Wednesday, May 12, 2010
अध्याय – 2
इस तथ्य को जान लेना आवश्यक है कि झारखण्ड़ क्षेत्र बींसवीं सदी के पाँच दशको तक यानि आज से पच्चास-बावन वर्ष पहले तक जनजातीय बाहुल क्षेत्र था सरकारी कागज-कलम यानि आँकड़ो के अनुसार। 1950 में आजादी के बाद जब संविधान की धारा 342 में महामहिम भारत के राष्ट्रपति ने अनुसूचित जन जातियों की सूची बनाई तो उसमें कुछ बड़े आदिवासी समुदायों यानि जनजाति का नाम छूट गया था छोड़ दिया गया।
तत्कालीन भारत सरकार ने यानि अंग्रेजी हुकूमत ने गृह विभाग के माध्यम से नोटिफिकेशन नम्बर 550 दिनांक 2 मई 1913 निकाला था। इस अधिसूचना में कहा गया था कि बिहार एवं उड़ीसा क्षेत्र में निवास करने वाली जातियाँ मुँड़ा, हो, उराँव, संथाल, भूमिज, खड़िया, घासी, गौड़, कघं, कोरवा, कुरमी, माल, सूरीया एवं पान जनजातियाँ थी। फिर 8 दिसम्बर 1931 के अधिसूचना द्वारा पुन: भारत सरकार ने उपरोक्त तेरह जातियों को जनजाति माना। इन जनजातियों के भी कई उपजातियोँ थी। मुंड़ा, कुरमी, संथाल, हो, उराँव आदि उपरोक्त तेरह जनजातियों के अलावा कोल, घटवार, खरवार, असुर, बैगा, बादुड़ी, बेदिया, चेरा, चिकबराइक, गोड़ाइत, करमाली, कोड़ा, मॉहली, लोहार, बिरहर, पहाड़िया, सूर्य पहाड़िया आदि जातियाँ थी जो जनजातियाँ मानी गई थी। ब्रिटिश शासन के बीसवीं सदी में इनकी जनसंख्या झारखण्ड़ क्षेत्र में कुल मिलाकर नब्बे प्रतिशत से कम नहीं रही होगी। हरिजन जातियाँ कम थी तथा उच्चवर्ण ब्राह्णण आदि का प्रतिशत कुछ भी नहीं था।
अन्य जातियाँ जो व्यवसाय तथा व्यवपार से संबंध रखती थी यानि बिचौलियाँ का काम करने वाली जातियाँ धीरे-धीरे झारखण्ड़ क्षेत्र के बाहर से आकर बाजार के विस्तार के साथ इस क्षेत्र में बसने लगीं।
ब्रिटिश शासन के पहले मुसलमान शासको ने सैकड़ो वर्षो तक भारत में राज किया। जाहिर है सात-आठ सौ वर्षो के मुसलमानों के प्रभुत्व में रहने के कारण झारखण्ड़ में भी इसका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था। झारखण्ड़ में भी इस्लाम ने पाँव फैलाए। पर मुसलमान शासकों ने इस क्षेत्र में स्थाई रूप से रहकर राज नहीं किया। मुगल शासको के साथ साधारण निष्ठा थी। ताँती, जुलाहा, बुनकर आदि जातियाँ मुसलमान बनीं।
अंग्रेजो ने तो यहाँ बकायदा मिशनरियों के माध्यम से धर्म-परिवर्त्तन का काम शुरू किया था तथा जनजातियों ने काफी तादाद में ईशाई धर्म को स्वीकार किया था। करीब सौ साल पहले इशाई मशिनरियाँ झारखण्ड़ में आई। 1900 ईस्वी के आसपास यह धर्म परिवर्त्तन काफी तेजी में हो रहे थे। धार्मिक परिवर्त्तनों का समय 1930-31 तक बड़ी गति से चला। सबसे पहले झारखण्ड़ में ऐथेनिक मूल के प्रकृति-पूजक थे। टोटेम आधारित जनजातियों का ही निवास स्थान था झारखण्ड़। जोहार थान, जाहिरा, सरना, हड़गड़ी, ग्रामथान, जियारी आदि की पूजा होती थी। मारांगबुरू, बड़बौंगा, पत्थरों, पहाड़ो, पैड़ो, नदियों की पूजा होती थी। प्रत्येक जनजाति की अपनी एक भाषा भी होती थी और आज भी है। मुंड़ा जनजाति की भाषा, “हो” कुड़मी जनजाति की भाषा कुड़माली भी होती थी और आज भी है। मुंडा जनजाति की भाषा मुड़ारी, हो की भाषा हो, कुड़मी की भाषा कुड़माली, उराँव की कुडुक आदि। सभी जनजातियों के अपने-अपने पर्व त्योहार भी होते हैं। सामाजिक रीति-रिवाज भी अपने-अपने हैं। हम यहाँ विस्तार से जनजातियों की जीवन-पद्धति पर जाना नहीं चाहते। यह जान लेना ही काफी है कि हिन्दूधर्म, ईस्लाम या ईशाई धर्मो के अनुआई ये नहीं थे और इनकी जीवन-शैली मैदानी सभ्यता के लोगों से बिलकुल ही भिन्न थी। इस समय झारखंड़ में एक तरफ तो ईशाई मिशनरियों का प्रभाव हो, मुंड़ा, उराँव, संथाल आदि जनजातियों पर पड़ रहा था, तो दूसरी तरफ सनातन धर्म का प्रचार प्रसार भी कुछ आदिवासी जातियों के बीच हो रहा था। जमींदारी प्रथा के शुरू होने एवं अंग्रेजों द्वारा झारखंड़ में प्रभुत्व स्थापित करने के साथ-साथ ब्राह्मणवाद धीरे-धीरे झारखंड़ में फैल रहा था। बहुत सी जातियोँ जो अपने को एथेनिक या टोटेमिस्टीक ग्रुप की मानती थी धीरे-धीरे हिन्दुत्व की ओर मुड़ने लगी। इनमें एक प्रमुख जाति हैं कुरमी महतो यानि कुड़मी महतो यह जाति जैसा कि हमने पहले ही कहा है 1913 एवं 1931 के अधिसूचना के अनुसार तथा डब्लू0 जी0 लेसी साहब के सर्वे के अनुसार प्रमीटिव ट्राइव मानी गई थी एवं जनजाति में शुमार की गई थी। इस जनजाति की अकेले की संख्या झारखंड़ क्षेत्र में पच्चीस प्रतिशत से अधिक थी और आज भी है।
प्रशासनिक एवं राजनैतिक कारणों से झारखंड़ क्षेत्र के तीन-चार हिस्सों में बँट जाने के कारण इन जनजातियों के जीवन में कई उतार-चढ़ाव आए। जो हिस्सा बंगाल में रह गया, वहाँ के जनजाति लोग बंगाली भाषा एवं संस्कृति से प्रभावित होने लगे। उसी प्रकार जो लोग उड़ीसा के राज्य की सीमा के अन्दर आए उन्होनें “उड़ीया-संस्कृति” एवं उड़ीया भाषा अपनाना शुरू किया। ठीक उसी प्रकार बिहार में पड़ने वाला हिस्सा भी प्रभावित हुआ तथा इस क्षेत्र के झारखंड़-वासी हिन्दी भाषा की तरफ मुखातिब हुए। ऐसा प्रशासनिक कारणों से एवं राजनैतिक कारणों से हुआ। एक ही सभ्यता-संस्कृति के मानने वाले लोग, एक ही भाषा के बोलने वाले लोग अलग-अलग प्रकार की भाषाएँ सीखने, बोलने लगे।
जैसा कि मैंने इंगित किया है कि कुरमी महतो जनजाति भी ब्राह्मणवाद् से प्रभावित हुई। 1915 में इन्होंने क्षत्रिय बनने का प्रयास करने लगे। मुर्गी-पालन, सुअर पालन जो आदिवासियों के परम्परागत काम थे, उसे छोड़ने का आन्दोलन किया तथा जनेऊ भी पहनने का आन्दोलन चलाया। इसका परिणाम कोई अच्छा नहीं हुआ। बिहार एवं उड़ीसा के विभाजन 1936 के बाद बिहार के कुरमी-जाति के लोगों के प्रभाव से इन्हें पिछड़ी जाति में बिहार राज्य में शामिल कर लिया गया। भारत के तत्कालिन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने यह स्पष्ट कर दिया था कि 1931 में अंग्रेजी सरकार ने अपने जनगणना में जिन जातियों को प्रीमिटीव ट्राइव माना था, उन सभी को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया जायेगा। पर संविधान की धारा 342 में कई जातियाँ अनुसूचित जातियों की श्रेणी से वंचित हो गई, उनमें एक कुरमी-महतो जाति भी थी। इस क्षेत्र की जनजाति भूमिज ने भी क्षत्रिय बनने के प्रयास सनातन धर्म के प्रभाव से किए थे। खतौरी, घटवार तो बकायदा अपने को राजपूत समझने लगे थे और घटवार जो यहाँ जमींदार बनाए गये थे, ऊँची हैसियत के हो गये थे और बाहर के राजपूतों से अपना संबंध भी जोड़ने लगे थे। शादी-विवाह भी करने लगे थे। उसी प्रकार वैष्णव धर्म का प्रचार प्रसार हुआ। चैतन्य महाप्रभु के झारखंड़ प्रवेश के बाद यहाँ बहुत सारे जनजाति के लोग वैष्णव धर्म भी अपनाने लगे। भगत बनने लगे। यहाँ की आदिम जाति मोची यानि चमार जो यहाँ जनजाति थी उन्हे सनातन धर्म के प्रभाव से शुद्रजाति कहा जाने लगा। उसी प्रकार कई अन्य जनजातियों के साथ हुआ।
सच तो यह है कि झारखंड़ क्षेत्र मे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र इन चार वर्णो में समाज बँटा हुआ नहीं था। यहाँ सनातन धर्म के प्रवेश के बाद ही ऐसा हुआ। इसके अलावा इस क्षेत्र में जैन धर्म भी बहुत पहले आ घुसा था और कुछ जातियों में इसका प्रभाव देखा गया है।
बावजूद इसके अन्य जनजातियों की तरह छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 के प्रवधानों का फायदा कुरमी महतो को भी मिला। इन्हें भी भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1865 एवं 1925 के प्रावधानों से अन्य बारह जनजातियों की तरह ही मुक्त रखा गया था। 1950 की सूची के बाद, कुरमी महतो समुदाय ने कई प्रयत्न किए पर अब तक उन्हें जनजाति सूची में भारत सरकार द्वारा शुमार नहीं किया जा सका है। “झारखंड़ मामलों से संबंधित समिति” की रिपोर्ट जो मई 1990 में प्रकाशित हुई इसमें भी इस जाति को “गैर-सरकारी आदिवासी” कहा गया है तथा यह भी कहा गया है कि झारखंड़ क्षेत्र के अन्य जनजातियों की अपेक्षा इसने अपने मूल वंश की पहचान को ज्यादे बरकरार रखा है।
इसी प्रकार धीरे-धारे अन्य कई जातियों को भी सरकारों ने अनुसूचित जनजाति की सूची से अलग कर दिया। इसमें प्रमुख हैं- रजवार, कोल, लोहार, खेतोरी, बड़ाइक इत्यादि।
ऐसा करने का एक बहुत बड़ा कारण था और ब्रिटिश हुकूमत की यह एक चाल थी। “फूट डालो और राज करो” नीति अपनाई गई थी। अगर इन जातियों को गैर-आदिवासी नहीं बनाया जाता तो जमीन-अधिग्रहण एवं हस्तातरण में काफी कठिनाई का सामना करना पड़ता क्योकिं छोटानागपुर यानि झारखंड़ क्षेत्र में इन्हें विभिन्न कानूनों के द्वारा विशेष सुरक्षा जमीन के हस्तातरण के मामले में प्रदत थी। फिर इंडिजीनियस ट्राईव को उजाड़ने की भी मनाही थी। इन जातियों के हाथ में झारखंड़ की समतल जमीन का बड़ा भाग था और वे इसमें खेती करके स्वतंत्र रूप से जीवन यापन करते थे। बाहरी दबाव का मुकाबला करने की ताकत इन जातियों में ज्यादे थी। चाहे वह दबाव राजनैतिक हो या धार्मिक। कुरमी-जाति के लोगों ने कोई धर्म परिवर्त्तन नहीं किया। वे न ईशाई बने न मुसलमान।
Sunday, April 25, 2010
मैदानी “जनजातीय क्षेत्रों” का सवाल
. असम के जनजातीय और वहिष्कृत तथा आंशिक रूप से वहिष्कृत क्षेत्रों पर विचार
करना ।
. उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रदेश और बलूचिश्तान में जनजातीय क्षेत्रों पर विचार करना ।
. असम से उत्तर प्रदेशों में वहिष्कृत तथा आंशिक रूप से वहिष्कृत क्षेत्रों की स्थिति पर
विचार करना ।
समिति ने निम्नलिखित दो महत्वपूर्ण प्रेक्षण दिए –
1. पहाड़ी जनजातियों का विभाजन ऐसे जनजातीय आबादी वाले या जनजातियों के समरूपी ग्रुपों की आबादी वाले काफी बड़े जिलों के रूप में किया गया है जिनके संगठन काफी लोकतांत्रिक तथा परस्पर विशिष्ट है और इनमें मैदानी सभ्यता के अवशेष बिलकुल नहीं है जो इनके समानरूपी क्षेत्रों में काम आते हैं ।
2. अन्य प्रदेशों में मैदानी जनजातीय आबादी ने मैदानी लोगों क जनजीवन का पर्याप्त रूप से आत्मघात कर दिया है और बहुत से स्थानों में जनजातीय संगठन खंड़ित हो गये है ।
दो समितियों की रिपोर्ट को लेकर असम के पहाड़ी क्षेत्रों के लिए छठी अनुसूची
बनी और मैदानी जनजातियों के लिए संविधान में पाँचवीं अनुसूची को जोड़ा गया था जिसमें उस समय केवल उन राज्यों को शामिल किया गया है जिनको छठी अनुसूची में नहीं रखा जा सका है । राष्ट्रपति द्वारा एक विशेष अधिकारी की नियुक्ति किए जाने के लिए भी एक उपबंध किया गया था जिसका कार्य सभी मामलों की जाँच करना और राष्ट्रपति को रिपोर्ट प्रस्तुत करना था ।
पाँचवीं अनुसूची में मैदानी जनजातीयों के क्षेत्रों को रखा गया । पाँजवीं अनुसूची में अनुसूचित क्षेत्रों के रूप मे जाने जाने वाले क्षेत्रो की घोषणा राष्ट्रपति द्वारा की जा सकती है । राज्य की कार्यपालिका शक्ति अनुसूचित क्षेत्रों पर लागू होती है । लेकिन राज्यपाल को कुछ उत्तरदायित्व सौंपा गया है । इन क्षेत्रों के प्रशासन के बारे में उसे राष्ट्रपति को प्रत्येक वर्ष या जब अपेक्षित हो, रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होती है । संघ की कार्यपालिका की शक्ति इन क्षेत्रों में राज्यों के प्रशासन के बारे में निर्देश करने के लिए प्रयोक्तव्य है । इस अनुसूची में एक जनजातीय सलाहकार परिषद् की परिकल्पना की गई है जिसका कार्य राज्यपाल द्वारा उन्हें भेजे गये उन मामलों पर सलाह देना है जिसका संबंध अनुसूचित जनजातियों के कल्याण तथा उन्नति से हो। राज्यपाल को इनके बारे में कायदे-कानून बनाने की शक्ति प्राप्त है। अनुलाचित क्षेत्रो मे शांति और उनके अच्छे प्रशासन चलाना-भूमि के हस्तांतरण को निषिद्ध या प्रतिबंधित करना, जनजातियों को भूमि के आवंटन को विनियमित करना, साहूकारी के कारोबार को नियंत्रण करना । राज्यपाल को संसद के या विधान मंड़ल के किसी अधिनियम को प्रयोजनीयता के सीमित या आशोघित करने की शक्ति प्राप्त है राज्यपाल के विनियमनों को कानून को शक्ति प्रदान करने के लिए अनिवार्य रुप से प्राप्त होनी चाहिए ओर उसे ऐसा कोई कानून बनाने के पहले जनजाति सलाहकार परिषद् यदि कोई हो, से परामर्श कर लेना चाहिए। संविधान शंसोधन 1976 के द्वारा राष्ट्रपति को राज्पाल के परामर्श से किसी राज्य में किसी अनुसूचित क्षेत्र को बढ़ाने की शक्ति प्राप्त है।
इस प्रकार ब्रिटिश समय के बाद से आदिवासी क्षेत्रों में प्रशासन का विकास लम्बे समय से चल रहा है । ब्रिटिश सरकार करों, राजस्व तथा सेवाओं की वसुली के साथ संतुष्ट थी। जब कभी तथा जहाँ कहीं शांति को खतरा होता था, तो उन्होने सैनिक हस्तक्षेप किया और अपना प्रशासन स्थापित किया। उनकी नीति का सार सरल और सस्ता प्रशासन और सीमाशुल्क, वसूल करना था। रीति-रीवाज, रहन-सहन, आस्था के प्रबंधन में कम से कम हस्तक्षेप करना उनका उद्देश्य था। उन्होने गैर-आदिवासियों द्वारा जन-जातियों के शोषण को रोकने के लिए कुछ उपाय किए।
परन्तु जनजातिय क्षेत्रों के आर्थिक विकास में ब्रिटिश-सरकार का योगदान नगण्य था। लगभग दो सौ वर्षो तक अँग्रेजों ने पिछड़ा क्षेत्र, अनुसूचित क्षेत्र और आर्थिक रूप से वर्जित क्षेत्र आदि अवधारणाएँ जो उन्हीं की बनाई हुई थी और जिनका उद्देश्य भारतवर्ष में में सुचारू रूप से शासन करना था के साथ खिलवाड़ किया। 1935 के भारत सरकार अधिनियम 1935 द्वारा छोटानागपुर तथा संथाल परगना को “आंशिक रूप से बहिष्कृत क्षेत्र” घोषित किया गया। इन्हें संविधान की पाँचवी अनुसूची के तहत रखा गया। यहाँ अंग्रेज प्रशासन के द्वारा एक बहुत बड़ी भूल हो गई थी। यह भूल थी या किसी प्रकार के षड़यंत्र के तहत ऐसा किया गया था, यह स्पष्ट रूप से आज पता करना कठिन है। 1931 के जातीय सर्वे की रिपोर्ट में जिन तेरह जातियों को प्रमीटीव ट्राइव माना गया था, उन्ही जातियों को 1891 में प्रकाषित रिजले साहब की रिपोर्ट ने भी प्रमीटीव ट्राइव माना गया था। दो नोटिफिकेषन इस संबंध में किए गये थे, 1913 में एवं 1921 ईस्वी में जिनमे इन जातियों को प्रमीटीव ट्राइव माना गया था। झारखण्ड़ क्षेत्र में इसी कारण 1908 में छोटानागपुर टिनेन्सी एक्ट बनाया गया। बंगाल एक्ट नं0 6, 1908। झारखंड़ क्षेत्र में इन जातियों की जनसंख्या को जोड़ने पर यह क्षेत्र जनजातीय बाहूल क्षेत्र बन जाता था। फिर यह बात समझ में नहीं आ रही है कि वर्त्तमान छोटानागपुर डीविजन एवं संथाल परगना को संविधान की पाँचवी सूची तक क्यों पहुचना पड़ा। यह तो पूर्ण रूप से बहिष्कृत क्षेत्र के दायरे में ठीक आसाम, मेघालय आदि के तरह आता था।
ब्रिटिश प्रशासन ने जाहिर है ऐसा इसलिए किया कि “फुट डालों और राज करो” झारखंड़ की अटूट धन-सम्पदा के दोहन के लिए ऐसा करना जरूरी था।
Sunday, April 11, 2010
संवैधानिक सुधार की प्रक्रिया
भारत सरकार अधिनियम 1919 के पहले 1918 में मॉटंगू चेम्सफोर्ड की रिपोर्ट में यह कहा गया कि शेष भारत के लिए परिकल्पित राजनितिक सुधार पिछड़े क्षेत्रों पर लागू नहीं हो सकते, क्योंकि ऐसा कुछ भी विद्यमान नहीं था जिसपर राजनैतिक संस्थाओं को आधारित किया जा सके।
भारत सरकार अधिनियम 1919 में इन भू-भागों को दो श्रेणियों में विभाजित किया गया था। कुछ क्षेत्र इतने अधिक पिछड़े हुए माने गये कि उन्हें सुधारों के क्षेत्रों से “पूर्णतया वहिष्कृत” किया गया ? अन्य पिछड़े क्षेत्रों पर “आंशोधित वहिष्करण” की प्रणाली लागू की गई थी। इस संवैधानिक परिवर्त्तन का मुख्य जोर यह सुनिश्चित करने पर था कि भारतीय विधान मंड़ल का कोई अधिनियम गर्वनर जनरल इन कांउसिल के विशिष्ट आदेश के बिना “पिछड़े-भू-भागों” पर लागू न हो। 1974 का अनुसूचित जिला अधिनियम रद्द कर दिया गया था।
साइमन कमीशन की रिपोर्ट में इस बात को स्पष्ट भांप लिया गया था कि इन क्षेत्रों के संबंध में सरकार की नीति क्या होनी चाहिए। रिपोर्ट में यह कहा गया “पिछड़े क्षेत्रों के प्रति सरकार का उत्तरदायित्व केवल मात्र इस बात से पूरा नहीं हो जायेगा कि उन्हें शोषण से संरक्षण प्रदान कर दिया गया है और वहाँ समय-समय पर फैलानी वाली गड़बड़ी की रोकथाम कर दी गई है। प्रशासन का प्रमुख उत्तरदायित्व इन क्षेत्रों के लोगों को शिक्षित करना है ताकि वे अपने पाँवों पर खड़े हो सके और इस दिशा में लगभग नहीं के बराबर शुरूआत की गई है। आयोग ने सिफारिश की कि इन “बहिष्कृत क्षेत्रों” के विकास के लिए निधियों की आवश्यकता है और ये निधियाँ केन्द्र द्वारा उपलब्ध कराई जा सकती है। इन क्षेत्रों के प्रशासन के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा अखिल भारतीय सेवाओं के माध्यम से राज्यपालों की एजेन्सी का उपयोग किया जाना चाहिए। इसने “आंशिक रूप से बहिष्कृत क्षेत्रों” के लिए अलग ढ़ंग की पद्धति का सुझाव दिया है।
भारत-सरकार अधिनियम 1935 में “पिछड़े क्षेत्रों” को “वहिष्कृत क्षेत्रों” एवं “आंशिक रूप से वहिष्कृत क्षेत्रों” के रूप में वर्गीकृत किया गया है। “वहिष्कृत क्षेत्रों” को राज्यपाल के स्वविवेक से कार्य करने के लिए राज्यपाल के व्यक्तिगत शासन के तहत में रखा गया था, जबकि आंशिक रूप से वहिष्कृत क्षेत्र मंत्रालय के उत्तरदायित्व के क्षेत्राधिकार में आते हैं। राज्यपाल इन क्षेत्रों के प्रशासन के संबंध में विशेष उत्तरदायित्व का निर्वाह करते थे, और यदि वह उचित समझे तो अपने व्यक्तिगत निर्णय के फलस्वरूप मंत्रियों के निर्णय के विरूद्ध व्यवस्था देने का अधिकार प्राप्त था। राज्यपाल के निर्देशों के बिना संघीय या प्रादेशिक विधानमंड़ल का कोई कानून इन क्षेत्रो पर प्रयोक्तव्य नहीं था। इस अधिनियम में भी “जनजाति क्षेत्रों” को भारत की सीमाओं के साथ लगे क्षेत्रों के रूप में परिभाषित किया गया था।
Thursday, April 1, 2010
अनुसूचित जनजाति (सेड्यूल ट्राइव) अनुसूचित जाति अवधारणा -
एच0 एच0 रिजले साहब के नेतृत्व में तत्कालीन बंगाल प्राविंस के रहने वाले लोगों का ऐथेनोग्राफिकल सर्वे यानि जातीय सर्वेक्षण कर लिया गया था। रिजले साहब की रिपोर्ट 1981 में प्रकाशित हुई थी, "दी ट्राइव एंड कास्ट आँफ बंगाल" बंगाल प्राविंस में अनेक जनजातियाँ निवास करती है। उन्होनें इन जातियों को चिन्हित किया। साइमन कमीशन की रिपोर्ट (1929-30) में आई। 1918 से लेकर आगे 1931 तक पुनः सर्वेक्षण का काम शुरू हुआ। डब्लू जी0 लेसी साहब के नेतृत्व में जनगनणा की रिपोर्ट 1931 में छपी एवं इसमें जातीय वर्गीकरण भी किए गये। यानि ऐथेनोग्राफिकल सर्वे भी किया गया एवं रिपोर्ट प्रकाशित की गई।
रिजले साहब ने 1884 में सर्वे किया था। उनकी ऐथेनोग्राफिकल सर्वे की रिपोर्ट के बाद 1913 में भारत सरकार ने एक नोटिफिकेशन निकाला जो 2 मई 1913 को गजेट आँफ इंडिया में प्रकशित हुई जिसका नम्बर 550 था। यह शिमला से प्रकाशित की गई। इस अधिसूचना ने बिहार एवं उड़ीसा क्षेत्र में निवास करने वाली मुंड़ा, उराँव, संथाल, हो, भूमिज, खड़िया, घासी, गाँड़, कंध, कोरवा, कुरमी, माल-सूरिया पान जाति को जनजाति कहा था और इसी वजह से उन्हे भारत सरकार के उत्तराधिकार अधिनियम 1865 के प्रावधानों से मुक्त रखा गया था। इन जातियों की अपनी अलग-अलग परम्परा पाई गई थी। इनके अपने उत्तराधिकार के नियम थे। सम्पति हस्तांतरण एवं प्रबंधन के अपने सामाजिक रीति-रिवाज थे। अतः इनपर विधान मंडल द्वारा पारित साधारण कानून जो मैदानी क्षेत्रों के निवासियो के लिए लागू किए जा सकते थे, इन क्षैत्रों तथा इन जातियों पर लागू नहीं किए गये। यह नोटिफिकेशन (अधिसूचना) रेस्ट्रोस्पेकटिव एफेक्ट (प्रतिलक्षी) प्रभाव यानि इंडियन सक्सेशन एक्ट 1865 के बनने के दिन से ही।
ज्ञातव्य हो कि 1931 में पुनः डब्लू जी लेसी साहब ने भारतीय जनगणना की रिपोर्ट प्रकाशित कराई एवं इसमें जनजातियों को भी सूचिबद्ध किया। इन्हे प्रीमीटीव ट्राइव का दर्जा भी दिया गया। एब-ओरिजनल कहा। 1931, 8 दिसम्बर को पुनः एक नोटिफिकेशन आया, कानून विभाग द्वारा। इसमें भी उपरोक्त तेरह जातियों को जनजाति कहा गया एवं भारतीय उत्तराधिकार नियम 1925 इंडियन संक्सेशन एक्ट 1925 के प्रभावों से मुक्त रखा गया एवं इसे भी प्रतिलक्षी प्रभाव-रेट्रोस्पेकटिव एफेक्ट से लागू किया गया यानि 1925 से ही।
इस प्रकार से हम देखते है कि झारखण्ड क्षेत्र की बहुसंख्यक जनता ब्रिटिश शासन काल में जनजाति रही थी।
झारखण्ड़ क्षेत्र का प्रशासन अपने आप में अनूठा था। अंग्रेजी राज से पूर्व छोटानागपूर पठार अनेक बड़े सामन्तो के कब्जे में था। संथाल परगना का पहाड़ियाँ जनजाति के कब्जे में था। इसके मैदानी क्षेत्र और घाटी में घटवार या घटवाल तथा जमींदारों का नियंत्रण था। मुगल-सम्राट के साथ साधारण निष्ठा थी।यहाँ पर मुसलमान शासकों ने पूर्ण रूपेण कब्जा नहीं किया था। झारखण्ड़ के निवासी आदिम जनजाति, प्रिमिटिव ट्राइव के लोग थे, जिनका अपना कानून था। अपने रस्मो-रिवाज थे। अपना रीति-रिवाज था। सम्पति के उत्तराधिकार के एवं हस्तांतरण के अपने नियम थे। वस्तुतः यहाँ के उस समय के निवासी हिन्दुत्व एवं ईस्लाम दोनों से अप्रभावित थे। वे प्रकृति पूजक थे।मुगलकाल के बाद सबसे ज्यादा प्रभाव ब्रिटिस शासन का इस क्षेत्र पर पड़ा। 1765 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कम्पनी को बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा की दिवानी स्वीकृति की गई थी। और इसी के साथ इस क्षेत्र में ब्रिटिश प्रशासन का अध्याय शुरू हुआ। दीवानी प्राप्त करने और सेवाएँ प्राप्त करने का अधिकार मिल गया। इस अधिकार का उपयोग कम्पनी ने अनुशासनहीन सामंतो, जमींदारो, मुखीयों के खिलाफ किया जो राजस्व या कर देने में अवहेलना या विलम्ब करते थे। ईस्ट इंडिया कम्पनी इन लोगों के वापसी झगड़े में हस्तक्षेप करती थी। इस अधिकार के तहत जनजातियों के विद्रोह को कुचलने के लिए सेना का उपयोग कम्पनी किया करती थी । 1776 में स्थाई बन्दोबस्त लागू करने के साथ कम्पनी का दामन चक्र पक्का हो गया।1788 में ईस्ट इंडिया कम्पनी की शक्ति तम्राट को हस्तांतरित हो गई। 1765 के बाद से करीब एक सौ वर्षो से भी अधिक समय तक इन क्षेत्रो में जनजातिय विद्रोह एवं आन्दोलन का समय रहा। ब्रिटिश प्रशासनिक प्रत्युत्तर पर ये विद्रोह हुए। इनमें महत्वपूर्ण है मलेर विद्रोह (1772), तिलका माँझी विद्रोह (1784), तमाड़ विद्रोह (1798), कोल इन्सरक्सन (1820), हो विद्रोह (1832) ग्रेट कोल विद्रोह आदि।सम्राट के पास शक्ति आ जाने के बाद जनजातीय क्षेत्र के प्रशासन में अनेक परिणामी परिवर्त्तन किए गये थे।मीलिटरी एक्शन के जरीए जनजातीय विद्रोहों एवं अन्य आन्दोलन को कुचलने का व्यापक इन्तजाम किया गया था। तीन तरफा कार्यवाही की गई, ग्राउंड प्राशासन को मजबूत करना, जनजातीयों की शिकायतों को दूर करके उन्हे शांत करना जो उस समय मुख्यतया ठेकेदारों, सामन्तो, जागीरदारों, महाजनों, व्यापारियों आदि के खिलाफ हुआ करती थी।अधिकांश शिकायतों का केन्द्र-बिन्दु जमीन और वनों पर उनका अधिकार एवं कभी-कभी उनकी महिलाओं का शोषण होता था।झारखण्ड क्षेत्र एक जनजातीय क्षेत्र रहा था। अधिकांश जनसंख्या जनजाति थी। ब्रिटिश प्रशासन ने अठारहवीं सदी के अन्त से ही संवैधानिक प्रक्रिया प्रारम्भ कर दिया था। जिसके अर्न्तगत प्रशासन को भारतीयों को सहयोजित करने और धीरे-धीरे उन्हे उत्तरदायित्व सौपना था। फिर भी झारखण्ड़ जैसे जनजातीय क्षेत्रों का प्रशासन इस प्रक्रिया से अछूता रह गया था।ब्रिटिश शासन ने भारतवर्ष में अपनी सत्ता चलाने के लिए एवं अपने कानूनों को लागू करने के लिए सर्वेक्षण के काम किए। जमीन का सर्वे तथा जातीय सर्वे भी किया। भारतवर्ष में निवास करने वाली जातियों का वर्गीकरण किया एवं भू-भाग का भी वर्गीकरण किया। ब्रिटिश शासन ने दो प्रकार के क्षेत्र पाये, एक तो भारत का मैदानी-समतल क्षेत्र तथा दूसरा पहाड़ी क्षेत्र। मैदानी लोगों के जीवन एवं दृष्टीकोणों में बहुत बड़ा अन्तर एवं विरोधावास पाया।इस अन्तर एवं विरोधावास का कारण यह था कि पहाड़ी क्षेत्र में भारतवर्ष की जनजातियाँ वास करती थी। जिनका रहन-सहन, रीति-रिवाज आदि अलग थे। ब्रिटिश सरकार का उद्देष्य विधान मंड़लो के सांविधानिक प्राधिकार को इन क्षेत्रों में न्यायिक एवं प्रशासनिक पद्धति को सरल तथा लचीली रखना सुनिश्चित करना चाहते थे।