Saturday, February 19, 2011

अध्याय - नौ (अतंरराष्ट्रीयता बनाम राष्ट्रीयता)

अतंरराष्ट्रीयता की अवधारणा के साथ कम्यूनिष्म चलता है। उसका आयाम पूरा विश्व है जिसको वह एक यूनिट मानता है। पूरे विश्व में वर्ग-संघर्ष की कल्पना करता है कम्यूनिष्म तथा कम्यूनिष्म लाना चाहता है। यह कम्यूनिष्म क्या है, इसकी व्याख्या करना मेरा उद्देश्य नहीं है। इसकी व्याख्या तो मार्क्स, लेनीन, माओ आदि ने पहले ही कर रखी है। कम्यूनिटी से कम्यूनिष्म बना है। कम्यूनिटी यानि जिसे हम समुदाय कह सकते है। तो कम्यूनिष्म का अर्थ हुआ समुदायवाद। यह सुनने में अच्छा नहीं लगता। जो समुदाय के लिए अच्छा हो जाहिर है वही नीति अच्छी है। किसी व्यक्ति विशेष के लिए गठित नीति अच्छी नहीं कही जा सकती। अब समुदाय एक नहीं कई है समाज में। तो समुदाय से व्यापक शब्द समाज हो जाता है। तो समुदाय से बढ़कर समाज हुआ। अतः नीति पूरे समाज के हित को देखते हुए उसके हित में होनी चाहिए। जो समाज मुखी सिद्धान्त है उन्हे समाजवाद ही कहेगें। अतः समाजवाद की बात करने का अर्थ अतंरराष्ट्रीयतावाद है। यहाँ पूरे मानव समाज को एक यूनिट माना गया। राष्ट्रीयता का अर्थ एक निश्चित भू-भाग के अंदर सिमट आता है। ऐसा भू-भाग जिसकी एक स्वाभविक रूप से सीमा बन गई हो, प्राकृतिक परिवेश एवं भौगोलिक दृष्टीकोण से। जाहिर है कि एक राष्ट्र यानि एक निश्चित भू-भाग के अंदर रहने वालों में एक प्रकार की समानता पाई जायेगी। यह समानता कई प्रकार की हो सकती है। सोचने के तरीके की हो सकती है। रंग-रूप, नाक-नक्से की हो सकती है। एक प्रकार के लोग, एक भू-भाग में अगर विद्यमान है तो एक राष्ट्रीयता के कहे जाते है।
इन्ही तथ्यों के आधार पर विश्व में महाद्वीप बने। महादेश बने। देश बने। अलग-अलग देश के वासियों ने अपनी सभ्यता-सास्कृति को विश्व के पटल पर महत्व दिलवाने का प्रयास किया है एवं अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाने की चेष्टा की है एवं बनाया है। एक दूसरे से लड़ाई लड़ी गई है, सिर्फ अपने देश की सिमाओं की रक्षा करने या उसका विस्तार करने के लिए। एक देश के लोग दूसरे देश के लोगों पर शासन करते है। दूसरों को गुलाम बनाया गया है। फिर स्वतंत्रता की लड़ाईयाँ लड़ी गई है। ये सभी निश्चित ही राष्ट्रीयता के नाम पर ही किए गये है।
एक देश के अंदर भी अलग-अलग धर्मों के लोग निवास करते हैं। अलग-अलग भाषा, बोलियाँ बोलने वाले लोग निवास करते है। जाहिर है कि ऐसे में छोटे स्तर पर वहीं होना स्वाभाविक है जो एक बड़े पैमाने पर विश्व के अन्दर अलग-अलग देशों की राष्टीयताओं के बीच होता है। यानि वैमनष्य, भेदभाव, एक के द्वारा दूसरे को शासन करने की मनोवृति। उन्नत आर्थिक स्थिति वाली कौम या फिर ताकतवर कौम के द्वारा कमजोरो को दबाने की चेष्टा। पूरे भारतवर्ष को ही देखें। हम कितने ही वर्गों में बँटे है।
सवाल उठता है, एसी परिस्थिति में अन्याय, शोषण, जुल्म, उपेक्षा के विरूद्ध कहाँ से लड़ाई शुरू की जाए। इस अन्याय या शोषण पर आधारित व्यवस्था का कहीं ओर छोर तो दिखाई देता नहीं। कहाँ पर इसकी गर्दन पकड़ी जाय। सैद्धान्तिक सवाल तो शोषण मुक्त समाज का निर्माण करना है, पर व्यवहारिक सवाल है कि क्या इसे अंतराष्ट्रीय अवधारणा के तहत पूरे विश्व को एक इकाई मानकर एक साथ पूरे विश्व में लड़ाई शुरू की जाय या फिर राष्ट्रीयता को आधार मानकर एक देश को यूनिट मानकर चला जाय या फिर एक प्रदेश को इकाई माना जाय। हम इससे भी नीचे परिवार तक जा सकते है। सफलता किधर से हाथ लगेगी इसका जबाव कुछ भी नहीं है। आप इस लड़ाई को कहाँ से शुरू करेगें, सफलता के लिए तो यह व्यक्ति विशेष की सौंच पर ही निर्भर करता है।
बिनोद बाबू ने सभी आयामों को देखा था। परखा था। उन्होनें अपने जीवन के शुरूआती दौर में वामपंथ-कम्यूनिष्म का साथ दिया था। पर उस अन्तराष्ट्रीय अवधारणा के साथ चलते हुए उन्हें लगा था कि उनकी उपलब्धि कुछ भी नहीं है। वे जहाँ के तहाँ है। कोई परिवर्त्तन उन्हें दिखाई नहीं दिया था। अतः उन्होने एक क्षेत्र विशेष को, जिसकी सभयता-संस्कृति तथा रहन-सहन, विश्वास एक सा था, चुना और उसकी राष्ट्रीयता को यूनिट मानकर अपना संघर्ष शुरू किया। निश्चित ही सफलताएँ हाथ लगी।

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