटा सिजुआ में शहीद हो गये। उन्हें काँग्रेस के गुंडों ने दिन दहाड़े बम गोलियों से मार डाला। उसी प्रकार इस कोयलाचंल में रसीक हाँसदा, नेपाल रवानी आदि दर्जनों शहीद हुए।
1975 में गोमो की रेल नगरी में सदानन्द झा शहीद हुए तथा 1977 में टाटा-सिजूआ तेतुलमुड़ी के शक्ति नाथ महतो शहीद हुए। ये दो प्रमुख कार्यकर्त्ता नेताओं की शहादत के बाद तो मानों पूरे दक्षिणी छोटानागपुर में आन्दोलन में उफान आ गया। फिर 1987 में जमशेदपुर में झारखंड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष निर्मल महतो को भी आतताइयों ने मार डाला। उनकी शहादत के बाद तो मानों पूरे दक्षिणी छोटानागपुर में आग ही लग गई। इसके अलावे इचागढ़ के अजीत महतो, धनंजय महतो आदि शहीद हुए। गुवा में 1982 में प्रसिद्ध गोली कांड हुआ जिसे आज गुआ गोली कांड के रूप में याद किया जाता है, इसके अलावे अनेकों शहीद हुए। हजारों जेल गये। रिटायर्ड आर्मी के जवान कंडुलना की पुलीस इन्काउटर दिखा कर हत्या कर दी।
संथाल परगना में भी यही हाल रहा। यहाँ उन तमाम घटनाओं का जिक्र करना संभव नहीं हैं। आम झारखंडी शोषित जनता ने भी प्रतित्चुर में हथियार उठा लिए। कई बड़े-बड़े संघर्ष पुलिस-प्रशासन के साथ हुए। महाजन, सामंतो के बिरूद्ध भी जम कर सशस्त्र संधंर्ष हुए। इस प्रकार 1990 तक आते-आते इस पार्टी के बीस विधायक एवं 1991 में छः सासंद बन गये। उन सांसदो के नाम है- श्री बिनोद बिहारी महतो, शिबू सोरेन, सूरज मंडल, शैलेन्द्र महतो, कृष्णा मार्डी, साइमन मरांडी। फिर बाद में 1992 के जून में गिरीडिह संसदिय क्षेत्र में बिनोद बिहारी महतो का निधन के बाद उपचुनाव हुआ जिसमें उनके पुत्र राज किशोर महतो सासंद बने।