Thursday, September 9, 2010

राज्य पुर्नगठन आयोग की रिपोर्ट एवं झारखंड आन्दोलन के प्रभाव –

आयोग ने यह भी विचार व्यक्त किया कि संविधान में प्रदत्त पाँचवीं सूची में किए गये मौजूदा प्रबन्ध उचित एवं संतोषप्रद हैं।
इसके अलावे आयोग ने यह विचार व्यक्त किए कि जैसा कि संविधान सभा की उपसमिति ने सिफारिश की है, जनजातीय लोगों को मंत्रीमंडल समेत प्रशासन की सभी शाखाओं में पर्याप्त रूप से भागीदारी होनी चाहिए और न केवल आर्थिक तथा शैक्षिक उन्नति पर ही बल्कि निवारात्मक राजनीतिक व मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर भी विचार किया जाना चाहिए।
इसके अलावे आयोग ने यह भी सुझाव दिए कि छोटानागपुर डीविजन के लिए विशेष विकास बोर्डो के प्रश्न पर भी विचार किया जाना चाहिए।
संक्षेप में कहे तो हम पाते हैं कि राज्य पुर्नगठन आयोग ने जनजातीय भावना के दृष्टीकोण से छोटानागपुर एवं संथाल परगना को स्वायत्तता प्रदान करने के प्रश्न पर विचार किया। उसने इस तथ्य को अनदेखा कर दिया कि छोटानागपुर एवं संथाल परगना क्षेत्रों की स्वायत्ता का समर्थन दो स्थानीय पार्टियाँ जनता पार्टी तथा लोक-सेवा संघ ने किया था जो कि मुख्यतयाः गैर-जनजातीय थी। झारखंड पार्टी तथा काँग्रेस के कुछ तत्वों समेत इन पार्टियों ने जिन्होंने थोड़ी सी स्वायत्तता का समर्थन किया था, इसके लिए क्षेत्र का बहुमत प्रकट किया। अलग राज्य की माँग से अलग हटकर संविधान की पाँचवी अनुसूची का प्रयोग करके विकास की बात करके स्वायत्तता प्रदान करने की बात कही है। इसके विरूद्ध स्वर्गीय राम नारायण सिंह सांसद अध्यक्ष छोटानागपुर संयुक्त संघ ने राज्य पुर्नगठन आयोग द्वारा किए गये तर्को का जोरदार खंड़न किया, जो आज इतने वर्षो बाद भी सही निकला। जब झारखंड मामलों से संबंधित समिति ने मई 1990 में अपनी रिपोर्ट दी तो राज्य पुर्नगठन आयोग की दी गई रिपोर्ट को गलत ठहराया।
झारखंड आन्दोलन ने कई उतार-चढ़ाव देखे है। झारखंड पार्टी ने उन्नीस सौ बावन – उन्नीस सौ सन्तावन में भारी सफलता हासिल किया। पर उन्नीस सौ बासठ के आम चुनाव में झारखंड के पक्ष में पड़े मतों में भारी गिरावट आई एवं यह संख्या घटकर आधी रह गई। बिहार विधान सभा में इसके नतीजे अच्छे नहीं हुए और सीटों की कुल संख्या घटकर बीस रह गई। इसका कारण निश्चित रूप से राज्य पुर्नगठन आयोग की प्रतिकुल रिपोर्ट है जिसने अलग राज्य की अनुशंसा नहीं की। इससे इस क्षेत्र के लोगों के दिलों पर यह बात घर कर गई कि झारखंड अलग राज्य का निर्माण नहीं हो सकता। इसीलिए मतदाताओं ने निराश होकर सोचा कि अब झारखंड नामधारी दलों को वोट देने से कोई लाभ नहीं होगा। निराश का संचार हुआ। स्वाभाविक था कि उनका झुकाव अखिल भारतीय पार्टियों की तरफ हुआ। क्षेत्रीय झारखंड नामधारी दल के नेताओं में गहरी निराशा बैठ गई। जब तक काँग्रेस नहीं चाहेगी, अलग राज्य नहीं बन सकता।
अतः श्री जयपाल सिंह ने काँग्रेस पार्टी के साथ समझौता कर लेना ही बेहतर समझा। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के समझाने पर श्री जयपाल सिंह उन्नीस सौ तिरसठ में काँग्रेस में शामिल हो गये। अधिकांश झारखंड पार्टी के नेता भी काँग्रेस में शामिल हो गये। झारखंड अलग राज्य की माँग को जबरजस्त झटका लगा।
श्री जयपाल सिंह को काँग्रेस ने बिहार में केबिनेट मंत्री, तत्कालीन मुख्यमंत्री विनोदानन्द झा के नेतृत्व में बना दिया। भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के ईशारे पर यह किया गया। श्री एस0 के0 बागे जो जयपाल सिंह के प्रमुख कप्तान थे, इगनियस कूजूर दूसरे नम्बर के प्रमुख नेता थे, पाँच विधायकों के साथ “झारखंड पार्टी” से अलग हो गये थे। परन्तु कुछ ही समय बाद कामराज प्लान के तहत तत्कालीन मुख्यमंत्री बिहार को स्तीफा देना पड़ा एवं उनके प्रतिद्वन्दी के0 बी0 सहाय मुख्यमंत्री बने। एस0 के0 बागे, के0 बी0 सहाय के साथ हो गये और केबिनेट मंत्री बन गये। जयपाल सिंह की कुर्सी छिन गई।
एक बार फिर जयपाल सिंह ने काँग्रेस छोड़कर झारखंड पार्टी को पुर्नजीवित करने का प्रयास किया। पर उन्नीस सौ सढ़सठ के चुनाव (1967) में इसे एक भी सीट नहीं मिली। संसद में भी कोई नहीं जा सका। जस्टिन रिचर्ड एवं एस0 हेम्ब्रम ने झारखंड पार्टी को एक और टुकड़ा किया। इन्होने “हूल झारखंड” पार्टी बनाया। इन्होने 1969 के मध्यावधि चुनाव में सात विधान सभा की सीटें जीती।
कुछ लोगों ने श्री जयपाल सिंह पर आरोप लगाया कि उनका काँग्रेस में शामिल होने का निर्णय निजी स्वार्थ से प्रेरित था तथा अपनी सुख सुविधाओं के लिए उन्होंने काँग्रेस का दामन थामा। पर एक बात गौर करने की बात है कि राज्य पुर्नगठन आयोग के विपरीत अनुशंसा करने से उनको भी धक्का लगा ही होगा। चाहे जो भी हो इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि जयपाल सिंह ने इस क्षेत्र के लोगों को जगाकर खासकर आदिवासी समुदाय को उनके हक एवं अधिकार के लिए तैयार किया था। लड़ा था। लोगों में चेतना जगाई थी। “माराँग गोमके” कहलाने का श्रेय प्राप्त किया था। परन्तु दुर्भाग्य यह रहा कि माराँग गोमके की कमजोरी का फायदा उठाकर काँग्रेस ने उन्हें तथा झारखंड आन्दोलन को ही काफी अरसे तक सुला दिया।
झारखंड आन्दोलन एक टूटे हुए शीशे की तरह बिखर गया। इसके कई नेता हो गये। श्री एन0 ई0 होरो, श्री बागुन सोमबुराई, सेत हेम्ब्रम, मोजेश गुड़िया (बिरसा सेवा दल) आदि। 1963-68 तक तीन दलों ने झारखंड आन्दोलन का नेतृत्व करने का दावा किया। 28 दिसम्बर 1967 को अखिल भारतीय झारखंड पार्टी गठित की गई। 1968 में पुनः पुरानी झारखंड पार्टी में भारी फूट पड़ गई। छोटानागपुर के आदिवासियों से अलग होकर संथाल परगना के संथालों ने अपने आप को अलग कर लिया। और एक अलग पार्टी हूल झारखंड बना लिया। इस चरण का एक और पहलू हुआ शिक्षित आदिवासियों के नेतृत्व वाले नपरीय प्रभाव वाले दलों का उभरना। ये विकसित हुए जो कि आदिवासी युवकों को प्रशासनिक एवं औद्योगिक संस्थानों में रोजगार प्रदान किए जाने की माँग करने के लिए, जो औद्योगिक परिसरों मे केन्द्रित थे। वास्तव में यह माँग एक आम माँग बन गई। बिरसा सेवादल श्री मोजेश गुड़िया के नेतृत्व में छठे दशक के अंतिम वर्षो (1967) में एक महत्वपुर्ण दल के रूप में उभरा। झारखंड पार्टी श्री एन0 ई0 होरो के नेतृत्व में चलने लगी।
कहने का तात्पर्य यह है कि झारखंड अलग राज्य की माँग एक सुविधावादी माँग में बदल गई। नेतागण या तो मंत्रीपद लेने में, विधायक या सांसद बनने में, रोजगार लेने में, ठीका लेने में, आदिवासियों के लिए सरकार में प्रतिनिधित्व लेने में या फिर आरक्षण लेने में व्यस्त हो गये। अलग राज्य का मुद्दा संविधान की पाँचवी तथा छठवीं अनुसूची के प्रावधानों के बीच दबकर रह गई। देखा यह गया कि जब जब किसी नेता या दल ने आन्दोलन पर बल दिया, उसे तेज किया तब तब झारखंड क्षेत्र में कोई बोर्ड या परिषद् या इसी प्रकार की कोई चीज गठित कर दी गई ताकि आन्दोलन के नेताओं को आत्मतुष्टि के साथ-साथ रोजी-रोटी या आराम की जिन्दगी मयस्सर हो सके।
कई नियम, अधिनियम परिषद् बनाए गये। 1951 में बिहार जनजातीय सलाहकार परिषद् बनाया गया था। छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 में ही बनाया गया था। संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम 1969 में बनाया गया। ये अधिनियम आदिवासियों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए बनाए गये थे। छोटानागपुर संथाल परगना के लिए, इसके विकास के मद्देनजर छोटानागपुर-संथाल परगना स्वायत्त विकास प्राधिकरण 1971 बनाया गया। इसके बाद 1974 में जनजातीय उपयोजना बनाई गई। 1978 में झारखंड विकास परिषद् बनाया गया। इसे 1991 में विधान सभा से पारित कराया गया।

राज्य पुर्नगठन आयोग की रिपोर्ट एवं झारखंड आन्दोलन के प्रभाव –

जस्टीस फजल अली द्वारा प्रस्तुत की गई राज्य पुर्नगठन आयोग, “स्टेट रिऑरगेनाइजेशन कमीशन” ने झारखंड पृथक राज्य के गठन की अनुशंसा नहीं की। इस आयोग ने इस माँग को अस्वीकृत करने के प्रमुख कारण दर्शाये। इसमें कहा गया कि झारखंड पार्टी को उन्नीस सौ बावन के आम-चुनाव में छोटानागपुर एवं संथाल परगना में वोटो या सिटों का स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं हुआ था। इस क्षेत्र के भीतर एवं बाहर दूसरे राजनैतिक दलों ने अलग झारखंड राज्य के गठन का विरोध किया था। फिर कहा गया कि जनजातियों की कुल जनसंख्या इस क्षेत्र में या प्रस्तावित अलग राज्य में कुल जनसंख्या में मात्र एक तिहाई से कुछ ज्यादे है। इसके अलावे जनजातियाँ कई वर्गो में बँटी थी एवं अलग-अलग भाषाएँ थी। इस प्रकार कई उपजातियों में बँटी रहने एवं अलग अलग भाषाई आधार होने तथा झारखंड अलग राज्य का विचार अल्पमत में होने तथा बहुमत के इस विचार से सहमत नहीं होने के कारण पृथक झारखंड राज्य का बनाया जाना उचित प्रतीत नहीं हुआ। आयोग ने इन्हीं कारणों के चलते अनुशंसा नहीं की।
आयोग का कहना था कि यह आन्दोलन सिर्फ जनजातियों यानि आदिवासियो का आन्दोलन है। दूसरा कारण जो यह दर्शाया गया था कि इस क्षेत्र में एक सम्पर्क भाषा का अभाव है। तीसरा कारण यह बताया गया कि अगर झारखंड अलग राज्य के लिए झारखंड को बिहार या सम्बन्धित राज्यों से अलग कर दिया जाय तो शेष बिहार या सम्बन्धित राज्यों का माली हालत का संतुलन बिगड़ जाएगा। एक दृष्टिकोण से तीसरा कारण ही अधिक महत्वपुर्ण बनाया गया था, क्योंकि बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा एवं मध्यप्रदेश के सीमावर्ती एवं समीपवर्ती दलित क्षेत्रों को मिलाकर एवं इन राज्यों से पृथक करके नये राज्य के गठन से इन राज्यों के राजस्व और रोजगार के अवसरों पर अवश्य प्रभाव पड़ेगा।
जैसा कि हमने पहले ही देख लिया है कि भारत के संविधान में कहीं इस बात का जिक्र नहीं है कि नये राज्यों का गठन किन आधारों पर किया जाय। सिर्फ इतना ही कहा गया है, भारतीय संविधान में कि जैसा कि संसद उचित समझे, नये राज्य बनाया जा सकते है।
देश की आजादी के पहले से ही इस विषय पर विवेचना की जाती रही थी कि नये राज्यों के गठन का आधार क्या हो ? सिर्फ अंग्रेजी की तरह प्रशासनिक दृष्टीकोण से नये राज्य बनाए जायें या भाषा, संस्कृति क्षेत्र या अन्य आधार पर नये राज्यों का गठन किया जाय।
इस संबंध में क्रमिक विकास हुए एवं पहले “भाषाई आधार” पर कई राज्यों का गठन किया गया। फिर आजादी के बाद अंततः राज्य पुर्नगठन आयोग का गठन किया गया। ताकि ठोस आधार पर पहुँचा जा सके। एक तरफ तो इस आयोग ने “भाषाई समानता” यानि “लींगवीस्टीक होमोजीनीयलीटी” को एक हितपुर्न आधार माना है, जिसके विरूद्ध गहरा असंतोष पनपा था, तो दूसरी ओर आयोग जातीय भावनाओं को संतुष्ट करने में अक्षम रहा। फिर आयोग ने यह नहीं कहा कि सिर्फ आदिवासी बहुल क्षेत्र का दर्जा दिया जा सकता है कि नहीं। स्पट था छोटे राज्यों के गठन की वकालत प्रशासनिक दृष्टीकोण से ही नहीं किया जाना चाहिए।
एक और महत्वपुर्ण आपत्ति जो इस माँग के विरूद्ध उठाई जाती रही थी वह यह था कि झारखण्ड क्षेत्र में बहुत भिन्नता व्याप्त थी और उसे एक सामान्य झारखण्डी सामाजिक में या राष्ट्रीयता में बाँधने की आशा नहीं की जा सकती। दूसरे शब्दों में वहाँ पर संथाल, हो, मुंडा, उराँव, खड़िया, पहाड़िया, गौंड, कोरव, भूमिज आदि अनुसूचित जनजातियाँ हैं तथा खतौरी, कुड़मी, कोयरी, तेली, कुम्हार, राजवार आदि अनेक गैर-अनुसूचित जनजातियाँ भी हैं एवं अनेक मूलवासी समुदाय तथा सदान जनसंख्या एवं उत्तर प्रदेश, उड़ीसा आदि के बाहरी लोग हैं।
यहाँ पर इस बात पर विचार करना आवश्यक था कि झारखंड क्षेत्र को केन्द्र सरकार ने बिहार, बंगाल, उड़ीसा, मध्य प्रदेश राज्य की सीमाओं के अन्दर बाँट दिया था। एक ही संस्कृति के लोगों को चार राज्यों में विभाजित कर दिया गया था। पर इतने से ही सरकार रूक नहीं गई। राज्य सरकारों एवं केन्द्र सरकार ने इस क्षेत्र की तामाम अनुसूचित मे विभेद पैदा कर दिया। कुछ को अनुसूचित जाति बना डाला, तो कुछ को अनुसूचित जनजाति की सूची से हटा दिया। उन्हें गैर-आदिवासी घोषित कर दिया और आदिवासियों को अल्प संख्यक बना डाला। आयोग ने बड़ी आसानी से कह दिया कि यह सिर्फ आदिवासियों का आन्दोलन है और इसे बहुमत प्राप्त नहीं। आयोग ने इस बात को भी नजर अंदाज कर दिया कि झारखण्ड पार्टी के विधायकों में से दश विधायक गैर-आदिवासी थे।
फिर यह दिखला दिया गया कि एक सम्पर्क भाषा का अभाव झारखण्ड में था और यह एक महत्वपुर्ण पहलू नये राज्य बनाने के लिए था कि भाषाई समानता हो। आयोग ने इस बात को नजर अंदाज कर दिया कि भारतवर्ष में पूर्व में बने किसी भी राज्य में एक ही सम्पर्क भाषा नहीं था और न आज है। बिहार को ही हम उदापरण को तौर पर लें तो उस समय और अभी भी वहाँ मगही, भोजपूरी, मैथली, मेसी, अंजिका आदि बोलियाँ है। फिर दक्षिण बिहार झारखण्ड क्षेत्र जब बिहार में शामिल था, तो खारखण्ड के भाषाओं संस्कृति की विभिन्नता तो बिहार में भी मौजूद थी। तो फिर बिल्कुल ही भिन्नता वाले उस पर बिहार एवं दक्षिणी बिहार को एक सीमा के अन्दर रखने का क्या औचित्य था। फिर इसका उदाहरण नागालैंड भी है, जिसमें पाँच प्रमुख तथा अनेक छोटी अनुसूचित जनजातियाँ हैं और यहाँ पर तेईस भिन्न-भिन्न भाषाएँ बोली जाती हैं।
अतः भाषाई भिन्नता कोई अर्थ नहीं रखती थी। जब हिन्दी पूरे देश की राजभाषा हो सकती है, तो झारखण्ड की भी हो सकती थी। फिर जब संयुक्त बिहार में हिन्दी से काम-काज चलता ही था जिस बिहार में झारखण्ड समाहित था, तो फिर नये राज्य प्रस्तावित झारखण्ड के लिए क्या कठिनाई थी और एक अलग सम्पर्क भाषा की आवश्यकता क्यों महसूस की जाने लगी ? क्या झारखण्डी सभ्यता-संस्कृति एक अलग प्रकार की संस्कृति नहीं थी ? क्या झारखण्डी राष्ट्रीयता का आधार भाषाई समानता के आधार का व्यापक रूप नहीं था ?
जहाँ तक आर्थिक असंतुलन की बात है, तो आयोग ने इस बात को नजर अंदाज कर दिया कि पंजाब एवं हरियाणा में कोई खदान नहीं। देश के अनेकों प्रदेशों में खनिज पदार्थ नहीं, जंगल नहीं तो क्या वे राज्य पीछे चले गये है। पंजाब एवं हरियाणा कृषि के बल पर देश का एक नम्बर राज्य बन सकते है तो शेष बिहार क्यों नहीं। उत्तर बिहार की जमीन की उस्पादकता पंजाब एवं हरियाणा की जमीनों से ज्यादा है। यही सरकारी रिपोर्ट है। वही बात उड़ीसा, पश्चिम बंगाल पर भी लागू होती थी।
दी स्टेट रिऑरगेनाइजेशन कमीशन (राज्य पुर्नगठन आयोग) के द्वारा कुछ विचार व्यक्त किए गये थे एवं कुछ सुझाव सरकार को दिए गये थे तथा कुछ सिफारिशें की गई थी। ये इस प्रकार थी-
दक्षिण बिहार को अगल करने से मौजूदा राज्य की सम्पूर्ण आर्थिक नीति पर प्रभाव पड़ेगा। कृषि, उद्योग और शिक्षा का संतुलन डगमगा जायेगा और उत्तरी एवं दक्षिणी बिहार के इलाके गरीब हो जायेगें। तथा विकास के अवसर एवं संसाधन कम हो जायेगें। इसीलिए दक्षिणी बिहार में सिंचाई के लिए विस्तृत योजना कार्यान्वित की जाय एवं विजाराधीन व्यापक विकास योजनाओं को प्रभावी बनाया जाय।
अनुसूचित क्षेत्रों में सामान्य प्रशासन जल्दी लाये जाने की सिफारिश की गई ताकि आदिवासियों और अन्य जातियों के बीच का भेदभाव जिस कारण या जहाँ कि वे जनजातीय क्षेत्रों को आर्थिक एवं राजनैतिक उन्नति में बाधा पहुँचाते हैं, धीरे-धीरे समाप्त किया जा सके।

Thursday, September 2, 2010

आदिवासी महासभा एवं झारखंड पार्टी –

द्वितीय विश्व-युद्ध की समाप्ति के बाद उन्नीस सौ छयालीस में भारत की “कन्सटीचूऐन्ट एसेम्बली” यानि “सांविधानिक सभा” के सदस्यों का चुनाव होने वाला था। खूँटी से श्री जयपाल सिंह आदिवासी महासभा के उम्मीद्वार बने एवं उनके विरोधी थे काँग्रेस के पूर्णचन्द मित्र। श्री जयपाल सिंह को हराने के लिए काँग्रेस ने पूरी शक्ति लगा दी। नैतिकता को ताख पर रखकर बाहर से गाड़ियों में भर-भर कर स्वंय-सेवकों के नाम से गुंडे बुलाये गये, जो नीरीह जनता पर आतंक फैलाने लगे। उन्नीस सौ छयालीस मार्च दो को श्री लियेन्डर तिड़, जो कभी आजाद हिन्द फौज में थे, गुन्डे स्वंय-सेवकों के साथ मिलकर ट्रको मे बैठकर काँग्रेस का प्रचार करने लगे। तापकरा बाजार में जब कुछ आदिवासियों ने उनका विरोध किया, क्योंकि गुंडे बाहरी थे, तो उन गुंडों ने ट्रक के उपर से गोलियों की बौछार शुरू कर दी। फिर लाठियाँ चलाई। तब वहाँ उपस्थित आदिवासियों ने नारा दिया कि काँग्रेस के दलाल वापस जाओ। भीड़ बढ़ने लगी, नारे सुनकर, तब वे वहाँ से वापस लौट गये। फिर वे खूँटी पहुँचे तथा उल्टा आदिवासियों पर हिंसा करने का आरोप लगाए गये। सूर्यास्त होने तक राँची एवं अन्य कई जगहों से गुंडे ईकट्ठा किए गये एवं बन्दूक, लाठी से लैस तापकरा बाजार में भेज दिए गये। रात्रि के करीब आठ बजे बेबस, निर्दोश, बेखबर, रास्ते से घर लौटते आदिवासियों से बन्दुक की नोक पर वोट माँगे गये तथा अंधाधुँध गोलियाँ चलाई गई। लाठियों से मार-मार कर लोगों को अधमरा कर दिया। महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया। आदिवासियों की लाशें दूसरे दिन मिली। करीब बाइस व्यक्ति घायल पाये गये। इन सब मृतकों को खूँटी लाकर एक ही गढ़े में दफन कर दिया गया। बाद में पता चला कि आततायी गुंडें सभी उत्तर बिहार के थे। मामले-मुकदमें भी दर्ज किए गये, पर सभी आततायी सबूत के अभाव में छूट गये।
इससे स्पष्ट है कि पूज्य महात्मा गाँधी की अहिंसा के नारे लगाने वाले एवं हरिजन आदिवासी के उत्थान की बात करने वाले काँग्रेस ने आदिवासियों की सामूहिक हत्याएँ करके जयपाल सिंह को पराजित किया। आदिवासी महासभा को खत्म करने के लिए ढ़ेर सारे प्रयास किए जाने लगे।
आदिवासी-क्षेत्र में दमन-चक्र चलाने का जो सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण मिलता है, वह है खरसवाँ का गोली कांड़। खरसवाँ को देशी राज्य उड़ीसा में मिलाया जाएगा, यह घोषणा की गई थी। “आदिवासी महासभा” ने घाटसिला, नरसिंहगढ़, चाईबासा, जमशेदपुर आदि अनेकों स्थानों पर आम सभा बुलाई और प्रस्ताव पास कर सरकार को सूचित किया कि खरसवाँ की जनता बिहार में ही रहना चाहती है। उड़ीसा में नहीं।
एक जनवरी उन्नीस सौ अड़तालीस को खरसावाँ बाजार में एक आम सभा बुलाई गई थी। चालीस पचास हजार की तादाद में लोग इकट्ठा हुए थे। उस समय इतनी भीड़ का पाँव-पैदल इकट्ठा होना बहुत बड़ी बात थी। “अंखड़-झारखंड” के नारों से सभा-स्थल गूँज उठा था। जमशेदपुर, राँची, संथाल परगना, मयूरभंज, रायरंगपुर आदि स्थानों से करीब पैंतीस हजार से अधिक लोग आए थे। शांतिपूर्ण तरीके से ये लोग राजा के महल तक आए और राजा से मिले। दिन दो बजे से चार बजे तक सभा हुई। सभा भंग होने के बाद नेतागणों ने जनता को अपने अपने घर वापस जाने को कहा। और स्वंय वापस चले गये।
लौटती निहत्थी भीड़ पर अचानक गोलियाँ चलाई जाने लगी। आधे घंटे तक अंधाधुँध गोलियाँ चलाई गई थी। एक हजार के करीब स्त्री, पुरूष, मासूम बच्चे मौत की घाट उतार दिए गये। स्वतंत्र भारत के पहली जनवरी, पहले ही वर्ष भारत के इतिहास में एक जघन्य अपराध किया गया।
यह घटना जलियाँवाला बाग की घटना से भी विभत्स कहा जाएगा। वहाँ तो देश में ब्रिटिश सरकार के राज्य में गोलियाँ देश-भक्तों पर चलाई गई थी जो आजादी की माँग कर रहें थे। यहाँ तो देश की आजादी के बाद इस तरह का विभत्स कांड़ किया गया, तो सिर्फ इसीलिए कि वे खरसवाँ को बिहार में ही रहने देना चाहते थे। ऐसा क्यों किया गया ? सिर्फ शोषित दलित एक जगह इकट्ठा होकर अपनी माँग रखने की कोशीश कर रहे थे। क्या आदिवासियों को इतना भी अधिकार आजाद भारत में नहीं था।
गोली चालन के बाद अधमरे लोगों को बूटों से रौंदकर मार डाला गया था। ताकि बोलने वाला कोई न बचे। उड़ीसा के अधिकारियों ने पूरे बाजार को घेर रखा था कोई समाचार बाहर जाने नहीं दिया जा रहा था। बिहार सरकार ने एक मेडिकल मिशन एवं “मिशन ऑफ मर्सी” भेजा था, किन्तु वे भी सेवा कार्य से रोक दिए गये थे। घायलों को एक-एक बूँद पानी के लिए भी तरसाया गया था।
श्रीमान् जयपाल सिंह ने कहा था कि आदिवासी, गैर-आदिवासी सभी से इस विषय पर बातचीत हुई थी ओर उससे निष्कर्ष निकलता था कि यह घटना पूर्व-नियोजित थी। खरसवाँ के आदिवासियों ने त्याग एवं बलिदान का अपूर्व आदर्श रखा। आजादी के चार महिने बाद की यह घटना बेमिसाल है। झारखंड के विभिन्न हिस्सों में खरसवाँ के शहीदों को याद करते हुए आदिवासी महासभा की ओर से “झारखंड रैली” निकाली गई। इसमे विशेष ग्यारह जनवरी, उन्नीस सौ अड़तालीस को चाईबासा में, अठारह जनवरी को जमशेदपुर में हुई। इनमें लाखों की तादाद में लोग इकट्ठा हुए।
आदिवासी महासभा एवं झारखंड पार्टी के संगठन के दिनों में इस घटना के बाद भी कई घटनाएँ हुई। इनमें एक महत्वपूर्ण कांड मिहिजाम गोली कांड है। मिहिजाम लोको बिल्डिंग वर्क्स बन रहा था। इस योजना को बनाने के लिए पन्द्रह-सोलह आदिवासी गाँवों को हटाना था। जनता बार-बार पुर्नवास एवं मुआवजा की माँग कर रही थी। पर कोई सुनने वाला नहीं था। एक फोगड़ा माँझी (मरांडी) नामक व्यक्ति ने आदिवासी महासभा को सूचना दी थी कि दिनांक एक जनवरी उन्नीस सौ उनपचास(01-01-1949) को करीब तीन सौ सिपाही पश्चिम बंगाल से लाए गये थे। दो लारी मिलिटरी भी लाई गई थी। घुड़ सवार भी थे। जबरजस्ती मिट्टी कटाई का काम शुरू कर दिया गया था और बस्तियों को उजाड़ने का भी इन्तजाम कर लिया गया था। संथाल-लोग फरियाद करने पहुँचे तो उनपर गोलियाँ चला दी गई। इसमें भी पाँच संथाल आदिवासी मारे गये। दो जनवरी को अगले ही दिन पुलिस ने चार गाँवों को घेर लिया सुबह-सुबह। पच्चीस-तीस लोगों को घेर कर जानदरों की तरह पकड़ लिया गया। एवं गिरफ्तार कर लिया गया। गाँव वालो के घरों में घुसकर सामानों को तोड़फोड़ कर दिया गया। उनके परम्परागत हथियारों, तीर-धनुष, लाठी आदि जब्त कर लिए गये। सैकड़ों लोगो पर मुकदमें दायर कर लिए गये।
आदिवासी महासभा को झारखंड पार्टी का रूप उन्नीस सौ अड़तालीस में दे दिया गया। झारखंड पार्टी के गठन के बाद श्री जयपाल सिंह ने अनुसूचित जनजातियों के अलावे अन्य लोगों को भी इसमें शामिल किया। आदिवासी महासभा का विस्तार किया गया। तथा इसमें जो सिर्फ आदिवासियों को ही सदस्य बनाया जाता था, उस प्रतिबंध को हटाकर इसे व्यापक रूप दिया जाने लगा।
इसका प्रभाव बहुत ही अच्छा रहा। उन्नीस सौ बावन के पहले आम-चुनाव में झारखंड पार्टी ने बिहार के अन्दर ही तैंतीस सीटों को विधान सभा में जीता। यह पार्टी बिहार विधान सभा मे प्रमुख विपक्षी पार्टी के रूप में बैठी। उन्नीस सौ बावन एवं उन्नीस सौ सन्तावन तक के वर्षो में झारखंड आन्दोलन बड़े जोरों पर रहा। दूसरी आम-चुनाव में यह पार्टी उड़ीसा तक पहुँची और वहाँ भी इसके पाँच विधायक बने। यह पार्टी उन दिनों उड़ीसा में भी एक प्रमुख पार्टी के रूप में उभरी। इसका कारण झारखंड पार्टी के अपनी नीतियों में सुधार एवं इसका गैर-आदिवासियों का शामिल करना था। यही कारण था कि बिहार के तैंतिस विधायकों में दश विधायक गैर-जनजाति के हुए।
पर बड़े दुःख की बात है कि बावजूद इस व्यापक आन्दोलन एवं सफलता के हजारों के शहीद होने के बावजूद राज्य पुर्नगठन आयोग (1954-1956) ने झारखंड अलग राज्य के गठन के लिए सिफराश नहीं की। इसे अलग राज्य का दर्जा नहीं मिले, इसके लिए कई गलत आघार बता दिए गये। गलत कारण रिपोर्ट में प्रस्तुत किए गये जो तथ्यों से परे थे। बौद्यिक बेईमानी की गई। इस आन्दोलन का गलत चेहरा सामनें लाया गया।
यह एक बड़ी विचित्र बात थी कि श्री जयपाल सिंह ने जिन्होनें झारखंड अलग राज्य के लिए इतने बड़े आन्दोलन को खड़ा किया था राज्य पुर्नगठन आयोग के समक्ष कोई प्रतिवेदन पेश नहीं किया। उन्होनें राज्य पुर्नगठन आयोग के समझ उपत्थित होना भी उचित नहीं समझा। यहाँ तक कि जब राज्य पुर्नगठन आयोग राँची, पहुँचा तो, वहाँ आलग राज्य की माँग को पेश करना तो दूर, श्री जयपाल सिंह राँची से ही दूर चले गये थे।
अब इसका क्या कारण था, यह कहना तो कठिन है, पर इतना तो स्पष्ट है कि सभंवत वे अलग राज्य के गठन में कोई दिलचस्पी नहीं रखते थे। फिर यह बात भी समझ में नहीं आती कि तब उन्होने इस आन्दोलन को आगे बढ़ाया ही क्यों था ? और ऐन वक्त में पीछे क्यों हट गये थे ?

आदिवासी महासभा एवं झारखंड पार्टी –

सर्वश्री जयपाल सिंह मुंड़ा के नेतृत्व में झारखंड पार्टी का जन्म हुआ। आदिवासी महासभा को भंग कर दिया गया। और उन्नीस सौ अड़तालीस में झारखंड़ पार्टी बनी। बीसवीं सदी के चालीसवें दशक में आदिवासी महासभा ने काँग्रेस पार्टी के साथ बहुत नजदीकी सम्बन्ध बनाए रखने का प्रयास किया। आदिवासी महासभा ने बिहार प्रदेश काँग्रेस कमिटी में एवं इसके कार्यकारिणी समिति में अपने प्रतिनिधि की बात की थी। काँग्रेस ने इस माँग को स्वीकार नहीं किया। मार्च उन्नीस सौ छयालीस में तत्कालीन काँग्रेस अध्यक्ष डा0 राजेन्द्र प्रसाद के सम्मुख एक स्मृति पत्र प्रस्तुत किया गया जिसमें काँग्रेस पार्टी के इन अंगो में आदिवासी समुदाय को उचित प्रतिनिधि देने की माँग की गई। सन् उन्नीस सौ छयालीस मे ही श्री जयपाल सिंह ने प्रान्तीय परिषद् के लिए एक सीट पर चुनाव लड़ा था, पर वे काँग्रेस के एक उम्मीद्वार के द्वारा पराजित हो गये थे। उनकी पराजय के कारणों में एक यह भी कहा जाता है कि आदिवासी महासभा की नीतियाँ प्रतिक्रिया वादी थी और इस कारण से अनेक आदिवासियों ने काँग्रेस का समर्थन कर दिया था।
आदिवासी महासभा के अलग राज्य की माँग के विरूद्ध, इस दौरान हमले शुरू हो गये थे। इस महासभा को बदनाम करने की साजिश शुरू हो गई थी। प्रेस ने इस महासभा को मूलतः ईशाई आदिम जातियों के एक संस्था के रूप चित्रित किया। यह भी प्रचारित किया जाता कि कुछ गैर-ईशाई जो इस संगठन या संस्था में हैं, उन्हे या तो जोर जबरजस्ती इस संस्था में रखा गया है या कुछ व्यक्तिगत स्वार्थ के कारण इस संस्था के साथ हैं। तत्कालीन प्रमुख पत्र “हिन्दुस्तान स्टैंडर्ड” तथा “सर्च लाइट” ने मार्च 19, उन्नीस सौ तैंतालीस एवं मार्च तेईस उन्नीस छयालीस को इसी आशय का समाचार छापा कि खुँटी क्षेत्र में एक ईशाई आतंक फैला रहा है। तथा यह भी छापा कि लूथरन एवं सेंट पाल मिशन गुंडागर्दी में प्रमुख हिस्सा ले रहें है। यह इसलिए कहा जा रहा था कि श्री जयपाल सिंह मुंड़ा जाति के थे ओर इनकी शिक्षा-दीक्षा ईशाई मिशनरी के द्वारा देश-विदेश में हुई थी। ज्ञातव्य हो कि ये अपने देश के हॉकि के श्रेष्ठतम् खिलाड़ियों में से एक थे और ओलम्पिक खेल में भारत की टीम की कप्तानी भी कर चुके थे। उन दिनों की बात है जब भारतीय हॉकि टीम अपने चरम उत्कर्ष में था।
इस प्रकार झारखंड आन्दोलन के शुरूआती दौर में ही इसे बदनाम करने की कोशिस की गई एवं इसे ईशाई मिशनरियों द्वारा संचालित आदिम जातियों का आन्दोलन कहा गया। इस प्रकार शासक वर्ग ने इस आन्दोलन के विरूद्ध सियासी चालें चलनी शुरू की।
उन्नीस सौ छयालीस की अपनी पराजय के बाद जयपाल सिंह खिन्न हो उठे थे और उन्होने यह घोषणा कर दी थी कि झारखंड के गैर आदिवासियों ने आदिवासियों का आर्थिक शोषण किया है एवं राजनैतिक शोषण किया है। उन्होने कहा कि आदिवासियों के पुनरूत्थान की कल्पना या आशा तब तक नहीं की जा सकती जब तक अतिक्रमण करने वाले गैर-आदिवासी झारखंड छोड़ नहीं देते। इस घोषणा से एक लाभ तो हुआ कि आदिवासी युवक आगे आये, पर नुकसान यह हुआ कि कई जगहों पर गैर-आदिवासियों के पर हमले हुए। आदिवसियों के विरूद्ध भी संघर्ष हुए। इससे पूरे झारखंड का वातावरण संकीर्ण हो गया। तथा आदिवासी नस्लवाद पैदा हुआ। यह आन्दोलन आदिवासी महासभा का यह आन्दोलन जातिवाद से प्रभावित हो गया।
यह सच है कि भारत की आजादी के पहले झारखंड अलग राज्य के आन्दोलन में ईशाई का तथा मुंड़ा एवं उराँव जाति का वर्चस्व था। इस आन्दोलन को ईशाई-मिशनरियों द्वारा संचालित आन्दोलन भी कहा गया था जिसका उद्देश्य मिशनरियों ने अपना हित एवं अपने-प्रचार के लिए और अपना पाँव जमाने के लिए किया था। शुरू से ही काँग्रेस पार्टी ने इस आन्दोलन का विरोध किया था। खासकर इसका विरोध उत्तर-बिहार के लोग कर रहें थे जिसका प्रभुत्व काँग्रेस पार्टी में था। आदिवासी भी जो ईशाई नहीं थें, सामान्यतया इस आन्दोलन से जुड़ नहीं पाये थे, पूरी तरह से, और उनकी धारणा झारखंड पृथक राज्य के सम्बन्ध में स्पष्ट नहीं थी। काँग्रेस के लोगों का ख्याल था कि अगर यह आन्दोलन जोर पकड़ेगा तो इस क्षेत्र में उनकी पकड़ कम हो जोयेगी एवं उनके लिए मुसीबत खड़ी हो जाएगी। यह धारणा काँग्रेस पार्टी के लोगों में अंत तक बनी रही।
झारखंड आन्दोलन में सियासी चालों की कमी नहीं रही। इस आन्दोलन को पहले तो गोली बन्दुक से तथा सरकारी हिंसा के द्वारा दबाए जाने का प्रयास किया गया। अनेकों सभाओं मे गोलियाँ दागी गई। नेताओं की हत्या की गई। उन्हें जेल में यातनाएँ दी गई। अगर हम थोड़ी नजर कुछ प्रमुख घटनाओं पर डालें तो इस आन्दोलन को कुचलने के लिए किए गये जुल्मों सितम को समझ सकते हैं।
उन्नीस सौ उनतीस के पूर्व गंगपुर राज्य (उड़ीसा) में गाँव-गाँव में “आदिवासी महासभा” का प्रचार हो चुका था। आम सभाओं में हजारों हजार की तादाद में जनता इकठ्ठा हो रही थी। इस एकता ने काँग्रेस पार्टी को चौंका दिया था और वह इसे दबाने का प्रयास करने लगी। उड़ीसा में उस समय श्री हरे कृष्ण महताब मुख्य मंत्री थे। गंगपुर राज्य में सुखे के कारण फसल मारी गई थी, फिर भी बड़ी बेरहमी के साथ लगान वसूल की जा रही थी। आदिवासी महासभा ने उन्नीस सौ उन्नतीस, पच्चीस अप्रेल को पाँच बजे गंगपुर के सिमको के मैदान में एक आम सभा रखी थी एवं प्रस्ताव लिया जाने वाला था कि गंगपुर राज्य को अकाल पीड़ित घोषित किया जाय, तथा कर-वसूली पर रोक लगाई जाय। सरकार से मदद माँगने की भी योजना थी। सभापति श्री निर्मल मुंड़ा थे, जिन्हें सरकार ने सभा-स्थल पर ही गिरफ्तार करने की योजना बनाई थी, पर वे लापाता हो गये। उनको नहीं पाकर उड़ीसा सरकार ने निहत्थों पर गोलियाँ चलवा दी। सैकड़ों स्त्री-पुरूष, बच्चे मारे गये। सैकड़ो घायल हुए। लाशों को गाड़ियों में लाद कर जंगलों में फेंक दिया गया। स्पष्टतः इस गोली कांड के द्वारा आदिवासियों के संगठन को छिन्न-भिन्न करने का ही उद्देश्य था। इसे कठोर एवं निर्मम ढंग से दमन किया गया ताकि भविष्य में उनकी आवाज सदा के लिए बन्द हो जाय। इसमें कहा जाता है कि मुख्य मंत्री हरे कृष्ण का हाथ था।

Friday, August 27, 2010

अध्याय पाँच

देश में अलग राज्य बनाने के आधार
अलग-अलग प्रदेश बनाने के आधारों की खोज काफी पहले से शुरू हो चुकि थी। भारतवर्ष की आजादी के पहले से ही उन कारणों या आधारों की खोज की जाने लगी थी जिनके सहारे किसी नये राज्य का गठन जनता एवं देश के हित के लिए किया जा सके।
अंग्रेजों ने राज्यों की सीमाओं को बदला एवं नये राज्यों का गठन किया था, सिर्फ अपनी राज्य सत्ता को आसानी से चलाने के लिए। उनके सामने संस्कृति, भाषा या और कोई आधार नहीं था। “फुट डालो एवं राज्य करो” की नीति के तहत यहाँ के निवासियों को विभाजित करने के लिए भी उन्होने राज्यो की सीमाओं का निर्माण उसी प्रकार किया था। सीमाओं का निर्धारण इस प्रकार किया था, कि एक सीमा के अन्दर रहने वाले लोग आसानी से एक न हो सके और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बगावत न कर सकें। यही कारण है कि हिन्दुस्तान में उत्तर की तरफ जो भूमि थी, उसे उत्तर प्रदेश का नाम दे दिया। ठीक उसी प्रकार मध्य भारत की भूमि का नाम मध्य प्रदेश दे दिया गया। इनके इतिहास, भूगोल, सभ्यता-संस्कृति का ख्याल रखते हुए, नामकरण नहीं किया गया। बंगाल के अंदर पहले बिहार, उड़ीसा, आसाम तक समाहित था। “दी इंडियन कान्सटीचूसनल रिर्फामस 1918” तथा “दी इंडियन स्टेचुटेरी कमीशन 1930” से स्पष्ट हो जाता है कि जो स्वरूप अंग्रेजों ने बनाया था, जो नक्सा ब्रिटिश हुकूमत ने बनाया था, वह सिर्फ उनके सैनिक दृष्टिकोण को मद्देनजर रखते हुए बनाया था। सिंधू एवं बाम्बे प्रोविंस भी इसी उद्देश्य से बनाये गये थे। बंगाल, बिहार, उड़ीसा, का गठन भी इसी उद्देश्य से, उसी प्रशासनिक दृष्टिकोण से किया गया था, ताकि भारतवर्ष की एक समान सभ्यता-संस्कृति के लोगों को अलग-अलग राज्यों में विभक्त करके रखा जा सके। उनकी भाषा-संस्कृति को गड़मड़ करके रखा जा सके। और तभी तो उनकी भाषा एवं उनका प्रशासन चल सकता था।
बींसवी सदी के दूसरे दशक में, 1920 में नागपुर के अधिवेशन में, तथा काँग्रेस ने 1929 में “दी स्टेचुटरी कमीशन” यानि साइमन कमीशन के समक्ष उत्कल आंध्र, सिंध एवं कर्नाटक के गठन की माँग भाषा-भाषाई आधार पर रखा था। फिर उन्नीस सौं अठाइस में “दी नेहरू कमिटी” “ऑफ ऑल पार्टी कान्फ्रेस” ने भी राज्यों के पुर्नगठन के लिए भषाई आधार की वकालत की। यहाँ तक की काँग्रेस ने अपने उन्नीस सौ पेंतालीस-छयालीस के इलेक्सन मेनिफेस्टो में इसी बात को दोहराया कि प्रशासनिक ईकाइयों का निर्माण भाषा एवं संस्कृति को देखते हुए किया जाय।
आजादी के बाद काँग्रेस ने इस दिशा में थोड़ा सा परिवर्त्तन किया। उन्नीस सौ सेंतालीस में “दी लिगविस्टीक प्रोविन्सेस कमिटी” यानि “धर-कमिटी” ने भाषाई सिद्धान्त को मान्यता देने लायक नहीं समक्षा। “जवाहरलाल विठ्ठल भाई कमिटी” जो उन्नीस सौ अड़तालीस की इंडियन नेशनल काँग्रेस की कमिटी थी, ने इस सिद्धान्त के विरूद्ध चेतावनी दी। हाँलाकि काँग्रेस के भाषाई आधार ने उन्नीस सौ तिरपन में आन्ध्रप्रदेश को जन्म दिया, जब काँग्रेस के पोट्टी श्री रामलू ने आमरण अनशन इसी संदर्भ में किया। उन्नीस सौ चौवन में भाषाई संकोर्णता एवं धार्मिक आधार से उत्पन्न संकट से उबरने के लिए न्यायमूर्ति फजल अली की अध्यक्षता में “राज्य पुर्नगठन आयोग” बना।
उन्नीस सौ छप्पन में इसकी जो रिपोर्ट आई उसमें “भाषाई-समानता” यानि “लिंग विस्टीक होमोजिनीयलिटी” को एक महत्वपुर्ण आधार माना गया, राज्यों की सीमाओं को निर्धारित करने के मामले में। इससे गहरा असंतोष जगा एवं देश में हिंसा भी भड़की। आयोग जातीय भावनाओं को संतुष्ट करने में अक्षम रहा। ये भावनाएँ देश में उस समय तक काफी प्रबल हो चुँकि थी। यही कारण है कि राज्य पुर्नगठ आयोग की रिपोर्ट का बहुतों ने स्वागत नहीं किया। काँग्रेस-पार्टी ही नहीं, बल्कि शोसलिस्ट पार्टी के राम मनोहर लोहिया ने भी भाषाई-आधार को माना एवं प्रोत्साहित किया। उन्नीस सौ साठ में बम्बई का विभाजन हुआ, तथा महाराष्ट्र एवं गुजरात भषाई-आधार पर बने। उन्नीस सौ छयासठ में पंजाब एवं हरियाणा बने। इसके बाद भी अनेक राज्य बने जिनके आधार में भाषाई-आधार एक महत्वपुर्ण तत्व के रूप में विद्यमान रहा।
वे राज्य हैं- नागालैंड (उन्नीस सौ सन्तावन) हिमाचल प्रदेश, मेघालय (उन्नीस सौ सत्तर), मणिपुर, त्रिपुरा, अरूणाचल प्रदेश एवं मिजोरम, मद्रास के विभाजन के बाद तमिलनाडू एवं कर्नाटक (उन्नीस सौ इकहत्तर) झारखंड राज्य के साथ-साथ कई अन्य जगहों पर भी पृथक राज्य की माँगे उठी। ये हैं- गोरखालैंड, (बंगाल से), उत्तराखंड (उत्तर प्रदेश से), छत्तीसगढ़ (मध्य प्रदेश से), तेलंगना (आन्ध्र प्रदेश से) विदर्भ (महाराष्ट्र), बोड़ोलैंड़।
भारत के संविधान में इस बात की चर्चा कहीं नहीं है कि नये राज्यों या पृथक राज्यों के गठन का अधार क्या हो। संविधान के प्रथम अध्याय की धारा-2 से चार तक नये राज्यों के गठन की बात कही गई है। भारतीय संविधान में सिर्फ इतना ही कहा गया है कि “जैसा कि संसद उचित समझे”, किसी निश्चित आधार के दायरे में नये राज्यों के निर्माण को बाँधा नहीं गया है। इसे संसद के द्वारा विचार करने के लिए खुला छोड़ दिया गया। परिस्थिति के अनुरूप स्वतंत्र निर्णय ले सकता है। संसद को यह भी आधिकार दिया गया है कि वह चाहे तो एक राज्य या उससे अधिक राज्यों का गठन कर सकती है। उसके लिए संबंधित राज्यों के राज्य सरकारों से सहमति प्राप्त करना भी आवश्यक नहीं माना गया है। असहमति जाहिर करने के बाद भी संसद को अधिकार है कि वह नये राज्य के गठन से संबंधित विधेयक को संसद में पारित करवा सकती है।
इस बात का भी जिक्र संविधान में नहीं है कि नये राज्य का गठन सिर्फ आदिवासी या जनजाति बाहुल क्षेत्रों के लिए ही किया जा सकता है और गैर-आदिवासी या गैर-जनजाति बाहुल क्षेत्रों के लिए नहीं किया जा सकता।

Monday, August 16, 2010

झारखंड अलग राज्य की माँग –

जैसा कि हमने देखा कि बिरसा आन्दोलन के समय एवं उसके बाद बींसवी सदी के प्रारम्भिक दो-तीन दशकों तक सामाजिक सुधारों, धार्मिक गति-विधियों का जोर झारखंड़ क्षेत्र में रहा। शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए यानि ब्रिटिश-सरकार द्वारा चलाए गए शिक्षा के प्रचार एवं प्रसार के लिए ईशाई मिशनरियों ने काम करना शुरू दिया था। “सुयारन ग्रेजुएट” ने शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए “क्रिसचीयन एसोसिएशन” की स्थापना की थी। आंगलिक मिशन के जे0 बोर्थेलमैन ने 1911-12 में ढाका में आयोजित छात्र संघ का उद्देश्य गरीब ईशाई छात्रों की शिक्षा के लिए राशि जुटाना था। एक और ईशाई नेता ने मुंडा-उराँव एजुकेशन काँग्रेस (यक्षा-सभा) तथा राँची यूनियन ने शहरी आदिवासियों के बीच शिक्षा का प्रसार करने का कार्य किया। 1918 ईस्वी के बाद जब संवैधानिक सुधारों के युग का सूत्रपात हुआ, तथा क्षेत्रिय एवं छोटे हितों की रक्षा तथा संवर्द्धन की मांग जोर पकड़ने लगी, तो शिक्षित ईशाई जनजातियों ने राँची के आंगलिक विषय के कहने पर छोटानागपुर विकास सोसाईटी को संगठित करने में सहायता की थी। ये शिक्षित आदिवासी अधिकत्तर जर्मन एवं आंगलिक मिशनों के छात्र थे।
जे0 बोर्थेलमैन आदिवासी ईशाई थे। इनके बाद स्टुडेन्ट यूनियन छात्र संघ का संचालन जोयले लकड़ा तथा बेदी उराँव ने किया। 1920 ईस्वी में छोटानागपुर उन्नति समाज की स्थापना हुई। “किसान सभा” बनाई गई जिसकी स्थापना थेबले उराँव ने की थी। इसके अलावे कैथोलिक ईशाईयों ने कैथोलिक सभा की स्थापना की थी। इसमें सदस्यता आंगलिक मिशन, लूथेरन मिशन तथा आदिवासियों तक ही सीमित रखा गया था। “छोटानागपुर कैथोलिक सभा” एक सामाजिक, धार्मिक संस्था थी। बाद में इसका राजमैतिक रूप भी उभरा। “छोटानागपुर उन्नति समाज” में भी गैर-आदिवासियों यानि गैर-जनजातियों को सदस्य नहीं बनाया जाता था।
कालान्तर में “छोटानागपुर उन्नति समाज” “किसान सभा” एवं छोटानागपुर कैथेलिक सभा ने मिलकर “आदिवासी महासभा” 1938 में बनाई। इसे पहले इगनियस बेक के नेतृत्व में बनाया गया।
जे0 बोर्थेलमैन ने छोटानागपुर उन्नति समाज के मंच से पहली बार झारखंड अलग राज्य बनाने की माँग को उठाया। आदिवासी बाहूल क्षेत्रों को मिलाकर एक अलग प्रदेश की माँग इस प्रकार 1920 में उठी। इस उन्नति समाज की गतिविधियाँ 1920 से 1938 तक चली, जबतक “”आदिलवासी महासभा” गठित नहीं हो गई।

झारखंड़ में बदली परिस्थिति

इस औद्योगिक विस्तार के लिए लाखों एकड़ जमीन सरकार के द्वारा अधिग्रहित की गई, सरकारी उपक्रमों एवं पब्लिक अंडरटेकिन्डस के लिए। हजारों एकड़ खेती योग्य भूमि नदियों पर बाँधे गये बाँधों में डूब गये। हजारों एकड़ जंगल साफ हो गये। इन उद्योगों में नौकरी, व्यवसाय, रोजगार, ठेकेदारी पाने के लिए झारखंड क्षेत्र से बाहर के लोग तेजी से भारी तादाद में यहाँ आने लगे। यहाँ जो शहर औद्योगिकरण के चलते बसे उनमे बाहरी क्षेत्र के लोग बसते गये। स्थानीय मूलवासी इन शहरों से दूर हटने लगे। नये नव धनाद्य लोगों का दल पनपने लगा। मॉफिया-संस्कृति पनपी। अपराध बढ़ने लगे।
झारखंड के मूलवासियों को चोतरफा मार झेलनी पड़ी। एक तो वे अपनी जमीनों से विस्थापित होने लगे। जमीनों से विस्थापित होने के साथ-साथ बाहरी संस्कृति के प्रवेश से झारखंडियों का सांस्कृतिक-विस्थापन भी शुरू होने लगा। झारखंड क्षेत्र के लोग वैसे ही सीधे-साधे स्वभाव वाले होते हैं। फिर अशिक्षा के चलते सरकारी महकमों मे भी कम थे सरकारी नौकरी से वंचित थे, नये खुलने वाले कलकारखानो, खदानो मे भा इन्हे नौकरी नहीं मिली। इन्हें कोई हिस्सेदारी नहीं दी गई। बहुत कम लोग स्वतंत्र व्यवसाय करना जानते थे। फिर इनके पास पूँजी भी नहीं थी। पदाधिकारी चाहे सरकारी हो, या प्राइवेट कम्पनियों के सभी बाहरी व्यक्ति।
जंगलों से भी मूलवासी -आदिवासियों का विस्थापन होने लगा। जंगल के कानून मूलवासियों के हक में नहीं हेने के कारण, जिन जंगलों पर उनका जीवन आश्रित था, वे जंगल ही उनके लिए बेकार होने लगे। जंगल पर आधारित झारखंडियों का जीवन नष्ट होने लगा। जंगल की सारी सम्पदा, उनका उत्पाद फूल, फल, कंद, पत्ते-पौधे, पेड़ जड़ी बूटी सभी का सरकारी करण हो गया। जंगल के पहाड़ो के पत्थर, मोरम, बाँस, घाँस, नदी, नाले सभी सरकारी हो गये।
औद्योगिकरण का यह विस्तार, झारखंड़ की सम्पदा का जोरदार दोहन 1970 तक आते-आते काफी प्रचंड रूप से हो गया था। इसके कई दुष्परिणाम सामने आए। सरकारी उपेक्षा के चलते विस्थापितों को कभी उचित मुआवजा भुगतान नहीं मिला। दशकों तक मुआवजा भुगतान नहीं किया गया। उनके पुर्नवास की कोई नीति नहीं बनाई गई। न ही उनका पुर्नवास किया गया। कोई अपने हक अधिकार की बात करता तो उन्हें गोलियों से भूँजा जाता। महाजनी शोषण, सूदखोरी अपने चरम पर पहुँच चुका था। संगठित रूप से, षंड़यंत्र करके शराब खोरी की आदत मूलवासियों, आदिवासियों में डाली जा रही थी। स्थिति ऐसी बन गई कि झारखंड़ी औने-पौने दामों पर अपनी जमीनें बेच देते। या फिर सूदखोर-महाजन उन पर कब्जा कर लेते।
प्रतिवर्ष झारखंड के गरीब लोग देश के दूसरे प्रदेशों में मजदूरी करने के लिए पलायन करने लगे। पंजाब, हरियाणा तथा पश्चिम बंगाल आदि प्रदेशों में खेत-मजदूर या ईंट भट्ठों में मजदूरी करने चले जाते। अपना परिवार, घर-द्वार छोड़कर पलायन करने लगे। त्रासदी तो यह हुई कि बाहर प्रदेशों से लोग झारखंड क्षेत्र में लोटा-कम्बल, झोंटा-सोटा लेकर आने लगे और पैरवी के बल पर करोड़पति बनने लगे, पर झारखण्ड के लोग पेट भरने के लिए बाहर पलायन करने लगे। अपने ही धर मे लगे उद्योगों, परियोजनाओं का कोई लाभ झारखंड़ियों को नहीं मिलने लगा। विकास के नाम पर झारखंड़ियों का विनाश शुरू हुआ। स्थानीय लोगों की जमीनों पर बाहर से आए लोगों ने कब्जा करना शुरू कर दिया। माफिया-संस्कृति के उदय के साथ ही पूरे झारखंड में आतंक का साम्राज्य बनने लगा। इनके आतंक से स्थानीय लोग त्रस्त रहने लगे। थाना-पुलिस, प्रशासन में स्थानीय लोगों के नहीं रहने के कारण, लूट एंव शोषण चरम सीमा पर पहुँच गया। छोटानागपुर काश्तकरी अधिनियम एवं संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम सिर्फ नाम के लिए रह गये। इन्हें ताख पर रखकर जमीनों का हस्तांतरण किया जाने लगा। सरकारी जमीनों की बन्दोबस्ती स्थानीय आदिवासी, हरिजन, गरीब, पिछड़े लोगों को नहीं करके धनी-मानी एवं बाहर से आए लोगों के हाथों कर दिया जाने लगा। झारखंडियों से जल-जंगल एवं जमीन के परम्परागत अधिकार छीनने लगे।
औद्योगिकरण के चलते प्रदुषण बढ़ने लगा। जंगल का विनाश होने लगा। प्रदुषण के चलते जमीनों की उत्पादकता पर बहुत बुरा असर पड़ा। फसल का उत्पादन घट गया। सभी नदियों, नालों, झरनों, तलाबों, जलाशयों का पानी प्रदुषित हो गया। पर्यावरण में असंतुलन पैदा हो गया। झारखंडियों की जीवन-शैली छिन्न-भिन्न होने लगी। विकाश के इस दौड़ में अशिक्षित, गरीब भोले झारखंडी पीछे पड़ गये।
आप देखेगें कि बिहार में आदिवासी जनसंख्या में लगातार कमी हुई है जो 1951 में 10.07 प्रतिशत से कम होकर 1981 की जनगणना में 8.13 प्रतिशत हो गई। यह कमी झारखंड क्षेत्र में सर्वाधिक बताई गई है। आदिवासियों की जनसंख्या 1951 में 36.81 प्रतिशत था। 1981 में यह घटकर 30.25 हो गया। आज की तारीख में यानि 2001 की जनगणना में यह मात्र 22 प्रतिशत रह गई है। यह सब बाहर से आकर बसने वाले गैर-आदिवासी जनसंख्या के कारण हुआ। इसका एक अन्य कारण भारी तादाद में आदिवासी जनसंख्या के बाहर पलायन करने का है। कई आदिवासी समुदाय तेजी से बदलती हुई परिस्थिति में अपने अस्तित्व की रक्षा भी नहीं कर पाये। बदले आर्थिक दौर एवं सामाजिक परिवेश से तालमेल नहीं बैठा पाने के कारण हतोत्साहित होकर बैठ गये। प्रायः सुप्त हो गये। इसमें बिरहोर, पहाड़ियाँ जातियाँ लुप्त हो गई है।
बिहार के अन्य जिलों यानि झारखंड क्षेत्र से बाहर के जिलों से आकर बसने वाले प्रवासियों की संख्या में धीरे-धीरे वृद्धि हुई। यह वृद्धि जो 1961 में 11.7 लाख से बढ़कर 1971 में 14.6 लाख हो गई। यह आबादी 1981 में बढ़कर 21.4 लाख हो गई। इस अवधि में बाहर से आकर बसने वाले प्रवासियों का प्रतिशत 10.6 प्रतिशत से बढ़कर 12.16 हो गई। राँची में यह प्रतिशत 5.96 से बढ़कर 8.62 प्रतिशत हो गई। औद्योगिक क्षेत्रों में यह प्रतिशत निश्चय ही इससे अधिक बढ़ गया। यह दबाव शहरों में सबसे ज्यादें हुआ। इतने लोगों के आने से जमीन एवं अन्य संशाधनों, रोजगार, शिक्षा, चिकित्सा और अन्य सुविधाओं पर अत्यधिक दबाव पड़ा।
आदिवासी बहूल जिले यानि जनजाति बाहूल जिले अल्पसंख्यक जिले हो गये। संथाल परगना एवं सिंहभूम इसके उदाहरण हैं। शहरी जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हुई है और बाहरी जनसंख्या ही इसमें ज्यादे है। इसके अलावा जनजातिय जनसंख्या का शहरीकरण हुआ है। ग्रामिण क्षेत्रों की जनजातिय जनसंख्या में कमी आई है। झारंखंड़ क्षेत्र में औद्योगिक मजदूरो की संख्या बढ़ी है। इसमें भी बाहरी मजदूर सर्वाधिक है। आज जब लोक-सभा तथा विधान सभा क्षेत्रों का परिसीमन किया जा रहा है, तो देखा जा रहा है कि शहरी क्षेत्रों में सीटें बढ़ गई एवं सूदूर आदिवासी क्षेत्रों में कम हो गई।
इस अवधि में यानि बींसवी शताब्दी के चौथे दशक के बाद से जो सबसे कठिन समस्या पैदा हुई, वह यह कि “स्थानिय” शब्द का विस्तार कर दिया गया। उसमें बिहार के सभी जिलों के व्यक्तियों को शामिल करने के परिणाम स्वरूप छोटानागपुर तथा संथाल परगना के हिस्सों में यहाँ के मूल-वासियों के स्थानों पर वे स्थानिय बनकर उनका हिस्सा खा गये। औद्योगिक प्रतिष्ठान सबसे ज्यादे झारखंड क्षेत्र में स्थापित किए गये। कारण कि यहीं वो सब संशाधन मौजूद थे।
बाहरी जनसंख्या के इस दबाव के कारण राजनैतिक क्षेत्रों में भी बाहरी व्यक्तियों का दबदबा बढ़ने लगा। ये बाहरी जनसंख्या बहुत जल्द सम्पन्न एवं धनी बनने लगे। औद्योगिक क्षेत्रों में बाहरी मजदूरों के वर्चस्व हो जाने के कारण एवं बाहरी ऑफिसरों, पदाधिकारियों, कर्मचारियों के रहने के कारण मजदूर यूनियनों में बाहरी लोग ही नेता बन कर उभरे। अखिल भारतीय पार्टियाँ इन्ही लोगों को सांसद या विधान सभा का टिकट देने लगीं। धीरे-धीरे झारखंड राजनैतिक उपनिवेश बनने लगा।
झारखंड में इस औद्योगिकरण के चलते एवं संस्कृति के प्रवेश के साथ-साथ यहाँ के सामाजिक जीवन पर भी प्रभाव पड़ने लगा। झारखंड़ क्षेत्र के लोगों को बाहर के लोगों की भाषा, रहन-सहन, वेष-भूषा प्रभावित करने लगी। भोजपुरी, बंगला, मगही, मैथली आदि भाषाएँ यहाँ के लोग भी बोलने लग गये। हिन्दी तो बोलचाल की भाषा में प्रयोग करने लगे थे। स्थिति ऐसी बनने लगी कि स्थानीय भाषा कुड़माली, संथाली, मुंडारी आदि का प्रयोग शहरों में नहीं करने लगे।
जल, जंगल, जमीन से विस्थापन के कारण झारखंडियों का सांस्कृतिक विस्थापन भी शुरू हो गया था। धार्मिक-विस्थापन भी हो रहे थें, जैसा कि हमने पहले ही देख लिया है।
सामाजिक विस्थापन का एक बड़ा भाग था, 1935 से 1970 की अवधि में लाया गया झारखंडी जातियों के सामाजिक स्तर मे बदलाव। अनेक जनजातियों को जनजाति की सूची से हटा दिया गया। इन जनजातियों की अच्छी खासी जनसंख्या थी। कुछ एक को जनजाति की सूची हटाकर “हरिजन” अनुसूची जाति की सूची बनाई गई। कुछ एक जातियों को जनजाति रहते हुए भी उन्हें जनजाति सूची से हटा दिया गया।
“हरिजन सेड्यूल कास्ट” की अवधारणा वास्तव में झारखंड से बाहर की अवधारणा है। वास्तव में झारखंड के मूलवासियों में शुद्र जाति का कोई वर्गीकरण झारखंड की सभ्यता-संस्कृति एवं सामाजिक संरचना में मौजूद नहीं था। ब्राह्मणवाद की जाति-प्रथा झारखंड में बहुत बाद मे लागू की जाने लगी। जिन जातियों को जनजाति सूची से हटाया गया, वो थी कुड़मी महतो, रजवार, खतौरी, बडाइक, गौंड़, पान कोल आदि।
इस प्रकार औद्योगिकरण के विस्तार के साथ, मूल झारखंडी चाहे वह अनुसूचित जनजाति के हो, अनुसूचित जाति के हो या अन्य गैर-आदिवासी सदान, सभी की समान रूप से उपेक्षा होने लगी, जिसके चलते दोनों वर्गो में निकटता बढ़ने लगी। बिहार सरकार एवं केन्द्र सरकार की उपेक्षापूर्ण नीतियों से इस क्षेत्र के आदिवासी एवं गैर-आदिवासी सभी मूलवासी शोषण के शिकार हुए एवं समान रूप से स्वयं को शोषित एवं उपेक्षित समझने भी लगे।
कृषि-युग की देन सामंतवाद है। औद्योगिक युग की देन पूँजीवाद-साम्राज्यवाद है। इस पूँजीवादी साम्राज्यवाद को चलाने के लिए अब सशरीर उपस्थित रहना जरूरी नहीं।
इस तेजी से बदलती परिस्थिति ने झारखंडियों को यह महसूस करा दिया कि वे इस बदलती दुनियाँ का हिस्सा नहीं। विकास की इस दौड़ में उन्हें भागीदारी ही नहीं लेने दी जा रही है। मुख्य धारा तो क्या उन्हें किसी भी धारा में लाने का कोई प्रयास नहीं हो रहा है। उन्हें यह लगने लगा कि यह व्यवस्था ही उनके शोषण के लिए बनी है। वे अपने आप को अलग-थलग अनुभव करने लगे। एक अलगाववाद की भावना का पैदा होना स्वाभाविक था, ऐसी परिस्थिति में। इस उपेक्षा एवं शोषण के प्रतिकार के रूप में उठ खड़ी हुई झारखंड अलग राज्य की माँग। कालान्तर में विख्यात हुए “झारखंड आन्दोलन” के नाम से अनेक कार्यकलाप एवं गतिदविधियाँ।