Friday, February 11, 2011

अध्याय आठ - झारखण्ड़ में वाम-पंथ

आजादी के बाद के समय को अगर हम देंखें और झारखंड क्षेत्र की तरफ नजर दौड़ाएँ तो हम पायेगें कि दक्षिण बिहार के तत्कालीन झारखंड़ क्षेत्र में काँग्रेस एवं झारखंड़ पार्टी का बोलबाला आजादी के तुरन्त बाद से हो गया। 1952 के आम चुनाव में बिहार विधान सभा में 33 विधायक झारखण्ड़ पार्टी के थे जिसके नेता, जयपाल सिंह मुंड़ा थे। बाकी काँग्रेस एवं एक अन्य क्षेत्रीय पार्टी के थे जिसका नेतृत्व राजा रामगढ़ कामाख्या नारायण सिंह कर रहें थे। उसका बोलबाला था। पश्चिम बंगाल के दक्षिण बिहार से सटे जिलों पुरूलिया, झाड़ग्राम आदि में काँग्रेस एवं एक क्षेत्रिय पार्टी लोक-सेवक दल का काफी प्रभाव था। यह क्षेत्र पश्चिम बंगाल का झारखण्ड़ क्षेत्र था। लोक-सेवक दल के पन्द्रह विधायक हो गये थे।
उसी प्रकार काँग्रेस का ही बोलबाला उड़ीसा एवं मध्यप्रदेश के झारखण्ड़ क्षेत्रों में था। पर धीरे-धीरे वामपंथी ताकतों ने झारखंड़ क्षेत्र में अपना प्रभाव फैलाना शुरू कर दिया। इसका एक प्रमुख कारण झारखंड़ क्षेत्र में औद्योगिकरण था। औद्योगिकरण के चलते मजदूरों की तादाद बढ़ी। हजारों की संख्या में यहाँ के किसानों को विस्थापित होना पड़ा, अपने गाँवों, खैतो एवं घरों से। इन विस्थापितों के नियोजन एवं पुर्नवास के लिए न तो राज्य सरकार द्वारा न ही केन्द्र सरकार द्वारा कोई नीति निर्धारण की गई। इन विस्थापितों की घोर उपेक्षा की गई। न तो उन्हें मुवाअजा दिया जाता न नौकरी। इन कारणों ने तथा मजदूरों के शोषण ने यहाँ वामपंथ के लिए बहुत उपयुक्त जमीन तैयार कर दिया।
यहाँ तक कि झारखंड़ मुक्ति मोर्चा के जन्मदाता प्रथम अध्यक्ष बिनोद बिहारी महतो भी पहले वामपंथी दल भारतीय कम्यूनिष्ट पार्टी में रहें। 1967 में जब कम्यूनिष्ट पार्टी ऑफ इंड़िया का विभाजन हुआ तो वे मार्क्ससीष्ट कम्यूनिष्ट पार्टी यानि कम्यूनिष्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्कसीष्ट) के सदस्य बन गये। 1967 में ही ई0 एम0 एस0 नम्बूद्रिपाद सरीखें नेता बिनोद बाबू के निमंत्रण पर धनबाद पधारें थे और यहाँ आम सभा चिल्ड्रेन-पार्क में किया गया था। इनके समकालीन चिन्मय मुखर्जी (धनबाद विधायक), टीकाराम माँझी (जमशेदपुर), सत्य चरण वेसरा (दुमका), विशेश्वर खाँ (संथाल परगना), राजेन्द्र सिंह मुंड़ा (राँची), धनंजय महतो (इचागढ़), चतुरानन मिश्र (गिरिडीह), मंजूर आलम (रामगढ़), सफी खाँ (बेरमो), चित्तो महतो (पुरूलिया), निर्मलेन्दू भट्टाचार्य (निरसा), ए0 के0 राय (धनबाद) आदि थे। फिर बाद में भी कई वामपंथी नेता उभरे। इनमें एस0 के0 बक्सी धनबाद-झरिया, महेन्द्र सिंह (बगोदर), ओपी लाल आजाद (गिरिडीह), एस0 के0 राय (झरिया) आदि कई वामपंथी नेता उभरे। करीब-करीब तीस से ज्यादे विधान सभा क्षेत्रों में वामपंथी पार्टियों के विधायक हुए जो वर्त्तमान झारखंड़ प्रदेश में हैं। 1960 से 1970 के दशक में वामपंथी पार्टियों के मजदूर यूनियनें हुआ करती थी एवं इनके माध्यम से पूरे झारखंड़ क्षेत्र में इनका प्रभाव बढ़ा।
नक्सल बादी आन्दोलन का प्रभाव भी झारखंड़ क्षेत्र में 1970 के दशक से फैलना शुरू हो गया था। कई आतंकवादी घटनाएँ घटी थी। झारखंड़ की भौगोलिक, स्थिति इसके घने जंगल एवं पहाड़ो से भरे भू-भाग के चलते यह क्षेत्र आतंकवादियों के नेताओं के लिए काफी सुरक्षित जगह बन गया। नक्सलवादी की तर्ज पर कई घटनाओं को अंजाम दिया गया। कई जगह बम फटे। ट्रेनों पर भी बम मारे गये। सिंहभूम, हजारीबाग, पलामू जिलों में 1970 के दशक में ही नक्सलियों की घूसपैठ हो गई थी। 1980 के बाद तो इनका कार्यक्षेत्र और भी बढ़ गया, तो इनके समर्थकों की तादाद भी काफी बढ़ गई। सूदर गाँवों के लोगों को प्रभावित किया गया। झारखंड़ के लोगों में फैला असंतोष, निर्मम शोषण, गरीबी, अशिक्षा तथा औपनिवेशिक शोषण ने आग में घी का काम किया। 1980 के बाद ए0 के0 राय ने एक पुस्तक लिखी “झारखंड़ और लालखंड़” तथा उनके समर्थकों के अन्दर एक नारे का भी प्रचार-प्रसार किया गया- “झारखंड़ को लालखंड़ में बदल डालो”।
झारखंड़ में तथाकथित वामपंथी ताकतों को सबसे बड़ा झटका तब लगा जब बिनोद बिहारी महतो ने 1973 में विधिवत रूप से “झारखंड़ मुक्ति मोर्चा” को जन्म दिया। बिनोद बिहारी महतो का संबंध कम्यूनिष्ट नेताओं से रहें थे । क्योंकि ये स्वंय पुराने कम्यूनिष्ट थे। बंगाल के ज्योति बासु से लेकर बिहार के बड़े कम्यूनिष्ट नेताओं के साथ उन्होंने काम किया था और झारखंड़ में वामपंथ के व्यापक प्रजार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इन पार्टियों के लिए जमीन तैयार की थी। वामपंथी पार्टियों को सबसे बड़ा झटका तब ही लगा था जब बिनोद बिहारी महतो ने झामुमो का गठन कर लिया था।
झामुमो के जुझारू आन्दोलन ने वामपंथ को धीरे-धीरे पीछे धकेल दिया था। झामुमो का आन्दोलन सिर्फ किताबी नहीं था, बल्कि जमीन से सीधा जुड़ा हुआ होने के कारण ज्यादा जुझारू एवं आर्कषक था। वर्ग संघर्ष की अवधारणा के साथ-साथ क्षेत्रिय संघर्ष की तथा वर्ण संघर्ष का अद्भूत समन्वय इसमें दृष्टी गोचर होता था। 1977 तक तो कॉमरेड ए0 के0 राय ठीक ठाक रहे। पर उसके बाद बिनोद बाबू का इस्तेमाल वामपंथियों ने अपनी राजनीति चमकाने के लिए किया। बिनोद बाबू एवं शिबू सोरेन को धोखे में रख कर उनके साथ-साथ चलते हुए वामपंथी उन्हें कमजोर करने की चेष्टा में लग चुके थे। वे दिखावे के लिए साथ थे, पर झारखंड़ अलग राज्य के आन्दोलन का समर्थन नहीं करके से गलत दिशा देने में लगे थे।
झारखंड़ में “नक्सलवाद” एक नया नाम लेकर उभरा। इसके नेताओं ने “लालखंड़” का नारा दिया। इसे ही झारखंड़ का विकल्प दिखलाया गया। कहा गया कि झारखंड़ को लालखंड़ में बदल डालो। कॉ0 राय ने तो “झारखंड़-लालखंड़” नामक पुस्तक 1980 में लिख डाली। निश्चय ही झारखंड़ अलग राज्य के आन्दोलन को रोकने के लिए ही यह नारा दिया गया। इस स्थिति ने एक संदेहात्मक स्थिति पैदा कर दी। अपने वामपंथी पृष्ठ भूमि के चलते तो बिनोद बाबू ने कॉ0 ए0 के0 राय को बरदास्त किया। पर शिबू-सोरेन इसे पचा नहीं पाते थे। पर कालान्तर में उनका कॉ0 ए0 के0 राय से भी गहरा मतभेद हो गया। बिनोद बाबू भी इस विषय पर खिन्न थे पर वे अपने काम में लगे रहे और वामपंथियों को झारखंड़ आन्दोलन में जोड़ते रहे।
1990 में श्री ए0 के0 राय ने झामुमो के खिलाफ विधान सभा चुनाव में अपना उम्मीद्वार सिन्दरी, निरसा, बाघमारा, मांडू, चन्दनकियारी आदि कई सीटें पर खड़ा कर दिया। लाल-हरा मैत्री को तोड़ दिया। अन्य क्षेत्रों में भी झामुमो का तालमेल अन्य वामपंथी दलों से टूट गया था। 1991 के लोक सभा चुनाव में धनबाद से कॉ0 राय हार गये। भुवनेश्वर मेहता सी0 पी0 आई0 हजारीबाग से जीते। भारतीय जनता पार्टी ने 1991 में झारखंड़ के 14 सीटों में से पाँच पर कब्जा किया। झामुमो ने छः सीटें लोकसभा के जीत ली थी। झामुमो के बढ़ते प्रभाव ने न सिर्फ वामपंथियों के जनाधार को खिसका दिया था, अपितु काँग्रेस का दक्षिण बिहार से सफाया ही कर दिया था।
1991 तक झारखंड़ क्षेत्र में उग्रवादी घटनाएँ बढ़ गई थी। “लालखंड़” के नाम पर माओवादी कम्यूनिष्ट सेंटर, पीपुल्स वार ग्रुप के अलावे झारखंड़ मुक्ति मंच का प्रभाव काफी बढ़ गया था। चुनाव बहिष्कार का नारा दिया गया और वोट-बहिष्कार किया जाने लगा। उन क्षेत्रों में वोट-वहिष्कार शुरू किया गया, जहाँ बिनोद बिहारी महतो ज्यादे सक्रिय थे। झामुमो ज्यादा सक्रिय था। स्पष्ट था कि वोट बहिष्कार झामुमो को हराने के उद्देश्य से ही किया जा रहा था।

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