झामुमो के अलावे 1972 से 1991 तक जिन अन्य झारखंड़ी नेताओ ने अलग झारखंड़ राज्य के लिए संघर्ष किया, उनमें प्रमुख रहे, सर्वश्री एन0 ई0 होरो, श्री राम दयाल मुंड़ा, श्री बागुन सोम्ब्रई, सूर्य सिंह बेसरा, मोजेस गुड़िया, प्रभाकर तिर्की आदि-आदि।
अब इस बात पर नजर डालना आवश्यक है कि बिहार विधान सभा में झारखंड़ नामधारी पार्टियों की स्थिति क्या रही थी। 1952 में 33 विधायक, 1957 में 32, 1967 में आठ, 1969 में सत्रह, 1971 में शून्य, 1972 में आठ, 1977 में फिर एक, 1980 में चौदह, 1984 में एक, 1985 में 9 तथा 1990 में 21 सीटें बिहार विधान सभा में झारखंड़ नामधारी पार्टियों को मिली। इसी प्रकार लोक सभा सीटें 1957 में 5 सीटें, 1962 में तीन सीटें, 1971 में दो सीटें, 1980 में एक सीटें, 1985 में एक भी सीटें नहीं, फिर 1989 में दो सीटें तथा 1991 में छः सीटे।
झारखंड़ अलग राज्य बनाने के संबंध में सरकार की सोच बड़ी भ्रामक थी। केन्द्र सरकार यह देखा करती कि इसके कितने जनप्रतिनिधि चुनाव जीत कर आते है जिससे झारखंड़ आन्दोलन की ताकत को नापा जाता रहा था। कम प्रतिनिधि चुनाव जीतकर आते तो कहा जाता कि झारखंड़ आन्दोलन को पर्याप्त जनसमर्थन प्राप्त नहीं है। पर यही बात दुसरे राज्यों के गठन के संबंध में नहीं सोची जाती थी। पंजाब से हरियाणा अलग हुआ। महाराष्ट्र से गुजरात बना। कर्नाटक बना मैसूर से अलग होकर। आन्ध्रप्रदेश तमिलनाडू से अलग हुआ। नागालैंड़ बना। पच्चीस राज्य बने आजादी के बाद। कहीं भी किसी भी मौके पर यह नहीं कहा गया कि इन राज्यों में अलग राज्य बनाने के लिए आन्दोलन क्यों नहीं हुए ? यह तलाश भी नहीं की गई कि आन्दोलन की जरूरत क्यों नहीं थी, इनको अलग करने के लिए। पर झारखंड़ अलग राज्य बनाने के सवाल पर आन्दोलन की आवश्यकता पर बल क्यों दिया गया? वह भी एक बड़े एवं सशक्त आन्दोलन की आवश्यकता क्यों दर्शाई जाती रही ? यह एक विचारनीय विषय है। दूसरी बात है कि इतिहास रहा है कि आधी सदी से ज्यादा समय तक यहाँ झारखंड़ अलग राज्य का सशक्त आन्दोलन चलाया गया, पर इसकी मान्यता नहीं देकर यहाँ के लोगों की आवाज को नहीं सुनकर उल्टे इस क्षेत्र के आन्दोलन को दबाया-कुचला गया। इस आन्दोलन में सैकड़ो को मारा गया, हजारो को जेल भेजा गया। लाखों लोगों ने कष्ट झेले। पर फिर भी झारखंड़ आन्दोलन को एक समस्या के रूप में देखा गया। इसका दमन किया गया जैसे कि यह माँग माँगना एवं आन्दोलन करना कोई गुनाह हो। यह कभी नहीं सोचा गया कि झारखंड़-आन्दोलन यहाँ की समस्याओं के चलते पैदा हुआ है तथा समस्या के निदान के रूप में एक राज्य माँगा जा रहा है। यह आन्दोलन अपने आप में कोई समस्या नहीं बल्कि समस्याओं का समाधान है।
झारखंड़ विषयक समिति का गठन 1989 में किया गया था। यह अपने आप में एक ऐतिहासिक घटना है तथा इसकी रिपोर्ट झारखंड़ आन्दोलन के इतिहास में एक महत्वपुर्ण तथा यादगार दस्तावेज के रूप में हमेशा जाना जाता रहेगा।
1987 में बिनोद बिहारी महतो ने “झारखंड़ समन्वय समिति” का गठन किया। ज्ञातव्य हो कि झामुमो के संस्थापक अध्यक्ष बिनोद बिहारी महतो प्रथम दश वर्षो 1983 तक झामुमो के अध्यक्ष रहे। फिर अमर शहीद निर्मल महतो अध्यक्ष बने तथा महामंत्री शिबू सोरेन ही रहे। इस समिति का गठन इसलिए किया गया कि झारखंड़ में झारखंड़ नामधारी पार्टियाँ तथा अन्य संगठन अलग-अलग से इस आन्दोलन को अंजाम दे रहे थे। बिनोद बिहारी महतो ने इस सोच के साथ इस समिति का गठन किया कि सभी मिलकर अगर जोरदार आन्दोलन करें तो केन्द्र सरकार इस विषय पर सोचने के लिए बाध्य होगी। उन्होनें इस समिति में कई संगठनों, पार्टियों तथा नेताओं को सम्मिलित किया। कुल मिलाकर बावन संगठन इसमें शामिल हुए। इसमें वामपंथी, समाजवादी, झारखंड़ नामधारी तथा कई अन्य सामाजिक संगठन भी थे। बिनोद बिहारी महतो की संयोजन शक्ति ने यह काम कर दिखाया क्योंकि वामपंथी से लेकर काँग्रेस विरोधी हर पार्टी, संगठन से उनका ताल्लूक रहा था। इसमें प्रमुख रूप से बिनोद बिहारी महतो, बी0 पी0 केशरी, संजय बसु मल्लिक, डा0 राम दयाल मुंड़ा, संतोष राणा, सर्वश्री एन0 ई0 होरो, लाल साहदेव, सूर्य सिंह बेसरा, प्रभाकर तिर्की, बिरसा उराँव, त्रिदीप घोष, मानव घोष दस्तिदार, भाई हेलेन कूजूर आदि कई नेताओं ने हिस्सा लिया था। एक विशाल रैली राँची के मोराबादी मैदान में 15 नवम्बर 1987 को भगवान बिरसा की जन्म तिथि पर आयोजित की गई। सरकारी बाधा एवं सरकार द्वारा सारे रास्तों की नाके बंदी, लाठी चार्ज के बावजूद लाखों की तादाद में भीड़ इकट्ठी हुई। नवम्बर के महिने में प्रचंड़ ठंड़ थी और बारिश भी हो गई थी, फिर भी लोगों का जोश देखने लायक था।
इसी झारखंड़ समन्वय समिति की रैली को देखते हुए केन्द्र सरकार ने इस माँग पर पुनः ध्यान दिया। केन्द्र सरकार के गृह मंत्रालय ने दिनांक 23-28 अगस्त 1989 को एक आदेश जारी करके “झारखंड़ मामलों से संबंधित समिति” नामक समिति का गठन किया। “कॉमिटि ऑन झारखंड़ मैटर्स” अंग्रेजी नाम है। इसमें झारखंड़ आन्दोलन के प्रतिनिधि, केन्द्र सरकार के प्रतिनिधि तथा झारखंड़ मामलों के विशेषज्ञों की टीम शामिल की गई। इस समिति ने मई 1990 में एक रिपोर्ट केन्द्र सरकार को सौंपी। राज्य पुर्नगठन आयोग के बाद यह एक विशेष समिति थी जो सिर्फ झारखंड़ आन्दोलन के मामलें में गठित की गई थी।
इस समिति में निम्नलिखित सदस्य थेः-
केन्द्र सरकार के प्रतिनिधि –.
1. श्री बी0 बी0 सक्सेना, संयुक्त सचिव ग्रामीण विकास विभाग।
2. श्री बी0 के0 मिश्रा, संचुक्त सचिव जनजाति विकास कल्याण मंत्रालय
राज्य सरकार के प्रतिनिधि –
श्री जे0 एल0 आर्य, गृह सचिव बिहार, सचिव-जनजाति कल्याण बिहार, क्षेत्रिय विकास आयुक्त बिहार।
झारखंड़ आन्दोलन के प्रतिनिधि –
1. डा0 आर0 डी0 मुंड़ा
2. डा0 ए0 के0 सिंह
3. सर्वश्री एन0 ई होरो
4. शिबू सोरेन
5. बिनोद बिहारी महतो
6. बी0 पी0 केसरी
7. एस0 एस0 बेसरा
8. प्रभाकर तिर्की
9. सन्तोष राणा
10. सूरज मंडल
11. शैलेन्द्र महतो
12. प्रो0 स्टीफन मरांड़ी
विशेषज्ञ –
1. डा0 एस0 के0 सिंह
महानिर्देशक भारतीय मानव शास्त्रीय सर्वेक्षण
2. डा0 भूपेन्द्र सिंह
भारत सरकार के भूतपूर्व सचिव
3. श्री के0 एन0 प्रसाद
भूतपूर्व अपर सचिव
अन्य प्रतिनिधि –
1. प्रो0 लालचन्द्र चुड़ामनी नाथ साहदेव
अध्यक्ष सदान् विकास परिषद्, राँची।
2. प्रो0 साहिद हसन्
महासचिव सदान विकास परिषद्।
उल्लेखनीय है कि झारखंड़ मुक्ति मोर्चा के तत्कालीन अध्यक्ष शिबू सोरेन, उपाध्यक्ष सूरज मंडल ने झामुमो को इस रैली में शामिल नहीं होने का निर्देश ही नहीं दिया, बल्कि इस समिति के संयोजक बिनोद बिहारी महतो का कई स्थानों में विरोध भी कराया गया था। उन्होंने रामगढ़ की आम सभा में अर्जुन राम (महतो) द्वारा खुलेआम विरोध भी करवाया था इन लोगों ने झामुमो का इस समिति में शामिल होना तथा इसके लोगों का समिति में शामिल होना तथा इसके लोगों का समिति के आन्दोल में भाग लेना उचित ही नहीं समझा था। बाद में इस समिति के आन्दोलन की सफलता देखकर “झारखंड़ मामलो से संबंधित समिति” में पैरवी करके सदस्य बन गये थे, जो झारखंड़ समन्वय समिति की देन थी। उस समय देश के प्रधान मंत्री श्री राजीव गाँधी थे तथा कॉग्रेस के श्री बूटा सिंह केन्द्रीय गृह-मंत्री थे। जब इस समिति का गठन किया गया, बिहार में कॉग्रेस के जगरनाथ मिश्रा मुख्य मंत्री थे। इस प्रकार झारखंड़ आन्दोलन को एक विस्तृत आयाम बिनोद बिहारी महतो के प्रयत्नों से मिला। सिर्फ आदिवासी आन्दोलन का जो ठप्पा लगा था, वह मिटने लगा था।
Saturday, February 19, 2011
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment