Monday, August 16, 2010
झारखंड़ में बदली परिस्थिति –
अगर पृथ्वी की आयु चौबीस घंटे की ऑकी जाय तो मानव-जीवन की सम्पूर्ण आयु मात्र दो मिनट की आयेगी। मानव-जीवन का अर्थ है मानव की सृष्टि से आज तक का उसका अस्तित्व का समय। ऐसा भू-गर्भ शास्त्रियों एवं खनन वैज्ञानिकों का कहना है। मानव ने अपनी उत्पत्ति से आजतक कई युगों की यात्र की है। पाषाण-युग से आज तक की यात्रा। जल, जंगल एवं जमीन ने मानव को पैदा किया है, अतः उनकी शारीरिक बनावट उसके रहन-सहन का ढंग, उसकी भाषा उसकी संस्कृति पर इन्हीं का प्रभाव पड़ा। संसार के विभिन्न इलाकों, द्वीपों, महाद्वीपों के मानव अलग परिस्थितियों में जीवन-यापन करने के कारण अलग-अलग साँचों में ढल गये। अलग-अलग प्रकृति के हो गये। अलग-अलग प्राकृतिक परिवेश के चलते अलग-अलग स्वभाव के हो गये। अलग-अलग बोलियाँ, भाषाएँ बोलने लगे। अलग-अलग सभ्यताएँ उभर कर सामने आई। अलग-अलग राष्ट्रीयताओं का जन्म हुआ। अलग-अलग राष्ट्र, देश बने। प्रदेश बने।
मानव की सभ्यता का इतिहास कृषि युग से शुरू हुआ, जब मानव ने अनाज उगाना शुरू किया। अनाज के लिए समतल जमीन पर खेती करना आवश्यक था, जहाँ पानी की प्रचुरता थी। मनुष्य की सभ्यता के विकास के मूल में पानी एक बहुत बड़े तत्व के रूप में मौजुद रहा। पानी के साथ लकड़ी तथा बाद में लोहे का नम्बर आया। यही कारण था कि रेनासाँ-पीरियड तक बड़े-बड़े शहरों, नगरों का अर्विभाव बड़ी-बड़ी नदियों एवं समुन्दर के किनारों पर हुआ। इंगलैंड, रोम, एथेन्स, ग्रीस, दिल्ली, वाराणसी, इलाहाबाद, पटना, कलकत्ता, मद्रास, बम्बई आदि शहर नदियों के किनारे या समुद्र के किनारे बसे।
कृषि-युग में राजतंत्र का उदय हुआ। भारतवर्ष में समाज को जातियों एवं सामुदायों मे बाँटा गया। भारतीय समाज विभिन्न समुदायों यानि जातियों में बँट गया। यह बँटवारा काम के आधार पर हो गया।
विश्व के सभी जगहों में खान-पान, रहन-सहन एवं सामाजिक मूल्यों का निर्धारण भी वहाँ के जमीन, जल एवं जंगल के अनुरूप हुए। कृषि-युग एवं धार्मिक उत्थानों के युगों में मानव का जीवन अपेक्षाकृत शांत एवं प्रकृति के अनुरूप चलता रहा। अशांति भी हुई। राज-तंत्र के लिए लड़ाई लड़ी गई। धार्मिक युद्ध भी हुए। इसके विरोध में समाजवाद लागू करने के लिए भी आन्दोलन होते रहे। पर आम जनता की जीवन शैली पर इन सबका कोई बड़ा प्रभाव नहीं हुआ। जीवन यापन की शैली का क्रमिक विकास होता रहा। सभ्यता एवं संस्कृतियों का क्रमिक विकास होता रहा। जीवन-यापन की शैली पर आम जनता के बीच कोई खास या अचानक परिवर्त्तन नहीं आया।
मनुष्य के जीवन की इस श्रृखला में जो सबसे बड़ी बात हुई वह थी भाप के इंजिन का अविष्कार, बिजली की खोज। यानि औद्योगिकरण के युग का प्रारम्भ। इसने पूरी मानव-जाति के इतिहास में अचानक नया मोड़ पैदा कर दिया। मानव-जाति को बहुत सीघ्र नये रास्ते पर सींच कर जला गया। मानव जाति की सोच को, उसकी जीवन शैली को औद्योगिकरण ने बूरी तरह प्रभावित किया। मानव जिन चीजों की कलपना तक नहीं कर पाया था, उन चीजों को वैज्ञानिकों ने सामने लाकर खड़ा कर दिया। तब शुरू हो गया वैज्ञानिक सभ्यता का युग। टेलिविजन, दूरभाष, रेडियो, मोबाईल फोन, रेलगाड़ी, हवाई जहाज से लेकर अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक हथियार, रसायनिक हथियार, आर0 डी0 एक्स0 बम, बारूद, प्रक्षेपात्र, परमाणु बम आदि। ग्रहों की दूरियाँ भी मानव मापने लगा। चाँद पर पहुँच गया और चन्दामामा की असलियत का पर्दाफास कर दिया। धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक मान्यताओं को कड़ा झटका लगा।
अब अगर यूँ कहें कि वैज्ञानिक युग में मानव का काम अब सिर्फ पानी एवं उपजाऊ जमीन से नहीं चलने लगा तो कोई गलत न होगा। अब मानव को चाहिए था, लोहा, कोयला, बॉक्साइट, जस्ता, ताँबा, सोना, युरेनियम, चाँदि, प्लेटिनम, अबरख, लकड़ी, बाँस, घास, तरह-तरह के खनिज पदार्थ तथा बिजली। पर ये चीजें बड़ी-बड़ी नदियों की समतल जमीनों पर नहीं मिले। तब इनकी खोज जंगलों भरे इलाकों, पहाड़ों से भरे भू-भागों में होने लगी। तब पाया गया कि वैज्ञानिक सभ्यता को बरकरार रखने के लिए सभी आवश्यक चीजें, सभी संसाधन जंगलों-पहाड़ो से भरे भू-भागों में मौजूद थी। बिजली पैदा करने वाली तेज धार वाली नदियाँ भी इन्ही इलाकों में मौजूद थी। विनमय के साधन को बनाने के लिए यानि सिक्के, नोट, कागज बनाने के तथा सोना, ताँबा, लकड़ी, सेवई घास, बाँस भी इन्ही भू-भागों में वर्त्तमान में है। आवागमन के लिए सड़कों को बनाने के लिए पत्थर, अलकत्तरा भी इन्ही पहाडो पर मिले। भवन निर्माण के लिए सिमेंट, चुना पत्थर भी यहीं। लोहा भी यहाँ, युरेनियम भी यहाँ। ऊर्जा के लिए कोयला भी इन्ही भू-भागों में मिले।
जंगल-झाड़ से घिरे भू-भाग ही झारखंड़ कहे जाते है। भारतवर्ष में कई झारखंड है। हमारा झारखंड, बिहार, बंगाल, उड़ीसा, मध्यप्रदेश, के हिस्सों में फैला है। वैज्ञानिक सभ्यता को चलाने के लिए आवश्यक सभी वस्तुएँ यहाँ मौजूद है। इस सभ्यता को चलाने के लिए आज झारखंड की जमीन, जल एवं जंगल तथा इसके खनिजों का किस प्रकार दोहन किया जा रहा है, एवं इसके क्या दुष्परिणाम हुए है, किस प्रकार झारखंड एक आंतरिक उपनिवेश बन गया है, इस पर हम चर्चा करेंगे।
भारतवर्ष ही नहीं, विश्व की वैज्ञानिक सभ्यता को चलाने के लिए झारखंड का क्या योगदान रहा है, इसे हमने अब जान लिया है। भारतवर्ष में एक नहीं कई झारखंड है, जहाँ औपनिवेशिक शोषण जारी है। झारखंड का धन झारखंड के लिए अभिशाप बन गया। इन सम्पदाओं का औद्योगिक विकास के लिए दोहन जरूरी था और इसी ने झारखंड को एक आंतरिक उपनिवेश बना डाला। बींसवी सदी के शुरूआती द्वितीय एवं तृतीय दशक से औद्योगिक जगत का प्रारम्भ झारखंड क्षेत्र में कोयले की खदानों की शुरूआत से हुआ। इसी शुरूआती दौर के समय से उन्नींस सौ पचास तक औद्योगिकरण की पृष्ठभूमि भारतवर्ष में भी तैयार हो चुकी थी। बम्बई, कानपुर आदि जगहों के कपड़ा-मिलों एवं चमड़े के कारखानों आदि के साथ-साथ ताँबा की खदानें बनने लगी थी। भारतवर्ष को आजादी 1947 मे मिली। इसके संविधान को मान्यता छब्बीस जनवरी उन्नींस सौ पचास मे मिली। आजादी मिलने के बाद तो इस क्षेत्र में सैकड़ों प्रकार की खनिजों के दोहन की प्रक्रिया में तेजी आ गई। औद्योगिकरण में तेजी आई। बड़ी-बड़ी ताप-विद्युत परियोजनाएँ लगाई जाने लगी। नदियों को बाँधा जाने लगा। बाँध बनाए जाने लगे। दामोदर, बराकर, स्वर्ण-रेखा, कोनार, खरकाई आदि कई बड़ी नदियों पर बाँध बाँधे गये। इसके साथ ही छोटी नदियों के जल को भी घेरा गया। पत्थर तोड़ने के हजारों क्रेशर लगने लगे। इन खनिजों पर आधारित सैकड़ों प्रकार के कल-कारखाने बनने लगे। कई औद्योगिक शहरों का जन्म हुआ, जैसे धनबाद, बोकारो, गिरिडीह, हजारीबाग, राँची, जमशेदपुर, सिन्दरी, घाटशिला वगैरह-वगैरह है। झारखंड के जंगलों एवं पहाड़ों के बीच ये शहर बसते गये।
Thursday, August 5, 2010
अध्याय-चार
पर कहीं-कहीं तो समशीतोष्ण मौसम। न ज्यादे ठंढ़ न ज्यादे गर्मी। पहाड़, नदी, नाले, झरनों, से भरपूर इलाकें। सैकड़ों प्रकार के फलदार वृक्ष एवं इमारती लकड़ी। जड़ी-बूची, औषधियों का भंड़ार। पशु-पक्षी की भरमार। इतना ही नहीं धरती के नीचे उन्ही इलाकों में खनिज पदार्थो की भरमार। देवताओं की वास्तव में चिंता हुई और वे रचनाकर्त्ता, सबके पालक विष्णु भगवान के पास पहुँचे। भगवान तो क्षीर-सागर के गहरे तल में गहरी निन्द्रा में लीन थे। पत्नी लक्ष्मी उनके पांव दबा रही थी। इतने सारे देवताओं को देखकर प्रभु को जगाया गया। प्रभु ने हाल समाचार पुछा ओर आश्चर्य व्यक्त किया कि इतने सारे स्वर्ग के देवता एक साथ किस प्रयोजन से पधारे थे। देवताओं ने कहा कि प्रभु पृथ्वी का निर्माण बड़े ही गलत ढंग से हो गया है, भविष्य में भारी समस्या देवलोक को ही हो सकती है। आपने एक ही स्थान पर सारी सम्पदा दे डाली है बाकि जगहों के साथ अन्याय हो गया। प्रभु ने उनसे पुछा कि ऐसा कहाँ हो गया है। देवताओं ने कहा कि प्रभु झारखंड़ क्षेत्र में आपने सारी न्यामतें न्योछावर कर दी हैं और बाकि जगहों के साथ अन्याय हो गया। प्रभु ने उनसे पुछा कि ऐसा कहाँ हो गया है। देवताओं ने कहा कि प्रभु झारखंड़ क्षेत्र में आपने सारी न्यायमतें न्योछावर कर दी हैं और सारी बातें प्रभु को बताया गया। भविष्य की समस्याओं की ओर ध्यान एकत्रित किया गया। प्रभु थोड़ी देर चुप रहे। फिर उन्होंने मानव-निर्माण विभाग में फोन लगाये ओर यह जानकारी प्राप्त की कि अभी पृथ्वी में मानव जाति का निर्माण हुआ था या नहीं, झारखंड़ में भी मानव बने थे कि नहीं। उधर जबाव मिला कि उस समय तक इस संबंध में कोई कदम ब्राह्माजी के द्वारा उठाया नहीं गया था। रचयिता ब्राह्मा गहन सोच में थे। प्रभु ने देवताओं को बता दिया कि उन्होने समस्या का समाधान सोच लिया है ओर देवताओं को वापस अपने-अपने काम मे लौटकर जाने को कह दिया। देवता असन्जस में पड़ गये। प्रभु फिर सो गये थे, बिना यह बताए कि आखिर समस्या का समाधान क्या था ? उन्होने फिर से प्रभु को जगाया और इस बाबत पूछा। प्रभु ने झल्लाकर कहा कि आप सबों को चिंता करने की बात नहीं है। समाधान यह है कि हम झारखंड़ में इस प्रकार के मनुष्य बनाएँगें जो इन सारी सम्पत्तियों, खनिजों को पहचानेगा ही नहीं। और अगर पहचानेगा नहीं तो उसका उपयोग भी नहीं करेगा। यह कहकर प्रभु फिर से सो गये।
और तब से झारखंड़ की सम्पदा ही झारखंड़वासियों के लिए अभिशाप बन गयी। झारखंड़ की लकड़ी, झारखंड़ की के वन-उत्पाद, झारखंड़ का कोयला, लोहा, ताँबा, अबरख आदि खनिज, उससे सम्बन्धित व्यापार, नौकरी, चाकरी, ठेकेदारी, झारखंड़ की बिजली आदि सभी सम्पदाओं पर झारखंड़ से बाहर के लोगों का कब्जा हो गया। झारखंड़ के बाहर, भी बाहर के लोगों ने बसाए। और रहने लगे। मजे की बात तो यह हो गई कि इन सम्पदाओं के दोहन के लिए जरूरी मजदूर, श्रमिक, अधिकारी भी बाहर से लाए गये। झारखंड़ के लोग झारखंड़ की प्रकृतिक सुन्दरता में भी रम गये। न बाढ़ का डर, न सुखे की त्रासदी। न गर्म न ठंड़ा। साल भर का अनाज उगा लेते ओर गीत गाते। नाचते। माँदर, ढोल, मगाड़ा, बांसुरी, करताल बजाते और मस्त रहते। अपनी संस्कृति को पकड़े बैठे रहे।
प्रभु ने झारखंड़ के मनुष्यों को भी अभिशाप दिया, उस अभिशाप का नतीजा हुआ कि झारखंड़ में शोषण चरम पर पहुँच गया। वास्तव में प्रभु से बड़ी गलती हो गई थी, उन्होंने समस्या का समाधान नहीं किया था, बल्कि समस्या का तत्काल निपटारा कर दिया था। समस्या का समाधान तो तब होता जब पृथ्वी का पुनः निर्माण किया जाता और सभी भागों को समान रूप से दौलत दी होती। पर झारखंड़ के मनुष्यों की दृष्टि को भ्रमित करके उन्होंने समस्या का अस्थाई हल ही निकाला था और इसे सिर्फ निपटा दिया था। प्रभु विष्णु की ही तरह केन्द्र सरकार एवं राज्य-सरकारों ने कोई स्थाई कदम नहीं उठाए। प्रभु विष्णु की ही तरह केन्द्र सरकार एवं राज्य-सरकारों ने कोई स्थाई कदम नहीं उठाए। प्रभु की तरह ही अब झारखंड़ को “टेकल” किया जाने लगा। “सोल्भ” करने की और किती ने ध्यान नहीं दिया। पहले तो झारखंड़ की सम्पदा दूसरों के लिए समस्या का कारण, बनने वाली थी, पर अब तो झारखंड़ की सम्पदा झारखंड़वासियों के लिए ही समस्या बन गई है।
एक दिन पुनः भगवान विष्णु को नींद से जागना पड़ा। कारण था कि स्वर्ग के सभी देवता पुनः उन्हें जगाने वहाँ पहुँचे थे। भगवान ने उठते ही पूछा कि अब क्या हो गया ? क्या किसी असूर ने स्वर्गलोक में हमला बोल दिया है ? देवताओं ने कहा कि ऐसी बात नहीं हैं। उनकी परेशानी का कारण पृथ्वी पर हो रहे अत्याचार हैं। पृथ्वी वासियों की चीख-पुकार से उनकी नींद हराम हो गई है। उस पर तो खासकर झारखंड़ क्षेत्र में सबसे ज्यादा अत्याचार अनाचार जुल्म असुरों द्वारा किये जा रहें है। इस वार्त्तालाप के दौरान ही प्रभु के कानों में क्षीर-सागर के गहरे तल तक चीख-पुकार, क्रंदन की आवाज पहुँची। उन्होनें बड़े आश्चर्य से पुछा भी यहाँ कौन रो रहा है ? देवताओं ने उन्हें बताया कि ये आवाजे पृथ्वी के झारखंड़ क्षेत्र से आ रही है। प्रभु ने देखा की झारखंड़ में मनुष्यों को जिंदा जलाया जा रहा है। वन के प्राणियों को लगातार गोली मारा जा रहा है। उन्होनें यमराज से पुछा कि मनुष्यों एवं अन्य प्राणियों पर ऐसा अत्याचार करने का किसने कानून बनाया। तुम्हारे यमलोक में तो मृत्यु के बाद प्राणियों पर ऐसा अत्याचार करने का किसने कानून बनाया। तुम्हारे यमलोक में तो मृत्यु के बाद प्राणियों के पाप-पुण्य का लेखा-जोखा करके उसे स्वर्ग या नर्क में लाया जाता है, फिर उचित सजा दिया जाता है। पर यह जीतेजी प्राणियों को जलाना, समझ में नहीं आता। क्या किसी अत्याचारी असुर का साम्राज्य झारखंड़ क्षेत्र में जल रहा है ? देवताओं से उन्हें जबाव मिलते, इसके पहले ही उन्होनें देखा कि वहाँ तो चारों तरफ असुर ही असुर दिखाई दे रहें है। जो बड़े-बड़े वाहनों उड़न खटोले पर बड़े-बड़ हथियार लिए घूम रहें हैं।
देवताओं ने भगवान से कहा कि प्रभु अब आप अवतार लेकर झारखंड़ में जाएँ एवं असुरों का नाश करें अन्यथा न तो भू-लोक बचेगा न ही स्वर्ग, न ही आपका सिंहासन। असुर अब चाँद पर पहुँच गये, मंगल की दूरी माप लिया। जल के अन्दर चलने की पन-डुब्बी बना ली है। अन्य ग्रहों पर भी कब्जा करने की तैयारी चल रही है।
प्रभु बड़े चितिंत हुए ऐर कहा कि “देखो देवताओं मैं तो अवतार लेते-लेते थक चुका हूँ।” फिर अब तो वहाँ पहले की तरह एक असुर रावण या कंस नहीं है। वहाँ तो दर्जनों एक साथ घूम रहे है। भाई! मुझसे उनका नाश करना संभव नहीं होगा। अब आप तैतींस करोड़ देवता हो, अब आप ग्रुप बना कर जाएँ-ठीक असुरो की तरह और समस्या का समाधान करें।
प्रभु फिर करवट लेकर सो गये। देवताओं के सामने अब असली समस्या आ खड़ी हुई थी। झारखंड़ के जल, जमीन एवं जंगल की रक्षा कैसे की जाए। यहाँ तक कि झारखंड़ की वायू भी प्रदुषित, हो चुकि थी कि उस वायु में साँस लेना मुश्किल हो गया। आसमान की परतों में छेद हो रहे थे। पर्यावरण तक असंतुलित हो गया था।
अब झारखंड़ी तो इतने ज्यादे शोषित-पीड़ित हो चुके थे कि इस शोषण को अपनी नियति मानने लगें थे। सिर उठाने की हिम्मत नहीं थी। हाथ-बाँधे, गर्दन झुकाए अपमानित होते रहते। चलती-फिरती लाश के समान सिर्फ हिलना-डूलना भर रह गया था।
ऐसी परिस्थिति में उनकी रक्षा कैसे हो ? उनके जीवन में परिवर्त्तन कैसे हो ? झारखंड़ियों को मुक्ति कैसे मिले ?
Friday, July 23, 2010
सुधारवादी सामाजिक एवं धार्मिक आन्दोलन –
बीसवीं सदी के पहले दो दशको में आदिम-जातियों को यानि प्रीमिटीव ट्राइव को बड़े पैमाने पर ईशाई बनाया गया। इनका धर्म-परिवर्त्तन किया गया। ओर यह प्रक्रिया बड़े-जोरों से चलाया गया।
यों तो बिरसा आन्दोलन एवं उसके पूर्व के आन्दोलनों का एक लम्बा इतिहास है जिसे यहाँ विस्तार से नहीं लिखा जा रहा है।
लगातर हो रहे आन्दोलनों ने तथा बीसवी सदी के प्रारम्भिक दो दशकों में हुए सुधारवादी और सामाजिक, धार्मिक आन्दोलनों ने झारखड़ अलग राज्य की अवधारणा को जन्म दिया।
उराँव जाति ने जो आन्दोलन 1902 ईस्वी में प्रारंभ किया था उसे एक प्रसिद्ध सुधारवादी आन्दोलन के रूप में जाना गया। इस आन्दोलन ने “कुरखा” धर्म या उराँवों के धर्म पर बल दिया। इस आन्दोलन को धर्म गुरूओं ने चलाया। इसमें आदिम भूत-प्रेत, बूरी आत्माओं से छुटकारा की बात कही गई थी। इसके अलावा अन्याय रहित भूमि-व्यवस्था तथा जमींदारों, महाजनों सरकारी कर्मचारियों के अन्याय से मुक्ति दिलाने की बात कही गई। बिरसा मुंड़ा-जाति ने भी मुँड़ा-जाति में व्याप्त पारम्परिक कुरीतियों से छुटकारा पाने की बात कही थी ओर उपाय किया था। मुंड़ा तथा उरांव अपने भूतकाल को स्वर्णीम मानते थे, इसीलिए उस काल को याद करते थे। वैसे तो झारखंड़ क्षेत्र के सभी आदिम जनजाति अपनी-अपनी परम्परा से जुड़े थे और उनसे अलग हटना नहीं चाहते थे।
हिन्दुओं के द्वारा चलाये गये “भक्ति-आन्दोलन” का भी प्रभाव झारखंड़ क्षेत्र में पड़ा। जैसा मैंने पहले भी इंगित किया है कि झारखंड़ में भक्ति-भाव या समर्पण की भावना यहाँ के जनजातियों में नहीं थी। बराबरी का भाव था। किसी की अराधना करना संस्कृति में निहीत नहीं था। पर इन वर्षो में बिरसा मुंड़ा के बाद झारखंड में भी ब्राह्मणवादी विचार धाराओं यानि हिन्दुत्व का प्रचार-प्रसार जोरों पर था। रामायण एवं महाभारत का पाठ नियमित रूप से गाँव-गाँव में शुरू किया गया था। यह पाठ खाली समय में यानि गर्मी के दिनों में किया जाता। उसी प्रकार वैष्णव धर्म का भी प्रचार-प्रसार गाजे-बाजे के साथ किया जाता। चैतन्य महाप्रभु के वैष्णव-वैरागी अनुआयी “खोल यानि मृदंग बाजे के साथ कीर्तन गाते, गाँव-गाँव में हरिबोल” स्थान बनाए गये।
जावा भगत, कदर के शिबू भगत, टाना भगत, जुलहा अरवा भगत के द्वारा चलाए गये आन्दोलन शुद्धता आन्दोलन थे और विशुद्ध खान-पान एवं सादा जीवन पर जोर देते थे। हिन्दुओं के आन्दोलनों को गोसाई गुरू, वैष्णव वैरागी और कबीर-पंथियों ने भी किया था। भगतों को बहुत प्रभावित किया था। इन “भगतों” नें “संथाल” तथा “हो” जाति के लोगों को प्रभावित किया था।
कुछ अन्य जनजातियाँ भूमिज आदि राजपूत बनने जले थे। ब्राह्मणवादी संस्कृति के चलते हिन्दुओं ने इनका वर्गीकरण “राजपुत” में किया। इनके पास जमीन थी। पर इस प्रयास में पूरी सफलता हिन्दुओं को प्राप्त नहीं हो सकी। क्योंकि मुर्गी-पालन, माँस, शराब, शुअर-पालन आदि को छोड़ने के लिए अधिकांश तैयार नहीं थे।
यही हाल कुड़मी-महतो समुदाय का था। 1915 ईस्वी में भक्ति आन्दोलन एवं हिन्दुत्व से प्रभावित निरंजन महतो ने कुड़मियों को क्षत्रिय जामा पहनाने का आन्दोलन शुरू किया था। इस समुदाय के हाथ में जमीन-जायदाद थी। इस समुदाय के अन्दर “जनेऊ” धारण करने का आन्दोलन चलाया गया तथा माँस-मदिरा छोड़ने का आन्दोलन चलाया गया। पर यह सफल नहीं हो सका। पर पूरे समुदाय को दुविधा जनक स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया। जिसका कुपरिणाम कई वर्षों के बाद सामने आया। कुड़मी-महतो समुदाय भी मुंड़ा की तरह खूँटकाटी अधिकार का उपयोग करता रहा था। यह आदिम जाति में शामिल होनो के बावजूद “हँड़ियाँ” नामक पेय पदार्थ का या खाद्य-पदार्थ का सेवन नहीं करता था।
1930 ईस्वी तक झारखंड़ में धार्मिक-परिवर्त्तनों या सुधारवादी आन्दोलनों का बहुत जोर रहा।
1931 ईस्वी के जातीय सर्वे जिसे डब्लू0 जी0 लेसी0 के द्वारा कराया गया था, की रिपोर्ट प्रकाशित की गई थी। इसके कुछ वर्षो के बाद बिहार को दो टुकड़ों में बाँटा गया। बिहार एवं उड़िसा। झारखंड़ क्षेत्र का कुछ हिस्सा उड़िसा में शामिल हो गया। इससे पुनः एक झटका इस क्षेत्र के लोगों की भाषा, संस्कृति, सभ्यता पर पड़ा। सामाजिक स्तर एवं सामाजिक प्रतिष्ठा भी परिवर्त्तन हुए।
ज्ञातव्य हो कि 1912 में बिहार को बंगाल प्रोविंस से अलग किया गया था। उस समय भी झारखंड़ क्षेत्र के कई बड़े जिले पश्चिम बंगाल के अन्दर रह गये थे।
इस प्रकार झारखंड़ क्षेत्र तीन बड़े राज्यों के अन्दर समाहित कर दिए गया था। इस क्षेत्र की एकता को इस प्रकार से अलग करके तोड़ने का काम किया गया था।
यह वही समय था जब संवैधानिक सुधारों की प्रक्रिया देशभर में शुरू की गई थी। 1935 के गर्वमेंट ऑफ इंड़िया एक्ट के तहत संथाल परगना एवं छोटानागपुर डीविजन को आंशिक रूप से बहिष्कृत क्षेत्र घोषित किया था। इन दो भू-भागों को आदिवासी, जनजाति बाहुल क्षेत्र होने के बावजूद इन्हें संविधान की पाँचवी सूँची में रखने की प्रक्रिया की गई। इसका एक मात्र कारण यही होगा कि ये क्षेत्र बिहार के अन्दर शामिल कर लिए गये थे एवं बिहार की पूरी गैर-आदिवासी जनसंख्या के मुकाबले आदिवासी जनसंख्या उतनी नहीं थी। पूरे बिहार को संविधान के छठी सूची में नहीं रखा जा सकता था। आंशिक रूप से किसी राज्य के हिस्से को संविधान की छठी अनुसूची में दर्ज नहीं किया जा सकता था।
Tuesday, June 29, 2010
बिरसा मुंडा का आन्दोलन एवं सुधारवादी समय
“सन् 1895 से 1900 ईस्वी तक बिरसा आन्दोलन वस्तुतः अपने अन्तिम लक्ष्य के प्रारूप में परिवर्त्तन वादी था” ऐसा श्री के0 एल0 शर्मा जी का कहना है। बिरसा मुंड़ा का आन्दोलन वास्तव में इस क्षेत्र के लोगों को संगठित करके अपनी पहचान बनाकर शोषण से मुक्ति का आन्दोलन था। इतिहासकार श्री कैथलीन गोब लिखते हैं कि “अति भौतिक और तिलस्मी उथल-पुथल उन सांस्कृति अल्प संख्यकों में बहुत अधिकता से होता है जो कि अपनी परम्परागत सुरक्षा, अपने व्यवसाय एवं अस्तित्व को गँवा बैठे हैं और अपने बीते दिनों और अपने आस-पास की तुलना में गहन शोषण के शिकार हुए हैं।” उन्होंने यह भी लिखा है कि यह व्याख्या उन आदिवासियों पर लागू होती है जो कि अपने अस्तित्व में हस्तक्षेप, भूमि से बेदखल होना, धोखेबाजी, दिवालियापन एवं पढ़े-लिखे और उच्चत्तर शैक्षणिक आक्रामक बाबूओं द्वारा अपनी संस्कृति के हनन का शिकार हुए हैं।
लेकिन बिरसा मुंड़ा का आन्दोलन कोई धार्मिक आन्दोलन नहीं था। इसमें धार्मिक-आवरण जरूर दिया गया था। बिना इस प्रकार के कोई धार्मिक आवरण दिए तथा बिना क्सी तिलिस्मी या दैवी चमत्कारिक वातावरण सृष्टि किए आदिम जातियों को संगठित करना, मुश्किल ही नहीं, बल्कि असंभव था। मुंड़ा समुदाय जिससे बिरसा मुंड़ा आते थे, कोई अल्प संख्यक जाति नहीं थी। इसके साथ अन्य जनजातियाँ मिलाकर एक बड़ी संख्या का निर्माण करती थी। वास्तव में हिन्दु जमींदार यानि ब्राह्मणवादी हिन्दु जमींदार और ब्रिटिश सरकार के लोग अल्प संख्यक थे। बिरसा आन्दोलन का मूलभूत कारण जमींदारों एवं ब्रिटिश शासकों से आर्थिक आजादी प्राप्ति का उद्देश्य था। बिरसा ने आम जनता को गोलबंद किया जिसका कि एक धार्मिक एवं सांस्कृतिक एक रूपता थी। शायद इसी कारण से इतिहासकारों ने बिरसा के आन्दोलन को राजनैतिक या आर्थिक विद्रोह की संज्ञा नहीं दी। वास्तव में बिरसा का आन्दोलन उस व्यवस्था के खिलाफ था जो ब्रिटिश शासन झारखण्ड़ क्षेत्र के मुंड़ा-समुदाय एवं अन्य जनजातियों पर जबरजस्ती लादा जा रहा था। मुंड़ा-समुदाय एवं अन्य समुदायों की अगनी जिससे खत्म करने का कठोर ग्रयास किया जा रबा था। मूलवासियों की आर्थिक व्यवस्था, जमीन संबंधी नियम, अधिकार तथा सामाजिक परिपार्टी पर भी कुठारघात किया जा रहा था। नष्ट किया जा रहा था। थाना-पुलिस ने पहड़ा एवं पंचायतों का स्थान ले लिया था कानून की प्रणाली बदली गई थी।
वास्तव में बिरसा का आन्दोलन उस छटपटाहट, उस पीड़ा का पूर्वाभास था जो बाद में झारखंड़ अलग राज्य के आन्दोलन के रूप में प्रस्फूटित हुआ। वास्तव में मूल उद्देश्य ब्रिटिश शासकों एवं उसके समर्थकों से आदिम जनजातियों को मुक्त करना था। खुली राजनैतिक गतिविधियाँ प्रतिबन्धित थी। सीधे-सीधे लड़ाई करना संभव नहीं था। अतः सामाजिक सुधार के नाम पर आन्दोलन किए गये। सन् 1895 में बिरसा आन्दोलन को बुरी तरह कुचल दिया गया। सन् 1898 में वे हजारीबाग जेल से छुटे, तीन साल जेल में रहने के बाद। उन्होंने पुनः संगठन पर जोर दिया और प्रशिक्षित साथियों के सहयोग से तथा विशाल समर्थन के माध्यम से ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ सन् 1899 में पुनः संघर्ष छेड़ दिया। लेकिन उन्हें पुनः गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया। राँची जेल में उनकी मृत्यु बिमारी के कारण 9 जून 1900 ईस्वी में हो गई। ज्ञातव्य हो कि मृत्यु के समय उनकी उम्र मात्र चौबिस वर्ष की थी।
जैसा कि मैंने कहा है कि जन समर्थन प्राप्त करने के लिए तिलस्मी वातावरण की सृष्टि जरूरी था, उन्होनें अपने आप को “धरती का अब्बा” या जगत-पिता नाम से घोषित किया। बाद में लोगों ने उन्हें भगवान का अवतार कहा।
मुंड़ा आन्दोलन का मुख्य कारण मुंड़ा लोगों की खूँटकटी जमीन व्यवस्था के बदले भूई हरी व्यवस्था को लागू करना था। बिरसा मुंड़ा को क्रिश्चियन लोगों का समर्थन भी मिला। जनजातियों का, ईसाई लोगों का समर्थन एवं उनके द्वारा जमींदारों के विरूद्ध संघर्ष को “सरदारी” लड़ाई कहा जाता है। यह संघर्ष बिरसा-आन्दोलन के रूप में उन्नीसवीं शत्ताब्दी के अंत तक विद्यमान रहा था।
ईशाई मिशनरियों को हिन्दू-जमींदारों के खिलाफ संघर्ष की उतनी चिंता नहीं थी। ईशाईयों का मूल उद्देश्य मुंड़ा एवं अन्य लोगों के बीच ईशाई घर्म का प्रचार करना था और वे लोग मुंड़ा लोगों को ब्रिटिश शासन के खिलाफ मदद देने में हिचकते थे। फलस्वरूप बिरसा मुंड़ा को ईशाई मिशनरियों से विरोध हो गया था।
बिरसा मुंड़ा के निवास स्थान खूँटी एवं आसपास के इलाकों में जोर-शोर से ईशाई धर्म का प्रचार-प्रसार किया जा रहा था। वास्तव में वह इलाका उन गति-विधियों का केन्द्र-बिन्दु था और कई विशाल चर्च वहाँ खड़े किए गये थे।
ज्ञातव्य हो बिरसा मुंड़ा को बचपन में इन चर्चो के शरण में भेजा गया था और उन्होंने ईशाई धर्म की दीक्षा भी ली थी।
कुमार सुरेश सिंह जनजातीय जीवन पर शोध करने वाले प्रख्यात विद्वान के अनुसार अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से भारतीय उप-महाद्वीप के कई हिस्सों में जनजातियों की भूमि-व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो रही थी। इसका कारण जन-जातीय क्षेत्रों में बाहरी लोगों का बड़ी संख्या में पहुँचना था। उस समय देश के अन्य भागों की तरह इन जनजातीय क्षेत्रों में भी ब्रिटिश सरकार की स्थापना और उसके पांव जमने के साथ-साथ गैर-जनजातीय लोगों का बाहर से यहाँ पहुँचने में तेजी से वृद्धि हुई। अपनी भूमि-व्यवस्था के क्षत-विक्षत होने, गैर-जनजातीय बाहरी लोगों द्वारा जमीनों के कब्जा करने तथा बाहरी व्यवसायी एवं व्यापारी द्वारा जन-जातीयों के धन दौलत के हड़पने के कारण, गहरा असंतोष एवं विद्रोह पनपा। इनकी परिणति मुंड़ाओं के उन्नसवीं शताब्दी के अन्तिम विद्रोह “उलगुलान” में हुई।
मुंड़ाओं के परम्परागत भूमि-व्यवस्था को नष्ट करने के लिए जिम्मेदार तत्व थे – राजा और उनके संबंधी जागीरदार और जीमींदार ब्रिटिश शासक और स्थानीय छोटे अफसर।
इस प्रकार सच पूछा जाय तो मुंड़ाओं का आन्दोलन भूमि के प्रश्न पर तो हुआ ही साथ ही उसके पीछे आत्म रक्षा की प्रबल इच्छा भी काम कर रही थी। आत्म रक्षा की इस भावना से प्रेरीत होकर पहले मुंड़ा तो ईशाई धर्म की ओर अपने बचाव के लिए मुड़े। और जब वहाँ उन्हें निराशा ही हाथ लगी तो वे कलकत्ता के वकीलों की ओर मुड़े। और जब अदालतों में अपने विरूद्ध चल रहे भूमि-संबंधों मुकदमों में न्याय पाने में मुंड़ाओं को विफलता मिली, तो वे अंत में कोई उपाय न देखकर बिरसा के नेतृत्व में अधिकारियों से भिड़ गये।
1895 तक आते-आते बिरसा मुंड़ा एक पैगम्बर के रूप में उभर कर सामने आए थे। रोग दूर करने वाले के रूप में पहले बिरसा लोकप्रिय हुए। फिर वे एक उपदेशक के रूप में उभरे। उन्होंने अपने धर्म का उपदेश शुरू किया। बिरसा स्वंय जनेऊ पहनते, साथ ही काठ की खड़ाऊँ पहनते। हल्दी के रंग से रंगी हुई धोती पहनते। उनकी यह वैष्णव वेश-भूषा होती। उन्होंने घोषण की थी कि वे पृथ्वी-पिता थें- धरती अरबा।
धीरे-धीरे बिरसा का धार्मिक आन्दोलन, राजनैतिक आन्दोलन के रूप में बदल गया। कारण था सरदारों का बढ़ता प्रभाव। सरदारों में यह आशा जगी थी कि अगर बिरसा का आन्दोलन अंग्रेजो के विरूद्ध एक सफल सशस्त्र विद्रोह बन सका तो उन्हें उनकी खोई प्रतिष्ठा, खोई सम्पदा एवं खोया हुआ मानकी पद वापस मिल सकेगा, जो कोल-विद्रोह के बाद खो गया था।
बिरसा और सरदार आन्दोलनों की जड़े एक भूमि-समस्या में थी और 1895-1900 में उनका विलयन हो गया था।
अनेकों लड़ाईयाँ बिरसा मुंड़ा के पहले भी इस क्षेत्र में लड़ी गई थी जिसके चलते सरकार को कुछ प्रशासनिक सुधार के लिए कदम उठाने पड़े थे। मुख्य रूप से ये निम्नलिखित हैः-
1 . सन् 1833 का रेगुलेशन (13) जिसके तहत जंगल महल जिलों का विघटन कर दिया गया था
और नया जिला मानभूम का गठन किया गया।
२. सन् 1854 का रेगुलेशन (20) जिसके अंत्तर्गत छोटानागपुर प्रखंड़ को एक आयुक्त के अंत्तर्गत गठित किया गया।
3. छोटानागपुर भूमि-कानून 1869।
4. बंगाल-एक्ट (1) 1879।
5. सन् 1895 और 1898-99 के पश्चात बिरसा मुंड़ा के समय “खुँटकाटी” व्यवस्था को पुनः लागू करना।
6. जमीन का पूर्ण-रूपेण सर्वेक्षण एवं भूमि हक संबंधी रिकार्डो का पंजीकरण।
7. बैठे-बेगारी प्रथा का उन्मूलन।
8. सम्पूर्ण छोटानागपुर का साधारण समान सर्वेक्षण।
9. एक नवम्बर 1902 को गुमला अवर प्रमंडल का गठन।
10. दिसम्बर 1905 में खूँटी अवर प्रमंडल का गठन ।
11. मुंड़ारी खूँटकाटी, भूमिव्यवस्था लागू की गई एवं रैयती और अन्य जमीनों की बिक्री एवं हस्तांतरण पर रोक लगा दी गई।
12. छोटानागपुर टेनेन्सी एक्ट 1908 को पारित करना। यह कानून बंगाल टिनेन्सी एक्ट (1) का एक विस्तृत और परिष्कृत रूप था। इसे स्थानीय रीति-रिवाज एवं मान्यताओं, धारणाओं को मद्य नजर बनाया गया था।
Sunday, June 20, 2010
अध्याय तीन
झारखण्ड़ के प्रमुख विद्रोह – झारखण्ड़ के विषय में जानकारी लेने के पहले झारखण्ड़ क्षेत्र में हुए ब्रिटिश-प्रशासन के विरूद्ध की जानकारी प्राप्त कर लेना आवश्यक होगा। वास्तव में झारखण्ड़ अलग राज्य के नाम से किए गये आन्दोलन की पृष्ठभूमि को पहले समझ लेना चाहिए।
झारखण्ड़ के लोगों की अपनी परम्परागत व्यवस्था, जीवन-शैली पर कुठारघात से ही इन विद्रोह का जन्म हुआ था। 1765 से जब ईस्ट इंडिया कम्पनी को दीवानी अधिकार दिए गये, विद्रोह की शुरूआत हो गई थी। इसके प्रमुख विद्रोह थे- मलेर विद्रोह (1772), तिलका मांझी विद्रोह (1784), तमाड़ विद्रोह (1798), कोल इसरेक्सन (1820), हो विद्रोह (1820), ग्रेड कोल इन्सरेक्सन (1832), गंगानारायण विद्रोह (1832), संथाल रिवोल्ट (1855-57), सरसप्त संघर्ष (1859-65), चुहॉड़ विद्रोह।
चुहाँड़ विद्रोह – ब्रिटिश हुकमरानों से झारखण्ड़ को सदा समता की आशा और अपेक्षा थी भी नहीं क्योंकि झारखण्ड ने जितना विरोध ब्रिटिश हुकमरानों का किया था, उससे झारखण्ड़ के प्रति अंग्रेजों की चिढ़, द्वेश और प्रतिकुल भावना को समझा जा सकता है।
भारत वर्ष के कई हिस्सों में ब्रिटिश राजशक्ति को देशीय राजशक्तियों से प्रतिरोध झेलना पड़ा। अन्य जगहों पर राजे-राजवाड़ो की शक्ति से लड़ना पड़ा था जिससे आम जनता पूरी तरह शामिल नहीं थी। यहाँ ब्रिटिश शासकों को जन संग्राम का सामना करना पड़ा। मराठा, सिख हैदर टीपू आदि ने ब्रिटिश विरोधी संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी कहानी को विस्तार से लिखा एवं कहा गया। पर सुदुर खान जंगलों के बीच हुए जन संग्रामों को अनदेखी कर दी गई।
12 अगस्त 1766 को मुगल बादशाह आलम द्वितीय से ईस्ट इंडिया कम्पनी को बंगाल की दिवानी स्वीकृत की गई थी। ज्ञातव्य हो कि उस समय बिहार में वर्त्तमान बिहार, बंगाल, झारखण्ड़, उड़ीसा और असम शामिल थे। अंग्रेजो ने उसके बाद भारतवर्ष में शासन चलाने के लिए जमीन सर्वेक्षण का काम शुरू किया। बंगाल के अंदर तत्कालीन छोटानागपुर के जंगल महल जिला में जमीन का सर्वे एवं खतियान बनाने का काम शुरू किया गया था। माल गुजारी वसूलना शुरू किया था। और बहुत सारी योजनाएँ तैयार की गई थी, जिससे यहाँ के जल जंगल एंव जमीन पर कब्जा किया जा सके। जिससे यहाँ असंतोष फैलने लगा था। शासन व्यवस्था को अंग्रेजों को सबसे पहले कुड़मी आदिवासियों ने सन् 1769 में चुनोती दी थी और सन् 1769 में भारत में भारत का पहला क्रांतिवीर रघुनाथ महतो सामने आया था और अद्भूत लड़ाई लड़ी थी।
रघुनाथ महतो का जन्म झारखण्ड़ क्षेत्र के तत्कालीन जंगल महल जिला और वर्त्तमान में सराईकेला जिला के नीमडीह प्रखंड़ के धुटियाडीह ग्राम में हुआ था। 1965 में ईस्ट इंड़िया कम्पनी ने जंगल महल जिला में आदिवासियों के जल, जंगल जमीन पर अपना अधिकार जमाने के लिए राजस्व वसूलना शुरू किया, मूलवासियों के जमीन छीनकर बंगाली जमींनदारों के हाथों हस्तांतरण किया जाने लगा, अन्य क्षेत्रों से लोगों को झारखंड़ क्षेत्र में आयात करके बसाना शुरू किया, तो रघुनाथ महतो ने इसका विरोध किया और जन-संगठन तैयार करके नीमडीह गांव के पास फाल्गून पूर्णिमा 1769 को अंग्रेजों के खिलाफ एक सभा बुलाकर शंखनाद किया। आज उसी स्थान को रघुनाथपुर कहा जाता है जो नीमडीह प्रखंड का मुख्यालय है। इसी तरह पुरूलिया के उत्तर दिशा में करीब तीस किलोमीटर पर शहर रघुनाथपुर है। मेदनीपुर जिला अंत्तर्गत झाड़ग्राम में भी रघुनाथपुर है। जनतश्रुति है कि इन्ही के नाम पर ये शहर बसे।
रघुनाथपुर महतो का विद्रोह 1805 तक चलता रहा। रघुनाथ महतो का विद्रोह नीमडीह, पातकोम, से लेकर बड़ाभूम, धालभूम, मेदनीपुर तथा किचूंग परगणना तक फैल गया। किचूंग परगणना के अंत्तर्गत सराईकेला, खरसवाँ जिला के प्रखंड़ राजनगर, सराईकेला, गम्हरिया क्षेत्र को कहा जाता था। जंगल महल जिला के कई जमींदार और राजाओं ने ईस्ट इडिया कम्पनी की अधीनता स्वीकार कर ली। पर धालभूम के राजाओं ने अंग्रेजों से लोहा लिया, पर हार गये। तब उनके भतीजे जगन्नाथ धल को राजा बनाया गया। धालभूम के राजा जगन्नाथ धल का संबंध ईस्ट ईंडिया कम्पनी से बिगड़ता गया और राजा ने कम्पनी की अनसुनी कर दी। परिणाम हुआ कि अंग्रेजों ने उनके गढ़ पर धावा करके उन्हें बेदखल किया और वे किला छोड़कर जंगल-पहाड़ों में भाग गये। अंग्रेजों ने उनकी जगह नीमू धल को राजा बनाया।
जून 1773 में इस विद्रोह के महानायक रधुनाथ महतो के साथ जगन्नाथ धल की मुलाकात ग्राम पिपला में हुई। वहाँ दोनों ने मित-मितान का संबंध जोड़ लिया और अंग्रेजों के खिलाफ कूद पड़े। इधर लेफ्टीनेंट गुड़यार जगह-जगह इन्हें तलाश कर रहा था। पर रधुनाथ महतो ने जगन्नाथ धल को मदद किया और पाँच हजार विद्रोहियों के साथ धालभूम गढ़ के नील धल के धाटशीला में आक्रमण किया जिससे धाटशीला के राजा एवं ईस्ट इंड़िया कम्पनी के लोगों को भागना पड़ा और नरसिंहगढ़ में शरण लेना पड़ा। पर फिर अंग्रेजो की भारी भरकम फौज ने कप्तान फोबिस के नेतृत्व में घाटशिला में हमला किया तो विद्रोहियों को भागना पड़ा। घाटशिला के जोडसा ग्राम के माझियां महतो, बालूक महतो, रांगा महतो, कालचिंती ग्राम के आनन्द महतो, रघु महतो, जगन्नाथपुर ग्राम के पुकलू मांझी, शंकर मांझी के साथ दर्जनों की संख्या में लोग मारे गये।
ज्ञातव्य हो कि इस चुहाड़ विद्रोह के पहले छोटानागपुर क्षेत्र, पटना काउंसिल के अधीन था। लेकिन जंगल महल जिला में ईस्ट इंड़िया कम्पनी सरकार का जैसे-जैसे कब्जा बढ़ रहा था, विद्रोह भी उसी अनुपातः में बढ़ रहा था। इस विद्रोह की आक्रमकता को देखते हुए नवम्बर 1773 में छोटानागपुर क्षेत्र को पटना काउंसिल के नियत्रण से हटाकर बंगाल प्रेसीडेन्सी के अधीन इसलिए कर लिया गया ताकि स्वंय ईस्ट इंड़िया कम्पनी कलकत्ता से अपना शासन चला सके।
बहुत ही अल्प समय में चुहाड़ विद्रोह ने भयानक रूप ले लिया। अंग्रोजों को विद्रोहियों से हार माननी पड़ी तथा जगन्नाथ धल को धलभूम का पुनः राजा बहाल करना पड़ा। चुहाड़ विद्रोह अब बड़ाभूम पुरूलिया झरिया पंचेत और मेदनीपुर राजाओं के अधीनस्त क्षेत्रों में फैल चुका था। 25 जुलाई 1774 के बाद झरिया राज क्षेत्र में रघुनाथ महतो ने हमला किया था। दामोदर नदी पार कर के आए थे। 1776 तक विद्रोह का एक केन्द्र सिल्ली और झालदा के बीच मे बना।
ईस्ट इंड़िया कम्पनी को लगा कि जंगल महल जिला चुहाड़ विद्रोहियों के हाथ चला गया है और अंग्रेज अपना नियंत्रण खो चुके हैं। भारत के गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग ने विद्रोह थमता नहीं देखकर छोटानागपुर खास जंगल महल और रामगढ़ जिला के तत्कालीन कमींशनरों से रघुनाथ महतो और विद्रोहियों से बातचीत कर समस्या का समाधान करने का आदेश दिया। गवर्नर जनरल ने आदेश दिया की उन पर किसी तरह का दमनात्मक कारवाई नहीं हो। लेकिन जमींदारों ने गवर्नर जनरल की बातों को नहीं मानने के लिए कमिशनरों पर दबाव बनाया। जमींदारों ने किसी भी परिस्थिति में रघुनाथ महतो और विद्रोहियों का आन्दोलन दबाने की कोशिस की। 5 अप्रैल 1778 का दिन था, जब ईस्ट इंडिया कंपनी के पुलिस को पता चला कि रघुनाथ महतो अपने दल-बल के साथ झालदा के आसपास ग्रामीण क्षेत्र से स्वर्णरेखा नदी पार कर राँची (तत्कालीन छोटानागपुर खास) और सिल्ली के बीच जंगल में लोटा, गाँव के नजदीक सभा कर रहे है और सभा के बाद रामगढ़ की ओर बढ़ने वाले है जो ईस्ट इंड़िया कंपनी के पुलिस बैरक पर हमला करेगें। पुलिस फोर्स ने सभा स्थल में ही रघुनाथ महतो को घेर लिया और वह पुलिस का शिकार हो गये। सभा स्थल में पुलिस की गोलीबारी से दर्जन भर लोग मारे गये। सैकड़ों लोग गिरफ्तार कर जेल भेज दिये गये। रघुनाथ महतो के नेतृत्व मे करीबन दस साल तक आन्दोलन चला लेकिन उनके शहादत के बाद भी चुहॉड़ विद्रोह 1804 तक चलता रहा और समय-समय पर इस विद्रोह को कई नेताओं ने नेतृत्व प्रदान किया।
भारत देश के प्रथम क्रांतिवीर अमर शहीद रघुनाथ महतो का बलिदान व्यर्थ नहीं गया। उनकी शहादत, त्याग और अंतिम आत्माहुति की ज्वाला कालातंर में विभिन्न आन्दोलन क्रांतियों, विद्रोही का प्रेरणास्रोत बना और न सिर्फ झारखंड़, न भारतवर्ष बल्कि पूरी दुनिया के स्वतंत्रता आंदोलन में अग्रतम गाथा के रूप में रघुनाथ महतो का बलिदान चिरस्मरणी रहेगा।
Monday, June 14, 2010
झारखण्ड की संस्कृति एंव सभ्यता
जनजातियाँ अपनी ही जाति में विवाह करतें है। एक गोष्ठी के लोग दूसरे गोष्ठी में विवाह करते हैं, अपनी ही गोष्ठी में यानि अपनी ही गोष्ठी में विवाह निषिद्ध होता है। दूसरी जातियों में भी विवाह निषिद्ध होता है। अगर कोई व्यक्ति ऐसा करता है तो उसे समाज से वहिष्कार करने की प्रथा है। इसे “बिटलाहा” कहा जाता है, झारखण्ड़ में।
प्रत्येक जनजाति की अपनी संस्कृति होती है। एक जनजाति के रीति-रिवाज, जन्म, शादी, मृत्यु के अवसर पर अपनाए गये अनुष्ठान, कर्म-कांड़ अलग-अलग प्रकार के होते है। इनका अपना धार्मिक विश्वास होता है। प्रत्येक जनजाति अपने स्वतंत्र रूप-ढंग से सोचता है। किसी-किसी विषय पर इनका कार्यकलाप अन्य जनजातियों के समरूप भी होता है।
इसकी अपनी एक शासन-व्यवस्था होती है। पंचायत होती है, जिसमे अपराधियों की सुनवाई, सजा होती है। जमीन-संबंधी झगड़े एवं अन्य मामले निपटाएँ जाते है। झारखण्ड़ में कुड़मी जनजाति इसे “बाइसी” कहती है। अपने जनजातीय समाज का आदिवासी या जनजातीय स्वशासन कहा जाता है।
सामान्यता झारखण्ड़ की जनजातियों की अर्थव्यवस्था खेती एवं शिकार पर निर्भर करती रही थी। इसपर हमने पहले ही चर्चा किया है। आत्म निर्भरता झारखंड़ियों का एक गुण है। पर वे उतना ही मेहनत करते है जितना कि उन्हे जरूरत है। सामंतवादी शासन-व्यवस्था झारखंड़ में जनजातियों के बीच नहीं थी। वस्तुओं का आदान प्रदान किया जाता था। विनियम के लिए रूपयों की कमी थी और बाजार में एक व्यक्ति की उपज दूसरे की उपज के साथ अदला-बदली कर ली जाती थी। मापने का पैमाने होता था – “पैला” जिससे अनाज मापा जाता था। आज भी है। लम्बाई मापने का पैमाने होता था –“हाथ” एवं “बित्ता”। वजन का पैमाना होता था – “सेर”, “पौवा”, ”छटाक” आदि।
जनजाति समुदाय का एक अपना विशिष्ट धर्म होता है। ये मूर्ति पूजक नहीं होते। इनके धर्म में प्रकृति पूजा, आत्मवाद और जीववाद की प्रधानता पाई जाती है। ये पहाड़ो, पेड़ो, पत्थरों, फसल आदि की पूजा करते हैं। इनका धर्म अपनी ही समाज तक सीमीत रहता है। जनजातियों के लोग कई प्रकार की जादुई क्रियाऍ भी किया करते है।
मैदानी क्षैत्र के धर्म हिन्दुत्व में एक बहुत बड़ा तत्व है जो हिन्दु धर्म का आधार है। वह है “भक्ति” भाव। हिन्दुत्व में भक्ति-भाव का होना आवश्यक है। राम की भक्ति करने वाले राम-भक्त कहे जाते है। उसी प्रकार कृष्ण-भक्त एवं विभिन्न देवी-देवताओं के भक्त होते है। भक्ति का जन्म समर्पण की भावना से उत्पन्न होता है। यहाँ भक्त अपने भगवान के सामने पूर्ण समर्पण करता है। बाद में इसी भक्ति का प्रसार ईस्लाम एवं ईशाई-धर्म में प्रवेश कर गया।
इस भक्ति को ईश्वर से वरदान प्राप्त करने का आधार माना गया है। पूर्ण-समर्पण हो तो ही फल मिलता है- ईश्वर या अराध्य देव की कृपा मिलती है। ओर बगैर कृपा के मनुष्य को कोई फल नहीं मिलता। यही बड़े-धर्मो हिन्दु-धर्म, ईस्लाम, ईशाई की देन है, बोद्ध-धर्म में भी “बोद्धम-शरणम् गच्छामी” का भाव है। इन सभी धर्मो में “मसीहा” हैँ भगवान है। देवी-देवता हैं। जिनकी कृपा चाहिए। कृपा के लिए “भक्ति” की जरूरत है।
जनजाति धर्म में ऐसी बात नहीं है। ये छोटे-विश्वास के लोग हैं। इनका सीधे विश्वास प्रकृति पर है। प्रकृति ही मसीहा है। पेड़-पौधे, पत्थर, पहाड़, फसल ही इनके अराध्य देव हैं। जनजाति समुदाय का सदस्य इस भक्ति-भाव से दूर रहता है। वह किसी की आराधना नहीं करता। समर्पण नहीं करता। बराबरी का भाव एक दूसरे सदस्य के साथ रखता है। चाहे वह सदस्य उसके दल का मुखिया ही क्यों न हो।
भक्ति-भाव सामन्तवाद की देन है जो मैदानी क्षेत्रों की देन है। पहाड़ी क्षेत्रों में जनजातियों में सामंतवाद नहीं था। झारखंड़ के मूलवासी इस सामन्तवादी व्यवस्था से अछुते रहे हैं। अतः इनमे सामंत का भय पैदा नहीं हुआ। भय नहीं तो फिर समर्पण किस प्रकार का। अगर समर्पण नहीं तो फिर भक्ति का अस्तित्व नहीं। झारखंड़ का आदमी गुलामी पसंद नहीं करता। यह उसके स्वभाव में नहीं। “ठकुर-सुहाती” नहीं कर सकता। यह उसने सीखा नहीं। जनजाति विद्रोह करेगा। यह जानते हुए भी कि इससे उसके बड़े शत्रु का नाश नहीं हो पायेगा, पर वह समर्पण नहीं कर के मिट जाना पसंद करेगा। अपने स्वभाव को वह जल्दी नहीं बदल पाता। बाहरी तत्वों के साथ जल्दी समझौता नहीं कर पाता। अपने आप को अपने दायरे में सीमित कर लेना ज्यादा अच्छा समझता है, वजाय बाहरी तत्वों में स्वंय को विलिन कर लेने के।
संकुचित स्वभाव के झारखंड़ी अंतरमुखी है। हल्ला नहीं कर सकते। प्रचार तंत्र से दूर रहते है। बढ़-चढ़ कर बोलने का आदत उनके पास नहीं। चुप-चाप अपना काम करते हैं। अपनी प्रतिभा के प्रचार-प्रसार को बुरा मानते है और मानते है कि इससे गुण खत्म हो जाते है। अपना इतिहास स्वंय नहीं लिखते या बोलते हैं। यही कारण है झारखंड़ियों का इतिहास बहुत कम लिखा हुआ मिलता है। मिलता भी है वह अन्य लोगों द्वारा अति रंजित व्याख्यान ही मिलता है। सही तथ्यों की जानकारी नही मिल पाती।
Saturday, June 5, 2010
झारखण्ड की संस्कृति एंव सभ्यता
कालान्तर में हिन्दू विधि द्वारा प्रशासित आर्य यानि हिन्दू संस्कृति के लोगों का प्रवेश झारखण्ड़ में हुआ। अधिक विकसित क्षेत्र के लोग कम विकसित क्षेत्र के लोगों के ऊपर हावी होने का प्रयास करते हैं। हिन्दू-संस्कृति को झारखण्ड़ क्षेत्र में व्यापक प्रचार-प्रसार के माध्यम से लादा या थोपा गया। गाँव-गाँव में रामायण, महाभारत की कथाओं का प्रचार-प्रसार ब्राह्मणों के द्वारा किया गया। द्रविड़ एवं आंस्ट्रिक संस्कृति बाहर के हिन्दू-संस्कृति द्वारा प्रभावित हुआ। पर साथ ही हिन्दू धर्म भी इन संस्कृतियों से प्रभावित हुआ। केला, सुपाड़ी, नारियल, ईंख एवं सिंदूर मूलत: द्रविड़ संस्कृति की नेवेद्य है। इसे हिन्दू संस्कृति ने अपनाया है।
झारखण्ड़ के विषय में, वहाँ की जातीय परिस्थिति को समझने के पहले जनजाति की क्या विशेषताएँ होती है, इसपर थोड़ी चर्चा करना आवश्यक है एवं महत्वपूर्ण है। क्योंकि झारखण्ड़ आन्दोलन का मूल वहाँ की जातीय परिस्थिति एवं संस्कृति है। झारखण्ड़ी राष्ट्रीयता को समझने के लिए वहाँ निवास करने वाली जनजातियों की विशेषताओं को जान लेना जरूरी होगा।
जनजाति का निर्माण कई गोंष्ठियों के संकलन से होता है। एक गोष्ठी एक परिवार ही रहा है। जनसंख्या की वृद्धि के चलते परिवारों की संख्या में वृद्धि होती है। परिवार ही जनजाति समाज की मौलिक ईकाई है। जनजाति परिवार या गोष्ठी का ही एक विस्तृत रूप है। जैसे मुंड़ा जनजाति में सोंय, पूर्ति, बोदरा, तिडू, भेंगरा इत्यादि, संथाल जनजाति में हेम्ब्रम, हाँसदा, सोरेन, मरांड़ी, बेसरा इत्यादि। कुड़मी जनजाति में सांखुआर, टिडुआर, मुतरूआर, काडूआर आदि। कुडुक जनजाति में कुजुर, मिंज, खेस, किसपोट्टा, सांखआर, तिग्गा आदि खड़िया जनजाति में बाः, किडो, बिलुंग आदि। हो जनजाति में तुबिद, तियू, लुगुन इत्यादि। इन गोष्ठियों को अंग्रेजी में ट्राइब कहा जाता है, जिसका अर्थ गण या दल है।
जनजाति टोटेमिक होते है। अंग्रेजी शब्द टोटेम का अर्थ है विश्वास। ट्राइब संगठित जनजाति किसी भौतिक पदार्थ, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, फूल-फल, किड़े-मकोड़े, जल-जीव आदि से अपना एक रहस्यमय संबंध होने का दावा करते हैं। वे ही ट्राइव या गोष्ठी नाम से जाने पहचाने जाते हैं। उनपर विश्वास या टोटेम मानते है।
जनजाति टाबू मानते हैं। टाबू (Taboo) का अर्थ धार्मिक विधि या निषेद्य या व्यवहार में नहीं लाने, बध नहीं करने अथवा खाने में व्यवहृत नहीं करने से होता है। जनजाति में प्रत्येक गोष्ठी का एक निषिद्य पदार्थ होता है।
प्रत्येक जनजाति को किसी एक न एक विशिष्ट नाम से जाना जाता है। जैसे कुड़मी, मुंड़ा, उराँव, हो, खड़िया आदि।
जनजाति का एक निश्चित भू-भाग होता है। उनका एक निर्दिष्ट परम्परागत निवास भूमि होती है। किन्तु इस सम्बन्ध में विद्वानों के विचारों में भिन्नता है। डा0 रिचर्ड का मत है कि जनजाति के लिए एक निश्चित स्थाई निवास भूमि होना आवश्यक नहीं है। कई जनजातियाँ घुमक्कड़ जीवन व्यतीत करती है। किन्तु डा0 मजूमदार का मत है कि घुमक्कड़ जनजातियाँ एक निश्चित भू-भाग यानि एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में ही घुमती है, सभी जगहों पर नहीं। वैसे झारखण्ड़ क्षेत्र में बसने वाली अधिकत्तर जनजातियाँ इस क्षेत्र की स्थाई निवासी हैं। घुमक्कड़ जातियाँ भी इस क्षेत्र से बाहर नहीं निकली।
प्रत्येक जनजाति की अपनी कविलावाची भाषा होती है जिसका प्रयोग उस जनजाति के सभी लोग करते हैं। जनजाति भाषा का हस्तान्तरण प्रमुख रूप से मौखिक रूप से होता है। इन जातियों की भाषाओं को लिपिबद्ध करने का प्रयास जनजातियों ने कम किया है। अतः इनकी लिपि नहीं मिलीती। हाल-फिलहाल में ‘’लिपि ‘’ तैयार करने की चेष्टा की गई है। वर्त्तमान मे भी कुड़मी जनजाति कुड़माली भाषा का प्रयोग करती है। संथाल जनजाति की भाषा संथाली, उराँव जनजाति की कुडुक है। बाहरी लोगों के सम्पर्क में आ जाने के कारण तथा हिन्दी के राष्ट्रीय भाषा बन जाने के कारण तथा अन्य भाषा-भाषियों के सम्पर्क के फलस्वरूप अनेक बाहरी शब्दों का समावेश इन भाषाओं में हो गया है।
जनजाति व्यक्तिवादी नहीं होता। समाजवादी या समाजमूखी होता है। एक निश्चित भू-भाग के दायरे में रहने के कारण तथा अपने जीवन-ज्ञापन के कार्यो को समाज के अन्य लोगों के द्वारा सहभागिता के आधार पर करने के कारण जनजाति में सामुदायिक भावना पाई जाति है। ये परस्पर सहयोग से जीने के अभ्यस्त होते हैं। शिकार करना, जंगलों में प्रवेश करना, खेती करना, सिचाईं करना, मछली मारना आदि सभी काम गाँव के सभी लोग या अधिकत्तर लोग एकजूट होकर करते है।