Tuesday, June 29, 2010

बिरसा मुंडा का आन्दोलन एवं सुधारवादी समय

बिरसा मुंडा का आन्दोलन एवं सुधारवादी समय – झारखंड़ आन्दोलन में प्रवेश करने के पहले इस क्षेत्र के भगवान समझे जाने वाले बिरसा मुंड़ा के विषय में कुछ जानकारी आवश्य प्राप्त कर लेनी चाहिए।
“सन् 1895 से 1900 ईस्वी तक बिरसा आन्दोलन वस्तुतः अपने अन्तिम लक्ष्य के प्रारूप में परिवर्त्तन वादी था” ऐसा श्री के0 एल0 शर्मा जी का कहना है। बिरसा मुंड़ा का आन्दोलन वास्तव में इस क्षेत्र के लोगों को संगठित करके अपनी पहचान बनाकर शोषण से मुक्ति का आन्दोलन था। इतिहासकार श्री कैथलीन गोब लिखते हैं कि “अति भौतिक और तिलस्मी उथल-पुथल उन सांस्कृति अल्प संख्यकों में बहुत अधिकता से होता है जो कि अपनी परम्परागत सुरक्षा, अपने व्यवसाय एवं अस्तित्व को गँवा बैठे हैं और अपने बीते दिनों और अपने आस-पास की तुलना में गहन शोषण के शिकार हुए हैं।” उन्होंने यह भी लिखा है कि यह व्याख्या उन आदिवासियों पर लागू होती है जो कि अपने अस्तित्व में हस्तक्षेप, भूमि से बेदखल होना, धोखेबाजी, दिवालियापन एवं पढ़े-लिखे और उच्चत्तर शैक्षणिक आक्रामक बाबूओं द्वारा अपनी संस्कृति के हनन का शिकार हुए हैं।
लेकिन बिरसा मुंड़ा का आन्दोलन कोई धार्मिक आन्दोलन नहीं था। इसमें धार्मिक-आवरण जरूर दिया गया था। बिना इस प्रकार के कोई धार्मिक आवरण दिए तथा बिना क्सी तिलिस्मी या दैवी चमत्कारिक वातावरण सृष्टि किए आदिम जातियों को संगठित करना, मुश्किल ही नहीं, बल्कि असंभव था। मुंड़ा समुदाय जिससे बिरसा मुंड़ा आते थे, कोई अल्प संख्यक जाति नहीं थी। इसके साथ अन्य जनजातियाँ मिलाकर एक बड़ी संख्या का निर्माण करती थी। वास्तव में हिन्दु जमींदार यानि ब्राह्मणवादी हिन्दु जमींदार और ब्रिटिश सरकार के लोग अल्प संख्यक थे। बिरसा आन्दोलन का मूलभूत कारण जमींदारों एवं ब्रिटिश शासकों से आर्थिक आजादी प्राप्ति का उद्देश्य था। बिरसा ने आम जनता को गोलबंद किया जिसका कि एक धार्मिक एवं सांस्कृतिक एक रूपता थी। शायद इसी कारण से इतिहासकारों ने बिरसा के आन्दोलन को राजनैतिक या आर्थिक विद्रोह की संज्ञा नहीं दी। वास्तव में बिरसा का आन्दोलन उस व्यवस्था के खिलाफ था जो ब्रिटिश शासन झारखण्ड़ क्षेत्र के मुंड़ा-समुदाय एवं अन्य जनजातियों पर जबरजस्ती लादा जा रहा था। मुंड़ा-समुदाय एवं अन्य समुदायों की अगनी जिससे खत्म करने का कठोर ग्रयास किया जा रबा था। मूलवासियों की आर्थिक व्यवस्था, जमीन संबंधी नियम, अधिकार तथा सामाजिक परिपार्टी पर भी कुठारघात किया जा रहा था। नष्ट किया जा रहा था। थाना-पुलिस ने पहड़ा एवं पंचायतों का स्थान ले लिया था कानून की प्रणाली बदली गई थी।
वास्तव में बिरसा का आन्दोलन उस छटपटाहट, उस पीड़ा का पूर्वाभास था जो बाद में झारखंड़ अलग राज्य के आन्दोलन के रूप में प्रस्फूटित हुआ। वास्तव में मूल उद्देश्य ब्रिटिश शासकों एवं उसके समर्थकों से आदिम जनजातियों को मुक्त करना था। खुली राजनैतिक गतिविधियाँ प्रतिबन्धित थी। सीधे-सीधे लड़ाई करना संभव नहीं था। अतः सामाजिक सुधार के नाम पर आन्दोलन किए गये। सन् 1895 में बिरसा आन्दोलन को बुरी तरह कुचल दिया गया। सन् 1898 में वे हजारीबाग जेल से छुटे, तीन साल जेल में रहने के बाद। उन्होंने पुनः संगठन पर जोर दिया और प्रशिक्षित साथियों के सहयोग से तथा विशाल समर्थन के माध्यम से ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ सन् 1899 में पुनः संघर्ष छेड़ दिया। लेकिन उन्हें पुनः गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया। राँची जेल में उनकी मृत्यु बिमारी के कारण 9 जून 1900 ईस्वी में हो गई। ज्ञातव्य हो कि मृत्यु के समय उनकी उम्र मात्र चौबिस वर्ष की थी।
जैसा कि मैंने कहा है कि जन समर्थन प्राप्त करने के लिए तिलस्मी वातावरण की सृष्टि जरूरी था, उन्होनें अपने आप को “धरती का अब्बा” या जगत-पिता नाम से घोषित किया। बाद में लोगों ने उन्हें भगवान का अवतार कहा।
मुंड़ा आन्दोलन का मुख्य कारण मुंड़ा लोगों की खूँटकटी जमीन व्यवस्था के बदले भूई हरी व्यवस्था को लागू करना था। बिरसा मुंड़ा को क्रिश्चियन लोगों का समर्थन भी मिला। जनजातियों का, ईसाई लोगों का समर्थन एवं उनके द्वारा जमींदारों के विरूद्ध संघर्ष को “सरदारी” लड़ाई कहा जाता है। यह संघर्ष बिरसा-आन्दोलन के रूप में उन्नीसवीं शत्ताब्दी के अंत तक विद्यमान रहा था।
ईशाई मिशनरियों को हिन्दू-जमींदारों के खिलाफ संघर्ष की उतनी चिंता नहीं थी। ईशाईयों का मूल उद्देश्य मुंड़ा एवं अन्य लोगों के बीच ईशाई घर्म का प्रचार करना था और वे लोग मुंड़ा लोगों को ब्रिटिश शासन के खिलाफ मदद देने में हिचकते थे। फलस्वरूप बिरसा मुंड़ा को ईशाई मिशनरियों से विरोध हो गया था।
बिरसा मुंड़ा के निवास स्थान खूँटी एवं आसपास के इलाकों में जोर-शोर से ईशाई धर्म का प्रचार-प्रसार किया जा रहा था। वास्तव में वह इलाका उन गति-विधियों का केन्द्र-बिन्दु था और कई विशाल चर्च वहाँ खड़े किए गये थे।
ज्ञातव्य हो बिरसा मुंड़ा को बचपन में इन चर्चो के शरण में भेजा गया था और उन्होंने ईशाई धर्म की दीक्षा भी ली थी।
कुमार सुरेश सिंह जनजातीय जीवन पर शोध करने वाले प्रख्यात विद्वान के अनुसार अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से भारतीय उप-महाद्वीप के कई हिस्सों में जनजातियों की भूमि-व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो रही थी। इसका कारण जन-जातीय क्षेत्रों में बाहरी लोगों का बड़ी संख्या में पहुँचना था। उस समय देश के अन्य भागों की तरह इन जनजातीय क्षेत्रों में भी ब्रिटिश सरकार की स्थापना और उसके पांव जमने के साथ-साथ गैर-जनजातीय लोगों का बाहर से यहाँ पहुँचने में तेजी से वृद्धि हुई। अपनी भूमि-व्यवस्था के क्षत-विक्षत होने, गैर-जनजातीय बाहरी लोगों द्वारा जमीनों के कब्जा करने तथा बाहरी व्यवसायी एवं व्यापारी द्वारा जन-जातीयों के धन दौलत के हड़पने के कारण, गहरा असंतोष एवं विद्रोह पनपा। इनकी परिणति मुंड़ाओं के उन्नसवीं शताब्दी के अन्तिम विद्रोह “उलगुलान” में हुई।
मुंड़ाओं के परम्परागत भूमि-व्यवस्था को नष्ट करने के लिए जिम्मेदार तत्व थे – राजा और उनके संबंधी जागीरदार और जीमींदार ब्रिटिश शासक और स्थानीय छोटे अफसर।
इस प्रकार सच पूछा जाय तो मुंड़ाओं का आन्दोलन भूमि के प्रश्न पर तो हुआ ही साथ ही उसके पीछे आत्म रक्षा की प्रबल इच्छा भी काम कर रही थी। आत्म रक्षा की इस भावना से प्रेरीत होकर पहले मुंड़ा तो ईशाई धर्म की ओर अपने बचाव के लिए मुड़े। और जब वहाँ उन्हें निराशा ही हाथ लगी तो वे कलकत्ता के वकीलों की ओर मुड़े। और जब अदालतों में अपने विरूद्ध चल रहे भूमि-संबंधों मुकदमों में न्याय पाने में मुंड़ाओं को विफलता मिली, तो वे अंत में कोई उपाय न देखकर बिरसा के नेतृत्व में अधिकारियों से भिड़ गये।
1895 तक आते-आते बिरसा मुंड़ा एक पैगम्बर के रूप में उभर कर सामने आए थे। रोग दूर करने वाले के रूप में पहले बिरसा लोकप्रिय हुए। फिर वे एक उपदेशक के रूप में उभरे। उन्होंने अपने धर्म का उपदेश शुरू किया। बिरसा स्वंय जनेऊ पहनते, साथ ही काठ की खड़ाऊँ पहनते। हल्दी के रंग से रंगी हुई धोती पहनते। उनकी यह वैष्णव वेश-भूषा होती। उन्होंने घोषण की थी कि वे पृथ्वी-पिता थें- धरती अरबा।
धीरे-धीरे बिरसा का धार्मिक आन्दोलन, राजनैतिक आन्दोलन के रूप में बदल गया। कारण था सरदारों का बढ़ता प्रभाव। सरदारों में यह आशा जगी थी कि अगर बिरसा का आन्दोलन अंग्रेजो के विरूद्ध एक सफल सशस्त्र विद्रोह बन सका तो उन्हें उनकी खोई प्रतिष्ठा, खोई सम्पदा एवं खोया हुआ मानकी पद वापस मिल सकेगा, जो कोल-विद्रोह के बाद खो गया था।
बिरसा और सरदार आन्दोलनों की जड़े एक भूमि-समस्या में थी और 1895-1900 में उनका विलयन हो गया था।
अनेकों लड़ाईयाँ बिरसा मुंड़ा के पहले भी इस क्षेत्र में लड़ी गई थी जिसके चलते सरकार को कुछ प्रशासनिक सुधार के लिए कदम उठाने पड़े थे। मुख्य रूप से ये निम्नलिखित हैः-
1 . सन् 1833 का रेगुलेशन (13) जिसके तहत जंगल महल जिलों का विघटन कर दिया गया था
और नया जिला मानभूम का गठन किया गया।
२. सन् 1854 का रेगुलेशन (20) जिसके अंत्तर्गत छोटानागपुर प्रखंड़ को एक आयुक्त के अंत्तर्गत गठित किया गया।
3. छोटानागपुर भूमि-कानून 1869।
4. बंगाल-एक्ट (1) 1879।
5. सन् 1895 और 1898-99 के पश्चात बिरसा मुंड़ा के समय “खुँटकाटी” व्यवस्था को पुनः लागू करना।
6. जमीन का पूर्ण-रूपेण सर्वेक्षण एवं भूमि हक संबंधी रिकार्डो का पंजीकरण।
7. बैठे-बेगारी प्रथा का उन्मूलन।
8. सम्पूर्ण छोटानागपुर का साधारण समान सर्वेक्षण।
9. एक नवम्बर 1902 को गुमला अवर प्रमंडल का गठन।
10. दिसम्बर 1905 में खूँटी अवर प्रमंडल का गठन ।
11. मुंड़ारी खूँटकाटी, भूमिव्यवस्था लागू की गई एवं रैयती और अन्य जमीनों की बिक्री एवं हस्तांतरण पर रोक लगा दी गई।
12. छोटानागपुर टेनेन्सी एक्ट 1908 को पारित करना। यह कानून बंगाल टिनेन्सी एक्ट (1) का एक विस्तृत और परिष्कृत रूप था। इसे स्थानीय रीति-रिवाज एवं मान्यताओं, धारणाओं को मद्य नजर बनाया गया था।

Sunday, June 20, 2010

अध्याय तीन

अध्याय तीन
झारखण्ड़ के प्रमुख विद्रोह –
झारखण्ड़ के विषय में जानकारी लेने के पहले झारखण्ड़ क्षेत्र में हुए ब्रिटिश-प्रशासन के विरूद्ध की जानकारी प्राप्त कर लेना आवश्यक होगा। वास्तव में झारखण्ड़ अलग राज्य के नाम से किए गये आन्दोलन की पृष्ठभूमि को पहले समझ लेना चाहिए।
झारखण्ड़ के लोगों की अपनी परम्परागत व्यवस्था, जीवन-शैली पर कुठारघात से ही इन विद्रोह का जन्म हुआ था। 1765 से जब ईस्ट इंडिया कम्पनी को दीवानी अधिकार दिए गये, विद्रोह की शुरूआत हो गई थी। इसके प्रमुख विद्रोह थे- मलेर विद्रोह (1772), तिलका मांझी विद्रोह (1784), तमाड़ विद्रोह (1798), कोल इसरेक्सन (1820), हो विद्रोह (1820), ग्रेड कोल इन्सरेक्सन (1832), गंगानारायण विद्रोह (1832), संथाल रिवोल्ट (1855-57), सरसप्त संघर्ष (1859-65), चुहॉड़ विद्रोह।
चुहाँड़ विद्रोह – ब्रिटिश हुकमरानों से झारखण्ड़ को सदा समता की आशा और अपेक्षा थी भी नहीं क्योंकि झारखण्ड ने जितना विरोध ब्रिटिश हुकमरानों का किया था, उससे झारखण्ड़ के प्रति अंग्रेजों की चिढ़, द्वेश और प्रतिकुल भावना को समझा जा सकता है।
भारत वर्ष के कई हिस्सों में ब्रिटिश राजशक्ति को देशीय राजशक्तियों से प्रतिरोध झेलना पड़ा। अन्य जगहों पर राजे-राजवाड़ो की शक्ति से लड़ना पड़ा था जिससे आम जनता पूरी तरह शामिल नहीं थी। यहाँ ब्रिटिश शासकों को जन संग्राम का सामना करना पड़ा। मराठा, सिख हैदर टीपू आदि ने ब्रिटिश विरोधी संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी कहानी को विस्तार से लिखा एवं कहा गया। पर सुदुर खान जंगलों के बीच हुए जन संग्रामों को अनदेखी कर दी गई।
12 अगस्त 1766 को मुगल बादशाह आलम द्वितीय से ईस्ट इंडिया कम्पनी को बंगाल की दिवानी स्वीकृत की गई थी। ज्ञातव्य हो कि उस समय बिहार में वर्त्तमान बिहार, बंगाल, झारखण्ड़, उड़ीसा और असम शामिल थे। अंग्रेजो ने उसके बाद भारतवर्ष में शासन चलाने के लिए जमीन सर्वेक्षण का काम शुरू किया। बंगाल के अंदर तत्कालीन छोटानागपुर के जंगल महल जिला में जमीन का सर्वे एवं खतियान बनाने का काम शुरू किया गया था। माल गुजारी वसूलना शुरू किया था। और बहुत सारी योजनाएँ तैयार की गई थी, जिससे यहाँ के जल जंगल एंव जमीन पर कब्जा किया जा सके। जिससे यहाँ असंतोष फैलने लगा था। शासन व्यवस्था को अंग्रेजों को सबसे पहले कुड़मी आदिवासियों ने सन् 1769 में चुनोती दी थी और सन् 1769 में भारत में भारत का पहला क्रांतिवीर रघुनाथ महतो सामने आया था और अद्भूत लड़ाई लड़ी थी।
रघुनाथ महतो का जन्म झारखण्ड़ क्षेत्र के तत्कालीन जंगल महल जिला और वर्त्तमान में सराईकेला जिला के नीमडीह प्रखंड़ के धुटियाडीह ग्राम में हुआ था। 1965 में ईस्ट इंड़िया कम्पनी ने जंगल महल जिला में आदिवासियों के जल, जंगल जमीन पर अपना अधिकार जमाने के लिए राजस्व वसूलना शुरू किया, मूलवासियों के जमीन छीनकर बंगाली जमींनदारों के हाथों हस्तांतरण किया जाने लगा, अन्य क्षेत्रों से लोगों को झारखंड़ क्षेत्र में आयात करके बसाना शुरू किया, तो रघुनाथ महतो ने इसका विरोध किया और जन-संगठन तैयार करके नीमडीह गांव के पास फाल्गून पूर्णिमा 1769 को अंग्रेजों के खिलाफ एक सभा बुलाकर शंखनाद किया। आज उसी स्थान को रघुनाथपुर कहा जाता है जो नीमडीह प्रखंड का मुख्यालय है। इसी तरह पुरूलिया के उत्तर दिशा में करीब तीस किलोमीटर पर शहर रघुनाथपुर है। मेदनीपुर जिला अंत्तर्गत झाड़ग्राम में भी रघुनाथपुर है। जनतश्रुति है कि इन्ही के नाम पर ये शहर बसे।
रघुनाथपुर महतो का विद्रोह 1805 तक चलता रहा। रघुनाथ महतो का विद्रोह नीमडीह, पातकोम, से लेकर बड़ाभूम, धालभूम, मेदनीपुर तथा किचूंग परगणना तक फैल गया। किचूंग परगणना के अंत्तर्गत सराईकेला, खरसवाँ जिला के प्रखंड़ राजनगर, सराईकेला, गम्हरिया क्षेत्र को कहा जाता था। जंगल महल जिला के कई जमींदार और राजाओं ने ईस्ट इडिया कम्पनी की अधीनता स्वीकार कर ली। पर धालभूम के राजाओं ने अंग्रेजों से लोहा लिया, पर हार गये। तब उनके भतीजे जगन्नाथ धल को राजा बनाया गया। धालभूम के राजा जगन्नाथ धल का संबंध ईस्ट ईंडिया कम्पनी से बिगड़ता गया और राजा ने कम्पनी की अनसुनी कर दी। परिणाम हुआ कि अंग्रेजों ने उनके गढ़ पर धावा करके उन्हें बेदखल किया और वे किला छोड़कर जंगल-पहाड़ों में भाग गये। अंग्रेजों ने उनकी जगह नीमू धल को राजा बनाया।
जून 1773 में इस विद्रोह के महानायक रधुनाथ महतो के साथ जगन्नाथ धल की मुलाकात ग्राम पिपला में हुई। वहाँ दोनों ने मित-मितान का संबंध जोड़ लिया और अंग्रेजों के खिलाफ कूद पड़े। इधर लेफ्टीनेंट गुड़यार जगह-जगह इन्हें तलाश कर रहा था। पर रधुनाथ महतो ने जगन्नाथ धल को मदद किया और पाँच हजार विद्रोहियों के साथ धालभूम गढ़ के नील धल के धाटशीला में आक्रमण किया जिससे धाटशीला के राजा एवं ईस्ट इंड़िया कम्पनी के लोगों को भागना पड़ा और नरसिंहगढ़ में शरण लेना पड़ा। पर फिर अंग्रेजो की भारी भरकम फौज ने कप्तान फोबिस के नेतृत्व में घाटशिला में हमला किया तो विद्रोहियों को भागना पड़ा। घाटशिला के जोडसा ग्राम के माझियां महतो, बालूक महतो, रांगा महतो, कालचिंती ग्राम के आनन्द महतो, रघु महतो, जगन्नाथपुर ग्राम के पुकलू मांझी, शंकर मांझी के साथ दर्जनों की संख्या में लोग मारे गये।
ज्ञातव्य हो कि इस चुहाड़ विद्रोह के पहले छोटानागपुर क्षेत्र, पटना काउंसिल के अधीन था। लेकिन जंगल महल जिला में ईस्ट इंड़िया कम्पनी सरकार का जैसे-जैसे कब्जा बढ़ रहा था, विद्रोह भी उसी अनुपातः में बढ़ रहा था। इस विद्रोह की आक्रमकता को देखते हुए नवम्बर 1773 में छोटानागपुर क्षेत्र को पटना काउंसिल के नियत्रण से हटाकर बंगाल प्रेसीडेन्सी के अधीन इसलिए कर लिया गया ताकि स्वंय ईस्ट इंड़िया कम्पनी कलकत्ता से अपना शासन चला सके।
बहुत ही अल्प समय में चुहाड़ विद्रोह ने भयानक रूप ले लिया। अंग्रोजों को विद्रोहियों से हार माननी पड़ी तथा जगन्नाथ धल को धलभूम का पुनः राजा बहाल करना पड़ा। चुहाड़ विद्रोह अब बड़ाभूम पुरूलिया झरिया पंचेत और मेदनीपुर राजाओं के अधीनस्त क्षेत्रों में फैल चुका था। 25 जुलाई 1774 के बाद झरिया राज क्षेत्र में रघुनाथ महतो ने हमला किया था। दामोदर नदी पार कर के आए थे। 1776 तक विद्रोह का एक केन्द्र सिल्ली और झालदा के बीच मे बना।
ईस्ट इंड़िया कम्पनी को लगा कि जंगल महल जिला चुहाड़ विद्रोहियों के हाथ चला गया है और अंग्रेज अपना नियंत्रण खो चुके हैं। भारत के गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग ने विद्रोह थमता नहीं देखकर छोटानागपुर खास जंगल महल और रामगढ़ जिला के तत्कालीन कमींशनरों से रघुनाथ महतो और विद्रोहियों से बातचीत कर समस्या का समाधान करने का आदेश दिया। गवर्नर जनरल ने आदेश दिया की उन पर किसी तरह का दमनात्मक कारवाई नहीं हो। लेकिन जमींदारों ने गवर्नर जनरल की बातों को नहीं मानने के लिए कमिशनरों पर दबाव बनाया। जमींदारों ने किसी भी परिस्थिति में रघुनाथ महतो और विद्रोहियों का आन्दोलन दबाने की कोशिस की। 5 अप्रैल 1778 का दिन था, जब ईस्ट इंडिया कंपनी के पुलिस को पता चला कि रघुनाथ महतो अपने दल-बल के साथ झालदा के आसपास ग्रामीण क्षेत्र से स्वर्णरेखा नदी पार कर राँची (तत्कालीन छोटानागपुर खास) और सिल्ली के बीच जंगल में लोटा, गाँव के नजदीक सभा कर रहे है और सभा के बाद रामगढ़ की ओर बढ़ने वाले है जो ईस्ट इंड़िया कंपनी के पुलिस बैरक पर हमला करेगें। पुलिस फोर्स ने सभा स्थल में ही रघुनाथ महतो को घेर लिया और वह पुलिस का शिकार हो गये। सभा स्थल में पुलिस की गोलीबारी से दर्जन भर लोग मारे गये। सैकड़ों लोग गिरफ्तार कर जेल भेज दिये गये। रघुनाथ महतो के नेतृत्व मे करीबन दस साल तक आन्दोलन चला लेकिन उनके शहादत के बाद भी चुहॉड़ विद्रोह 1804 तक चलता रहा और समय-समय पर इस विद्रोह को कई नेताओं ने नेतृत्व प्रदान किया।
भारत देश के प्रथम क्रांतिवीर अमर शहीद रघुनाथ महतो का बलिदान व्यर्थ नहीं गया। उनकी शहादत, त्याग और अंतिम आत्माहुति की ज्वाला कालातंर में विभिन्न आन्दोलन क्रांतियों, विद्रोही का प्रेरणास्रोत बना और न सिर्फ झारखंड़, न भारतवर्ष बल्कि पूरी दुनिया के स्वतंत्रता आंदोलन में अग्रतम गाथा के रूप में रघुनाथ महतो का बलिदान चिरस्मरणी रहेगा।

Monday, June 14, 2010

झारखण्ड की संस्कृति एंव सभ्यता

झारखण्ड की संस्कृति एंव सभ्यता : झारखण्ड़ में यह सहकारिता की भावना तथा समानता की भावना बहुत अधिक है। यहाँ जब लोग शिकार पर निकलते थे या अब भी निकलते हैं तो साथ में चलने वाले कुत्ते को भी उसी शिकार का हिस्सा देते हैं जिसका शिकार किया जाता है। झारखण्ड़ में पेड़-पौधो, फल-फुल पर किसी का व्यक्तिगत मालिकाना हक नहीं होता है। यहाँ तक कि तालाब, नदी, नाले में मछली भी सामुहिक रूप से मारा जाता था और वापस में बाँट कर खाया जाता था।
जनजातियाँ अपनी ही जाति में विवाह करतें है। एक गोष्ठी के लोग दूसरे गोष्ठी में विवाह करते हैं, अपनी ही गोष्ठी में यानि अपनी ही गोष्ठी में विवाह निषिद्ध होता है। दूसरी जातियों में भी विवाह निषिद्ध होता है। अगर कोई व्यक्ति ऐसा करता है तो उसे समाज से वहिष्कार करने की प्रथा है। इसे “बिटलाहा” कहा जाता है, झारखण्ड़ में।
प्रत्येक जनजाति की अपनी संस्कृति होती है। एक जनजाति के रीति-रिवाज, जन्म, शादी, मृत्यु के अवसर पर अपनाए गये अनुष्ठान, कर्म-कांड़ अलग-अलग प्रकार के होते है। इनका अपना धार्मिक विश्वास होता है। प्रत्येक जनजाति अपने स्वतंत्र रूप-ढंग से सोचता है। किसी-किसी विषय पर इनका कार्यकलाप अन्य जनजातियों के समरूप भी होता है।
इसकी अपनी एक शासन-व्यवस्था होती है। पंचायत होती है, जिसमे अपराधियों की सुनवाई, सजा होती है। जमीन-संबंधी झगड़े एवं अन्य मामले निपटाएँ जाते है। झारखण्ड़ में कुड़मी जनजाति इसे “बाइसी” कहती है। अपने जनजातीय समाज का आदिवासी या जनजातीय स्वशासन कहा जाता है।
सामान्यता झारखण्ड़ की जनजातियों की अर्थव्यवस्था खेती एवं शिकार पर निर्भर करती रही थी। इसपर हमने पहले ही चर्चा किया है। आत्म निर्भरता झारखंड़ियों का एक गुण है। पर वे उतना ही मेहनत करते है जितना कि उन्हे जरूरत है। सामंतवादी शासन-व्यवस्था झारखंड़ में जनजातियों के बीच नहीं थी। वस्तुओं का आदान प्रदान किया जाता था। विनियम के लिए रूपयों की कमी थी और बाजार में एक व्यक्ति की उपज दूसरे की उपज के साथ अदला-बदली कर ली जाती थी। मापने का पैमाने होता था – “पैला” जिससे अनाज मापा जाता था। आज भी है। लम्बाई मापने का पैमाने होता था –“हाथ” एवं “बित्ता”। वजन का पैमाना होता था – “सेर”, “पौवा”, ”छटाक” आदि।
जनजाति समुदाय का एक अपना विशिष्ट धर्म होता है। ये मूर्ति पूजक नहीं होते। इनके धर्म में प्रकृति पूजा, आत्मवाद और जीववाद की प्रधानता पाई जाती है। ये पहाड़ो, पेड़ो, पत्थरों, फसल आदि की पूजा करते हैं। इनका धर्म अपनी ही समाज तक सीमीत रहता है। जनजातियों के लोग कई प्रकार की जादुई क्रियाऍ भी किया करते है।
मैदानी क्षैत्र के धर्म हिन्दुत्व में एक बहुत बड़ा तत्व है जो हिन्दु धर्म का आधार है। वह है “भक्ति” भाव। हिन्दुत्व में भक्ति-भाव का होना आवश्यक है। राम की भक्ति करने वाले राम-भक्त कहे जाते है। उसी प्रकार कृष्ण-भक्त एवं विभिन्न देवी-देवताओं के भक्त होते है। भक्ति का जन्म समर्पण की भावना से उत्पन्न होता है। यहाँ भक्त अपने भगवान के सामने पूर्ण समर्पण करता है। बाद में इसी भक्ति का प्रसार ईस्लाम एवं ईशाई-धर्म में प्रवेश कर गया।
इस भक्ति को ईश्वर से वरदान प्राप्त करने का आधार माना गया है। पूर्ण-समर्पण हो तो ही फल मिलता है- ईश्वर या अराध्य देव की कृपा मिलती है। ओर बगैर कृपा के मनुष्य को कोई फल नहीं मिलता। यही बड़े-धर्मो हिन्दु-धर्म, ईस्लाम, ईशाई की देन है, बोद्ध-धर्म में भी “बोद्धम-शरणम् गच्छामी” का भाव है। इन सभी धर्मो में “मसीहा” हैँ भगवान है। देवी-देवता हैं। जिनकी कृपा चाहिए। कृपा के लिए “भक्ति” की जरूरत है।
जनजाति धर्म में ऐसी बात नहीं है। ये छोटे-विश्वास के लोग हैं। इनका सीधे विश्वास प्रकृति पर है। प्रकृति ही मसीहा है। पेड़-पौधे, पत्थर, पहाड़, फसल ही इनके अराध्य देव हैं। जनजाति समुदाय का सदस्य इस भक्ति-भाव से दूर रहता है। वह किसी की आराधना नहीं करता। समर्पण नहीं करता। बराबरी का भाव एक दूसरे सदस्य के साथ रखता है। चाहे वह सदस्य उसके दल का मुखिया ही क्यों न हो।
भक्ति-भाव सामन्तवाद की देन है जो मैदानी क्षेत्रों की देन है। पहाड़ी क्षेत्रों में जनजातियों में सामंतवाद नहीं था। झारखंड़ के मूलवासी इस सामन्तवादी व्यवस्था से अछुते रहे हैं। अतः इनमे सामंत का भय पैदा नहीं हुआ। भय नहीं तो फिर समर्पण किस प्रकार का। अगर समर्पण नहीं तो फिर भक्ति का अस्तित्व नहीं। झारखंड़ का आदमी गुलामी पसंद नहीं करता। यह उसके स्वभाव में नहीं। “ठकुर-सुहाती” नहीं कर सकता। यह उसने सीखा नहीं। जनजाति विद्रोह करेगा। यह जानते हुए भी कि इससे उसके बड़े शत्रु का नाश नहीं हो पायेगा, पर वह समर्पण नहीं कर के मिट जाना पसंद करेगा। अपने स्वभाव को वह जल्दी नहीं बदल पाता। बाहरी तत्वों के साथ जल्दी समझौता नहीं कर पाता। अपने आप को अपने दायरे में सीमित कर लेना ज्यादा अच्छा समझता है, वजाय बाहरी तत्वों में स्वंय को विलिन कर लेने के।
संकुचित स्वभाव के झारखंड़ी अंतरमुखी है। हल्ला नहीं कर सकते। प्रचार तंत्र से दूर रहते है। बढ़-चढ़ कर बोलने का आदत उनके पास नहीं। चुप-चाप अपना काम करते हैं। अपनी प्रतिभा के प्रचार-प्रसार को बुरा मानते है और मानते है कि इससे गुण खत्म हो जाते है। अपना इतिहास स्वंय नहीं लिखते या बोलते हैं। यही कारण है झारखंड़ियों का इतिहास बहुत कम लिखा हुआ मिलता है। मिलता भी है वह अन्य लोगों द्वारा अति रंजित व्याख्यान ही मिलता है। सही तथ्यों की जानकारी नही मिल पाती।

Saturday, June 5, 2010

झारखण्ड की संस्कृति एंव सभ्यता

झारखण्ड की संस्कृति एंव सभ्यता : झारखण्ड क्षेत्र में बहूतायात जनसंख्या जनजातीय थी। ये आदिम लोग थे और कबिलाओं में निवास करते थे। इनकी संस्कृति आदिम संस्कृति रही है। कबिलाई जनसंख्या के सास्कृतिक विकास को हम तीन चरणों में बाँट सकते हैं। आदिम कबिले की आदिम जनजाति संस्कृति। दूसरे हिन्दु प्रभावित आदिम संस्कृति एंव तृतीय ईशाई प्रभावित आदिम संस्कृति। कबिलावाची जनजाति संस्कृति यानि कबिलाई जनजाति संस्कृति दो धाराओं में मूलत: विभक्त है। द्रविड़ संस्कृति एवं आस्ट्रीक संस्कृति। झारखण्ड क्षेत्र में प्राचीन युग में अति आदिम, (प्रमीटीव) जनजातियों के अपने स्थाई रूप से बसने के कारण द्रविड़ संस्कृति एवं आस्ट्री् संस्कृति एक दूसरे को किसी न किसी रूप में प्रभावित किया है। आदिम जनजाति अपने परम्परागत रीति-रिवाज से शासित होते है। इनकी अपनी प्रथाएँ है यानि चलन है जिनसे ये प्रशासित होते है। झारखण्ड़ के जनजाति मूर्तिपूजक नहीं, प्रकृति पूजक थे। ये हिन्दु धर्म के धारक या वाहक नहीं थे। सरना अथवा जाहिरा धर्म को मानते थे। यहाँ निवास करनेवाली जातियों की संस्कृति वैदिक नहीं थी। इनकी संस्कृति थी, कुड़मी-संस्कृति, संथाल-संस्कृति, खड़िया, उराँव, मुंड़ा संस्कृति आदि।
कालान्तर में हिन्दू विधि द्वारा प्रशासित आर्य यानि हिन्दू संस्कृति के लोगों का प्रवेश झारखण्ड़ में हुआ। अधिक विकसित क्षेत्र के लोग कम विकसित क्षेत्र के लोगों के ऊपर हावी होने का प्रयास करते हैं। हिन्दू-संस्कृति को झारखण्ड़ क्षेत्र में व्यापक प्रचार-प्रसार के माध्यम से लादा या थोपा गया। गाँव-गाँव में रामायण, महाभारत की कथाओं का प्रचार-प्रसार ब्राह्मणों के द्वारा किया गया। द्रविड़ एवं आंस्ट्रिक संस्कृति बाहर के हिन्दू-संस्कृति द्वारा प्रभावित हुआ। पर साथ ही हिन्दू धर्म भी इन संस्कृतियों से प्रभावित हुआ। केला, सुपाड़ी, नारियल, ईंख एवं सिंदूर मूलत: द्रविड़ संस्कृति की नेवेद्य है। इसे हिन्दू संस्कृति ने अपनाया है।
झारखण्ड़ के विषय में, वहाँ की जातीय परिस्थिति को समझने के पहले जनजाति की क्या विशेषताएँ होती है, इसपर थोड़ी चर्चा करना आवश्यक है एवं महत्वपूर्ण है। क्योंकि झारखण्ड़ आन्दोलन का मूल वहाँ की जातीय परिस्थिति एवं संस्कृति है। झारखण्ड़ी राष्ट्रीयता को समझने के लिए वहाँ निवास करने वाली जनजातियों की विशेषताओं को जान लेना जरूरी होगा।
जनजाति का निर्माण कई गोंष्ठियों के संकलन से होता है। एक गोष्ठी एक परिवार ही रहा है। जनसंख्या की वृद्धि के चलते परिवारों की संख्या में वृद्धि होती है। परिवार ही जनजाति समाज की मौलिक ईकाई है। जनजाति परिवार या गोष्ठी का ही एक विस्तृत रूप है। जैसे मुंड़ा जनजाति में सोंय, पूर्ति, बोदरा, तिडू, भेंगरा इत्यादि, संथाल जनजाति में हेम्ब्रम, हाँसदा, सोरेन, मरांड़ी, बेसरा इत्यादि। कुड़मी जनजाति में सांखुआर, टिडुआर, मुतरूआर, काडूआर आदि। कुडुक जनजाति में कुजुर, मिंज, खेस, किसपोट्टा, सांखआर, तिग्गा आदि खड़िया जनजाति में बाः, किडो, बिलुंग आदि। हो जनजाति में तुबिद, तियू, लुगुन इत्यादि। इन गोष्ठियों को अंग्रेजी में ट्राइब कहा जाता है, जिसका अर्थ गण या दल है।
जनजाति टोटेमिक होते है। अंग्रेजी शब्द टोटेम का अर्थ है विश्वास। ट्राइब संगठित जनजाति किसी भौतिक पदार्थ, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, फूल-फल, किड़े-मकोड़े, जल-जीव आदि से अपना एक रहस्यमय संबंध होने का दावा करते हैं। वे ही ट्राइव या गोष्ठी नाम से जाने पहचाने जाते हैं। उनपर विश्वास या टोटेम मानते है।
जनजाति टाबू मानते हैं। टाबू (Taboo) का अर्थ धार्मिक विधि या निषेद्य या व्यवहार में नहीं लाने, बध नहीं करने अथवा खाने में व्यवहृत नहीं करने से होता है। जनजाति में प्रत्येक गोष्ठी का एक निषिद्य पदार्थ होता है।
प्रत्येक जनजाति को किसी एक न एक विशिष्ट नाम से जाना जाता है। जैसे कुड़मी, मुंड़ा, उराँव, हो, खड़िया आदि।
जनजाति का एक निश्चित भू-भाग होता है। उनका एक निर्दिष्ट परम्परागत निवास भूमि होती है। किन्तु इस सम्बन्ध में विद्वानों के विचारों में भिन्नता है। डा0 रिचर्ड का मत है कि जनजाति के लिए एक निश्चित स्थाई निवास भूमि होना आवश्यक नहीं है। कई जनजातियाँ घुमक्कड़ जीवन व्यतीत करती है। किन्तु डा0 मजूमदार का मत है कि घुमक्कड़ जनजातियाँ एक निश्चित भू-भाग यानि एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में ही घुमती है, सभी जगहों पर नहीं। वैसे झारखण्ड़ क्षेत्र में बसने वाली अधिकत्तर जनजातियाँ इस क्षेत्र की स्थाई निवासी हैं। घुमक्कड़ जातियाँ भी इस क्षेत्र से बाहर नहीं निकली।
प्रत्येक जनजाति की अपनी कविलावाची भाषा होती है जिसका प्रयोग उस जनजाति के सभी लोग करते हैं। जनजाति भाषा का हस्तान्तरण प्रमुख रूप से मौखिक रूप से होता है। इन जातियों की भाषाओं को लिपिबद्ध करने का प्रयास जनजातियों ने कम किया है। अतः इनकी लिपि नहीं मिलीती। हाल-फिलहाल में ‘’लिपि ‘’ तैयार करने की चेष्टा की गई है। वर्त्तमान मे भी कुड़मी जनजाति कुड़माली भाषा का प्रयोग करती है। संथाल जनजाति की भाषा संथाली, उराँव जनजाति की कुडुक है। बाहरी लोगों के सम्पर्क में आ जाने के कारण तथा हिन्दी के राष्ट्रीय भाषा बन जाने के कारण तथा अन्य भाषा-भाषियों के सम्पर्क के फलस्वरूप अनेक बाहरी शब्दों का समावेश इन भाषाओं में हो गया है।
जनजाति व्यक्तिवादी नहीं होता। समाजवादी या समाजमूखी होता है। एक निश्चित भू-भाग के दायरे में रहने के कारण तथा अपने जीवन-ज्ञापन के कार्यो को समाज के अन्य लोगों के द्वारा सहभागिता के आधार पर करने के कारण जनजाति में सामुदायिक भावना पाई जाति है। ये परस्पर सहयोग से जीने के अभ्यस्त होते हैं। शिकार करना, जंगलों में प्रवेश करना, खेती करना, सिचाईं करना, मछली मारना आदि सभी काम गाँव के सभी लोग या अधिकत्तर लोग एकजूट होकर करते है।

Friday, May 28, 2010

आर्थिक परिस्थिति : ब्रिटिश शासन काल एवं पूर्व

आर्थिक परिस्थिति : ब्रिटिश शासन काल एवं पूर्व
झारखंड़ क्षेत्र झाड़-जंगल से घिरा क्षेत्र है। यहाँ सैकड़ो प्रकार के पैड़-पौधे है। कन्द-मूल है। बाँस है। घास है। पूरा इलाका टीलों एवं पहाड़ो से भरा हुआ है। उबड़-खाबड़ जमीन है। समतल मैदान बहुत कम है और ये पहाड़ो की तलहटियों पर फेले हैं। यहाँ छोटे-छोटे नाले, झरने आदि हैं तो बड़ी-बड़ी नदियाँ भी है। जल की प्रचुरता रही है। यहाँ का मौसम समशीतोष्ण है। न ज्यादे ठंड़, न ज्यादे गरमी पड़ती है।
ब्रिटिश शासन काल एवं पूर्व में घने जंगल थे। बाघ, भालू, मोर, हाथी, हीरण, जंगली सुअर आदि बड़े एवं खतरनाक जानवरों से ये जंगल एवं पहाड़ भरे हुए थे। इसके अलावा सैकड़ो प्रकार के पक्षी थे। प्रसिद्ध शिकारी जिम कारर्वेट ने छोटानागपुर के पक्षियों-जानवरों के विषय में काफी कुछ लिखा है। यहाँ पर दामोदर, सुवर्ण रेखा, बराकर, कंषावती, कोनार आदि बड़ी नदियाँ है। यहाँ के गाँवों में लोग टोलो में निवास करते थे जो दूर-दूर होते थे। एवं इन गाँवो की जनसंख्या भी कम होती थी। पहाड़ो पर भी जनजातियाँ घर बना लेती थी। इनका प्रमुख व्यवसाय कृषि था एंव इसके बाद शिकार। ये चावल की खेती करते थे। छोटे-छोटे खेत पहाड़ों की तलहटी वाले समतल मैदान में होते थे और पहाड़ की ढलानों पर भी। जमीन उपर-नीचे होने के कारण खेत भी उपर-नीचे होते हैं। चावल की तरह “गुदली”, मड़ुआ, कोदो, जो, मकई, बाजरा पैदा करते थे। दलहन में अरहर, कुरथी, उरद, खेसारी पैदा करते थे। सरसों भी पैदा करते थे। सुरगुजा, कुदरूम आदि फसलें भी यहाँ पैदा किया जाता रहा था। जोगल के फल-फुल, कंद भी खाते थे। कुछ जंगल के जानवरों का शिकार करके भी अपनी खुराक जुटा लेते थे। इसके अलावा बकरी पालना, सुअर पालना मुख्य काम था। प्रत्येक घर में इन्हें पालने की परिपाटी थी। गाय-भैंस पालने का चलन नहीं था। बैलों एवं भैंसों से खेती करते थे। हल चलाकर। जीवन बहूत सरल था। साग सब्जी बेगन टमाटर आदि उगा लेते थे। तम्बाकू भी उगाते थे। महुआ के पेड़ से महुआ उतार कर शराब भी बना लेते एवं चावल की शराब “हँड़िया” भी।
यहाँ के निवासी सामुहिक जीवन पद्धति के आदि थे। व्यक्तिवादी नहीं थे। सामंतवादी नहीं थे। ज्यादे की लालसा नहीं थी। शादी विवाह पास के गाँवों में ही हो जाते थे। आवागमन की सुविधा नहीं थी। उस समय लोग बैल-गाड़ियों में ही यात्राएँ किया करते थे। झारखंड़ के मुल निवासी घोड़े की सवारी का उपयोग नहीं करते थे। झारखंड़ वासियों का जीवन जंगल पर आधारित जीवन था। जंगल की लड़की का प्रयोग एवं उपयोग मकान बनाने, हल बनाने एवं कृषि के अन्य उपकरण बैलगाड़ी आदि बनाने में करते थे। जलावन का काम सुखी लकड़ियों से चल जाता था। अनेक प्रकार के पेड़ थे जिनके पत्तों से बीड़ी, “चुटी” बनाकर घुम्रपान करते। फल-मूल-कंद खाते थे। दवाई भी जंगल की जड़ी-बूटी से बनाते थे। पहाड़ के पत्थरों से या मिट्टी से मकान की दिवार बनाते थे। बरसात के दिनों में जिन दिनों कपड़े का “छाता” का अविष्कार नहीं हुआ था। उन दिनों “घोंघ” या “पोतरो” (गूँग चोंगा) होता था और सामने की ओर खुला। इसे एक प्रकार की लत्तर के पत्तों से बनाया जाता था जिन पत्तों का आकार काफी बड़ा होता था। इसे पहनकर किसान बरसात के दिनों मे हल चलाते, धान रोपते या खेतों में अन्य काम करते थे। बाँस की पत्तियों को चीरकर पतली-पतली सीकें बनाते थे और उसे बुनकर बाँस का छाता बनाते थे। इसके अलावा कृषि एवं घरेलू उपकरण जैसे धान कुटने के लिए “ढ़ेकी”, धान साफ करने के लिए “सूप”, बाँस की पत्तियों से टोकरी, “खाँची” यानि बड़ी टोकरी सामान ढोने के लिए, “डेमनी” आदि जरूरत के मुताबिक। यहाँ तक कि सिचाईं के लिए नालों में, कुएँ में “टेड़ा-डाँग”। लाट-खुटाँ, रहट का एक प्रकार हैं। तथा “सिनी” “चाड़या”, “डाबका” भी सिचाईं के लिए बनाया जाता था। झारखंड़ के निवासी अपने जंगलों की रक्षा भी करते थे। घास-फूस काटकर जानवरों को खिलाते थे। मछली-मारने के लिए नदी या तालाब में प्रयुक्त करने के लिए आवश्यक उपकरण जैसे “घूँघी”, “जाल”, “पोलाई” आदि घाँस या लकड़ी से बनाते थे।
करंज का तेल, नीम का तेल तथा महुआ के वृक्ष से तैयार “कोचड़ा” की सब्जी तथा तेल बनाते थे उसके बीज से । महुआ के पेड़ में जो फूल आते है, उन्हे महुआ कहते हैं। इससे शराब बनाती है। आदमी एवं जानवर इसे कच्चे रूप में भी खाते थे। फूल के गिरजाने के बाद फल आता है जो हरे रंग का आँवला के बराबर होता है और इसके बीज से “कोचड़ा का तेल” यानि ढौरी का तेल बनाया जाता है। यह औषधि है और विभिन्न कामों के लिए प्रयोग किया जाता है। खटिया की रस्सी भी जंगल के सवाई घास से तैयार करते हैं तथा बिछाने के लिए चटाई भी खजूर एवं ताड़ के पत्ते से बनाते थे। ओढ़ने की रजाई के लिए समेल की रूई वृक्षों से काफी तादाद मे प्राप्त करतें थे। यहाँ तक की तेल बनाने के “धनी” बनाया जाता था जो सरसों एवं अन्य बीजों को पेरकर, पीसकर तेल निकालता था। “जाँता” बनता था, दाल बनानें के लिए “जाँता ” हाथ से चलाने वाली छोटी चक्की को कहते हैं।
जंगल से लोहा की मिट्टी, ताँबा की मिट्टी आदि मिलते थे। झारखंड़ के लोग लोहा, ताँबा आदि गलाना जानते थे। हथियार भी लकड़ी एंव लोहा से बना लेते। इसके अलावे घर को लीपने-पोतने के लिए चिकनी सफेद मिट्टी, लाल मिट्टी भी उपलब्ध थी।
इस प्रकार झारखंड़ के लोग अपना काम आप चलाते थे। ये गरीब जरूर थे, पर शांत होते थे। इनका स्वभाव था कि ये बाहर के लोगों के साथ जल्दी मिलना जुलना पसन्द नही करते थे। अपने जीवन-शैली, कार्य-शैली में हस्तक्षेप पसन्द नहीं था।
व्यवसाय, व्यवपार करने वाली जातियाँ झारखंड़ क्षेत्र में बाजार के विस्तार के साथ मैदानी इलाकों से आकर बसने लगी थी। ये बिचौलियों का काम करने वाली जातियाँ थी।

Wednesday, May 12, 2010

अध्याय – 2

झारखण्ड़ की जातीय संरचना :
इस तथ्य को जान लेना आवश्यक है कि झारखण्ड़ क्षेत्र बींसवीं सदी के पाँच दशको तक यानि आज से पच्चास-बावन वर्ष पहले तक जनजातीय बाहुल क्षेत्र था सरकारी कागज-कलम यानि आँकड़ो के अनुसार। 1950 में आजादी के बाद जब संविधान की धारा 342 में महामहिम भारत के राष्ट्रपति ने अनुसूचित जन जातियों की सूची बनाई तो उसमें कुछ बड़े आदिवासी समुदायों यानि जनजाति का नाम छूट गया था छोड़ दिया गया।
तत्कालीन भारत सरकार ने यानि अंग्रेजी हुकूमत ने गृह विभाग के माध्यम से नोटिफिकेशन नम्बर 550 दिनांक 2 मई 1913 निकाला था। इस अधिसूचना में कहा गया था कि बिहार एवं उड़ीसा क्षेत्र में निवास करने वाली जातियाँ मुँड़ा, हो, उराँव, संथाल, भूमिज, खड़िया, घासी, गौड़, कघं, कोरवा, कुरमी, माल, सूरीया एवं पान जनजातियाँ थी। फिर 8 दिसम्बर 1931 के अधिसूचना द्वारा पुन: भारत सरकार ने उपरोक्त तेरह जातियों को जनजाति माना। इन जनजातियों के भी कई उपजातियोँ थी। मुंड़ा, कुरमी, संथाल, हो, उराँव आदि उपरोक्त तेरह जनजातियों के अलावा कोल, घटवार, खरवार, असुर, बैगा, बादुड़ी, बेदिया, चेरा, चिकबराइक, गोड़ाइत, करमाली, कोड़ा, मॉहली, लोहार, बिरहर, पहाड़िया, सूर्य पहाड़िया आदि जातियाँ थी जो जनजातियाँ मानी गई थी। ब्रिटिश शासन के बीसवीं सदी में इनकी जनसंख्या झारखण्ड़ क्षेत्र में कुल मिलाकर नब्बे प्रतिशत से कम नहीं रही होगी। हरिजन जातियाँ कम थी तथा उच्चवर्ण ब्राह्णण आदि का प्रतिशत कुछ भी नहीं था।
अन्य जातियाँ जो व्यवसाय तथा व्यवपार से संबंध रखती थी यानि बिचौलियाँ का काम करने वाली जातियाँ धीरे-धीरे झारखण्ड़ क्षेत्र के बाहर से आकर बाजार के विस्तार के साथ इस क्षेत्र में बसने लगीं।
ब्रिटिश शासन के पहले मुसलमान शासको ने सैकड़ो वर्षो तक भारत में राज किया। जाहिर है सात-आठ सौ वर्षो के मुसलमानों के प्रभुत्व में रहने के कारण झारखण्ड़ में भी इसका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था। झारखण्ड़ में भी इस्लाम ने पाँव फैलाए। पर मुसलमान शासकों ने इस क्षेत्र में स्थाई रूप से रहकर राज नहीं किया। मुगल शासको के साथ साधारण निष्ठा थी। ताँती, जुलाहा, बुनकर आदि जातियाँ मुसलमान बनीं।
अंग्रेजो ने तो यहाँ बकायदा मिशनरियों के माध्यम से धर्म-परिवर्त्तन का काम शुरू किया था तथा जनजातियों ने काफी तादाद में ईशाई धर्म को स्वीकार किया था। करीब सौ साल पहले इशाई मशिनरियाँ झारखण्ड़ में आई। 1900 ईस्वी के आसपास यह धर्म परिवर्त्तन काफी तेजी में हो रहे थे। धार्मिक परिवर्त्तनों का समय 1930-31 तक बड़ी गति से चला। सबसे पहले झारखण्ड़ में ऐथेनिक मूल के प्रकृति-पूजक थे। टोटेम आधारित जनजातियों का ही निवास स्थान था झारखण्ड़। जोहार थान, जाहिरा, सरना, हड़गड़ी, ग्रामथान, जियारी आदि की पूजा होती थी। मारांगबुरू, बड़बौंगा, पत्थरों, पहाड़ो, पैड़ो, नदियों की पूजा होती थी। प्रत्येक जनजाति की अपनी एक भाषा भी होती थी और आज भी है। मुंड़ा जनजाति की भाषा, “हो” कुड़मी जनजाति की भाषा कुड़माली भी होती थी और आज भी है। मुंडा जनजाति की भाषा मुड़ारी, हो की भाषा हो, कुड़मी की भाषा कुड़माली, उराँव की कुडुक आदि। सभी जनजातियों के अपने-अपने पर्व त्योहार भी होते हैं। सामाजिक रीति-रिवाज भी अपने-अपने हैं। हम यहाँ विस्तार से जनजातियों की जीवन-पद्धति पर जाना नहीं चाहते। यह जान लेना ही काफी है कि हिन्दूधर्म, ईस्लाम या ईशाई धर्मो के अनुआई ये नहीं थे और इनकी जीवन-शैली मैदानी सभ्यता के लोगों से बिलकुल ही भिन्न थी। इस समय झारखंड़ में एक तरफ तो ईशाई मिशनरियों का प्रभाव हो, मुंड़ा, उराँव, संथाल आदि जनजातियों पर पड़ रहा था, तो दूसरी तरफ सनातन धर्म का प्रचार प्रसार भी कुछ आदिवासी जातियों के बीच हो रहा था। जमींदारी प्रथा के शुरू होने एवं अंग्रेजों द्वारा झारखंड़ में प्रभुत्व स्थापित करने के साथ-साथ ब्राह्मणवाद धीरे-धीरे झारखंड़ में फैल रहा था। बहुत सी जातियोँ जो अपने को एथेनिक या टोटेमिस्टीक ग्रुप की मानती थी धीरे-धीरे हिन्दुत्व की ओर मुड़ने लगी। इनमें एक प्रमुख जाति हैं कुरमी महतो यानि कुड़मी महतो यह जाति जैसा कि हमने पहले ही कहा है 1913 एवं 1931 के अधिसूचना के अनुसार तथा डब्लू0 जी0 लेसी साहब के सर्वे के अनुसार प्रमीटिव ट्राइव मानी गई थी एवं जनजाति में शुमार की गई थी। इस जनजाति की अकेले की संख्या झारखंड़ क्षेत्र में पच्चीस प्रतिशत से अधिक थी और आज भी है।
प्रशासनिक एवं राजनैतिक कारणों से झारखंड़ क्षेत्र के तीन-चार हिस्सों में बँट जाने के कारण इन जनजातियों के जीवन में कई उतार-चढ़ाव आए। जो हिस्सा बंगाल में रह गया, वहाँ के जनजाति लोग बंगाली भाषा एवं संस्कृति से प्रभावित होने लगे। उसी प्रकार जो लोग उड़ीसा के राज्य की सीमा के अन्दर आए उन्होनें “उड़ीया-संस्कृति” एवं उड़ीया भाषा अपनाना शुरू किया। ठीक उसी प्रकार बिहार में पड़ने वाला हिस्सा भी प्रभावित हुआ तथा इस क्षेत्र के झारखंड़-वासी हिन्दी भाषा की तरफ मुखातिब हुए। ऐसा प्रशासनिक कारणों से एवं राजनैतिक कारणों से हुआ। एक ही सभ्यता-संस्कृति के मानने वाले लोग, एक ही भाषा के बोलने वाले लोग अलग-अलग प्रकार की भाषाएँ सीखने, बोलने लगे।
जैसा कि मैंने इंगित किया है कि कुरमी महतो जनजाति भी ब्राह्मणवाद् से प्रभावित हुई। 1915 में इन्होंने क्षत्रिय बनने का प्रयास करने लगे। मुर्गी-पालन, सुअर पालन जो आदिवासियों के परम्परागत काम थे, उसे छोड़ने का आन्दोलन किया तथा जनेऊ भी पहनने का आन्दोलन चलाया। इसका परिणाम कोई अच्छा नहीं हुआ। बिहार एवं उड़ीसा के विभाजन 1936 के बाद बिहार के कुरमी-जाति के लोगों के प्रभाव से इन्हें पिछड़ी जाति में बिहार राज्य में शामिल कर लिया गया। भारत के तत्कालिन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने यह स्पष्ट कर दिया था कि 1931 में अंग्रेजी सरकार ने अपने जनगणना में जिन जातियों को प्रीमिटीव ट्राइव माना था, उन सभी को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया जायेगा। पर संविधान की धारा 342 में कई जातियाँ अनुसूचित जातियों की श्रेणी से वंचित हो गई, उनमें एक कुरमी-महतो जाति भी थी। इस क्षेत्र की जनजाति भूमिज ने भी क्षत्रिय बनने के प्रयास सनातन धर्म के प्रभाव से किए थे। खतौरी, घटवार तो बकायदा अपने को राजपूत समझने लगे थे और घटवार जो यहाँ जमींदार बनाए गये थे, ऊँची हैसियत के हो गये थे और बाहर के राजपूतों से अपना संबंध भी जोड़ने लगे थे। शादी-विवाह भी करने लगे थे। उसी प्रकार वैष्णव धर्म का प्रचार प्रसार हुआ। चैतन्य महाप्रभु के झारखंड़ प्रवेश के बाद यहाँ बहुत सारे जनजाति के लोग वैष्णव धर्म भी अपनाने लगे। भगत बनने लगे। यहाँ की आदिम जाति मोची यानि चमार जो यहाँ जनजाति थी उन्हे सनातन धर्म के प्रभाव से शुद्रजाति कहा जाने लगा। उसी प्रकार कई अन्य जनजातियों के साथ हुआ।
सच तो यह है कि झारखंड़ क्षेत्र मे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र इन चार वर्णो में समाज बँटा हुआ नहीं था। यहाँ सनातन धर्म के प्रवेश के बाद ही ऐसा हुआ। इसके अलावा इस क्षेत्र में जैन धर्म भी बहुत पहले आ घुसा था और कुछ जातियों में इसका प्रभाव देखा गया है।
बावजूद इसके अन्य जनजातियों की तरह छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 के प्रवधानों का फायदा कुरमी महतो को भी मिला। इन्हें भी भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1865 एवं 1925 के प्रावधानों से अन्य बारह जनजातियों की तरह ही मुक्त रखा गया था। 1950 की सूची के बाद, कुरमी महतो समुदाय ने कई प्रयत्न किए पर अब तक उन्हें जनजाति सूची में भारत सरकार द्वारा शुमार नहीं किया जा सका है। “झारखंड़ मामलों से संबंधित समिति” की रिपोर्ट जो मई 1990 में प्रकाशित हुई इसमें भी इस जाति को “गैर-सरकारी आदिवासी” कहा गया है तथा यह भी कहा गया है कि झारखंड़ क्षेत्र के अन्य जनजातियों की अपेक्षा इसने अपने मूल वंश की पहचान को ज्यादे बरकरार रखा है।
इसी प्रकार धीरे-धारे अन्य कई जातियों को भी सरकारों ने अनुसूचित जनजाति की सूची से अलग कर दिया। इसमें प्रमुख हैं- रजवार, कोल, लोहार, खेतोरी, बड़ाइक इत्यादि।
ऐसा करने का एक बहुत बड़ा कारण था और ब्रिटिश हुकूमत की यह एक चाल थी। “फूट डालो और राज करो” नीति अपनाई गई थी। अगर इन जातियों को गैर-आदिवासी नहीं बनाया जाता तो जमीन-अधिग्रहण एवं हस्तातरण में काफी कठिनाई का सामना करना पड़ता क्योकिं छोटानागपुर यानि झारखंड़ क्षेत्र में इन्हें विभिन्न कानूनों के द्वारा विशेष सुरक्षा जमीन के हस्तातरण के मामले में प्रदत थी। फिर इंडिजीनियस ट्राईव को उजाड़ने की भी मनाही थी। इन जातियों के हाथ में झारखंड़ की समतल जमीन का बड़ा भाग था और वे इसमें खेती करके स्वतंत्र रूप से जीवन यापन करते थे। बाहरी दबाव का मुकाबला करने की ताकत इन जातियों में ज्यादे थी। चाहे वह दबाव राजनैतिक हो या धार्मिक। कुरमी-जाति के लोगों ने कोई धर्म परिवर्त्तन नहीं किया। वे न ईशाई बने न मुसलमान।

Sunday, April 25, 2010

मैदानी “जनजातीय क्षेत्रों” का सवाल

मैदानी “जनजातीय क्षेत्रों” का सवाल – केबिनेट मिशन के 16 मई 1946 के विवरण से उत्पन्न होकर संविधान सभा गठित की जानेवाली मौलिक अधिकारों तथा अल्प संख्यकों संबंधी सलाहकार समिति ने तीन उप समितियों का गठन किया जिनके लक्ष्य निम्नलिखित थें –
. असम के जनजातीय और वहिष्कृत तथा आंशिक रूप से वहिष्कृत क्षेत्रों पर विचार
करना ।
. उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रदेश और बलूचिश्तान में जनजातीय क्षेत्रों पर विचार करना ।
. असम से उत्तर प्रदेशों में वहिष्कृत तथा आंशिक रूप से वहिष्कृत क्षेत्रों की स्थिति पर
विचार करना ।
समिति ने निम्नलिखित दो महत्वपूर्ण प्रेक्षण दिए –
1. पहाड़ी जनजातियों का विभाजन ऐसे जनजातीय आबादी वाले या जनजातियों के समरूपी ग्रुपों की आबादी वाले काफी बड़े जिलों के रूप में किया गया है जिनके संगठन काफी लोकतांत्रिक तथा परस्पर विशिष्ट है और इनमें मैदानी सभ्यता के अवशेष बिलकुल नहीं है जो इनके समानरूपी क्षेत्रों में काम आते हैं ।
2. अन्य प्रदेशों में मैदानी जनजातीय आबादी ने मैदानी लोगों क जनजीवन का पर्याप्त रूप से आत्मघात कर दिया है और बहुत से स्थानों में जनजातीय संगठन खंड़ित हो गये है ।
दो समितियों की रिपोर्ट को लेकर असम के पहाड़ी क्षेत्रों के लिए छठी अनुसूची
बनी और मैदानी जनजातियों के लिए संविधान में पाँचवीं अनुसूची को जोड़ा गया था जिसमें उस समय केवल उन राज्यों को शामिल किया गया है जिनको छठी अनुसूची में नहीं रखा जा सका है । राष्ट्रपति द्वारा एक विशेष अधिकारी की नियुक्ति किए जाने के लिए भी एक उपबंध किया गया था जिसका कार्य सभी मामलों की जाँच करना और राष्ट्रपति को रिपोर्ट प्रस्तुत करना था ।
पाँचवीं अनुसूची में मैदानी जनजातीयों के क्षेत्रों को रखा गया । पाँजवीं अनुसूची में अनुसूचित क्षेत्रों के रूप मे जाने जाने वाले क्षेत्रो की घोषणा राष्ट्रपति द्वारा की जा सकती है । राज्य की कार्यपालिका शक्ति अनुसूचित क्षेत्रों पर लागू होती है । लेकिन राज्यपाल को कुछ उत्तरदायित्व सौंपा गया है । इन क्षेत्रों के प्रशासन के बारे में उसे राष्ट्रपति को प्रत्येक वर्ष या जब अपेक्षित हो, रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होती है । संघ की कार्यपालिका की शक्ति इन क्षेत्रों में राज्यों के प्रशासन के बारे में निर्देश करने के लिए प्रयोक्तव्य है । इस अनुसूची में एक जनजातीय सलाहकार परिषद् की परिकल्पना की गई है जिसका कार्य राज्यपाल द्वारा उन्हें भेजे गये उन मामलों पर सलाह देना है जिसका संबंध अनुसूचित जनजातियों के कल्याण तथा उन्नति से हो। राज्यपाल को इनके बारे में कायदे-कानून बनाने की शक्ति प्राप्त है। अनुलाचित क्षेत्रो मे शांति और उनके अच्छे प्रशासन चलाना-भूमि के हस्तांतरण को निषिद्ध या प्रतिबंधित करना, जनजातियों को भूमि के आवंटन को विनियमित करना, साहूकारी के कारोबार को नियंत्रण करना । राज्यपाल को संसद के या विधान मंड़ल के किसी अधिनियम को प्रयोजनीयता के सीमित या आशोघित करने की शक्ति प्राप्त है राज्यपाल के विनियमनों को कानून को शक्ति प्रदान करने के लिए अनिवार्य रुप से प्राप्त होनी चाहिए ओर उसे ऐसा कोई कानून बनाने के पहले जनजाति सलाहकार परिषद् यदि कोई हो, से परामर्श कर लेना चाहिए। संविधान शंसोधन 1976 के द्वारा राष्ट्रपति को राज्पाल के परामर्श से किसी राज्य में किसी अनुसूचित क्षेत्र को बढ़ाने की शक्ति प्राप्त है।
इस प्रकार ब्रिटिश समय के बाद से आदिवासी क्षेत्रों में प्रशासन का विकास लम्बे समय से चल रहा है । ब्रिटिश सरकार करों, राजस्व तथा सेवाओं की वसुली के साथ संतुष्ट थी। जब कभी तथा जहाँ कहीं शांति को खतरा होता था, तो उन्होने सैनिक हस्तक्षेप किया और अपना प्रशासन स्थापित किया। उनकी नीति का सार सरल और सस्ता प्रशासन और सीमाशुल्क, वसूल करना था। रीति-रीवाज, रहन-सहन, आस्था के प्रबंधन में कम से कम हस्तक्षेप करना उनका उद्देश्य था। उन्होने गैर-आदिवासियों द्वारा जन-जातियों के शोषण को रोकने के लिए कुछ उपाय किए।
परन्तु जनजातिय क्षेत्रों के आर्थिक विकास में ब्रिटिश-सरकार का योगदान नगण्य था। लगभग दो सौ वर्षो तक अँग्रेजों ने पिछड़ा क्षेत्र, अनुसूचित क्षेत्र और आर्थिक रूप से वर्जित क्षेत्र आदि अवधारणाएँ जो उन्हीं की बनाई हुई थी और जिनका उद्देश्य भारतवर्ष में में सुचारू रूप से शासन करना था के साथ खिलवाड़ किया। 1935 के भारत सरकार अधिनियम 1935 द्वारा छोटानागपुर तथा संथाल परगना को “आंशिक रूप से बहिष्कृत क्षेत्र” घोषित किया गया। इन्हें संविधान की पाँचवी अनुसूची के तहत रखा गया। यहाँ अंग्रेज प्रशासन के द्वारा एक बहुत बड़ी भूल हो गई थी। यह भूल थी या किसी प्रकार के षड़यंत्र के तहत ऐसा किया गया था, यह स्पष्ट रूप से आज पता करना कठिन है। 1931 के जातीय सर्वे की रिपोर्ट में जिन तेरह जातियों को प्रमीटीव ट्राइव माना गया था, उन्ही जातियों को 1891 में प्रकाषित रिजले साहब की रिपोर्ट ने भी प्रमीटीव ट्राइव माना गया था। दो नोटिफिकेषन इस संबंध में किए गये थे, 1913 में एवं 1921 ईस्वी में जिनमे इन जातियों को प्रमीटीव ट्राइव माना गया था। झारखण्ड़ क्षेत्र में इसी कारण 1908 में छोटानागपुर टिनेन्सी एक्ट बनाया गया। बंगाल एक्ट नं0 6, 1908। झारखंड़ क्षेत्र में इन जातियों की जनसंख्या को जोड़ने पर यह क्षेत्र जनजातीय बाहूल क्षेत्र बन जाता था। फिर यह बात समझ में नहीं आ रही है कि वर्त्तमान छोटानागपुर डीविजन एवं संथाल परगना को संविधान की पाँचवी सूची तक क्यों पहुचना पड़ा। यह तो पूर्ण रूप से बहिष्कृत क्षेत्र के दायरे में ठीक आसाम, मेघालय आदि के तरह आता था।
ब्रिटिश प्रशासन ने जाहिर है ऐसा इसलिए किया कि “फुट डालों और राज करो” झारखंड़ की अटूट धन-सम्पदा के दोहन के लिए ऐसा करना जरूरी था।