Sunday, March 6, 2011

“झारखंड़ मामलों से संबंधित समिति” की रिपोर्ट

इस रिपोर्ट में जो सबसे महत्वपूर्ण बात सामने रखी, वह यह है कि जिन कारणों से राज्य पुर्नगठन आयोग ने झारखण्ड़ अलग राज्य की माँग को ठुकरा दिया था, उन कारणों को इस समिति की रिपोर्ट ने गलत ठहरा दिया।
इस समिति ने जो दूसरी महत्वपूर्ण बात कही, वह यह कि अब तक के जितने उपाय संविधान की पाँचवी सूची के अन्तर्गत इस क्षेत्र के विकास के लिए किए गये थे, वे सभी उपाय नाकामयाब साबित हुए थे। इस रिपोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि अब तक सारे प्रयास इस क्षेत्र को पाँचवीं सूची के अन्दर शामिल मानकर किए गये थे।
इस रिपोर्ट ने अपने अध्याय-तीन पारा चौबिस में यह स्पष्ट कर दिया कि “झारखण्ड़ आन्दोलन के इतिहास में जो उल्लेखनीय बात हुई है, वह आदिवासी और गैर-आदिवासी आबादी का एक जूट होना है। इस आन्दोलन में मुंड़ा, संथाल, हो और उराँव जैसे बड़े-बड़े आदिवासी समूहों और कुर्मी जैसे गैर-आदिवासी समुहों और अन्य जातियों का दबदबा है परन्तु अन्य जातियाँ भी इसमें शामिल हुई है। छोटे-छोटे आदिवासी ग्रुपों के सम्बन्ध में सूचना कम है। इस तरह झारखंड़ आन्दोलन का सामाजिक आधार पिछले बीस वर्षों में काफी फैला है।”
इस रिपोर्ट ने यह बात कह कर यह स्पष्ट कर दिया था कि 1970 से इस आन्दोलन का सामाजिक आयाम बढ़ा था। रिपोर्ट 1990 में लिखी जा रही थी और सामाजिक आयाम के बढ़ने की बात पिछले 20 वर्षों से की गई थी। इसका मतलब ही यही था कि झारखंड़ मुक्ति मोर्चा के गठन के बाद से ही आदिवासी तथा गैर-आदिवासियों का संयुक्त आन्दोलन चला। 1990 तक निश्चय ही इस आन्दोलन को मात्र आदिवासियों का आन्दोलन बतलाया गया था। इसे अब अल्पमत का नहीं कहा जा सकता था। बिनोद बिहारी महतो के झामुमो के संस्थापक- अध्यक्ष होने के साथ ही स्थिति में बदलाव शुरू हो गया था, क्योंकि उनके साथ अन्य गैर-आदिवासी समूह भी शामिल हुए जिसमें कोयलांचल के मजदूर भी थे।
इस समिति ने यह भी स्पष्ट कर दिया था कि “पिछले चालीस वर्षो से झारखंड़ क्षेत्र की एक अलग पहचान भाषा, सांस्कृतिक धारा, भौतिक विकास की एक स्पष्ट अवधारणा रही है।” इस रिपोर्ट ने स्वीकार किया कि “उपनिवेशकालीन समय में इस प्रदेश का तीन अथवा चार राज्यों में विभाजन हो गया। राजनैतिक तथा प्रशासनिक राज्यों में यह विभाजन बना हुआ है, लेकिन प्रशासनिक सीमाओं के आर-पार लोगों में परस्पर सांस्कृतिक आदान-प्रदान रूका नहीं है, वास्तव में यह विकसित हुआ है।”
झारखंड़ मामलों से संबंधित समिति ने मई 1990 में यह स्पष्ट सुझाव दे दिया कि “इसिलिए हमें इस क्षेत्र को स्पष्ट सांस्कृतिक पहचानवाले क्षेत्र के रूप में मान लेना चाहिए जिसका विकास लोगों के सम्पूर्ण विकास के एक भाग के रूप में किया जाना चाहिए।”
चूँकि इसी रिपोर्ट ने यह साबित कर दिया था कि अब तक के विकास के लिए अपनाए गये उपाय जो संविधान की पाँचवी सूची के तहत अपनाए गये थे, इस क्षेत्र के विकास में कामगार सिद्ध नहीं हुए थे, कुछ अन्य उपाय करने चाहिए। यानि इस समिति की रिपोर्ट ने यह इंगित कर दिया था कि जितने प्रकार के परिषद् या बोर्ड बनाए गये थे, सभी विफल साबित हुए थे।
पर, इस क्षेत्र का विकास कैसे हो, इस अहम् सवाल का जबाव भी इसी रिपोर्ट ने दे दिया था। अपने अध्याय छः “निष्कर्ष” शीर्षक के अन्तर्गत पारा ग्यारह में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि “झारखंड़ जनसमुदाय के पहले दो वर्गो अर्थात आदिवासी समूह और मूल गैर-आदिवसी समूह का भविष्य एक दूसरे से जुड़ा रहा। इन दोनों समूहों की संस्कृति और इतिहास एक समान है। .................. परिणाम यह है कि आज दो वर्गो ने एक समान उद्देश्य रखा है यह जब एक जातीय वर्ग का दूसरी जाति या एक धार्मिक समुदाय का दूसरे का प्रश्न नहीं है। बाहरी शोषणकर्त्ताओं के विरूद्ध मन की भावना से इन दो वर्गो को एक अलग झारखंड़ राज्य के लिए एकीकृत किया है। आशा है कि वर्त्तमान सामाजिक आर्थिक लक्ष्य को लेकर एक धर्मनिरपेक्ष झारखंड़ राज्य का परिणाम हो। यदि ऐसा होता हे तो उन सभी लोगों को प्रसन्नता होगी जो संविधान की प्रस्तावना की भावना का मूल्य समझते है।”
इस समिति की रिपोर्ट के उपर वर्णित तथ्यों को दखने के बाद इस बात पर कोई संदेह ही नहीं रह जाना चाहिए कि झारखंड़ क्षेत्र का मतलब दक्षिण बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा एवं मध्यप्रदेश के समीपवर्ती इलाके हैं जिनकी समान सभ्यता-संस्कृति है। इसकी एक अलग पहचान भी है। अब इस बात पर संदेश नहीं होना चहिए कि इस क्षेत्र को ही अलग राज्य का दर्जा मिल जाना चाहिए।
पर, बड़ी हैरत की बात है कि झारखंड़ अलग राज्य के संबंध में हमेशा ही बौधिक बेईमानी की जाती रही है। राज्य पुर्नगठन आयोग ने अगर 1955-56 में सही तथ्यों को लिखा होता तो निश्चय ही झारखण्ड़ अलग राज्य बनाने की अनुशंसा की गई होती और अन्य राज्यों के साथ-साथ इसके गठन की प्रक्रिया भी शुरू कर दी जाती। वहाँ उस समय भी बौधिक बेईमानी की गई। इसे सिर्फ आदिवासियों का आन्दोलन करार दिया गया। अन्य कारण जो अलग राज्य नहीं बनाने के लिए दर्शाये गये थे, वे भी भ्रामक एवं तथ्यों से परे थे। इस बार तो गजब ही किया गया। समिति की रिपोर्ट में सही तथ्यों को तो रखा गया एवं निष्कर्ष भी सही निकाले गये पर जो सुझाव दिए गये इस क्षेत्र के लिए वह सर्वथा गलत रहे। यहाँ भी अन्य प्रकार की बौधिक बेईमानी की गई।
राज्य पुर्नगठन आयोग के दिनों में सबसे सशक्त पार्टी झारखंड़ी पार्टी के प्रमुख नेता श्री जयपाल सिंह ने अलग राज्य बनाने के लिए आयोग पर कोई दबाव नहीं दिया। उदासीन रहे। हो सकता है, इसी कारण आयोग को बौधिक बेइमानी करने का मौका मिल गया।
इस बार भी कहीं न कहीं किसी के कारण उलटे सुझाव दे दिये गये। झामुमो के तत्कालीन अध्यक्ष शिबू सोरेन ने समिति पर ऐसा कोई दबाव नहीं दिया। बल्कि कालान्तर में पता चला कि वे ही एक प्रकार के परिषद् के समर्थक बन गये थे।
इस बात का उल्लेख करना यहाँ जरूरी हो गया है कि 1978 में ही बिहार विधान सभा द्वारा “झारखंड़ विकास परिषद् 1978” का गठन किया गया था। इसका भी जिक्र करना आवश्यक है कि ठीक राज्य पुर्नगठन आयोग के गठन के पूर्व 1951 में, बिहार जनजातीय सलाहकार परिषद् बनाया गया था। फिर 1971 में छोटानागपुर संथाल परगना स्वायत्त विकास प्राधिकरण बनाया गया था। इधर झारखंड़ विषयक समिति अपना दौरा कर रही थी। रिपोर्ट तैयार कर रही थी, तो दूसरी तरफ बिहार सरकार इसे भ्रमित करने के लिए झारखंड़ क्षेत्र विकास परिषद् 1991 के विधेयक का निर्माण कर उसे पारित कराने में लगी थी। इस विधेयक द्वारा पूर्व के छोटानागपुर संथाल परगना स्वशासी विकास प्राधिकरण 1971 एवं उसके बाद के संशोधनों को निरस्त कर दिया गया था और 1/8/1991 को 1991 एवं उसके बाद के संशोधनों को निरस्त कर दिया गया। मई 1990 के झारखंड़ मामलों से संबंधित समिति की रिपोर्ट मई 1990 उसी प्रकार ठढ़े बस्ते में पड़ी रही।

Sunday, February 20, 2011

“झारखंड़ मामलों से संबंधित समिति” की रिपोर्ट

झारखंड़ मामलों से संबंधित समिति 1989, को केन्द्र सरकार का आदेश था कि पूरे झारखंड़ क्षेत्र का दौरा यह समिति करे तथा अपनी रिपोर्ट दे। इस समिति को संविधान के ढाँचे के अन्तर्गत क्षेत्र के लोगों की अपेक्षाओं पर विचार करना था और उन्हें पूरा करने को लिए रूप रेखाएँ बनाना था यह आन्दोलन कारियों के द्वारा गृह मंत्री को लिए गये ज्ञापनों एवं उनके साथ हुए जून 1989 में हुई बैठकों में उठाए गये मुद्दो पर भी विचार-विमर्श करना था, केन्द्र सरकार ने इस विषय पर झारखंड़ क्षेत्र के सासंदो को पर्यवेक्षक नियुक्त किया था।
इस समिति को दक्षिण बिहार, मध्यप्रदेश, उड़ीसा तथा पश्चिम बंगाल के उन क्षेत्रों का दौरा करना था जिसे झारखंड़ क्षेत्र माना जाता रहा था। चूँकि समय सीमा मात्र एक महिने की थी, यह समिति पूरे क्षेत्रों का दौरा नहीं कर सकी और देश में आम चुनाव की घोषणा अक्टूबर 1989 के बाद कर दी गई थी, तो दौरा बन्द हो गया और विशेषज्ञों को रिपोर्ट तैयार करने को कह दिया गया। विशेषज्ञों द्वारा तैयार किए गये मसौदे पर 25 अप्रेल 1990 को समिति की बैठक में विचार-विमर्श किया गया। फिर 14-15 मई 1990 को हुई बैठक में नये मसौदे पर चर्चा हुई और गृह-मंत्रालय को सौंप दिया गया।
इस रिपोर्ट में कुल मिलाकर छः अध्याय हैं तथा सात अनुच्छेद। इस रिपोर्ट में यह भी दर्शाया है कि किस प्रकार झारखंड़ आन्दोलन के सामाजिक एवं क्षेत्रीय आयाम का विस्तार हुआ। एक छोटे आन्दोलन ने जिसे छोटानागपुर उन्नति समाज ने शुरू किया था, किस प्रकार विशाल रूप लिया इस पर भी विवेचना किया है। झारखंड़ में औद्योगिकरण के प्रभाव इसके जातीय विशाल रूप लिया इस पर भी विवेचना किया है। झारखंड़ में औद्योगिकरण के प्रभाव इसके जातीय समीकरण, जनसांख्यिकीय स्थिति आदि कई विषयों पर भी इस रिपोर्ट में बहुत कुछ कहा गया है। इसके साथ साथ राज्य पुर्नगठन आयोग की रिपोर्ट का हवाला भी दिया गया है जो अलग राज्य से सम्बन्धित है तथा झारखंड़ आन्दोलन के कारणों पर भी विवेचना किया गया है।

Saturday, February 19, 2011

“झारखंड़ विषयक समिति” का निर्माण –

झामुमो के अलावे 1972 से 1991 तक जिन अन्य झारखंड़ी नेताओ ने अलग झारखंड़ राज्य के लिए संघर्ष किया, उनमें प्रमुख रहे, सर्वश्री एन0 ई0 होरो, श्री राम दयाल मुंड़ा, श्री बागुन सोम्ब्रई, सूर्य सिंह बेसरा, मोजेस गुड़िया, प्रभाकर तिर्की आदि-आदि।
अब इस बात पर नजर डालना आवश्यक है कि बिहार विधान सभा में झारखंड़ नामधारी पार्टियों की स्थिति क्या रही थी। 1952 में 33 विधायक, 1957 में 32, 1967 में आठ, 1969 में सत्रह, 1971 में शून्य, 1972 में आठ, 1977 में फिर एक, 1980 में चौदह, 1984 में एक, 1985 में 9 तथा 1990 में 21 सीटें बिहार विधान सभा में झारखंड़ नामधारी पार्टियों को मिली। इसी प्रकार लोक सभा सीटें 1957 में 5 सीटें, 1962 में तीन सीटें, 1971 में दो सीटें, 1980 में एक सीटें, 1985 में एक भी सीटें नहीं, फिर 1989 में दो सीटें तथा 1991 में छः सीटे।
झारखंड़ अलग राज्य बनाने के संबंध में सरकार की सोच बड़ी भ्रामक थी। केन्द्र सरकार यह देखा करती कि इसके कितने जनप्रतिनिधि चुनाव जीत कर आते है जिससे झारखंड़ आन्दोलन की ताकत को नापा जाता रहा था। कम प्रतिनिधि चुनाव जीतकर आते तो कहा जाता कि झारखंड़ आन्दोलन को पर्याप्त जनसमर्थन प्राप्त नहीं है। पर यही बात दुसरे राज्यों के गठन के संबंध में नहीं सोची जाती थी। पंजाब से हरियाणा अलग हुआ। महाराष्ट्र से गुजरात बना। कर्नाटक बना मैसूर से अलग होकर। आन्ध्रप्रदेश तमिलनाडू से अलग हुआ। नागालैंड़ बना। पच्चीस राज्य बने आजादी के बाद। कहीं भी किसी भी मौके पर यह नहीं कहा गया कि इन राज्यों में अलग राज्य बनाने के लिए आन्दोलन क्यों नहीं हुए ? यह तलाश भी नहीं की गई कि आन्दोलन की जरूरत क्यों नहीं थी, इनको अलग करने के लिए। पर झारखंड़ अलग राज्य बनाने के सवाल पर आन्दोलन की आवश्यकता पर बल क्यों दिया गया? वह भी एक बड़े एवं सशक्त आन्दोलन की आवश्यकता क्यों दर्शाई जाती रही ? यह एक विचारनीय विषय है। दूसरी बात है कि इतिहास रहा है कि आधी सदी से ज्यादा समय तक यहाँ झारखंड़ अलग राज्य का सशक्त आन्दोलन चलाया गया, पर इसकी मान्यता नहीं देकर यहाँ के लोगों की आवाज को नहीं सुनकर उल्टे इस क्षेत्र के आन्दोलन को दबाया-कुचला गया। इस आन्दोलन में सैकड़ो को मारा गया, हजारो को जेल भेजा गया। लाखों लोगों ने कष्ट झेले। पर फिर भी झारखंड़ आन्दोलन को एक समस्या के रूप में देखा गया। इसका दमन किया गया जैसे कि यह माँग माँगना एवं आन्दोलन करना कोई गुनाह हो। यह कभी नहीं सोचा गया कि झारखंड़-आन्दोलन यहाँ की समस्याओं के चलते पैदा हुआ है तथा समस्या के निदान के रूप में एक राज्य माँगा जा रहा है। यह आन्दोलन अपने आप में कोई समस्या नहीं बल्कि समस्याओं का समाधान है।
झारखंड़ विषयक समिति का गठन 1989 में किया गया था। यह अपने आप में एक ऐतिहासिक घटना है तथा इसकी रिपोर्ट झारखंड़ आन्दोलन के इतिहास में एक महत्वपुर्ण तथा यादगार दस्तावेज के रूप में हमेशा जाना जाता रहेगा।
1987 में बिनोद बिहारी महतो ने “झारखंड़ समन्वय समिति” का गठन किया। ज्ञातव्य हो कि झामुमो के संस्थापक अध्यक्ष बिनोद बिहारी महतो प्रथम दश वर्षो 1983 तक झामुमो के अध्यक्ष रहे। फिर अमर शहीद निर्मल महतो अध्यक्ष बने तथा महामंत्री शिबू सोरेन ही रहे। इस समिति का गठन इसलिए किया गया कि झारखंड़ में झारखंड़ नामधारी पार्टियाँ तथा अन्य संगठन अलग-अलग से इस आन्दोलन को अंजाम दे रहे थे। बिनोद बिहारी महतो ने इस सोच के साथ इस समिति का गठन किया कि सभी मिलकर अगर जोरदार आन्दोलन करें तो केन्द्र सरकार इस विषय पर सोचने के लिए बाध्य होगी। उन्होनें इस समिति में कई संगठनों, पार्टियों तथा नेताओं को सम्मिलित किया। कुल मिलाकर बावन संगठन इसमें शामिल हुए। इसमें वामपंथी, समाजवादी, झारखंड़ नामधारी तथा कई अन्य सामाजिक संगठन भी थे। बिनोद बिहारी महतो की संयोजन शक्ति ने यह काम कर दिखाया क्योंकि वामपंथी से लेकर काँग्रेस विरोधी हर पार्टी, संगठन से उनका ताल्लूक रहा था। इसमें प्रमुख रूप से बिनोद बिहारी महतो, बी0 पी0 केशरी, संजय बसु मल्लिक, डा0 राम दयाल मुंड़ा, संतोष राणा, सर्वश्री एन0 ई0 होरो, लाल साहदेव, सूर्य सिंह बेसरा, प्रभाकर तिर्की, बिरसा उराँव, त्रिदीप घोष, मानव घोष दस्तिदार, भाई हेलेन कूजूर आदि कई नेताओं ने हिस्सा लिया था। एक विशाल रैली राँची के मोराबादी मैदान में 15 नवम्बर 1987 को भगवान बिरसा की जन्म तिथि पर आयोजित की गई। सरकारी बाधा एवं सरकार द्वारा सारे रास्तों की नाके बंदी, लाठी चार्ज के बावजूद लाखों की तादाद में भीड़ इकट्ठी हुई। नवम्बर के महिने में प्रचंड़ ठंड़ थी और बारिश भी हो गई थी, फिर भी लोगों का जोश देखने लायक था।
इसी झारखंड़ समन्वय समिति की रैली को देखते हुए केन्द्र सरकार ने इस माँग पर पुनः ध्यान दिया। केन्द्र सरकार के गृह मंत्रालय ने दिनांक 23-28 अगस्त 1989 को एक आदेश जारी करके “झारखंड़ मामलों से संबंधित समिति” नामक समिति का गठन किया। “कॉमिटि ऑन झारखंड़ मैटर्स” अंग्रेजी नाम है। इसमें झारखंड़ आन्दोलन के प्रतिनिधि, केन्द्र सरकार के प्रतिनिधि तथा झारखंड़ मामलों के विशेषज्ञों की टीम शामिल की गई। इस समिति ने मई 1990 में एक रिपोर्ट केन्द्र सरकार को सौंपी। राज्य पुर्नगठन आयोग के बाद यह एक विशेष समिति थी जो सिर्फ झारखंड़ आन्दोलन के मामलें में गठित की गई थी।
इस समिति में निम्नलिखित सदस्य थेः-
केन्द्र सरकार के प्रतिनिधि –.
1. श्री बी0 बी0 सक्सेना, संयुक्त सचिव ग्रामीण विकास विभाग।
2. श्री बी0 के0 मिश्रा, संचुक्त सचिव जनजाति विकास कल्याण मंत्रालय
राज्य सरकार के प्रतिनिधि –
श्री जे0 एल0 आर्य, गृह सचिव बिहार, सचिव-जनजाति कल्याण बिहार, क्षेत्रिय विकास आयुक्त बिहार।
झारखंड़ आन्दोलन के प्रतिनिधि –
1. डा0 आर0 डी0 मुंड़ा
2. डा0 ए0 के0 सिंह
3. सर्वश्री एन0 ई होरो
4. शिबू सोरेन
5. बिनोद बिहारी महतो
6. बी0 पी0 केसरी
7. एस0 एस0 बेसरा
8. प्रभाकर तिर्की
9. सन्तोष राणा
10. सूरज मंडल
11. शैलेन्द्र महतो
12. प्रो0 स्टीफन मरांड़ी
विशेषज्ञ –
1. डा0 एस0 के0 सिंह
महानिर्देशक भारतीय मानव शास्त्रीय सर्वेक्षण
2. डा0 भूपेन्द्र सिंह
भारत सरकार के भूतपूर्व सचिव
3. श्री के0 एन0 प्रसाद
भूतपूर्व अपर सचिव
अन्य प्रतिनिधि –
1. प्रो0 लालचन्द्र चुड़ामनी नाथ साहदेव
अध्यक्ष सदान् विकास परिषद्, राँची।
2. प्रो0 साहिद हसन्
महासचिव सदान विकास परिषद्।
उल्लेखनीय है कि झारखंड़ मुक्ति मोर्चा के तत्कालीन अध्यक्ष शिबू सोरेन, उपाध्यक्ष सूरज मंडल ने झामुमो को इस रैली में शामिल नहीं होने का निर्देश ही नहीं दिया, बल्कि इस समिति के संयोजक बिनोद बिहारी महतो का कई स्थानों में विरोध भी कराया गया था। उन्होंने रामगढ़ की आम सभा में अर्जुन राम (महतो) द्वारा खुलेआम विरोध भी करवाया था इन लोगों ने झामुमो का इस समिति में शामिल होना तथा इसके लोगों का समिति में शामिल होना तथा इसके लोगों का समिति के आन्दोल में भाग लेना उचित ही नहीं समझा था। बाद में इस समिति के आन्दोलन की सफलता देखकर “झारखंड़ मामलो से संबंधित समिति” में पैरवी करके सदस्य बन गये थे, जो झारखंड़ समन्वय समिति की देन थी। उस समय देश के प्रधान मंत्री श्री राजीव गाँधी थे तथा कॉग्रेस के श्री बूटा सिंह केन्द्रीय गृह-मंत्री थे। जब इस समिति का गठन किया गया, बिहार में कॉग्रेस के जगरनाथ मिश्रा मुख्य मंत्री थे। इस प्रकार झारखंड़ आन्दोलन को एक विस्तृत आयाम बिनोद बिहारी महतो के प्रयत्नों से मिला। सिर्फ आदिवासी आन्दोलन का जो ठप्पा लगा था, वह मिटने लगा था।

अध्याय - नौ (अतंरराष्ट्रीयता बनाम राष्ट्रीयता)

अतंरराष्ट्रीयता की अवधारणा के साथ कम्यूनिष्म चलता है। उसका आयाम पूरा विश्व है जिसको वह एक यूनिट मानता है। पूरे विश्व में वर्ग-संघर्ष की कल्पना करता है कम्यूनिष्म तथा कम्यूनिष्म लाना चाहता है। यह कम्यूनिष्म क्या है, इसकी व्याख्या करना मेरा उद्देश्य नहीं है। इसकी व्याख्या तो मार्क्स, लेनीन, माओ आदि ने पहले ही कर रखी है। कम्यूनिटी से कम्यूनिष्म बना है। कम्यूनिटी यानि जिसे हम समुदाय कह सकते है। तो कम्यूनिष्म का अर्थ हुआ समुदायवाद। यह सुनने में अच्छा नहीं लगता। जो समुदाय के लिए अच्छा हो जाहिर है वही नीति अच्छी है। किसी व्यक्ति विशेष के लिए गठित नीति अच्छी नहीं कही जा सकती। अब समुदाय एक नहीं कई है समाज में। तो समुदाय से व्यापक शब्द समाज हो जाता है। तो समुदाय से बढ़कर समाज हुआ। अतः नीति पूरे समाज के हित को देखते हुए उसके हित में होनी चाहिए। जो समाज मुखी सिद्धान्त है उन्हे समाजवाद ही कहेगें। अतः समाजवाद की बात करने का अर्थ अतंरराष्ट्रीयतावाद है। यहाँ पूरे मानव समाज को एक यूनिट माना गया। राष्ट्रीयता का अर्थ एक निश्चित भू-भाग के अंदर सिमट आता है। ऐसा भू-भाग जिसकी एक स्वाभविक रूप से सीमा बन गई हो, प्राकृतिक परिवेश एवं भौगोलिक दृष्टीकोण से। जाहिर है कि एक राष्ट्र यानि एक निश्चित भू-भाग के अंदर रहने वालों में एक प्रकार की समानता पाई जायेगी। यह समानता कई प्रकार की हो सकती है। सोचने के तरीके की हो सकती है। रंग-रूप, नाक-नक्से की हो सकती है। एक प्रकार के लोग, एक भू-भाग में अगर विद्यमान है तो एक राष्ट्रीयता के कहे जाते है।
इन्ही तथ्यों के आधार पर विश्व में महाद्वीप बने। महादेश बने। देश बने। अलग-अलग देश के वासियों ने अपनी सभ्यता-सास्कृति को विश्व के पटल पर महत्व दिलवाने का प्रयास किया है एवं अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाने की चेष्टा की है एवं बनाया है। एक दूसरे से लड़ाई लड़ी गई है, सिर्फ अपने देश की सिमाओं की रक्षा करने या उसका विस्तार करने के लिए। एक देश के लोग दूसरे देश के लोगों पर शासन करते है। दूसरों को गुलाम बनाया गया है। फिर स्वतंत्रता की लड़ाईयाँ लड़ी गई है। ये सभी निश्चित ही राष्ट्रीयता के नाम पर ही किए गये है।
एक देश के अंदर भी अलग-अलग धर्मों के लोग निवास करते हैं। अलग-अलग भाषा, बोलियाँ बोलने वाले लोग निवास करते है। जाहिर है कि ऐसे में छोटे स्तर पर वहीं होना स्वाभाविक है जो एक बड़े पैमाने पर विश्व के अन्दर अलग-अलग देशों की राष्टीयताओं के बीच होता है। यानि वैमनष्य, भेदभाव, एक के द्वारा दूसरे को शासन करने की मनोवृति। उन्नत आर्थिक स्थिति वाली कौम या फिर ताकतवर कौम के द्वारा कमजोरो को दबाने की चेष्टा। पूरे भारतवर्ष को ही देखें। हम कितने ही वर्गों में बँटे है।
सवाल उठता है, एसी परिस्थिति में अन्याय, शोषण, जुल्म, उपेक्षा के विरूद्ध कहाँ से लड़ाई शुरू की जाए। इस अन्याय या शोषण पर आधारित व्यवस्था का कहीं ओर छोर तो दिखाई देता नहीं। कहाँ पर इसकी गर्दन पकड़ी जाय। सैद्धान्तिक सवाल तो शोषण मुक्त समाज का निर्माण करना है, पर व्यवहारिक सवाल है कि क्या इसे अंतराष्ट्रीय अवधारणा के तहत पूरे विश्व को एक इकाई मानकर एक साथ पूरे विश्व में लड़ाई शुरू की जाय या फिर राष्ट्रीयता को आधार मानकर एक देश को यूनिट मानकर चला जाय या फिर एक प्रदेश को इकाई माना जाय। हम इससे भी नीचे परिवार तक जा सकते है। सफलता किधर से हाथ लगेगी इसका जबाव कुछ भी नहीं है। आप इस लड़ाई को कहाँ से शुरू करेगें, सफलता के लिए तो यह व्यक्ति विशेष की सौंच पर ही निर्भर करता है।
बिनोद बाबू ने सभी आयामों को देखा था। परखा था। उन्होनें अपने जीवन के शुरूआती दौर में वामपंथ-कम्यूनिष्म का साथ दिया था। पर उस अन्तराष्ट्रीय अवधारणा के साथ चलते हुए उन्हें लगा था कि उनकी उपलब्धि कुछ भी नहीं है। वे जहाँ के तहाँ है। कोई परिवर्त्तन उन्हें दिखाई नहीं दिया था। अतः उन्होने एक क्षेत्र विशेष को, जिसकी सभयता-संस्कृति तथा रहन-सहन, विश्वास एक सा था, चुना और उसकी राष्ट्रीयता को यूनिट मानकर अपना संघर्ष शुरू किया। निश्चित ही सफलताएँ हाथ लगी।

Friday, February 11, 2011

अध्याय आठ - झारखण्ड़ में वाम-पंथ

आजादी के बाद के समय को अगर हम देंखें और झारखंड क्षेत्र की तरफ नजर दौड़ाएँ तो हम पायेगें कि दक्षिण बिहार के तत्कालीन झारखंड़ क्षेत्र में काँग्रेस एवं झारखंड़ पार्टी का बोलबाला आजादी के तुरन्त बाद से हो गया। 1952 के आम चुनाव में बिहार विधान सभा में 33 विधायक झारखण्ड़ पार्टी के थे जिसके नेता, जयपाल सिंह मुंड़ा थे। बाकी काँग्रेस एवं एक अन्य क्षेत्रीय पार्टी के थे जिसका नेतृत्व राजा रामगढ़ कामाख्या नारायण सिंह कर रहें थे। उसका बोलबाला था। पश्चिम बंगाल के दक्षिण बिहार से सटे जिलों पुरूलिया, झाड़ग्राम आदि में काँग्रेस एवं एक क्षेत्रिय पार्टी लोक-सेवक दल का काफी प्रभाव था। यह क्षेत्र पश्चिम बंगाल का झारखण्ड़ क्षेत्र था। लोक-सेवक दल के पन्द्रह विधायक हो गये थे।
उसी प्रकार काँग्रेस का ही बोलबाला उड़ीसा एवं मध्यप्रदेश के झारखण्ड़ क्षेत्रों में था। पर धीरे-धीरे वामपंथी ताकतों ने झारखंड़ क्षेत्र में अपना प्रभाव फैलाना शुरू कर दिया। इसका एक प्रमुख कारण झारखंड़ क्षेत्र में औद्योगिकरण था। औद्योगिकरण के चलते मजदूरों की तादाद बढ़ी। हजारों की संख्या में यहाँ के किसानों को विस्थापित होना पड़ा, अपने गाँवों, खैतो एवं घरों से। इन विस्थापितों के नियोजन एवं पुर्नवास के लिए न तो राज्य सरकार द्वारा न ही केन्द्र सरकार द्वारा कोई नीति निर्धारण की गई। इन विस्थापितों की घोर उपेक्षा की गई। न तो उन्हें मुवाअजा दिया जाता न नौकरी। इन कारणों ने तथा मजदूरों के शोषण ने यहाँ वामपंथ के लिए बहुत उपयुक्त जमीन तैयार कर दिया।
यहाँ तक कि झारखंड़ मुक्ति मोर्चा के जन्मदाता प्रथम अध्यक्ष बिनोद बिहारी महतो भी पहले वामपंथी दल भारतीय कम्यूनिष्ट पार्टी में रहें। 1967 में जब कम्यूनिष्ट पार्टी ऑफ इंड़िया का विभाजन हुआ तो वे मार्क्ससीष्ट कम्यूनिष्ट पार्टी यानि कम्यूनिष्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्कसीष्ट) के सदस्य बन गये। 1967 में ही ई0 एम0 एस0 नम्बूद्रिपाद सरीखें नेता बिनोद बाबू के निमंत्रण पर धनबाद पधारें थे और यहाँ आम सभा चिल्ड्रेन-पार्क में किया गया था। इनके समकालीन चिन्मय मुखर्जी (धनबाद विधायक), टीकाराम माँझी (जमशेदपुर), सत्य चरण वेसरा (दुमका), विशेश्वर खाँ (संथाल परगना), राजेन्द्र सिंह मुंड़ा (राँची), धनंजय महतो (इचागढ़), चतुरानन मिश्र (गिरिडीह), मंजूर आलम (रामगढ़), सफी खाँ (बेरमो), चित्तो महतो (पुरूलिया), निर्मलेन्दू भट्टाचार्य (निरसा), ए0 के0 राय (धनबाद) आदि थे। फिर बाद में भी कई वामपंथी नेता उभरे। इनमें एस0 के0 बक्सी धनबाद-झरिया, महेन्द्र सिंह (बगोदर), ओपी लाल आजाद (गिरिडीह), एस0 के0 राय (झरिया) आदि कई वामपंथी नेता उभरे। करीब-करीब तीस से ज्यादे विधान सभा क्षेत्रों में वामपंथी पार्टियों के विधायक हुए जो वर्त्तमान झारखंड़ प्रदेश में हैं। 1960 से 1970 के दशक में वामपंथी पार्टियों के मजदूर यूनियनें हुआ करती थी एवं इनके माध्यम से पूरे झारखंड़ क्षेत्र में इनका प्रभाव बढ़ा।
नक्सल बादी आन्दोलन का प्रभाव भी झारखंड़ क्षेत्र में 1970 के दशक से फैलना शुरू हो गया था। कई आतंकवादी घटनाएँ घटी थी। झारखंड़ की भौगोलिक, स्थिति इसके घने जंगल एवं पहाड़ो से भरे भू-भाग के चलते यह क्षेत्र आतंकवादियों के नेताओं के लिए काफी सुरक्षित जगह बन गया। नक्सलवादी की तर्ज पर कई घटनाओं को अंजाम दिया गया। कई जगह बम फटे। ट्रेनों पर भी बम मारे गये। सिंहभूम, हजारीबाग, पलामू जिलों में 1970 के दशक में ही नक्सलियों की घूसपैठ हो गई थी। 1980 के बाद तो इनका कार्यक्षेत्र और भी बढ़ गया, तो इनके समर्थकों की तादाद भी काफी बढ़ गई। सूदर गाँवों के लोगों को प्रभावित किया गया। झारखंड़ के लोगों में फैला असंतोष, निर्मम शोषण, गरीबी, अशिक्षा तथा औपनिवेशिक शोषण ने आग में घी का काम किया। 1980 के बाद ए0 के0 राय ने एक पुस्तक लिखी “झारखंड़ और लालखंड़” तथा उनके समर्थकों के अन्दर एक नारे का भी प्रचार-प्रसार किया गया- “झारखंड़ को लालखंड़ में बदल डालो”।
झारखंड़ में तथाकथित वामपंथी ताकतों को सबसे बड़ा झटका तब लगा जब बिनोद बिहारी महतो ने 1973 में विधिवत रूप से “झारखंड़ मुक्ति मोर्चा” को जन्म दिया। बिनोद बिहारी महतो का संबंध कम्यूनिष्ट नेताओं से रहें थे । क्योंकि ये स्वंय पुराने कम्यूनिष्ट थे। बंगाल के ज्योति बासु से लेकर बिहार के बड़े कम्यूनिष्ट नेताओं के साथ उन्होंने काम किया था और झारखंड़ में वामपंथ के व्यापक प्रजार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इन पार्टियों के लिए जमीन तैयार की थी। वामपंथी पार्टियों को सबसे बड़ा झटका तब ही लगा था जब बिनोद बिहारी महतो ने झामुमो का गठन कर लिया था।
झामुमो के जुझारू आन्दोलन ने वामपंथ को धीरे-धीरे पीछे धकेल दिया था। झामुमो का आन्दोलन सिर्फ किताबी नहीं था, बल्कि जमीन से सीधा जुड़ा हुआ होने के कारण ज्यादा जुझारू एवं आर्कषक था। वर्ग संघर्ष की अवधारणा के साथ-साथ क्षेत्रिय संघर्ष की तथा वर्ण संघर्ष का अद्भूत समन्वय इसमें दृष्टी गोचर होता था। 1977 तक तो कॉमरेड ए0 के0 राय ठीक ठाक रहे। पर उसके बाद बिनोद बाबू का इस्तेमाल वामपंथियों ने अपनी राजनीति चमकाने के लिए किया। बिनोद बाबू एवं शिबू सोरेन को धोखे में रख कर उनके साथ-साथ चलते हुए वामपंथी उन्हें कमजोर करने की चेष्टा में लग चुके थे। वे दिखावे के लिए साथ थे, पर झारखंड़ अलग राज्य के आन्दोलन का समर्थन नहीं करके से गलत दिशा देने में लगे थे।
झारखंड़ में “नक्सलवाद” एक नया नाम लेकर उभरा। इसके नेताओं ने “लालखंड़” का नारा दिया। इसे ही झारखंड़ का विकल्प दिखलाया गया। कहा गया कि झारखंड़ को लालखंड़ में बदल डालो। कॉ0 राय ने तो “झारखंड़-लालखंड़” नामक पुस्तक 1980 में लिख डाली। निश्चय ही झारखंड़ अलग राज्य के आन्दोलन को रोकने के लिए ही यह नारा दिया गया। इस स्थिति ने एक संदेहात्मक स्थिति पैदा कर दी। अपने वामपंथी पृष्ठ भूमि के चलते तो बिनोद बाबू ने कॉ0 ए0 के0 राय को बरदास्त किया। पर शिबू-सोरेन इसे पचा नहीं पाते थे। पर कालान्तर में उनका कॉ0 ए0 के0 राय से भी गहरा मतभेद हो गया। बिनोद बाबू भी इस विषय पर खिन्न थे पर वे अपने काम में लगे रहे और वामपंथियों को झारखंड़ आन्दोलन में जोड़ते रहे।
1990 में श्री ए0 के0 राय ने झामुमो के खिलाफ विधान सभा चुनाव में अपना उम्मीद्वार सिन्दरी, निरसा, बाघमारा, मांडू, चन्दनकियारी आदि कई सीटें पर खड़ा कर दिया। लाल-हरा मैत्री को तोड़ दिया। अन्य क्षेत्रों में भी झामुमो का तालमेल अन्य वामपंथी दलों से टूट गया था। 1991 के लोक सभा चुनाव में धनबाद से कॉ0 राय हार गये। भुवनेश्वर मेहता सी0 पी0 आई0 हजारीबाग से जीते। भारतीय जनता पार्टी ने 1991 में झारखंड़ के 14 सीटों में से पाँच पर कब्जा किया। झामुमो ने छः सीटें लोकसभा के जीत ली थी। झामुमो के बढ़ते प्रभाव ने न सिर्फ वामपंथियों के जनाधार को खिसका दिया था, अपितु काँग्रेस का दक्षिण बिहार से सफाया ही कर दिया था।
1991 तक झारखंड़ क्षेत्र में उग्रवादी घटनाएँ बढ़ गई थी। “लालखंड़” के नाम पर माओवादी कम्यूनिष्ट सेंटर, पीपुल्स वार ग्रुप के अलावे झारखंड़ मुक्ति मंच का प्रभाव काफी बढ़ गया था। चुनाव बहिष्कार का नारा दिया गया और वोट-बहिष्कार किया जाने लगा। उन क्षेत्रों में वोट-वहिष्कार शुरू किया गया, जहाँ बिनोद बिहारी महतो ज्यादे सक्रिय थे। झामुमो ज्यादा सक्रिय था। स्पष्ट था कि वोट बहिष्कार झामुमो को हराने के उद्देश्य से ही किया जा रहा था।

झामुमो के आन्दोलन को आतंकवादी आन्दोलन कहा गया

मुरलीडीह कोलियरी की एक दिलचस्प घटना है। वहाँ पर बाहरी गुंड़ों एवं गाँव वालों के साथ अकसर गड़ाई होती रहती थी। विस्थापन की लड़ाई लड़ी जा रही थी। बिनोद बाबू का एक कार्यकर्त्ता जो पूरी तरह से उनका भक्त था उस कोलियरी के मुँहाने पर लगे हुए हेड-गियर पर चढ़ गया। हेड-गीयर का एक बड़ा सा ऊँचा मीनार, लोहे की पट्टियों के खम्भों से बनाया जाता है। कोयला निकालने के लिए जो सैकड़ों फीट नीचे कुँआ खोदा जाता है, उसके मुँह को पीट कहते है। इसी पीट के चारों तरफ लोहे के सौ-फीट, पच्चास फीट, खम्भें गाड़ कर वहाँ दो बड़ी घिरनियाँ लगाई जाती है। इन गोलाकार घिरनियों में लोहे के रस्से पार किए जाते हैं। और जिस प्रकार कुँए से बाल्टी में पानी निकालते है, उसी प्रकार नीचे से टबों में डालकर कोयले को उन्ही लोहे की रस्सियों द्वारा खींचकर बाहर निकाला जाता है।

अब माथुर महतो उसी हेड-गीयर के ऊपर घिरनी के पास बैठ गया था। छाता लिए हुए था। सुबह ही चढ़ गया था। सुबह पाली-सिफ्ट के बाद काम बंद कर देना पड़ा। वह नीचे कूद जाने की घमकी प्रबंधन के लोगों को देता जा रहा था। गर्मी का दिन था। वह बीड़ी पीता जाता, तथा खैनी यानि एक प्रकार का तम्बाकू खाता जाता। लाख समझाने पर भी वह नहीं माना। उसने सिर्फ एक ही शर्त्त रखी, कि जब तक बिनोद बाबू आकर उसे नहीं मनाएँगे तब तक वह नहीं उतरेगा। वहीं आवें। हमारे विस्थापितों का काम करायें। दूसरे दिन बिनोद बाबू सीधे कचहरी से वकील की पोशाक में ही मुरलीडीह पीट पर पहुँचे और तब जाकर माथुर महतो पीट के हैड-गीयर से उतरा।

यहाँ उनके द्वारा चलाए गये आन्दोलनों का विस्तृत विवरण नहीं दिया जा सकता है। संक्षेप में विरोध, प्रतिरोध का जो रास्ता बिनोद बाबू ने अपनाया था, वह अनूठा था। शोषणकर्त्ता स्तंभित हो जाता था। आतंकित हो जाता था। छोटी मछलियाँ जिस प्रकार बड़ी मछली के आक्रमण के पहले इकठ्ठा हो जाती हैं एवं सब मिलकर एक ऐसी आकृति बना लेती हैं जो बहुत बड़ी मछली के समान दिखे। इसी सिद्धान्त को बिनोद बाबू ने अपनाया था। आक्रामक तेवर उनलोगों में पैदा किया, जो बिलकुल निरीह थे। उनमें साहस का संचार किया।

प्रतिरोध को जन आन्दोलन का रूप दिया। अगर यह आन्दोलन सशस्त्र था, तो भी इसे आतंकवाद से जोड़ा जाना गलत होगा। आतंकवादी रात के अंधेरे में समूह में हमला करते थे और फरार हो जाते थे। ये अपनी पहचान छुपा कर चलते हैं। यहाँ तक कि छद्यनाम धारण कर लेते हैं। इनके काम करने का तरीका ही था कि चुपचाप वारदात कर डालो और फरार हो जाओ। आम जनता इनसें भयभीत रहती है। गाँव के लोगों को डरा-धमका कर उनसे खर्च करवाना। उनकी मुर्गियों, बकरियों को खा जाना। उन्हें धमकाकर रखना इनका काम था। इनकी कार्यशैली में अपराधिक मनोवृत्ति की स्पष्ट झलक है, चाहे इन वारदातों को वे किसी भी सिद्धान्त का जामा पहना दें। चाहे इसे माओवाद कहें या लेलीनवाद। वारदात करके पहचान छुपाना, पुलिस से बचके रहना, छुपके रहना। चुपके से वारदात करना। यह निश्चय ही आपराधिक कार्य हैं। पर खुला-दिन के उजाले में सशस्त्र प्रतिरोध एवं जेल जाने की मंशा लेकर आगे बढ़ना, दूसरी बात है। अपने कृत्यों को न्यायपूर्ण मानते हुए, एक बलिदान की भावना से आगे आना एक क्रांतिकारी सामाजिक परिवर्त्तन की ओर इशारा करता है। इशारा ही नहीं पथ-प्रदर्शित करता है।

बिनोद बाबू स्वयं वकील थे। इन आन्दोलनों से ऊपजे मुकदमें की देखभाल करने के लिए बुद्धिजीवि वर्ग खासकर वकीलों को प्रेरित करते थे कि वे मुफ्त इन दलित, वंचित, गरीब, शोषित के मुकदमों को लड़े। कई जिलों में उन्होंने ऐसे वकील पैदा किए, ढूँढ़ निकाले जो सुचारू रूप से उनके निर्देश पर काम करते थे। बिनोद बाबू जमीन अधिग्रहण के मामलों के विशेषज्ञ माने जाते थे। उन्होंने सरकार द्वारा कम कीमत पर ली गई जमीनों के विरूद्ध मुकदमें लड़े और विस्थापितों को उचित मुआवजा कोर्ट से दिलवाने का काम किया। पूरे देश में उन्होंने संभवत भू-अर्जन मामलों से संबधित जितने मुकदमें लड़े उतना बहुत विरले वकील ही लड़े होंगे। उन्होंने इससे बहुत पैसा कमाया, पर उस पैसे का अधिकत्तम भाग पार्टी चलाने, गरीबों को मदद करने तथा शैक्षणिक संस्थान खोलने में लगा दिए।

Monday, December 13, 2010

झामुमो के आन्दोलन को आतंकवादी आन्दोलन कहा गया

मात्र तीन वर्षो के अंदर (1970-73) उत्तरी छोटानागपुर के हजारीबाग से धनबाद जिले तक तथा संथाल परगना के जामताड़ा, दुमका आदि जिलों तक यह धान-कटनी का आन्दोलन जोर-शोर से चलने लगा। इसमें न सिर्फ आदिवासी, बल्कि हरिजन पिछड़े वर्ग के लोग जो आदिवासियों की तरह शोषित थे, पीड़ित थे, महाजनी जुल्म से लड़ने के लिए उठ खड़े हुए तथा उन्होनें भी अपनी जमीनों पर कब्जा धान काटकर किया। पूरे क्षेत्र में एक भूचाल सा आ गया था।
उन्ही दिनों 1971 में एक दिन एक नौजवान गोला प्रखंड के नेमरा गाँव से बिनोद बाबू के पास आया था। वह नौजवान था शिबू सोरेन।
सिद्धु कान्हू, चाँद भेरव, बाबा तिलका माँझी से लेकर बिरसा भगवान तक जो लड़ाई लड़ी गई वह वास्तव में जमीन के लिए लड़ी गयी लड़ाई ही थी।
1970 के दसक में ही गाँव के झगड़ों का निपटारा गाँव में ही बिनोद बाबू की प्रेरणा एवं निर्देश से किया जाने लगा। ग्रामीण अब थाना-पुलिस एवं कोर्ट कचहरी से बचने लगे थे। गाँव के समूहों का जो निर्णय होता, उसी को मानने लगे। नतीजा यह निकला कि कई जगहों पर बकायदा ग्रामीण कोर्ट बैठने लगे जिसमें क्रांतिकारी विचार धारा के लोग हिस्सा लेने लगे। पुलिस एवं कोर्ट-कचहरी से वैसे ही लोगों का विश्वास उठ चुका था। अतः इन गाँव के कोर्टो में मामले धड़ाधड़ आने लगे। गाँव वाले कभी-कभी उस इलाके के महाजनों एवं जालिम जमींदारों की शिकायत लेकर आ जाते। तब निर्णय लेना कठिन हो जाता था, क्योंकि आरोपी एक शक्तिशाली व्यक्ति होता था जिसके हाथ मजबूत एवं लम्बे होते थे। ऐसे अवसर पर बिनोद बाबू को बुलाया जाता। बिनोद बाबू नहीं होते तो शिबू सोरेन को बुलाया जाता। वहाँ तथ्यों की सुनवाई रात-भर होती और सर्व सम्पति से निर्णय लिए जाते। अति अत्यचारी व्यक्ति के खिलाफ “बिटलाहा” का आदेश होता। कम अत्याचारी के खेतों पर जबरन कब्जा किये जाने का निर्णय होता, जिन खेतों को महाजन गलत तरीके से हड़प लेते थे। सैकड़ों की तादाद में गाँव वाले हरवे-हथियार से लैस होकर निकलते और दिन के उजाले में निर्णयों को लागू करते। “बिटलाहा” के आदेश पर गाँव वाले अत्याचारी के घर पर धावा बोलते और उसकी सम्पति को नुकसान पहुँचा देते। पर घर के महिलाओं, बच्चों पर कोई आँच नहीं आने देते। मर्द जमींदार अगर मुकाबलें में डटते तो उनके साथ मुकाबला होता। कई जगहों पर कार्यकर्त्ता मारे गये। कहीं-कहीं आततायियों के सर भी कलम कर दिए गये।
इन ग्रामीण कचहरियों का फैलाव होता गया। यहाँ तक कि गाँव तीन-पतली, जिला गिरिडीह में गुणेश्वर हाँसदा के नेतृत्व में ग्रामीण सुप्रीम कोर्ट बन गया।
इस प्रकार सीधी कार्यवाही के आन्दोलन ने जोर पकड़ा एवं यह आम जनता का आन्दोलन बन गया। चारों तरफ स्थिति तनावपूर्ण बन गई थी। पुलिस-प्रशासन की सक्रियता के बावजूद आन्दोलन रूकने का नाम नहीं ले रहा था। लोगों के अंदर आत्म बल इतना बढ़ गया था कि अन्याय के खिलाफ स्वतः र्स्फूत आन्दोलन होने लगे। प्रत्येक गाँव में नौजवान नेता, कार्यकर्त्ता तैयार होने लग गये थे।
1973 के आते-आते प्रशासन ने बिनोद बिहारी महतो पर समान्तर सरकार चलाने का आरोप लगा दिया।
समान्तर सरकार कहें या इसका कुछ और नाम दें। यह तो इसलिए उपजा था कि तत्कालिन व्यवस्था में झारखंड़ी पीस रहे थे। उस तत्कालीन व्यवस्था में उनकी समस्याओं का निदान उन्हें दूर तक दिखाई नहीं देता था। स्वाभाविक था कि वे स्वंय अपनी समस्याओं के समाधान के लिए आगे आते तथा स्व-शासन की ओर प्रेरित होते। पुराने मानकी-मुंड़ा-महतोई परगनैत आदि आदिवासी जनजाति शासन पद्धति की ओर बढ़े जो उनकी अपनी परम्परागत एवं रीति-रिवाज की उपज थी। जो उनका अपना स्वशासन था और जिसको उन्हें मजबूरी में छोड़ना पड़ा था। ब्रिटिश हुकुमत की व्यवस्था को अपनाना पड़ा था। उसी व्यवस्था को अपनाना पड़ा था। वही व्यवस्था हू-बू-हू स्वतंत्र भारत में भी लागू की गई थी। जाहिर है कि जनजातियों का आक्रोश उसी ब्रिटिश व्यवस्था को बल पूर्वक झारखंड़ी व्यवस्था पर लागू करने के विरूद्ध था। इसके लिए कितनी ही लड़ाइयाँ पूर्व में लड़ी गई थी। अतः पूनः स्वशासन की तरफ लोट जाने का आह्वान जो बिनोद बाबू ने दिया था, वह सबको ग्राह्य था। पर यह आन्दोलन था तो व्यवस्था-विरोधी। पर इसे व्यवस्था-विरोधी भी कहना गलत ही होगा। क्योंकि पंच-परमेश्वर है- यह सिद्धांत भारत वर्ष में हजारों वर्षो से चलता रहा है एवं लागू होता रहा है। तो अगर बिनोद बाबू ने फिर गाँव में ही पंचायत बुलाकर समस्याओं के समाधान की ओर कदम बढ़ाया तो उसे गलत कैसे कहा जा सकता है।
पर, गलत कहा गया। आरोप लगाए गये। ब्रिटिश शाषन-पद्धति जो आजाद भारत में हू-ब-हू लागू की गयी, उसके हित में बिनोद बाबू के कार्य कलाप नहीं थे। वे आम जनता के हित में थे। उनपर मुकदमे लादे गये। उन्हें आतंकवादी नेता करार कर दिया गया। और झामुमो के आन्दोलन को आतंकवादी आन्दोलन।
विस्थापन के विरूद्ध लड़ाई किस प्रकार लड़ी गई ? इसका जो तरीका बिनोद बाबू ने आख्तीयार किया वह भी नायाब था। अद्भूत था। टाटा कम्पनी की खदानें जिला धनबाद के जामाडोबा, डूंगरी, पटिया, भौंरा क्षेत्रों में है। साथ ही सिजुआ-भेलाटाँड़ में। फिर हजारीबाग के मांडू इलाके में कई खदानें हैं। टाटा कम्पनी वह कम्पनी है जिसकी कोयला-खदानों का राष्ट्रीयकरण नहीं किया गया। “केपटिव माइन्स” के दायरे में रखकर उन्हें राष्ट्रीयकरण से बाहर रखा गया। टाटा कम्पनी की जमशेदपुर में स्टील उत्पादन का विशाल कारखाना है। सिंहभूम जिले में लौह-अयस्क को गलाने के लिए कोयले की आवश्यकता पड़ती है। इस कम्पनी में सिर्फ कांग्रेस एवं उसकी यूनियन चलती थी। और किसी की भी बात सुनी नहीं जाती थी। टाटा कम्पनी अपने गुंड़ो के बल पर जो काँग्रेस की यूनियन के लोग होते थे और झारखंड़ से बाहरी मूल के होते थे, पूरे इलाके को आतंकित करके रखती थी। अगल बगल के गाँव के लोग जबान तक खोल नहीं सकते थे।
ऐसे माहौल में टाटा कम्पनी से विस्थापितों के लिए न्याय माँगना नक्कारखाने में तूती की आवाज साबित हो रही थी। पर बिनोद बाबू ने माँग नहीं, माँग करके जामाडोबा के पास बहती जोड़िया यानि छोटी नाली को अपने आन्दोलन का स्थल चुना। उन्होंने एक स्थान पर गाँव वालों को इकठ्ठा किया और गैंता-कुदाल लेकर स्वयं जोड़िया में उतरे। उनके पीछे सैकड़ों लोग थे। सभी मिलकर वहाँ पर मिट्टी से जोड़िया पर बाँध बाँधने लगे। अगल बगल के कॉलोनी निवासी एवं टाटा के ऑफिसरों ने सोचा कि ये लोग पागल हो गये हैं। नाला बाँधने से कहीं आन्दोलन होता है। पर जब बाँध बँध गया, दिनभर की मेहनत से, तभी लोगों को इसका प्रभाव नजर आया। पानी जमा हो गया और यह पानी बगल के कोयले की खदान में घुसने लगा। टाटा कम्पनी के ऑफिसरों को तब चिंता हुई कि अगर इसी तरह पानी घूसता रहा तो खदान बंद कर देना पड़ेगा। तब सिक्यूरिटी के लोग आए। बिनोद बाबू ने कहा कि यह जोड़िया सार्वजनिक सम्पत्ति है और इसमें बाँध-बाँधकर के गाँव के लोग अपने खेत की सिंचाई की व्यवस्था कर रहें हैं। इसे रोकने का अधिकार टाटा कम्पनी को नहीं है।
इसके बाद टाटा कम्पनी को झूकना पड़ा और वार्त्ता हुई तथा गाँव वालों एवं विस्थापितों की समस्याओं पर ध्यान दिया गया। नियोजन की पहल शुरू हुई। इस तरह के जन आन्दोलनों के चलते ही बड़ी-बड़ी कम्पनियों को विस्थपितों पर ध्यान देना पड़ा। भारत कोकिंग कोल लिमिटेड की कोलियारी में पहुँचने के लिए गाँव के रास्तों से फिर या तो रैयती जमीनों से होकर गुजरना जरूरी था। कोयला ट्रान्सपोर्ट रोड से करने के लिए, अफसरों के आवागमन के लिए, भीतर गाँव तक तथा खदानों तक जाने के लिए बीसीसीएल द्वारा जमीन अधिग्रहित नहीं की गई थी। लिहाजा बिनोद बाबू ने इन रास्तों को रोकवाना शुरू किया। बहुत सारी जमीनों पर बीसीसीएल ने जबरन कब्जा किया था। उन जमीनों पर मशीनों को चलाने पर रोक लगा दी गई। मशीनों पर झंड़े गाड़े गये।